सहजानन्द-वर्णी
001 - मंगलाचरण
002 - गुणों के समुद्र की स्तुति असंभव
003 - धृष्टतापूर्वक फिर भी आपकी स्तुति करता हूँ
004 - आप ही शुद्ध, शक्तिमान, अनुपम एव शातं हैं
005 - जिनशासन के अपवाद का हेतु
006 - जिनदेव का शासन
008 - अन्य एकांत मतों में बंध, मोक्ष आदि घटित नहीं होते हैं --
009 - एकान्त मतों की सिद्धि स्वभाव हेतु से संभव नहीं है --
010 - अवक्तव्य एकान्त में दोष
011 - क्षणिकैकान्त पक्ष में दोष
012 - निरन्वय विनाश मानने में दोष
013 - क्षणिकैकान्तवाद में हेतु घटित नहीं होता
014 - पदार्थों के आकस्मिक विनाश मानने में दोष
015 - उपचार से भी क्षणिक पक्ष में दोष
016 - क्षणिकैकान्त से लोक-व्यवहार का लोप
017 - क्षणिकैकान्त में निर्विकल्प-बुद्धिभूत स्वपक्ष ही बाधित
018 - विज्ञानाद्वैत में व्यभिचार दोष
019 - विज्ञानाद्वैत में स्वसंवेदन भाव नहीं बनता
020 - स्वसंवेदनाद्वैत गूंगे की भाषा के समान प्रलाप-मात्र
021 - संवेदनाद्वैत में संवृति और परमार्थ दोनों का अभाव
022 - संवेदनाद्वैत की सिद्धि किसी प्रमाण से संभव नहीं
023 - संवेदनाद्वैत को उपचार मानने में भी दोष
024 - संवेदनाद्वैत में विद्या प्राप्ति असंभव
025 - शून्यवाद की मान्यता में दोष
026 - वस्तु सामान्य-विशेषात्मक
027 - शून्यवाद में बन्ध और मोक्ष संभव नहीं
028 - उभय एकान्त रूप अवाच्य में दोष
029 - अवाच्य एकान्त का निराकरण
030 - सर्वथा एकान्त से वस्तु की सिद्धि नहीं होती
031 - असत्य में भेद विशेषण की अपेक्षा, एकान्तिक नहीं
032 - बौद्ध मत में चतुःकोटि की मान्यता का खण्डन
033 - बौद्ध मतानुसार मान्य निर्विकल्पक-प्रत्यक्ष का निरसन
034 - शून्यैकान्तवाद में शुभाशुभ कार्य एवं कर्ता आदि घटित नहीं
035 - चार्वाक मत की मान्यतायें भोले प्राणियों को ठगने वाली
036 - भूतचतुष्टय से चैतन्य की उत्पत्ति की मान्यता का निरसन-
037 - चार्वाक एवं मीमांसक मत से स्वच्छन्द वृत्ति की पुष्टि
038 - मीमांसक द्वारा मान्य हिंसादि से स्वर्ग की प्राप्ति मिथ्या
039 - प्रचलित अन्य मिथ्या मान्यतायें युक्तिपूर्ण नहीं
040 - विशेष सामान्यनिष्ठ है अतः वस्तु सामान्य-विशेषात्मक
041 - 'एवकार' एकान्तिक पक्ष होने से वस्तु का अभाव
042 - 'एवकार' के न कहने पर वस्तु के वस्तुत्व की हानि
043 - 'स्यात्' शब्द से ही वस्तु के स्वरूप का निश्चय
044 - बिना कहे भी 'स्यात्' शब्द का ग्रहण करना चाहिए
045 - सप्तभंगी का निरूपण
046 - 'स्यात्' के प्रयोग से ही अनेकान्तात्मक वस्तु की सिद्धि
047 - स्याद्वाद में ही अनेकान्तात्मक वस्तुतत्त्व का सम्यक् निरूपण संभव
048 - वीर शासन की 'युक्त्यनुशासन' ही सार्थक संज्ञा
049 - एकानेक रूप वस्तु की सिद्धि
050 - सापेक्ष नयों से वस्तु तत्त्व की सिद्धि
051 - अनेकान्तात्मक वस्तु-तत्त्व का निश्चय ही सम्यग्दर्शन
052 - बन्ध्-मोक्ष की समीचीन सिद्धि अनेकान्त मत से ही संभव
053 - सामान्य-विशेषात्मक वस्तु तत्त्व की सिद्धि
054 - सामान्य मात्र वस्तु की सिद्धि संभव नहीं
055 - अवस्तुभूत सामान्य अप्रमेय होने से वस्तु तत्त्व की सिद्धि नहीं
056 - अन्य दर्शनों में मान्य सामान्य-विशेष के स्वरूप से वस्तु स्वरूप की सिद्धि नहीं
057 - निःस्वभावभूत संवृतिरूप साधन से संवृतिरूप साध्य की सिद्धि की युक्ति वस्तु स्वरूप के निर्धरण में असमर्थ
058 - संवेदनाद्वैत स्वपक्ष का घातक
059 - सर्वशून्यतारूप अभावैकान्त से वस्तु स्वरूप की सिद्धि संभव नहीं
060 - वाक्य विधि-प्रतिषेध दोनों का विधायक है
061 - स्याद्वाद शासन सभी की उन्नति का साध्क-रूप 'सर्वोदय' तीर्थ
062 - हे वीर जिन! आपके शासन में श्रद्धान करने वाला अभद्र भी समन्तभद्र हो जाता है
063 - राग-द्वेष से रहित हिताभिलाषियों के हित के उपायभूत यह आपके गुणों का स्तवन किया है
064 - हे महावीर स्वामी! आप ही स्तुति के योग्य
सहजानन्द-वर्णी
!!
श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम:
!!
आचार्य समंतभद्र-देव-विरचित
श्री
युक्त्यनुशासन
मूल संस्कृत सूत्र
वर्णी
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