
टीका :
कोई और कहता है कि अनुमानादि के पर बुद्धयादि का निश्चायकपना स्वीकार करने पर भी चार्वाकादि को प्रत्यक्ष एक प्रमाणवाद को त्याग करने का प्रसंग आता है। जैसे - सौगतादि को तर्क प्रमाण के द्वारा व्याप्ति का निश्चय स्वीकार करने पर उनके द्वारा स्वीकृत दो, तीन, चार आदि संख्या का व्याघात होता है। यदि कोई कहे कि - तर्क को मानकर भी हम उसे प्रमाण नहीं मानेंगे, अप्रमाण मान लेवेंगे, व्याप्ति का ज्ञान आकाश पुष्प के समान हो जावेगा। अप्रमाण के समारोप आदि का निराकरण न करने से अपने विषय के निश्चायकपने का अभाव होने से। |