+
आत्मज्ञानी के परिणाम
-
(
(कवित्त)
)
जब चेतन सँभारि निज पौरुष, निरखै निजद्रगसौं निज मर्म।
तब सुखरूप विमल अविनासिक, जानै जगतसिरोमनिधर्म ॥
अनुभौ करै सुद्ध चेतनकौ, रमै स्वभाव वमैसब कर्म।
इहि विधि सधै मुकति कौ मारग, अरुसमीप आवै सिव सर्म ॥५॥