कथा
0001 - मंगलाचरण
001 - प्रथमं सर्ग
002 - द्वितीयं सर्ग
003 - तृतीय सर्ग
004 - चतुर्थ सर्ग
005 - पंचम सर्ग
006 - षष्टम सर्ग
007 - सप्तम सर्ग
008 - अष्टम सर्ग
009 - नवम सर्ग
कथा
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श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
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श्री-सकलकीर्ति-भट्टारक प्रणीत
श्री
सुकुमाल-चरित्र
आभार : श्री नेमीचन्दजी बाकलीवाल, किशनगढ़; पण्डित देवेन्द्रकुमार जैन, बिजौलियां-राजस्थान
कथा
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