+ सौगत आदि के मत में भी तत्त्वों का ज्ञान होता है, इस प्रकार की आशंका के होने पर कहते हैं -
सर्वज्ञाय निरस्तबाधकधिये स्याद्वादिने ते नम-।
स्तात्प्रत्यक्षमलक्षयन् स्वमतमभ्यस्याप्यनेकांतभाक्॥
तत्त्वं शक्यपरीक्षणं सकलविन्नैकांतवादी तत:।
प्रेक्षावानकलंक याति शरणं त्वामेव वीरं जिनम्॥20॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[स्याद्वादिने] स्याद्वादी [निरस्तबाधक धिये] ज्ञानावरणादि बाधक कारणों से रहित ऐसे ज्ञान वाले [ते सर्वज्ञाय नमस्तात्] आप सर्वज्ञ को नमस्कार होवे। [एकांतवादी] एकांतवादी बुद्ध आदि [स्वमतं अभ्यस्त अपि] अपने मत का अभ्यास करके भी [शक्य परीक्षणं] जिसका परीक्षण करना शक्य है ऐसे [अनेकांतभाव] अनेकांतात्मक [प्रत्यक्षं] प्रत्यक्षरूप [तत्त्वं] तत्त्व को [अलक्षयन्] नहीं जानते हुए [सकलवित् न] सर्वज्ञ नहीं हैं। [तत:] इसलिए [अकलंक] हे कर्मकलंकरहित अकलंक देव! [प्रेक्षावान्] बुद्धिमानजन [त्वां जिनं वीरं एवं] आप जिनेन्द्र भगवान वीरप्रभु की ही [शरणं याति] शरण में आते हैं॥२०॥

  अभयचन्द्रसूरि 

अभयचन्द्रसूरि :

तात्पर्यवृत्ति-एकांतवादी अर्थात् एकांतरूप केवल द्रव्य ही तत्त्व है अथवा पर्याय ही तत्व है, ऐसा कहने का जिन का स्वभाव है वे एकांतवादी बुद्ध, कपिल आदि जन त्रिकालगोचर अशेष द्रव्य पर्यायों को जानने वाले सर्वज्ञ नहीं हो सकते हैं क्योंकि वे अनेकांत स्वरूप को आत्मसात् करने वाले ऐसे जीवादि पदार्थों के स्वरूप को नहीं जानते हैं। उन जीवादि पदार्थों के स्वरूप का परीक्षण करना संशय आदि का व्यवच्छेद करके उनका विवेचन करना यद्यपि शक्य है, लौकिकजनों के गोचर है, प्रत्यक्ष-स्पष्ट है फिर भी वे लोग नहीं जानते हैं। निरन्वय विनाश आदि भावना से सहित चित्र वाले वे लोग सर्वथैकांतरूप अपने मत का अभ्यास करके अनेकांत तत्त्व को जानने में समर्थ नहीं होते हैं पुन: उनको सर्वज्ञता कैसे हो सकती है ?

इस कारण से ज्ञानावरण आदि कलंक से रहित भो अकलंकदेव! आपको मैं नमस्कार करता हूँ। कैसे हैं वे अकलंक भगवान् ? सर्वज्ञ हैं-लोग-अलोक के सभी वस्तु समुदाय को जानने वाले हैं ‘सर्वं जानातीति सर्वज्ञ:’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार सब कुछ जानने वाले हैं। पुन: वे कैसे हैं ?

बाधकरूप जो दोष और आवरण हैं, उनको अनेकांत तत्त्व की भावना के बल से नष्ट कर देने से बाधा रहित ज्ञान को जो धारण करने वाले हैं। पुन: कैसे हैं ? स्यात्-कथंचित् सत्-असत् आदि अनेकांतात्मक तत्त्व को कहने वाले स्याद्वादी हैं। ऐसे आपको मेरा नमस्कार होवे।

केवल मैं ही आपको नमस्कार नहीं करता हूँ किन्तु सभी प्रेक्षावान्-परीक्षकजन आपकी शरण में आते हैं। नित्य प्रवृत्त होने वाले वर्तमान की अपेक्षा से इस प्रकार का वचन है।

क्या नाम वाले भगवान् की शरण में परीक्षक लोग आते हैं ? जिनका ‘वीर’ नाम है ऐसे जो अंतिम तीर्थंकर वर्धमान भगवान हैं पुन: वे कैसे हैं ? जिन हैं-नानाविध विषम भव वन में भ्रमण के कारणभूत दुष्कृत को जो जीतते हैं, वे जिन कहलाते हैं। सभी लोग उनकी शरण को प्राप्त करते हैं क्योंकि वे तीर्थंकर शास्त्रकारों का उपकार करने वाले हैं।

विशेषार्थ-यहाँ पर श्री भट्टाकलंक देव ने तीन विशेषणों से विशिष्ट देव को नमस्कार किया है। सर्वज्ञ, निरस्तबाधक धी और स्याद्वादी। ये तीनों विशेषण भगवान उमास्वामी के द्वारा तत्त्वार्थसूत्र महाशास्त्र की आदि में किये गये मंगलाचरण के समान ही हैं। स्याद्वादी विशेषण मोक्षमार्ग के नेतृत्व को सूचित करता है, निरस्तबाधक धी विशेषण कर्म पर्वत के नेतृत्व को स्पष्ट कर रहा है और सर्वज्ञ विशेषण तत्त्वों के ज्ञातृत्व को बतला रहा है। ऐसे ही श्री समंतभद्रस्वामी ने आप्त के सर्वज्ञ, वीतराग और हितोपदेशी ये तीन विशेष गुण बतलाये हैं सो यहाँ भी सर्वज्ञ से सर्वज्ञ, निरस्त बाधक बुद्धि से वीतरागता और स्याद्वादी से हितोपदेशिता सिद्ध हो जाता है। ऐसे तीन विशेषणों से विशिष्ट को नमस्कार करके श्री अकलंक देव ने अपने नाम को धारण करने वाले ऐसे कर्म कलंक रहित अकलंक भगवान को संबोधन करके कहा है कि हे अकलंक भगवन्! आप जिन वीर की शरण में सभी परीक्षक लोग आ जाते हैं।

(अब वृत्तिकार श्री अभयचंद्रसूरि श्री भट्टाकलंक देव और प्रभाचंद्राचार्य का स्मरण करते हुए इस परिच्छेद को पूर्ण करते हुए श्लोक कहते हैं)-

श्लोकार्थ-श्रीमान् भट्टाकलंकरूप चंद्रमा की प्रभा-किरणों से यह नय और दुर्नय के निरूपण रूप धान्य समूह पुष्टि को प्राप्त हुआ है। उसमें नय से निष्ठुर-कुशल यह श्री अभयचंद्रसूरि के द्वारा रचित तात्पर्यवृत्ति अखिल जनों के हित के लिए अर्थ के पाक की पटुता को प्राप्त होती है।।१।।

भावार्थ-धान्य आदि के खेत चंद्रमा की किरणों से पुष्टि को प्राप्त होते हैं, बढ़ते हैं, पुन: पक जाते हैं तब लोगों को फल देने लगते हैं। ऐसे ही यहाँ पर वृत्तिकार ने कहा है कि सुनय और दुर्नय का निरूपण करने वाला जो यह प्रकरण है वह धान्य का खेत है उसे श्री अकलंकदेव रूपी चंद्रमा के द्वारा प्रगट हुई किरणों ने अथवा प्रभाचंद्र सूरि की वाणी ने पुष्ट किया है, बढ़ाया है, पुन: मैंने जो तात्पर्यवृत्ति टीका की है उसने इस धान्य को पकाकर फल देने वाली कर दिया है अर्थात् सभी भव्य जीव इस टीका के आधार से सुनय-दुर्नय के मर्म को समझकर उसके फलस्वरूप सम्यग्ज्ञान को प्राप्त कर लेंगे।

इस प्रकार श्री अभयचंद्रसूरि कृत लघीयस्त्रय की स्याद्वादभूषण संज्ञक तात्पर्यवृत्ति टीका में पाँचवां परिच्छेद पूर्ण हुआ।

नय प्रवेश नाम से द्वितीय प्रकरण वाला द्वितीय महाधिकार समाप्त हुआ।