आर्यिका-ज्ञानमती
001 - देवों की पूजा आदि से आप महान नहीं हैं
002 - विग्रह आदि महोदय से भी आप महान नहीं हैं
003 - तीर्थंकरत्व हेतु से भी आप महान नहीं हैं
004 - दोषों तथा आवरणों का पूर्णतया अभाव संभव है
005 - सर्वज्ञ की व्यवस्था
006 - आप ही निर्दोष सर्वज्ञ हैं
007 - सर्वथा एकांतवाद प्रमाण से बाधित है
008 - एकांत में शुभ-अशुभ आदि नहीं बनते
009 - भावैकांत की मान्यता में दोष
010 - प्रागभाव-प्रध्वंसाभाव को न मानने में दोष
011 - अन्योन्याभाव-अत्यंताभाव को न मानने में दोष
012 - अभावैकान्त की मान्यता में दोष
013 - एकांतरूप भावाभाव और अवक्तव्य में दोष
014 - भाव-अभाव आदि निर्दोष कैसे हैं ?
015 - सत् असत् निर्दोष कैसे हैं ?
016 - उभय और अवक्तव्य कथन निर्दोष कैसे हैं ?
017 - भावधर्म अभाव के साथ रहता है
018 - अभाव भाव के साथ रहता है
019 - वस्तु भावाभावात्मक है
020 - शेष भंग भी नय विवक्षा से बनेंगे
021 - वस्तु एक रूप नहीं है
022 - प्रत्येक धर्म का अर्थ पृथक् है
023 - अन्य धर्मों में भी सप्तभंगी प्रक्रिया करना
024 - अद्वैत एकांत में दोष
025 - अद्वैत में शुभ-अशुभ आदि द्वैत नहीं बनते
026 - अद्वैत में द्वैत आ जाता है
027 - अद्वैत के बिना द्वैत कैसे ?
028 - पृथक्त्वैकांत नहीं बनता
029 - बौद्ध की पृथक्त्व मान्यता में दोष
030 - क्या ज्ञान ज्ञेय से सर्वथा भिन्न है
031 - बौद्ध के यहाँ वचन किसको कहते हैं ?
032 - अद्वैत पृथक्त्व एकान्त में दोष
033 - अद्वैत और पृथक्त्व सच्चे भी हैं
034 - सभी वस्तुएँ एकत्व और पृथक्त्व रूप केसे हैं ?
035 - सत् में ही विवक्षा और अविवक्षा होती है
036 - एक वस्तु में भेद और अभेद दोनों केसे होंगे ?
037 - वस्तु को सर्वथा नित्य मानने में दोष
038 - प्रमाण और कारकों के नित्य होने में विक्रिया केसी ?
039 - सर्वथा सत् रूप कार्य उत्पन्न केसे होगा ?
040 - नित्य एकांत में पुण्य पापादि भी असंभव हैं
041 - क्षणिक एकांत भी असंभव है
042 - कार्य सर्वथा असत् से केसे होगा ?
043 - क्षणिक एकांत में कार्यकारण भाव असंभव है
044 - बौद्ध भिन्न-भिन्न कार्यक्षणों में एकत्व को संवृति से मानता है
045 - बौद्ध के यहाँ चतुष्कोटि विकल्प अवक्तव्य है
046 - एकांत से अवक्तव्य मान्यता में दोष
047 - असत् का निषेध होता है क्या ?
048 - अवस्तु ही अवक्तव्य है
049 - सभी धर्मों से रहित को कहा नहीं जा सकता
050 - आप बौद्ध वस्तु को अवाच्य क्यों मानते हो ?
051 - सर्वथा क्षणिक में कृतनाश आदि दोष आते हैं
052 - नाश को निर्हेतुक मानने में दोष
053 - बौद्ध ने हेतु को विसदृश कार्य के लिए माना है
054 - बौद्ध के यहाँ स्कंधादी में उत्पादादि नहीं बनते हैं
055 - नित्य क्षणिक का उभय एकांत सदोष है
056 - नित्य और क्षणिक स्याद्वाद में निर्दोष हैं
057 - उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य की व्यवस्था
058 - उत्पाद आदि अभिन्न हैं
059 - एक द्रव्य के नाश आदि में भिन्न भाव होते है
060 - वस्तु तत्त्व त्रयात्मक है
061 - क्या कार्य कारण आदि सर्वथा भिन्न हैं ?
062 - वैशेषिक के सर्वथा भिन्नैकांत में दोष
063 - वैशेषिक को देश-काल भेद भी मानना चाहिए
064 - समवाय से वृत्ति मानने में दोष
065 - सामान्य समवाय एक-एक हैं
066 - सामान्य समवाय भी परस्पर में भिन्न हैं
067 - परमाणु की अन्यरूप परिणति न मानने में दोष
068 - कार्य भ्रांत है तो कारण भी भ्रांत है
069 - सांख्य के यहाँ कार्यकारणादि में एकत्व ही है
070 - सर्वथा भिन्न-अभिन्न की उभय और अवाच्य भी सदोष है
071 - कथंचित् कार्य-कारण आदि का भेद-अभेद ठीक है
072 -
073 - धर्म, धर्मी सर्वथा आपेक्षिक या अनापेक्षिक ही नहीं है
074 - आपेक्षिक-अनापेक्षिक का उभय एवं अवाच्य एकांत से नहीं घटता
075 - आपेक्षिक-अनापेक्षिक की अनेकांत व्यवस्था
076 - सर्वथा हेतु सिद्ध या आगम सिद्ध तत्त्व बाधित है
077 - हेतु के और आगम के उभय एवं अवाच्य भी सदोष हैं
078 - हेतु और आगम का अनेकांत
079 - सर्वथा अंतरंग अर्थ मानना सदोष है
080 - ज्ञान मात्र मानने से साध्य-साधन भी नहीं बनेंगे
081 - सर्वथा बहिरंग अर्थ ही है ऐसा कहना भी सदोष है
082 - अंतरंग और बहिरंग अर्थ का उभय और अवाच्य भी सदोष हैं
083 - ज्ञान पदार्थ और बाह्य पदार्थ दोनों ही सिद्ध हैं
084 - जीव शब्द बाह्य अर्थ से सहित है
085 - संज्ञा रूप हेतु निर्दोष है
086 - विज्ञानाद्वैतवादी का समाधान
087 - ज्ञान और शब्द की प्रमाणता कैसे है ?
088 - क्या भाग्य से ही सभी कार्य सिद्ध हो सकते हैं ?
089 - क्या एकांत से पुरुषार्थ से ही कार्य सिद्ध होते हैं ?
090 - भाग्य-पुरुषार्थ के उभय एवं अवाच्य का खंडन
091 - भाग्य और पुरुषार्थ का अनेकांत
092 - क्या पर को सुख-दु:ख देने से ही पुण्य-पाप बंध निश्चित है ?
093 - क्या स्वयं में दु:ख-सुख से पुण्य-पाप होता है ?
094 - पुण्य-पाप का उभय एवं अवक्तव्य भी एकांत से सदोष है
095 - पुन: पुण्य-पाप का बंध कैसे होता है ?
096 - क्या अज्ञान से बंध और अल्पज्ञान से मोक्ष होता है ?
097 - अज्ञान, अल्पज्ञान से बंध-मोक्ष का उभय और अवक्तव्य नहीं बनता है
098 - अज्ञान से बंध एवं अल्पज्ञान से मोक्ष की सुंदर व्यवस्था
099 - कर्मबंध के अनुसार संसार विचित्र है
100 - शुद्धि-अशुद्धि शक्तियाँ कैसी हैं
101 - प्रमाण का लक्षण और भेद
102 - प्रमाणों का फल क्या है ?
103 - ‘स्यात्’ शब्द का महत्व
104 - स्याद्वाद का स्वरूप
105 - स्याद्वाद और केवलज्ञान में क्या अंतर है ?
106 - नय और हेतु का लक्षण
107 - द्रव्य का स्वरूप
108 - मिथ्यानय-सम्यकनय का लक्षण
109 - वस्तु को विधि आदि के द्वारा कहते है
110 - उभयात्मक वस्तु को एक रूप कहना मिथ्या है
111 - वचन का वास्तविक स्वभाव क्या है ?
112 - स्यात्कार ही अभिप्रेत को प्राप्त कराने वाला है
113 - स्याद्वाद की सम्यक् व्यवस्था
114 - आप्त मीमांसा करने का उद्देश्य
आर्यिका-ज्ञानमती
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श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
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स्वामी-श्री-समंतभाद्राचार्य-देव-विरचित
श्री
देवागम स्तोत्र
अपरनाम : आप्त मीमांसा
मूल संस्कृत गाथा,
आर्यिका ज्ञानमती कृत हिंदी टीका सहित
ज्ञानमती
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