+ सर्वथा भेदपक्ष में दूषण -
भेदेत्वात्मान्तरवत्तदनुपपत्तेः ॥71॥
अन्वयार्थ : भेद मानने पर अन्य आत्मा के समान यह इस प्रमाण का फल है ऐसा व्यवहार हो नहीं सकता है।

  टीका 

टीका :

प्रमाण को फल से सर्वथा भिन्न मानने में यह दोष आता है कि जिस तरह आत्मा के प्रमाण का फल उस ही प्रकार हमारे आत्मा के प्रमाण का फल दोनों सदृश हो जावेंगे। फिर वह फल हमारे प्रमाण का और दूसरे के आत्मा के प्रमाण का नहीं यह कैसे व्यवस्थित होगा ? इसका निष्कर्ष यह है कि जैसे-दूसरे आत्मा के प्रमाण का फल हमारा नहीं कहलाता उसी प्रकार हमारे आत्मा के प्रमाण का फल भी हमारा नहीं कहलायेगा।