+ अकिञ्चित्कर हेत्वाभास के प्रयोग की उपयोगिता -
लक्षणे एवासौ दोषो व्युत्पन्नप्रयोगस्य पक्षदोषेणैवदुष्टत्वात् ॥39॥
अन्वयार्थ : लक्षण की अपेक्षा से ही यह दोष है क्योंकि व्युत्पन्न पुरुषों का प्रयोग पेक्ष के दोषों से ही पुष्ट हो जाता है।

  टीका 

टीका :

अकिञ्चित्कर हेत्वाभास का विचार शास्त्रकाल में ही होता है, वाद काल में नहीं, क्योंकि व्युत्पन्न पुरुषों का प्रयोग पक्ष के दोषों से ही दूषित हो जाता है। विशेष : शिष्यों को शास्त्र के पठन-पाठनकाल में ही अकिञ्चित्कर हेत्वाभास को दोष रूप कहा गया है, शास्त्रार्थ करने के समय नहीं क्योंकि शास्त्रार्थ के समय विद्वान् लोगों का ही अधिकार होता है।