+ दृष्टान्तादिक साध्य की सिद्धि के लिए फलवान नहीं -
तावता च साध्यसिद्धिः ॥93॥
अन्वयार्थ : उतने मात्र से ही साध्य की सिद्धि हो जाती है ।

  टीका 

टीका :

उस साध्य अविनाभावि हेतु के प्रयोग से ही साध्य की सिद्धि हो जाती है, इसलिए साध्य की सिद्धि में दृष्टान्तादिक की कोई आवश्यकता नहीं है।

विशेष : उतने मात्र से अर्थात् जिसका विपक्ष में रहना निश्चित रूप से असंभव है, ऐसे हेतु के प्रयोग मात्र से ही साध्य की सिद्धि हो जाती है। अतः उसके लिए दृष्टान्तादिक का प्रयोग कोई फलवाला नहीं है।