
जीव निरजीव करता करम पुन्न पाप,
आस्रव संवर निरजराबंध मोष है ।
सरव विशुद्धि स्यादवाद साध्य साधक,
दुवादस दुवार धरै समैसार कोष है ॥
दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै,
निगमकौ नाटक परमरसपोष है ।
सौ परमागम बनारसी बखानै जामैं,
ज्ञान को निदान सुद्ध चारित की चोष है ॥५१॥
अन्वयार्थ :
जीव निरजीव करता करम पुन्न पाप,
आस्रव संवर निरजराबंध मोष है ।
सरव विशुद्धि स्यादवाद साध्य साधक,
दुवादस दुवार धरै समैसार कोष है ॥
दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै,
निगमकौ नाटक परमरसपोष है ।
सौ परमागम बनारसी बखानै जामैं,
ज्ञान को निदान सुद्ध चारित की चोष है ॥५१॥