
ज्ञानमती :
यदि अवयव-अवयवी आदि में, भेद सर्वथा कहो सुजान;;देश-काल से भी होगा यह, भेद पुन: युतसिद्ध समान;;पृथक्-पृथक् आश्रय वाले, घट-पट में भी वृत्ती होगी;;तब तो मूर्त कार्य कारण में, एकदेशता नहिं होगी
अवयव, अवयवी आदि में परस्पर में अत्यन्त भेद मानने पर देशकाल की अपेक्षा से भी इनमें भेद मानना होगा एवं देश, काल से भी भेद के मानने पर इनकी वृत्ति युतसिद्ध पदार्थों की तरह होगी, पुन: मूर्त कार्य-कारण में सामान्य देशता-एकदेशपना नहीं बन सकेगा।भावार्थ-इसका भाव यह है कि जब धर्म और धर्मी में अवयव-अवयवी आदि पदार्थों में सर्वथा ही अत्यंत भेद है तब देश और काल की अपेक्षा भी उनमें भेद मानना पड़ेगा। जैसे घट और वृक्ष आदि पदार्थ सर्वथा भिन्न हैं वैसे ही जीव और ज्ञान, वस्त्र और तंतु आदि भी सर्वथा ही भिन्न रहेंगे। घट और उसकी मिट्टी में भी सर्वथा भेद ही बना रहेगा। |