टीका
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परम्परा से संभव अन्य हेतुओं का पूर्वोक्त हेतुओं में ही अन्तर्भाव
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परम्पराया संभवत्साधनमत्रैवान्तर्भावनीयम् ॥86॥
अन्वयार्थ :
और भी जो साधन
(हेतु)
सम्भव हो सकते हैं उनका पूर्वोक्त साधनों में ही अन्तर्भाव करना चाहिए ।
टीका