+ बौद्धादि के मत में भी संख्याभासपना -
सौगतसांख्ययोगप्राभाकरजैमिनीयानां प्रत्यक्षानुमानागमोप मानार्थापत्याभावैरेकैकाधिकैः व्याप्तिवत् ॥57॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार बौद्ध, सांख्य, योग, प्रभाकर और जैमिनीयों के प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्थापत्ति और अभाव इन एक-एक अधिक प्रमाणों के द्वारा व्याप्ति विषय नहीं की जाती है।

  टीका 

टीका :

जैसे - बौद्ध, सांख्य, यौग, प्रभाकर, जैमिनीय इनके द्वारा ' स्वीकृत एक-एक अधिक प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्थापत्ति और अभाव के द्वारा व्याप्ति का निर्णय नहीं होता। इसलिए उनकी संख्या संख्याभास है इसी प्रकार चार्वाक भी प्रत्यक्ष मात्र से ही परलोकादि का निषेध तथा पर की बुद्धि आदिक की सिद्धि नहीं कर सकता। इसलिए चार्वाक के द्वारा स्वीकृत प्रत्यक्ष ही एक प्रमाण है - ऐसा मानना संख्याभास है।

विशेषार्थ : मत प्रमाण संख्या 1. चार्वाक / प्रत्यक्ष (एक) : 2. सौगत प्रत्यक्ष, अनुमान (दो) 3. सांख्य प्रत्यक्ष, अनुमान, आगेम, (तीन) 4. यौग प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान (चार) 5. प्रभाकर प्रत्यक्ष, अनुमान आगम, उपमान, अर्थापत्ति (पाँच) 6. जैमिनीय प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्थापत्ति, अभाव (छ:) इन सबके द्वारा माने गए प्रमाणों से व्याप्ति अर्थात् अविनाभाव का ग्रहण नहीं होता है।