((सवैया इकतीसा))
पुग्गलकर्म करै नहि जीव, कही तुम मैं समुझी नहि तैसी ।
कौन करै यह रूप कहौं अब, को करता करनी कहु कैसी ॥
आपुही आपु मिलै बिछुरै जड़, क्यौं करि मो मन संसय ऐसी ?
सिष्य संदेह निवारन कारन , बात कहैं गुरु है कछु जैसी ॥१९॥