प्रवचनसार
























- कुन्दकुन्दाचार्य



nikkyjain@gmail.com
Date : 28-Sep-2022

Index


अधिकार

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार चरणानुयोग-चूलिका-अधिकार परिशिष्ट







Index


गाथा / सूत्रविषय
000_index) विषयानुक्रमणिका
000_मंगलाचरण) टीकाकार (अमृतचंद्रआचार्य और जयसेनाचार्य) द्वारा मंगलाचरण

ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार

001) तीर्थ-नायक को प्रणमन
002) पंच परमेष्ठी को नमस्कार
003) वर्तमान तीर्थंकरों को नमन
004-005) साम्य का आश्रय
006) सराग और वीतरागचारित्र में हेय-उपादेय
007) चारित्र का स्वरूप
008) आत्मा ही चारित्र है
009) जीव ही शुभ, अशुभ और शुद्ध
010) परिणाम वस्तु का स्वभाव
011) शुद्ध परिणाम के ग्रहण और शुभ परिणाम के त्याग के लिये उनका फल विचारते हैं
012) अत्यन्त हेय है ऐसे अशुभ परिणाम का फल विचारते हैं
013)  शुद्धोपयोग के फल की आत्मा के प्रोत्साहन के लिये प्रशंसा करते हैं
014) शुद्धोपयोग परिणत आत्मा का स्वरूप
015) शुद्धोपयोग द्वारा तत्काल ही होनेवाली शुद्ध आत्मस्वभाव प्राप्ति की प्रशंसा
016) शुद्धात्म स्वभाव की प्राप्ति अन्य कारकों से निरपेक्ष होने से अत्यन्त आत्माधीन
017) शुद्धात्म-स्वभाव के अत्यन्त अविनाशीपना और कथंचित् उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्तता
018) उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य सर्व द्रव्यों के साधारण, शुद्ध आत्मा के भी
019) सर्वज्ञ को जो मानते हैं, वो सम्यग्दृष्टी
020) आत्मा के इन्द्रियों के बिना ज्ञान और आनन्द कैसे?
021) शुद्ध आत्मा के शारीरिक सुख दुःख नहीं
022) केवली भगवान के सब प्रत्यक्ष
023) भगवान को कुछ भी परोक्ष नहीं
024) आत्मा का ज्ञान प्रमाणपना और ज्ञान का सर्वगतपना
025-026) आत्मा को ज्ञान प्रमाण न मानने में दोष
027) ज्ञान की भाँति आत्मा का भी सर्वगतत्व न्याय-सिद्ध
028) आत्मा और ज्ञान के एकत्व-अन्यत्व का विचार
029) ज्ञान ज्ञेय के समीप नहीं जाता
030) ज्ञेय-पदार्थों में प्रविष्ट नहीं हुआ होने पर भी प्रविष्ट की भाँति ज्ञात होता है
031) उसी अर्थ को दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं
032) पदार्थ ज्ञान में वर्तते हैं
033) ज्ञानी की ज्ञेय पदार्थों के साथ भिन्नता ही है
034) भाव-श्रुतज्ञान से भी आत्मा का परिज्ञान होता है
035) पदार्थों की जानकारी-रूप भावश्रुत ही ज्ञान है
036) भिन्न ज्ञान से आत्मा ज्ञानी नहीं होता
037) आत्मा ज्ञान है और शेष ज्ञेय हैं
038) भूत-भावि पर्यायें वर्तमान ज्ञान में विद्यमान--वर्तमान की भांति दिखाई देती हैं
039) भूत-भावि पर्यायों की असद्भूत--अविद्यमान संज्ञा है
040) वर्तमान ज्ञान के असद्भूत पर्यायों का प्रत्यक्षपना दृढ़ करते हैं
041) भूत-भावि सूक्ष्मादि पदार्थों को इन्द्रिय ज्ञान नहीं जानता है
042) अतीन्द्रिय ज्ञान भूत-भावि सूक्ष्मादि पदार्थों को जानता है
043) जिसके कर्मबन्ध के कारणभूत हितकारी-अहितकारी विकल्परूप से, जानने योग्य विषयों में परिणमन है, उसके क्षायिकज्ञान नहीं है
044) ज्ञान और रागादि रहित कर्म का उदय बंध का कारण नहीं है
045) केवली के रागादि का अभाव होने से धर्मोपदेशादि भी बंध के कारण नहीं हैं
046) रागादि रहित कर्मोदय तथा विहारादि क्रिया बंध का कारण नहीं है
047) केवली-भगवान की भाँति समस्त जीवों के स्वभाव विघात का अभाव होने का निषेध
048) पुन: चालु विषय का अनुसरण करके अतीन्द्रिय ज्ञान को सर्वज्ञरूप से अभिनन्दन करते हैं
049) जो सबको नहीं जानता वह एक को भी नहीं जानता
050) एक को न जानने वाला सबको नहीं जानता
051) क्रमश: प्रवर्तमान ज्ञान की सर्वगतता सिद्ध नहीं होती
052) युगपत् प्रवृत्ति के द्वारा ही ज्ञान का सर्वगतत्व
053) केवलज्ञानी के ज्ञप्तिक्रिया का सद्भाव होने पर भी उसके क्रिया के फलरूप बन्ध का निषेध
054) ज्ञान-प्रपंच व्याख्यान के बाद आधारभूत सर्वज्ञ को नमस्कार
055) ज्ञान और सुख की हेयोपादेयता
056) अतीन्द्रिय सुख का साधनभूत अतीन्द्रिय ज्ञान उपादेय है
057) इन्द्रिय-सुख का साधनभूत इन्द्रिय-ज्ञान हेय है
058) इन्द्रियाँ मात्र अपने विषयों में भी युगपत् प्रवृत्त नहीं होतीं, इसलिये इन्द्रियज्ञान हेय ही है
059) इन्द्रियज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है
060) परोक्ष और प्रत्यक्ष के लक्षण बतलाते हैं
061) प्रत्यक्ष-ज्ञान पारमार्थिक सुख-रूप
062) ऐसे अभिप्राय का खंडन करते हैं कि 'केवलज्ञान को भी परिणाम के द्वारा' खेद का सम्भव होने से केवलज्ञान ऐकान्तिक सुख नहीं है
063) 'केवलज्ञान सुखस्वरूप है' ऐसा निरूपण करते हुए उपसंहार
064) केवलज्ञानियों को ही पारमार्थिक सुख होता है
065) परोक्षज्ञान वालों के अपारमार्थिक इन्द्रिय-सुख
066) जहाँ तक इन्द्रियाँ हैं वहाँ तक स्वभाव से ही दुःख है
067) मुक्त आत्मा के सुख की प्रसिद्धि के लिये, शरीर सुख का साधन होने की बात का खंडन
068) इसी बात को दृढ़ करते हैं
069) जैसे निश्चय से शरीर सुख का साधन नहीं है, उसी प्रकार निश्चय से विषय भी सुख के करण नहीं
070) आत्मा के सुख-स्वभावता और ज्ञान-स्वभावता अन्य दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं
071) श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव पूर्वोक्त लक्षण अनन्त-सुख के आधारभूत सर्वज्ञ को वस्तुस्तवनरूप से नमस्कार करते हैं
072) उन्हीं भगवान को सिद्धावस्था सम्बन्धी गुणों के स्तवनरूप से नमस्कार
073) इन्द्रिय-सुख स्वरूप सम्बन्धी विचारों को लेकर, उसके साधन (शुभोपयोग) का स्वरूप
074) शुभोपयोग साधन है और उनका साध्य इन्द्रियसुख है
075) इसप्रकार इन्द्रिय-सुख की बात उठाकर अब इन्द्रिय-सुख को दुखपने में डालते हैं
076) इन्द्रिय-सुख के साधनभूत पुण्य को उत्पन्न करनेवाले शुभोपयोग की, दुःख के साधनभूत पाप को उत्पन्न करनेवाले अशुभोपयोग से अविशेषता
077) शुभोपयोग-जन्य फलवाला जो पुण्य है उसे विशेषत: दूषण देने के लिये उस पुण्य को (उसके अस्तित्व को) स्वीकार करके, उसकी (पुण्य की) बात का खंडन
078) इस प्रकार स्वीकार किये गये पुण्य दु:ख के बीज (तृष्णा) के कारण हैं
079) पुण्य में दुःख के बीज की विजय घोषित करते हैं
080) पुन: पुण्य-जन्य इन्द्रिय-सुख को अनेक पकार से दुःखरूप प्रकाशित करते हैं
081) पुण्य और पाप की अविशेषता का निश्चय करते हुए उपसंहार
082) इस प्रकार शुभ और अशुभ उपयोग की अविशेषता अवधारित करके, अशेष दुःख का क्षय करने का मन में दृढ़ निश्चय करके शुद्धोपयोग में निवास
083) शुद्धोपयोग के अभाव में शुद्धात्मा को प्राप्त नहीं करता है - व्यतिरेक रूप से दृढ करते हैं
084) शुद्धोपयोग का अभाव होने पर जैसे (जिन के समान) जिन सिद्ध स्वरूप को प्राप्त नहीं करता है
085) इस प्रकार के उन निर्दोषी परमात्मा की जो श्रद्धा करते हैं - उन्हे मानते हैं - वे अक्षय सुख को प्राप्त करते हैं, एसा प्रज्ञापन करते हैं - ज्ञान कराते हैं
086) 'मैं मोह की सेना को कैसे जीतूं' - ऐसा उपाय विचारता है
087) इसप्रकार मैने चिंतामणि-रत्न प्राप्त कर लिया है तथापि प्रमाद चोर विद्यमान है, ऐसा विचार कर जागृत रहता है
088) यही एक, भगवन्तों ने स्वयं अनुभव करके प्रगट किया हुआ मोक्ष का पारमार्थिक पंथ है
090) शुद्धात्म-लाभ के परिपंथी (शत्रु) मोह का स्वभाव और उसमें प्रकारों को व्यक्त करते हैं
091) तीनों प्रकार के मोह को अनिष्ट कार्य का कारण कहकर उसका क्षय करने को सूत्र द्वारा कहते हैं
092) इस मोह-राग-द्वेष को इन चिन्हों के द्वारा पहिचान कर उत्पन्न होते ही नष्ट कर देना चाहिये
093) मोह-क्षय करने का उपायान्तर (दूसरा उपाय) विचारते हैं
094) जिनेन्द्र के शब्द ब्रह्म में अर्थों की व्यवस्था (पदार्थों की स्थिति) किस प्रकार है सो विचार करते हैं
095) इस प्रकार मोहक्षय के उपायभूत जिनेश्वर के उपदेश की प्राप्ति होने पर भी पुरुषार्थ अर्थक्रियाकारी है, इसलिये पुरुषार्थ करता है
096) स्व-पर के विवेक की सिद्धि से ही मोह का क्षय हो सकता है, इसलिये स्व-पर के विभाग की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं
097) सब प्रकार से स्व-पर के विवेक की सिद्धि आगम से करने योग्य है, ऐसा उपसंहार करते हैं
098) न्याय-पूर्वक ऐसा विचार करते हैं कि- जिनेन्द्रोक्त अर्थों के श्रद्धान बिना धर्म-लाभ (शुद्धात्म-अनुभवरूप धर्म-प्राप्ति) नहीं होता
099) दूसरी पातनिका - सम्यक्त्व के अभाव में श्रमण (मुनि) नहीं है, उस श्रमण से धर्म भी नहीं है । तो कैसे श्रमण हैं? एसा प्रश्न पूछने पर उत्तर देते हुए ज्ञानाधिकार का उपसंहार करते हैं
100) ऐसे निश्चय रत्नत्रय परिणत महान तपोधन (मुनिराज) की जो वह भक्ति करता है, उसका फल दिखाते हैं
101) उस पुण्य से दूसरे भव में क्या फल होता है, यह प्रतिपादन करते हैं

ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार

102) अब सम्यक्त्व (अधिकार) कहते हैं -
103) ज्ञेयतत्त्व का प्रज्ञापन करते हैं अर्थात् ज्ञेयतत्त्व बतलाते हैं । उसमें (प्रथम) पदार्थ का सम्यक् (यथार्थ) द्रव्यगुणपर्यायस्वरूप वर्णन करते हैं
104) अनुषंगिक (पूर्व-गाथा के कथन के साथ सम्बन्ध वाली) ऐसी यह ही स्‍वसमय-परसमय की व्‍यवस्‍था (भेद) निश्‍च‍ित (उसका) उपसंहार करते हैं
105) द्रव्य का लक्षण बतलाते हैं
106) अनुक्रम से दो प्रकार का अस्तित्व कहते हैं । स्वरूप-अस्तित्व और सादृश्य अस्तित्व । इनमें से यह स्वरूपास्तित्व का कथन है
107) यह (नीचे अनुसार) सादृश्य-अस्तित्व का कथन है
108) द्रव्यों से द्रव्यान्तर की उत्पत्ति होने का और द्रव्य से सत्ता का अर्थान्तरत्व होने का खण्डन करते हैं ।
109) अब, यह बतलाते हैं कि उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक होने पर भी द्रव्य सत् है
110) अब, उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य का परस्पर अविनाभाव दृढ़ करते हैं
111) अब, उत्पादादि का द्रव्य से अर्थान्तरत्व को नष्ट करते हैं; (अर्थात् यह सिद्ध करते हैं कि उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य द्रव्य से पृथक् पदार्थ नहीं हैं)
112) अब, और भी दुसरी पद्धति से द्रव्य के साथ उत्पादि के अभेद का समर्थन करते हैं और समय भेद का निराकरण करते हैं -
113) अब, द्रव्य के उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य को अनेक द्रव्यपर्याय के द्वारा विचार करते हैं
114) अब, द्रव्य के उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य एक द्रव्य पर्याय द्वारा विचार करते हैं
115) अब, सत्ता और द्रव्य अर्थान्तर (भिन्न पदार्थ, अन्य पदार्थ) नहीं हैं, इस सम्बन्ध में युक्ति उपस्थित करते हैं
116) अब, पृथक्‍त्‍व और अन्यत्व का लक्षण स्पष्ट करते हैं
117) अब अतद्‌भाव को उदाहरण पूर्वक स्पष्ट बतलाते हैं
118) अब, सर्वथा अभाव अतद्‌भाव का लक्षण है, इसका निषेध करते हैं
119) अब, सत्ता और द्रव्य का गुण-गुणि‍त्‍व सिद्ध करते हैं
120) अब गुण और गुणी के अनेकत्व का खण्डन करते हैं
121) अब, द्रव्य के सत्-उत्पाद और असत्-उत्पाद होने में अविरोध सिद्ध करते हैं
122) अब (सर्व पर्यायों में द्रव्‍य अन्‍वय है अर्थात् वह का वही है, इसलिये उसके सत्‌-उत्‍पाद है — इसप्रकार) सत्-उत्‍पाद को अनन्‍यत्‍व के द्वारा नि‍श्‍चि‍त करते हैं
123) अब, असत्-उत्पाद को अन्यत्व के द्वारा निश्‍चित करते हैं
124) अब, एक ही द्रव्य के अनन्यपना और अन्यपना होने में जो विरोध है, उसे दूर करते हैं --
125) अब, समस्त विरोधों को दूर करने वाली सप्तभंगी प्रगट करते हैं
126) अब, जिसका निर्धारण करना है, इसलिये जिसे उदाहरणरूप बनाया गया है ऐसे जीव की मनुष्यादि पर्यायें क्रिया का फल हैं इसलिये उनका अन्यत्व (अर्थात् वे पर्यायें बदलती रहती हैं, इस प्रकार) प्रकाशित करते हैं
127) अब, यह व्यक्त करते हैं कि मनुष्यादि पर्यायें जीव को क्रिया के फल हैं
128) अब यह निर्णय करते हैं कि मनुष्यादिपर्यायों में जीव के स्वभाव का पराभव किस कारण से होता है?
129) अब, जीव की द्रव्यरूप से अवस्थितता होने पर भी पर्यायों से अनवस्थितता (अनित्यता-अस्थिरता) प्रकाशते हैं
130) अब, जीव की अनवस्थितता का हेतु प्रगट करते हैं
131) अब परिणामात्मक संसार में किस कारण से पुद्‌गल का संबंध होता है—कि जिससे वह (संसार) मनुष्यादि पर्यायात्मक होता है? — इसका यहाँ समाधान करते हैं
132) अब, परमार्थ से आत्मा के द्रव्यकर्म का अकर्तृत्व प्रकाशित करते हैं
133) अब, यह कहते हैं कि वह कौनसा स्वरूप है जिसरूप आत्मा परिणमित होता है?
134) अब ज्ञान, कर्म और कर्मफल का स्वरूप वर्णन करते हैं
135) अब ज्ञान, कर्म और कर्मफल को आत्मारूप से निश्‍चित करते हैं
136) अब, इस प्रकार ज्ञेयपने को प्राप्त आत्मा की शुद्धता के निश्चय से ज्ञानतत्त्व की सिद्धि होने पर शुद्ध आत्मतत्त्व की उपलब्धि (अनुभव, प्राप्ति) होती है; इस प्रकार उसका अभिनन्दन करते हुए (अर्थात् आत्मा की शुद्धता के निर्णय की प्रशंसा करते हुए धन्यवाद देते हुए), द्रव्यसामान्य के वर्णन का उपसंहार करते हैं
137) अब, द्रव्यविशेष का प्रज्ञापन करते हैं (अर्थात् द्रव्यविशेषों को द्रव्य को भेदों को बतलाते हैं) । उसमें (प्रथम) द्रव्य के जीवाजीवपनेरूप विशेष को निश्‍चित करते हैं, (अर्थात् द्रव्य के जीव और अजीव-ऐसे दो भेद बतलाते हैं)
138) अब द्रव्य के लोकालोक स्वरूप-विशेष (भेद) निश्चित करते हैं
139) अब, ‘क्रिया’ रूप और ‘भाव’ रूप ऐसे जो द्रव्य के भाव हैं उनकी अपेक्षा से द्रव्य का भेद निश्‍चित करते हैं
140) अब, यह बतलाते हैं कि गुण विशेष से (गुणों के भेद से) द्रव्य विशेष (द्रव्यों का भेद) होता है
141) अब, मूर्त और अमूर्त गुणों के लक्षण तथा संबंध (अर्थात् उनका किन द्रव्यों के साथ संबंध है यह) कहते हैं
142) अब, मूर्त पुद्‌गल द्रव्य के गुण कहते हैं
143-144) अब, शेष अमूर्त द्रव्यों के गुण कहते हैं और द्रव्‍य का प्रदेशवत्‍व और अप्रदेशवत्‍वरूप विशेष (भेद) बतलाते हैं
145) अब, यह कहते हैं कि प्रदेशवत्त्व और अप्रदेशवत्त्व किस प्रकार से संभव है
146) अब उसी अर्थ को दृढ करते हैं
147) अब, यह बतलाते हैं की प्रदेशी और अप्रदेशी द्रव्य कहाँ रहते हैं
148) अब, यह कहते हैं की प्रदेशवतत्त्व और अप्रदेशवतत्त्व किस प्रकार से संभव है
149) अब, 'कालाणु अप्रदेशी ही है' ऐसा नियम करते हैं (अर्थात दर्शाते हैं)
150) अब काल-पदार्थ के द्रव्य और पर्याय को बतलाते हैं
151) अब, आकाश के प्रदेश का लक्षण सूत्र द्वारा कहते हैं
152) अब, तिर्यकप्रचय तथा ऊर्ध्वप्रचय बतलाते हैं
153) अब, कालपदार्थ का ऊर्ध्वप्रचय निरन्वय है, इस बात का खंडन करते हैं
154) अब, (जैसे एक वृत्यंश में कालपदार्थ उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यवाला सिद्ध किया है उसी प्रकार) सर्व वृत्यंशों में कालपदार्थ उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यवाला है यह सिद्ध करते हैं
155) अब, कालपदार्थ के अस्तित्व अन्यथा अनुपपत्ति होने से (अन्य प्रकार से) नहीं बन सकता; इसलिये उसका प्रदेशमात्रपना सिद्ध करते हैं
156) अब, इस प्रकार ज्ञेयतत्त्व कहकर, ज्ञान और ज्ञेय के विभाग द्वारा आत्मा को निश्‍चित करते हुए, आत्मा को अत्यन्त विभक्त (भिन्न) करने के लिये व्यवहारजीवत्व के हेतु का विचार करते हैं
157) अब, प्राण कौन-कौन से हैं, सो बतलाते हैं
158) अब, वे ही प्राण भेद-नय से दस प्रकार के होते हैं, ऐसा आवेदन करते हैं (मर्यादा पूर्वक ज्ञान कराते हैं) --
159) अब, व्युत्पत्ति से प्राणों को जीवत्व का हेतुपना और उनका पौद्‌गलिकपना सूत्र द्वारा कहते हैं
160) अब, प्राणों का पौद्‌गलिकपना सिद्ध करते हैं
161) अब, प्राणों के पौद्‌गलिक कर्म का कारणत्‍व प्रगट करते हैं
162) अब पौद्‌गलिक प्राणों की संतति की (प्रवाह-परम्परा) की प्रवृत्ति का अन्तरंग हेतु सूत्र द्वारा कहते हैं
163) अब पौद्‌गलिक प्राणों की संतति की निवृत्ति का अन्‍तरङ्ग हेतु समझाते है
164) अब फिर भी, आत्मा की अत्यन्त विभक्तता सिद्ध करने के लिये, व्यवहार जीवत्व के हेतु ऐसी जो गतिविशिष्ट (देव-मनुष्यादि) पर्यायों का स्वरूप कहते हैं
165) अब पर्याय के भेद बतलाते हैं
166) अब, आत्मा का अन्य द्रव्य के साथ संयुक्तपना होने पर भी अर्थ निश्रायक अस्तित्व को स्व-पर विभाग के हेतु के रूप में समझाते हैं
167) अब, आत्मा को अत्यन्त विभक्त करने के लिये परद्रव्य के संयोग के कारण का स्वरूप कहते हैं
168) अब कहते हैं कि इनमें कौनसा उपयोग परद्रव्य के संयोग का कारण है
169) अब शुभोपयोग का स्वरूप कहते हैं
170) अब अशुभोपयोग का स्वरूप कहते हैं
171) अब, परद्रव्य के संयोग का जो कारण (अशुद्धोपयोग) उसके विनाश का अभ्यास बतलाते हैं
172) अब शरीरादि परद्रव्य के प्रति भी मध्यस्थपना प्रगट करते हैं
173) अब, शरीर, वाणी और मन का परद्रव्यपना निश्‍चित करते हैं
174) अब आत्मा के परद्रव्यत्व का अभाव और परद्रव्य के कर्तृत्व का अभाव सिद्ध करते हैं
175) अब इस संदेह को दूर करते हैं कि 'परमाणुद्रव्यों को पिण्डपर्यायरूप परिणति कैसे होती है?'
176) अब यह बतलाते हैं कि परमाणु के वह स्निग्ध-रूक्षत्व किस प्रकार का होता है
177) अब यह बतलाते हैं कि कैसे स्निग्धत्व-रूक्षत्व से पिण्डपना होता है
178) अब यह निश्‍चित करते हैं कि परमाणुओं के पिण्डत्‍व में यथोक्त (उपरोक्त) हेतु है
179) अब, आत्मा के पुद्‌गलों के पिण्ड के कर्तृत्व का अभाव निश्‍चित करते हैं
180) अब ऐसा निश्‍चित करते हैं कि आत्मा पुद्‌गलपिण्ड का लानेवाला नहीं है
181) अब ऐसा निश्‍चित करते हैं कि आत्मा पुद्‌गलपिण्डों को कर्मरूप नहीं करता
182) अब आत्‍मा के कर्मरूप परिणत पुद्‌गलद्रव्‍यात्‍मक शरीर के कर्तत्‍व का अभाव निश्‍चि‍त करते हैं (अर्थात् यह निश्‍च‍ित करते हैं कि कर्मरूपपरिणतपुद्‌गलद्रव्‍यस्‍वरूप शरीर का कर्ता आत्‍मा नहीं है)
183) अब आत्मा के शरीरपने का अभाव निश्‍चित करते हैं
184) तब फिर जीव का, शरीरादि सर्वपरद्रव्यों से विभाग का साधनभूत, असाधारण स्वलक्षण क्या है, सो कहते हैं
185) अब, अमूर्त ऐसे आत्मा के, स्निग्धरूक्षत्व का अभाव होने से बंध कैसे हो सकता है ? ऐसा पूर्व पक्ष उपस्थित करते हैं
186) अब ऐसा सिद्धान्त निश्‍चित करते हैं कि आत्मा अमूर्त होने पर भी उसको इस प्रकार बंध होता है
187) अब भावबंध का स्वरूप बतलाते हैं
188) भावबंध की युक्ति और द्रव्यबन्ध का स्वरूप
189) अब पुद्‌गलबंध, जीवबंध और उन दोनों के बंध का स्वरूप कहते हैं
190) अब, ऐसा बतलाते हैं कि द्रव्यबंध का हेतु भावबंध है
191) अब, यह सिद्ध करते हैं कि—राग परिणाममात्र जो भावबंध है सो द्रव्यबन्ध का हेतु होने से वही निश्‍चयबन्ध है
192) अब, परिणाम का द्रव्यबन्ध के साधकतम राग से विशिष्टपना सविशेष प्रगट करते हैं (अर्थात् परिणाम द्रव्यबंध के उत्कृष्ट हेतुभूत राग से विशेषता वाला होता है ऐसा भेद सहित प्रगट करते हैं)
193) अब विशिष्ट परिणाम के भेद को तथा अविशिष्ट परिणाम को, कारण में कार्य का उपचार कार्यरूप से बतलाते हैं
194) अब, जीव की स्वद्रव्य में प्रवृत्ति और परद्रव्य से निवृत्ति की सिद्धि के लिये स्व-पर का विभाग बतलाते हैं
195) अब, यह निश्‍चित करते हैं कि—जीव को स्वद्रव्य में प्रवृत्ति का निमित्त स्व-पर के विभाग का ज्ञान है, और परद्रव्य में प्रवृत्ति का निमित्त स्व-पर के विभाग का अज्ञान है
196) अब, आत्मा का निश्चय से रागादि स्व-परिणाम ही कर्म है और द्रव्य-कर्म उसका कर्म नहीं है, ऐसा प्रारूपित करते हैं -- कथन करते हैं -
197) अब, पुद्‌गलपरिणाम आत्मा का कर्म क्यों नहीं है—ऐसे सन्देह को दूर करते हैं
198) पुद्गल-परिणाम आत्मा का कर्म नहीं
199) पुद्‌गल कर्मों की विचित्रता को कौन करता है?
200) अब, पहले (१९९वीं गाथा में) कही गई प्रकृतियों के, जघन्य अनुभाग और उत्कृष्ट अनुभाग का स्वरूप प्रतिपादित करते हैं
201) अकेला ही आत्मा बंध है
202) निश्चय और व्यवहार का अविरोध
203) अशुद्धनय से अशुद्ध आत्मा की ही प्राप्ति
204) शुद्धनय से शुद्धात्मा की ही प्राप्ति
205) शुद्धात्मा ही उपलब्ध करने योग्य क्यों?
206) दूसरा कुछ भी उपलब्ध करने योग्य क्यों नहीं?
207) शुद्धात्मा की उपलब्धि से क्या होता है?
208) मोहग्रंथि टूटने से क्या होता है?
209) ध्यान आत्मा में अशुद्धता नहीं लाता
210) सकलज्ञानी क्या ध्याते हैं?
211) सकलज्ञानी परम सौख्य का ध्यान करता है
212) शुद्ध आत्मा की उपलब्धि मोक्ष का मार्ग
213) मैं (आचार्यदेव) स्वयं भी शुद्धात्मप्रवृत्ति करता हूँ
214) मध्य-मंगल

चरणानुयोग-चूलिका-अधिकार

215) श्रमणार्थी की भावना
216) श्रमणार्थी पहले क्या-क्या करता है?
217) दीक्षार्थी भव्य जैनाचार्य का आश्रय लेता है
218) गुरु द्वारा स्वीकृत श्रमणार्थी की अवस्था कैसी?
219-220) श्रमण-लिंग का स्वरूप
221) अब इन दोनों लिंगों को ग्रहणकर पहले भावि नैगमनय से कहे गये पंचाचार के स्वरूप को अब स्वीकार कर उसके आधार से उपस्थित स्वस्थ-स्वरूप लीन होकर वह श्रमण होता है ऐसा प्रसिद्ध करते हैं -
222-223) अब, जब विकल्प रहित सामायिक संयम से च्युत होता है, तब विकल्प सहित छेदोपस्थापन चारित्र को स्वीकार करता है, ऐसा कथन करते हैं -
224) अब इन मुनिराज के दीक्षा देनेवाले गुरु के समाननिर्यापक नामक दूसरे भी गुरु हैं इसप्रकार गुरु व्यवस्था का निरूपण करते हैं -
225-226)  अब पहले (२२४ वीं) गाथा में कहे गये दोनो प्रकार के छेदक का प्रायश्चित्त विधान कहते हैं -
227) अब विकार रहित श्रामण्य में छेद को उत्पन्न करनेवाले पर द्रव्यों के सम्बन्ध का निषेध करते हैं -
228) अब श्रमणता की परिपूर्ण कारणता होने से अपने शुद्धात्मद्रव्य में हमेशा स्थिति करना चाहिये, ऐसा प्रसिद्ध करते हैं-
229)  अब, श्रमणता के छेद की कारणता होने से प्रासुक आहार आदि में भी ममत्व का निषेध करते हैं -
230) अब शुद्धोपयोगरूप भावना को रोकनेवाले छेद को कहते हैं -
231) अब अन्तरंग-बहिरंग हिंसारूप से दो प्रकार के छेद को प्रसिद्ध करते हैं
232-233) अब उसी अर्थ को दृष्टान्त और दार्ष्टान्त द्वारा दृढ़ करते हैं -
234) अब, निश्चय हिंसारूप अन्तरंग छेद, पूर्णरूप से निषेध करने योग्य है; ऐसा उपदेश देते हैं-
235) अब बाह्य में जीव का घात होने पर बन्ध होता है, अथवा नहीं होता है; परन्तु परिग्रह होने पर नियम से बन्ध होता है, ऐसा प्रतिपादन करते हैं -
236) निरपेक्ष त्याग से ही कर्मक्षय
237-238-239) परिग्रह त्याग
240) सपरिग्रह के नियम से चित्त-शुद्धि नष्ट
241) अपवाद-संयम
242) उपकरण का स्वरूप
243) उपकरण अशक्य अनुष्ठान हैं
244) स्त्री पर्याय से मुक्ति का निराकरण
253) दीक्षाग्रहण में वर्ण व्यवस्था
254) निश्चयनय का अभिप्राय
255) उपकरण रूप अपवाद व्याख्यान का विशेष
256) युक्त आहार-विहार
257) प्रमाद
258) युक्ताहार-विहार
260) युक्ताहारत्व का विस्तार
261-262) मांस के दोष
263) हाथ में आया हुआ प्रासुक आहार भी देय नहीं
264) सापेक्ष उत्सर्ग और अपवाद से चारित्र की रक्षा
265) उत्सर्ग और अपवाद में विरोध से असंयम
266) आगम के परिज्ञान से ही एकाग्रता
267) आगम के परिज्ञान से हीन के कर्मों का क्षय नहीं
268) अब मोक्षमार्ग चाहने वालों को आगम ही दृष्टि-आँख है, ऐसा प्रसिद्ध करते हैं -
269) अब, आगमरूपी नेत्र से सभी दिखाई देता है, ऐसा विशेषरूप से ज्ञान कराते हैं -
270) दर्शन-रहित के संयतपना नहीं
271) अब आगमज्ञान, तत्त्वार्थश्रद्धान, संयतत्व की युगपतता का अभाव होने पर मोक्ष नहीं है, ऐसी व्यवस्था बताते हैं -
272) आत्मज्ञानी ही मोक्षमार्गी
273) अब पहले (२७२ वीं) गाथा में कहे गये आत्मज्ञान से रहित जीव के, सम्पूर्ण आगम का ज्ञान, तत्त्वार्थ-श्रद्धान और संयतत्व की युगपतता भी अकिंचित्कर है, ऐसा उपदेश देते है -
274) अब, द्रव्य-भाव संयम का स्वरूप कहते हैं -
275) आत्मज्ञानी संयत
276) आत्मज्ञानी संयत का लक्षण
277) युगपत आत्मज्ञान और संयत ही मोक्षमार्ग
278) एकाग्रता के अभाव से मोक्ष का अभाव
279) अब, जो वे अपने शुद्धात्मा में एकाग्र हैं उनका ही मोक्ष होता है; ऐसा उपदेश देते हैं -
280) लौकिक संसर्ग का निषेध
281) लौकिक का लक्षण
282) उत्तम संसर्ग का उपदेश
283) लौकिक संसर्ग कथंचित् अनिषिद्ध
284) शुभोपयोग मुनियों के गौण और श्रावकों को मुख्य
285) शुभोपयोगियों की श्रमणरूप में गौणता
286) शुभोपयोगी श्रमण
287) प्रवृत्ति शुभोपयोगियो के ही है
289) वैयावृत्ति संयम की विराधना-रहित होकर करें
290) प्रवृत्ति में विशेषता
291) अनुकम्पा का लक्षण
292) प्रवृत्ति का काल
293) पात्र-विशेष से वही शुभोपयोग में फल-विशेषता
294) कारण-विपरीतता से फल-विपरीतता
297) पात्रभूत मुनि का लक्षण
299) सामान्य विनय तथा उसके बाद विशेष विनय व्यवहार
301) श्रमणभासों के प्रति समस्त प्रवृत्तियों का निषेध
302) शुभोपयोगियों की शुभप्रवृत्ति
303) श्रमणाभास
304) मोक्षमार्गी पर दोष लगाने में दोष
305) अधिक गुणवा्लों से विनय चाहने से गुणों का विनाश
306) हीन गुणवालों के साथ वर्तने से गुणों का विनाश
307) संसार-स्वरूप
308) मोक्ष का स्वरूप
309) मोक्ष का कारण
310) मोक्षमार्ग
311) शास्त्र का फल और समाप्ति

परिशिष्ट

312) परिशिष्ट



!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम: !!

श्रीमद्‌-भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव-प्रणीत

श्री
प्रवचनसार

मूल प्राकृत गाथा, श्री अमृतचंद्राचार्य विरचित 'तत्त्वदीपिका' नामक संस्कृत टीका का हिंदी अनुवाद, श्री जयसेनाचार्य विरचित 'तात्पर्य-वृत्ति' नामक संस्कृत टीका का हिंदी अनुवाद सहित

आभार : पं जयचंदजी छाबडा, पं हुकमचंद भारिल्ल

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!! नम: श्रीसर्वज्ञवीतरागाय !!

ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नम: ॥1॥
अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकलभूतलकलंका
मुनिभिरूपासिततीर्था सरस्वती हरतु नो दुरितान् ॥2॥
अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥3॥


अर्थ : बिन्दुसहित ॐकार को योगीजन सर्वदा ध्याते हैं, मनोवाँछित वस्तु को देने वाले और मोक्ष को देने वाले ॐकार को बार बार नमस्कार हो । निरंतर दिव्य-ध्वनि-रूपी मेघ-समूह संसार के समस्त पापरूपी मैल को धोनेवाली है मुनियों द्वारा उपासित भवसागर से तिरानेवाली ऐसी जिनवाणी हमारे पापों को नष्ट करो । जिसने अज्ञान-रूपी अंधेरे से अंधे हुये जीवों के नेत्र ज्ञानरूपी अंजन की सलार्इ से खोल दिये हैं, उस श्री गुरु को नमस्कार हो । परम गुरु को नमस्कार हो, परम्परागत आचार्य गुरु को नमस्कार हो ।


॥ श्रीपरमगुरुवे नम:, परम्पराचार्यगुरुवे नम: ॥

सकलकलुषविध्वंसकं, श्रेयसां परिवर्धकं, धर्मसम्बन्धकं, भव्यजीवमन: प्रतिबोधकारकं, पुण्यप्रकाशकं, पापप्रणाशकमिदं शास्त्रं श्री-प्रवचनसार नामधेयं, अस्य मूल-ग्रन्थकर्तार: श्री-सर्वज्ञ-देवास्तदुत्तर-ग्रन्थ-कर्तार: श्री-गणधर-देवा: प्रति-गणधर-देवास्तेषां वचनानुसार-मासाद्य आचार्य श्री-कुन्द-कुन्दाचार्य-देव विरचितं ॥

(समस्त पापों का नाश करनेवाला, कल्याणों का बढ़ानेवाला, धर्म से सम्बन्ध रखनेवाला, भव्यजीवों के मन को प्रतिबुद्ध-सचेत करनेवाला यह शास्त्र प्रवचनसार नाम का है, मूल-ग्रन्थ के रचयिता सर्वज्ञ-देव हैं, उनके बाद ग्रन्थ को गूंथनेवाले गणधर-देव हैं, प्रति-गणधर देव हैं उनके वचनों के अनुसार लेकर आचार्य श्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेव द्वारा रचित यह ग्रन्थ है । सभी श्रोता पूर्ण सावधानी पूर्वक सुनें । )


॥ श्रोतार: सावधानतया शृणवन्तु ॥

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्‌ ॥
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारकं
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम्‌ ॥


आर्हत भक्ति
पण्डित-जुगल-किशोर कृत
तुम चिरंतन, मैं लघुक्षण
लक्ष वंदन, कोटी वंदन ॥

जागरण तुम, मैं सुषुप्ति, दिव्यतम आलोक हो प्रभु,
मैं तमिस्रा हूँ अमा की, क्षीण अन्तर, क्षीण तन-मन ।
लक्ष वंदन, कोटी वंदन ॥

शोध तुम, प्रतिशोध रे ! मैं, क्षुद्र-बिन्दु विराट हो तुम,
अज्ञ मैं पामर अधमतम, सर्व जग के विज्ञ हो तुम,
देव ! मैं विक्षिप्त उन्मन, लक्ष वंदन, कोटी वंदन ॥

चेतना के एक शाश्वत, मधु मंदिर उच्छ्वास ही हो
पूर्ण हो, पर अज्ञ को तो, एक लघु प्रतिभास ही हो
दिव्य कांचन, मैं अकिंचन, लक्ष वंदन, कोटी वंदन ॥

व्याधि मैं, उपचार अनुपम, नाश मैं, अविनाश हो रे !
पार तुम, मँझधार हूँ मैं, नाव मैं, पतवार हो रे !
मैं समय, तुम सार अर्हन् !, लक्ष वंदन, कोटी वंदन

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+ विषयानुक्रमणिका -
वि ष या नु क्र म णि का
अन्वयार्थ : गाथा सारिणि - ज्ञानतत्व प्रज्ञापन (सम्यग्ज्ञान) महाधिकार - १०१ गाथा

जयसेनाचार्य :
ग्रंथ की गाथा-सारणी
क्रम अधिकार संख्या आ. जयसेन कृत अधिकार का नाम गाथा कुल गाथाऐं आ. अमृतचंद्र कृत अधिकार का नाम गाथा कुल गाथाऐं
1 प्रथम महाधिकार सम्यग्ज्ञान 1 से 101 101 ज्ञानतत्त्व प्रज्ञापन 1 से 92 92
2 द्वितीय महाधिकार सम्यग्दर्शन 102 से 214 113 ज्ञेयतत्त्व प्रज्ञापन 93 से 200 108
3 तृतिय महाधिकार सम्यक्चारित्र 215 से 311 97 चरणानुयोग सूचक चूलिका 201 से 275 75
3 अधिकार 311 275

अधिकार अन्तराधिकार स्थल कुल गाथा
शुद्धोपयोग - ७२ (१ - ७२) पीठिका - १४ (१ - १४) नमस्कार मुख्यता (१ - ५)
चरित्र कथन (६ - ८)
तीन उपयोग कथन (९ - १०)
उपयोग फल कथन (११ - १२)
शुद्धोपयोग फल तथा लक्षण (१३ - १४)
सामान्य सर्वज्ञ सिद्धि - ७ (१५ - २१) सर्वज्ञ स्वभाव कथन (१५ - १६)
सर्वज्ञ की उत्पाद व्यय ध्रौव्य स्थापना (१७ - १८)
सर्वज्ञ श्रद्धा से अनन्त सुख ( १९)
अतीन्द्रिय ज्ञान तथा केवली कवलाहार निषेध (२० - २१)
ज्ञानप्रपंच - ३३ (२२ - ५४) केवलज्ञान मे सब प्रत्यक्ष हैं (२२ - २३)
आत्मा व्यवहार से सर्वगत है (२४ - २८)
ज्ञान ज्ञेय का परस्पर गमन निराकरण (२९ - ३३)
निश्चय व्यवहार केवली प्रतिपादन (३४ - ३७)
वर्त्तमान ज्ञान त्रिकालज्ञ (३८ - ४२)
बंधकारक ज्ञान नहीं, राग है (४३ - ४७)
केवलज्ञान - सर्वज्ञता (४८ - ५२)
ज्ञानप्रपंच उपसंहार (५३ - ५४)
सुखप्रपंच - १८ (५५ -७२) अधिकार गाथा (५५)
अतीन्द्रिय ज्ञान की प्रधानता परक (५६)
इन्द्रिय ज्ञान की प्रधानता परक (५७ - ६०)
अतीन्द्रिय सुख की प्रधानता परक (६१ - ६४)
इन्द्रिय सुख प्रतिपादन परक (६५ - ७२)
ज्ञानकण्डिका चतुष्टय प्रतिपादक - २५ (७३ -९७) शुभाशुभ मूढता निराकरण - १० (७३ - ८२) स्वतंत्र व्याख्यान (७३ - ७६)
तृष्णोत्पादक पुण्य (७७ - ८०)
उपसंहार (८१ - ८२)
आप्त-आत्मा के स्वरूप परिज्ञान विषयक मूढता निराकरण - ७ (८३ -८१) शुद्धात्मा प्राप्ति का उपाय एकमात्र शुद्धोपयोग (८३)
सिद्ध दशा प्राप्ति का उपाय एकमात्र शुद्धोपयोग (८४)
निर्दोषी परमात्मा की श्रद्धा का फल अक्षय सुख (८५)
मोह क्षय का उपाय (८६)
शुद्धात्मारूप चिंतामणि की रक्षा का उपाय (८७)
मोक्ष प्राप्ति का अनाद्यानंत एक उपाय (८८)
रत्नत्रय आराधक पुरुष ही पुजादी के योग्य (८९)
द्रव्य गुण पर्याय परिज्ञान विषयक मूढ़ता का निराकरण - ६ (१० - १५) मोह के स्वरुप और भेद का प्रतिपादन (९०)
दुःख और बंध के कारक रागादी निर्मूल नष्ट करने योग्य (९१ - ९२)
आत्मा की जानकारी आगमाभ्यास की अपेक्षा रखता है (९३)
द्रव्य गुण पर्यायों की अर्थ संज्ञा है (९४)
संपूर्ण दुखों का क्षय, मोहादी का नष्ट करना है (९५)
स्व पर तत्व परिज्ञान विषयक मूढता निराकरण - २ (१६,१७) मोह क्षय का उपाय स्वपर भेद विज्ञान (९६)
स्वपर भेद विज्ञान का उपाय आगम (९७)
स्वतंत्र गाथा चतुष्टय - ४ (९८ - १०१) तत्वश्रद्धान रहित श्रमण के शुद्धोपयोग लक्षण धर्म नहीं होता है (९८)
शुद्धोपयोगी आत्मा ही धर्म है (९९)
शुद्धोपयोगी मुनि के प्रति भक्ति का फल (१००)
उस पुण्य से दुसरे भव मे फल (१०१)


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+ टीकाकार (अमृतचंद्रआचार्य और जयसेनाचार्य) द्वारा मंगलाचरण -
सर्वव्याप्येकचिद्रूपस्वरूपाय परात्मने
स्वोपलब्धिप्रसिद्धाय ज्ञानानन्दात्मने नम: ॥1-अ॥

हेलोल्लुप्तमहामोहतमस्तोमं जयत्यद:
प्रकाशयज्जगत्तत्त्वमनेकान्तमयं मह: ॥2-अ॥

परमानन्दसुधारसपिपासितानां हिताय भव्यानाम्‌
क्रियते प्रकटिततत्त्वा प्रवचनसारस्य वृत्तिरियम्‌ ॥3-अ॥

नम: परमचैतन्यस्वात्मोत्थसुख्सम्पदे
परमागमसाराय सिद्धाय परमेष्ठिने ॥1-ज॥
स्वानुभूति से जो प्रगट सर्वव्यापि चिद्रूप ।
ज्ञान और आनन्दमय नमो परात्मस्वरूप ॥१-अ॥

महामोहतम को करे क्रीड़ा में निस्तेज ।
सब जग आलोकित करे अनेकान्तमय तेज ॥२-अ॥

प्यासे परमानन्द के भव्यों के हित हेतु ।
वृत्ति प्रवचनसार की करता हूँ भवसेतु ॥३-अ॥
अन्वयार्थ : [सर्वव्याप्येकचिद्रूपस्वरूपाय] सर्वव्यापी (सबका ज्ञाता) होने पर भी एक चैतन्यरूप (भाव चैतन्य ही) जिसका स्वरूप है - (जो ज्ञेयाकार हाने पर भी ज्ञाना- कार है अथांत् सर्वज्ञता को लिये हुए आत्मज्ञ हैं) जो [स्वोपलब्धिप्रसिद्धाय] स्वानुभव प्रसिद्ध है (शुद्ध आत्मोपलब्धि से प्रसिद्ध है), और जो [ज्ञानानन्दात्मने] ज्ञानानन्दात्मक है (अतीन्द्रिय पूर्ण-ज्ञान तथा अतीन्द्रिय पूर्ण-सुख-स्वरूप हैं) ऐसे उस [परमात्मने] परमात्मा (उत्कृष्ट आत्मा) के लिये [नम:] नमस्कार हो ॥१-अ॥
[हेलोल्लुप्तमहामोहतमस्तोमं] क्रीडा मात्र में महा-मोहरूप अन्धकार समूह को नष्ट करने वाला (ज्ञान) [जगत्तत्त्वं] जगत् (लोक अलोक) के स्वरूप को [प्रकाशयत्] प्रकाशित करता है, [अद:] वह [मह:] तेज [जयति] जयवन्त है, उसके लिये नमस्कार है ॥२-अ॥
[परमानन्द-सुधारसपिपासितानां] परमानन्दरूप सुधा-रस के पिपासु (अतीन्द्रियसुखरूप अमृत के प्यासे) [भव्यानां] भव्यों के [हिताय] हित के लिये [प्रकटि ततत्त्वा] तत्त्व को प्रगट करने वाली [इयं] यह [प्रवचनसारस्य] श्री प्रवचनसार की [वृत्ति:] टीका [क्रियते] (मुझ अमृतचन्द्राचार्य द्वारा) की जाती है ॥३-अ॥
जिनकी सम्पत्ति परम अतीन्द्रिय सुख है, जो सुख परम चैतन्य-स्वरूप निजात्मा से उत्पन्न हुआ है, ऐसे परमागम के साररूप सिद्ध परमेष्ठी को नमस्कार हो ॥१-ज॥

अमृतचंद्राचार्य :
(सर्व प्रथम, ग्रंथ के प्रारंभ में श्रीमद्‌भगवत्‍कुन्‍दकुन्‍दाचार्यदेवविचरित प्राकृत गाथाबद्ध श्री प्रवचनसार नामक शास्‍त्र की 'तत्त्वदीपिका' नामक संस्‍कृत टीका के रचयिता श्री अमृतचन्‍द्राचार्यदेव उपरोक्‍त श्‍लोकों के द्वारा मङ्गलाचरण करते हुए ज्ञानानन्‍दस्‍वरूप परमात्‍मा को नमस्‍कार करते हैं : )

सर्वव्यापी (अर्थात् सबका ज्ञाता-द्रष्टा) एक चैतन्यरूप (मात्र चैतन्य ही) जिसका स्वरूप है और जो स्वानुभव प्रसिद्ध है (अर्थात् शुद्ध आत्मानुभव से प्रकृष्टतया सिद्ध है) उस ज्ञानानन्दात्मक (ज्ञान और आनन्दस्वरूप) उत्कृष्ट आत्मा को नमस्कार हो ।

(अब अनेकान्तमय ज्ञान की मंगल के लिये लोक द्वारा स्तुति करते हैं : )

जो महामोहरूपी अंधकारसमूह को लीलामात्र में नष्ट करता है और जगत के स्वरूप को प्रकाशित करता है ऐसा अनेकांतमय तेज सदा जयवंत है ।

(अब श्री अमृतचंद्राचार्यदेव (तीसरे श्‍लोक द्वारा) अनेकांतमय जिन प्रवचन के सारभूत इस प्रवचनसार शास्त्र की टीका करने की प्रतिज्ञा करते हैं : )

परमानन्दरूपी सुधारस के पिपासु भव्य जीवों के हितार्थ, तत्त्व को (वस्तुस्वरूप को) प्रगट करने वाली प्रवचनसार की यह टीका रची जा रही है ।

अब, यहां (भगवत्‍कुन्‍दकुन्‍दाचार्यविरचित) गाथासूत्रों का अवतरण किया जाता है।


  • प्रवर्तमान तीर्थ के नायक (श्री महावीर स्वामी) पूर्वक भगवन्त पंचपरमेष्ठी को प्रणाम और वन्दना से होने वाला (भेदाभेदात्मक नमस्कार के द्वारा) सम्मान करके (काय के विशेष नमन द्वारा और वचन के द्वारा उनके प्रति मन में बहुमान लाकर)

  • सम्पूर्ण पुरुषार्थ से मोक्ष मार्ग के चारित्र को आश्रय करते हुए, (कश्चित्) कोई निकट भव्यात्मा प्रतिज्ञा करते हैं-

  • जयसेनाचार्य :
    इस प्रवचनसार की व्याख्या में मध्यम-रुचि-धारी शिष्य को समझाने के लिये मुख्य तथा गौण रूप से अन्तरंग-तत्त्व (निज आत्मा) बाह्य-तत्त्व (अन्य पदार्थ) को वर्णन करने के लिये सर्वप्रथम एक सौ एक गाथा मे ज्ञानाधिकार को कहेंगे । इसके बाद एक सौ तेरह गाथाओं में दर्शन का अधिकार कहेंगे । अनन्तर सत्तानवे गाथाओं में चारित्र का अधिकार कहेंगे । इस तरह समुदाय से तीन सौ ग्यारह गाथाओं मे ज्ञान, दर्शन, चारित्ररूप तीन महा-अधिकार हैं । अथवा टीका के अभिप्राय से सम्यग्ज्ञान, ज्ञेय और चारित्र अधिकार चूलिका सहित तीन अधिकार हैं ।

    इन तीन अधिकारों मे पहले ही ज्ञान नाम के महा अधिकार में इस तरह एक सौ एक गाथाओं के द्वारा प्रथम महा-अधिकार में समुदाय-पातनिका जाननी चाहिए ।

    प्रथम शुद्धोपयोग अधिकार की सारणी (72 गाथाऐं)
    अन्तराधिकार क्रम अन्तराधिकार का नाम गाथा कुल गाथा
    प्रथम पीठिका 1 से 14 14
    द्वितीय सामान्य सर्वज्ञ सिद्धि 14 से 21 7
    तृतीय ज्ञानप्रपंच 22 से 54 33
    चतुर्थ सुखप्रपंच 55 से 72 18

    यहाँ पहली पातनिका के अभिप्राय: से इस तरह पीठिका नाम के पहले अन्तराधिकार मे पाँच स्थलों के द्वारा चौदह गाथाओं से समुदाय पातनिका कही है ।

    पीठिका नामक प्रथम अंतराधिकार की सारणी (14 गाथाऐं)
    स्थल क्रम स्थल विषय गाथा कुल गाथा
    प्रथम स्थल नमस्कार मुख्यता 1 से 5 5
    द्वितीय स्थल चारित्र कथन 6 से 8 3
    तृतीय स्थल तीन उपयोग कथन 9 व 10 2
    चतुर्थ स्थल उपयोग कल कथन 11 व 12 2
    पंचम स्थल शुद्धोपयोग फल तथा लक्षण 13 व 14 2

    अनन्तर शिवकुमार नामक कोई निकट भव्य, जो स्वसंवेदन से उतन्न होने वाले परमानन्दमयी एक लक्षण के धारी सुखरूपी अमृत से विपरीत चतुर्गति रूप संसार के दुःखों से भयभीत है, जिसे परमभेद विज्ञान के प्रकाश का माहात्म्य प्रकट हो गया है जिसने समस्त दुर्नय रूपी एकान्त के दुराग्रह को दूर कर दिया तथा सर्व शत्रु-मित्र आदि का पक्षपात छोड़कर व अत्यन्त मध्यस्थ होकर धर्म-अर्थ-काम पुरुषार्थों की अपेक्षा अत्यन्त सार और आत्महितकारी अविनाशी व पंचपरमेष्ठी के प्रसाद से उत्पन्न होने वाले मोक्ष- लक्ष्मीरूपी पुरुषार्थ को अंगीकार करते हुए श्री वर्धमान स्वामी तीर्थंकर परमदेव प्रमुख भगवान् पंच-परमेष्ठियों को द्रव्य और भाव नमस्कार कर परम चारित्र का आश्रय ग्रहण करता हूँ, ऐसी प्रतिज्ञा करता है ।

    ऐसे निकट भव्य शिवकुमार को सम्बोधन करने के लिये श्री कुन्दकुन्दाचार्य इस ग्रन्थ की रचना करते हैं ।


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    ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार



    + तीर्थ-नायक को प्रणमन -
    एस सुरासुरमणुसिंदवंदिदं धोदघाइकम्ममलं ।
    पणमामि वड्‌ढमाणं तित्थं धम्मस्स कत्तारं ॥1॥
    एष सुरासुरमनुष्येन्द्रवन्दितं धौतघातिकर्ममलम् ।
    प्रणमामि वर्धमानं तीर्थं धर्मस्य कर्तारम् ॥१॥
    सुर असुर इन्द्र नरेन्द्र वंदित कर्ममल निर्मलकरन
    वृषतीर्थ के करतार श्री वर्द्धमान जिन शत-शत नमन ॥१॥
    अन्वयार्थ : [एष:] यह मैं [सुरासुरमनुष्येन्द्रवंदितं] जो *सुरेन्द्रों, *असुरेन्द्रों और *नरेन्द्रों से वन्दित हैं तथा जिन्होंने [धौतघातिकर्ममलं] घाति कर्म-मल को धो डाला है ऐसे [तीर्थं] तीर्थ-रूप और [धर्मस्य कर्तारं] धर्म के कर्ता [वर्धमानं] श्री वर्धमानस्वामी को [प्रणमामि] नमस्कार करता हूँ ॥१॥
    *सुरेन्द्र = ऊर्ध्वलोक-वासी देवों के इन्द्र
    *असुरेन्द्र = अधोलोक-वासी देवों के इन्द्र
    *नरेन्द्र = चक्रवर्ती, मनुष्यों के अधिपति

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, यहाँ (भगवत् कुन्दकुन्दाचार्य विरचित) गाथा-सूत्रों का अवतरण किया जाता है --

    यह *स्वसंवेदनप्रत्यक्ष *दर्शन-ज्ञान-सामान्यस्वरूप मैं, जो ऐसे श्री वर्धमान देव को प्रवर्तमान तीर्थ की नायकता के कारण प्रथम ही, प्रणाम करता हूँ ॥१॥

    *स्वसंवेदनप्रत्यक्ष = स्वानुभवसे प्रत्यक्ष (दर्शनज्ञानसामान्य स्वानुभवसे प्रत्यक्ष है)
    *दर्शन-ज्ञान-सामान्यस्वरूप = दर्शनज्ञानसामान्य अर्थात् चेतना जिसका स्वरूप है ऐसा

    जयसेनाचार्य :
    [एस] यह जो मैं ग्रन्थकार इस ग्रन्थ को करने का उद्यमी हुआ हूं और अपने ही द्वारा अपने आत्मा का अनुभव करने में लवलीन हूँ सो श्री वर्धमान तीर्थंकर परमदेव को [पणमामि] नमस्कार करता हूँ ॥१॥


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    + पंच परमेष्ठी को नमस्कार -
    सेसे पुण तित्थयरे ससव्वसिद्धे विसुद्धसब्भावे ।
    समणे य णाणदंसणचरित्ततववीरियायारे ॥2॥
    शेषान् पुनस्तीर्थकरान् ससर्वसिद्धान् विशुद्धसद्भावान् ।
    श्रमणांश्च ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्याचारान् ॥२॥
    अवशेष तीर्थंकर तथा सब सिद्धगण को कर नमन
    मैं भक्तिपूर्वक नमूँ पंचाचारयुत सब श्रमणजन ॥२॥
    अन्वयार्थ : [पुन:] और [विशुद्धसद्भावान्] विशुद्ध *सत्तावाले [शेषान् तीर्थकरान्] शेष तीर्थंकरों को [ससर्वसिद्धान्] सर्व सिद्ध-भगवन्तों के साथ ही, [च] और [ज्ञानदर्शनचारित्रतपोवीर्याचारान्] ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार युक्त [श्रमणान्] *श्रमणों को नमस्कार करता हूँ ॥२॥
    *सत्ता = अस्तित्व
    *श्रमण = आचार्य, उपाध्याय और साधु

    अमृतचंद्राचार्य :
    तत्पश्चात जो विशुद्ध सत्तावान् होने से ताप से उत्तीर्ण हुए (अन्तिम ताव दिये हुए अग्नि में से बाहर निकले हुए) उत्तम सुवर्ण के समान शुद्ध दर्शन-ज्ञान स्वभाव को प्राप्त हुए हैं, ऐसे शेष *अतीत तीर्थंकरों को और सर्व सिद्धों को तथा ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार युक्त होने से जिन्होंने परम शुद्ध उपयोग भूमिका को प्राप्त किया है, ऐसे श्रमणों को-- जो कि आचार्यत्व, उपाध्यायत्व और साधुत्वरूप विशेषों से विशिष्ट (भेदयुक्त) हैं उन्हें -- नमस्कार करता हूँ ॥२॥

    अतीत = गत, हो गये, भूतकालीन

    जयसेनाचार्य :
    इसके बाद प्रणाम करता हूँ । किन्हें प्रणाम करता हूँ? [सेसे पुण तित्थयरे ससव्वसिद्धे] वृषभादि पार्श्व पर्यन्त शेष सभी तीर्थकरों तथा शुद्ध आत्म-स्वभाव की प्राप्ति है लक्षण जिनका, ऐसे सभी सिद्धों को प्रणाम करता हूँ । ये सभी कैसे हैं? [विसुद्धसब्भावे] सर्व मल रहित आत्मा की प्राप्ति के बल से सम्पूर्ण आवरणों के पूर्णतया विनष्ट हो जाने के कारण तथा केवलज्ञान, केवलदर्शन स्वभाव सम्पन्न होने के कारण विशुद्ध सत्तावाले हैं । [समणे य] तथा श्रमण शब्द से कहने योग्य आचार्य, उपाध्याय और साधुओं को प्रणाम करता हूँ । वे श्रमण किन लक्षणों वाले हैं? [णाणदंसणचरित्ततववीरियायारे] सर्व विशुद्ध द्रव्य-गुण-पर्याय स्वरूप चेतन वस्तु में जो वह रागादि विकल्प रहित चंचलता रहित स्थिरता; उसमें अन्तर्भूत व्यवहार पंचाचार-रूप सहकारी कारण से उत्पन्न निश्चय पंचाचार-रूप से परिणमित होने के कारण सम्यग्ज्ञान-दर्शन-चारित्र-तप-वीर्याचार सहित (उन श्रमणों) को (नमस्कार करता हूँ)

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    + वर्तमान तीर्थंकरों को नमन -
    ते ते सव्वे समगं समगं पत्तेगमेव पत्तेगं ।
    वंदामि य वट्टंते अरहंते माणुसे खेत्ते ॥3॥
    तांस्तान् सर्वान् समकं समकं प्रत्येकमेव प्रत्येकम् ।
    वन्दे च वर्तमानानर्हतो मानुषे क्षेत्रे ॥३॥
    उन सभी को युगपत तथा प्रत्येक को प्रत्येक को
    मैं नमूँ विदमान मानस क्षेत्र के अरहंत को ॥३॥
    अन्वयार्थ : [तान् तान् सर्वान्] उन उन सबको [च] तथा [मानुषे क्षेत्रे वर्तमानान्] मनुष्य क्षेत्र में विद्यमान [अर्हत:] अरहन्तों को [समकं समकं] साथ ही साथ--समुदायरूप से और [प्रत्येकं एव प्रत्येकं] प्रत्येक प्रत्येक को--व्यक्तिगत [वंदे] वन्दना करता हूँ ॥३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    तत्पश्चात् इन्हीं पंचपरमेष्ठियों को, उस-उस व्यक्ति में (पर्याय में) व्याप्त होनेवाले सभी को, वर्तमान में इस क्षेत्र में उत्पन्न तीर्थंकरों का अभाव होने से और महाविदेहक्षेत्र में उनका सद्भाव होने से मनुष्य-क्षेत्र में प्रवर्तमान तीर्थ-नायक युक्त वर्तमान काल गोचर करके, (-महाविदेहक्षेत्र में वर्तमान श्री सीमधरादि तीर्थंकरों की भाँति मानों सभी पंच परमेष्ठी भगवान वर्तमान काल में ही विद्यमान हों, इस प्रकार अत्यन्त भक्ति के कारण भावना भाकर-चिंतवन करके उन्हें) युगपद्‌ युगपद् अर्थात् समुदायरूप से और प्रत्येक प्रत्येक को अर्थात् व्यक्तिगत रूप से *संभावना करता हूँ । किस प्रकार से संभावना करता हूँ? मोक्षलक्ष्मी के स्वयंवर समान जो परम निर्ग्रंथता की दीक्षा का उत्सव (आनन्दमय प्रसंग) है उसके उचित मंगलाचरण-भूत जो *कृतिकर्म शास्त्रोपदिष्ट वन्दनोच्चार (कृतिकर्मशास्त्र मे उपदेशे हुए स्तुति-वचन) के द्वारा सम्भावना करता हूँ ॥३॥

    *संभावना = संभावना करना, सन्मान करना, आराधन करना
    *कृतिकर्म = अंगबाह्य १४ प्रकीर्णकों में छट्टा प्रकीर्णक कृतिकर्म है जिसमें नित्य-नैमित्तिक क्रिया का वर्णन है

    जयसेनाचार्य :
    अब, [ते ते सव्वे] पहले कहे हुये उन सभी पंच-परमेष्ठियों को । [वंदामि च] कर्ता-रूप मैं नमस्कार करता हूँ । उन सभी को कैसे नमस्कार करता हूँ? [समगं समगं] सामूहिक वन्दना-रूप से अर्थात् सभी को एक साथ नमस्कार करता हूँ । उन सभी को और कैसे नमस्कार करता हूँ? [पत्तेगमेव पत्तेगं] व्यक्तिगत वन्दनारूप से अर्थात प्रत्येक को पृथक्‌-पृथक्‌ नमस्कार करता हूँ । मैं मात्र पूर्वोक्त इन्हें ही नमस्कार नहीं करता हूँ, वरन्‌ । [अरहंते] अरहन्तों को भी नमस्कार करता हूँ । वे अरहंत कैसे है? [वट्टंते माणुसे खेत्ते] विद्यमान हैं । वे अरहंत कहाँ विद्यमान हैं? मानुष क्षेत्र में (ढ़ाई द्वीप में) विद्यमान हैं ।

    वह इसप्रकार- अभी यहीं भरतक्षेत्र में तीर्थकरों का अभाव होने से पाँच महाविदेहों में विद्यमान श्री सीमन्धर-स्वामी तीर्थंकर परमदेव आदि तीर्थंकरों के साथ उन्हीं पंच-परमेष्ठियों को नमस्कार करता हूँ । पूर्वोक्त सभी को कैसे नमस्कार करता हूँ? मोक्ष-लक्ष्मी के स्वयंवर मण्डपभूत जिनदीक्षा के अवसर पर साधनभूत मंगलाचार स्वरूप, सिद्ध भगवान के अनन्त ज्ञानादि गुणों की भावनारूप सिद्ध-भक्ति से, और उसी-प्रकार निर्मल समाधि-रूप परिणमित परमयोगियों के गुणों की भावना लक्षण योग-भक्ति से; उन सभी को नमस्कर करता हूँ ।

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    + साम्य का आश्रय -
    किच्चा अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं ।
    अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेव सव्वेसिं ॥4॥
    तेसिं विसुद्धदंसणणाणपहाणासमं समासेज्ज ।
    उवसंपयामि सम्मं जत्तो णिव्वाणसंपत्ती ॥5॥
    कृत्वार्हद्भयः सिद्धेभ्यस्तथा नमो गणधरेभ्यः ।
    अध्यापकवर्गेभ्यः साधुभ्यश्चैव सर्वेभ्यः ॥४॥
    तेषां विशुद्धदर्शनज्ञानप्रधानाश्रमं समासाद्य ।
    उपसम्पद्ये साम्यं यतो निर्वाणसम्प्राप्तिः ॥५॥
    अरहंत सिद्धसमूह गणधरदेवयुत सब सूरिगण
    अर सभी पाठक साधुगण इन सभी को करके नमन ॥४॥
    परिशुद्ध दर्शनज्ञानयुत समभाव आश्रम प्राप्त कर
    निर्वाणपद दातार समताभाव को धारण करूँ ॥५॥
    अन्वयार्थ : [अर्हद्भय:] इस प्रकार अरहन्तों को, [सिद्धेभ्य:] सिद्धों को, [तथा गणधरेभ्य:] आचार्यों को, [अध्यापकवर्गेभ्य:] उपाध्याय-वर्ग को [च एवं] और [सर्वेभ्यः साधुभ्य:] सर्व साधुओं को [नम: कृत्वा] नमस्कार करके [तेषां] उनके [विशुद्धदर्शनज्ञानप्रधानाश्रमं] *विशुद्ध दर्शन-ज्ञान प्रधान आश्रम को [समासाद्य] प्राप्त करके [साम्यं उपसंपद्ये] मैं *साम्य को प्राप्त करता हूँ [यत:] जिससे [निर्वाण संप्राप्ति:] निर्वाण की प्राप्ति होती है ॥४-५॥
    *विशुद्धदर्शनज्ञानप्रधान = विशुद्ध दर्शन और ज्ञान जिसमें प्रधान (मुख्य) हैं, ऐसे
    *साम्य = समता, समभाव

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब इस प्रकार अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय तथा सर्व साधुओं को प्रणाम और वन्दनोच्चार से प्रवर्तमान द्वैत के द्वारा, भाव्यभावक भाव से उत्पन्न अत्यन्त गाढ इतरेतर मिलन के कारण समस्त स्वपर का विभाग विलीन हो जाने से जिसमें अद्वैत प्रवर्तमान है, ऐसा नमस्कार करके, उन्हीं अरहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, सर्व-साधुओं के आश्रम को , --जो कि (आश्रम) विशुद्ध-ज्ञान-दर्शन-प्रधान होने से सहजशुद्ध-दर्शन-ज्ञान स्वभाव वाले आत्म तत्त्व का श्रद्धान और ज्ञान जिसका लक्षण है ऐसे सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान का सम्पादक है उसे-- प्राप्त करके, सम्यग्दर्शन-ज्ञान सम्पन्न होकर, जिसमें कषाय-कण विद्यमान होने से जीव को जो पुण्य बंध की प्राप्ति का कारण है ऐसे सराग चारित्र को -- वह (सराग चारित्र) क्रम से आ पड़ने पर भी (गुणस्थान-आरोहण के क्रम में बलात् अर्थात् चारित्रमोह के मन्द उदय से आ पड़ने पर भी) -- दूर उल्लंघन करके, जो समस्त कषाय-क्लेश-रूपी कलंक से भिन्न होने से निर्वाण प्राप्ति का कारण है ऐसे वीतराग-चारित्र नामक साम्य को प्राप्त करता हूँ । सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की ऐक्य स्वरूप एकाग्रता को मैं प्राप्त हुआ हूँ यह (इस) प्रतिज्ञा का अर्थ है । इस प्रकार तब इन्होंने (श्रीमद्भगवत्कृन्दकुन्दाचार्य देव ने) साक्षात् मोक्षमार्ग को अंगीकार किया ॥४-५॥

    जयसेनाचार्य :
    अब, [किच्चा] करके । क्या करके? [णमो] नमस्कार करके । किन्हे नमस्कार करके? [अरहंताणं सिद्धाणं तह णमो गणहराणं अज्झावयवग्गाणं साहूणं चेव] अरहन्त-सिद्ध-आचार्य-उपाध्याय और साधुओं को नमस्कार करके । कितनी संख्या वाले अरहन्तादि को नमस्कार करके? [सव्वेसिं] सभी को नमस्कार करके ॥४॥

    इस प्रकार पंच-परमेष्ठियों को नमस्कार करके क्या करता हूँ ? [उवसंपयामि] आश्रय लेता हूँ । किसका आश्रय लेता हूँ ? [सम्मं] साम्य-चारित्र का । उस चारित्र का आश्रय लेने से क्या होता है? [जत्तो णिव्वाणसंपत्ति] उससे निर्वाण की प्राप्ति होती है । उसका आश्रय लेने से पूर्व क्या करके? [समासेज] प्राप्त करके । किसे प्राप्त करके? [विसुद्धदंसणणाणपहाणासमं] विशुद्ध ज्ञान दर्शन है लक्षण जिसका, ऐसे प्रधान आश्रम को प्राप्त करके । किनसे सम्बन्धित उस प्रधान आश्रम को प्राप्त करके? [तेसिं] उन पूर्वोक्त पंच-परमेष्ठियों के उस प्रधान आश्रम को प्राप्त करके ।

    वह इसप्रकार- मैं आराधक हूँ, और ये अरहंत आदि आराध्य हैं- इसप्रकार आराधक-आराध्य की भिन्नता-रूप नमस्कार को द्वैत नमस्कार कहते हैं, तथा रागादि उपाधि-रूप विकल्पों से रहित परम समाधि के बल से स्वयं में ही आराध्य-आराधक भाव अद्वैत नमस्कार कहलाता है ।

    इसप्रकार पूर्वोक्त ३ गाथाओं द्वारा कहे गये पंच-परमेष्ठियों को पूर्वोक्त लक्षण द्वैताद्वैत नमस्कार करके । पंचपरमेष्ठियों को द्वैताद्वैत नमस्कार करके क्या करता हूँ? मठ-चैत्यालय आदि रूप व्यवहार आश्रम से भिन्न लक्षण वाले रागादि से भिन्न अपने आत्मा के आश्रय से उत्पन्न यह सुख स्वभावी परमात्मा है- ऐसा भेदज्ञान तथा वह सुख स्वभावी आत्मा ही पूर्णत: उपादेय है- ऐसी रुचिरूप सम्यक्त्व इन लक्षणों वाले ज्ञान-दर्शन स्वभावी भावाश्रम-रूप प्रधान आश्रम को प्राप्त कर उस पूर्वक होने वाला सराग-चारित्र क्रमापतित अवश्यम्भावी होने पर भी पुण्य बंध का कारण है, ऐसा जानकर उसे छोड़कर शुद्धात्मा में स्थिर अनुभूति स्वरूप वीतराग-चारित्र का मैं आश्रय लेता हूँ- यह गाथा का भाव है ॥५॥

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    + सराग और वीतरागचारित्र में हेय-उपादेय -
    संपज्जदि णिव्वाणं देवासुरमणुयरायविहवेहिं ।
    जीवस्स चरित्तादो दंसणणाणप्पहाणादो ॥6॥
    सम्पद्यते निर्वाणं देवासुरमनुजराजविभवैः ।
    जीवस्य चरित्राद्दर्शनज्ञानप्रधानात् ॥६॥
    निर्वाण पावैं सुर-असुर-नरराज के वैभव सहित
    यदि ज्ञान-दर्शनपूर्वक चारित्र सम्यक् प्राप्त हो ॥६॥
    अन्वयार्थ : [जीवस्य] जीवको [दर्शनज्ञानप्रधानात्] दर्शनज्ञानप्रधान [चारित्रात्] चारित्र से [देवासुरमनुजराजविभवै:] देवेन्द्र, असुरेन्द्र और नरेन्द्र के वैभवों के साथ [निर्वाणं] निर्वाण [संपद्यते] प्राप्त होता है ॥६॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब वे ही (कुन्दकुन्दाचार्यदेव) वीतरागचारित्र इष्ट-फल वाला है इसलिये उसकी उपादेयता और सरागचारित्र अनिष्ट फलवाला है इसलिये उसकी हेयता का विवेचन करते हैं : -

    दर्शन-ज्ञान प्रधान चारित्र से, यदि वह (चारित्र) वीतराग हो तो मोक्ष प्राप्त होता है; और उससे ही, यदि वह सराग हो तो देवेन्द्र-असुरेन्द्र-नरेन्द्र के वैभव--क्लेश रूप बन्ध की प्राप्ति होती है । इसलिये मुमुक्षुओं को इष्ट फल-वाला होने से वीतराग चारित्र ग्रहण करने योग्य (उपादेय) है, और अनिष्ट फलवाला होने से सराग-चारित्र त्यागने योग्य (हेय) है ॥६॥

    जयसेनाचार्य :
    [संपज्जदि] प्राप्ति होती है । किसकी प्राप्ति होती है? [णिव्व्वणं] मोक्ष की प्राप्ति होती है । कैसे मोक्ष की प्राप्ति होती है? इनके साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है । किनके साथ उसकी प्राप्ति होती है? [देवासुरमणुयरायविहवेहिं] देवेन्द्र, असुरेन्द्र एवं नरेन्द्र सम्बन्धी वैभवों के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है । उसकी प्राप्ति किसे होती है? [जीवस्स] जीव को उसकी प्राप्ति होती है । जीव को उसकी प्राप्ति किससे होती है? [चरित्तादो] चारित्र से उसकी प्राप्ति होती है । कैसे चारित्र से होती है? [दंसणणाणप्पहाणादो] सम्यग्दर्शन-ज्ञान प्रधान चारित्र से जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

    वह इसप्रकार - स्वाधीन ज्ञान-सुख स्वभावी शुद्धात्म-द्रव्य में चंचलता रहित निर्विकार अनुभूतिरूप स्थिरता लक्षण वाले निश्चय चारित्र से जीव के उत्पन्न होता है । क्या उत्पन्न होता है? पराधीन इन्द्रिय जनित ज्ञान-सुख से भिन्न लक्षण वाला स्वाधीन अतीन्द्रिय-रूप उत्कृष्ट ज्ञान-सुख सम्पन्न मोक्ष उत्पन्न होता है । सराग-चारित्र से मुख्यतया देवेन्द्र, असुरेन्द्र एवं नरेन्द्र सम्बन्धी वैभव को उत्पन्न करने वाला विशिष्ट पुण्य बंध होता है, एवं परम्परा से मोक्ष प्राप्त होता है ।

    असुरों में सम्यग्दृष्टि कैसे उत्पन्न होता है? यदि ऐसी शंका हो, तो निदान बंध से सम्यक्त्व की विराधना करके वहाँ उत्पन्न होता है- ऐसा जानना चाहिये ।

    यहाँ निश्चय से वीतराग-चारित्र उपादेय और सराग-चारित्र हेय है- यह गाथा का भाव है ।

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    + चारित्र का स्वरूप -
    चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो त्ति णिद्दिट्ठो ।
    मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो हु समो ॥7॥
    चारित्रं खलु धर्मो धर्मो यस्तत्साम्यमिति निर्दिष्टम् ।
    मोहक्षोभविहीनः परिणाम आत्मनो हि साम्यम् ॥७॥
    चारित्र ही बस धर्म है वह धर्म समताभाव है
    दृगमोह-क्षोभविहीन निज परिणाम समताभाव है ॥७॥
    अन्वयार्थ : [चारित्रं] चारित्र [खलु] वास्तव में [धर्म:] धर्म है । [यः धर्म:] जो धर्म है [तत् साम्यम्] वह साम्य है [इति निर्दिष्टम्] ऐसा (शास्त्रों में) कहा है । [साम्यं हि] साम्य [मोहक्षोभविहीनः] मोह-क्षोभ रहित ऐसा [आत्मनः परिणाम:] आत्मा का परिणाम (भाव) है ॥७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब चारित्र का स्वरूप व्यक्त करते हैं :-

    स्वरूप में चरण करना (रमना) सो चारित्र है । स्वसमय में प्रवृत्ति करना (अपने स्वभाव में प्रवृत्ति करना) ऐसा इसका अर्थ है । यही वस्तु का स्वभाव होने से धर्म है । शुद्ध चैतन्य का प्रकाश करना यह इसका अर्थ है । वही यथावस्थित आत्म गुण होने से (विषमता-रहित सुस्थित आत्मा का गुण होने से) साम्य है । और साम्य, दर्शन-मोहनीय तथा चारित्र-मोहनीय के उदय से उत्पन्न होने वाले समस्त मोह और क्षोभ के अभाव के कारण अत्यन्त निर्विकार ऐसा जीव का परिणाम है ॥७॥

    जयसेनाचार्य :
    [चारित्तं] चारित्र-रूप कर्ता (इस गाथामें चारित्र 'कर्ता कारक' के स्थान पर है) [खलु धम्मो] स्पष्ट रूप से धर्म है । [धम्मो जो तो समो त्ति णिद्दिट्ठो] जो धर्म है वह शम कहा गया है । [समो] और जो शम है वह [मोहक्खोहविहीणो परिणामो अप्पणो हु] मोह-क्षोभ से रहित परिणाम है । मोह-क्षोभ से रहित वह शम किसका परिणाम है? वह आत्मा का परिणाम है । [हु] स्पष्टरूप से ।

    वह इसप्रकार - शुद्ध चैतन्य स्वरूप मे चरण-प्रवृत्ति-लीनता चारित्र है, वही चारित्र, मिथ्यात्व-रागादि परिणमन रूप भाव संसार में डूबे हुये प्राणियों को निकालकर निर्विकार शुद्ध चैतन्य स्वरूप में धरता है, अत: धर्म है । वही धर्म स्वात्मा के आश्रय से उत्पन्न होने वाले सुखमयी अमृतरूप शीतल जल के द्वारा काम-क्रोधादि-रूप अग्नि से उत्पन्न सांसारिक दुखों-रूप जलन को शान्त करनेवाला होने से शम है; और इसलिये शुद्धात्मा के श्रद्धानरूप सम्यग्दर्शन को नष्ट करनेवाला होने से दर्शनमोहनीय नामक (कर्म) मोह कहलाता है, तथा वीतराग स्थिर परिणमन-रूप चारित्र को नष्ट करनेवाला होने से चारित्र-मोहनीय नामक (कर्म) क्षोभ कहलाता है; मोह और क्षोभ- इन दोनों को पूर्णत: नष्ट करने वाला होने से वही शम, मोह-क्षोभ रहित शुद्धात्मा का परिणाम कहलाता है - यह अभिप्राय है ॥७॥

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    + आत्मा ही चारित्र है -
    परिणमदि जेण दव्वं तक्कालं तम्मयं त्ति पण्णत्तं ।
    तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेयव्वो ॥8॥
    परिणमति येन द्रव्यं तत्कालं तन्मयमिति प्रज्ञप्तम् ।
    तस्माद्धर्मपरिणत आत्मा धर्मो मन्तव्यः ॥८॥
    जिसकाल में जो दरव जिस परिणाम से हो परिणमित
    हो उसीमय वह धर्मपरिणत आतमा ही धर्म है ॥८॥
    अन्वयार्थ : [द्रव्यं] द्रव्य जिस समय [येन] जिस भावरूप से [परिणमति] परिणमन करता है [तत्कालं] उस समय [तन्मयं] उस मय है [इति] ऐसा [प्रज्ञप्तं] (जिनेन्द्र देव ने) कहा है; [तस्मात्] इसलिये [धर्मपरिणत: आत्मा] धर्मपरिणत आत्मा को [धर्म: मन्तव्य:] धर्म समझना चाहिये ॥८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब आत्मा की चारित्रता (अर्थात् आत्मा ही चारित्र है ऐसा) निश्चय करते हैं :-

    वास्तव में जो द्रव्य जिस समय जिस भावरूप से परिणमन करता है, वह द्रव्य उस समय उष्णता रूप से परिणमित लोहे के गोले की भाँति उस मय है, इसलिये यह आत्मा धर्मरूप परिणमित होने से धर्म ही है । इसप्रकार आत्मा की चारित्रता सिद्ध हुई ॥८॥

    जयसेनाचार्य :
    [परिणमदि जेण दव्वं तक्काले तम्मय त्ति पण्णत्तं] द्रव्यरूप कर्ता (इस गाथा में द्रव्य कर्ताकारक के स्थान पर है) जिस पर्याय से परिणमित होता है, [यत:] उस समय उस पर्याय से तन्मय होता है ऐसा कहा गया है, [तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेदव्वो] अत: धर्म पर्याय से परिणत आत्मा ही धर्म मानना चाहिये ।

    वह इसप्रकार- निज शुद्धात्म परिणति रूप निश्चय धर्म, तथा पंच परमेष्ठी आदि के प्रति भक्ति के परिणाम-रूप व्यवहार धर्म कहा गया है क्योंकि उस विवक्षित-अविवक्षित पर्याय से परिणत द्रव्य उस पर्याय- रूप होता है, इसलिये तपे हुए लोहे के गोले के समान, अभेदनय की अपेक्षा पूर्वोक्त दो प्रकार के धर्मरूप परिणत आत्मा ही धर्म है - ऐसा जानना चाहिये ।

    धर्मरूप से परिणत आत्मा धर्म क्यों जानना चाहिये? उपादान कारण के समान ही कार्य होता है- ऐसा वचन होने से धर्मरूप परिणत आत्मा धर्म जानना चाहिये । शुद्ध और अशुद्ध उपादान के भेद से वह उपादान कारण भी दो प्रकार का है । आगम भाषा में जिसे शुक्लध्यान कहते हैं वह रागादि विकल्प रहित स्वसंवेदन ज्ञान केवलज्ञान की उत्पत्ति का शुद्ध उपादान कारण है; तथा अशुद्ध निश्चयनय से अशुद्धात्मा रागादि का अशुद्ध उपादान कारण है । यह गाथा का भाव है ।

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    + जीव ही शुभ, अशुभ और शुद्ध -
    जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा सुहो असुहो ।
    सुद्धेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसब्भावो ॥9॥
    जीवः परिणमति यदा शुभेनाशुभेन वा शुभोऽशुभः ।
    शुद्धेन तदा शुद्धो भवति हि परिणामस्वभावः ॥९॥
    स्वभाव से परिणाममय जिय अशुभ परिणत हो अशुभ
    शुभभाव परिणत शुभ तथा शुधभाव परिणत शुद्ध है ॥९॥
    अन्वयार्थ : [जीव:] जीव [परिणामस्वभाव:] परिणामस्वभावी होने से [यदा] जब [शुभेन वा अशुभेन] शुभ या अशुभ भावरूप [परिणमति] परिणमन करता है [शुभ: अशुभ:] तब शुभ या अशुभ (स्वयं ही) होता है, [शुद्धेन] और जब शुद्धभावरूप परिणमित होता है [तदा शुद्ध: हि भवति] तब शुद्ध होता है ॥९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब यहाँ जीव का शुभ, अशुभ और शुद्धत्व (अर्थात् यह जीव ही शुभ, अशुभ और शुद्ध है ऐसा) निश्चित करते हैं -

    जब यह आत्मा शुभ या अशुभ राग भाव से परिणमित होता है तब जपा कुसुम या तमाल पुष्प के (लाल या काले) रंग-रूप परिणमित स्फटिक की भाँति, परिणाम-स्वभाव होने से शुभ या अशुभ होता है (उस समय आत्मा स्वयं ही शुभ या अशुभ है); और जब वह शुद्ध अरागभाव से परिणमित होता है तब शुद्ध अरागपरिणत (रंग रहित) स्फटिक की भाँति, परिणाम-स्वभाव होने से शुद्ध होता है । (उस समय आत्मा स्वयं ही शुद्ध है) । इस प्रकार जीव का शुभत्व, अशुभत्व और शुद्धत्व सिद्ध हुआ ॥९॥

    जयसेनाचार्य :
    [जीवो परिणमदि जदा सुहेण असुहेण वा] जीवरूपी कर्ता जब शुभ या अशुभ परिणाम से परिणमित होता है, [सुहो असुहो हवदि] तब शुभ से शुभ-रूप वा अशुभ से अशुभ-रूप होता है । [सुद्धेण तदा सुद्धो हि] और जब शुद्ध परिणाम से परिणमित होता है, तब स्पष्ट-रूप से शुद्ध होता है । जीव कैसा होता हुआ शुभादि-रूप होता है? [परिणामसब्भावो] परिणाम सद्भाव वाला होता हुआ- परिणाम स्वभावी होने से शुभादि-रूप होता है ।

    वह इसप्रकार- जैसे अत्यन्त निर्मल स्फटिक-मणि भी जपा के फूल आदि लाल, काले और सफेद रंग रूप उपाधि के वश से लाल, काला व सफेद रंग वाला हो जाता है; उसीप्रकार स्वभाव से शुद्ध-बुद्ध एक स्वरूप वाला होने पर भी यह जीव व्यवहार से गृहस्थ दशा की अपेक्षा यथासंभव सराग सम्यक्त्व-पूर्वक दान-पूजा आदि शुभ क्रिया से, तथा मुनिदशा अपेक्षा मूलगुण-उत्तरगुण आदि शुभ क्रिया से परिणमता हुआ शुभ जानना चाहिये । मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग इन पांच (बंध के) कारणों रूप अशुभोपयोग से परिणमता हुआ अशुभ जानना चाहिये; तथा निश्चय रत्नत्रय स्वरूप शुद्धोपयोग से परिणमता हुआ शुद्ध जानना चाहिये ।

    विशेष यह कि सिद्धान्त ग्रन्थों में असंख्यात लोक प्रमाण जीव के परिणाम, मध्यम-रूप से जानकारी कराने की अपेक्षा मिथ्यादृष्टि आदि चौदह गुणस्थानरूप से कहे गये हैं । यहाँ प्राभृतशास्त्र (अध्यात्मशास्त्र) में वे ही गुणस्थान संक्षिप्तरूप से अशुभोपयोग, शुभोपयोग और शुद्धोपयोग रूप से कहे गये हैं ।

    प्राभृतशास्त्र में तीन उपयोग किस प्रकार से कहे गये हैं? - यह भाव है ॥९॥

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    + परिणाम वस्तु का स्वभाव -
    णत्थि विणा परिणामं अत्थो अत्थं विणेह परिणामो ।
    दव्वगुणपज्जयत्थो अत्थो अत्थित्तणिव्वत्तो ॥10॥
    नास्ति विना परिणाममर्थोऽर्थं विनेह परिणामः ।
    द्रव्यगुणपर्ययस्थोऽर्थोऽस्तित्वनिर्वृत्तः ॥१०॥
    परिणाम बिन ना अर्थ है अर अर्थ बिन परिणाम ना
    अस्तित्वमय यह अर्थ है बस द्रव्यगुणपर्यायमय ॥१०॥
    अन्वयार्थ : [इह] इस लोक में [परिणामं विना] परिणाम के बिना [अर्थ: नास्ति] पदार्थ नहीं है, [अर्थं विना] पदार्थ के बिना [परिणाम:] परिणाम नहीं है; [अर्थ:] पदार्थ [द्रव्यगुणपर्ययस्थ:] द्रव्य-गुण-पर्याय में रहने-वाला और [अस्तित्वनिर्वृत्त:] (उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-मय) अस्तित्व से बना हुआ है ॥१०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब परिणाम वस्तु का स्वभाव है यह निश्चय करते हैं :-

    परिणाम के बिना वस्तु अस्तित्व धारण नहीं करती, क्योंकि वस्तु द्रव्यादि के द्वारा (द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव से) परिणाम से भिन्न अनुभव में (देखने में) नहीं आती, क्योंकि
    1. परिणाम रहित वस्तु गधे के सींग के समान है
    2. तथा उसका, दिखाई देने वाले गोरस इत्यादि (दूध, दही वगैरह) के परिणामों के साथ 1विरोध आता है ।
    (जैसे-परिणाम के बिना वस्तु अस्तित्व धारण नहीं करती उसी प्रकार) वस्तु के बिना परिणाम भी अस्तित्व को धारण नहीं करता, क्योंकि स्वाश्रय-भूत वस्तु के अभाव में (अपने आश्रय-रूप जो वस्तु है वह न हो तो) निराश्रय परिणाम को शून्यता का प्रसंग आता है । और वस्तु तो 2ऊर्ध्वतासामान्यस्वरूप द्रव्य में, सहभावी विशेष-स्वरूप (साथ ही साथ रहनेवाले विशेष- भेद जिनका स्वरूप है ऐसे) गुणों में तथा क्रमभावी विशेष-स्वरूप पर्यायों में रही हुई और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यमय अस्तित्व से बनी हुई है; इसलिये वस्तु परिणाम-स्वभाववाली ही है ॥१०॥

    1यदि वस्तुको परिणाम रहित माना जावे तो गोरस इत्यादि वस्तुओंके दूध, दही आदि जो परिणाम प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं उनके साथ विरोध आयेगा
    2कालकी अपेक्षासे स्थिर होनेको अर्थात् कालापेक्षित प्रवाहको ऊर्ध्वता अथवा ऊँचाई कहा जाता है । ऊर्ध्वतासामान्य अर्थात् अनादि- अनन्त उच्च (कालापेक्षित) प्रवाहसामान्य द्रव्य है

    जयसेनाचार्य :
    [णत्थि विणा परिणामं अत्थो] सबसे पहले मुक्त जीव में कहते हैं- सिद्ध पर्याय रूप शुद्ध परिणाम के बिना शुद्ध जीव पदार्थ नहीं है । सिद्ध पर्याय के बिना शुद्ध जीव पदार्थ क्यों नहीं है? सिद्ध पर्याय और शुद्ध जीव में नाम लक्षण, प्रयोजन आदि भेद होने पर भी दोनों में प्रदेश-भेद नहीं होने से सिद्ध पर्याय के बिना शुद्ध जीव नहीं है । [अत्थं विणेह परिणामो] इस लोक में मुक्त-स्वरूपी आत्म-पदार्थ के बिना शुद्धात्मा की प्राप्ति लक्षण सिद्ध पर्याय-रूप शुद्ध परिणाम नहीं है । मुक्त जीव के बिना सिद्ध पर्याय क्यों नहीं है? मुक्त जीव और सिद्ध पर्याय में नामादि (पूर्वोक्त) भेद होने पर भी प्रदेशभेद नहीं होने से मुक्त जीव के बिना सिद्ध पर्याय नही होती । [दव्वगुणपज्जयत्थो] आत्मस्वरूप द्रव्य, उसमें ही केवलज्ञानादि गुण और सिद्धरूप पर्याय; इसप्रकार कहे गये लक्षण वाले द्रव्य-गुण-पर्याय में रहता है- द्रव्य-गुण-पर्याय में स्थित है । द्रव्य-गुण-पर्यायों में स्थिति करने वाला कर्तारूप वह कौन है? [अत्थो] जैसे सुवर्ण पदार्थ सुवर्ण द्रव्य, पीलेपन आदि गुणों तथा कुण्डल आदि पर्यायों में स्थित है उसीप्रकार परमात्म पदार्थ पूर्वोक्त अपने द्रव्य-गुण-पर्यायों में स्थित है । वह परमात्म-पदार्थ और कैसा है? [अत्थित्तणिव्वत्तो] जैसे सुवर्ण पदार्थ सुवर्ण द्रव्य सुवर्ण-मय गुण और सुवर्णमय पर्यायों रूप अस्तित्व से बना हुआ है, उसीप्रकार परमात्मपदार्थ भी शुद्ध द्रव्य, शुद्ध गुणों, शुद्ध पर्यायों के आधारभूत शुद्ध अस्तित्व से बना होने के कारण अस्तित्व से रचित है ।

    यहाँ तात्पर्य यह है कि जैसे मुक्त जीव में द्रव्य-गुण-पर्याय, इन तीनों का परस्पर अविनाभाव दिखाया गया है, उसीप्रकार नय-भेद से संसारी-जीव में भी मतिज्ञानादि विभाव-गुणों और मनुष्य-नारकी आदि विभाव-पर्यायों में परस्पर अविनाभाव यथा-योग्य जान लेना चाहिये । उसी प्रकार पुद्गलादि शेष द्रव्यों में भी द्रव्य-गुण-पर्याय का परस्पर अविनाभाव जान लेना चाहिये ॥१०॥

    🏠
    + शुद्ध परिणाम के ग्रहण और शुभ परिणाम के त्याग के लिये उनका फल विचारते हैं -
    धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपयोगजुदो ।
    पावदि णिव्वाणसुहं सुहोवजुत्तो य सग्गसुहं ॥11॥
    धर्मेण परिणतात्मा आत्मा यदि शुद्धसंप्रयोगयुतः ।
    प्राप्नोति निर्वाणसुखं शुभोपयुक्तो वा स्वर्गसुखम् ॥११॥
    प्राप्त करते मोक्षसुख शुद्धोपयोगी आतमा
    पर प्राप्त करते स्वर्गसुख हि शुभोपयोगी आतमा ॥११॥
    अन्वयार्थ : [धर्मेण परिणतात्मा] धर्म से परिणमित स्वरूप वाला [आत्मा] आत्मा [यदि] यदि [शुद्धसंप्रयोगयुक्त:] शुद्ध उपयोग में युक्त हो तो [निर्वाणसुख] मोक्ष सुख को [प्राप्नोति] प्राप्त करता है [शुभोपयुक्त: च] और यदि शुभोपयोग वाला हो तो [स्वर्गसुखम्‌] स्वर्ग के सुख को (बन्ध को) प्राप्त करता है ॥११॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब जिनका चारित्र परिणाम के साथ सम्पर्क (सम्बन्ध) है ऐसे जो शुद्ध और शुभ (दो प्रकार के) परिणाम हैं उनके ग्रहण तथा त्याग के लिये (शुद्ध परिणाम के ग्रहण और शुभ परिणाम के त्याग के लिये) उनका फल विचारते हैं :-

    जब यह आत्मा धर्म-परिणत स्वभाव वाला होता हुआ शुद्धोपयोग परिणति को धारण करता है-बनाये रखता है तब, जो विरोधी शक्ति से रहित होने के कारण अपना कार्य करने के लिये समर्थ है ऐसा चारित्रवान होने से, (वह) साक्षात् मोक्ष को प्राप्त करता है; और जब वह धर्मपरिणत स्वभाव वाला होने पर भी शुभोपयोग परिणति के साथ युक्त होता है तब जो *विरोधी शक्ति सहित होने से स्वकार्य करने में असमर्थ है और कथंचित् विरुद्ध कार्य करनेवाला है ऐसे चारित्र से युक्त होने से, जैसे अग्नि से गर्म किया हुआ घी किसी मनुष्य पर डाल दिया जावे तो वह उसकी जलन से दुःखी होता है, उसी प्रकार वह स्वर्ग सुख के बन्ध को प्राप्त होता है, इसलिये शुद्धोपयोग उपादेय है और शुभोपयोग हेय है ।

    *दान, पूजा, पंच-महाव्रत, देवगुरुधर्म प्रति राग इत्यादिरूप जो शुभोपयोग है वह चारित्रका विरोधी है इसलिये सराग (शुभोपयोगवाला) चारित्र विरोधी शक्ति सहित है और वीतरग चारित्र विरोधी शक्ति रहित है

    जयसेनाचार्य :
    [धम्मेण परिणदप्पा अप्पा] धर्मरूप से परिणत स्वरूप वाला होता हुआ यह आत्मा, [जदि सुद्धसंपयोगजुदो] यदि शुद्धोपयोग है नाम जिसका ऐसे शुद्धसंप्रयोग परिणामरूप परिणत होता है, [पावदि णिव्वाणसुहं] तो मोक्षसुख प्राप्त करता है । [सुहोवजुत्तो व सग्गसुहं] शुभोपयोग से परिणत होता हुआ स्वर्ग-सुख प्राप्त करता है ।

    यहाँ इसका विस्तार करते है- इस गाथा में धर्म शब्द से अहिंसा लक्षण धर्म, गृहस्थ धर्म, मुनि धर्म, उत्तम क्षमादि लक्षण रत्नत्रय स्वरूप धर्म, मोह-क्षोभ रहित आत्मा के परिणाम अथवा वस्तु का शुद्ध स्वभाव ग्रहण किया जाता है । ''चारित्र ही वास्तविक धर्म है'' ऐसा वचन होने से, वही धर्म दूसरे शब्दों में चारित्र कहा जाता है । और वह चारित्र अपहृत संयम-उपेक्षा संयम भेद से अथवा सराग-वीतराग भेद से और शुभोपयोग-शुद्धोपयोग भेद से दो प्रकार का है । वहाँ जो शुद्धसंप्रयोग शब्द से कहा जाने वाला शुद्धोपयोग स्वरूप वीतराग चारित्र है उससे मोक्ष की प्राप्ति होती है । निर्विकल्प समाधि रूप शुद्धोपयोग में रहने की शक्ति का अभाव होने पर जब (पूर्वोक्त जीव) शुभोपयोगरूप सराग-चारित्र से परिणत होता है, तो अनाकुलता लक्षण पारमार्थिक सुख से विपरीत आकुलता पैदा करने वाला स्वर्ग-सुख प्राप्त करता है । तथा बाद में परम समाधिरूप मोक्ष की कारणभूत वीतराग चारित्ररूप सामग्री के सद्भाव में मोक्ष प्राप्त करता है- यह गाथा का भाव है ॥११॥

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    + अत्यन्त हेय है ऐसे अशुभ परिणाम का फल विचारते हैं -
    असुहोदएण आदा कुणरो तिरियो भवीय णेरइयो ।
    दुक्खसहस्सेहिं सदा अभिद्‌दुदो भमदि अच्चंतं ॥12॥
    अशुभोदयेनात्मा कुनरस्तिर्यग्भूत्वा नैरयिकः ।
    दुःखसहस्रैः सदा अभिद्रुतो भ्रमत्यत्यन्तम् ॥१२॥
    अशुभोपयोगी आतमा हो नारकी तिर्यग कुनर
    संसार में रुलता रहे अर सहस्त्रों दुख भोगता ॥१२॥
    अन्वयार्थ : [अशुभोदयेन] अशुभ उदयसे [आत्मा] आत्मा [कुनर:] कुमनुष्य [तिर्यग्‌] तिर्यंच [नैरयिक:] और नारकी [भूत्वा] होकर [दुःखसहस्रै:] हजारों दुःखों से [सदा अभिद्रुतः] सदा पीडित होता हुआ [अत्यंत भ्रमति] (संसारमें) अत्यन्त भ्रमण करता है ॥१२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब चारित्र परिणाम के साथ सम्पर्क रहित होने से जो अत्यन्त हेय है ऐसे अशुभ-परिणाम का फल विचारते हैं :-

    जब यह आत्मा किंचित् मात्र भी धर्मपरिणति को प्राप्त न करता हुआ अशुभोपयोग परिणति का अवलम्बन करता है, तब वह कुमनुष्य, तिर्यंच और नारकी के रूप में परिभ्रमण करता हुआ (तद्रूप) हजारों दुःखों के बन्धन का अनुभव करता है; इसलिये चारित्रके लेशमात्र का भी अभाव होने से यह अशुभोपयोग अत्यन्त हेय ही है ॥१२॥

    इसप्रकार यह भाव (भगवान कुन्दकुन्दाचार्य देव) समस्त शुभाशुभोपयोग-वृत्ति को (शुभ उपयोगरूप और अशुभ उपयोगरूप परिणति को) अपास्त कर (हेय मानकर, तिरस्कार करके, दूर करके) शुद्धोपयोग-वृत्ति को आत्मसात् (आत्मरूप, अपने-रूप) करते हुए शुद्धोपयोग अधिकार प्रारम्भ करते हैं । उसमें (पहले) शुद्धोपयोग के फल की आत्मा के प्रोत्साहन के लिये प्रशंसा करते हैं ।

    जयसेनाचार्य :
    [असुहोदयेण] अशुभ-कर्म के उदय से, [आदा] आत्मा, [कुणरो तिरियो भवीय णेरइयो] कुमनुष्य, तिर्यंच, नारकी होकर । इन रूप होकर आत्मा क्या करता है? [दुक्ससहस्सेहिं सदा अभिंधुदो भमदि अच्चंतं] हजारों दु:खों से हमेशा पीड़ित होता हुआ संसार में दीर्घ काल तक घूमता रहता है ।

    वह इसप्रकार- निर्विकार शुद्धात्म तत्त्व की रुचि-रूप निश्चय सम्यग्दर्शन तथा उसी मे निर्विकल्प मनोवृत्तिरूप निश्चयचारित्र से विरुद्ध लक्षण वाले विपरीत मान्यता के उत्पादक, देखे हुए, सुने हुए, भोगे हुए विषयों की इच्छा सम्बन्धी तीव्र संक्लेश परिणाम-रूप अशुभोपयोग से बंधे हुये पाप-कर्मों के उदय में यह आत्मा सहज-शुद्धात्मा के आश्रय से उत्पन्न आनन्द है स्वलक्षण जिसका, ऐसे पारमार्थिक-सुख से विपरीत दुःख से दुखी होता हुआ आत्मस्वभाव की भावना से रहित होकर संसार में दीर्घकाल तक घूमता रहता है- यह तात्पर्य है ॥१२॥

    इस प्रकार शुभादि तीनों उपयोगों के फल को बताने वाले चौथे सथल में दो गाथायें समाप्त हुई ।

    (अब शुद्धोपयोग के फल अनन्तसुख और शुद्धोपयोगी पुरुषका लक्षण बताने वाला, दो गाथाओं में निबद्ध पाँचवाँ स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब
    1. शुभोपयोग और अशुभोपयोग- इन दोनों को निश्चयनय से हेय जानकर अधिकार प्रारम्भ करते हुए शुद्धात्म-भावना को आत्मसात्‌ करने वाले-शुद्धोपयोगी जीव के प्रोत्साहन के लिये शुद्धोपयोग का फल प्रकाशित करते हैं-
    2. अथवा द्रितीय पातनिका- यद्यपि शुद्धोपयोग का फल ज्ञान और सुख आगे संक्षेप-विस्तार से कहेंगे तथापि यहाँ पीठिका में भी सूचना करते हैं -
    3. अथवा तृतीय पातनिका- पहले (ग्यारहवीं गाथा मे) शुद्धोपयोग का फल निर्वाण कहा था, अब निर्वाण का फल अनन्त सुख कहते हैं -

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    +  शुद्धोपयोग के फल की आत्मा के प्रोत्साहन के लिये प्रशंसा करते हैं -
    अइसयमादसमुत्थं विसयातीदं अणोवममणंतं ।
    अव्वुच्छिण्णं च सुहं सुद्धवओगप्पसिद्धाणं ॥13॥
    अतिशयमात्मसमुत्थं विषयातीतमनौपम्यमनन्तम् ।
    अव्युच्छिन्नं च सुखं शुद्धोपयोगप्रसिद्धानाम् ॥१३॥
    शुद्धोपयोगी जीव के है अनूपम आत्मोत्थसुख
    है नंत अतिशयवंत विषयातीत अर अविछिन्न है ॥१३॥
    अन्वयार्थ : [शुद्धोपयोगप्रसिद्धानां] शुद्धोपयोग से *निष्पन्न हुए आत्माओं को (केवली और सिद्धों का) [सुखं] सुख [अतिशयं] अतिशय [आत्मसमुत्थं] आत्मोत्पन्न [विषयातीतं] विषयातीत (अतीन्द्रिय) [अनौपम्यं] अनुपम [अनन्तं] अनन्त (अविनाशी) [अव्युच्छिन्नं च] और अविच्छिन्न (अटूट) है ॥१३॥
    *निष्पन्न होना = उत्पन्न होना; फलरूप होना; सिद्ध होना । (शुद्धोपयोग से निष्पन्न हुए अर्थात् (शुद्धोपयोग कारण से कार्यरूप हुए)

    अमृतचंद्राचार्य :
    इसप्रकार यह भाव (भगवान कुन्दकुन्दाचार्य देव) समस्त शुभाशुभोपयोगवृत्ति को(शुभउपयोगरूप और अशुभ उपयोगरूप परिणति को) अपास्त कर (हेय मानकर, तिरस्कार करके, दूर करके) शुद्धोपयोगवृत्ति को आत्मसात् (आत्मरूप, अपनेरूप) करते हुए शुद्धोपयोग अधिकार प्रारम्भ करते हैं । उसमें (पहले) शुद्धोपयोग के फल की आत्मा के प्रोत्साहन के लिये प्रशंसा करते हैं -
    1. अनादि संसार से जो पहले कभी अनुभव में नहीं आया ऐसे अपूर्व, परम अद्भुत आह्लादरूप होने से 'अतिशय',
    2. आत्मा का ही आश्रय लेकर (स्वाश्रित) प्रवर्तमान होने से 'आत्मोत्पन्न',
    3. पराश्रय से निरपेक्ष होने से (स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्द के तथा संकल्प-विकल्प के आश्रय की अपेक्षा से रहित होने से) 'विषयातीत',
    4. अत्यन्त विलक्षण होने से (अन्य सुखों से सर्वथा भिन्न लक्षण वाला होने से) 'अनुपम',
    5. समस्त आगामी काल में कभी भी नाश को प्राप्त न होने से 'अनन्त' और
    6. बिना ही अन्तर के प्रवर्तमान होने से 'अविच्छिन्न'
    सुख शुद्धोपयोग से निष्पन्न हुए आत्माओं के होता है, इसलिये वह (सुख) सर्वथा प्रार्थनीय (वांछनीय) है ॥१३॥

    जयसेनाचार्य :
    [सुहं] इसप्रकार कहे हुये विशेषण सम्पन्न सुख होता है । ऐसा सुख किन्हें होता है? [सुद्धवओवप्पसिद्धाणं] वीतराग परम सामायिक शब्द से कहने योग्य शुद्धोपयोग से प्रसिद्ध उत्पन्न हुए जो अरहंत और सिद्ध हैं उन्हें होता है ।

    यहाँ यही सुख उपादेय रूप से निरन्तर भावना करने योग्य है - यह भाव है ।

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    + शुद्धोपयोग परिणत आत्मा का स्वरूप -
    सुविदिदपयत्थसुत्तो संजमतवसंजुदो विगदरागो ।
    समणो समसुहदुक्खो भणिदो सुद्धोवओगो त्ति ॥14॥
    सुविदितपदार्थसूत्रः संयमतपः संयुतो विगतरागः ।
    श्रमणः समसुखदुःखो भणितः शुद्धोपयोग इति ॥१४॥
    हो वीतरागी संयमी तपयुक्त अर सूत्रार्थ विद्
    शुद्धोपयोगी श्रमण के समभाव भवसुख-दुक्ख में ॥१४॥
    अन्वयार्थ : [सुविदितपदार्थसूत्र:] जिन्होंने (निज शुद्ध आत्मादि) पदार्थों को और सूत्रों को भली भाँति जान लिया है, [संयमतप:संयुत:] जो संयम और तपयुक्त हैं, [विगतराग:] जो वीतराग अर्थात् राग रहित हैं [समसुखदुःख:] और जिन्हें सुख-दुःख समान हैं, [श्रमण:] ऐसे श्रमण को (मुनिवर को) [शुद्धोपयोग: इति भणित:] 'शुद्धोपयोगी' कहा गया है ॥१४॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब शुद्धोपयोग-परिणत आत्मा का स्वरूप कहते हैं :-

    सूत्रों के अर्थ के ज्ञानबल से स्वद्रव्य और परद्रव्य के विभाग के परिज्ञान में, श्रद्धान में, और विधान में (आचरण में) समर्थ होने से (स्वद्रव्य और परद्रव्य की भिन्नता का ज्ञान, श्रद्धान और आचरण होने से) जो श्रमण पदार्थों को और (उनके प्रतिपादक) सूत्रों को जिन्होंने भली-भाँति जान लिया है ऐसे हैं, समस्त छह जीव-निकाय के हनन के विकल्प से और पंचेन्द्रिय सम्बन्धी अभिलाषा के विकल्प से आत्मा को व्यावृत्त करके आत्मा का शुद्धस्वरूप में संयमन करने से, और स्वरूप-विश्रान्त निस्तरंग चैतन्य-प्रतपन होने से जो संयम और तप-युक्त हैं, सकल मोहनीय के विपाक से भेद की भावना की उत्कृष्टता से (समस्त मोहनीय कर्म के उदय से भिन्नत्व की उत्कृष्ट भावना से) निर्विकार आत्म-स्वरूप को प्रगट किया होने से जो वीतराग हैं, और परमकला के अवलोकन के कारण साता वेदनीय तथा असाता वेदनीय के विपाक से उत्पन्न होनेवाले जो सुख-दुख उन सुख-दुख जनित परिणामों की विषमता का अनुभव नहीं होने से (परम सुख-रस में लीन, निर्विकार स्वसंवेदन रूप परमकला के अनुभव के कारण इष्टानिष्ट संयोगों में हर्ष-शोकादि विषय परिणामों का अनुभव न होने से) जो समसुखदुःख हैं, ऐसे श्रमण शुद्धोपयोगी कहलाते हैं ॥१४॥

    परिज्ञान = पूरा ज्ञान; ज्ञान
    व्यावृत्त करके = विमुख करके; रोककर; अलग करके
    स्वरूपविश्रान्त = स्वरूपमें स्थिर हुआ
    निस्तरंग = तरंग रहित; चंचलता रहित; विकल्प रहित; शांत
    प्रतपन होना = प्रतापवान होना, प्रकाशित होना, दैदीप्यमान होना

    जयसेनाचार्य :
    [सुविदिदपयत्थसुत्तो] जिसने संशयादि रहित होने के कारण अच्छी तरह से निज शुद्धात्मा आदि पदर्थों और उनके प्रतिपादक सूत्रों (आगम-जिनवाणी) को जान लिया है, और उनका श्रद्धान किया है, उसे पदार्थों और सूत्रों को अच्छी तरह जाननेवाला कहते हैं । [संजमतवसंजुदो] बाह्य में द्रव्येन्द्रियों से निवृत्त होकर छहकाय के जीवों की रक्षा से और अन्तरंग में अपने शुद्धात्मा के अनुभव के बल से स्वरूप में संयमित होने से जो संयम-सम्पन्न हैं तथा बहिरंग और अन्तरंग तप के बल से काम-क्रोधादि शत्रुओं के द्रारा जिसका प्रताप खण्डित नहीं हुआ है, ऐसे निज शुद्धात्मा मे प्रतापवंत-विजयवंत होने से (स्वरूपलीन होने से) जो तप-सम्पन्न हैं । [विगदरागो] वीतराग शुद्धात्म-भावना के बल से समस्त रागादि दोषों से रहित होने के कारण जो विगतराग हैं । [समसुहदुक्खो] वीतराग निर्विकल्प समाधि से उत्पन्न उसीप्रकार परमानन्द सुख-रस में लीन जो निर्विकार स्व-संवेदनरूप उत्कृष्ट कला, उसके अवलम्बन से इष्ट-अनिष्ट पंचेन्द्रिय विषयों में हर्ष-विषाद रहित होने के कारण जो समसुख-दु:ख हैं । [समणो] ऐसे गुणों से समृद्ध श्रमण-उत्कृष्ट मुनि, [भणिदो सुद्धोवओगो त्ति] शुद्धोपयोग कहे गये हैं - यह अभिप्राय है ॥१४॥

    इसप्रकार पाँचवें स्थल में शुद्धोपयोग के फलभूत अनन्त-सुख का और शुद्धोपयोगी पुरुष का स्वरूप बताने वाली दो गाथायें समाप्त हुई ।

    इसप्रकार यहाँ चौदह गाथाओं द्वारा पाँच स्थलों में विभक्त 'पीठिका' नामक प्रथम अन्तराधिकार पूर्ण हुआ ।

    इसके बाद सात गाथाओं में निबद्ध सामान्य से सर्वज्ञसिद्धि-ज्ञान विचार और संक्षेप में शुद्धोपयोग का फल बताने वाला दूसरा अन्तराधिकार है । वहाँ चार स्थल हैं-
    1. उनमें से पहले स्थल में सर्वज्ञ का स्वरूप बताने वाली पहली गाथा और स्वयंभू का कथन करनेवाली दूसरी- इसप्रकार [उवओगविसुद्धो] इत्यादि दो गाथायें हैं ।
    2. दूसरे स्थल में उन्हीं सर्वज्ञ भगवान के उत्पाद-व्यय-धौव्य की स्थापना करने के लिये पहली गाथा तथा उन्हीं उत्पाद-व्यय-धौव्य को दृढ़ करने के लिये दूसरी- इसप्रकार [भंग विहीणो] इत्यादि दो गाथायें हैं ।
    3. तीसरे स्थल में सर्वज्ञ की श्रद्धा से अनन्त-सुख होता, इसे दिखाने के लिये [तं सव्वट्ठवरिट्ठं] इत्यादि एक गाथा है ।
    4. इसके बाद चौथे स्थल में अतीन्द्रिय ज्ञान-सुख रूप परिणमन को बताने की मुख्यता से पहली गाथा तथा केवली भगवान के कवलाहार निषेध की मुख्यता से दूसरी गाथा- इसप्रकार [पक्खीणघाइकम्मो] इत्यादि दो गाथायें हैं ।
    इसप्रकार चार स्थलों द्वारा दूसरे अन्तराधिकार में समुदाय पातनिका (सामूहिक उत्थानिका) है ।

    सामान्य सर्वज्ञ -सिद्धि नामक द्वितीयान्तराधिकार का स्थल-विभाजन
    स्थल क्रम विषय गाथा कुल
    प्रथम सर्वज्ञ एवं स्वयंभू स्वरूप प्रतिपादक 15-16 2
    द्वीतीय सर्वज्ञ के उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य सिद्धि एवं पुष्टि 17-18 2
    तृतीय सर्वज्ञ श्रद्धा का फल 19 1
    चतुर्थ अतीन्द्रिय ज्ञान-सुख रूप परिणमन तथा केवली कवलाहार निषेध 20-21 2
    कुल ४     कुल 7

    अब, दूसरे अन्तराधिकार में दो गाथाओं वाला सर्वज्ञ एवं स्वयम्भू प्रतिपादक प्रथम स्थल प्रारम्भ होता वह इसप्रकार -

    अब -
    1. शुद्धोपयोग की प्राप्ति के बाद केवलज्ञान होता है, यह कहते हैं -
    2. अथवा दूसरी पातनिका - 'कुन्दकुन्दाचार्यदेव’ सम्बोधन करते हैं कि हे 'शिवकुमार महाराज' संक्षिप्त रुचिवाला कोई आसन्न-भव्य पीठिका के व्याख्यान को ही सुनकर अपना कार्य (स्वरूप-लीनतारूप कार्य) कर लेता है । विस्तार रुचि वाला कोई दूसरा, शुद्धोपयोग से उत्पन्न सर्वज्ञ के ज्ञान-सुखादिक का विचार कर बाद में (स्वरूप-लीनतारूप) अपना कार्य करता है; अत: सर्वज्ञ के ज्ञान-सुखादिक की व्याख्या करते हैं -

    🏠
    + शुद्धोपयोग द्वारा तत्काल ही होनेवाली शुद्ध आत्मस्वभाव प्राप्ति की प्रशंसा -
    उवओगविसुद्धो जो विगदावरणंतरायमोहरओ ।
    भूदो सयमेवादा जादि परं णेयभूदाणं ॥15॥
    उपयोगविशुद्धो यो विगतावरणान्तरायमोहरजाः ।
    भूतः स्वयमेवात्मा याति पारं ज्ञेयभूतानाम् ॥१५॥
    शुद्धोपयोगी जीव जग में घात घातीकर्मरज
    स्वयं ही सर्वज्ञ हो सब ज्ञेय को हैं जानते ॥१५॥
    अन्वयार्थ : [यः] जो [उपयोगविशुद्ध:] उपयोग विशुद्ध (शुद्धोपयोगी) है [आत्मा] वह आत्मा [विगतावरणान्तरायमोहरजा:] ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और मोहरूप रज से रहित [स्वयमेव भूत:] स्वयमेव होता हुआ [ज्ञेयभूतानां] ज्ञेयभूत पदार्थों के [पारं याति] पार को प्राप्त होता है ॥१५॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, शुद्धोपयोग की प्राप्ति के बाद तत्काल (अन्तर पड़े बिना) ही होनेवाली शुद्धआत्मस्वभाव (केवलज्ञान) प्राप्ति की प्रशंसा करते हैं :-

    जो (आत्मा) चैतन्य परिणाम-स्वरूप उपयोग के द्वारा यथा-शक्ति विशुद्ध होकर वर्तता है, वह (आत्मा) जिसे पद-पद पर (प्रत्येक पर्याय में) विशिष्ट (असाधारण) विशुद्ध शक्ति प्रगट होती जाती है, ऐसा होने से, अनादि संसार से बँधी हुई दृढ़तर मोह-ग्रंथी छूट जाने से अत्यन्त निर्विकार चैतन्यवाला और समस्त ज्ञानावरण, दर्शनावरण तथा अन्तराय के नष्ट हो जाने से निर्विघ्न विकसित आत्म-शक्तिवान स्वयमेव होता हुआ ज्ञेयता (पदार्थों) के अन्त को पा लेता है ।

    यहाँ (यह कहा है कि) आत्मा ज्ञान-स्वभाव है, और ज्ञान ज्ञेय प्रमाण है; इसलिये समस्त ज्ञेयों के भीतर प्रवेश को प्राप्त (ज्ञाता) ज्ञान जिसका स्वभाव है ऐसे आत्मा को आत्मा शुद्धोपयोग के ही प्रसाद से प्राप्त करता है ।

    जयसेनाचार्य :
    [उवओगविसुद्धो जो] शुद्धोपयोग रूप परिणाम से विशुद्ध होकर जो हैं [विगदावरणंतरायमोहरओ] ज्ञानावरण, दर्शनावरण अन्तराय और मोहरज रहित होते हुये वर्तते हैं । वे शुद्धोपयोग से विशुद्ध ज्ञानावरणादि रज से रहित कैसे हुये? [सयमेव] निश्चय से स्वयं ही ऐसे हुये । [आदा] वे पूर्वोक्त परमात्मा, [जादि] जाते हैं । वे सर्वज्ञ परमात्मा कहाँ जाते हैं? [पारं] अन्त तक जाते हैं । वे परमात्मा किनके अन्त तक जाते हैं? [णेयभूदाणं] जानने योग्य पदार्थों के अन्त तक जाते हैं । सबको जानते है - यह इसका अर्थ है ।

    यहाँ इसका विस्तार करते हैं- आगम भाषा में जिसे पृथक्त्ववितर्कवीचार शुक्लध्यान कहते हैं, ऐसे निर्मोह स्वभावी निज शुद्धात्मा मे स्थिरतारूप शुद्धोपयोग नामक परिणामों से, पहले सम्पूर्ण मोह का क्षय कर उसके बाद रागादि विकल्परूप उपाधि रहित स्वसम्वेदन सम्पन्न एकत्ववितर्क अवीचार नामक दूसरे शुक्लध्यान के साथ क्षीणकषाय गुणस्थान में अन्तर्मुहूर्त काल ठहरकर उसके ही अन्तिम समय में उन शुद्धोपयोगी जीव के ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वीर्यान्तराय नामक तीन घातिकर्म एक साथ नष्ट हो जाते हैं और तीन-लोक तीन-कालवर्ती सम्पूर्ण वस्तुओं में रहनेवाले अनन्त धर्मों को एक साथ प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान प्रगट हो जाता है ।

    इससे फलित हुआ कि शुद्धोपयोग से ही सर्वज्ञ होते हैं ॥१५॥

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    + शुद्धात्म स्वभाव की प्राप्ति अन्य कारकों से निरपेक्ष होने से अत्यन्त आत्माधीन -
    तह सो लद्धसहावो सव्वण्हू सव्वलोगपदिमहिदो ।
    भूदो सयमेवादा हवदि सयंभु त्ति णिद्दिट्ठो ॥16॥
    तथा स लब्धस्वभावः सर्वज्ञः सर्वलोकपतिमहितः ।
    भूतः स्वयमेवात्मा भवति स्वयम्भूरिति निर्दिष्टः ॥१६॥
    त्रैलोक्य अधिपति पूज्य लब्धस्वभाव अर सर्वज्ञ जिन
    स्वयं ही हो गये तातैं स्वयम्भू सब जन कहें ॥१६॥
    अन्वयार्थ : [तथा] इसप्रकार [सः आत्मा] वह आत्मा [लब्धस्वभाव:] स्वभाव को प्राप्त [सर्वज्ञ:] सर्वज्ञ [सर्वलोकपतिमहित:] और *सर्व (तीन) लोक के अधिपतियों से पूजित [स्वयमेव भूत:] स्वयमेव हुआ होने से [स्वयंभू: भवति] 'स्वयंभू' है [इति निर्दिष्ट:] ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा है ॥१६॥
    *सर्वलोक के अधिपति = तीनों लोक के स्वामी - सुरेन्द्र, असुरेन्द्र और चक्रवर्ती

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, शुद्धोपयोग से होनेवाली शुद्धात्मस्वभाव की प्राप्ति अन्य कारकों से निरपेक्ष (स्वतंत्र) होने से अत्यन्त आत्माधीन है (लेशमात्र पराधीन नहीं है) यह प्रगट करते हैं :-

    शुद्ध उपयोग की भावना के प्रभाव से समस्त घाति-कर्मों के नष्ट होने से जिसने शुद्ध अनन्त-शक्तिवान चैतन्य स्वभाव को प्राप्त किया है, ऐसा यह (पूर्वोक्त) आत्मा,
    1. शुद्ध अनन्त शक्ति युक्त ज्ञायक स्वभाव के कारण स्वतंत्र होने से जिसने कर्तृत्व के अधिकार को ग्रहण किया है ऐसा,
    2. शुद्ध अनन्त-शक्ति युक्त ज्ञानरूप से परिणमित होने के स्वभाव के कारण स्वयं ही प्राप्य होने से (स्वयं ही प्राप्त होता होने से) कर्मत्व का अनुभव करता हुआ,
    3. शुद्ध अनन्त शक्ति युक्त ज्ञानरूप से परिणमित होने के स्वभाव से स्वयं ही साधकतम (उत्कृष्ट साधन) होने से करणता को धारण करता हुआ,
    4. शुद्ध अनन्त शक्ति युक्त ज्ञानरूप से परिणमित होने के स्वभाव के कारण स्वयं ही कर्म द्वारा समाश्रित होने से (अर्थात् कर्म स्वयं को ही देने में आता होने से) सम्प्रदानता को धारण करता हुआ,
    5. शुद्ध अनन्त-शक्तिमय ज्ञानरूप से परिणमित होने के समय पूर्व में प्रवर्तमान विकलज्ञान स्वभाव का नाश होने पर भी सहज ज्ञान स्वभाव से स्वयं ही ध्रुवता का अवलम्बन करने से अपादान को धारण करता हुआ, और
    6. शुद्ध अनन्त-शक्ति युक्त ज्ञानरूप से परिणमित होने के स्वभाव का स्वयं ही आधार होने से अधिकरणता को आत्मसात् करता हुआ
    (इस प्रकार) स्वयमेव छह कारक-रूप होने से अथवा उत्पत्ति- अपेक्षा से द्रव्य-भाव भेद से भिन्न घातिकर्मों को दूर करके स्वयमेव आविर्भूत होने से, 'स्वयंभू' कहलाता है ।

    यहाँ यह कहा गया है कि - निश्चय से पर के साथ आत्मा का कारकता का सम्बन्ध नहीं है, कि जिससे शुद्धात्म-स्वभाव की प्राप्ति के लिये सामग्री (बाह्य साधन) ढूँढने की व्यग्रता से जीव (व्यर्थ ही) परतंत्र होते हैं ।

    जयसेनाचार्य :
    [तह सो लद्धसहावो] जैसे निश्चय रत्नत्रय लक्षण शुद्धोपयोग के प्रसाद से (यह आत्मा) सभी को जानता है, उसी प्रकार पूर्वोक्त (पन्द्रहवीं गाथा में कहे) शुद्धात्मस्वभाव को प्राप्त करता हुआ, [आदा] यह आत्मा [हवदि सयंभु त्ति णिद्दिट्ठो] स्वयंभू है, ऐसा कहा गया है । वह आत्मा कैसा होता हुआ स्वयंभू है ? [सव्वण्हू सव्वलोगपदिमहिदो भूदो] सर्वज्ञ और सम्पूर्ण लोक के (विविध) राजाओं द्वारा पूजित होता हुआ स्वयंभू है । वह स्वयंभू कैसे है? [सयमेव] वह निश्चय से स्वयं ही स्वयंभू है ।

    वह इसप्रकार-
    1. अभिन्न कारकरूप ज्ञानानंद एक स्वभाव से स्वतंत्र होने के कारण कर्ता है ।
    2. नित्यानन्द एक स्वभाव से स्वयं को प्राप्त होने के कारण कर्म कारक है ।
    3. शुद्ध चैतन्य स्वभाव से साधकतम होने के कारण करण कारक है ।
    4. वीतराग परमानन्द एक परिणति लक्षण कर्म से समाश्रित होने के कारण (स्वयं को दिया गया होने से) सम्प्रदान है ।
    5. उसी प्रकार पहले के मति आदि ज्ञान के भेदों का अभाव होने पर भी अखण्डित एक चैतन्य-प्रकाश से अविनाशी होने के कारण अपादान है ।
    6. निश्चय से शुद्ध चैतन्य आदि गुण स्वभावी आत्मा का स्वयं ही आधार होने के कारण अधिकरण है;
    इसप्रकार अभेद स्वरूप से स्वयं ही परिणमता हुआ यह आत्मा परमात्म-स्वभावरूप केवलज्ञान की उत्पत्ति के समय भिन्न कारकों की अपेक्षा नहीं करता, इसलिये स्वयंभू है -- यह भाव है ॥१६॥

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    + शुद्धात्म-स्वभाव के अत्यन्त अविनाशीपना और कथंचित् उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य युक्तता -
    भंगविहूणो य भवो संभवपरिवज्जिदो विणासो हि ।
    विज्जदि तस्सेव पुणो ठिदिसंभवणाससमवाओ ॥17॥
    भङ्गविहीनश्च भवः संभवपरिवर्जितो विनाशो हि ।
    विद्यते तस्यैव पुनः स्थितिसंभवनाशसमवायः ॥१७॥
    यद्यपि उत्पाद बिन व्यय व्यय बिना उत्पाद है
    तथापी उत्पादव्ययथिति का सहज समवाय है ॥१७॥
    अन्वयार्थ : [भङ्गविहिन: च भव:] उसके (शुद्धात्मस्वभाव को प्राप्त आत्मा के) विनाश रहित उत्पाद है, और [संभवपरिवर्जित: विनाश: हि] उत्पाद रहित विनाश है । [तस्य एव पुन:] उसके ही फिर [स्थितिसंभवनाशसमवाय: विद्यते] स्थिति, उत्पाद और विनाश का समवाय मिलाप, एकत्रपना विद्यमान है ॥१७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब इस स्वयंभू के शुद्धात्मस्वभाव की प्राप्ति के अत्यन्त अविनाशीपना और कथंचित्(कोई प्रकार से) उत्पाद -व्यय -ध्रौव्य युक्तता का विचार करते हैं :-

    वास्तव में इस (शुद्धात्म-स्वभाव को प्राप्त) आत्मा के शुद्धोपयोग के प्रसाद से हुआ जो शुद्धात्म-स्वभाव से (शुद्धात्म-स्वभावरूप से) उत्पाद है वह, पुन: उस रूप से प्रलय का अभाव होने से विनाश रहित है; और (उस आत्मा के शुद्धोपयोग के प्रसाद से हुआ) जो अशुद्धात्म-स्वभाव से विनाश है वह पुन: उत्पत्ति का अभाव होने से, उत्पाद रहित है । इससे (यह कहा है कि) उस आत्मा के सिद्ध-रूप से अविनाशीपन है । ऐसा होने पर भी आत्मा के उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य का समवाय विरोध को प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वह विनाश रहित उत्पाद के साथ, उत्पाद रहित विनाश के साथ और उन दोनों के आधार-भूत द्रव्य के साथ समवेत (तन्मयता से युक्त-एकमेक) है ।

    जयसेनाचार्य :
    [भंगविहीणो य भवो] विनाश रहित उत्पाद जीवन-मरण आदि में समता-भाव लक्षण परम-उपेक्षा संयम-रूप शुद्धोपयोग से उत्पन्न जो वह केवलज्ञान रूप उत्पाद । वह केवलज्ञानरूप उत्पाद किस विशेषता वाला है ? वह केवलज्ञानरूप उत्पाद विनाश रहित है । [संभवपरिवज्जिदो विणासो त्ति] उत्पाद रहित विनाश है । जो वह मिथ्यात्व रागादि परिवर्तनरूप संसार पर्याय का विनाश है । वह संसार पर्याय का विनाश किस विशेषता वाला है? वह संसार पर्याय का विनाश उत्पाद से रहित है- वीतरागी आत्मतत्त्व से विरुद्ध लक्षण वाले रागादि परिणामों का अभाव होने से उत्पाद से रहित है । इससे जाना जाता है कि उन्हीं भगवान के द्रव्यार्थिकनय की अपेक्षा सिद्ध-स्वरूप से विनाश नहीं है । [विज्जदि तस्सेव पुणो ठिदिसंभवणाससमवाओ] फिर भी उन्हीं के ध्रौव्य-उत्पाद-व्यय का समवाय (संग्रह) विद्यमान है । उन्हीं भगवान के पर्यायार्थिकनय से शुद्ध व्यंजन पर्याय की अपेक्षा सिद्ध पर्यायरूप से उत्पाद संसार पर्यायरूप से विनाश और केवलज्ञानादि गुणों के आधारभूत द्रव्यपने से धौव्य है ।

    इससे सिद्ध हुआ कि द्रव्यार्थिकनय से नित्यपना होने पर भी पर्यायार्थिकनय से उत्पाद-व्यय-धौव्य तीनों पाये जाते हैं ।

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    + उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य सर्व द्रव्यों के साधारण, शुद्ध आत्मा के भी -
    उप्पादो य विणासो विज्जदि सव्वस्स अट्ठजादस्स ।
    पज्जाएण दु केणवि अट्ठो खलु होदि सब्भूदो ॥18॥
    उत्पादश्च विनाशो विद्यते सर्वस्यार्थजातस्य ।
    पर्यायेण तु केनाप्यर्थः खलु भवति सद्भूतः ॥१८॥
    सभी द्रव्यों में सदा ही होंय रे उत्पाद-व्यय
    ध्रुव भी रहे प्रत्येक वस्तु रे किसी पर्याय से ॥१८॥
    अन्वयार्थ : [उत्पाद:] किसी पर्याय से उत्पाद [विनाश: च] और किसी पर्याय से विनाश [सर्वस्य] सर्व [अर्थजातस्य] पदार्थमात्र के [विद्यते] होता है; [केन अपि पर्यायेण तु] और किसी पर्याय से [अर्थ:] पदार्थ [सद्भूत: खलु भवति] वास्तव में ध्रुव है ॥१८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, उत्पाद आदि तीनों (उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य) सर्व द्रव्यों के साधारण है इसलिये शुद्धआत्मा (केवली भगवान और सिद्ध भगवान) के भी अवश्यम्भावी है ऐसा व्यक्त करते हैं :-

    जैसे उत्तम स्वर्ण की बाजूबन्द रूप पर्याय से उत्पत्ति दिखाई देती है, पूर्व अवस्था रूप से वर्तने वाली अँगूठी इत्यादिक पर्याय से विनाश देखा जाता है और पीलापन इत्यादि पर्याय से दोनों में (बाजूबन्द और अँगूठी में) उत्पत्ति-विनाश को प्राप्त न होने से ध्रौव्यत्व दिखाई देता है । इस प्रकार सर्व द्रव्यों के किसी पर्याय से उत्पाद, किसी पर्याय से विनाश और किसी पर्याय से ध्रौव्य होता है, ऐसा जानना चाहिए । इससे (यह कहा गया है कि) शुद्ध आत्मा के भी द्रव्य का लक्षण-भूत उत्पाद, व्यय, ध्रौव्यरूप अस्तित्व अवश्यम्भावी है ।

    जयसेनाचार्य :
    [उप्पादो य विणासो विज्जदि सव्वस्स अट्ठजादस्स] सभी पदार्थ समूह के उत्पाद और व्यय विद्यमान हैं । सभी पदार्थों के उत्पाद-व्यय किस रूप में विद्यमान हैं? [पज्जाएण दु केणवि] अर्थ-व्यंजन पर्याय-रूप अथवा स्वभाव-विभाव पर्याय-रूप किसी विवक्षित पर्याय से उनके उत्पाद-व्यय विद्यमान है । उत्पाद-व्यय वाले वे पदार्थ किस विशेषता वाले हैं? [अट्ठो खलु होदि सब्भूदो] वास्तव में पदार्थ सत्ताभूत-सत्ता से आभिन्न होते हैं ।

    वह इसप्रकार - जैसे लोक में सुवर्ण, गोरस, मिट्टी, पुरुष आदि मूर्त पदार्थों में उत्पाद आदि तीनों प्रसिद्ध हैं, उसीप्रकार अमूर्त मुक्तजीव में भी जानना चाहिये । यद्यपि संसार के विनाश से उत्पन्न शुद्धात्मा में रुचि, जानकारी, निश्चल अनुभूति लक्षण कारण-समयसाररूप पर्याय का विनाश होता है और उसी प्रकार केवल-ज्ञानादि की व्यक्ति (प्रगटता) रूप कार्य-समयसार पर्याय का उत्पाद होता है; तथापि पदार्थ होने के कारण उत्पाद-व्यय दोनों ही पर्यायों रूप से परिणत आत्मद्रव्यत्व की अपेक्षा मुक्त जीव धौव्य रूप हैं ।

    अथवा जैसे ज्ञेय पदार्थ प्रतिसमय उत्पाद-व्यय-धौव्य तीनभंग रूप से परिणमन करते हैं उसीप्रकार ज्ञान भी (ज्ञेय पदार्थ सम्बन्धी) जानकारी की अपेक्षा उत्पाद-व्यय-धौव्य तीनभंग रूप से परिणमित होता है, अथवा षटस्थानगत अगुरुलघुक गुण सम्बन्धी वृद्धि-हानि की अपेक्षा उत्पादादि तीनों भंग जानना चाहिये - यह गाथा का तात्पर्य है ॥१८॥

    इस प्रकार सिद्ध जीव में द्रव्यार्थिक-नय से नित्यपना होने पर भी विवक्षित पर्याय से उत्पाद-व्यय-धौव्य की स्थापना रूप से दूसरे स्थल में दो गाथायें पूर्ण हुई ।

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    + सर्वज्ञ को जो मानते हैं, वो सम्यग्दृष्टी -
    तं सव्वट्ठवरिट्ठं इट्ठं अमरासुरप्पहाणेहिं ।
    ये सद्दहंति जीवा तेसिं दुक्खाणि खीयंति ॥19॥
    असुरेन्द्र और सुरेन्द्र को जो इष्ट सर्व वरिष्ठ हैं
    उन सिद्ध के श्रद्धालुओं के सर्व कष्ट विनष्ट हों ॥१९॥
    अन्वयार्थ : जो जीव सर्व पदार्थों में श्रेष्ठ, देव-असुरों में प्रधान इन्द्रों के द्वारा स्वीकृत, उन सर्वज्ञ भगवान की श्रद्धा करते हैं, उनके सभी दु:ख नष्ट हो जाते हैं ॥१९॥

    जयसेनाचार्य :
    [तं सव्व्ट्ठवरिट्ठं] वे सम्पूर्ण पदार्थों में श्रेष्ठ, [इट्ठं] स्वीकृत हैं । वे सर्वोत्कृष्ट (सर्वज्ञ) किनसे स्वीकृत है? [अमरासुरप्पहाणेहिं] देवों और असुरों में प्रधान इन्द्रों से स्वीकृत हैं । [ये सद्दहन्ति] जो श्रद्धा-रुचि करते हैं [जीवा] भव्य जीव; जो भव्य जीव उनकी श्रद्धा करते हैं [तेसिं] उन श्रद्धालु भव्य जीवों के [दुक्खाणि] वीतराग-पारमार्थिक-सुख से भिन्न लक्षणवाले दुःख [खीयंति] नष्ट हो जाते हैं- यह गाथा का अर्थ है ॥१९॥

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    + आत्मा के इन्द्रियों के बिना ज्ञान और आनन्द कैसे? -
    पक्खीणघादिकम्मो अणंतवरवीरिओ अहियतेजो । (19)
    जादो अदिंदिओ सो णाणं सोक्खं च परिणमदि ॥20॥
    प्रक्षीणघातिकर्मा अनन्तवरवीर्योऽधिकतेजाः ।
    जातोऽतीन्द्रियः स ज्ञानं सौख्यं च परिणमति ॥१९॥
    अतीन्द्रिय हो गये जिनके ज्ञान सुख वे स्वयंभू
    जिन क्षीणघातिकर्म तेज महान उत्तम वीर्य हैं ॥२०॥
    अन्वयार्थ : [प्रक्षीणघातिकर्मा] जिसके घाति-कर्म क्षय हो चुके हैं, [अतीन्द्रिय: जात:] जो अतीन्द्रिय हो गया है, [अनन्तवरवीर्य:] अनन्त जिसका उत्तम वीर्य है और [अधिकतेजा:] अधिक (उत्कृष्ट) जिसका [केवल-ज्ञान और केवल-दर्शनरूप] तेज है [सः] ऐसा वह (स्वयंभू आत्मा) [ज्ञानं सौख्यं च] ज्ञान और सुख-रूप [परिणमति] परिणमन करता है ॥१९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, शुद्धोपयोगके प्रभाव से स्वयंभू हुए इस (पूर्वोक्त) आत्मा के इन्द्रियों के बिना ज्ञान और आनन्द कैसे होता है ? ऐसे संदेह का निवारण करते हैं :-

    शुद्धोपयोग के सामर्थ्य से जिसके घाति-कर्म क्षय को प्राप्त हुए हैं, क्षायोपशमिक ज्ञान-दर्शन के साथ असंपृक्त (संपर्क रहित) होने से जो अतीन्द्रिय हो गया है, स्वयमेव स्वपर-प्रकाशकता लक्षण ज्ञान और अनाकुलता लक्षण सुख होकर परिणमित होता है । इस प्रकार आत्मा का, ज्ञान और आनन्द स्वभाव ही है । और स्वभाव पर से अनपेक्ष (स्वतंत्र, अपेक्षा रहित) होने के कारण इन्द्रियों के बिना भी आत्मा के ज्ञान और आनन्द होता है ॥१९॥

    जयसेनाचार्य :
    [पक्खीणघादिकम्मो] ज्ञानादि अनन्त चतुष्टय स्वरूप परमात्म-द्रव्य की भावना लक्षण शुद्धोपयोग के बल से घातिकर्म रहित होते हुये । [अणंतवरवीरिओ] अनन्त उत्कृष्ट वीर्यवाले है । घातिकर्मों से रहित और अनन्तवीर्य सम्पन्न वे और किन विशेषताओं सहित है? [अहियतेजो] अधिक तेज युक्त हैं । यहाँ तेज शब्द से केवलज्ञान और केवलदर्शन- ये दोनों ग्रहण करना चाहिये । [जादो सो] वे घातिकर्म रहित इत्यादि पूर्वोक्त लक्षण सम्पन्न आत्मा उत्पन्न हुये हैं । वे आत्मा कैसे उत्पन्न हुये हैं? [अणिंदियो] अनिन्द्रिय-इन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्ति से रहित-रूप से उत्पन्न हुये हैं । अनिन्द्रिय होकर वे क्या करते हैं? [णाणं सोक्खं च परिणमदि] केवलज्ञान और अनन्त सुख रूप से परिणमित हैं ।

    वह इसप्रकार- इस व्याख्यान से क्या कहा गया है? निश्चय से अनन्त ज्ञान-सुख स्वभावी आत्मा भी व्यवहार से संसार अवस्था में कर्मों से ढंके हुये ज्ञान-सुख रूप होता हुआ, पश्चात् इन्द्रियों के आधार से कुछ थोड़े से ज्ञान और सुख रूप परिणमित होता है । जब निर्विकल्प स्व-संवेदन के बल से कर्म का अभाव होता है, तब क्षयोपशम का अभाव हो जाने से इन्द्रियाँ नहीं होने पर भी अपने अतीन्द्रिय ज्ञान और सुख का अनुभव करता है ।

    इससे यह फलित हुआ कि इन्द्रियों का अभाव होने पर भी अपने अनन्त ज्ञान और सुख का अनुभव होता है । इन्द्रियों के अभाव में अनन्त ज्ञानादि का अनुभव कैसे हो सकता है? स्वभाव को पर की अपेक्षा नहीं होती; अत: इन्द्रियों के बिना भी अनन्त ज्ञानादि का अनुभव हो जाता है- ऐसा अभिप्राय है ॥२०॥

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    + शुद्ध आत्मा के शारीरिक सुख दुःख नहीं -
    सोक्खं वा पुण दुक्खं केवलणाणिस्स णत्थि देहगदं । (20)
    जम्हा अदिंदियत्तं जादं तम्हा दु तं णेयं ॥21॥
    सौख्यं वा पुनर्दुःखं केवलज्ञानिनो नास्ति देहगतम् ।
    यस्मादतीन्द्रियत्वं जातं तस्मात्तु तज्ज्ञेयम् ॥२०॥
    अतीन्द्रिय हो गये हैं जिन स्वयंभू बस इसलिए
    केवली के देहगत सुख-दु:ख नहीं परमार्थ से ॥२१॥
    अन्वयार्थ : [केवलज्ञानिन:] केवलज्ञानी के [देहगतं] शरीर-सम्बन्धी [सौख्यं] सुख [वा पुन: दुःखं] या दुःख [नास्ति] नहीं है, [यस्मात्] क्योंकि [अतीन्द्रियत्व जातं] अतीन्द्रियता उत्पन्न हुई है [तस्मात् तु तत् ज्ञेयम्] इसलिये ऐसा जानना चाहिये ॥२०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब अतीन्द्रियता के कारण ही शुद्ध-आत्मा के (केवली भगवान के) शारीरिक सुख-दुःख नहीं है यह व्यक्त करते हैं :-

    जैसे अग्नि को लोह-पिण्ड के तप्त पुद्गलों का समस्त विलास नहीं है (अर्थात् अग्नि लोहे के गोले के पुद्गलों के विलास से-उनकी क्रियासे- भिन्न है) उसी प्रकार शुद्ध आत्मा के (अर्थात् केवलज्ञानी भगवान के) इन्द्रिय-समूह नहीं है; इसीलिये जैसे अग्नि को घन के घोर आघातों की परम्परा नहीं है (लोहे के गोले के संसर्ग का अभाव होने पर घन के लगातार आघातों की भयंकर मार अग्नि पर नहीं पड़ती) इसी प्रकार शुद्ध आत्मा के शरीर सम्बन्धी सुख दुःख नहीं हैं ॥२०॥

    जयसेनाचार्य :
    [सोक्खं वा पुण दुक्खं केवलणाणिस्स णत्थि] सुख अथवा दुःख केवलज्ञानी के नहीं हैं । केवलज्ञानी के कैसे सुख-दुख नहीं हैं? [देहगदं] देह सम्बन्धी- देह के आधारवाली जिह्वा (जीभ) इन्द्रिय आदि से उत्पन्न ग्रासाहार आदि सुख और असाता के उदय से उत्पन्न भूख आदि दुःख केवली-भगवान के नहीं हैं । ये देहगत सुख-दुःख केवली भगवान के क्यों नहीं हैं ? [जम्हा अदिंदियत्तं जादं] क्योंकि वे मोहादि घातिकर्मों का अभाव होने पर पाँच इन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्ति से रहित होते हुये उत्पन्न हुये हैं, अत: उन्हें ये सुख-दुःख नहीं हैं । [तम्हा दु तं णेयं] इसलिये अतीन्द्रियता होने के कारण उनके ज्ञान और सुख अतीन्द्रिय ही जानने चाहिये ।

    वह इसप्रकार- जैसे लोहे के गोले के संसर्ग का अभाव होने से अग्नि घन के आघात को प्राप्त नहीं होती, उसीप्रकार यह आत्मा भी लोह-पिण्ड के समान इन्द्रिय-समूह का अभाव होने से सांसारिक सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता - यह अर्थ है ॥

    यहाँ कोई कहता है- औदारिक शरीर विद्यमान होने से केवली के भोजन है अथवा असातावेदनीय कर्म का उदय होने से हम लोगों के समान उनके भी भोजन होता है? आचार्य इसका निराकरण करते हैं - उन भगवान का शरीर औदारिक नहीं परमौदारिक है । कहा भी है -

    'क्षीण दोषवाले वीतराग-सर्वज्ञ जीव के सात-धातु रहित, शुद्ध स्फटिक मणि के समान, अत्यन्त तेजस्वी शरीर होता है ।'

    तथा असाता-वेदनीय का उदय होने से उनके भोजन है, ऐसा जो कहते है- वहाँ निराकरण करते हैं - जैसे धान्य आदि बीज जलरूप सहकारी कारण से सहित होने पर अंकुर आदि कार्य को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार असाता वेदनीय कर्म, मोहनीय कर्मरूप सहकारी कारण सहित होने पर ही भूख आदि कार्य उत्पन्न करता है । मोहनीय के सद्भाव में असातावेदनीय भूख आदि कार्य करता है; यह कैसे जाना?

    'वेदनीय कर्म मोह के बल से जीव का घात करता है' - ऐसा वचन होने से । और यदि मोह के अभाव में भी वेदनीयकर्म क्षुधादि परिषह उत्पन्न करता है, तो वह वध-रोगादि परिषहों को भी उत्पन्न करे, परन्तु नहीं करता । मोह के अभाव में वेदनीयकर्म वध आदि परिषहों को उत्पन्न नहीं करता- यह कैसे जाना? 'भोजन और उपसर्ग का अभाव होने से' इस वचन से यह जानकारी होती हैं ।

    'केवली के भोजन' मानने पर और भी दोष आते हैं । यदि केवली भगवान के क्षुधा की बाधा है तो क्षुधा की उत्पत्तिरूप शक्ति की क्षीणता से उनके अनन्त वीर्य नहीं है; उसीप्रकार क्षुधा से दुःखित जीव के अनन्त सुख भी नहीं है; जिह्वा इन्द्रिय की जानकारीरूप मतिज्ञान से परिणत जीव के केवल-ज्ञान भी सम्भव नही है । अथवा और भी कारण हैं । केवली के असाता-वेदनीय के उदय की अपेक्षा साता-वेदनीय का उदय अनन्तगुणा है । इसलिये शक्कर की राशि में नीम की कणिका के समान असाता-वेदनीय का उदय होने पर भी ज्ञात नहीं होता ।

    इसीप्रकार (केवली कवलाहार के विषय मे) और भी बाधक (कारण) हैं-जैसे वेद कषाय का उदय होने पर भी मोह का मंद उदय होने से अखण्ड ब्रह्मचारी प्रमतसंयत आदि मुनिराजों के स्त्री परिषह सम्बन्धी बाधा नहीं होती है; और जैसे नव-ग्रैवियक आदि अहमिन्द्र देवों के वेद कषाय का उदय होने पर भी, मोह का मंद उदय होने से स्त्री विषयक बाधा नहीं होती है; उसीप्रकार भगवान में असातावेदनीय का उदय विद्यमान होने पर भी मोह का पूर्णत: अभाव हो जाने से क्षुधा की बाधा नहीं होती है ।

    हमारे ऐसा कहने पर यदि आपके द्वारा फिर से ऐसा कहा जाता है कि मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोग केवली पर्यन्त तेरह गुणस्थानवर्ती जीव आहारक हैं '- ऐसा आहारक मार्गणा के प्रकरण में आगम में कहा गया है- इसलिये केवली के आहार है; परन्तु आपका यह कथन उचित नहीं है ।

    'नोकर्माहार, कर्माहार, कवलाहार, लेपाहार, ओजाहार और मानसिक आहार- क्रमश: ये छह प्रकार के आहार जानना चाहिये ।'

    इसप्रकार गाथा में कहे हुये क्रमानुसार यद्यपि आहार छह प्रकार के है, तथापि केवली के नोकर्माहार अपेक्षा आहारकपना जानना चाहिये; कवलाहार की अपेक्षा नहीं ।

    वह इसप्रकार- लाभान्तरायकर्म के सम्पूर्ण क्षय हो जाने से अन्य मनुष्यों के असम्भव कवलाहार के बिना भी कुछ कम पूर्व कोटी पर्यन्त शरीर स्थिति के कारणभूत, सप्तधातु से रहित परमौदारिक शरीर सम्बन्धी नोकर्माहार के योग्य सूक्ष्म, सुरस सुगन्धमय पुद्गल प्रतिक्षण आते रहते हैं '' -ऐसा नव केवललब्धि व्याख्यान के प्रंसग में कहा गया है । इससे ज्ञात होता है कि नोकर्माहार की अपेक्षा ही केवली के आहारकपना है ।

    यहाँ फिर प्रश्न है कि आपकी कल्पना से केवली के आहारक - अनाहारकपना नोकर्माहार की अपेक्षा है, कवलाहार की अपेक्षा नहीं है- यह कैसे ज्ञात होता है?

    आचार्य उत्तर देते हैं कि ऐसा नहीं है । 'एक दो अथवा तीन समय तक ही अनाहारक होता है' ऐसा तत्वार्थसूत्र में कहा गया है । इस सूत्र का भाव कहते है- दूसरे भव के प्रति गमन के समय विग्रहगति में शरीर का अभाव होने पर नवीन शरीर ग्रहण करने के लिये तीन शरीर और छह पर्याप्तियों के योग्य पुद्गल-स्कन्धों का ग्रहण नोकर्माहार कहलाता है; और वह विग्रहगति में कर्माहार विद्यमान होने पर भी एक, दो अथवा तीन समय तक नहीं होता । इसलिये नोकर्माहार की अपेक्षा ही आगम में आहारक और अनाहारकपना जानना चाहिये । यदि यह कवलाहार की अपेक्षा मानते हो तो भोजन के समय को छोड़कर हमेशा अनाहारक ही है, तब तीन समय का नियम घटित नहीं होता ।

    यदि आपका यह मत हो कि वर्तमान मनुष्यों के समान, केवलियों के भी मनुष्यपना होने से कवलाहार है। तो (यह भी) उचित नहीं हैं, क्योंकि तब तो यह कहा जा सकता है कि वर्तमान मनुष्यों के समान, पूर्वकालीन पुरुषों के भी सर्वज्ञपना नहीं हैं, और राम-रावण आदि पुरुषों के विशेष सामर्थ्य नहीं है; परन्तु ऐसा तो नहीं है ।

    दूसरा तथ्य यह है कि सात धातु रहित परमौदारिक शरीर के अभाव में 'छटवें गुणस्थान तक प्रथम आहार संज्ञा होती है ।' - ऐसा वचन होने से यद्यपि प्रमत्तसंयत नामक छटवें गुणस्थानवर्ती छद्मस्थ मुनिराज भी आहार ग्रहण करते हैं; तथापि ज्ञान, संयम और ध्यान की सिद्धि के लिये ही; देह के प्रति ममत्व के लिये वे आहार ग्रहण नहीं करते ।

    'शरीर की स्थिति के लिये आहार है, शरीर ज्ञान के लिये माना गया है, ज्ञान कर्म नष्ट करने के लिये है और कर्मो के नाश से परमसुख होता है ।'

    'मुनिराज शरीर के बल व आयु के हेतु से और शरीर के चय (हृष्ट-पुष्टता) के लिये तथा तेज के लिये भोजन नहीं करते; अपितु ज्ञान, संयम और ध्यान की सिद्धि के लिये भोजन करते हैं ।' (यहाँ 'ण बलाउसाहणट्ठं' के स्थान पर 'ण बलाउसाउअट्ठं' भी पाठ हैं; जिसका अर्थ है - बल, आयु और स्वाद के लिये भोजन नहीं करते ।) उन भगवान के ज्ञान, संयम, ध्यान आदि गुण स्वभाव से ही हैं; आहार के बल से नहीं (अत: एतदर्थ तो कवलाहार नहीं हैं) और यदि देह के ममत्व से आहार ग्रहण करते है, तो वे छद्यस्थों से भी हीनता को प्राप्त होते हैं ।

    यहाँ पुन: कोई कहता है कि उनके विशिष्ट अतिशय होने से प्रगट भोजन नहीं है, गुप्त भोजन है ।

    आचार्य इसका उत्तर देते हैं कि यदि ऐसा है तो परमौदारिक शरीरपना होने से भोजन ही नहीं है, यही अतिशय क्यों नहीं हो जाता है । वहाँ गुप्त भोजन में मायास्थान (छल) दीनता तथा और भी भोजन सम्बंधी कहे गये अनेक दोष आते हैं । वे अन्यत्र तर्क शास्त्र से जानना चाहिये । यह अध्यात्मग्रन्थ होने से यहाँ नहीं कहे हैं ।

    यहाँ भाव यह है कि यह वस्तु का स्वरूप ही है, ऐसा जानकर यहाँ आग्रह नहीं करना चाहिये । आग्रह क्यों नहीं करना चाहिये? दुराग्रह होने पर राग-द्वेष की उत्पत्ति होती है और उससे वीतराग ज्ञानानन्द स्वभावी परमात्मा की भावना नष्ट होती है; अत: आग्रह नहीं करना चाहिये ॥२१॥

    इस प्रकार सात गाथाओं वाले चार स्थलों के द्वारा 'सामन्य से सर्वज्ञसिद्धि' नामक दूसरा अन्तराधिकार समाप्त हुआ ।

    अब, 'ज्ञान-प्रपञ्च' नामक तीसरे अन्तराधिकार में ३३ गाथायें हैं । वहाँ आठ स्थल हैं । उनमें से

    इसप्रकार आठ स्थलों में विभक्त ३३ गाथाओं में निबद्ध ज्ञानप्रपंच नामक तीसरे अन्तराधिकार की समुदायपातनिका (सामूहिक उत्थानिका) समाप्त हुई ।

    ज्ञान-प्रपंच नामक तीसरे अंतराधिकार की सामुदायिक पातनिका
    स्थलक्रम प्रतिपादित संक्षिप्त विषय वस्तु गाथायें कहाँ से कहाँ तक कुल गाथायें
    प्रथम केवलज्ञान के सर्व प्रत्यक्ष है 22 से 23 2
    द्वितीय आत्मा और ज्ञान-निश्चय से आत्मगत, व्यवहार से सर्वगत 24 से 28 5
    तृतीय ज्ञान-ज्ञेय का परस्पर गमन निराकरण 29 से 33 5
    चतुर्थ निश्चय व्यवहार केवली प्रतिपादन 34 से 37 4
    पंचम वर्तमान ज्ञान त्रिकालज्ञ 38 से 42 5
    षष्टम बंधकारक-ज्ञान नहीं राग है 43 से 47 5
    सप्तम केवलज्ञान सर्वज्ञता 48 से 52 4
    अष्टम उपसंहार एवं नमस्कार परक 52 से 54 2
    कुल आठ स्थल कुल 33

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    + केवली भगवान के सब प्रत्यक्ष -
    परिणमदो खलु णाणं पच्चक्खा सव्वदव्वपज्जाया । (21)
    सो णेव ते विजाणदि उग्गहपुव्वाहिं किरियाहिं ॥22॥
    परिणममानस्य खलु ज्ञानं प्रत्यक्षाः सर्वद्रव्यपर्यायाः ।
    स नैव तान् विजानात्यवग्रहपूर्वाभिः क्रियाभिः ॥२१॥
    केवली भगवान के सब द्रव्य गुण-पर्याययुत
    प्रत्यक्ष हैं अवग्रहादिपूर्वक वे उन्हें नहीं जानते ॥२२॥
    अन्वयार्थ : [खलु] वास्तव में [ज्ञानं परिणममानस्य] ज्ञानरूपसे (केवलज्ञानरूप से) परिणमित होते हुए केवली-भगवान के [सर्वद्रव्यपर्याया:] सर्व द्रव्य-पर्यायें [प्रत्यक्षा:] प्रत्यक्ष हैं; [सः] वे [तान्] उन्हें [अवग्रहपूर्वाभि: क्रियाभि:] अवग्रहादि क्रियाओं से [नैव विजानाति] नहीं जानते ॥२१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ज्ञान के स्वरूप का विस्तार और सुख के स्वरूप का विस्तार क्रमशः प्रवर्तमान दो अधिकारों के द्वारा कहते हैं । इनमें से (प्रथम) अतीन्द्रिय ज्ञानरूप परिणमित होने से केवली-भगवान के सब प्रत्यक्ष है, यह प्रगट करते हैं :-

    केवली-भगवान इन्द्रियों के आलम्बन से अवग्रह-ईहा-अवाय पूर्वक क्रम से नहीं जानते, (किन्तु) स्वयमेव समस्त आवरण के क्षय के क्षण ही, अनादि-अनन्त, अहेतुक और असाधारण ज्ञान-स्वभाव को ही कारण-रूप ग्रहण करने से तत्काल ही प्रगट होने वाले केवल-ज्ञानोपयोग रूप होकर परिणमित होते हैं; इसलिये उनके समस्त द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का अक्रमिक ग्रहण होने से समक्ष संवेदन की (प्रत्यक्ष ज्ञान की) आलम्बन-भूत समस्त द्रव्य-पर्यायें प्रत्यक्ष ही हैं ॥२१॥

    जयसेनाचार्य :
    [पच्चक्खा सव्वदव्वपज्जाया] - सभी द्रव्य-पर्यायें प्रत्यक्ष हैं । सभी द्रव्य-पर्यायें किनके प्रत्यक्ष हैं? केवली भगवान के । वे क्या करते हुये केवली के प्रत्यक्ष हैं? [परिणमदो] - वे परिणमन करते हुए केवली भगवान के प्रत्यक्ष हैं । [खलु] - वास्तव में । वे सर्व द्रव्य- पर्यायें किस रूप से परिणमन करते हुये केवली के प्रत्यक्ष है? [णाणं] - अनन्त पदार्थों को जानने में समर्थ केवलज्ञानरूप से परिणमन करते हुये केवली के वे प्रत्यक्ष हैं । तो क्या वे उन्हें क्रम से जानते हैं? [सो णेव ते विजाणदि उग्गहपुव्वाहिं किरियाहिं] - और वे भगवान उन्हें अवग्रह पूर्वक क्रियाओं से नहीं जानते हैं, वरन् एक साथ जानते हैं - यह अर्थ है ।

    यहाँ इसका विस्तार करते हैं - अनाद्यनन्त, अहेतुक ज्ञानानन्द एक स्वभावी निज शुद्धात्मा को उपादेय कर केवलज्ञान की उत्पत्ति के बीजभूत आगम- भाषा की अपेक्षा शुक्लध्यान नामक रागादि विकल्पजाल रहित स्वसंवेदनज्ञानरूप से जब यह आत्मा परिणमित होता है, तब स्वसंवेदनज्ञान के फलभूत केवलज्ञान स्वरूप जानकारीरूप से परिणत उस आत्मा के उसी क्षण क्रम से प्रवृत्ति करनेवाले क्षायोपशमिक ज्ञान का अभाव होने से; एक साथ स्थित सम्पूर्ण द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव रूप से सभी द्रव्य-गुण-पर्यायें प्रत्यक्ष होती है - यह अभिप्राय है ।

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    + भगवान को कुछ भी परोक्ष नहीं -
    णत्थि परोक्खं किंचि वि समंत सव्वक्खगुणसमिद्धस्स । (22)
    अक्खातीदस्स सदा सयमेव हि णाणजादस्स ॥23॥
    नास्ति परोक्षं किंचिदपि समन्ततः सर्वाक्षगुणसमृद्धस्य ।
    अक्षातीतस्य सदा स्वयमेव हि ज्ञानजातस्य ॥२२॥
    सर्वात्मगुण से सहित हैं अर जो अतीन्द्रिय हो गये
    परोक्ष कुछ भी है नहीं उन केवली भगवान के ॥२३॥
    अन्वयार्थ : [सदा अक्षातीतस्य] जो सदा इन्द्रियातीत हैं, [समन्तत: सर्वाक्षगुण-समृद्धस्य] जो सर्व ओर से (सर्व आत्म-प्रदेशों से) सर्व इन्द्रिय गुणों से समृद्ध हैं [स्वयमेव हि ज्ञानजातस्य] और जो स्वयमेव ज्ञानरूप हुए हैं, उन केवली भगवान को [किंचित् अपि] कुछ भी [परोक्ष नास्ति] परोक्ष नहीं है ॥२२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब अतीन्द्रिय ज्ञानरूप परिणमित होने से ही इन भगवान को कुछ भी परोक्ष नहीं है, ऐसा अभिप्राय प्रगट करते हैं :-

    समस्त आवरण के क्षय के क्षण ही ऐसे इन (केवली) भगवान को समस्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव का अक्रमिक ग्रहण होने से कुछ भी परोक्ष नहीं है ।

    जयसेनाचार्य :
    अब पूर्व गाथा (बाईसवीं गाथा) में सब प्रत्यक्ष है- ऐसा अन्वय (अस्ति-विधि) रूप से कथन किया था; यहाँ परोक्ष कुछ भी नहीं है, इसप्रकार उसी अर्थ को व्यतिरेक (नास्ति-निषेध) रूप से दृढ़ करते है -

    [णत्थि परोक्खं किंचि वि] - उन भगवान के कुछ भी परोक्ष नहीं है । किस विशेषता वाले उन भगवान के कुछ भी परोक्ष नहीं है? [समंत सव्वक्खगुणसमिद्धस्स] - सभी आत्मप्रदेशों से अथवा पूर्णरूप से स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द की जानकारीरूप सभी इन्द्रियों के गुणों से समृद्ध उन केवली भगवान के कुछ भी परोक्ष नहीं है । तो क्या इन्द्रियसहित केवली के, कुछ भी परोक्ष नहीं है? ऐसा नहीं है । [अक्खातीदस्स] - इन्द्रिय व्यापार से रहित केवली के, कुछ भी परोक्ष नहीं है ।

    अथवा दूसरा व्याख्यान- जो ज्ञान से व्याप्त होता है, जानता है; वह आत्मा है; उस आत्मा के गुणों से समृद्ध इन्द्रिय व्यापार से रहित केवली भगवान के कुछ भी परोक्ष नहीं हैं । [सदा] - हमेशा ही उन्हें कुछ भी परोक्ष नहीं हैं । वे केवली भगवान किस विशेषता वाले हैं? [सयमेव हि णाणजादस्स] - स्वयं ही वास्तव में केवलज्ञानरूप से परिणत उन केवली भगवान के कुछ भी परोक्ष नहीं है ।

    वह इसप्रकार-अतीन्द्रिय स्वभावी परमात्मा से विपरीत क्रम से प्रवृति की कारणभूत इन्द्रियों से रहित तीनलोक, तीनकालवर्ती समस्त पदार्थों को एक-साथ जानने में समर्थ, अविनाशी, अखण्ड एक-प्रतिभासमय (ज्योतिस्वरूप) केवलज्ञानरूप से परिणत उन भगवान के कुछ भी परोक्ष नहीं है, यह भाव है |

    इसप्रकर केवली के सभी प्रत्यक्ष है- इस कथनरूप से प्रथम स्थल में दो गाथायें पूर्ण हुई ।

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    + आत्मा का ज्ञान प्रमाणपना और ज्ञान का सर्वगतपना -
    आदा णाणपमाणं णाणं णेयप्पमाणमुद्दिट्ठं । (23)
    णेयं लोयालोयं तम्हा णाणं तु सव्वगयं ॥24॥
    आत्मा ज्ञानप्रमाणं ज्ञानं ज्ञेयप्रमाणमुद्दिष्टम् ।
    ज्ञेयं लोकालोकं तस्माज्ज्ञानं तु सर्वगतम् ॥२३॥
    यह आत्म ज्ञानप्रमाण है अर ज्ञान ज्ञेयप्रमाण है
    हैं ज्ञेय लोकालोक इस विधि सर्वगत यह ज्ञान है ॥२४॥
    अन्वयार्थ : [आत्मा] आत्मा [ज्ञानप्रमाणं] ज्ञान प्रमाण है; [ज्ञानं] ज्ञान [ज्ञेयप्रमाणं] ज्ञेय प्रमाण [उद्दिष्टं] कहा गया है । [ज्ञेयं लोकालोकं] ज्ञेय लोकालोक है [तस्मात्] इसलिये [ज्ञानं तु] ज्ञान [सर्वगतं] सर्वगत-सर्व व्यापक है ॥२३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, आत्मा का ज्ञान-प्रमाणपना और ज्ञान का सर्वगतपना उद्योत करते हैं :-

    'समगुणपर्यायं द्रव्यं (गुण-पर्यायें अर्थात् युगपद् सर्वगुण और पर्यायें ही द्रव्य है)' इस वचन के अनुसार आत्मा ज्ञान से हीनाधिकता-रहित-रूप से परिणमित होने के कारण ज्ञान-प्रमाण है, और ज्ञान ज्ञेयनिष्ठ होनेसे, दाह्य-निष्ठ दहन की भाँति, ज्ञेय प्रमाण है । ज्ञेय तो लोक और अलोक के विभाग से विभक्त, अनन्त पर्याय-माला से आलिंगित स्वरूप से सूचित (प्रगट, ज्ञान), नाशवान दिखाई देता हुआ भी ध्रुव ऐसा षट्द्रव्य-समूह, अर्थात् सब कुछ है (ज्ञेय छहों द्रव्यों का समूह अर्थात् सब कुछ है) इसलिये निःशेष आवरण के क्षय के समय ही लोक और अलोक के विभाग से विभक्त समस्त वस्तुओं के आकारों के पार को प्राप्त करके इसीप्रकार अच्युत-रूप रहने से ज्ञान सर्वगत है ।

    ज्ञेयनिष्ठ = ज्ञेयों का अवलम्बन करने वाला; ज्ञेयों में तत्पर
    दहन = जलाना; अग्नि
    विभक्त = विभागवाला (षट्द्रव्यों के समूह में लोक-अलोक रूप दो विभाग हैं)
    अनन्त पर्यायें द्रव्य को आलिंगित करती है (द्रव्य में होती हैं) ऐसे स्वरूप-वाला द्रव्य ज्ञात होता है

    जयसेनाचार्य :
    (अब, आत्मा और ज्ञान के निश्चय से आत्मगतपना तथा व्यवहार से सर्वगतपना बताने वाली पाँच गाथाओं में निबद्ध दूसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब, आत्मा ज्ञान प्रमाण है और ज्ञान व्यवहार से सर्वगत है; ऐसा उपदेश देते हैं-

    [आदा णाणपमाणं] - ज्ञान के साथ हीनाधिकता का अभाव होने से आत्मा ज्ञान प्रमाण है ।

    वह इसप्रकार- [समगुणयर्यायं द्रव्यं भवति] - गुण-पर्यायों के बराबर द्रव्य होता है' - ऐसा वचन होने से, जैसे यह आत्मा वर्तमान मनुष्य भव में वर्तमान मनुष्य पर्याय के बराबर है और वैसे ही मनुष्य पर्याय के प्रदेशवर्ती ज्ञानगुण के बराबर प्रत्यक्षरूप से दिखाई देता है; उसी प्रकार यह आत्मा निश्चय से सदैव अव्याबाध अक्षयसुख आदि अनन्त गुणों के आधारभूत केवलज्ञान-गुण के बराबर है ।


    [णाणं णेयप्पमाणमुद्दिट्ठम्] - ईंधन-निष्ठ अग्नि के समान ज्ञान ज्ञेयों के बराबर कहा गया है । [णेयं लोयालोयं] - ज्ञेय लोकालोक है । सर्व प्रकार से आश्रय करने योग्य शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी परमात्मद्रव्य आदि छह द्रव्य स्वरूप लोक है, लोक से बाह्य भाग में शुद्ध (मात्र) आकाश अलोक है, और ये लोक एवं अलोक दोनों अपनी-अपनी अनन्त पर्यायों रूप से परिणमन करने के कारण अनित्य भी हैं और द्रव्यार्थिक नय से नित्य भी हैं । [तम्हा णाणं तु सव्वगयं] - जिस कारण से निश्चय रत्नत्रय स्वरूप शुद्धोपयोग की भावना के बल से उत्पन्न जो केवलज्ञान वह टंकोत्कीर्ण (टाँकी से उकेरे गये) आकार को जाननेरूप न्याय से हमेशा ज्ञेयों को जानता है, उसकारण व्यवहार से ज्ञान सर्वगत कहा गया है ।

    इससे यह सिद्ध हुआ कि आत्मा ज्ञान प्रमाण है और ज्ञान सर्वगत है ।

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    + आत्मा को ज्ञान प्रमाण न मानने में दोष -
    णाणप्पमाणमादा ण हवदि जस्सेह तस्स सो आदा । (24)
    हीणो वा अहिओ वा णाणादो हवदि धुवमेव ॥25॥
    हीणो जदि सो आदा तण्णाणमचेदणं ण जाणादि । (25)
    अहिओ वा णाणादो णाणेण विणा कहं णादि ॥26॥
    ज्ञानप्रमाणमात्मा न भवति यस्येह तस्य स आत्मा ।
    हीनो वा अधिको वा ज्ञानाद्भवति ध्रुवमेव ॥२४॥
    हीनो यदि स आत्मा तत् ज्ञानमचेतनं न जानाति ।
    अधिको वा ज्ञानात् ज्ञानेन विना कथं जानाति ॥२५॥
    अरे जिनकी मान्यता में आत्म ज्ञानप्रमाण ना
    तो ज्ञान से वह हीन अथवा अधिक होना चाहिए ॥२५॥
    ज्ञान से हो हीन अचेतन ज्ञान जाने किसतरह
    ज्ञान से हो अधिक जिय किसतरह जाने ज्ञान बिन ॥२६॥
    अन्वयार्थ : [इह] इस जगत में [यस्य] जिसके मत में [आत्मा] आत्मा [ज्ञानप्रमाणं] ज्ञानप्रमाण [न भवति] नहीं है, [तस्य] उसके मत में [सः आत्मा] वह आत्मा [ध्रुवम्‌ एव] अवश्य [ज्ञानात् हीन: वा] ज्ञान से हीन [अधिक: वा भवति] अथवा अधिक होना चाहिये ॥२४॥
    [यदि] यदि [सः आत्मा] वह आत्मा [हीन:] ज्ञान से हीन हो [तत्] तो वह [ज्ञानं] ज्ञान [अचेतनं] अचेतन होने से [न जानाति] नहीं जानेगा, [ज्ञानात् अधिक: वा] और यदि [आत्मा] ज्ञान से अधिक हो तो [वह आत्मा] [ज्ञानेन विना] ज्ञान के बिना [कथं जानाति] कैसे जानेगा? ॥२५॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब आत्मा को ज्ञान प्रमाण न मानने में दो पक्ष उपस्थित करके दोष बतलाते हैं :-

    यदि यह स्वीकार किया जाये कि यह आत्मा ज्ञान से हीन है तो आत्मा से आगे बढ़ जाने-वाला ज्ञान (आत्मा के क्षेत्रसे आगे बढ़कर उससे बाहर व्याप्त होने-वाला ज्ञान) अपने आश्रय-भूत चेतन-द्रव्य का समवाय (सम्बन्ध) न रहने से अचेतन होता हुआ रूपादि गुण जैसा होने से नहीं जानेगा; और यदि ऐसा पक्ष स्वीकार किया जाये कि यह आत्मा ज्ञान से अधिक है तो अवश्य (आत्मा) ज्ञान से आगे बढ़ जाने से (ज्ञान के क्षेत्र से बाहर व्यास होने से) ज्ञान से पृथक् होता हुआ घट-पटादि जैसा होने से ज्ञान के बिना नहीं जानेगा । इसलिये यह आत्मा ज्ञान-प्रमाण ही मानना योग्य है ।

    जयसेनाचार्य :
    [णाणप्पमाणमादा ण हवदि जस्सेह] इस लोक में जिस वादी के मत में ज्ञान के बराबर आत्मा नहीं है । [तस्स सो आदा] उसके मत में वह आत्मा [हीणो वा अहिओ वा णाणादो हवदि धुवमेव] - निश्चित ही ज्ञान से कम अथवा ज्यादा है ॥२५॥

    [हीणो जदि सो आदा तं णाणमचेदणं ण जाणादि] जैसे अग्नि का अभाव होने पर उसका उष्णगुण ठंडा हो जाता है; उसीप्रकार यदि आत्मा को ज्ञान से कम माना जावे तो अपने आधारभूत चेतनात्मक द्रव्य के संयोग का अभाव हो जाने से, उस आत्मा का ज्ञान अचेतन होता हुआ कुछ भी नहीं जानता है । [अहिओ वा णाणादो णाणेण विणा कहं णादि] और जैसे उष्ण गुण के नहीं होने पर अग्नि ठंडी होती हुई जलाने का कार्य करने में असमर्थ है; उसीप्रकार यदि आत्मा को ज्ञान से अधिक माना जावे, तो ज्ञान गुण के बिना आत्मा भी अचेतन होता हुआ कैसे जानने में समर्थ हो सकता है, अर्थात् जानने में समर्थ नहीं हो सकता ।

    यहाँ भाव यह है कि जो कोई आत्मा को अंगूठे के पर्व (पोर) जितना श्यामाक (सावाँ) चावल जितना अथवा वटक कणिका (छोटे पिण्ड के अत्यन्त छोटे हिस्से) जितना - इत्यादि आकार वाला मानते हैं; उन सभी की मान्यताओं का इस कथन से निराकरण हुआ; तथा जो सात समुद्घातों को छोड़कर देह प्रमाण से भी अधिक प्रमाणवाला आत्मा को मानते हैं; उनकी मान्यताओं का निराकरण भी इस कथन से हो गया ॥२६॥


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    + ज्ञान की भाँति आत्मा का भी सर्वगतत्व न्याय-सिद्ध -
    सव्वगदो जिणवसहो सव्वे वि य तग्गया जगदि अट्ठा । (26)
    णाणमयादो य जिणो विसयादो तस्स ते भणिदा ॥27॥
    सर्वगतो जिनवृषभः सर्वेऽपि च तद्गता जगत्यर्थाः ।
    ज्ञानमयत्वाच्च जिनो विषयत्वात्तस्य ते भणिताः ॥२६॥
    हैं सर्वगत जिन और सर्व पदार्थ जिनवरगत कहे
    जिन ज्ञानमय बस इसलिए सब ज्ञेय जिनके विषय हैं ॥२७॥
    अन्वयार्थ : [जिनवृषभ:] जिनवर [सर्वगत:] सर्वगत हैं [च] और [जगति] जगत के [सर्वे अपि अर्था:] सर्व पदार्थ [तद्गता:] जिनवरगत (जिनवर में प्राप्त) हैं; [जिन: ज्ञानमयत्वात्] क्योंकि जिन ज्ञानमय हैं [च] और [ते] वे सब पदार्थ [विषयत्वात्] ज्ञान के विषय होने से [तस्य] जिन के विषय [भणिता:] कहे गये हैं ॥२६॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ज्ञान की भाँति आत्मा का भी सर्वगतत्व न्यायसिद्ध है ऐसा कहते हैं :-

    ज्ञान त्रिकाल के सर्व द्रव्य-पर्याय रूप प्रवर्तमान समस्त ज्ञेयाकारों को पहुँच जाने से (जानता होने से) सर्वगत कहा गया है; और ऐसे (सर्वगत) ज्ञानमय होकर रहने से भगवान भी सर्वगत ही हैं । इसप्रकार सर्व पदार्थ भी सर्वगत ज्ञान के विषय होने से, सर्वगत ज्ञान से अभिन्न उन भगवान के वे विषय हैं ऐसा (शास्त्र में) कहा है; इसलिये सर्व पदार्थ भगवान-गत ही ( भगवान में प्राप्त ही) हैं ।

    वहाँ (ऐसा समझना कि) - निश्चयनय से अनाकुलता लक्षण सुख का जो संवेदन उस सुख-संवेदन के अधिष्ठानता जितना ही आत्मा है और उस आत्मा के बराबर ही ज्ञान स्वतत्त्व है; उस निज-स्वरूप आत्म-प्रमाण ज्ञान को छोड़े बिना, समस्त ज्ञेयाकारों के निकट गये बिना, भगवान (सर्व पदार्थों को) जानते हैं । निश्चयनय से ऐसा होने पर भी व्यवहारनय से यह कहा जाता है कि भगवान सर्वगत हैं । और नैमित्तिक-भूत ज्ञेयाकारों को आत्मस्थ (आत्मा में रहे हुए) देखकर ऐसा उपचार से कहा जाता है; कि 'सर्व पदार्थ आत्मगत (आत्मा में) हैं'; परन्तु परमार्थत: उनका एक दूसरे में गमन नहीं होता, क्योंकि सर्व द्रव्य स्वरूप-निष्ठ (अर्थात् अपने-अपने स्वरूप में निष्चल अवस्थित) हैं ।

    यही क्रम ज्ञान में भी निश्चित करना चाहिये । (अर्थात् आत्मा और ज्ञेयों के सम्बन्ध में निश्चय-व्यवहार से कहा गया है, उसी प्रकार ज्ञान और ज्ञेयों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए) ॥२६॥

    अधिष्ठान = आधार, रहनेका स्थान (आत्मा सुख-संवेदन का आधार है । जितने में सुख का वेदन होता है उतना ही आत्मा है)
    ज्ञेयाकार = पर पदार्थों के द्रव्य-गुण-पर्याय जो कि ज्ञेय हैं । (यह ज्ञेयाकार परमार्थत: आत्मा से सर्वथा भिन्न है ।)
    नैमित्तिकभूत ज्ञेयाकार = ज्ञान में होनेवाले (ज्ञान की अवस्था-रूप) ज्ञेयाकार । (इन ज्ञेयाकारो को ज्ञानाकार भी कहा जाता है, क्योंकि ज्ञान इन ज्ञेयाकार-रूप परिणमित होते हैं । यह ज्ञेयाकार नैमित्तिक हैं और पर पदार्थों के द्रव्य-गुण-पर्याय उनके निमित्त हैं । इन ज्ञेयाकारों को आत्मा में देखकर 'समस्त पर पदार्थ आत्मा में हैं', इसप्रकार उपचार किया जाता है । यह बात ३१ वीं गाथा में दर्पण का दृष्टान्त देकर समझाई गई है ।)

    जयसेनाचार्य :
    अब जैसे पहले (२४ वीं गाथा में) ज्ञान को सर्वगत कहा था, उसीप्रकार सर्वगत ज्ञान की अपेक्षा भगवान भी सर्वगत हैं यह ज्ञान कराते हैं -

    [सव्वगदो] सर्वगत हैं । कर्तारूप वे सर्वगत कौन हैं? [जिणवसहो] - सर्वज्ञ सर्वगत हैं । सर्वज्ञ सर्वगत क्यों हैं? [जिणो णाणमयादो य] - सर्वज्ञ-जिन ज्ञानमय होने के कारण सर्वगत हैं । [सव्वे वि य तग्गया जगदि अट्ठा] - और वे जगत् के सभी पदार्थ, दर्पण में बिम्ब के समान, व्यवहार से उन भगवान में गये हैं । वे पदार्थ भगवान में गये हैं, यह कैसे जाना? [ते भणिया] - वे पदार्थ वहाँ गये हैं - ऐसा कहा गया है । [विषयादो] - ज्ञान के विषय - ज्ञेय होने से वे पदार्थ भगवान में गये हैं - ऐसा कहा गया है । किसके ज्ञेय होने से वे गये हुये कहे गये हैं? [तस्स] - भगवान के ज्ञेय होने से वे भगवान में गये हुये कहे गये हैं ।

    वह इसप्रकार - जो अनन्तज्ञान और अनाकुलता लक्षण अनन्तसुख का आधार है वह आत्मा है ।

    ऐसा होने से आत्मप्रमाण ज्ञान आत्मा का अपना स्वरूप है । ऐसे अपने स्वरूप को तथा शरीर में रहने रूप स्थिति को नहीं छोड़ते हुये ही वे सर्वज्ञ लोकालोक को जानते हैं । इसलिये व्यवहार से भगवान सर्वगत कहे गये हैं । और दर्पण में बिम्ब के समान क्योंकि नीले, पीले आदि बाह्य पदार्थ जानकारी-रूप से ज्ञान में प्रतिबिम्बित होते हैं (झलकते है), इसलिये पदार्थों के कार्यभूत पदार्थाकार भी पदार्थ कहलाते हैं और वे ज्ञान में स्थित हैं - ऐसे कथन में दोष नही है - यह अभिप्राय है ।

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    + आत्मा और ज्ञान के एकत्व-अन्यत्व का विचार -
    णाणं अप्प त्ति मदं वट्टदि णाणं विणा ण अप्पाणं । (27)
    तम्हा णाणं अप्पा अप्पा णाणं व अण्णं वा ॥28॥
    ज्ञानमात्मेति मतं वर्तते ज्ञानं विना नात्मानम् ।
    तस्मात् ज्ञानमात्मा आत्मा ज्ञानं वा अन्यद्वा ॥२७॥
    रे आतमा के बिना जग में ज्ञान हो सकता नहीं
    है ज्ञान आतम किन्तु आतम ज्ञान भी है अन्य भी ॥२८॥
    अन्वयार्थ : [ज्ञानं आत्मा] ज्ञान आत्मा है [इति मतं] ऐसा जिन-देव का मत है । [आत्मानं विना] आत्मा के बिना (अन्य किसी द्रव्य में) [ज्ञानं न वर्तते] ज्ञान नहीं होता, [तस्मात्] इसलिये [ज्ञानं आत्मा] ज्ञान आत्मा है; [आत्मा] और आत्मा [ज्ञानं वा] (ज्ञान गुण द्वारा) ज्ञान है [अन्यत् वा] अथवा (सुखादि अन्य गुण द्वारा) अन्य है ॥२७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, आत्मा और ज्ञान के एकत्व-अन्यत्व का विचार करते हैं :-

    क्योंकि शेष समस्त चेतन तथा अचेतन वस्तुओं के साथ समवाय सम्बन्ध (अभिन्न-प्रदेशरूप सम्बन्ध; तादात्म्य सम्बन्ध) नहीं है, इसलिये जिसके साथ अनादि अनन्त स्वभाव-सिद्ध समवाय-सम्बन्ध है ऐसे एक आत्मा का अति निकटतया [अभिन्न प्रदेश-रूप से] अवलम्बन करके प्रवर्तमान होने से ज्ञान आत्मा के बिना अपना अस्तित्व नहीं रख सकता; इसलिये ज्ञान आत्मा ही है । और आत्मा तो अनन्त धर्मों का अधिष्ठान (आधार) होने से ज्ञान-धर्म के द्वारा ज्ञान है और अन्य धर्म के द्वारा अन्य भी है ।

    और फिर, इसके अतिरिक्त (विशेष समझना कि) यहाँ अनेकान्त बलवान है । यदि यह माना जाय कि एकान्त से ज्ञान आत्मा है तो, (ज्ञानगुण आत्मद्रव्य हो जाने से) ज्ञान का अभाव हो जायेगा, (और ज्ञान-गुण का अभाव होने से) आत्मा के अचेतनता आ जायेगी अथवा विशेष-गुण का अभाव होने से आत्मा का अभाव हो जायेगा । यदि यह माना जाये कि सर्वथा आत्मा ज्ञान है तो, (आत्म-द्रव्य एक ज्ञान-गुणरूप हो जाने पर ज्ञानका कोई आधार-भूत द्रव्य नहीं रहने से) निराश्रयता के कारण ज्ञान का अभाव हो जायेगा अथवा (आत्मद्रव्य के एक ज्ञान-गुणरूप हो जाने से) आत्मा की शेष पर्यायों का (सुख, वीर्यादि गुणों का) अभाव हो जायेगा और उनके साथ ही अविनाभावी सम्बन्ध वाले आत्मा का भी अभाव हो जायेगा । (क्योंकि सुख, वीर्य इत्यादि गुण न हों तो आत्मा भी नहीं हो सकता)

    जयसेनाचार्य :
    अब ज्ञान आत्मा है, परन्तु आत्मा ज्ञान अथवा सुखादि भी है, ऐसा प्रतिपादित करते हैं -

    [णाणं अप्प त्ति मदं] - ज्ञान आत्मा है, यह स्वीकृत है । ज्ञान आत्मा है - ऐसा क्यों स्वीकार किया गया है ? [वट्टदि णाणं विणा ण अप्पाणं] - ज्ञानरूप कर्ता स्वजीव के बिना अन्यत्र घड़े, कपड़े आदि में नहीं रहता हैं । [तम्हा णाणं अप्पा] - इससे जाना जाता है कि कथंचित् ज्ञान आत्मा ही है । इसप्रकार गाथा के तीन चरणों से ज्ञान का कथंचित् आत्मत्व स्थित हुआ । [अप्पा णाणं व अण्णं वा] - आत्मा ज्ञानधर्म की अपेक्षा ज्ञान है; सुख, वीर्य आदि धर्मों की अपेक्षा अन्य भी है; नियम नही है ।

    वह इसप्रकार - यदि एकान्त से "ज्ञान आत्मा है" - यह कहा जाये तो ज्ञान गुण मात्र ही आत्मा प्राप्त होता है, सुखादि धर्मों के लिये स्थान नहीं रहता । ऐसी स्थिति में सुख, वीर्य आदि धर्म-समूहों का अभाव होने से आत्मा का अभाव होगा । आधारभूत आत्मा का अभाव होने पर आधेयभूत ज्ञानगुण का भी अभाव होगा - इसप्रकार एकान्त मानने पर दोनों का ही अभाव हो जाएगा । इसलिये आत्मा कथंचित् ज्ञान है, सर्वथा नहीं ।

    यहाँ अभिप्राय यह है कि आत्मा व्यापक है और ज्ञान व्याप्य; इसलिये ज्ञान आत्मा हो परन्तु आत्मा ज्ञान भी है और अन्य भी है ।

    वैसा ही कहा भी है - 'व्यापक तद् और अतद् दोनों में रहता है परन्तु व्याप्य मात्र तद् में ही रहता है । '

    इसप्रकार (क्षेत्र अपेक्षा) आत्मा और ज्ञान का एकत्व तथा व्यवहार से ज्ञान का सर्वगतत्व इत्यादि कथनरूप से दूसरे स्थल में पाँच गाथायें पूर्ण हुईं ।

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    + ज्ञान ज्ञेय के समीप नहीं जाता -
    णाणी णाणसहावो अट्ठा णेयप्पगा हि णाणिस्स । (28)
    रूवाणि व चक्खूणं णेवण्णोण्णेसु वट्टंति ॥29॥
    ज्ञानी ज्ञानस्वभावोऽर्था ज्ञेयात्मका हि ज्ञानिनः ।
    रूपाणीव चक्षुषोः नैवान्योन्येषु वर्तन्ते ॥२८॥
    रूप को ज्यों चक्षु जाने परस्पर अप्रविष्ठ रह
    त्यों आत्म ज्ञानस्वभाव अन्य पदार्थ उसके ज्ञेय हैं ॥२९॥
    अन्वयार्थ : [ज्ञानी] आत्मा [ज्ञानस्वभाव:] ज्ञान स्वभाव है [अर्था: हि] और पदार्थ [ज्ञानिनः] आत्मा के [ज्ञेयात्मका:] ज्ञेय स्वरूप हैं [रूपाणि इव चक्षुषो:] जैसे कि रूप (रूपी पदार्थ) नेत्रों का ज्ञेय है वैसे [अन्योन्येषु] वे एक-दूसरे में [न एव वर्तन्ते] नहीं वर्तते ॥२८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ज्ञान और ज्ञेय के परस्पर गमन का निषेध करते हैं (अर्थात् ज्ञान और ज्ञेय एक-दूसरे में प्रवेश नहीं करते ऐसा कहते हैं ।) :-

    आत्मा और पदार्थ स्वलक्षण-भूत पृथक्त्व के कारण एक दूसरे में नहीं वर्तते परन्तु उनके मात्र नेत्र और रूपी पदार्थ की भाँति ज्ञान-ज्ञेय स्वभाव-सम्बन्ध से होने वाली एक दूसरे में प्रवृत्ति पाई जाती है । (प्रत्येक द्रव्य का लक्षण अन्य द्रव्यों से भिन्नत्व होने से आत्मा और पदार्थ एक दूसरे में नहीं वर्तते, किन्तु आत्मा का ज्ञान स्वभाव है और पदार्थों का ज्ञेय स्वभाव है, ऐसे ज्ञान-ज्ञेयभावरूप सम्बन्ध के कारण ही मात्र उनका एक दूसरे में होना नेत्र और रूपी पदार्थों की भाँति उपचार से कहा जा सकता है) । जैसे नेत्र और उनके विषय-भूत रूपी पदार्थ परस्पर प्रवेश किये बिना ही ज्ञेयाकारों को ग्रहण और समर्पण करने के स्वभाव-वाले हैं, उसी प्रकार आत्मा और पदार्थ एक दूसरे में प्रविष्ट हुए बिना ही समस्त ज्ञेयाकारों के ग्रहण और समर्पण करने के स्वभाव-वाले हैं । (जिस प्रकार आँख रूपी पदार्थों में प्रवेश नहीं करती और रूपी पदार्थ आँख में प्रवेश नहीं करते तो भी आँख रूपी पदार्थों के ज्ञेयाकारो के ग्रहण करने-जानने के स्वभाव-वाली है और रूपी पदार्थ स्वयं के ज्ञेयाकारों को समर्पित होने-जनाने के स्वभाववाले हैं, उसीप्रकार आत्मा पदार्थों में प्रवेश नहीं करता और पदार्थ आत्मा में प्रवेश नहीं करते तथापि आत्मा पदार्थों के समस्त ज्ञेयाकारों को ग्रहण कर लेने, जान लेने के स्वभाव-वाला है और पदार्थ स्वयं के समस्त ज्ञेयाकारों को समर्पित हो जाने-ज्ञात हो जाने के स्वभाव-वाले हैं ।)

    जयसेनाचार्य :
    अब ज्ञान और ज्ञेय का परस्पर गमन-निराकरण प्रतिपादक (एक दूसरे में जाने के निषेध परक) पाँच गाथाओं में निबद्ध तीसरा स्थल आरम्भ होता है ।

    अब ज्ञान ज्ञेय के समीप नहीं जाता; यह निश्चित करते हैं -

    [णाणी णाणसहावो] - ज्ञानी सर्वज्ञ केवलज्ञान स्वभावी ही हैं । [अट्ठा णेयप्पगा हि णाणिस्स] - तीनलोक, तीनकालवर्ती पदार्थ ज्ञेयस्वरूप ही हैं, ज्ञानस्वरूप नहीं हैं । वे सभी पदार्थ किसके ज्ञेय स्वरूप हैं? वे ज्ञानी के ज्ञेय स्वरूप हैं । [रूवाणि व चक्खूणं णेवण्णोण्णेसु वट्टन्ति] - ज्ञानी और पदार्थ परस्पर में एकपने से प्रवृत्ति नहीं करते । ज्ञानी और पदार्थ किसके समान, किससे सम्बन्धित परस्पर में प्रवृत्ति नहीं करते? जैसे नेत्र और रूप परस्पर में प्रवृत्ति नहीं करते, उसीप्रकार वे दोनों आपस में प्रवृत्ति नहीं करते हैं ।

    वह इसप्रकार - जैसे रूपी द्रव्य नेत्र के साथ परस्पर में सम्बन्ध का अभाव होने पर भी अपने आकार को समर्पित करने में समर्थ हैं और नेत्र भी उनके आकार को ग्रहण करने में समर्थ हैं, उसी प्रकार तीनलोक रूपी उदरविवर (छिद्र) में स्थित, तीनकाल सम्बन्धी पर्यायों से परिणमित पदार्थ, ज्ञान के साथ परस्पर प्रदेशों का सम्बन्ध नहीं होने पर भी अपने आकार को समर्पित करने में समर्थ हैं; अखण्ड एक प्रतिभासमय केवलज्ञान भी उनके आकारों को ग्रहण करने में समर्थ है - यह भाव है ।

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    + ज्ञेय-पदार्थों में प्रविष्ट नहीं हुआ होने पर भी प्रविष्ट की भाँति ज्ञात होता है -
    ण पविट्ठो णाविट्ठो णाणी णेयेसु रूवमिव चक्खू । (29)
    जाणदि पस्सदि णियदं अक्खातीदो जगमसेसं ॥30॥
    न प्रविष्टो नाविष्टो ज्ञानी ज्ञेयेषु रूपमिव चक्षुः ।
    जानाति पश्यति नियतमक्षातीतो जगदशेषम् ॥२९॥
    प्रविष्ठ रह अप्रविष्ठ रह ज्यों चक्षु जाने रूप को
    त्यों अतीन्द्रिय आत्मा भी जानता सम्पूर्ण जग ॥३०॥
    अन्वयार्थ : [चक्षु: रूपं इव] जैसे चक्षु रूप को (ज्ञेयों में अप्रविष्ट रहकर तथा अप्रविष्ट न रहकर जानती-देखती है) उसी प्रकार [ज्ञानी] आत्मा [अक्षातीतः] इन्द्रियातीत होता हुआ [अशेषं जगत्] अशेष जगत को (समस्त लोकालोक को) [ज्ञेयेषु] ज्ञेयों में [न प्रविष्ट:] अप्रविष्ट रहकर [न अविष्ट:] तथा अप्रविष्ट न रहकर [नियतं] निरन्तर [जानाति पश्यति] जानता-देखता है ॥२१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, आत्मा पदार्थों में प्रवृत्त नहीं होता तथापि जिससे (जिस शक्ति-वैचित्र्य से) उसका पदार्थों में प्रवृत्त होना सिद्ध होता है उस शक्तिवैचित्र्य को उद्योत करते हैं :-

    जिस प्रकार चक्षु रूपी द्रव्यों को स्वप्रदेशों के द्वारा अस्पर्श करता हुआ अप्रविष्ट रहकर (जानता-देखता है) तथा ज्ञेय आकारों को आत्मसात् (निजरूप) करता हुआ अप्रविष्ट न रहकर जानता-देखता है; इसीप्रकार आत्मा भी इन्द्रियातीतता के कारण *प्राप्यकारिता की विचारगोचरता से दूर होता हुआ ज्ञेयभूत समस्त वस्तुओं को स्वप्रदेशों से अस्पर्श करता है, इसलिये अप्रविष्ट रहकर (जानता-देखता है) तथा शक्ति वैचित्र के कारण वस्तु में वर्तते समस्त ज्ञेयाकारों को मानों मूल में से उखाड़कर ग्रास कर लेने से अप्रविष्ट न रहकर जानता- देखता है । इसप्रकार इस विचित्र शक्तिवाले आत्माके पदार्थोंमें अप्रवेश की भाँति प्रवेश भी सिद्ध होता है ।

    *प्राप्यकारिता = ज्ञेय विषयों को स्पर्श करके ही कार्य कर सकना-जान सकना । (इन्द्रियातीत हुए आत्मामें प्राप्यकारिता के विचार का भी अवकाश नहीं है)

    जयसेनाचार्य :
    [ण पविट्ठो] - निश्चयनय से प्रविष्ट नहीं है । [णाविट्ठो] - व्यवहार से अप्रविष्ट नहीं, वरन् प्रविष्ट ही है । प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं होने वाला कर्तारूप वह कौन है? [णाणी] - ज्ञानीरूप कर्ता प्रविष्ट और अप्रविष्ट नहीं है । ज्ञानी प्रविष्ट- अप्रविष्ट किनमें नहीं है? [णेयेसु] - वह ज्ञेय पदार्थो में प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं है । ज्ञानी किसके समान उनमें प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं है? [रूवमिवचक्खू] - रूप के सम्बन्ध में नेत्र के समान ज्ञानी उनमें प्रविष्ट-अप्रविष्ट नहीं है । ऐसा होता हुआ ज्ञानी क्या करता है? [जाणदि पस्सदि] - उन्हें जानता और देखता है । [णियदं] - वह उन्हें संशयरहित जानता-देखता है । वह जानने-देखने वाला ज्ञानी किस विशेषता वाला है? वह [अक्खातीदो] - अक्षातीत-इन्द्रिय रहित है । वह किसे जानता-देखता है? [जगमसेसं] - वह समूर्ण जगत् को जानता-देखता है ।

    वह इसप्रकार - जैसे नेत्ररुपी कर्ता यद्यपि निश्चय से रूपी द्रव्यों को स्पर्श नहीं करता, तथापि व्यवहार से लोक में स्पर्श करते हुए के समान ज्ञात होता है; उसीप्रकार यह आत्मा केवलज्ञान से पूर्व मिथ्यात्व-रागादि आस्रव और आत्मा के बीच में होने वाले विशिष्ट भेदज्ञान से उत्पन्न होनेवाले केवलज्ञान और केवलदर्शन से तीनलोक और तीनकालवर्ती पदार्थों को निश्चय से स्पर्श नहीं करता हुआ भी व्यवहार से स्पर्श करता है; तथा स्पर्श करते हुए के समान ज्ञान से जानता और दर्शन से देखता है । वह आत्मा कैसा होता हुआ जानता और देखता है ? अतीन्द्रिय सुखरूप आस्वाद से परिणत (स्वाद का आस्वादी) होता हुआ अक्षातीत होता हुआ उन सबको जानता और देखता है ।

    इससे ज्ञात होता है कि निश्चय से अप्रवेश के समान ज्ञेय पदार्थों में व्यवहार से प्रवेश भी घटित होता है ।

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    + उसी अर्थ को दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं -
    रयणमिह इन्दणीलं दुद्धज्झसियं जहा सभासाए । (30)
    अभिभूय तं पि दुद्धं वट्टदि तह णाणमट्ठेसु ॥31॥
    रत्नमिहेन्द्रनीलं दुग्धाध्युषितं यथा स्वभासा ।
    अभिभूय तदपि दुग्धं वर्तते तथा ज्ञानमर्थेषु ॥३०॥
    ज्यों दूध में है व्याप्त नीलम रत्न अपनी प्रभा से
    त्यों ज्ञान भी है व्याप्त रे निश्शेष ज्ञेय पदार्थ में ॥३१॥
    अन्वयार्थ : [यथा] जैसे [इह] इस जगत में [दुग्धाध्युषितं] दूध में पड़ा हुआ [इन्द्रनीलं रत्नं] इन्द्रनील रत्न [स्वभासा] अपनी प्रभा के द्वारा [तद् अपि दुग्धं] उस दूध में [अभिभूय] व्याप्त होकर [वर्तते] वर्तता है, [तथा] उसीप्रकार [ज्ञानं] ज्ञान [अर्थेषु] पदार्थों में व्याप्त होकर वर्तता है ॥३०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, यहाँ इसप्रकार (दृष्टान्तपूर्वक) यह स्पष्ट करते हैं कि ज्ञान पदार्थों में प्रवृत्त होता है :-

    जैसे दूध में पड़ा हुआ इन्द्रनील रत्न अपने प्रभा-समूह से दूध में व्याप्त होकर वर्तता हुआ दिखाई देता है, उसी प्रकार संवेदन (ज्ञान) भी आत्मा से अभिन्न होने से कर्ता-अंश से आत्मता को प्राप्त होता हुआ ज्ञान-रूप कारण-अंश के द्वारा कारण-भूत पदार्थों के कार्य भूत समस्त ज्ञेयाकारो में व्याप्त होता हुआ वर्तता है, इसलिये कार्य में कारण का (ज्ञेयाकारों में पदार्थों का) उपचार करके यह कहने में विरोध नहीं आता कि 'ज्ञान पदार्थों में व्याप्त होकर वर्तता है ।'

    प्रमाणदृष्टिसे संवेदन अर्थात् ज्ञान कहने पर अनन्त गुणपर्यायोंका पिंड समझमें आता है । उसमें यदि कर्ता, करण आदि अंश किये जायें तो कर्ता-अंश वह अखंड आत्मद्रव्य है और करण- अंश वह ज्ञानगुण है ।
    पदार्थ कारण हैं और उनके ज्ञेयाकार [द्रव्य-गुण-पर्याय] कार्य हैं ।

    जयसेनाचार्य :
    [रयणं] - रत्न, [इह] - इस लोक में । इस लोक में किस नाम वाला रत्न? [इंदणीलं] - इन्द्रनील नामक रत्न । वह इन्द्रनील नामक रत्न किस विशेषता वाला है? [दुद्धज्झसियं] - दूध में पड़ा हुआ इन्द्रनील रत्न, [जहा] - जैसे [सभासाए] - अपनी प्रभा से [अभीभूय] - तिरस्कृत कर । इन्द्रनील रत्न अपनी प्रभा से किसे तिरस्कृत कर ? [तं पि दुद्धं] - वह रत्न अपनी प्रभा से उस पूर्वोक्त दूध को तिरस्कृत कर, [वट्टदि] - वर्तता है । इसप्रकार दृष्टान्त पूर्ण हुआ । [तह णाणमत्त्थेसु] - उसी प्रकार ज्ञान पदार्थों में वर्तता है ।

    वह इसप्रकार- जैसे इन्द्रनील रत्नरूप कर्ता अपनी नील प्रभारूप साधन से दूध को नीला करके वर्तता है, उसी प्रकार निश्चय रत्नत्रय स्वरूप परमसामायिक संयम से उत्पन्न हुआ जो केवलज्ञान वह स्व-पर को जाननेरूप सामर्थ्य से सम्पूर्ण अज्ञान-रूपी अन्धकार को तिरस्कृत कर एक साथ ही सभी पदार्थों में ज्ञानाकार रूप से वर्तता है ।

    यहाँ भाव यह है - कारणभूत सभी पदार्थों के कार्यभूत ज्ञानाकार उपचार से 'अर्थ' कहलाते हैं और उनमें ज्ञान वर्तता है; अत: अर्थों मे ज्ञान वर्तता है - इस कथन में भी व्यवहार से दोष नहीं है ।

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    + पदार्थ ज्ञान में वर्तते हैं -
    जदि ते ण संति अट्ठा णाणे णाणं ण होदि सव्वगयं । (31)
    सव्वगयं वा णाणं कहं ण णाणट्ठिया अट्ठा ॥32॥
    यदि ते न सन्त्यर्था ज्ञाने ज्ञानं न भवति सर्वगतम् ।
    सर्वगतं वा ज्ञानं कथं न ज्ञानस्थिता अर्थाः ॥३१॥
    वे अर्थ ना हों ज्ञान में तो ज्ञान न हो सर्वगत
    ज्ञान है यदि सर्वगत तो क्यों न हों वे ज्ञानगत ॥३२॥
    अन्वयार्थ : [यदि] यदि [ते अर्था:] वे पदार्थ [ज्ञाने न संति] ज्ञान में न हों तो [ज्ञानं] ज्ञान [सर्वगत] सर्वगत [न भवति] नहीं हो सकता [वा] और यदि [ज्ञानं सर्वगतं] ज्ञान सर्वगत है तो [अर्था:] पदार्थ [ज्ञानस्थिता:] ज्ञानस्थित [कथं न] कैसे नहीं हैं? (अर्थात् अवश्य हैं) ॥३१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसा व्यक्त करते हैं कि इस प्रकार पदार्थ ज्ञान में वर्तते हैं :-

    यदि समस्त स्व-ज्ञेयाकारों के समर्पण द्वारा (ज्ञान में) अवतरित होते हुए समस्त पदार्थ ज्ञान में प्रतिभासित न हों तो वह ज्ञान सर्वगत नहीं माना जाता । और यदि वह (ज्ञान) सर्वगत माना जाये, तो फिर (पदार्थ) साक्षात् ज्ञानदर्पण-भूमिका में अवतरित बिम्ब की भाँति अपने-अपने ज्ञेयाकारों के कारण (होने से) और परम्परा से प्रतिबिम्ब के समान ज्ञेयाकारों के कारण होने से पदार्थ कैसे ज्ञान-स्थित निश्चित् नहीं होते? (अवश्य ही ज्ञान-स्थित निश्चित होते हैं) ॥३१॥

    बिम्ब = जिसका दर्पण में प्रतिबिंब पड़ा हो वह । (ज्ञान को दर्पण की उपमा दी जाये तो, पदार्थों के ज्ञेयाकार बिम्ब समान हैं और ज्ञान में होनेवाले ज्ञान की अवस्थारूप ज्ञेयाकार प्रतिबिम्ब समान हैं)
    पदार्थ साक्षात् स्वज्ञेयाकारों के कारण हैं, अर्थात् पदार्थ अपने-अपने द्रव्य-गुण-पर्यायों के साक्षात् कारण हैं और परम्परा से ज्ञान की अवस्था-रूप ज्ञेयाकारों के (ज्ञानाकारों के) कारण हैं ।

    जयसेनाचार्य :
    [जइ] - यदि [ते अट्ठा न सन्ति] - वे पदार्थ अपने ज्ञानाकार समर्पण की अपेक्षा दर्पण में बिम्ब के समान नहीं हैं । दर्पण में बिम्ब के समान वे पदार्थ कहाँ नहीं हैं? [णाणे] - यदि वे पदार्थ केवलज्ञान में नहीं हैं । [णाणं ण होदि सव्वगयं] - तो ज्ञान सर्वगत नहीं हो सकता । [सव्वगयं वा णाणं] - यदि आपको व्यवहार से सर्वगत ज्ञान स्वीकृत है, [कहं ण णाणट्ठिया अट्ठा] - तो अपने ज्ञेयाकारों को जानकारी रूप से समर्पित करने की अपेक्षा व्यवहारनय से वे पदार्थ ज्ञान में स्थित कैसे नहीं हैं, वरन् हैं ही ।

    यहाँ अभिप्राय यह है कि जिस कारण व्यवहार से ज्ञेय सम्बन्धी ज्ञानाकारों को ग्रहण करने की अपेक्षा ज्ञान सर्वगत कहलाता है, उसी कारण व्यवहार से ज्ञेय सम्बन्धी ज्ञानाकार समर्पण की अपेक्षा पदार्थ भी ज्ञानगत कहलाते हैं ।

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    + ज्ञानी की ज्ञेय पदार्थों के साथ भिन्नता ही है -
    गेण्हदि णेव ण मुंचदि ण परं परिणमदि केवली भगवं । (32)
    पेच्छदि समंतदो सो जाणदि सव्वं णिरवसेसं ॥33॥
    गृह्णाति नैव न मुञ्चति न परं परिणमति केवली भगवान् ।
    पश्यति समन्ततः स जानाति सर्वं निरवशेषम् ॥३२॥
    केवली भगवान पर ना ग्रहे छोड़े परिणमें
    चहुं ओर से सम्पूर्णत: निरवशेष वे सब जानते ॥३३॥
    अन्वयार्थ : [केवली भगवान्] केवली भगवान [परं] पर को [न एव गृह्णाति] ग्रहण नहीं करते, [न मुंचति] छोड़ते नहीं, [न परिणमति] पररूप परिणमित नहीं होते; [सः] वे [निरवशेष सर्वं] निरवशेषरूप से सबको (सम्पूर्ण आत्मा को, सर्व ज्ञेयों को) [समन्तत:] सर्व ओर से (सर्व आत्मप्रदेशों से) [पश्यति] देखते-जानते हैं ॥३२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, इसप्रकार (व्यवहार से) आत्मा की पदार्थों के साथ एक दूसरे में प्रवृत्ति होने पर भी, (निश्चय से) वह पर का ग्रहण -त्याग किये बिना तथा पररूप परिणमित हुए बिना सबको देखता-जानता है इसलिये उसे (पदार्थों के साथ) अत्यन्त भिन्नता है ऐसा बतलाते हैं :-

    यह आत्मा, स्वभाव से ही परद्रव्य के ग्रहण-त्याग का तथा पर-द्रव्यरूप से परिणमित होने का (उसके) अभाव होने से, स्व-तत्त्वभूत केवल-ज्ञानरूप से परिणमित होकर निष्कंप निकलने वाली ज्योति-वाला उत्तम मणि जैसा होकर रहता हुआ, इसप्रकार (पूर्वोक्त दोनों प्रकार से) उसका (आत्मा का पदार्थों से) अत्यन्त भिन्नत्व ही है ।

    निःशेषरूप से = कुछ भी किंचित् मात्र शेष न रहे इस प्रकार से
    साक्षात्कार करना = प्रत्यक्ष जानना
    ज्ञप्ति-क्रिया का बदलते रहना = अर्थात् ज्ञान में एक ज्ञेय को ग्रहण करना और दूसरे को छोड़ना सो ग्रहण-त्याग है; इस प्रकार का ग्रहण-त्याग वह क्रिया है, ऐसी क्रिया का केवली-भगवान के अभाव हुआ है
    आकारान्तर = अन्य आकार

    जयसेनाचार्य :
    अब, यद्यपि व्यवहार से ज्ञानी का पदार्थों के साथ ग्राह्यग्राहक-ज्ञेयज्ञायक सम्बन्ध है, तथापि संश्लेषादि सम्बन्ध नहीं है, अत: ज्ञेय पदार्थों के साथ उनकी भिन्नता ही है; ऐसा प्रतिपादित करते हैं -


    [गेण्हदि णेव ण मुंचदि] - ग्रहण नहीं करते, छोड़ते नहीं हैं, [ण परं परिणमदि] - परद्रव्य रूप ज्ञेय पदार्थों का परिणमन नहीं करते । ग्रहण करने, छोड़ने और परिणमन करनेरूप क्रिया को नहीं करने वाले कर्तारूप वे कौन हैं? [केवली भगवं] - केवली भगवान--सर्वज्ञ परद्रव्य को इससे ज्ञात होता है कि परद्रव्य के साथ भिन्नता ही है । तो क्या वे सर्वज्ञ परद्रव्य को जानते नहीं हैं ? [पेच्छदि समंतदो सो जाणदि सव्वं णिरवसेसं] - तो भी वे सर्वज्ञ व्यवहारनय से अशेष सर्व को सर्व द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप से जानते और देखते हैं ।

    अथवा दूसरा व्याख्यान - यतः सर्वज्ञ अन्तरंग में काम-क्रोधादि को एवं बाह्य विषयों में पंचेन्द्रिय विषयादिक बाह्य द्रव्य को ग्रहण नहीं करते, अपने अनन्त ज्ञानादि चतुष्टय को छोड़ते नहीं हैं, अत: ये जीव केवलज्ञान की उत्पत्ति के समय से ही एक साथ सबको जानते हुए अन्य विकल्परूप परिणमित नहीं होते । ऐसे होते हुये वे केवली क्या करते हैं? आत्मतत्त्व से उत्पन्न केवलज्ञानरुपी ज्योति द्वारा स्फटिक मणि के समान अत्यन्त स्थिर चैतन्य-प्रकाशरूप होकर अपने आत्मा को, अपने आत्मा द्वारा, अपने आत्मा में अनुभव करते हैं।

    इस कारण भी परद्रव्य के साथ ज्ञान की पृथकता ही है - यह अभिप्राय है ।

    इसप्रकार ज्ञान ज्ञेयरूप से परिणमित नहीं होता, इत्यादि व्याख्यानरूप तीसरे स्थल में पाँच गाथायें पूर्ण हुईं ।

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    + भाव-श्रुतज्ञान से भी आत्मा का परिज्ञान होता है -
    जो हि सुदेण विजाणादि अप्पाणं जाणगं सहावेण । (33)
    तं सुदकेवलिमिसिणो भणंति लोयप्पदीवयरा ॥34॥
    यो हि श्रुतेन विजानात्यात्मानं ज्ञायकं स्वभावेन ।
    तं श्रुतकेवलिनमृषयो भणन्ति लोकप्रदीपकराः ॥३३॥
    श्रुतज्ञान से जो जानते ज्ञायकस्वभावी आतमा
    श्रुतकेवली उनको कहें ऋषिगण प्रकाशक लोक के ॥३४॥
    अन्वयार्थ : [यः हि] जो वास्तव में [श्रुतेन] श्रुतज्ञान के द्वारा [स्वभावेन ज्ञायकं] स्वभाव से ज्ञायक (अर्थात् ज्ञायक-स्वभाव) [आत्मानं] आत्मा को [विजानाति] जानता है [तं] उसे [लोकप्रदीपकरा:] लोक के प्रकाशक [ऋषय:] ऋषीश्वरगण [श्रुतकेवलिन भणन्ति] श्रुतकेवली कहते हैं ॥३३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब केवलज्ञानी को और श्रुतज्ञानी को अविशेषरूप से दिखाकर विशेष आकांक्षा के क्षोभ का क्षय करते हैं (अर्थात् केवलज्ञानी में और श्रुतज्ञानी में अन्तर नहीं है ऐसा बतलाकर विशेष जानने की इच्छा के क्षोभ को नष्ट करते हैं ) :-

    जैसे भगवान, युगपत् परिणमन करते हुए समस्त तथा जो चेतक-स्वभाव से एकत्व होने से केवल (अकेला, शुद्ध, अखंड) है ऐसे आत्मा को, आत्मा से, आत्मा में अनुभव करने के कारण केवली हैं; उसीप्रकार ये लोग (गणधर आदि) भी, क्रमश परिणमित होते हुए कितने ही चैतन्य-विशेषों से युक्त श्रुतज्ञान के द्वारा, अनादि-निधन- निष्कारण- असाधारण- स्वसंवेद्यमान- चैतन्यसामान्य जिसकी महिमा है तथा जो चेतक स्वभाव के द्वारा एकत्व होने से केवल (अकेला) है ऐसे आत्मा को, आत्मा से, आत्मा में, अनुभव करने के कारण श्रुतकेवली हैं । (इसलिये) विशेष आकांक्षा के क्षोभ से बस हो; (हम तो) स्वरूप-निश्चल ही रहते हैं ।

    अनादिनिधन = अनादि- अनन्त (चैतन्यसामान्य आदि तथा अन्त रहित है)
    निष्कारण = जिसका कोई कारण नहीं हैं ऐसा; स्वयंसिद्ध; सहज
    असाधारण = जो अन्य किसी द्रव्यमें न हो, ऐसा
    स्वसंवेद्यमान = स्वत: ही अनुभवमें आनेवाला
    चेतक = चेतनेवाला; दर्शकज्ञायक
    आत्मा निश्चय से परद्रव्य के तथा राग-द्वेषादि के संयोगों तथा गुण-पर्याय के भेदों से रहित, मात्र चेतक-स्वभावरूप ही है, इसलिये वह परमार्थ से केवल (अकेला, शुद्ध, अखंड) है

    जयसेनाचार्य :
    (अब निश्चय-व्यवहार केवली के प्रतिपादन की मुख्यता वाला चार गाथाओं में निबद्ध चौथा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब, जैसे निरावरण, परिपूर्ण प्रगट स्वरूप केवलज्ञान से आत्मा का परिज्ञान होता है; उसी प्रकार सावरण, अल्पप्रगट-स्वरूप केवलज्ञान की उत्पत्ति के बीजभूत, स्वसंवेदन ज्ञानरूप भाव-श्रुतज्ञान से भी आत्मा का परिज्ञान होता है - यह निश्चित करते हैं ।

    अथवा द्वितीय पातनिका - जैसा केवलज्ञान प्रमाण है, उसीप्रकार केवलज्ञान द्वारा दर्शाये गये पदार्थों को प्रकाशित करने वाला श्रुतज्ञान भी परोक्ष प्रमाण है । इसप्रकार दोनों पातनिकाओं को मन में धारण कर इस गाथा का प्रतिपादन करते हैं -

    [जो] - जो कर्ता, [हि] - स्पष्टरूप से, [सुदेण] - निर्विकार स्वसंवेदनरूप भाव-श्रुत परिणाम द्वारा [विजाणदि] - विशेषरूप से जानता है -- विषय सुख सम्बन्धी आनन्द से विलक्षण निज शुद्धात्मा की भावना से उत्पन्न परमानन्द एक स्वरूपी सुखरस के आस्वादरूप अनुभव करते हैं । भाव-श्रुत परिणाम द्वारा किसका अनुभव करता है? [अप्पाणं] - निजात्मद्रव्य का भाव-श्रुतजान द्वारा अनुभव करता है । ऐसे निजात्मद्रव्य का अनुभव कैसे करता है? [सहावेण] - सम्पूर्ण विभाव रहित अपने स्वभाव से अनुभव करता है । [तं सुयकेवलिं] - उन आत्मानुभवी महायोगीन्द्र को श्रुतकेवली [भणंति] - कहते हैं । उन्हें श्रुतकेवली कर्तारूप कौन कहते हैं? [इसिणो] - ऋषी उन्हें श्रुतकेवली कहते हैं । वे ऋषी किस विशेषता वाले हैं? [लोयप्पदीवयरा] - वे लोक को प्रकाशित करने वाले हैं ।

    यहाँ विस्तार करते हैं - परद्रव्य से रहितपने रूप एक साथ परिपूर्ण सम्पूर्ण चैतन्य की समृद्धि से सम्पन्न केवलज्ञान द्वारा जैसे, अनादि-अनन्त, अहेतुक, अन्य द्रव्यों से असाधारण स्वानुभूति-गम्य परम चैतन्य सामान्य स्वरूपवाले मात्र आत्मा का आत्मा में स्वानुभव करने से भगवान केवली हैं, उसीप्रकार ये गणधरदेव आदि निश्चय रत्नत्रय के आराधक मनुष्य भी पूर्वोक्त लक्षण वाले आत्मा का भाव-श्रुतज्ञान द्वारा स्वसंवेदन करने से निश्चय श्रुतकेवली हैं ।

    विशेष यह है कि जैसे कोई देवदत्त दिन में सूर्य का उदय होने से देखता है, रात्रि में दीपक से कुछ देखता है; उसीप्रकार केवली भगवान सूर्य के उदय के समान केवलज्ञान से दिन के समान मोक्ष पर्याय में भगवान आत्मा को देखते हैं तथा संसारी ज्ञानीजन रात्रि के समान संसार पर्याय में दीपक के समान रागादि विकल्पों से रहित परम समाधि से निजात्मा को देखते हैं ।

    यहाँ अभिप्राय यह है कि आत्मा परोक्ष है, कैसे ध्यान कर सकते हैं, ऐसे संदेह को धारण कर परमात्म-भावना नहीं छोड़ना चाहिये ।

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    + पदार्थों की जानकारी-रूप भावश्रुत ही ज्ञान है -
    सुत्तं जिणोवदिट्ठं पोग्गलदव्वप्पगेहिं वयणेहिं । (34)
    तं जाणणा हि णाणं सुत्तस्स य जाणणा भणिया ॥35॥
    सूत्रं जिनोपदिष्टं पुद्गलद्रव्यात्मकैर्वचनैः ।
    तज्ज्ञप्तिर्हि ज्ञानं सूत्रस्य च ज्ञप्तिर्भणिता ॥३४॥
    जिनवरकथित पुद्गल वचन ही सूत्र उसकी ज्ञप्ति ही
    है ज्ञान उसको केवली जिनसूत्र की ज्ञप्ति कहें ॥३५॥
    अन्वयार्थ : [सूत्रं] सूत्र अर्थात् [पुद्गलद्रव्यात्मकै: वचनै:] पुद्गल-द्रव्यात्मक वचनों के द्वारा [जिनोपदिष्टं] जिनेन्द्र भगवान के द्वारा उपदिष्ट वह [तज्ज्ञप्ति: ही] उसकी ज्ञप्ति [ज्ञानं] ज्ञान है [च] और उसे [सूत्रस्य ज्ञप्ति:] सूत्र की ज्ञप्ति (श्रुतज्ञान) [भणिता] कहा गया है ॥३४॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ज्ञान के श्रुत-उपाधिकृत भेद को दूर करते हैं (अर्थात् ऐसा बतलाते हैं कि श्रुतज्ञान भी ज्ञान ही है, श्रुतरूप उपाधि के कारण ज्ञान में कोई भेद नहीं होता) :-

    प्रथम तो श्रुत ही सूत्र है; और वह सूत्र भगवान अर्हन्त-सर्वज्ञ के द्वारा स्वयं जानकर उपदिष्ट स्यात्कार चिन्हयुक्त, पौदगलिक शब्दब्रह्म है । उसकी ज्ञप्ति (शब्दब्रह्म को जाननेवाली ज्ञातृ-क्रिया) सो ज्ञान है; श्रुत (सूत्र) तो उसका (ज्ञान का) कारण होने से ज्ञान के रूप में उपचार से ही कहा जाता है (जैसे कि अन्न को प्राण कहा जाता है) । ऐसा होने से यह फलित हुआ कि 'सूत्र की ज्ञप्ति' सो श्रुतज्ञान है । अब यदि सूत्र तो उपाधि होने से उसका आदर न किया जाये तो 'ज्ञप्ति' ही शेष रह जाती है; ('सूत्र की ज्ञप्ति' कहने पर निश्चय से ज्ञप्ति कहीं पौद्गलिक सूत्र की नहीं, किन्तु आत्मा की है; सूत्र ज्ञप्ति का स्वरूप-भूत नहीं, किन्तु विशेष वस्तु अर्थात् उपाधि है; क्योंकि सूत्र न हो तो वहाँ भी ज्ञप्ति तो होती ही है । इसलिये यदि सूत्र को न गिना जाय तो 'ज्ञप्ति' ही शेष रहती है ।) और वह (ज्ञप्ति) केवली और श्रुतकेवली के आत्मानुभवन में समान ही है । इसलिये ज्ञान में श्रुत-उपाधिकृत भेद नहीं है ॥३४॥

    स्यात्कार = 'स्यात्‌' शब्द । (स्यात्‌ = कथंचित्‌; किसी अपेक्षा से)
    ज्ञप्ति = जानना; जानने की क्रिया; जानन-क्रिया

    जयसेनाचार्य :
    अब, व्यवहार से शब्दरूप द्रव्यश्रुत ज्ञान है, तथा निश्चय से पदार्थों की जानकारी रूप भावश्रुत ही ज्ञान है, ऐसा कहते है ।

    अथवा, आत्मभावना में लीन निश्चय श्रुतकेवली हैं ऐसा पिछली गाथा (गाथा ३४) में कहा था । इस गाथा में ये व्यवहार-श्रुतकेवली हैं ऐसा कहते हैं -

    [सुत्तं] - द्रव्यश्रुत । वह द्रव्यश्रुत कैसा है? [जिणोवदिट्ठम्] - जिनेन्द्र भगवान द्वारा कहा गया है । वह द्रव्यश्रुत जिनेन्द्र भगवान ने कैसे कहा है? [पोग्गलदव्वप्पगेहिं वयणेहिं] - पुद्गलद्रव्यात्मक दिव्यध्वनि-रूप वचनों से वह द्रव्यश्रुत जिनेन्द्र भगवान ने कहा है । [तं जाणणा हिणाणं] - उस पूर्वोक्त शब्दश्रुत के आधार से ज्ञप्ति-पदार्थों की जानकारी ज्ञान कहलाती है, [हि] - वास्तव में । [सुत्तस्स य जाणणा भणिया] - इसलिये व्यवहार से पूर्वोक्त द्रव्यश्रुत की भी ज्ञान संज्ञा है, परन्तु निश्चय से नहीं । वह इसप्रकार --

    जैसे निश्चय से शुद्ध-बुद्ध एक स्वभाव सम्पन्न जीव है, पश्चात् व्यवहार से नर-नारकादि रूप भी जीव कहा जाता है, उसीप्रकार निश्चय से समस्त वस्तुओं को जाननेवाला अखण्ड एक प्रतिभासरूप ज्ञान कहा गया है, पश्चात् व्यवहार से मेघसमूह से ढंके हुये सूर्य की विशिष्ट अवस्था के समान कर्मसमूह से ढंके हुये अखण्ड एक ज्ञानरूप जीव के मतिज्ञान, श्रुतज्ञान आदि नाम होते हैं - यह भाव है ।

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    + भिन्न ज्ञान से आत्मा ज्ञानी नहीं होता -
    जो जाणदि सो णाणं ण हवदि णाणेण जाणगो आदा । (35)
    णाणं परिणमदि सयं अट्‌टा णाणट्ठिया सव्वे ॥36॥
    यो जानाति स ज्ञानं न भवति ज्ञानेन ज्ञायक आत्मा ।
    ज्ञानं परिणमते स्वयमर्था ज्ञानस्थिताः सर्वे ॥३५॥
    जो जानता सो ज्ञान आतम ज्ञान से ज्ञायक नहीं
    स्वयं परिणत ज्ञान में सब अर्थ थिति धारण करें ॥३६॥
    अन्वयार्थ : [यः जानाति] जो जानता है [सः ज्ञानं] सो ज्ञान है (अर्थात् जो ज्ञायक है वही ज्ञान है), [ज्ञानेन] ज्ञान के द्वारा [आत्मा] आत्मा [ज्ञायक: भवति] ज्ञायक है [न] ऐसा नहीं है । [स्वयं] स्वयं ही [ज्ञानं परिणमते] ज्ञान-रूप परिणमित होता है [सर्वे अर्था:] और सर्व पदार्थ [ज्ञानस्थिता:] ज्ञान-स्थित हैं ॥३५॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, आत्मा और ज्ञान का कर्त्तृत्व-करणत्वकृत भेद दूर करते हैं (अर्थात् परमार्थतः अभेद आत्मा में, 'आत्मा ज्ञातृक्रिया का कर्ता है और ज्ञान करण है' ऐसा व्यवहार से भेद किया जाता है, तथापि आत्मा और ज्ञान भिन्न नहीं हैं इसलिये अभेदनय से 'आत्मा ही ज्ञान है' ऐसा समझाते हैं) :-

    आत्मा अपृथग्भूत कर्तृत्व और करणत्व की शक्ति-रूप पारमैश्वर्यवान होने से जो स्वयमेव जानता है (अर्थात् जो ज्ञायक है) वही ज्ञान है; जैसे - जिसमें साधकतम उष्णत्व-शक्ति अन्तर्लीन है, ऐसी स्वतंत्र अग्नि के दहन-क्रिया की प्रसिद्धि होने से उष्णता कही जाती है । परन्तु ऐसा नहीं है कि जैसे पृथग्वर्ती हँसिये से देवदत्त काटने वाला कहलाता है उसीप्रकार (पृथग्वर्ती) ज्ञान से आत्मा जानने-वाला (ज्ञायक) है । यदि ऐसा हो तो दोनों के अचेतनता आ जायेगी और अचेतनों का संयोग होने पर भी ज्ञप्ति उत्पन्न नहीं होगी । आत्मा और ज्ञान के पृथग्वर्ती होने पर भी यदि आत्मा के ज्ञप्ति का होना माना जाये तो पर-ज्ञान के द्वारा पर को ज्ञप्ति हो जायेगी और इसप्रकार राख इत्यादि के भी ज्ञप्ति का उद्भव निरंकुश हो जायेगा । ('आत्मा और ज्ञान पृथक् हैं किन्तु ज्ञान आत्मा के साथ युक्त हो जाता है इसलिये आत्मा जानने का कार्य करता है' यदि ऐसा माना जाये तो जैसे ज्ञान आत्मा के साथ युक्त होता है, उसीप्रकार राख, घड़ा, स्तंभ इत्यादि समस्त पदार्थों के साथ युक्त हो जाये और उससे वे सब पदार्थ भी जाननेका कार्य करने लगें; किन्तु ऐसा तो नहीं होता, इसलिये आत्मा और ज्ञान पृथक् नहीं हैं) और, अपने से अभिन्न ऐसे समस्त ज्ञेयाकाररूप परिणमित जो ज्ञान है उसरूप स्वयं परिणमित होनेवाले को, कार्यभूत समस्त ज्ञेयाकारों के कारणभूत समस्त पदार्थ ज्ञानवर्ति ही कथंचित् हैं । (इसलिये) ज्ञाता और ज्ञान के विभाग की क्लिष्ट कल्पना से क्या प्रयोजन है? ॥३५॥

    पारमैश्वर्य = परम सामर्थ्य; परमेश्वरता
    साधकतम = उत्कृष्ट साधन वह करण
    जो स्वतंत्र रूपसे करे वह कर्ता
    अग्नि जलानेकी क्रिया करती है, इसलिये उसे उष्णता कहा जाता है

    जयसेनाचार्य :
    अब भिन्न ज्ञान से आत्मा ज्ञानी नहीं होता, ऐसा उपदेश देते हैं -

    [जो जाणदि सो णाणं] - कर्तारूप (जानने की क्रिया करनेवाला) जो जानता है वह ज्ञान है । वह इसप्रकार - जैसे नाम, लक्षण, प्रयोजन आदि के भेद होने पर भी अभेदनय से जलाने की क्रिया करने में समर्थ उष्णगुण से परिणत अग्नि भी उष्ण कहलाती है, उसी प्रकार पदार्थों को जानने सम्बन्धी क्रिया करने में समर्थ ज्ञान गुण से परिणत आत्मा भी ज्ञान कहलाता है ।

    वैसे ही कहा है - "[जानातीति ज्ञानमात्मा] - जो जानता है वह ज्ञान-आत्मा है ।'' [ण हवदि णाणेण जाणगो आदा] - आत्मा सर्वथा ही भिन्न ज्ञान से ज्ञानी नहीं है । यहाँ कोई कहता है - जैसे देवदत्त स्वयं से भिन्न दात्र (हंसिया) से लावक (काटने-छेदने वाला) है, उसीप्रकार आत्मा भी भिन्न ज्ञान से ज्ञायक हो, क्या दोष है? आचार्य कहते हैं - ऐसा नहीं है । छेदन क्रिया के विषय में बहिरंग साधनरूप दात्र देवदत्त से भिन्न (भले ही) हो, परन्तु छेदन क्रिया के विषय में अंतरंग साधनरूप देवदत्त की शक्ति विशेष उससे अभिन्न ही है; उसी प्रकार पदार्थों की जानकारी के विषय में अंतरंग साधनरूप ज्ञान आत्मा से अभिन्न ही है, बहिरंग साधनरूप उपाध्याय-अध्यापक, प्रकाश आदि आत्मा से भिन्न भी हों, दोष नहीं है । और यदि भिन्न ज्ञान से आत्मा ज्ञानी है तो दूसरे के ज्ञान से घड़े, खम्भे आदि सभी जड़ पदार्थ भी ज्ञानी हो जावें, परन्तु वे ज्ञानी नहीं होते ।

    [णाणं परिणमदि सयं] - क्योंकि भिन्न ज्ञान से आत्मा ज्ञानी नहीं है, इसलिये घट की उत्पत्ति में मिट्टी के पिण्ड समान उपादान रूप से स्वयं जीव ही ज्ञानरूप परिणमन करता है । [अट्ठा णाणट्ठियो सव्वे] - दर्पण में झलकने वाले बिम्ब के समान व्यवहार से ज्ञेय पदार्थ जानकारी रूप से ज्ञान में स्थित हैं - यह अभिप्राय है ।

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    + आत्मा ज्ञान है और शेष ज्ञेय हैं -
    तम्हा णाणं जीवो णेयं दव्वं तिहा समक्खादं । (36)
    दव्वं ति पुणो आदा परं च परिणामसंबद्धं ॥37॥
    तस्मात् ज्ञानं जीवो ज्ञेयं द्रव्यं त्रिधा समाख्यातम् ।
    द्रव्यमिति पुनरात्मा परश्च परिणामसंबद्धः ॥३६॥
    जीव ही है ज्ञान ज्ञेय त्रिधावर्णित द्रव्य हैं
    वे द्रव्य आतम और पर परिणाम से संबद्ध हैं ॥३७॥
    अन्वयार्थ : [तस्मात्] इसलिये [जीव: ज्ञानं] जीव ज्ञान है [ज्ञेयं] और ज्ञेय [त्रिधा समाख्यातं] तीन प्रकार से वर्णित (त्रिकालस्पर्शी) [द्रव्यं] द्रव्य है । [पुन: द्रव्यं इति] (वह ज्ञेयभूत) द्रव्य अर्थात् [आत्मा] आत्मा (स्वात्मा) [पर: च] और पर [परिणामसम्बद्ध] जो कि परिणाम वाले हैं ॥३६॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, यह व्यक्त करते हैं कि ज्ञान क्या है और ज्ञेय क्या है :-

    (पूर्वोक्त प्रकार) ज्ञानरूप से स्वयं परिणमित होकर स्वतंत्रतया ही जानता है इसलिये जीव ही ज्ञान है, क्योंकि अन्य द्रव्य इसप्रकार (ज्ञानरूप) परिणमित होने तथा जानने में असमर्थ हैं । और ज्ञेय, वर्त चुकी, वर्त रही और वर्तनेवाली ऐसी विचित्र पर्यायों की परम्परा के प्रकार से त्रिविध काल-कोटि को स्पर्श करता होने से अनादि-अनन्त ऐसा द्रव्य है । (आत्मा ही ज्ञान है और ज्ञेय समस्त द्रव्य हैं) वह ज्ञेयभूत द्रव्य आत्मा और पर (स्व और पर) ऐसे दो भेद से दो प्रकारका है । ज्ञान स्व-पर ज्ञायक है, इसलिये ज्ञेय की ऐसी द्विविधता मानी जाती है ।

    प्रश्न – अपने में क्रिया के हो सकने का विरोध है, इसलिये आत्मा के स्व-ज्ञायकता कैसे घटित होती है?

    उत्तर – कौन सी क्रिया है और किस प्रकार का विरोध है? जो यहाँ (प्रश्न में) विरोधी क्रिया कही गई है वह या तो उत्पत्ति-रूप होगी या ज्ञप्ति-रूप होगी । प्रथम, उत्पत्ति-रूप क्रिया तो 'कहीं स्वयं अपने में से उत्पन्न नहीं हो सकती' इस आगम-कथन से, विरुद्ध ही है; परन्तु ज्ञप्ति-रूप क्रिया में विरोध नहीं आता, क्योंकि वह, प्रकाशन क्रिया की भाँति, उत्पत्ति-क्रिया से विरुद्ध प्रकार से (भिन्न प्रकार से) होती है । जैसे जो प्रकाश्य-भूत पर को प्रकाशित करता है ऐसे प्रकाशक दीपक को स्व प्रकाश्य को प्रकाशित करने के सम्बन्ध में अन्य प्रकाशक की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि उसके स्वयमेव प्रकाशन क्रिया की प्राप्ति है; उसी प्रकार जो ज्ञेय-भूत पर को जानता है ऐसे ज्ञायक आत्मा को स्व-ज्ञेय के जानने के सम्बन्ध में अन्य ज्ञायक की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि स्वयमेव ज्ञान-क्रिया की प्राप्ति है । (इससे सिद्ध हुआ कि ज्ञान स्व को भी जान सकता है ।)

    प्रश्न – आत्मा को द्रव्यों की ज्ञानरूपता और द्रव्यों को आत्मा की ज्ञेयरूपता कैसे (किस प्रकार घटित) है?

    उत्तर – वे परिणाम-वाले होने से । आत्मा और द्रव्य परिणाम-युक्त हैं, इसलिये आत्मा के, द्रव्य जिसका आलम्बन हैं ऐसे ज्ञानरूप से (परिणति), और द्रव्यों के, ज्ञान का अवलम्बन लेकर ज्ञेयाकार-रूप से परिणति अबाधित रूप से तपती है-प्रतापवंत वर्तती है ।

    (आत्मा और द्रव्य समय- समय पर परिणमन किया करते हैं, वे कूटस्थ नहीं हैं; इसलिये आत्मा ज्ञान स्वभाव से और द्रव्य ज्ञेय स्वभाव से परिणमन करता है, इसप्रकार ज्ञान स्वभाव में परिणमित आत्मा ज्ञान के आलम्बनभूत द्रव्यों को जानता है और ज्ञेय-स्वभाव से परिणमित द्रव्य ज्ञेय के आलम्बनभूत ज्ञान में, आत्मा में, ज्ञात होते हैं ।) ॥३६॥

    कोई पर्याय स्वयं अपने में से उत्पन्न नहीं हो सकती, किन्तु वह द्रव्यके आधार से -- द्रव्य में से उत्पन्न होती है; क्योंकि यदि ऐसा न हो तो द्रव्यरूप आधार के बिना पर्यायें उत्पन्न होने लगें और जल के बिना तरंगें होने लगें; किन्तु यह सब प्रत्यक्ष विरुद्ध है; इसलिये पर्याय के उत्पन्न होने के लिये द्रव्यरूप आधार आवश्यक है । इसीप्रकार ज्ञान-पर्याय भी स्वयं अपने में से उत्पन्न नहीं हो सकती; वह आत्म-द्रव्य में से उत्पन्न हो सकती है - जो कि ठीक ही है । परन्तु ज्ञान पर्याय स्वयं अपने से ही ज्ञात नहीं हो सकती यह बात यथार्थ नहीं है । आत्म द्रव्य में से उत्पन्न होनेवाली ज्ञान-पर्याय स्वयं अपने से ही ज्ञात होती है । जैसे दीपक-रूपी आधार में से उत्पन्न होने वाली प्रकाश-पर्याय स्व-पर को प्रकाशित करती है, उसी प्रकार आत्मारूपी आधार में से उत्पन्न होनेवाली ज्ञान-पर्याय स्व-पर को जानती है । और यह अनुभव सिद्ध भी है कि ज्ञान स्वयं अपने को जानता है ।
    ज्ञान के ज्ञेयभूत द्रव्य आलम्बन अर्थात् निमित्त हैं । यदि ज्ञान ज्ञेय को न जाने तो ज्ञान का ज्ञानत्व क्या?
    ज्ञेय का ज्ञान आलम्बन अर्थात् निमित्त है । यदि ज्ञेय ज्ञान में ज्ञात न हो तो ज्ञेय का ज्ञेयत्व क्या?

    जयसेनाचार्य :
    अब आत्मा ज्ञान है और शेष ज्ञेय हैं, ऐसा निरूपण करते हैं -

    [तम्हा णाणं जीवो] - क्योंकि आत्मा ही उपादान रूप से ज्ञानरूप परिणमित है, उसी प्रकार पदार्थों को जानता है, ऐसा पहले गाथा (३६) में कहा था, अत: आत्मा ही ज्ञान है । आत्मा का ज्ञेय कौन है? द्रव्य आत्मा का ज्ञेय है । [तिहा समक्खादं] - और वह द्रव्य तीन कालवर्ती पर्यायों की परिणति रूप से अथवा द्रव्य-गुण-पर्याय रूप से और उसी प्रकार उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य रूप से तीन प्रकार का कहा गया है । [दव्वं ति पुणो आदा परं च] - और वह ज्ञेयभूत द्रव्य आत्मा और पर है । ज्ञेयभूत द्रव्य आत्मा और पर कैसे है? दीपक के समान ज्ञान स्व और पर को जानता है; अत: ज्ञेयभूत् द्रव्य स्व और पर हैं । और वे स्व-पर द्रव्य कैसे हैं? [परिणामसंबद्धं] - वे स्व-पर द्रव्य कथंचित् परिणामी हैं - यह अर्थ है ।

    यहाँ नैयायिक मत का अनुसरण करने वाला कोई कहता है - घट आदि के समान प्रमेयता होने से ज्ञान ज्ञानान्तर से (अन्य ज्ञान से) जानने योग्य है? आचार्य उसका निराकरण करते है - आपका यह कथन दीपक के साथ दोष को प्राप्त है । जिसप्रकार दीपक प्रमेय-परिच्छेद्य-ज्ञेय -- जानने योग्य होने पर भी दूसरे दीपक से प्रकाशित नही होता (अपितु स्वयं प्रकाशित है); उसी प्रकार ज्ञान भी स्वयं ही स्वयं को प्रकाशित करता है, दूसरे ज्ञान से प्रकाशित नही होता । यदि वह ज्ञान स्वयं को प्रकाशित न करता हुआ दूसरे ज्ञान से प्रकाशित हो तो आकाश व्यापी महान दुर्निवार अनवस्था प्राप्त होती है - यह गाथा का अर्थ है ।

    इसप्रकार निश्चय-श्रुतकेवली - व्यवहार-श्रुतकेवली कथन की मुख्यता से, भिन्न ज्ञान निराकरण और ज्ञान-ज्ञेय स्वरूप कथन से चौथे स्थल में चार गाथायें पूर्ण हुईं ।

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    + भूत-भावि पर्यायें वर्तमान ज्ञान में विद्यमान--वर्तमान की भांति दिखाई देती हैं -
    तक्कालिगेव सव्वे सदसब्भूदा हि पज्जया तासिं । (37)
    वट्‌टन्ते ते णाणे विसेसदो दव्वजादीणं ॥38॥
    तात्कालिका इव सर्वे सदसद्भूता हि पर्यायास्तासाम् ।
    वर्तन्ते ते ज्ञाने विशेषतो द्रव्यजातीनाम् ॥३७॥
    असद्भूत हों सद्भूत हों सब द्रव्य की पर्याय सब
    सद्ज्ञान में वर्तमानवत् ही हैं सदा वर्तमान सब ॥३८॥
    अन्वयार्थ : [तासाम् द्रव्यजातीनाम्‌] उन (जीवादि) द्रव्य-जातियों की [ते सर्वे] समस्त [सदसद्भूता: हि] विद्यमान और अविद्यमान [पर्याया:] पर्यायें [तात्कालिका: इव] तात्कालिक (वर्तमान) पर्यायों की भाँति, [विशेषत:] विशिष्टता-पूर्वक (अपने-अपने भिन्न-भिन्न स्वरूप में) [ज्ञाने वर्तन्ते] ज्ञान में वर्तती हैं ॥३७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसा उद्योत करते हैं कि द्रव्यों की अतीत और अनागत पर्यायें भी तात्कालिकपर्यायों की भाँति पृथक्रूप से ज्ञान में वर्तती हैं :-

    (जीवादिक) समस्त द्रव्य-जातियों की पर्यायों की उत्पत्ति की मर्यादा तीनों काल की मर्यादा जितनी होने से (वे तीनो-काल में उत्पन्न हुआ करती हैं इसलिये), उनकी (उन समस्त द्रव्य-जातियों की), क्रम-पूर्वक तपती हुई स्वरूप-सम्पदा वाली (एक के बाद दूसरी प्रगट होने वाली), विद्यमानता और अविद्यमानता को प्राप्त जो जितनी पर्यायें हैं, वे सब तात्कालिक (वर्तमान-कालीन) पर्यायों की भाँति, अत्यन्त मिश्रित होने पर भी सब पर्यायों के विशिष्ट लक्षण स्पष्ट ज्ञात हों इस प्रकार, एक क्षण में ही, ज्ञान-मंदिर में स्थिति को प्राप्त होती हैं । यह (तीनों काल की पर्यायों का वर्तमान पर्यायों की भाँति ज्ञान में ज्ञात होना) अयुक्त नहीं है; क्योंकि
    1. उसका दृष्टान्त के साथ (जगत में जो दिखाई देता है-अनुभव में आता है उसके साथ) अविरोध है । (जगत में) दिखाई देता है कि छद्मस्थ के भी, जैसे वर्तमान वस्तु का चिंतवन करते हुए ज्ञान उसके आकार का अवलम्बन करता है उसी प्रकार भूत और भविष्यत वस्तु का चितवन करते हुए (भी) ज्ञान उसके आकार का अवलम्बन करता है ।
    2. और ज्ञान चित्रपट के समान है । जैसे चित्रपट में अतीत, अनागत और वर्तमान वस्तुओं के आलेख्याकार साक्षात् एक क्षण में ही भासित होते हैं; उसीप्रकार ज्ञान-रूपी भित्ति में (ज्ञान-भूमिका में, ज्ञान-पट में) भी अतीत, अनागत और वर्तमान पर्यायों के ज्ञेयाकार साक्षात् एक क्षण में ही भासित होते हैं ।
    3. और सर्व ज्ञेयाकारों की तात्कालिकता (वर्तमानता, साम्प्रतिकता) अविरुद्ध है । जैसे नष्ट और अनुत्पन्न वस्तुओं के आलेख्याकार वर्तमान ही हैं, उसीप्रकार अतीत और अनागत पर्यायों के ज्ञेयाकार वर्तमान ही हैं ॥३७॥

    ज्ञान में समस्त द्रव्यों की तीनों-काल की पर्यायें एक ही साथ ज्ञात होने पर भी प्रत्येक पर्याय का विशिष्ट स्वरूप-प्रदेश, काल, आकार इत्यादि विशेषतायें-स्पष्ट ज्ञात होता है; संकर-व्यतिकर नहीं होते
    आलेख्य = आलेखन योग्य; चित्रित करने योग्य

    जयसेनाचार्य :
    (अब वर्तमान ज्ञान तीन काल को जानता है, इस तथ्य का प्रतिपादक पाँच गाथाओं में निबद्ध पाँचवां स्थल प्रारम्भ होता है)

    अब, भूत-भावि पर्यायें वर्तमान ज्ञान में विद्यमान--वर्तमान की भांति दिखाई देती हैं; ऐसा निरूपण करते हैं -

    [सव्वे सदसब्भूदा हि पज्जया] - जो सभी विद्यमान और अविद्यमान पर्यायें हैं, [हि] - वास्तव में, [वट्टन्ते ते] - वे पूर्वोक्त सभी पर्यायें वर्तती हैं, प्रतिभासित होती हैं, ज्ञात होती हैं । विद्यमान-अविद्यमान वे सभी पर्यायें कहाँ वर्तती हैं? [णाणे]- वे सभी पर्यायें केवलज्ञान में वर्तती हैं । वे पर्यायें किसके समान केवलज्ञान में वर्तती हैं? [तक्कालिगेव] - वे वर्तमान पर्यायों के समान केवलज्ञान में वर्तती हैं । वे पर्यायें किनसे सम्बन्धित--किनकी हैं? [तासिं दव्वजादीणं] - उन प्रसिद्ध शुद्ध जीवद्रव्य आदि द्रव्य-जातियों--समूहों की वे पर्यायें हैं । केवलज्ञान में एक साथ वर्तते हुये भी वे सभी पर्यायें परस्पर सम्बन्ध रहित हैं । युगपत् वर्तती हुई वे पर्यायें सम्बन्ध रहित कैसे हैं? [विसेसदो] - अपने-अपने प्रदेश, काल, आकार रूप विशेषों के द्वारा संकर, व्यतिकर दोषों के निराकरण रूप रहने के कारण वे सर्व पर्यायें परस्पर सम्बन्ध रहित हैं - यह अर्थ है ।

    विशेष यह है कि जैसे मन में विचार करते हुये छद्मस्थ पुरुष के भूत-भावि पर्यायें स्फुरायमान होती हैं, और जैसे चित्र-दीवाल पर (दीवाल पर बने हुये चित्रों में) बाहुबली-भरत आदि भूतकालीन रूप और श्रेणिक-तीर्थंकर आदि भावि रूप वर्तमान के समान प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं, उसीप्रकार चित्र-दीवाल के स्थानीय (समान) केवलज्ञान में भूत-भावि पर्यायें एक साथ प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं, एक साथ दिखाई देने में कुछ भी विरोध नही है ।

    जैसे ये केवली भगवान परद्रव्य-पर्यायों को जानकारी मात्र से जानते हैं, तन्मयरूप से नहीं, निश्चय से केवलज्ञानादि गुणों की आधारभूत अपनी सिद्ध-पर्याय को ही केवली-भगवान स्वसंवित्ति आकार से तन्मय होकर जानते हैं; उसीप्रकार आसन्न-भव्य जीव को भी निज शुद्धात्मा के सम्यक्श्रद्धान, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र रूप निश्चय रत्नत्रय पर्याय ही सर्व प्रयोजन से जानने योग्य है - यह तात्पर्य है ।

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    + भूत-भावि पर्यायों की असद्भूत--अविद्यमान संज्ञा है -
    जे णेव हि संजाया जे खलु णट्‌ठा भवीय पज्जया । (38)
    ते होंति असब्भूदा पज्जाया णाणपच्चक्खा ॥39॥
    ये नैव हि संजाता ये खलु नष्टा भूत्वा पर्यायाः ।
    ते भवन्ति असद्भूताः पर्याया ज्ञानप्रत्यक्षाः ॥३८॥
    पर्याय जो अनुत्पन्न हैं या नष्ट जो हो गई हैं
    असद्भावी वे सभी पर्याय ज्ञानप्रत्यक्ष हैं ॥३९॥
    अन्वयार्थ : [ये पर्याया:] जो पर्यायें [हि] वास्तव में [न एव संजाता:] उत्पन्न नहीं हुई हैं, तथा [ये] जो पर्यायें [खलु] वास्तव में [भूत्वा नष्टा:] उत्पन्न होकर नष्ट हो गई हैं, [ते] वे [असद्भूता: पर्याया:] अविद्यमान पर्यायें [ज्ञानप्रत्यक्षा: भवन्ति] ज्ञान प्रत्यक्ष हैं ॥३८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, अविद्यमान पर्यायों की (भी) कथंचित् (किसी प्रकार से; किसी अपेक्षा से) विद्यमानता बतलाते हैं :-

    जो (पर्यायें) अभी तक उत्पन्न भी नहीं हुई और जो उत्पन्न होकर नष्ट हो गई हैं, वे (पर्यायें) वास्तव में अविद्यमान होने पर भी, ज्ञान के प्रति नियत होने से (ज्ञान में निश्चित-स्थिर-लगी हुई होने से, ज्ञान में सीधी ज्ञात होने से) *ज्ञानप्रत्यक्ष वर्तती हुई, पाषाण स्तम्भ में उत्कीर्ण, भूत और भावी देवों (तीर्थकर-देवो) की भाँति अपने स्वरूप को अकम्पतया (ज्ञान को) अर्पित करती हुई (वे पर्यायें) विद्यमान ही हैं ॥३८॥

    *प्रत्यक्ष = अक्ष के प्रति-अक्ष के सन्यूख-अक्ष के निकट में- अक्ष के सम्बन्ध में हो ऐसा, अक्ष = ज्ञान; आत्मा

    जयसेनाचार्य :
    [जे णेव हि संजाया जे खलु णट्ठा भवीय पज्जाया] - जो आज तक उत्पन्न नहीं हुई हैं, अर्थात् भविष्य-कालीन पर्यायें और वास्तव में नष्ट हुई पर्यायें । वे पर्यायें क्या करके नष्ट हुई हैं ? उत्पन्न हो कर वे पर्यायें नष्ट हुई हैं । [ते होंति असब्भूदा पज्जाया] - वे पूर्वोक्त भूत-भावि पर्यायें विद्यमान नहीं होने से असद्भूत कही जाती हैं । [णाणपच्चक्खा] - विद्यमान नहीं होने से वे असद्भूत हैं तो भी वर्तमान ज्ञान की विषय होने के कारण व्यवहार से भूतार्थ कही जाती हैं, और उसीप्रकार वे ज्ञान प्रत्यक्ष भी होती हैं ।

    जैसे ये भगवान निश्चय से परमानन्द एक लक्षण सुख स्वभावमय मोक्ष-पर्याय को ही तन्मयतापूर्वक जानते हैं परद्रव्य-पर्यायों को तो व्यवहार से जानते हैं; उसीप्रकार आत्मा की भावना करने वाले पुरुष के द्वारा रागादि विकल्पों की उपाधि रहित स्वसंवेदन पर्याय ही प्रधानता से जानने योग्य है, बाह्य द्रव्य और पर्यायें तो गौणरूप से हैं - यह भाव है ।

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    + वर्तमान ज्ञान के असद्भूत पर्यायों का प्रत्यक्षपना दृढ़ करते हैं -
    जदि पच्चक्खमजादं पज्जयं पलयिदं च णाणस्स । (39)
    ण हवदि वा तं णाणं दिव्वं ति हि के परूवेंति ॥40॥
    यदि प्रत्यक्षोऽजातः पर्यायः प्रलयितश्च ज्ञानस्य ।
    न भवति वा तत् ज्ञानं दिव्यमिति हि के प्ररूपयन्ति ॥३९॥
    पर्याय जो अनुत्पन्न हैं या हो गई हैं नष्ट जो
    फिर ज्ञान की क्या दिव्यता यदि ज्ञात होवें नहीं वो ॥४०॥
    अन्वयार्थ : [यदि वा] यदि [अजात: पर्याय:] अनुत्पन्न पर्याय [च] तथा [प्रलयितः] नष्ट पर्याय [ज्ञानस्य] ज्ञान के (केवलज्ञान के) [प्रत्यक्ष: न भवति] प्रत्यक्ष न हो तो [तत् ज्ञानं] उस ज्ञान को [दिव्यं इति हि] 'दिव्य' [के प्ररूपयंति] कौन प्ररूपेगा? ॥३९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, इन्हीं अविद्यमान पर्यायों की ज्ञानप्रत्यक्षता को दृढ़ करते हैं :-

    जिसने अस्तित्व का अनुभव नहीं किया और जिसने अस्तित्व का अनुभव कर लिया है ऐसी (अनुत्पन्न और नष्ट) पर्याय-मात्र को यदि ज्ञान अपनी निर्विघ्न विकसित, अखंडित प्रताप-युक्त प्रभु-शक्ति के (महा सामर्थ्य) द्वारा बलात् अत्यन्त आक्रमित करे (प्राप्त करे), तथा वे पर्यायें अपने स्वरूप-सर्वस्व को अक्रम से अर्पित करें (एक ही साथ ज्ञानमें ज्ञात हों) इसप्रकार उन्हें अपने प्रति नियत न करे (अपने में निश्चित न करे, प्रत्यक्ष न जाने), तो उस ज्ञानकी दिव्यता क्या है? इससे (यह कहा गया है कि) पराकाष्ठा को प्राप्त ज्ञान के लिये यह सब योग्य है ॥३९॥

    जयसेनाचार्य :
    [जइ पच्चक्खमजायं पज्जायं पलइयं च णाणस्स ण हवदि वा] - यदि प्रत्यक्ष नहीं है । वह कौन प्रत्यक्ष नहीं है ? भविष्यकालीन पर्याय । भविष्यकालीन पर्याय ही नहीं, अपितु भूतकालीन पर्याय भी । भूत-भावि पर्याय किसके प्रत्यक्ष नहीं है? भूत-भावि पर्याय ज्ञान (केवलज्ञान) के प्रत्यक्ष नहीं है (तो)[तं णाणं दिव्वं ति हि के परूवेंति] - उस ज्ञान को दिव्य कौन कहेगें? कोई भी नहीं कहेगें ।

    वह इसप्रकार - क्रम और साधन सम्बन्धी बाधा से रहित होने के कारण यदि ज्ञानरूप कर्ता वर्तमान पर्याय के समान भूत-भावि पर्यायों को साक्षात् प्रत्यक्ष नहीं करता, तो वह ज्ञान दिव्य नहीं है । वास्तव में वह ज्ञान ही नहीं है ।

    जैसे, केवली भगवान यद्यपि परद्रव्य-पर्यायों को जानकारी-मात्र से जानते हैं, तथापि निश्चयनय से सहजानन्द एक स्वभावी स्वशुद्धात्मा में तन्मयरूप से उसकी जानकारी करते हैं; उसी प्रकार निर्मल भेदज्ञानी जीव भी यद्यपि व्यवहार से परद्रव्य-गुण-पर्यायों का ज्ञान करते हैं, तथापि निश्चय से स्व-विषय होने से निर्विकार स्वसंवेदन पर्याय में पर्याय द्वारा परिज्ञान करते हैं - यह गाथा का तात्पर्य है ।

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    + भूत-भावि सूक्ष्मादि पदार्थों को इन्द्रिय ज्ञान नहीं जानता है -
    अत्थं अक्खणिवदिदं ईहापुव्वेहिं जे विजाणंति । (40)
    तेसिं परोक्खभूदं णादुमसक्कं ति पण्णत्तं ॥41॥
    अर्थमक्षनिपतितमीहापूर्वैर्ये विजानन्ति ।
    तेषां परोक्षभूतं ज्ञातुमशक्यमिति प्रज्ञप्तम् ॥४०॥
    जो इन्द्रियगोचर अर्थ को ईहादिपूर्वक जानते
    वे परोक्ष पदार्थ को जाने नहीं जिनवर कहें ॥४१॥
    अन्वयार्थ : [ये] जो [अक्षनिपतितं] अक्षपतित अर्थात् इन्द्रिय-गोचर [अर्थं] पदार्थ को [ईहापूवैं:] ईहादिक द्वारा [विजानन्ति] जानते हैं, [तेषां] उनके लिये [परोक्षभूतं] परोक्षभूत पदार्थ को [ज्ञातुं] जानना [अशक्यं] अशक्य है [इति प्रज्ञप्तं] ऐसा सर्वज्ञ-देव ने कहा है ॥४०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, इन्द्रियज्ञान के लिये नष्ट और अनुत्पन्न का जानना अशक्य है (अर्थात् इन्द्रियज्ञान नष्ट और अनुत्पन्न पदार्थों को-पर्यायों को नहीं जान सकता) ऐसा न्याय से निश्चित करते हैं -

    विषय और विषयी का सन्निपात जिसका लक्षण (स्वरूप) है, ऐसे इन्द्रिय और पदार्थ के सन्निकर्ष को प्राप्त करके, जो अनुक्रम से उत्पन्न ईहादिक के क्रम से जानते हैं वे उसे नहीं जान सकते जिसका स्व-अस्तित्व काल बीत गया है तथा जिसका स्व-अस्तित्वकाल उपस्थित नहीं हुआ है क्योंकि (अतीत-अनागत पदार्थ और इन्द्रिय के) यथोक्त लक्षण (यथोक्तस्वरूप, ऊपर कहा गया जैसा) ग्राह्यग्राहक सम्बन्ध का असंभव है ।

    सन्निपात = मिलाप; संबंध होना वह
    सन्निकर्ष = सम्बन्ध; समीपता
    इन्द्रियगोचर पदार्थ ग्राह्य है और इन्द्रियाँ ग्राहक हैं

    जयसेनाचार्य :
    [अत्थं] - घट, पट आदि ज्ञेय पदार्थ । वे ज्ञेय पदार्थ कैसे हैं ? [अक्खणिवदिदं] - इन्द्रियों से सम्बन्धित वे पदार्थ हैं । इसप्रकार के पदार्थ को [ईहापुब्व्वेहिं जे विजाणंति] - जो पुरुष अवग्रह, ईहा, अवाय, धारणा आदि क्रम से वास्तव में जानते हैं । [तेसिं परोक्खभूदं] - उनका वह ज्ञान परोक्ष होता हुआ [णादुमसक्कं ति पण्णत्तं] - सूक्ष्मादि पदार्थों को जानने में असमर्थ है - ऐसा कहा है । वह परोक्ष ज्ञान उनको जानने में असमर्थ है - ऐसा किनने कहा है? ऐसा ज्ञानियों ने कहा है ।

    वह इसप्रकार - नेत्र आदि इन्द्रियाँ घट, पट आदि पदार्थो के निकट जाकर बाद में पदार्थ को जानती हैं - ऐसा सन्निकर्ष का लक्षण नैयायिक मत में कहा गया है । अथवा संक्षेप से, इन्द्रिय और पदार्थ का सम्बन्ध ही सन्निकर्ष है, और वही प्रमाण है । और वह सन्निकर्ष उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म परकीय मनोवृत्ति तथा पुद्गल परमाणु आदि में प्रवृत्ति नही करता । सन्निकर्ष इन विषयों में प्रवृत्ति क्यों नही करता ? इन्द्रियों से स्थूल विषय और मूर्तिक विषय मात्र ज्ञात होने के कारण इन विषयों मे सन्निकर्ष प्रवृत्ति नहीं करता । इस कारण इन्द्रिय ज्ञान से सर्वज्ञ नही होते हैं ।

    इसलिये ही अतीन्द्रिय ज्ञान की उत्पत्ति के कारणभूत, रागादि विकल्प रहित, स्वसंवेदन ज्ञान को छोड़कर जो पंचेन्द्रिय-सुख के साधनभूत इन्द्रिय ज्ञान में और विविध इच्छाओं के विकल्प-जालरूप मानस ज्ञान में स्नेह करते हैं, वे सर्वज्ञ-पद प्राप्त नहीं करते - यह गाथा का अभिप्राय है ।

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    + अतीन्द्रिय ज्ञान भूत-भावि सूक्ष्मादि पदार्थों को जानता है -
    अपदेसं सपदेसं मुत्तममुत्तं च पज्जयमजादं । (41)
    पलयं गदं च जाणदि तं णाणमदिंदियं भणियं ॥42॥
    अप्रदेशं सप्रदेशं मूर्तममूर्तं च पर्ययमजातम् ।
    प्रलयं गतं च जानाति तज्ज्ञानमतीन्द्रियं भणितम् ॥४१॥
    सप्रदेशी अप्रदेशी मूर्त और अमूर्त को
    अनुत्पन्न विनष्ट को जाने अतीन्द्रिय ज्ञान ही ॥४२॥
    अन्वयार्थ : [अप्रदेशं] जो ज्ञान अप्रदेश को, [सप्रदेशं] सप्रदेश को, [मूर्तं] मूर्त को, [अमूर्त: च] और अमूर्त को तथा [अजातं] अनुत्पन्न [च] और [प्रलयंगतं] नष्ट [पर्यायं] पर्याय को [जानाति] जानता है, [तत् ज्ञानं] वह ज्ञान [अतीन्द्रियं] अतीन्द्रिय [भणितम्‌] कहा गया है ॥४१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसा स्पष्ट करते हैं कि अतीन्द्रिय-ज्ञान के लिये जो जो कहा जाता है वह (सब) संभव है :-

    इन्द्रिय-ज्ञान उपदेश, अन्तःकरण और इन्द्रिय इत्यादि को विरूप-कारणता से (ग्रहण करके) और उपलब्धि (क्षयोपशम), संस्कार इत्यादिको अंतरंग स्वरूप-कारणता से ग्रहण करके प्रवृत्त होता है; और वह प्रवृत्त होता हुआ सप्रदेश को ही जानता है क्योंकि वह स्थूल को जाननेवाला है, अप्रदेश को नहीं जानता, (क्योंकि वह सूक्ष्म को जाननेवाला नहीं है); वह मूर्त को ही जानता है क्योंकि वैसे (मूर्तिक) विषय के साथ उसका सम्बन्ध है, वह अमूर्त को नहीं जानता (क्योंकि अमूर्तिक विषय के साथ इन्द्रियज्ञान का सम्बन्ध नहीं है); वह वर्तमान को ही जानता है, क्योंकि विषय-विषयी के सन्निपात सद्भाव है, वह प्रवर्तित हो चुकनेवाले को और भविष्य में प्रवृत्त होनेवाले को नहीं जानता (क्योंकि इन्द्रिय और पदार्थ के सन्निकर्ष का अभाव है)

    परन्तु जो अनावरण अतीन्द्रिय ज्ञान है उसे अपने अप्रदेश, सप्रदेश, मूर्त और अमूर्त (पदार्थ मात्र) तथा अनुत्पन्न एवं व्यतीत पर्यायमात्र, ज्ञेयता का अतिक्रमण न करने से ज्ञेय ही है-जैसे प्रज्वलित अग्नि को अनेक प्रकार का ईंधन, दाह्यता का अतिक्रमण न करने से दाह्य ही है । (जैसे प्रदीप्त अग्नि दाह्यमात्र को-ईंधनमात्र को - जला देती है, उसीप्रकार निरावरण ज्ञान ज्ञेयमात्र को - द्रव्य-पर्याय मात्र को - जानता है)

    विरूप = ज्ञान के स्वरूप से भिन्न स्वरूपवाले । (उपदेश, मन और इन्द्रियाँ पौद्गलिक होने से उनका रूप ज्ञान के स्वरूप से भिन्न है । वे इन्द्रियज्ञान में बहिरंग कारण हैं)
    उपलब्धि = ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम के निमित्त से पदार्थों को जानने की शक्ति (यह 'लब्ध' शक्ति जब 'उपयुक्त' होती हैं तभी पदार्थ जानने में आते है)
    संस्कार = भूतकाल में जाने हुये पदार्थों की धारणा ।

    जयसेनाचार्य :
    [अपदेसं] अप्रदेशी--कालाणु, परमाणु आदि (एक प्रदेशी द्रव्य), [सपदेसं] शुद्ध जीवास्तिकाय आदि पाँच अस्तिकाय स्वरूप (बहुप्रदेशी द्रव्य), [मुत्तं] मूर्तिक पुद्गल द्रव्य, [अमुत्तं च] और शुद्ध जीव द्रव्यादि अमूर्तिक द्रव्य [पज्जयमजादं पलयं गयं च] अनुत्पन्न भावि तथा नष्ट हुई भूतकालीन पर्यायें -- पूर्वोक्त इन सभी ज्ञेय वस्तुओं को, [जाणदि] जो ज्ञानरूप कर्ता जानता है, [तं णाणमदिंदियं भणियं] उस ज्ञान को अतीन्द्रिय ज्ञान कहते हैं उससे ही सर्वज्ञ होते हैं ।

    इसलिये पहले (४१ वी) गाथा में कहे गये इन्द्रिय-ज्ञान और मानस-ज्ञान को छोड़कर जो समस्त विभाव परिणामों के त्याग पूर्वक निर्विकल्प समाधिरूप स्वसंवेदन-ज्ञान में प्रीति करते हैं, वे ही परमाह्लाद एक लक्षण स्वभाव वाले सर्वज्ञ पद को प्राप्त करते हैं - यह अभिप्राय है ।

    इसप्रकार भूत-भावि पर्यायें वर्तमान ज्ञान में प्रत्यक्ष नहीं होती है - इस मान्यता वाले बौद्धमत के निराकरण की मुख्यता से तीन गाथायें, और उसके बाद नैयायिक मतानुसारि शिष्य के सम्बोधन के लिए इन्द्रिय-ज्ञान से सर्वज्ञ नहीं होते अतीन्द्रिय-ज्ञान से सर्वज्ञ होते हैं - इसप्रकार दो गाथायें -- इसप्रकार समूहरूप से पाँचवें स्थल में पाँच गाथायें पूर्ण हुईं ।

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    + जिसके कर्मबन्ध के कारणभूत हितकारी-अहितकारी विकल्परूप से, जानने योग्य विषयों में परिणमन है, उसके क्षायिकज्ञान नहीं है -
    परिणमदि णेयमट्ठं णादा जदि णेव खाइगं तस्स । (42)
    णाणं ति तं जिणिंदा खवयंतं कम्ममेवुत्ता ॥43॥
    परिणमति ज्ञेयमर्थं ज्ञाता यदि नैव क्षायिकं तस्य ।
    ज्ञानमिति तं जिनेन्द्राः क्षपयन्तं कर्मैवोक्तवन्तः ॥४२॥
    ज्ञेयार्थमय जो परिणमे ना उसे क्षायिक ज्ञान हो
    कहें जिनवरदेव कि वह कर्म का ही अनुभवी ॥४३॥
    अन्वयार्थ : [ज्ञाता] ज्ञाता [यदि] यदि [ज्ञेयं अर्थं] ज्ञेय पदार्थ-रूप [परिणमति] परिणमित होता हो तो [तस्य] उसके [क्षायिकं ज्ञानं] क्षायिक ज्ञान [न एव इति] होता ही नहीं । [जिनेन्द्रा:] जिनेन्द्र देवों ने [तं] उसे [कर्म एव] कर्म को ही [क्षपयन्तं] अनुभव करने वाला [उक्तवन्तः] कहा है ॥४२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसी श्रद्धा व्यक्त करते हैं कि ज्ञेय पदार्थरूप परिणमन जिसका लक्षण है ऐसी (ज्ञेयार्थ-परिणमन-स्वरूप) क्रिया ज्ञान में से उत्पन्न नहीं होती :-

    यदि ज्ञाता ज्ञेय पदार्थरूप परिणमित होता हो, तो उसे सकल कर्म-वन के क्षय से प्रवर्तमान स्वाभाविक जानपने का कारण (क्षायिक ज्ञान) नहीं है; अथवा उसे ज्ञान ही नहीं है; क्योंकि प्रत्येक पदार्थरूप से परिणति के द्वारा मृगतृष्णा में जलसमूह की कल्पना करने की भावना वाला वह (आत्मा) अत्यन्त दुःसह कर्म-भार को ही भोगता है ऐसा जिनेन्द्रों ने कहा है ॥४२॥

    जयसेनाचार्य :
    (अब छठवॉ स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब राग-द्वेष-मोह बंध के कारण हैं, ज्ञान नही - इत्यादि कथनरूप से पाँच गाथा पर्यन्त व्याख्यान करते हैं । वह इसप्रकार है -

    [परिणमदि णेयमट्ठम् णादा जदि] - यदि ज्ञाता आत्मा यह नीला, यह पीला इत्यादि विकल्प-रूप से ज्ञेय-पदार्थों के प्रति परिणमन करता है, [णेव खाइगं तस्स णाणं ति] - तो उस आत्मा को क्षायिक-ज्ञान नहीं है । अथवा ज्ञान ही नही है । ज्ञेयार्थ परिणत उस आत्मा को ज्ञान कैसे नहीं है? [तं जिणिन्दा खवयंतं कम्ममेवुत्ता] - उस कर्मतापन्न पुरुष को (कर्म कारक में प्रयुक्त पुरुष को) जिनेन्द्र-भगवानरूपी कर्ता कहते हैं । जिनेन्द्र-भगवान उस पुरुष को क्या करता हुआ कहते हैं? वे उसे अनुभव करता हुआ कहते हैं । वे उसे किसका अनुभव करता हुआ ही कहते हैं? वे उसे कर्म का अनुभव करता हुआ ही कहते हैं । निर्विकार सहजानन्द एक सुख-स्वभाव के अनुभव से रहित होता हुआ वह उदय में आये हुये अपने कर्मों का ही अनुभव करता रहता है, ज्ञान का अनुभव नहीं करता - यह अर्थ है ।

    अथवा दूसरा व्याख्यान - यदि ज्ञाता, पदार्थ के प्रति परिणमन कर बाद में पदार्थ को जानता है तो पदार्थों के अनन्त होने से (उसे) सभी पदार्थों की जानकारी नहीं है ।

    अथवा तीसरा व्याख्यान - छद्मस्थ-अवस्था में जब बाह्य ज्ञेय पदार्थों का विचार किया जाता है, तब रागादि विकल्प रहित स्वसंवेदन ज्ञान नहीं है, उसके अभाव में क्षायिक ज्ञान ही उत्पन्न नहीं होता है - यह अभिप्राय है ।

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    + ज्ञान और रागादि रहित कर्म का उदय बंध का कारण नहीं है -
    उदयगदा कम्मंसा जिणवरवसहेहिं णियदिणा भणिया । (43)
    तेसु विमूढो रत्तो दुट्‌ठो वा बंधमणुभवदि ॥44॥
    उदयगताः कर्मांशा जिनवरवृषभैः नियत्या भणिताः ।
    तेषु विमूढो रक्तो दुष्टो वा बन्धमनुभवति ॥४३॥
    जिनवर कहें उसके नियम से उदयगत कर्मांश हैं
    वह राग-द्वेष-विमोह बस नित बंध का अनुभव करे ॥४४॥
    अन्वयार्थ : [उदयगता: कर्मांशा:] (संसारी जीव के) उदय-प्राप्त कर्मांश (ज्ञानावरणीय आदि पुद्गल-कर्म के भेद) [नियत्या] नियम से [जिनवरवृषभै:] जिनवर वृषभों ने [भणिता:] कहे हैं । [तेषु] जीव उन कर्मांशों के होने पर [विमूढ: रक्त: दुष्ट: वा] मोही, रागी अथवा द्वेषी होता हुआ [बन्धं अनुभवति] बन्ध का अनुभव करता है ॥४३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    (यदि ऐसा है) तो फिर ज्ञेय पदार्थरूप परिणमन जिसका लक्षण है ऐसी(ज्ञेयार्थ-परिणमनस्वरूप) क्रिया और उसका फल कहाँ से (किस कारण से) उत्पन्न होता है, ऐसा अब विवेचन करते हैं :-

    प्रथम तो, संसारी के नियम से उदयगत पुद्गल कर्मांश होते ही हैं । अब वह संसारी, उन उदयगत कर्मांशों के अस्तित्व में, चेतते-जानते- अनुभव करते हुए, मोह-राग- द्वेष में परिणत होने से ज्ञेय पदार्थों में परिणमन जिसका लक्षण है ऐसी (ज्ञेयार्थ परिणमन-स्वरूप) क्रिया के साथ युक्त होता है; और इसीलिये क्रिया के फलभूत बन्ध का अनुभव करता है । इससे (ऐसा कहा है कि) मोह के उदय से ही (मोह के उदय में युक्त होने के कारण से ही) क्रिया और क्रिया फल होता है, ज्ञान से नहीं ॥४३॥

    जयसेनाचार्य :
    अब, अनन्त पदार्थों की जानकारी रूप से परिणत होने पर भी ज्ञान बंध का कारण नहीं है, इसी प्रकार रागादि रहित कर्म का उदय भी बंध का कारण नहीं है; ऐसा निश्चित करते हैं -

    [उदयगदा कम्मंसा जिणवरवसहेहिं णियदिणा भणिया] उदय को प्राप्त ज्ञानावरणादि मूल-उत्तर कर्म प्रकृति भेद वाले कर्मांश तीर्थंकरों ने स्वभाव से कहे हैं, किन्तु (वे) अपने-अपने शुभाशुभ फल को देकर चले जाते हैं, रागादि परिणामों से रहित होने पर बंध नहीं करते हैं । तो फिर जीव बंध कैसे करता है? यदि यह प्रश्न हो तो? [तेसु विमूढो रत्तो दुट्ठो वा बन्धमणुभवदि] मोह, राग, द्वेष से विलक्षण निज शुद्धात्मतत्व की भावना से रहित होता हुआ उदय में आये हुये कर्मांशों में विशेष रूप से मोह, राग, द्वेष रूप होता है, वह केवलज्ञानादि अनन्त गुणों की प्रगटता स्वरूप मोक्ष से विलक्षण प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश भेदवाले बंध का अनुभव करता है ।

    इससे यह निश्चय हुआ कि ज्ञान बंध का कारण नहीं, इसी प्रकार कर्म का उदय भी बंध का कारण नहीं है; किन्तु रागादि बंध के कारण हैं ।

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    + केवली के रागादि का अभाव होने से धर्मोपदेशादि भी बंध के कारण नहीं हैं -
    ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य णियदयो तेसिं । (44)
    अरहंताणं काले मायाचारो व्व इत्थीणं ॥45॥
    ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य णियदयो तेसिं ।
    अरहंताणं काले मायाचारो व्व इत्थीणं ॥४४॥
    यत्न बिन ज्यों नारियों में सहज मायाचार त्यों
    हो विहार उठना-बैठना अर दिव्यध्वनि अरिहंत के ॥४५॥
    अन्वयार्थ : [तेषाम् अर्हता] उन अरहन्त भगवन्तों के [काले] उस समय [स्थाननिषद्याविहारा:] खड़े रहना, बैठना, विहार [धर्मोपदेश: च] और धर्मोपदेश- [स्त्रीणां मायाचार: इव] स्त्रियों के मायाचार की भाँति, [नियतय:] स्वाभाविक ही-प्रयत्न बिना ही- होता है ॥४४॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसा उपदेश देते हैं कि केवली-भगवान के क्रिया भी क्रिया-फल (बन्ध) उत्पन्न नहीं करती :-

    जैसे स्त्रियों के, प्रयत्न के बिना भी, उस प्रकार योग्यता का सद्धाव होने से स्वभावभूत ही माया के ढक्कन से ढँका हुआ व्यवहार प्रवर्तता है, उसी प्रकार केवली भगवान के, प्रयत्न के बिना ही (प्रयत्न न होने पर भी) उस प्रकार की योग्यता का सद्धाव होने से खड़े रहना, बैठना, विहार और धर्मदेशना स्वभावभूत ही प्रवर्तते हैं और यह (प्रयत्न के बिना ही विहारादि का होना), बादल के दृष्टान्त से अविरुद्ध है । जैसे बादल के आकाररूप परिणमित पुद्गलों का गमन, स्थिरता, गर्जन और जलवृष्टि पुरुष-प्रयत्न के बिना भी देखी जाती है, उसीप्रकार केवली-भगवान के खड़े रहना इत्यादि अबुद्धिपूर्वक ही (इच्छा के बिना ही) देखा जाता है । इसलिये यह स्थानादिक (खड़े रहने-बैठने इत्यादि का व्यापार), मोहोदय-पूर्वक न होने से, क्रिया-विशेष (क्रिया के प्रकार) होने पर भी केवली भगवान के क्रिया-फलभूत बन्ध के साधन नहीं होते ॥४४॥

    जयसेनाचार्य :
    [ठाणणिसेज्जविहारा धम्मुवदेसो य] स्थान--ऊपर स्थिति--खड़ा होना, [निषद्या] आसन--बैठना, श्रीविहार और धर्मोपदेश [णियदयो] ये क्रियायें स्वाभाविक--बिना इच्छा के होती हैं । ये क्रियायें स्वाभाविक किनके होती है ? [तेसिं अरहंताणं] उन अरहन्त निर्दोषी परमात्मा के ये क्रियायें स्वाभाविक होती हैं । उनके ये कब होती हैं ? [काले] अरहन्त अवस्था में उनके ये होती हैं । उनके ये क्रियायें किसके समान होती हैं? [मायाचारो व्व ड़त्थीणं] स्त्रियों के मायाचार के समान उनके ये क्रियायें होती हैं ।

    वह इसप्रकार - जैसे स्त्रीवेद के उदय का सद्भाव होने से स्त्रियों के प्रयत्न के बिना भी मायाचार होता है, उसी प्रकार शुद्धात्म-तत्व के विरोधी मोह के उदय में होने वाले इच्छा पूर्वक प्रयत्न-रूप कार्य का अभाव होने पर भी भगवान के श्रीविहारादि होते हैं । अथवा बादलों के ठहरने, गमन करने, गरजने, पानी बरसाने आदि के समान भगवान के ये क्रियायें सहज होती हैं ।

    इससे यह सिद्ध हुआ कि मोहादि का अभाव होने पर क्रिया विशेष भी बंध का कारण नहीं है ।

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    + रागादि रहित कर्मोदय तथा विहारादि क्रिया बंध का कारण नहीं है -
    पुण्णफला अरहंता तेसिं किरिया पुणो हि ओदइया । (45)
    मोहादीहिं विरहिदा तम्हा सा खाइग त्ति मदा ॥46॥
    पुण्यफला अर्हन्तस्तेषां क्रिया पुनर्हि औदयिकी ।
    मोहादिभिः विरहिता तस्मात् सा क्षायिकीति मता ॥४५॥
    पुण्यफल अरिहंत जिन की क्रिया औदयिकी कही
    मोहादि विरहित इसलिए वह क्षायिकी मानी गई ॥४६॥
    अन्वयार्थ : [अर्हन्तः] अरहन्त भगवान [पुण्यफला:] पुण्य-फल वाले हैं [पुन: हि] और [तेषां क्रिया] उनकी क्रिया [औदयिकी] औदयिकी है; [मोहादिभि: विरहिता] मोहादि से रहित है [तस्मात्] इसलिये [सा] वह [क्षायिकी] क्षायिकी [इति मता] मानी गई है ॥४५॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    इसप्रकार होने से तीर्थंकरों के पुण्य का विपाक अकिंचित्कर ही है (कुछ करता नहीं है, स्वभाव का किंचित् घात नहीं करता) ऐसा अब निश्चित करते हैं :-

    अरहन्त भगवान जिनके वास्तव में पुण्यरूपी कल्पवृक्ष के समस्त फल भली-भाँति परिपक्व हुए हैं ऐसे ही हैं, और उनकी जो भी क्रिया है वह सब उसके (पुण्य के) उदय के प्रभाव से उत्पन्न होने के कारण औदयिकी ही है । किन्तु ऐसी (पुण्य के उदय से होनेवाली) होने पर भी वह सदा औदयिकी क्रिया महा-मोहराजा की समस्त सेना के सर्वथा क्षय से उत्पन्न होती है इसलिये मोह-राग-द्वेष रूपी *उपरंजकों का अभाव होने से चैतन्य के विकार का कारण नहीं होती इसलिये कार्यभूत बन्ध की अकारणभूतता से और कार्यभूत मोक्ष की कारणभूतता से क्षायिकी ही क्यों न माननी चाहिये? (अवश्य माननी चाहिये) और जब क्षायिकी ही माने तब कर्मविपाक (कर्मोदय) भी उनके (अरहन्तों के) स्वभाव-विघात का कारण नहीं होता (ऐसे निश्चित होता है) ॥४५॥

    *उपरंजकों = उपराग-मलिनता करनेवाले (विकारीभाव)

    जयसेनाचार्य :
    अब रागादि रहित कर्मोदय तथा विहारादि क्रिया बंध का कारण नहीं है - ऐसा जो पहले (४४- ४५ वीं गाथा में) कहा था; उसी अर्थ को अन्य प्रकार से दृढ़ करते हैं -

    [पुण्यफला अरहंता] महाकल्याणक पूजा को उत्पन्न करने वाला, तीनों लोकों में विजय को करने वाला जो तीर्थंकर नामक पुण्य नामकर्म, उसके फलस्वरूप अरहन्त तीर्थंकर होते हैं । [तेसिं किरिया पुणो हि ओदइया] उनकी जो दिव्यध्वनि-रूप वचन व्यापारादि क्रिया, वह निःक्रिय शुद्धात्म-तत्व से विपरीत कर्मोदय से उत्पन्न होने के कारण वास्तव में सब ही औदयिकी है । [मोहादीहिं विरहिदा] क्योंकि निर्मोह शुद्धात्म-तत्व को आवृत्त करने वाले ममकार-अहंकार को उत्पन्न करने में समर्थ मोहादि से रहित है, [तम्हा सा खायग त्ति मदा] इसलिये यद्यपि वह औदयिकी है, तथापि निर्विकार शुद्धात्म-तत्व में विकार-उत्पादक नहीं होने से क्षायिकी मानी गई है ।

    यहाँ शिष्य कहता है- (तीर्थंकरों की औदयिकी क्रिया बंध-कारक नहीं होने से क्षायिकी मानने पर) 'औदयिक भाव बंध के कारण हैं' - यह आगम वचन व्यर्थ है ।

    आचार्य इसका निराकरण करते हैं - औदयिक भाव बंध के कारण हैं, किन्तु मोह के उदय से सहित औदयिक भाव ही; अन्य नहीं । द्रव्य मोह का उदय होने पर भी यदि शुद्धात्म-भावना के बल से भाव मोहरूप परिणमन नहीं करता तो बंध नहीं होता । यदि पुन: कर्मोदय मात्र से बंध होता तो संसारियों के सदैव कर्म के उदय की विद्यमानता होने से सदैव--सर्वदा बंध ही होगा, (कभी भी) मोक्ष नहीं हो सकेगा - यह अभिप्राय है ।

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    + केवली-भगवान की भाँति समस्त जीवों के स्वभाव विघात का अभाव होने का निषेध -
    जदि सो सुहो व असुहो ण हवदि आदा सयं सहावेण । (46)
    संसारो वि ण विज्जदि सव्वेसिं जीवकायाणं ॥47॥
    यदि स शुभो वा अशुभो न भवति आत्मा स्वयं स्वभावेन ।
    संसारोऽपि न विद्यते सर्वेषां जीवकायानाम् ॥४६॥
    यदी स्वयं स्वभाव से शुभ-अशुभरूप न परिणमें
    तो सर्व जीवनिकाय के संसार भी ना सिद्ध हो ॥४७॥
    अन्वयार्थ : [यदि] यदि (ऐसा माना जाये कि) [सः आत्मा] आत्मा [स्वयं] स्वयं [स्वभावेन] स्वभाव से (अपने भाव से) [शुभ: वा अशुभ:] शुभ या अशुभ [न भवति] नहीं होता (शुभाशुभ भाव में परिणमित ही नहीं होता) [सर्वेषां जीवकायाना] तो समस्त जीव-निकायों के [संसार: अपि] संसार भी [न विद्यते] विद्यमान नहीं है ऐसा सिद्ध होगा ॥४६॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, केवली-भगवान की भाँति समस्त जीवों के स्वभाव-विघात का अभाव होने का निषेध करते हैं :-

    यदि एकान्त से ऐसा माना जाये कि शुभाशुभ-भावरूप स्वभाव में (अपने भाव में) आत्मा स्वयं परिणमित नहीं होता, तो यह सिद्ध हुआ कि (वह) सदा ही सर्वथा निर्विघात शुद्धस्वभाव से ही अवस्थित है; और इसप्रकार समस्त जीवसमूह, समस्त बन्धकारणों से रहित सिद्ध होने से संसार अभावरूप स्वभाव के कारण नित्य-मुक्तता को प्राप्त हो जायेंगे अर्थात् नित्य-मुक्त सिद्ध होवेगे ! किन्तु ऐसा स्वीकार नहीं किया जा सकता; क्योंकि आत्मा परिणाम-धर्मवाला होने से, जैसे स्फटिकमणि जपाकुसुम और तमालपुष्प के रंग-रूप स्वभाव-युक्तता से प्रकाशित होता है उसीप्रकार, उसे (आत्मा के) शुभाशुभ-स्वभावयुक्तता प्रकाशित होती है । (जैसे स्फटिकमणि लाल और काले फूल के निमित्त से लाल और काले स्वभाव में परिणमित दिखाई देता है उसीप्रकार आत्मा कर्मोपाधि के निमित्त से शुभाशुभ स्वभावरूप परिणमित होता हुआ दिखाई देता है)

    जयसेनाचार्य :
    [जदि सो सुहो व असुहो ण हवदि आदा सयं सहावेण] - जैसे शुद्धनय से आत्मा शुभाशुभरूप परिणमित नहीं होता, उसी प्रकार यदि अशुद्धनय से भी स्वयं अपने उपादान कारण स्वभावरूप अशुद्ध निश्चय से भी नहीं परिणमता तो । अशुद्धनय से भी शुभाशुभरूप न परिणमने में क्या दोष होता? [संसारो वि ण विज्जदि] - नि:संसार शुद्धात्मस्वरूप से विपरीत संसार व्यवहारनय से भी नहीं होता । अशुद्धनय से भी उसरूप न परिणमने पर संसार किनके नहीं होता? [सव्वेसिं जीवकायाणं] - सभी जीव समूहों के संसार नहीं होता ।

    वह इसप्रकार - प्रथम तो आत्मा परिणामी है, और वह कर्मोपाधि का निमित्त होने पर स्फटिक मणि के समान उपाधि को ग्रहण करता है, इसकारण संसार का अभाव नहीं होता । और यदि ऐसा मत हो कि सांख्यों के लिये संसार का अभाव दोष नही, वरन् भूषण गुण ही है; तो ऐसा भी नहीं है । संसार का अभाव ही मोक्ष कहलाता है और वह प्रत्यक्ष विरोधरूप से संसारी जीवों के दिखाई नहीं देता - यह भाव है ।

    इसप्रकार रागादि बंध के कारण हैं, ज्ञान बंध का कारण नहीं है - इत्यादि व्याख्यान की मुख्यता से छठवें स्थल में पाँच गाथायें पूर्ण हुईं ।

    🏠
    + पुन: चालु विषय का अनुसरण करके अतीन्द्रिय ज्ञान को सर्वज्ञरूप से अभिनन्दन करते हैं -
    जं तक्कालियमिदरं जाणदि जुगवं समंतदो सव्वं । (47)
    अत्थं विचित्तविसमं तं णाणं खाइयं भणियं ॥48॥
    यत्तात्कालिकमितरं जानाति युगपत्समन्ततः सर्वम् ।
    अर्थं विचित्रविषमं तत् ज्ञानं क्षायिकं भणितम् ॥४७॥
    जो तात्कालिक अतात्कालिक विचित्र विषमपदार्थ
    चहुं ओर से इक साथ जाने वही क्षायिक ज्ञान है ॥४८॥
    अन्वयार्थ : [यत्] जो [युगपद्] एक ही साथ [समन्तत:] सर्वत: (सर्व आत्म-प्रदेशों से) [तात्कालिकं] तात्कालिक [इतरं] या अतात्कालिक, [विचित्रविषमं] विचित्र (अनेक पकार के) और विषम (मूर्त, अमूर्त आदि असमान जाति के) [सर्वं अर्थं] समस्त पदार्थों को [जानाति] जानता है [तत् ज्ञानं] उस ज्ञान को [क्षायिकं भणितम्] क्षायिक कहा है ॥४७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, पुनः प्रकृत का (चालु विषय का) अनुसरण करके अतीन्द्रिय-ज्ञान को सर्वज्ञरूप से अभिनन्दन करते हैं (अर्थात् अतीन्द्रिय ज्ञान सबका ज्ञाता है ऐसी उसकी प्रशंसा करते हैं) -

    क्षायिक ज्ञान वास्तव में एक समय में ही सर्वत: (सर्व आत्मप्रदेशों से), वतर्मान में वर्तते तथा भूत-भविष्यत काल में वर्तते उन समस्त पदार्थों को जानता है जिनमें *पृथकरूप से वर्तते स्व-लक्षणरूप लक्ष्मी से आलोकित अनेक प्रकारों के कारण वैचित्र प्रगट हुआ है और जिनमें परस्पर विरोध से उत्पन्न होनेवाली असमानजातीयता के कारण वैषम्य प्रगट हुआ है ।

    (इसी बात को युक्ति-पूर्वक समझाते हैं) अथवा, अतिविस्तार से पूरा पड़े (कुछ लाभ नहीं)? जिसका अनिवार (रोका न जा सके ऐसा अमर्यादित) फैलाव है ऐसा प्रकाशमान होने से क्षायिक ज्ञान अवश्यमेव सर्वदा सर्वत्र सर्वथा सर्व को जानता है ॥४७॥

    *द्रव्यों के भिन्न-भिन्न वर्तनेवाले निज-निज लक्षण उन द्रव्यों की लक्ष्मी-सम्पत्ति-शोभा हैं

    जयसेनाचार्य :
    (अब सातवाँ स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब सर्वप्रथम केवलज्ञान ही सर्वज्ञस्वरूप है, इसके बाद सभी की जानकारी होने पर एक की जानकारी, एक की जानकारी होने पर सर्व की जानकारी - इत्यादि कथनरूप से पाँच गाथा पर्यन्त व्याख्यान करते हैं । वह इसप्रकार -

    यहाँ ज्ञान प्रपंच का प्रकरण है, उस प्रकरण का अनुसरण कर फिर से केवलज्ञान को सर्वज्ञरूप से निरूपित करते हैं -

    [जं] जो ज्ञानरूप कर्ता [जाणदि] - जानता है । ज्ञान किसे जानता है? [अत्थं] - ज्ञान पदार्थ को जानता है । यहाँ पदार्थ यह विशेष पद है । किस विशेषता वाले पदार्थ को जानता है? [तक्कालियमिदरं] - तात्कालिक-वर्तमान, इतर-भूत-भावि काल सम्बन्धी पदार्थों को जानता है । ज्ञान इन पदार्थों को कैसे जानता है? [जुगवं] - एक साथ एक समय में और [समंतदो] - सब ओर से - सर्व आत्मप्रदेशों से अथवा सर्व प्रकार से ज्ञान उनको जानता है । ज्ञान कितनी संख्यावाले पदार्थों को जानता है? [सव्वमं] - सम्पूर्ण पदार्थों को वह जानता है । और किस विशेषतावाले पदार्थों को जानता है? [विचित्तं] - विविध भेदवाले पदार्थों को जानता है । वे पदार्थ और कैसे हैं? [विसमं] - मूर्त-अमूर्त, चेतन-अचेतन आदि विविध जाति विशेषों से असमान उन सभी पदार्थों को जानता है । [तं णाणं खाइयं भणियं] - जो इसप्रकार के गुणों से विशिष्ट ज्ञान है, वह ज्ञान क्षायिक कहा गया है । अभेदनय से वही सर्वज्ञ-स्वरूप है, वही उपादेयभूत अनन्त सुखादि अनन्त गुणों का आधारभूत ज्ञान सर्व प्रकार उपादेयरूप से भावना करने योग्य है - यह तात्पर्य है ।

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    + जो सबको नहीं जानता वह एक को भी नहीं जानता -
    जो ण विजाणदि जुगवं अत्थे तिक्कालिगे तिहुवणत्थे । (48)
    णादुं तस्स ण सक्कं सपज्जयं दव्वमेगं वा ॥49॥
    यो न विजानाति युगपदर्थान् त्रैकालिकान् त्रिभुवनस्थान् ।
    ज्ञातुं तस्य न शक्यं सपर्ययं द्रव्यमेकं वा ॥४८॥
    जाने नहीं युगपद् त्रिकालिक अर्थ जो त्रैलोक्य के
    वह जान सकता है नहीं पर्यय सहित इक द्रव्य को ॥४९॥
    अन्वयार्थ : [य] जो [युगपद्] एक ही साथ [त्रैकालिकान् त्रिभुवनस्थान्] त्रैकालिक त्रिभुवनस्थ (तीनों काल के और तीनों लोक के) [अर्थान्] पदार्थों को [न विजानाति] नहीं जानता, [तस्य] उसे [सपर्ययं] पर्याय सहित [एकं द्रव्यं वा] एक द्रव्य भी [ज्ञातुं न शक्य] जानना शक्य नहीं है ॥४८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसा निश्चित करते हैं कि जो सबको नहीं जानता वह एक को भी नहीं जानता :-

    इस विश्व में एक आकाश-द्रव्य, एक धर्म-द्रव्य, एक अधर्म-द्रव्य, असंख्य काल-द्रव्य और अनन्त जीव-द्रव्य तथा उनसे भी अनन्तगुने पुद्गल द्रव्य हैं, और उन्हीं के प्रत्येक के अतीत, अनागत और वर्तमान ऐसे (तीन) प्रकारों से भेद वाली निरवधि वृत्ति-प्रवाह के भीतर पड़ने वाली (समा जाने वाली) अनन्त पर्यायें हैं । इस प्रकार यह समस्त (द्रव्यों और पर्यायों का) समुदाय ज्ञेय है । उसी में एक कोई भी जीव-द्रव्य ज्ञाता है । अब यहाँ, जैसे समस्त दाह्य को दहकती हुई अग्नि समस्त-दाह्यहेतुक (समस्त दाह्य जिसका निमित्त है ऐसा) समस्त दाह्याकार-पर्यायरूप परिणमित सकल एक दहन जिसका आकार (स्वरूप) है ऐसे अपने रूप में (अग्नि रूप में) परिणमित होती है, वैसे ही समस्त ज्ञेयों को जानता हुआ ज्ञाता (आत्मा) समस्त ज्ञेयहेतुक समस्त ज्ञेयाकार पर्यायरूप परिणमित सकल एक ज्ञान जिसका आकार (स्वरूप) है ऐसे निजरूपसे-जो चेतनता के कारण स्वानुभव-प्रत्यक्ष है उस-रूप-परिणमित होता है । इस प्रकार वास्तव में द्रव्य का स्वभाव है । किन्तु जो समस्त ज्ञेय को नहीं जानता वह (आत्मा), जैसे समस्त दाह्य को न दहती हुई अग्नि समस्त-दाह्यहेतुक समस्त-दाह्याकारपर्यायरूप परिणमित सकल एक दहन जिसका आकार है ऐसे अपने रूप में परिणमित नहीं होता उसीप्रकार समस्त-ज्ञेयहेतुक समस्त-ज्ञेयाकार पर्यायरूप परिणमित सकल एक ज्ञान जिसका आकार है ऐसे अपने रूपमें-स्वयं चेतना के कारण स्वानुभव-प्रत्यक्ष होने पर भी परिणमित नहीं होता, (अपने को परिपूर्ण-तया अनुभव नहीं करता-नहीं जानता) इस प्रकार यह फलित होता है कि जो सबको नहीं जानता वह अपने को (आत्मा को) नहीं जानता ॥४८॥

    निरवधि = अवधि-हद-मर्यादा अन्तरहित
    वृत्ति = वर्तन करना; उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य; अस्तित्व, परिणति
    दहन = जलाना, दहना
    सकल = सारा; परिपूर्ण

    जयसेनाचार्य :
    अब जो सबको नहीं जानता वह एक को भी नहीं जानता; ऐसा विचार करते हैं ।

    [जो ण विजाणदि] - कर्तारूप जो (इस वाक्य में कर्ता कारक में प्रयुक्त जो) नहीं जानता है । जो कैसे नहीं जानता है? [जुगवं] - जो एक साथ एक समय में नहीं जानता है । एक साथ किन्हें नहीं जानता है ? [अत्थे] - जो पदार्थों को एक साथ नहीं जानता है । कैसे पदार्थों को नहीं जानता? [तिक्कालिगे] - त्रिकालवर्ती पर्यायरूप परिणत पदार्थों के जो नहीं जानता है । और कैसे पदार्थों को नहीं जानता है? [तिहुवणत्थे] - तीनलोक में स्थित पदार्थों को नहीं जानता है । [णादुं तस्स ण सक्कं] - उस पुरुष का ज्ञान जानने में समर्थ नहीं है । किसे जानने में समर्थ नहीं है? [दव्वं] - ज्ञेयद्रव्य को जानने में समर्थ नहीं है । किस विशेषता वाले ज्ञेयद्रव्य को जानने में समर्थ नहीं है? [सपज्जयं] - अनन्त पर्याय सहित ज्ञेय द्रव्य को जानने में समर्थ नहीं है । कितनी संख्या सहित ज्ञेय द्रव्य को जानने में समर्थ नहीं है? [एगं वा] - एक भी ज्ञेयद्रव्य को जानने में समर्थ नहीं है ।

    वह इस प्रकार - आकाश द्रव्य एक, धर्म द्रव्य एक और इसीप्रकार अधर्म द्रव्य एक, लोकाकाश प्रमाण असंख्यात कालाणु, उससे अनंतगुणे जीव द्रव्य और उससे भी अनन्तगुणे पुद्गल द्रव्य हैं । उसीप्रकार सभी में से प्रत्येक की अनन्त पर्यायें; ये सब ज्ञेय हैं तथा उनमें से एक विवक्षित जीव द्रव्य ज्ञाता है । इसप्रकार वस्तु का स्वभाव है ।

    वहाँ जैसे अग्नि समस्त जलाने योग्य पदार्थों को जलाती हुई सम्पूर्ण दाह्य के निमित्त से होनेवाले सम्पूर्ण दाह्याकार पर्यायरूप से परिणत सम्पूर्ण एक दहन-स्वरुप उष्णरूप से परिणत घास-पत्ते आदि के आकाररूप स्वयं को परिणत करती है, उसीप्रकार यह आत्मा सम्पूर्ण ज्ञेयों को जानता हुआ सम्पूर्ण ज्ञेयों के निमित्त से होने वाले सम्पूर्ण ज्ञेयाकार पर्यायरूप से परिणत सकल एक अखण्ड ज्ञानरूप अपने आत्मा को परिणमित करता है, जानता है, निश्चित करता है ।

    और जैसे वही अग्नि पूर्वोक्त लक्षण दाह्य को नहीं जलाती हुई उस आकाररूप परिणत नही होती, उसीप्रकार आत्मा भी पूर्वोक्त लक्षणवाले सर्व ज्ञेयों को नहीं जानता हुआ पूर्वोक्त लक्षणवाले सकल एक अखण्ड ज्ञानाकाररूप अपने आत्मा को परिणमित नहीं करता, जानता नहीं, निश्चित नहीं करता है ।

    दूसरा भी उदाहरण देते हैं- जैसे कोई अन्धा सूर्य से प्रकाशित पदार्थों को नहीं देखता हुआ सूर्य को नहीं देखने के समान; दीपक से प्रकाशित पदार्थों को नहीं देखता हुआ दीपक को नहीं देखने के समान; दर्पण में स्थित बिम्ब को नहीं देखते हुये दर्पण को नहीं देखने के समान; अपनी दृष्टि से प्रकाशित पदार्थों को नहीं देखता हुआ हाथ-पैर आदि अंगों रूप से परिणत अपने शरीराकार स्वयं को अपनी दृष्टि से नहीं देखता; उसी-प्रकार यह विवक्षित आत्मा भी केवलज्ञान से प्रकाशित पदार्थों को नहीं जानता हुआ सम्पूर्ण अखण्ड एक केवलज्ञानरूप आत्मा को भी नहीं जानता है ।

    इससे यह निश्चित हुआ कि जो सबको नहीं जानता, वह आत्मा को भी नहीं जानता ।

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    + एक को न जानने वाला सबको नहीं जानता -
    दव्वं अणंतपज्जयमेगमणंताणि दव्वजादाणि । (49)
    ण विजाणदि जदि जुगवं किध सो सव्वाणि जाणादि ॥50॥
    द्रव्यमनन्तपर्यायमेकमनन्तानि द्रव्यजातानि ।
    न विजानाति यदि युगपत् कथं स सर्वाणि जानाति ॥४९॥
    इक द्रव्य को पर्यय सहित यदि नहीं जाने जीव तो
    फिर जान कैसे सकेगा इक साथ द्रव्यसमूह को ॥५०॥
    अन्वयार्थ : [यदि] यदि [अनन्तपर्यायं] अनन्त पर्याय-वाले [एकं द्रव्यं] एक द्रव्य को (आत्मद्रव्य को) [अनन्तानि द्रव्यजातानि] तथा अनन्त द्रव्य-समूह को [युगपद्] एक ही साथ [न विजानाति] नहीं जानता [सः] तो वह पुरुष [सर्वाणि] सब को (अनन्त द्रव्य-समूह को) [कथं जानाति] कैसे जान सकेगा? (अर्थात् जो आत्म-द्रव्य को नहीं जानता हो वह समस्त द्रव्य-समूह को नहीं जान सकता) ॥४९॥
    प्रकारांतर से अन्वयार्थ - [यदि] यदि [अनन्तपर्यायं] अनन्त पर्यायवाले [एकं द्रव्यं] एक द्रव्य को (आत्म-द्रव्य को) [न विजानाति] नहीं जानता [सः] तो वह पुरुष [युगपद्] एक ही साथ [सर्वाणि अनन्तानि द्रव्यजातानि] सर्व अनन्त द्रव्य-समूह को [कथं जानाति] कैसे जान सकेगा? ॥४९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसा निश्चित करते हैं कि जो सबको नहीं जानता वह एक को भी नहीं जानता :-

    प्रथम तो आत्मा वास्तव में स्वयं ज्ञानमय होने से ज्ञातृत्व के कारण ज्ञान ही है; और ज्ञान प्रत्येक आत्मा में वर्तता (रहता) हुआ प्रतिभासमय महा-सामान्य है । वह प्रतिभासमय महा-सामान्य प्रतिभास-मय अनन्त विशेषों में व्याप्त होनेवाला है; और उन विशेषों के (भेदों के) निमित्त सर्व द्रव्य-पर्याय हैं । अब जो पुरुष सर्व द्रव्य-पर्याय जिनके निमित्त हैं ऐसे अनन्त विशेषों में व्याप्त होनेवाले प्रतिभास-मय महा-सामान्यरूप आत्मा का स्वानुभव प्रत्यक्ष नहीं करता, वह (पुरुष) प्रतिभासमय महासामान्यके द्वारा व्याप्य (व्याप्य होने योग्य) जो प्रतिभास-मय अनन्त विशेष है उनकी निमित्तभूत सर्व द्रव्य पर्यायों को कैसे प्रत्यक्ष कर सकेगा ? (नहीं कर सकेगा) इससे ऐसा फलित हुआ कि जो आत्मा को नहीं जानता वह सबको नहीं जानता ।

    अब, इससे ऐसा निश्चित होता है कि सर्व के ज्ञान से आत्मा का ज्ञान और आत्मा के ज्ञान से सर्व का ज्ञान (होता है); और ऐसा होने से, आत्मा ज्ञानमयता के कारण स्व-संचेतक होने से, ज्ञाता और ज्ञेय का वस्तुरूप से अन्यत्व होने पर भी, प्रतिभास और प्रतिभास्यमानकर, अपनी अवस्था में अन्योन्य मिलन होने के कारण (ज्ञान और ज्ञेय, आत्मा की-ज्ञान की अवस्था में परस्पर मिश्रित-एकमेकरूप होने से) उन्हें भिन्न करना अत्यन्त अशक्य होने से मानो सब कुछ आत्मा में निखात (प्रविष्ट) हो गया हो इसप्रकार प्रतिभासित (ज्ञात) होता है । (आत्मा ज्ञानमय होने से वह अपने को अनुभव करता है-जानता है, और अपने को जानने पर समस्त ज्ञेय ऐसे ज्ञात होते हैं-मानों वे ज्ञान में स्थित ही हों, क्योंकि ज्ञान की अवस्था में से ज्ञेयाकारों को भिन्न करना अशक्य है ।) यदि ऐसा न हो तो (यदि आत्मा सबको न जानता हो तो) ज्ञान के परिपूर्ण आत्म-संचेतन का अभाव होने से परिपूर्ण एक आत्मा का भी ज्ञान सिद्ध न हो ।

    ज्ञान सामान्य व्यापक है, और ज्ञान विशेष-भेद व्याप्य हैं । उन ज्ञान-विशेषों के निमित्त ज्ञेयभूत सर्व द्रव्य और पर्यायें हैं
    निखात = खोदकर भीतर गहरा उतर गया हुवा; भीतर प्रविष्ट हुआ

    जयसेनाचार्य :
    अब एक को नहीं जानता हुआ सबको नहीं जानता है, ऐसा निश्चित करते हैं -

    [दव्वं] - द्रव्य [अणंतपज्जयं] - अनन्त पर्याय [एगं] - एक [अणंताणि दव्वजादीणि] - अनन्त द्रव्य समूह को [जो ण विजाणदि] - जो नहीं जानता है, [किध सो सव्वाणि जाणादि] - वह सबको कैसे जान सकता है? [जुगवं] - युगपत् - एक समय में, किसी भी तरह नहीं जान सकता है ।

    वह इसप्रकार- ज्ञान आत्मा का लक्षण है और वह अखण्ड प्रतिभासमय सभी जीवों में सामान्यरूप से पाया जाने वाला महासामान्यरूप है । और वह महासामान्य ज्ञानमय अनन्त विशेषों में व्याप्त है । और वे ज्ञान विशेष विषयभूत, ज्ञेयभूत अनन्त द्रव्य-पर्यायों के ज्ञायक-ग्राहक-जाननेवाले हैं । अखण्ड एक प्रतिभासमय जो महासामान्य उस स्वभाववाले आत्मा को जो वह प्रत्यक्ष नहीं जानता, तो वह पुरुष प्रतिभासमय महासामान्य से व्याप्त जो अनन्त ज्ञानविशेष, उनके विषयभूत जो अनन्त द्रव्य-पर्यायें, उन्हें कैसे जान सकता है? किसी भी प्रकार नहीं जान सकता ।

    इससे यह निश्चित हुआ कि जो आत्मा को नहीं जानता वह सर्व को नहीं जानता । वैसा ही कहा है -

    ''एक भाव सर्वभाव-स्वभाववाला है, सभी भाव एकभाव-स्वभाववाले हैं; अत: जिसके द्वारा एक भाव वास्तविकरूप से जान लिया गया है, उसके द्वारा सभी भाव वास्तविकरूप से जान लिये गये हैं ।''

    यहाँ शिष्य कहता है - आत्मा की विशिष्ट जानकारी होने पर सभी की जानकारी होती है - ऐसा यहाँ कहा गया है, वहाँ पहले (४९वीं गाथा में) सर्व की जानकारी होने पर आत्मा की जानकारी होती है - ऐसा कहा था । यदि ऐसा है तो छद्मस्थजीवों को तो सभी की जानकारी नहीं है, उन्हें आत्मा की जानकारी कैसे होगी? आत्मा की जानकारी के अभाव में आत्मभावना कैसे होगी? और उसके अभाव में केवलज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है ।

    आचार्य इसका निराकरण करते हैं – परोक्ष प्रमाणभूत श्रुतज्ञान द्वारा सभी पदार्थ जाने जाते है । श्रुतज्ञान द्वारा सभी पदार्थ कैसे जाने जाते हैं ? यदि यह शंका हो तो कहते हैं – छद्मस्थों के भी व्याप्तिज्ञान (अनुमान ज्ञान) रूप से लोकालोकादि की जानकारी पायी जाती है। तथा केवलज्ञान सम्बन्धी विषय को ग्रहण करने वाला वह व्याप्तिज्ञान परोक्षरूप से कथंचित आत्मा ही कहा गया है । अथवा स्वसंवेदनज्ञान से आत्मा जाना जाता है, और उससे भावना की जाती है, और उस रागादि विकल्प रहित स्वसंवेदन ज्ञानरूप भावना से केवलज्ञान उत्पन्न होता है – इसप्रकार दोष नहीं है ।

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    + क्रमश: प्रवर्तमान ज्ञान की सर्वगतता सिद्ध नहीं होती -
    उप्पज्जदि जदि णाणं कमसो अट्ठे पडुच्च णाणिस्स । (50)
    तं णेव हवदि णिच्चं ण खाइगं णेव सव्वगदं ॥51॥
    उत्पद्यते यदि ज्ञानं क्रमशोऽर्थान् प्रतीत्य ज्ञानिनः ।
    तन्नैव भवति नित्यं न क्षायिकं नैव सर्वगतम् ॥५०॥
    पदार्थ का अवलम्ब ले जो ज्ञान क्रमश: जानता
    वह सर्वगत अर नित्य क्षायिक कभी हो सकता नहीं ॥५१॥
    अन्वयार्थ : [यदि] यदि [ज्ञानिनः ज्ञानं] आत्मा का ज्ञान [क्रमश:] क्रमश: [अर्थान् प्रतीत्य] पदार्थों का अवलम्बन लेकर [उत्पद्यते] उत्पन्न होता हो [तत्] तो वह (ज्ञान) [न एव नित्यं भवति] नित्य नहीं है, [न क्षायिकं] क्षायिक नहीं है, [न एव सर्वगतम्] और सर्वगत नहीं है ॥५०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसा निश्चित करते हैं कि क्रमशः प्रवर्तमान ज्ञान की सर्वगतता सिद्ध नहीं होती :-

    जो ज्ञान क्रमश: एक एक पदार्थ का अवलम्बन लेकर प्रवृत्ति करता है वह (ज्ञान) एक पदार्थ के अवलम्बन से उत्पन्न होकर दूसरे पदार्थ के अवलम्बन से नष्ट हो जाने से नित्य नहीं होता तथा कर्मोदय के कारण एक *व्यक्ति को प्राप्त करके फिर अन्य व्यक्ति को प्राप्त करता है इसलिये क्षायिक भी न होता हुआ, वह अनन्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव को प्राप्त होने में (जानने में) असमर्थ होने के कारण सर्वगत नहीं है ॥५०॥

    *व्यक्ति = प्रगटता विशेष, भेद

    जयसेनाचार्य :
    अब क्रमप्रवृत्त (क्रम से पदार्थों को जाननेवाले) ज्ञान से सर्वज्ञ नहीं होते हैं, ऐसी व्यवस्था करते हैं - ऐसा निश्चित करते हैं -

    [उप्पज्जदि जदि णाणं] - यदि ज्ञान उत्पन्न होता है । [कमसो] - क्रम से । ज्ञान क्रम से क्या करके उत्पन्न होता है? [अट्ठे पडुच्च] - ज्ञेय पदार्थों का आश्रयकर यदि ज्ञान उत्पन्न होता है? [णाणिस्स] - ज्ञानी आत्मा का ज्ञान यदि क्रमश: ज्ञेयों का आश्रयकर उत्पन्न होता है, तो [तं णेव हवदि णिच्चं] - उत्पत्ति के निमित्तभूत पदार्थों का विनाश होने पर उसका भी विनाश हो जाता है; अत: वह ज्ञान नित्य नहीं है । [ण खाइगं] - ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम की पराधीनता होने से क्षायिक भी नहीं है । [णेव सव्वगदं] - क्योंकि पूर्वोक्त प्रकार से पराधीन होने के कारण नित्य नहीं है, क्षयोपशम के अधीन होने के कारण क्षायिक नहीं है; इसलिए एक साथ सम्पूर्ण द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावों की जानकारीरूप सामर्थ्य का अभाव होने से सर्वगत नहीं है ।

    इससे यह निश्चित हुआ कि जो ज्ञान क्रम से पदार्थों का आश्रय लेकर उत्पन्न होता है, उस ज्ञान से सर्वज्ञ नहीं होते हैं ।

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    + युगपत् प्रवृत्ति के द्वारा ही ज्ञान का सर्वगतत्व -
    तिक्कालणिच्चविसमं सयलं सव्वत्थसंभवं चित्तं । (51)
    जुगवं जाणदि जोण्हं अहो हि णाणस्स माहप्पं ॥52॥
    त्रैकाल्यनित्यविषमं सकलं सर्वत्रसंभवं चित्रम् ।
    युगपज्जानाति जैनमहो हि ज्ञानस्य माहात्म्यम् ॥५१॥
    सर्वज्ञ जिन के ज्ञान का माहात्म्य तीनों काल के
    जाने सदा सब अर्थ युगपद् विषम विविध प्रकार के ॥५२॥
    अन्वयार्थ : [त्रैकाल्यनित्यविषमं] तीनों काल में सदा विषम (असमान जाति के), [सर्वत्र संभवं] सर्व क्षेत्र के [चित्रं] विचित्र (अनेक प्रकार के) [सकलं] समस्त पदार्थों को [जैनं] जिनदेव का ज्ञान [युगपत् जानाति] एक साथ जानता है [अहो हि] अहो ! [ज्ञानस्य माहात्म्यम्] ज्ञान का माहात्म्य ! ॥५१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब ऐसा निश्चित होता है कि युगपत् प्रवृत्ति के द्वारा ही ज्ञान का सर्वगतत्व सिद्ध होता है (अर्थात् अक्रम से प्रवर्तमान ज्ञान ही सर्वगत हो सकता है ) :-

    वास्तव में क्षायिक ज्ञान का, सर्वोत्कृष्टता का स्थानभूत परम माहात्म्य है; और जो ज्ञान एक साथ ही समस्त पदार्थों का अवलम्बन लेकर प्रवृत्ति करता है वह ज्ञान- अपने में समस्त वस्तुओं के ज्ञेयाकार *टकोत्कीर्ण-न्याय से स्थित होने से जिसने नित्यत्व प्राप्त किया है और समस्त व्यक्ति को प्राप्त कर लेने से जिसने स्वभाव-प्रकाशक क्षायिक-भाव प्रगट किया है ऐसा-त्रिकाल में सदा विषम रहनेवाले (असमान जातिरूप से परिणमित होनेवाले) और अनन्त प्रकारों के कारण विचित्रता को प्राप्त सम्पूर्ण सर्व पदार्थों के समूह को जानता हुआ, अक्रम से अनन्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव को प्राप्त होने से जिसने अद्भुत माहात्म्य प्रगट किया है ऐसा सर्वगत ही है ॥५१॥

    *टकोत्कीर्ण न्याय = पत्थर में टांकी से उत्कीर्ण आकृति की भाँति

    जयसेनाचार्य :
    अब एक साथ जानकारीरूप ज्ञान से ही सर्वज्ञ होते हैं ऐसा आवेदन करते हैं -

    [जाणदि] - जानता है । इस क्रिया का कर्ता कौन है? कौन जानता है? [जोण्हं] - जिनेन्द्र भगवान का ज्ञान जानता है । उनका ज्ञान कैसे जानता है? [जुगवं] - एक साथ-एक समय में जानता है । [अहो हि णाणस्स माहप्प्म] - अहो! स्पष्टरूप से यह जैन-ज्ञान केवलज्ञान की महिमा देखो । वह ज्ञान किसे जानता है? पदार्थ को जानता है । यहाँ अर्थ (पदार्थ) शब्द अध्याहार है अर्थात् पूर्व गाथा से लिया गया है । वे पदार्थ कैसे हैं? [तिक्कालणिच्चविसयं] - तीनकाल सम्बन्धी विषय-सर्वकाल स्थित हैं । वे पदार्थ और किस विशेषता वाले हैं? [सयलं] - सम्पूर्ण हैं । वे पदार्थ और कैसे हैं? [सव्वत्थसम्भवं] - लोक में सर्वत्र स्थित हैं । वे और कैसे हैं? [चित्तं] - अनेक जातियों के भेद से विचित्र हैं ।

    वह इसप्रकार- एक साथ सम्पूर्ण पदार्थों को जाननेवाले ज्ञान से सर्वज्ञ होते हैं- ऐसा जानकर क्या करना चाहिये? अज्ञानी जीवों के चित्त को चमत्कृत करने के कारण और परमात्मा सम्बन्धी भावना को नष्ट करने वाले जो ज्योतिष्क, मन्त्रवाद, रससिद्धि आदि खण्ड-विज्ञान-एकदेशज्ञान-क्षयोपशमज्ञान हैं; वहाँ आग्रह छोड़कर तीनलोक-तीनकालवर्ती सम्पूर्ण वस्तुओं को एक साथ प्रकाशित करनेवाले अविनश्वर, अखण्ड, एक प्रतिभासमय सर्वज्ञ शब्द से वाच्य जो केवलज्ञान उसकी उत्पत्ति का कारणभूत जो सम्पूर्ण रागादि विकल्प जाल रहित सहज शुद्धात्मा से अभेदरूप ज्ञान उसकी ही भावना करना चाहिये - यह तात्पर्य है ।

    इसप्रकार केवलज्ञान ही सर्वज्ञ है-इस कथनरूप से एक गाथा, इसके बाद सर्व पदार्थों की जानकारी से परमात्मज्ञान होता है-इस कथन परक पहली गाथा और परमात्मज्ञान से सभी पदार्थों की जानकारी होती है - इसप्रकार दूसरी गाथा है । इसके बाद क्रमप्रवृत्त ज्ञान से सर्वज्ञ नहीं होते है- इसप्रकार पहली गाथा तथा एक साथ सबको जाननेवाले ज्ञान से सर्वज्ञ होते हैं-इसप्रकार दूसरी गाथा-इसप्रकार सामूहिकरूप से सातवें स्थल में पाँच गाथायें पूर्ण हुई ।

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    + केवलज्ञानी के ज्ञप्तिक्रिया का सद्भाव होने पर भी उसके क्रिया के फलरूप बन्ध का निषेध -
    ण वि परिणमदि ण गेण्हदि उप्पज्जदि णेव तेसु अट्टेसु । (52)
    जाणण्णवि ते आदा अबंधगो तेण पण्णत्तो ॥53॥
    नापि परिणमति न गृह्णाति उत्पद्यते नैव तेष्वर्थेषु ।
    जानन्नपि तानात्मा अबन्धकस्तेन प्रज्ञप्तः ॥५२॥
    सर्वार्थ जाने जीव पर उनरूप न परिणमित हो
    बस इसलिए है अबंधक ना ग्रहे ना उत्पन्न हो ॥५३॥
    अन्वयार्थ : [आत्मा] (केवलज्ञानी) आत्मा [तान् जानन् अपि] पदार्थों को जानता हुआ भी [न अपि परिणमति] उस रूप परिणमित नहीं होता, [न गृह्णति] उन्हें ग्रहण नहीं करता [तेषु अर्थेषु न एव उत्पद्यते] और उन पदार्थों के रूप में उत्पन्न नहीं होता [तेन] इसलिये [अबन्धक: प्रज्ञप्त:] उसे अबन्धक कहा है ॥५२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ज्ञानी के (केवलज्ञानी आत्मा के) ज्ञप्ति-क्रिया का सद्भाव होने पर भी उसके क्रिया के फलरूप बन्ध का निषेध करते हुए उपसंहार करते हैं (अर्थात् केवलज्ञानी आत्मा के जानने की क्रिया होने पर भी बन्ध नहीं होता, ऐसा कहकर ज्ञान-अधिकार पूर्ण करते हैं)-

    यहाँ (ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापनकी ४३वी गाथा) इस गाथा सूत्र में, 'उदयगत पुद्गल-कर्मांशों के अस्तित्व में चेतित होने पर-जानने पर-अनुभव करने पर मोह-राग-द्वेष में परिणत होने से ज्ञेयार्थपरिणमन-स्वरूप क्रिया के साथ युक्त होता हुआ आत्मा क्रिया-फलभूत बन्ध का अनुभव करता है, किन्तु ज्ञान से नहीं' इसप्रकार प्रथम ही अर्थ-परिणमन-क्रिया के फलरूप से बन्ध का समर्थन किया गया है (अर्थात् बन्ध तो पदार्थरूप में परिणमनरूप क्रिया का फल है ऐसा निश्चित किया गया है) तथा इस गाथा सूत्र (ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापनकी ३२ वीं गाथा) में शुद्धात्मा के अर्थ परिणमनादि क्रियाओं का अभाव निरूपित किया गया है इसलिये जो (आत्मा) पदार्थरूप में परिणमित नहीं होता, उसे ग्रहण नहीं करता और उसरूप उत्पन्न नहीं होता उस आत्मा के ज्ञप्तिक्रिया का सद्धाव होने पर भी वास्तव में क्रिया-फलभूत बन्ध सिद्ध नहीं होता ।

    (कलश)
    जिसने किये हैं निर्मूल घातिकर्म सब ।
    अनंत सुख वीर्य दर्श ज्ञान धारी आतमा ॥
    भूत भावी वर्तमान पर्याय युक्त सब ।
    द्रव्य जाने एक ही समय में शुद्धातमा ॥
    मोह का अभाव पररूप परिणमें नहीं ।
    सभी ज्ञेय पीके बैठा ज्ञानमूर्ति आत्मा ॥
    पृथक्-पृथक् सब जानते हुए भी ये ।
    सदा मुक्त रहें अरिहंत परमातमा ॥४॥

    जिसने कर्मों को छेद डाला है ऐसा यह आत्मा भूत, भविष्यत और वर्तमान समस्त विश्‍व को (तीनों काल की पर्यायों से युक्त समस्त पदार्थों को) एक ही साथ जानता हुआ भी मोह के अभाव के कारण पररूप परिणमित नहीं होता, इसलिये अब, जिसके समस्त ज्ञेयाकारों को अत्यन्त विकसित ज्ञप्‍ति के विस्तार से स्वयं पी गया है ऐसे तीनों लोक के पदार्थों को पृथक् और अपृथक् प्रकाशित करता हुआ वह ज्ञानमूर्ति मुक्त ही रहता है ।

    इस प्रकार ज्ञान-अधिकार समाप्त हुआ ।

    जयसेनाचार्य :
    [ण वि परिणमदि] - जैसे अपने आत्म-प्रदेशों के साथ समरसी भाव से परिणत होते हैं, वैसे ज्ञेयरूप से परिणत नहीं हैं । [ण गेण्हदि] - और जैसे अनन्त-ज्ञानादि चतुष्टय-स्वरूप स्वयं को स्वयं से ग्रहण करते हैं, वैसे ज्ञेयरूप को ग्रहण नहीं करते हैं । [उपज्जदि णेव अट्ठेसु] - और जैसे निर्विकार परमानन्द एक सुखरूप अपनी सिद्ध-पर्याय से उत्पन्न होते हैं, वैसे ही ज्ञेय पदार्थों में उत्पन्न नहीं होते । क्या करते हुए भी ये सब नहीं करते हैं? [जाणण्णवि ते] - स्वयं से पृथक्-रूप उन ज्ञेय पदार्थों को जानते हुये भी उन रूप परिणमन आदि क्रियाओं को नहीं करते हैं । उनको जानते हुये भी उनरूप परिणमन आदि कौन नहीं करते हैं - इस क्रिया का कर्ता कौन है? [आदा] - मुक्तात्मा-केवली भगवान, उन्हें जानते हुये भी उनरूप परिणमन आदि नहीं करते हैं । [अबंधगो तेण पण्णतो] - इस कारण उन्हें कर्मों का अबंधक कहा है ।

    वह इस प्रकार - रागादि रहित ज्ञान बन्ध का कारण नहीं हैं - ऐसा जानकर शुद्धात्मा की परिपूर्ण प्राप्ति लक्षण मोक्ष से विपरीत नारकादि दुःखों के कारणभूत कर्मबन्ध के कारण इन्द्रिय-मन से उत्पन्न एकदेश विज्ञान को छोड़कर, कर्मबंध के अकारणभूत परिपूर्ण निर्मल केवलज्ञान के बीजभूत निर्विकार स्वसंवेदन ज्ञान में ही भावना करना चाहिये - यह अभिप्राय है ।

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    + ज्ञान-प्रपंच व्याख्यान के बाद आधारभूत सर्वज्ञ को नमस्कार -
    तस्स णमाइं लोगो देवासुरमणुअरायसंबंधो ।
    भत्तो करेदि णिच्चं उवजुत्तो तं तहा वि अहं ॥54॥
    नमन करते जिन्हें नरपति सुर-असुरपति भक्तगण
    मैं भी उन्हीं सर्वज्ञजिन के चरण में करता नमन ॥५४॥
    अन्वयार्थ : देवराज, असुरराज और मनुजराज सम्बन्धी भक्तलोक उपयोग-पूर्वक हमेशा उन सर्वज्ञ भजवान को नमस्कार करते हैं; मैं भी उसीप्रकार उनको नमस्कार करता हूँ ॥५४॥

    जयसेनाचार्य :
    [करेदि] - करता है । वह कौन करता है? [लोगो] - लोक करता है । कैसा लोक करता है? [देवासुरमणुअरायसंबंधो] - देवेन्द, असुरेन्द्र और नरेन्द्र सम्बन्धी लोक करता है । और वह लोक कैसा है? [भत्तो] - भक्त है । [णिच्चं] - सदैव । और वह लोक किस विशेषता वाला है? [उवजुत्तो] - उपयोगयुक्त अथवा प्रयत्नशील है । ऐसा लोक क्या करता है? [णमाइं] - नमस्कार करता है । किन्हें नमस्कार करता है? उन पूर्वोक्त सर्वज्ञ को नमस्कार करता है । [तं तहा वि अहं] - मैं ग्रन्थकर्ता भी उन सर्वज्ञ को उसी प्रकार से नमस्कार करता हूँ ।

    यहाँ अर्थ यह है कि जैसे देवेन्द्र, चक्रवर्ती आदि अनन्त, अक्षय सुखादि गुणों के स्थानभूत सर्वज्ञ स्वरूप को नमस्कार करते हैं; उसी प्रकार उस पद का अभिलाषी मैं भी परम भक्ति से उनको प्रणाम करता हूँ ।

    इस प्रकार आठ स्थलों द्वारा ३२ गाथायें और उसके बाद एक नमस्कार-गाथा - इस प्रकार सामूहिक रूप से ३३ गाथाओं द्वारा ज्ञानप्रपंच नामक तीसरा अन्तराधिकार पूर्ण हुआ ।

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    + ज्ञान और सुख की हेयोपादेयता -
    अत्थि अमुत्तं मुत्तं अदिंदियं इंदियं च अत्थेसु । (53)
    णाणं च तहा सोक्खं जं तेसु परं च तं णेयं ॥55॥
    अस्त्यमूर्तं मूर्तमतीन्द्रियमैन्द्रियं चार्थेषु ।
    ज्ञानं च तथा सौख्यं यत्तेषु परं च तत् ज्ञेयम् ॥५३॥
    मूर्त और अमूर्त इन्द्रिय अर अतीन्द्रिय ज्ञान-सुख
    इनमें अमूर्त अतीन्द्रियी ही ज्ञान-सुख उपादेय हैं ॥५५॥
    अन्वयार्थ : [अर्थेषु ज्ञानं] पदार्थ सम्बन्धी ज्ञान [अमूर्तं मूर्तं] अमूर्त या मूर्त, [अतीन्द्रिय ऐन्द्रिय च अस्ति] अतीन्द्रिय या ऐन्द्रिय होता है; [च तथा सौख्यं] और इसी-प्रकार (अमूर्त या मूर्त, अतीन्द्रिय या ऐन्द्रिय) सुख होता है । [तेषु च यत् परं] उसमें जो प्रधान-उत्कृष्ट है [तत् ज्ञेयं] वह उपादेय-रूप जानना ॥५३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ज्ञान से अभिन्न सुख का स्वरूप विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए ज्ञान और सुख की हेयोपादेयता का (अर्थात् कौनसा ज्ञान तथा सुख हेय है और कौनसा उपादेय है वह) विचार करते हैं :-

    यहाँ, (ज्ञान तथा सुख दो प्रकार का है-) एक ज्ञान तथा सुख मूर्त और इन्द्रियज है; और दूसरा (ज्ञान तथा सुख) अमूर्त और अतीन्द्रिय है । उसमें जो अमूर्त और अतीन्द्रिय है वह प्रधान होने से उपादेय-रूप जानना । वहाँ, पहला ज्ञान तथा सुख मूर्तरूप ऐसी क्षायोपशमिक उपयोग-शक्तियों से उस-उस प्रकार की इन्द्रियों के द्वारा उत्पन्न होता हुआ पराधीन होने से इसलिये गौण है ऐसा समझकर वह हेय है अर्थात् छोड़ने योग्य है; और दूसरा ज्ञान तथा सुख अमूर्तरूप ऐसी चैतन्यानुविधायी ऐकाकी आत्मपरिणाम शक्तियों से तथाविध अतीन्द्रिय स्वाभाविक चिदाकार-परिणामों के द्वारा उत्पन्न होता हुआ अत्यन्त आत्माधीन होने से इसलिये मुख्य है, ऐसा समझकर वह (ज्ञान और सुख) उपादेय अर्थात् ग्रहण करने योग्य है ॥५३॥

    इन्द्रियज = इन्द्रियों द्वारा उत्पन्न होनेवाला; ऐन्द्रिय
    कादाचित्क = कदाचित्-कभी कभी होनेवाला; अनित्य
    मूर्तिक इन्द्रियज ज्ञान क्रम से प्रवृत्त होता है; युगपत्‌ नहीं होता; तथा मूर्तिक इन्द्रियज सुख भी क्रमश: होता है, एक ही साथ सर्व इन्द्रियों के द्वारा या सर्व प्रकार से नहीं होता
    सप्रतिपक्ष = प्रतिपक्ष-विरोधी सहित (मूर्त-इन्द्रियज ज्ञान अपने प्रतिपक्ष अज्ञानसहित ही होता है, और मूर्त इन्द्रियज सुख उसके प्रतिपक्षभूत दु:ख सहित ही होता है)
    सहानिवृद्धि = हानिवृद्धि सहित
    चैतन्यानुविधायी = चैतन्य के अनुसार वर्तनेवाली; चैतन्य के अनुकूलरूप से, विरुद्धरूप से नहीं, वर्तने वाली

    जयसेनाचार्य :
    अब 'सुखप्रपंच' नामक चतुर्थान्तराधिकार में अठारह गाथायें हैं । यहाँ पाँच स्थल हैं - उनमें से इसप्रकार सुखप्रपंचाधिकार में समुदायपातनिका हुई ।

    (अब यहाँ अधिकार - गाथा रूप से पहला स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब उपादेयभूत अतीन्द्रियसुख के स्वरूप का विस्तार करते हुये अतीन्द्रियज्ञान और अतीन्द्रियसुख उपादेय हैं, तथा इन्द्रिय जन्य ज्ञान सुख हेय हैं - इसप्रकार प्रतिपादन रूप से सबसे पहले प्रथम अधिकार स्थल गाथा द्वारा चार स्थलों को सूत्रित करते हैं (व्यवस्थित करते हैं) -

    [अत्थि] - है । क्या है- इस क्रिया का कर्ता कौन है? [णाणं] - ज्ञान है - यहाँ भिन्न विशिष्ट क्रम परस्पर सम्बन्ध-रहितता का सूचक है । वह ज्ञान किस विशेषतावाला है? [अमुत्तं मुत्तं] - अमूर्त और मूर्त है । वह ज्ञान और किस विशेषतावाला है? [अदिंदियं इदियं च] - जो ज्ञान अमूर्त है, वह अतीन्द्रिय है और जो मूर्त है, वह इन्द्रियजन्य है । इन विशेषताओं वाला ज्ञान है । इन विशेषताओ वाला ज्ञान किन विषयों में है? [अत्थेसु] - ऐसा ज्ञान, ज्ञेय पदार्थों के सम्बन्ध में है । [तहा सोक्खं च] - उसीप्रकार ज्ञान के समान अमूर्त, अतीन्द्रिय और मूर्त, इन्द्रियजन्य सुख होता है । [जं तेसु परं च तं णेयं] - उन पूर्वोक्त ज्ञान और सुख के मध्य जो उत्कृष्ट अतीन्द्रिय ज्ञान और सुख है, वह उपादेय है - ऐसा जानना चाहिये ।

    उसका ही विस्तार करते हैं – अमूर्त, क्षायिकी, अतीन्द्रिय, चिदानन्द एक लक्षणवाली शुद्धात्म-शक्तियों से उत्पन्न होने के कारण स्वाधीन और अविनश्वर होने से अतीन्द्रिय ज्ञान और सुख उपादेय है; तथा पूर्वोक्त अमूर्त शुद्धात्म-शक्तियों से विरुद्ध लक्षणवाली क्षायोपशमिक इन्द्रिय- शक्तियों से उत्पन्न होने के कारण पराधीन और विनश्वर होने से इन्द्रियजन्य ज्ञान और सुख हेय है- यह तात्पर्य है ।

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    + अतीन्द्रिय सुख का साधनभूत अतीन्द्रिय ज्ञान उपादेय है -
    जं पेच्छदो अमुत्तं मुत्तेसु अदिंदियं च पच्छण्णं । (54)
    सयलं सगं च इदरं तं णाणं हवदि पच्चक्खं ॥56॥
    यत्प्रेक्षमाणस्यामूर्तं मूर्तेष्वतीन्द्रियं च प्रच्छन्नम् ।
    सकलं स्वकं च इतरत् तद्ज्ञानं भवति प्रत्यक्षम् ॥५४॥
    अमूर्त को अर मूर्त में भी अतीन्द्रिय प्रच्छन्न को
    स्व-पर को सर्वार्थ को जाने वही प्रत्यक्ष है ॥५६॥
    अन्वयार्थ : [प्रेक्षमाणस्य यत्] देखने-वाले का जो ज्ञान [अमूर्तं] अमूर्त को, [मूर्तेषु] मूर्त पदार्थों में भी [अतीन्द्रियं] अतीन्द्रिय को, [च प्रच्छन्न] और प्रच्छन्न को, [सकलं] इन सबको- [स्वकं च इतरत] स्व तथा पर को - देखता है, [तद् ज्ञानं] वह ज्ञान [प्रत्यक्ष भवति] प्रत्यक्ष है ॥५४॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, अतीन्द्रिय-सुख का साधनभूत (कारणरूप) अतीन्द्रिय-ज्ञान उपादेय है - इसप्रकार उसकी प्रशंसा करते हैं :-

    जो अमूर्त है, जो मूर्त पदार्थों में भी अतीन्द्रिय है, और जो प्रच्छन्न है, उस सबको-जो कि स्व और पर इन दो भेदों में समा जाता है उसे - अतीन्द्रिय ज्ञान अवश्य देखता है । अमूर्त धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय इत्यादि, मूर्त पदार्थों में भी अतीन्द्रिय परमाणु इत्यादि, तथा उन सबका-जो कि स्व और पर के भेद से विभक्त हैं उनका वास्तव में उस अतीन्द्रिय ज्ञान के दृष्टापन है; (अर्थात् उन सबको वह अतीन्द्रिय ज्ञान देखता है) क्योंकि वह (अतीन्द्रिय ज्ञान) प्रत्यक्ष है । जिसे अनन्त शुद्धि का सद्धाव प्रगट हुआ है, ऐसे ऐसे उस प्रत्यक्ष ज्ञान को, जैसे दाह्याकार दहन का अतिक्रमण नहीं करते उसी प्रकार ज्ञेयाकार ज्ञान का अतिक्रम (उल्लंघन) न करने से - यथोक्त प्रभाव का अनुभव करते हुए (उपर्युक्त पदार्थों को जानते हुए) कौन रोक सकता है ? (अर्थात् कोई नहीं रोक सकता ।) इसलिये वह (अतीन्द्रिय ज्ञान) उपादेय है ॥५४॥

    प्रच्छन्न = गुप्त; अन्तरित; ढका हुआ
    असांप्रतिक = अतात्कालिक; वर्तमानकालीन नहि ऐसा; अतीत-अनागत
    अन्तर्लीन = अन्दर लीन हुए; अन्तर्मग्न
    अक्ष = आत्मा का नाम 'अक्ष' भी है । (इन्द्रियज्ञान अक्ष = अर्थात् इन्द्रियों के द्वारा जानता है; अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष ज्ञान अक्ष अर्थात् आत्मा के द्वारा ही जानता है)
    ज्ञेयाकार ज्ञान को पार नहीं कर सकते-ज्ञान की हद से बाहर जा नहीं सकते, ज्ञान में जान ही लेते है

    जयसेनाचार्य :
    (अब यहाँ अतीन्द्रिय ज्ञान की प्रधानता परक दूसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब पूर्वोक्त उपादेयभूत अतीन्द्रिय ज्ञान को विशेषरूप से व्यक्त करते हैं -

    [जं] - जो अतीन्द्रिय ज्ञान रूप कर्ता है, अर्थात् इस वाक्य का कर्ता जो ज्ञान है । [पेच्छदो] - देखनेवाले पुरुष का वह ज्ञान जानता है । उसका वह ज्ञान क्या-क्या जानता है? [अमुत्तं] - अमूर्त अतीन्द्रिय, निरुपराग, सदानन्द एक सुख स्वभाववाले परमात्मद्रव्य प्रभृति सर्व अमूर्त द्रव्य-समूह को, [मुत्तेसु अर्दिदियं च] - मूर्त पुद्गल द्रव्यों में जो अतीन्द्रिय पुद्गल परमाणु आदि हैं उन्हें जानता है । [सयलं] - वे पूर्वोक्त सर्व ज्ञेय दो प्रकार के हैं । वे ज्ञेय दो प्रकार के कैसे हैं? [सगं च इदरं] - यथासंभव कोई ज्ञेय स्वद्रव्यगत है और अन्य पर द्रव्यगत हैं । उन दोनों को जिस कारण जानता है, उस कारण [तं णाणं] - वह पूर्वोक्त ज्ञान [हवदि] - है । वह ज्ञान कैसा है? वह ज्ञान [पच्चक्ख्म] - प्रत्यक्ष है ।

    यहाँ शिष्य कहता है-ज्ञानप्रपंचाधिकार पहले ही पूर्ण हो गया है, इस सुख-प्रपंचाधिकार में सुख ही कहना चाहिये । आचार्य उसका निराकरण करते है- जो अतीन्द्रिय-ज्ञान पहले कहा गया है, वही अभेदनय से सुख है- ऐसा बताने के लिये अथवा वहाँ ज्ञान की मुख्यता होने से हेयोपादेय विचार नहीं किया है -यह बताने के लिये सुखप्रपंचाधिकार में भी ज्ञान का स्वरूप स्पष्ट करते हैं ।

    इस प्रकार अतीन्द्रिय-ज्ञान उपादेय है - इस कथन की मुख्यता से एक गाथा द्वारा दूसरा स्थल पूर्ण हुआ ।

    (अब हेयभूत इन्द्रिय-ज्ञान की मुख्यता से चार गाथाओं में निबद्ध तीसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

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    + इन्द्रिय-सुख का साधनभूत इन्द्रिय-ज्ञान हेय है -
    जीवो सयं अमुत्तो मुत्तिगदो तेण मुत्तिणा मुत्तं । (55)
    ओगेण्हित्ता जोग्गं जाणदि वा तं ण जाणादि ॥57॥
    जीवः स्वयममूर्तो मूर्तिगतस्तेन मूर्तेन मूर्तम् ।
    अवगृह्य योग्यं जानाति वा तन्न जानाति ॥५५॥
    यह मूर्ततनगत जीव मूर्तपदार्थ जाने मूर्त से
    अवग्रहादिकपूर्वक अर कभी जाने भी नहीं ॥५७॥
    अन्वयार्थ : [स्वयं अमूर्त:] स्वयं अमूर्त ऐसा [जीव:] जीव [मूर्तिगतः] मूर्त शरीर को प्राप्त होता हुआ [तेन मूर्तेन] उस मूर्त शरीर के द्वारा [योग्य मूर्तं] योग्य मूर्त पदार्थ को [अवग्रह्य] *अवग्रह करके (इन्द्रिय-ग्रहण योग्य मूर्त पदार्थ का अवग्रह करके) [तत्] उसे [जानाति] जानता है [वा न जानाति] अथवा नहीं जानता (कभी जानता है और कभी नहीं जानता) ॥५५॥
    *अवग्रह = मतिज्ञान से किसी पदार्थ को जानने का प्रारम्भ होने पर पहले ही अवग्रह होता है क्योंकि मतिज्ञान अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा-इस क्रम से जानता है

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, इन्द्रिय-सुख का साधनभूत (कारणरूप) इन्द्रियज्ञान हेय है - इसप्रकार उसकी निन्दा करते हैं-

    इन्द्रियज्ञान को उपलम्भक भी मूर्त है और उपलभ्य भी मूर्त है । वह इन्द्रियज्ञान वाला जीव स्वयं अमूर्त होने पर भी मूर्त-पचेन्द्रियात्मक शरीर को प्राप्त होता हुआ, ज्ञप्ति उत्पन्न करने में बल-धारण का निमित्त होने से जो उपलम्भक है ऐसे उस मूर्त (शरीर) के द्वारा मूर्त ऐसी स्पर्शादि-प्रधान वस्तु को-जो कि योग्य हो अर्थात् जो (इन्द्रियों के द्वारा) उपलभ्य हो उसे- अवग्रह करके, कदाचित उससे आगे-आगे की शुद्धि के सद्धाव के कारण उसे जानता है और कदाचित अवग्रह से आगे आगे की शुद्धि के असद्भाव के कारण नहीं जानता, क्योंकि वह (इन्द्रिय ज्ञान) परोक्ष है । परोक्षज्ञान, चैतन्य-सामान्य के साथ (आत्मा का) अनादि-सिद्ध सम्बन्ध होने पर भी जो अति दृढ़तर अज्ञानरूप तमोग्रन्थि (अन्धकार-समूह) द्वारा आवृत हो गया है, ऐसा आत्मा पदार्थ को स्वयं जानने के लिये असमर्थ होने से उपात्त और अनुपात्त पर-पदार्थरूप सामग्री को ढूँढने की व्यग्रता से अत्यन्त चंचल-तरल-अस्थिर वर्तता हुआ, अनन्त-शक्ति से च्युत होने से अत्यन्त विक्लव वर्तता हुआ, महामोह-मल्ल के जीवित होने से परपरिणति का (पर को परिणमित करने का) अभिप्राय करने पर भी पद-पद पर ठगाता हुआ, परमार्थत: अज्ञान में गिने जाने योग्य है । इसलिये वह हेय है ॥५५॥

    उपलम्भक = बतानेवाला, जानने में निमित्त-भूत । (इन्द्रियज्ञान को पदार्थों के जानने में निमित्त-भूत मूर्त पचेन्द्रियात्मक शरीर है)
    उपलभ्य = जनाने योग्य
    स्पर्शादिप्रधान = जिसमें स्पर्श, रस, गंध और वर्ण मुख्य हैं, ऐसी
    उपात्त = पास (इन्द्रिय, मन इत्यादि उपात्त पर पदार्थ हैं)
    अनुपात्त = अप्राप्त (प्रकाश इत्यादि अनुपात्त पर पदार्थ हैं)
    विक्लव = खिन्न; दुःखी, घबराया हुआ

    जयसेनाचार्य :
    अब हेयभूत इन्द्रिय-सुख का कारण होने से और अल्प-विषय होने से इन्द्रिय-ज्ञान हेय है ऐसा उपदेश देते हैं -

    [जीवो सयं अमुत्तो] - प्रथम तो जीव शक्तिरूप से शुद्ध-द्रव्यार्थिक-नय से अमूर्त, अतीन्द्रिय ज्ञान-सुख स्वाभावी है, बाद में अनादि बंध के वश से व्यवहार-नय से [मुत्तिगदो] – मूर्त शरीरगत – मूर्त शरीररूप से परिणत होता है । [तेण मुत्तिणा] – उस मूर्त शरीर से – मूर्त शरीर के आधार से उत्पन्न मूर्त द्रव्येंद्रिय-भावेंद्रिय के आधार से [मुत्तं] मूर्त वस्तु को [ओगेण्हित्ता] – अवग्रहादि रूप से क्रम और साधन सम्बन्धी व्यवधान रूप कर [जोग्गं] – उन स्पर्शादि मूर्त वस्तु को । कैसी स्पर्शादि मूर्त वस्तु को? इन्द्रिय ग्रहण के योग्य मूर्त वस्तुओं को [जाणदि वा तण्ण जाणादि]- स्वावरण कर्म के क्षयोपशम योग्य कुछ स्थूल को जानता है तथा विशेष क्षयोपशम का अभाव होने से सूक्ष्म को नहीं जानता है ।

    यहाँ भाव यह है – यद्यपि इन्द्रियज्ञान व्यवहार से प्रत्यक्ष कहा जाता है, तथापि निश्चय से केवलज्ञान की अपेक्षा परोक्ष ही है; और परोक्षज्ञान, जितने अंशों में सूक्ष्म पदार्थ को नहीं जानता उतने अंशों में मन के खेद का कारण होता है, और खेद दुःख हैं- इसप्रकार दुःख को उत्पन्न करने वाला होने से इन्द्रियज्ञान हेय है ।

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    + इन्द्रियाँ मात्र अपने विषयों में भी युगपत् प्रवृत्त नहीं होतीं, इसलिये इन्द्रियज्ञान हेय ही है -
    फासो रसो य गंधो वण्णो सद्दो य पोग्गला होंति । (56)
    अक्खाणं ते अक्खा जुगवं ते णेव गेण्हंति ॥58॥
    स्पर्शो रसश्च गन्धो वर्णः शब्दश्च पुद्गला भवन्ति ।
    अक्षाणां तान्यक्षाणि युगपत्तान्नैव गृह्णन्ति ॥५६॥
    पौद्गलिक स्पर्श रस गंध वर्ण अर शब्दादि को
    भी इन्द्रियाँ इक साथ देखो ग्रहण कर सकती नहीं ॥५८॥
    अन्वयार्थ : [स्पर्श:] स्पर्श, [रस: च] रस, [गंध:] गंध, [वर्ण:] वर्ण [शब्द: च] और शब्द [पुद्गला:] पुद्गल हैं, वे [अक्षाणां भवन्ति] इन्द्रियों के विषय हैं [तानि अक्षाणि] (परन्तु) वे इन्द्रियाँ [तान्] उन्हें (भी) [युगपत्] एक साथ [न एव गृह्णन्ति] ग्रहण नहीं करतीं (नहीं जान सकतीं) ॥५६॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, इन्द्रियाँ मात्र अपने विषयों में भी युगपत् प्रवृत्त नहीं होतीं, इसलिये इन्द्रियज्ञान हेय ही है, ऐसा निश्चय करते हैं :-

    मुख्य ऐसे स्पर्श-रस-गंध-वर्ण तथा शब्द-जो कि पुद्गल हैं वे- इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण होने योग्य (ज्ञात होने योग्य), हैं । (किन्तु) इन्द्रियों के द्वारा वे भी युगपद् (एक साथ) ग्रहण नहीं होते (जानने में नहीं आते) क्योंकि क्षयोपशम की उसप्रकार की शक्ति नहीं है । इन्द्रियों के जो क्षयोपशम नाम की अन्तरंग ज्ञातृशक्ति है वह कौवे की आँख की पुतली की भाँति क्रमिक प्रवृत्ति-वाली होने से अनेकत: प्रकाश के लिये (एक ही साथ अनेक विषयों को जानने के लिये) असमर्थ है, इसलिये द्रव्येन्द्रिय द्वारों के विद्यमान होने पर भी समस्त इन्द्रियों के विषयों का (विषयभूत पदार्थों का) ज्ञान एक ही साथ नहीं होता, क्योंकि इन्द्रिय ज्ञान परोक्ष है ॥५६॥

    स्पर्श, रस, गंध और वर्ण-यह पुद्गलके मुख्य गुण हैं

    जयसेनाचार्य :
    अब, चक्षु आदि इन्द्रिय-ज्ञान, रूपादि अपने विषय को भी एक साथ नहीं जानता है, अत: हेय है; ऐसा निश्चय करते हैं -

    [फासो रसो य गंधो वण्णो सद्दो व पुग्गला होंति] - स्पर्श, रस, गंध, वर्ण, शब्द पुद्गल मूर्त हैं । और वे विषय हैं । वे किनके विषय हैं? [अक्खाणं] - वे स्पर्शनादि इन्द्रियों के विषय हैं । [ते अक्खा] - वे इन्द्रियरूप कर्ता (इस वाक्य में कर्ता के स्थानीय वे इन्द्रियाँ) [जुगवं ते णेव गेण्हंति]- एक साथ उन अपने विषयों को भी ग्रहण नहीं करतीं - जानती नहीं हैं ।

    यहाँ अभिप्राय यह है - जैसे सर्व प्रकार से उपादेयभूत (प्रगट करने योग्य) अनन्त सुख का उपादान कारणभूत केवलज्ञान, एक साथ सम्पूर्ण वस्तुओं को जानता हुआ जीव के सुख का कारण है, वैसे अपने विषय में भी एक साथ जानकारी का अभाव होने से यह इन्द्रिय-ज्ञान, सुख का कारण नहीं है ।

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    + इन्द्रियज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है -
    परदव्वं ते अक्खा णेव सहावो त्ति अप्पणो भणिदा । (57)
    उवलद्धं तेहि कधं पच्चक्खं अप्पणो होदि ॥59॥
    परद्रव्यं तान्यक्षाणि नैव स्वभाव इत्यात्मनो भणितानि ।
    उपलब्धं तैः कथं प्रत्यक्षमात्मनो भवति ॥५७॥
    इन्द्रियाँ परद्रव्य उनको आत्मस्वभाव नहीं कहा
    अर जो उन्हीं से ज्ञात वह प्रत्यक्ष कैसे हो सके ?॥५९॥
    अन्वयार्थ : [तानि अक्षाणि] वे इन्द्रियाँ [परद्रव्यं] पर द्रव्य हैं [आत्मनः स्वभाव: इति] उन्हें आत्म-स्वभावरूप [न एव भणितानि] नहीं कहा है; [तै:] उनके द्वारा [उपलब्धं] ज्ञात [आत्मनः] आत्मा को [प्रत्यक्षं] प्रत्यक्ष [कथं भवति] कैसे हो सकता है ? ॥५७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, यह निश्चय करते हैं कि इन्द्रियज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है :-

    जो केवल आत्मा के प्रति ही नियत हो वह (ज्ञान) वास्तव में प्रत्यक्ष है । यह (इन्द्रियज्ञान) तो, जो भिन्न अस्तित्ववाली होने से परद्रव्यत्व को प्राप्त हुई है, और आत्म-स्वभावत्व को किंचित्मात्र स्पर्श नहीं करतीं (आत्मस्वभावरूप किंचित्मात्र भी नहीं हैं) ऐसी इन्द्रियों के द्वारा उपलब्धि करके (ऐसी इन्द्रियों के निमित्त से पदार्थों को जानकर) उत्पन्न होता है, इसलिये वह (इन्द्रियज्ञान) आत्मा के लिये प्रत्यक्ष नहीं हो सकता ॥५७॥

    जयसेनाचार्य :
    अब, इन्द्रिय-ज्ञान प्रत्यक्ष नहीं है,यह निश्चित करते हैं -

    [परदव्वं ते अक्खा] – वे प्रसिद्ध इन्द्रियाँ परद्रव्य हैं ।वे किसके परद्रव्य हैं? वे आत्मा के परद्रव्य हैं । [णेव सहावो त्ति अप्पणो भणिदा] – आत्मा का जो वह विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभाव है, इन्द्रियाँ निश्चय से उस स्वभाव रूप नहीं कही गई है ।वे आत्मस्वभावरूप क्यों नही कही गई हैं? वे इन्द्रियाँ पृथक अस्तित्व से रचित होने के कारण उसरूप नहीं कही गई है। [उवलद्धं तेहिं] जो पंचेन्द्रिय विषयभूत वस्तु उनके द्वारा ज्ञात है, [कधं पच्चक्खं अप्पणो होदि] – वह वस्तु आत्मा के प्रत्यक्ष कैसे हो सकती है? (किसी भी प्रकार नहीं हो सकती)

    और उसी प्रकार विविध मनोरथों की व्याप्ति के विषय में प्रतिपाद्य-प्रतिपादकादि(विषय-विषयी आदि) विकल्प-जालरूप जो मन वह भी इन्द्रिय ज्ञान के समान निश्चय से परोक्ष है-ऐसा जान कर क्या करना चाहिये? सम्पूर्ण एक अखण्ड प्रत्यक्ष प्रतिभासमय उत्कृष्ट ज्योति-केवलज्ञान के कारणभूत शुद्धात्म-स्वरूप की भावना से उत्पन्न परमाह्लाद एक लक्षण सुखसंवित्ति (आनन्दानुभूति) के आकार परिणतिरूप रागादि विकल्पों की उपाधि रहित स्वसंवेदन ज्ञान में (उसी एक शुद्धात्मस्वरूप की) भावना करना चाहिये – यह अभिप्राय है ।

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    + परोक्ष और प्रत्यक्ष के लक्षण बतलाते हैं -
    जं परदो विण्णाणं तं तु परोक्खं ति भणिदमट्‌ठेसु । (58)
    जदि केवलेण णादं हवदि हि जीवेण पच्चक्खं ॥60॥
    यत्परतो विज्ञानं तत्तु परोक्षमिति भणितमर्थेषु ।
    यदि केवलेन ज्ञातं भवति हि जीवेन प्रत्यक्षम् ॥५८॥
    जो दूसरों से ज्ञात हो बस वह परोक्ष कहा गया
    केवल स्वयं से ज्ञात जो वह ज्ञान ही प्रत्यक्ष है ॥६०॥
    अन्वयार्थ : [परत:] पर के द्वारा होने वाला [यत्] जो [अर्थेषु विज्ञानं] पदार्थ सम्बन्धी विज्ञान है [तत् तु] वह तो [परोक्षं इति भणितं] परोक्ष कहा गया है, [यदि] यदि [केवलेन जीवेण] मात्र जीव के द्वारा ही [ज्ञात भवति हि] जाना जाये तो [प्रत्यक्षं] वह ज्ञान प्रत्यक्ष है ॥५८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, परोक्ष और प्रत्यक्ष के लक्षण बतलाते हैं :-

    यहाँ (इस गाथा में) सहज सुख का साधनभूत ऐसा यही महा-प्रत्यक्ष ज्ञान इच्छनीय माना गया है - उपादेय माना गया है (ऐसा आशय समझना) ॥५८॥

    परोपदेश = अन्य का उपदेश
    उपलब्धि = ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम के निमित्त से उत्पन्न पदार्थों को जानने की शक्ति (यह 'लब्ध' शक्ति जब 'उपर्युक्त' होती है, तभी पदार्थ ज्ञात होता है)
    संस्कार = पूर्व ज्ञात पदार्थ की धारणा
    चक्षुइन्द्रिय द्वारा रूपी पदार्थ को देखने में प्रकाश भी निमित्तरूप होता है
    प्रादुर्भाव को प्राप्त = प्रगट उत्पन्न

    जयसेनाचार्य :
    अब, पुन: अन्य विधि से प्रत्यक्ष- परोक्ष का लक्षण कहते हैं -

    [जं परदो विण्णाणं तं तु परोक्ख त्ति भणिदं] - जो पर से ज्ञान होता है वह परोक्ष कहा गया है । किन विषयों सम्बन्धी ज्ञान को परोक्ष कहा गया है? [अट्ठेसु] –ज्ञेय पदार्थों सम्बन्धी पर से होनेवाले ज्ञान को परोक्ष कहा गया है । [जदि केवलेण णादं हवदि हि] - यदि केवल - बिना किसी की सहायता के स्पष्टरूप से ज्ञात होता है । किस कर्ता द्वारा ज्ञात होता है? जीव द्वारा ज्ञात होता है । तो [पच्चक्खं] - प्रत्यक्ष है ।

    यहाँ विस्तार करते हैं – इन्द्रिय, मन, परोपदेश, प्रकाश आदि बाह्य कारणभूत और इसीप्रकार ज्ञानावरणीयकर्म के क्षयोपशम से उत्पन्न पदार्थों को ग्रहण करने की शक्तिरूप उपलब्धि – लब्धि से और अन्तरंग कारणभूत पदार्थ-ज्ञान के अवधारणरूप संस्कार से जो ज्ञान उत्पन्न होता है, वह पराधीन होने से परोक्ष कहा गया है । और यदि पूर्वोक्त सर्व परद्रव्यों से निरपेक्ष मात्र शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी परमात्मा से उत्पन्न होता है, तो वह ज्ञान अक्ष नामक आत्मा को लेकर (आत्मा के आश्रय से) उत्पन्न होने से प्रत्यक्ष है - यह गाथा का अभिप्राय है ।

    इसप्रकार हेयभूत इन्द्रिय-ज्ञान के कथन की मुख्यता से चार गाथाओं में निबद्ध तीसरा स्थल पूर्ण हुआ ।

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    + प्रत्यक्ष-ज्ञान पारमार्थिक सुख-रूप -
    जादं सयं समंतं णाणमणंतत्थवित्थडं विमलं । (59)
    रहिदं तु ओग्गहादिहिं सुहं ति एगंतियं भणिदं ॥61॥
    जातं स्वयं समंतं ज्ञानमनन्तार्थविस्तृतं विमलम् ।
    रहितं त्ववग्रहादिभिः सुखमिति ऐकान्तिकं भणितम् ॥५९॥
    स्वयं से सर्वांग से सर्वार्थग्राही मलरहित
    अवग्रहादि विरहित ज्ञान ही सुख कहा जिनवरदेव ने ॥६१॥
    अन्वयार्थ : [स्वयं जात] अपने आप ही उत्पन्न [समंतं] समंत (सर्व प्रदेशों से जानता हुआ) [अनन्तार्थविस्तृतं] अनन्त पदार्थों में विस्तृत [विमलं] विमल [तु] और [अवग्रहादिभि: रहितं] अवग्रहादि से रहित- [ज्ञानं] ऐसा ज्ञान [ऐकान्तिकं सुखं] ऐकान्तिक सुख है [इति भणित] ऐसा (सर्वज्ञ-देव ने) कहा है ॥५९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, इसी प्रत्यक्षज्ञान को पारमार्थिक सुखरूप बतलाते हैं :-

    1. स्वयं उत्पन्न होने से,
    2. समंत होने से,
    3. अनन्त-पदार्थों में विस्तृत होने से,
    4. विमल होने से और
    5. अवग्रहादि रहित होने से,
    प्रत्यक्षज्ञान ऐकान्तिक सुख है यह निश्चित होता है, क्योंकि एक मात्र अनाकुलता ही सुख का लक्षण है । (इसी बात को विस्तार-पूर्वक समझाते हैं -- )

    1. पर के द्वारा उत्पन्न होता हुआ पराधीनता के कारण
    2. असमंत होने से इतर द्वारों के आवरण के कारण
    3. मात्र कुछ पदार्थों में प्रवर्तमान होता हुआ अन्य पदार्थों को जानने की इच्छा के कारण,
    4. समल होने से असम्यक् अवबोध के कारण (--कर्ममल-युक्त होने से संशय-विमोह-विभ्रम सहित जानने के कारण), और
    5. अवग्रहादि सहित होने से क्रमश: होने वाले पदार्थ-ग्रहण के खेद के कारण
    (इन कारणों को लेकर), परोक्ष ज्ञान अत्यन्त आकुल है; इसलिये वह परमार्थ से सुख नहीं है ।

    और यह प्रत्यक्ष ज्ञान तो अनाकुल है, क्योंकि-
    1. अनादि ज्ञान-सामान्यरूप स्वभाव पर महा विकास से व्याप्त होकर स्वत: ही रहने से स्वयं उत्पन्न होता है, इसलिये आत्माधीन है, (और आत्माधीन होने से आकुलता नहीं होती);
    2. समस्त आत्म-प्रदेशों में परम समक्ष ज्ञानोपयोग रूप होकर, व्याप्त होनेसे समंत है, इसलिये अशेष द्वार खुले हुए हैं (और इसप्रकार कोई द्वार बन्द न होने से आकुलता नहीं होती);
    3. समस्त वस्तुओं के ज्ञेयाकारों को सर्वथा पी जाने से परम विविधता में व्याप्त होकर रहने से अनन्त पदार्थों में विस्तृत है, इसलिये सर्व पदार्थों को जानने की इच्छा का अभाव है (और इस प्रकार किसी पदार्थ को जानने की इच्छा न होने से आकुलता नहीं होती);
    4. सकल शक्ति को रोकनेवाला कर्मसामान्य (ज्ञान में से) निकल जाने से (ज्ञान) अत्यन्त स्पष्ट प्रकाश के द्वारा प्रकाशमान (तेजस्वी) स्वभाव में व्याप्त होकर रहने से विमल है इसलिये सम्यक रूप से (बराबर) जानता है (और इसप्रकार संशयादि रहितता से जानने के कारण आकुलता नहीं होती); तथा
    5. जिनने त्रिकाल का अपना स्वरूप युगपत् समर्पित किया है (-एक ही समय बताया है) ऐसे लोकालोक मे व्याप्त होकर रहने से अवग्रहादि रहित है इसलिये क्रमश: होने वाले पदार्थ ग्रहण के खेद का अभाव है ।
    -इसप्रकार (उपरोक्त पाँच कारणों से) प्रत्यक्ष ज्ञान अनाकुल है । इसलिये वास्तव में वह पारमार्थिक सुख है ॥५९॥

    समन्त = चारों ओर-सर्व भागों में वर्तमान; सर्व आत्म-प्रदेशों से जानता हुआ; समस्त; सम्पूर्ण, अखण्ड
    ऐकान्तिक = परिपूर्ण; अन्तिम, अकेला; सर्वथा
    परोक्ष ज्ञान खंडित है अर्थात् (वह अमुक प्रदेशों के द्वारा ही जानता है); जैसे-वर्ण आँख जितने प्रदेशों के द्वारा ही (इन्द्रियज्ञान से) ज्ञात होता है; अन्य द्वार बन्द हैं
    इतर = दूसरे; अन्य; उसके सिवाय के
    पदार्थग्रहण अर्थात् पदार्थ का बोध एक ही साथ न होने पर अवग्रह, ईहा इत्यादि क्रमपूर्वक होने से खेद होता है
    समक्ष = प्रत्यक्ष
    परमविविधता = समस्त पदार्थ समूह जो कि अनन्त विविधतामय है

    जयसेनाचार्य :
    (अब चार गाथाओं में निबद्ध मुख्यतया अतीन्द्रिय सुख का प्रतिपादक चौथा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब, अभेद नय से पाँच विशेषणों से विशिष्ट केवलज्ञान ही सुख है, ऐसा प्रतिपादन करते हैं -

    [जादं] - उत्पन्न है । कर्तारूप कौन उत्पन्न है - इस वाक्य में कर्ता कौन है ? [णाणं] - केवलज्ञान उत्पन्न है । वह कैसे उत्पन्न हैं? [सयं] - स्वयं ही वह उत्पन्न है? । वह केवलज्ञान और किस विशेषता वाला है? [समत्तं] – परिपूर्ण है । किस स्वरूपवाला है? [अणंतत्थवित्थडं] – वह अनन्त पदार्थों में विस्तृत है । वह और कैसा है? [रहियं तु ओग्गहादिहिं] - और वह अवग्रहादि से रहित है । वह और कैसा है? [विमलं] - संशयादि मल से रहित है । इसप्रकार पांच विशेषणों सहित जो केवलज्ञान है [सुहं ति एगंतियं भणियं] - वह सुख कहा गया है । वह सुख कहा गया है? वह नियम से (सर्वथा) सुख कहा गया है ।

    वह इसप्रकार - - इसप्रकार पांच विशेषणों से विशिष्ट जो क्षायिक ज्ञान है, वह अनाकुलता लक्षण वाले उत्कृष्ट आनन्दमय एकरूप वास्तविक सुख से नाम, लक्षण, प्रयोजन आदि की अपेक्षा भिन्न होने पर भी निश्चय से अभिन्न होने से पारमार्थिक सुख कहलाता है - यह अभिप्राय है ।

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    + ऐसे अभिप्राय का खंडन करते हैं कि 'केवलज्ञान को भी परिणाम के द्वारा' खेद का सम्भव होने से केवलज्ञान ऐकान्तिक सुख नहीं है -
    जं केवलं ति णाणं तं सोक्खं परिणमं च सो चेव । (60)
    खेदो तस्स ण भणिदो जम्हा घादी खयं जादा ॥62॥
    यत्केवलमिति ज्ञानं तत्सौख्यं परिणामश्च स चैव ।
    खेदस्तस्य न भणितो यस्मात् घातीनि क्षयं जातानि ॥६०॥
    अरे केवलज्ञान सुख परिणाममय जिनवर कहा
    क्षय हो गये हैं घातिया रे खेद भी उसके नहीं ॥६२॥
    अन्वयार्थ : [यत्] जो [केवलं इति ज्ञानं] 'केवल' नाम का ज्ञान है [तत् सौख्यं] वह सुख है [परिणाम: च] परिणाम भी [सः च एव] वही है [तस्य खेद: न भणित:] उसे खेद नहीं कहा है (अर्थात् केवलज्ञान में सर्वज्ञ-देव ने खेद नहीं कहा) [यस्मात्] क्योंकि [घातीनि] घाति-कर्म [क्षयं जातानि] क्षय को प्राप्त हुए हैं ॥६०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसे अभिप्राय का खंडन करते हैं कि 'केवलज्ञान को भी परिणाम के द्वारा खेद का सम्भव होने से केवलज्ञान ऐकान्तिक सुख नहीं है' :-

    यहाँ (केवलज्ञान के सम्बन्ध में), (१) खेद क्या, (२) परिणाम क्या तथा (३) केवलज्ञान और सुखका व्यतिरेक (भेद) क्या, कि जिससे केवलज्ञान को ऐकान्तिक सुखत्व न हो ?
    1. खेद के आयतन (स्थान) घाति-कर्म हैं, केवल परिणाम मात्र नहीं । घाति-कर्म महा मोह के उत्पादक होने से धतूरे की भाँति अतत्‌ में तत् बुद्धि धारण करवाकर आत्मा को ज्ञेयपदार्थ के प्रति परिणमन कराते हैं; इसलिये वे घातिकर्म, प्रत्येक पदार्थ के प्रति परिणमित हो-होकर थकने वाले आत्मा के लिये खेद के कारण होते हैं । उनका (घाति-कर्मों का) अभाव होने से केवलज्ञान में खेद कहाँ से प्रगट होगा ?
    2. और तीन-कालरूप तीन भेद जिसमें किये जाते हैं ऐसे समस्त पदार्थों की ज्ञेयाकाररूप (विविधता को प्रकाशित करने का स्थानभूत केवलज्ञान, चित्रित-दीवार की भाँति, स्वयं) ही अनन्त-स्वरूप स्वयमेव परिणमित होने से केवलज्ञान ही परिणाम है । इसलिये अन्य परिणाम कहाँ हैं कि जिनसे खेद की उत्पत्ति हो?
    3. और, केवलज्ञान समस्त स्वभाव-प्रतिघात के अभाव के कारण निरंकुश अनन्त शक्ति के उल्लसित होने से समस्त त्रैकालिक लोकालोक के- आकार में व्याप्त होकर कूटस्थतया अत्यन्त निष्कंप है, इसलिये आत्मा से अभिन्न ऐसा सुख-लक्षणभूत अनाकुलता को धारण करता हुआ केवलज्ञान ही सुख है, इसलिये केवलज्ञान और सुख का व्यतिरेक कहाँ है?
    इससे, यह सर्वथा अनुमोदन करने योग्य है (आनन्द से संमत करने योग्य है) कि केवलज्ञान ऐकान्तिक सुख है ॥६०॥

    अतत्‌ में तत्बुद्धि = वस्तु जिस स्वरूप नहीं है उस स्वरूप होने की मान्यता; जैसे कि- जड में चेतन बुद्धि (जड में चेतन की मान्यता), दुःख में सुख-बुद्धि वगैरह ।
    प्रतिघात = विघ्न; रुकावट; हनन; घात
    कूटस्थ = सदा एकरूप रहनेवाला; अचल (केवलज्ञान सर्वथा अपरिणामी नहीं है, किन्तु वह एक ज्ञेय से दूसरे ज्ञेय के प्रति नहीं बदलता-सर्वथा तीनों काल के समस्त ज्ञेयाकारों को जानता है, इसलिये उसे कूटस्थ कहा है)

    जयसेनाचार्य :
    अब, अनन्त पदार्थों की जानकारी होने से केवलज्ञान में भी खेद है, ऐसा पूर्व पक्ष (प्रश्न) होने पर निराकरण करते हैं -

    [जं केवलं ति णाणं तं सोक्खं] - जो केवलज्ञान है वही सुख है, इसलिये [खेदो तस्स ण भणिदो] -उस केवलज्ञान के खेद-दुःख नहीं कहा है । केवलज्ञान के दुःख क्यों नही कहा है? [जम्हा घादी खयं जादा] - क्योंकि मोहादि घातिकर्म क्षय को प्राप्त हुये हैं इसलिये उसे खेद नहीं कहा है । तब फिर उसके अनन्त पदार्थों की जानकारीरूप परिणाम दुःख का कारण होता होगा? ऐसा नहीं है । [परिणमं च सो चेव] - उस केवलज्ञान का वह परिणाम भी सुखरूप ही है ।

    यहाँ उसका विस्तार करते है- ज्ञानावरण - दर्शनावरण के उदय होने पर एक साथ पदार्थों को जानने में असमर्थ होने से क्रम-करण व्यवधान (बाधा) रूप से ग्रहण होने पर खेद होता है । दोनों आवरण कर्मों का अभाव हो जाने पर (पदार्थों को) एक साथ ग्रहण करने (जानने) में केवल-ज्ञान को खेद नही है, अपितु सुख ही है । वैसे ही उन भगवान के तीन-लोक तीन-कालवर्ती सर्व पदार्थों को एक साथ जानने में समर्थ अखण्ड एक रूप प्रत्यक्ष जानकारी स्वरूप परिणमता हुआ केवलज्ञान ही परिणाम है; केवलज्ञान से भिन्न कोई परिणाम नही है जिससे खेद होगा ।

    अथवा परिणाम के विषय में दूसरा व्याख्यान करते हैं - एक साथ अनन्त पदार्थों की जानकारीरूप परिणाम होने पर भी, वीर्यान्तराय के पूर्ण क्षय से अनन्त वीर्यता हो जाने के कारण खेद का हेतु नहीं है; और उसीप्रकार शुद्धात्मा के सम्पूर्ण प्रदेशों में समरसी भाव से परिणमित होते हुये सहज शुद्ध आनन्द एक स्वरूप सुखरस के आस्वादनरूप परिणमित आत्मा से अभिन्न अनाकुलता की अपेक्षा खेद नहीं है।

    इसप्रकार संज्ञा, लक्षण, प्रयोजन आदि कृत भेद होने पर भी निश्चय से अभेदरूप से परिणमन करता हुआ केवलज्ञान ही सुख कहा गया है । इससे यह निश्चित हुआ कि केवलज्ञान से भिन्न सुख नहीं है । इसीलिये केवलज्ञान में खेद संभव नहीं है।

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    + 'केवलज्ञान सुखस्वरूप है' ऐसा निरूपण करते हुए उपसंहार -
    णाणं अत्थंतगयं लोयालोएसु वित्थडा दिट्ठी । (61)
    णट्ठमणिट्ठं सव्वं इट्ठं पुण जं तु तं लद्धं ॥63॥
    ज्ञानमर्थान्तगतं लोकालोकेषु विस्तृता दृष्टिः ।
    नष्टमनिष्टं सर्वमिष्टं पुनर्यत्तु तल्लब्धम् ।।६१॥
    अर्थान्तगत है ज्ञान लोकालोक विस्तृत दृष्टि है
    नष्ट सर्व अनिष्ट एवं इष्ट सब उपलब्ध हैं॥६३॥
    अन्वयार्थ : [ज्ञानं] ज्ञान [अर्थान्तगतं] पदार्थों के पार को प्राप्त है [दृष्टि:] और दर्शन [लोकालोकेषु विस्तृता:] लोकालोक में विस्तृत है; [सर्वं अनिष्टं] सर्व अनिष्ट [नष्टं] नष्ट हो चुका है [पुन:] और [यत् तु] जो [इष्टं] इष्ट है [तत्] वह सब [लब्धं] प्राप्त हुआ है । (इसलिये केवल, अर्थात् केवलज्ञान सुखस्वरूप है) ॥६१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, पुनः 'केवल (अर्थात् केवलज्ञान) सुखस्वरूप है' ऐसा निरूपण करते हुए उपसंहार करते हैं :-

    सुख का कारण स्वभाव-प्रतिघात का अभाव है । आत्मा का स्वभाव दर्शन-ज्ञान है; (केवल दशा में) उनके (दर्शन-ज्ञान के) प्रतिघात का अभाव है, क्योंकि दर्शन लोकालोक मे विस्तृत होने से और ज्ञान पदार्थों के पार को प्राप्त होने से वे (दर्शन-ज्ञान) स्वच्छन्दता-पूर्वक (स्वतंत्रतापूर्वक, बिना अंकुश, किसी से बिना दबे) विकसित हैं (इस प्रकार दर्शन-ज्ञान रूप स्वभाव के प्रतिघात का अभाव है) इसलिये स्वभाव के प्रतिघात का अभाव जिसका कारण है ऐसा सुख अभेद-विवक्षा से केवलज्ञान का स्वरूप है ।

    (प्रकारान्तर से केवलज्ञान की सुखस्वरूपता बतलाते हैं) और, केवल अर्थात् केवलज्ञान सुख ही है, क्योंकि सर्व अनिष्टों का नाश हो चुका है और सम्पूर्ण इष्ट की प्राप्ति हो चुकी है । केवल-अवस्था में, सुखोपलब्धि के विपक्षभूत दुःखों के साधनभूत अज्ञान का सम्पूर्णतया नाश हो जाता है और सुख का साधनभूत परिपूर्ण ज्ञान उत्पन्न होता है, इसलिये केवल ही सुख है । अधिक विस्तार से बस हो ॥६१॥

    जयसेनाचार्य :
    अब और भी केवलज्ञान की सुखस्वरूपता दूसरी पद्धति से दृढ़ करते हैं -

    [णाणं अत्थंतगयं] - केवलज्ञान ज्ञेय पदार्थों के अन्त-पार को प्राप्त है, [लोयालोएसु वित्थडा दिट्ठी] - दृष्टि-केवलदर्शन लोकालोक में विस्तृत है । [णट्ठमणिट्ठम सव्वं] - अनिष्ट- दुःख और अज्ञान सभी नष्ट हैं, [इट्ठम पुण जं हि तं लद्धं] - और जो वास्तविक इष्ट ज्ञान और सुख है, वे सभी प्राप्त हुये हैं ।

    वह इसप्रकार -- स्वभाव- घात के अभाव से सुख होता है - स्वभाव का घात नहीं होना सुख है । केवलज्ञान और केवलदर्शन ये दोनों स्वभाव हैं, उनका घात करने वाले दो आवरण कर्म हैं केवली के उन आवरण कर्मों का अभाव है; इसलिये स्वभाव-घात के अभाव में होनेवाला अक्षयानन्तसुख है । और क्योंकि परमानन्द एक लक्षण सुख से विपरीत, आकुलता के उत्पादक अनिष्टरूप दुःख और अज्ञान नष्ट हुये हैं; तथा क्योंकि पूर्वोक्त लक्षण सुख के अविनाभावी तीन लोक के उदर-विवर (छिद्र) में स्थित सम्पूर्ण पदार्थों को एक साथ प्रकाशित करनेवाला- जाननेवाला इष्ट ज्ञान प्राप्त है - इससे ज्ञात होता है कि केवली का ज्ञान ही सुख है - यह अभिप्राय है ।

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    + केवलज्ञानियों को ही पारमार्थिक सुख होता है -
    न श्रद्दधति सौख्यं सुखेषु परममिति विगतघातिनाम्‌ । (62)
    श्रुत्वा ते अभव्या भव्या वा तत्प्रतीच्छन्ति ॥64॥
    न श्रद्दधति सौख्यं सुखेषु परममिति विगतघातिनाम् ।
    श्रुत्वा ते अभव्या भव्या वा तत्प्रतीच्छन्ति ॥६२॥
    घातियों से रहित सुख ही परमसुख यह श्रवण कर
    भी न करें श्रद्धान तो वे अभवि भवि श्रद्धा करें ॥६४॥
    अन्वयार्थ : ’[विगतघातिनां] जिनके घाति-कर्म नष्ट हो गये हैं उनका [सौख्यं] सुख [सुखेषु परमं] (सर्व) सुखों में परम अर्थात् उत्कृष्ट है' [इति श्रुत्वा] ऐसा वचन सुनकर [न श्रद्दधति] जो श्रद्धा नहीं करते [ते अभव्या:] वे अभव्य हैं; [भव्या: वा] और भव्य [तत्] उसे [प्रतीच्छन्ति] स्वीकार (आदर) करते हैं - उसकी श्रद्धा करते हैं ॥६२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, ऐसी श्रद्धा कराते हैं कि केवलज्ञानियों को ही पारमार्थिक-सुख होता है :-

    इस लोक में मोहनीय आदि कर्मजाल वालों के स्वभाव प्रतिघात के कारण और आकुलता के कारण सुखाभास होने पर भी उस सुखाभास को 'सुख' कहने की अपारमार्थिक रूढ़ि है; और जिनके घाति-कर्म नष्ट हो चुके हैं ऐसे केवली-भगवान के, स्वभाव-प्रतिघात के अभाव के कारण और अनाकुलता के कारण सुख के यथोक्त कारण का और लक्षण का सद्धाव होने से पारमार्थिक सुख है - ऐसी श्रद्धा करने योग्य है । जिन्हें ऐसी श्रद्धा नहीं है वे - मोक्षसुख के सुधापान से दूर रहने वाले अभव्य-मृगतृष्णा के जलसमूह को ही देखते (अनुभव करते) हैं; और जो उस वचन को इसी समय स्वीकार (श्रद्धा) करते हैं वे- शिवश्री के (मोक्ष-लक्ष्मी के) भाजन- आसन्न-भव्य हैं, और जो आगे जाकर स्वीकार करेंगे वे दूर-भव्य हैं ॥६२॥

    सुख का कारण स्वभाव प्रतिघात का अभाव है
    सुख का लक्षण अनाकुलता है

    जयसेनाचार्य :
    अब परमार्थिक सुख केवली के ही है, जो उसे संसारियों के मानते हैं, वे अभव्य हैं; ऐसा निरूपण करते हैं -

    [णो सद्दहंति] - जो नहीं मानते हैं । किसे नहीं मानते हैं ? [सोक्खं] - निर्विकार परमाह्लादमय एक सुख को जो नही मानते हैं । उस सुख को कैसा नहीं मानते हैं? [सुहेसुपरमंति] – सुखों में वही निर्विकार परमाह्लादमय सुख ही सर्वोत्कृष्ट है - उस सुख को जो ऐसा नहीं मानते हैं । ऐसा सुख किन्हें होता है? [विगदघादीणं] - घाति कर्मों से रहित भगवान को ऐसा सुख होता है । क्या करके भी नहीं मानते हैं? [सुणिदूण – “जाद सयं समत्तं“] वह सुख स्वोत्पन्न है, परिपूर्ण है..... इत्यादि पूर्वोक्त (६१ से ६३) तीन गाथाओं में कही पद्धति से सुनकर भी जो नहीं मानते हैं । [ते अभव्वा] - वे अभव्य हैं । वे जीव वर्तमान समय में सम्यक्त्वरूपी भव्यत्व की प्रगटता का अभाव होने से अभव्य कहे जाते हैं, सर्वथा अभव्य नहीं हैं । [भव्वा वा तं पडिच्छंति] - जो वर्तमान काल में सम्यक्त्वरूप भव्यत्व की प्रगटतारूप से भविष्य में परिणमित हैं, वे उस अनंत-सुख को अभी मानते हैं । और जो सम्यक्त्वरूप भव्यत्व की प्रगटतारूप से भविष्य में परिणमित होंगे, वे दूरभव्य आगे श्रद्धान करेंगे ।

    यहाँ अर्थ यह है- जैसे मारने के लिये कोतवाल द्वारा पकड़े गये चोर को मरण अच्छा नहीं लगता; उसीप्रकार यद्यपि इन्द्रिय-सुख इष्ट नहीं है; तथापि कोतवाल के समान चारित्र-मोहनीय के उदय से मोहित होता हुआ उपराग रहित अपने आत्मा के आश्रय से उत्पन्न सुख को प्राप्त नहीं करता हुआ, आत्म-निन्दा आदि रूप से परिणत सरागसम्यग्दृष्टि, हेयरूप से उसका अनुभव करता है । और जो वीतराग सम्यग्दृष्टि शुद्धोपयोगी हैं उनको, मछलियों के भूमि पर आने के समान अथवा अग्नि में प्रवेश के समान निर्विकार शुद्धात्म-सुख से च्युत होना भी दुःख प्रतीत होता है ।

    वैसा ही कहा है- ''समतारूपी सुख का अनुभव करनेवाले मनुष्य को समता से च्युत होना ही अच्छा नहीं लगता, तब पंचेन्द्रिय विषय-भोगों की तो बात ही क्या? अर्थात् वे वहाँ कैसे रम सकते हैं? नहीं रम सकते । जैसे मछलियों को जब भूमि ही जलाती है, तब अग्नि-अंगारों का तो कहना ही क्या? वे तो जलायेंगे ही ।''

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    + परोक्षज्ञान वालों के अपारमार्थिक इन्द्रिय-सुख -
    मणुआसुरामरिंदा अहिद्‌दुदा इन्दिएहिं सहजेहिं । (63)
    असहंता तं दुक्खं रमंति विसएसु रम्मेसु ॥65॥
    मनुजासुरामरेन्द्रा अभिद्रुता इन्द्रियैः सहजैः ।
    असहमानास्तद्दुःखं रमन्ते विषयेषु रम्येषु ॥६३॥
    नरपती सुरपति असुरपति इन्द्रियविषयदवदाह से
    पीड़ित रहें सह सके ना रमणीक विषयों में रमें ॥६५॥
    अन्वयार्थ : [मनुजासुरामरेन्द्रा:] मनुष्येन्द्र (चक्रवर्ती) असुरेन्द्र और सुरेन्द्र [सहजै: इन्द्रियै:] स्वाभाविक (परोक्ष-ज्ञानवालो को जो स्वाभाविक है ऐसी) इन्द्रियों से [अभिद्रुता:] पीड़ित वर्तते हुए [तद् दुःखं] उस दुःख को [असहमाना:] सहन न कर सकने से [रम्येषु विषयेषु] रम्य विषयों में [रमन्ते] रमण करते हैं ॥६३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, परोक्षज्ञानवालों के अपारमार्थिक इन्द्रिय-सुख का विचार करते हैं :-

    प्रत्यक्ष ज्ञान के अभाव के कारण परोक्ष ज्ञान का आश्रय लेने वाले इन प्राणियों को उसकी (परोक्ष ज्ञान की) सामग्री रूप इन्द्रियों के प्रति निजरस से ही (स्वभाव से ही) मैत्री प्रवर्तती है । अब इन्द्रियों के प्रति मैत्री को प्राप्त उन प्राणियों को, उदय-प्राप्त महा-मोहरूपी कालाग्नि ने ग्रास बना लिया है, इसलिये तप्त लोहे के गोले की भाँति (जैसे गरम किया हुआ लोहे का गोला पानी को शीघ्र ही सोख लेता है) अत्यन्त तृष्णा उत्पन्न हुई है; उस दुःख के वेग को सहन न कर सकने से उन्हें व्याधि के प्रतिकार के समान (रोग में थोड़ा सा आराम जैसा अनुभव कराने वाले उपचार के समान) रम्य विषयों में रति उत्पन्न होती है । इसलिये इन्द्रियाँ व्याधि समान होने से और विषय व्याधि के प्रतिकार समान होने से छद्मस्थों के पारमार्थिक सुख नहीं है ॥६३॥

    जयसेनाचार्य :
    (अब इन्द्रिय-सुख के प्रतिपादन की मुख्यता से आठ गाथाओं में निबद्ध पाँचवा स्थल प्रारम्भ होता है । यह स्थल चार भागों में विभक्त है । उनमें से सर्वप्रथम इन्द्रिय-सुख दुःख है - इस तथ्य का प्रतिपादक दो गाथाओं वाला प्रथम भाग प्रारम्भ होता है ।)

    अब, संसारियों के साधक इन्द्रिय-ज्ञान के साध्यभूत इन्द्रिय-सुख का विचार करते हैं -

    [मणुआसुरामरिंदा] - मनुष्येन्द्र – चक्रवर्ती, असुरेन्द्र और देवेन्द्र । ये सभी कैसे हैं? [अहिद्दुदा इन्दियेहिं सहजेहिं] - कदर्थित - दु:खित-पीड़ित हैं । ये सभी किनसे पीड़ित हैं? ये सभी स्वाभाविक इन्द्रियों से पीड़ित हैं । [असहंता तं दुक्खं] - ये दु:खोद्रेक - दुःखों की तीव्रता को सहन नहीं करते हुये, [रमंते विसएसु रम्मेसु] - रम्याभास विषयों में रमण करते हैं ।

    अब विस्तार करते हैं- मनुष्य आदि जीव अमूर्त, अतीन्द्रिय ज्ञान-सुख के आस्वाद को प्राप्त नहीं करते हुये, मूर्त, इन्द्रिय ज्ञान-सुख के लिये उनके कारणभूत पंचेन्द्रियों में (पंचेन्द्रिय विषयों में) मित्रता करते हैं और इससे तप्त लोहे के गोले के जल खींचने (सोखने) के समान विषयों में तीव तृष्णा उत्पन्न होती है । उस तृष्णा को सहन नहीं करते हुए, वे विषयों का अनुभव करते हैं । इससे ज्ञात होता है कि पाँचों इन्द्रियाँ रोग (बीमारी) के समान हैं और विषय उनके निराकरण के लिये औषध के समान है - इस प्रकार संसारियों के वास्तविक सुख नहीं है ।

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    + जहाँ तक इन्द्रियाँ हैं वहाँ तक स्वभाव से ही दुःख है -
    जेसिं विसएसु रदी तेसिं दुक्खं वियाण सब्भावं । (64)
    जइ तं ण हि सब्भावं वावारो णत्थि विसयत्थं ॥66॥
    येषां विषयेषु रतिस्तेषां दुःखं विजानीहि स्वाभावम् ।
    यदि तन्न हि स्वभावो व्यापारो नास्ति विषयार्थम् ॥६४॥
    पंचेन्द्रियविषयों में रती वे हैं स्वभाविक दु:खीजन
    दु:ख के बिना विषविषय में व्यापार हो सकता नहीं ॥६६॥
    अन्वयार्थ : [येषां] जिन्हें [विषयेषु रति:] विषयों में रति है, [तेषां] उन्हें [दुःख] दुःख [स्वाभावं] स्वाभाविक [विजानीहि] जानो; [हि] क्योंकि [यदि] यदि [तद्] वह दुःख [स्वभावं न] स्वभाव न हो तो [विषयार्थं] विषयार्थ में [व्यापार:] व्यापार [न अस्ति] न हो ॥६४॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, जहाँ तक इन्द्रियाँ हैं वहाँ तक स्वभाव से ही दुःख है, ऐसा न्याय से निश्चित करते हैं :-

    जिनकी हत (निकृष्ट, निंद्य) इन्द्रियाँ जीवित (विद्यमान) हैं, उन्हें उपाधि के कारण (बाह्य संयोगों के कारण, औपाधिक) दुख नहीं है किन्तु स्वाभाविक ही है, क्योंकि उनकी विषयों में रति देखी जाती है । जैसे-
    1. हाथी हथिनी रूपी कुट्टनी के शरीर स्पर्श की ओर,
    2. मछली बंसी में फँसे हुए मांस के स्वाद की ओर,
    3. भ्रमर बन्द हो जाने वाले कमल के गंध की ओर,
    4. पतंगा दीपक की ज्योति के रूप की ओर और
    5. हिरन शिकारी के संगीत के स्वर की ओर दौड़ते हुए दिखाई देते हैं
    उसी प्रकार - दुर्निवार इन्द्रिय-वेदना के वशीभूत होते हुए वे यद्यपि विषयों का नाश अति निकट है (अर्थात् विषय क्षणिक हैं) तथापि, विषयों की ओर दौड़ते दिखाई देते हैं । और यदि 'उनका दुख स्वाभाविक है' ऐसा स्वीकार न किया जाये तो जैसे-
    1. जिसका शीत-ज्वर उपशांत हो गया है, वह पसीना आने के लिये उपचार करता तथा जिसका दाह-ज्वर उतर गया है वह काँजी से शरीर के ताप को उतारता तथा
    2. जिसकी आखों का दुख दूर हो गया है वह वटाचूर्ण (शंख इत्यादि का चूर्ण) आँजता तथा
    3. जिसका कर्णशूल नष्ट हो गया हो वह कान में फिर बकरे का मूत्र डालता दिखाई नहीं देता और
    4. जिसका घाव भर जाता है वह फिर लेप करता दिखाई नहीं देता
    -इसीप्रकार उनके विषय व्यापार देखने में नहीं आना चाहिये; किन्तु उनके वह (विषय-प्रवृत्ति) तो देखी जाती है । इससे (सिद्ध हुआ कि) जिनके इन्द्रियाँ जीवित हैं ऐसे परोक्ष-ज्ञानियों के दुख स्वाभाविक ही है ॥६४॥

    जयसेनाचार्य :
    अब जो इन्द्रिय व्यापार है वह दुःख ही है, ऐसा कहते हैं -

    [जेसिं विसएसु रदी] - जिनके निर्विषय अतीन्द्रिय परमात्मस्वरूप से विपरीत विषयों में प्रीति है, [तेसिं दुक्खं वियाण सब्भावं] - उन बर्हिमुख जीवों के निज शुद्धात्मद्रव्य की संवित्ति से उत्पन्न निरुपाधि पारमार्थिक सुख से विपरीत दुःख स्वभाव से ही है - ऐसा जानना चाहिये । उनके स्वभाव से दुःख है- यह कैसे ज्ञात होता है? पंचेन्द्रिय विषयों में प्रीति दिखाई देने से यह ज्ञात होता है । [जइ तं ण हि सब्भावं] - यदि वास्तव में वह दुःख उनके स्वभाव से नहीं होता [वावारो णत्थि विसयत्थम] - तो उनका विषयों के लिए व्यापार घटित नहीं होता । व्याधि-निवारण के लिये औषधि में प्रवृत्ति के समान यत: उनका विषयों में प्रवर्तन देखा जाता है- इससे ही यह ज्ञात होता है कि उनके दुःख है - यह अभिप्राय है ।

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    + मुक्त आत्मा के सुख की प्रसिद्धि के लिये, शरीर सुख का साधन होने की बात का खंडन -
    पप्पा इट्ठे विसये फासेहिं समस्सिदे सहावेण । (65)
    परिणममाणो अप्पा सयमेव सुहं ण हवदि देहो ॥67॥
    प्राप्येष्टान् विषयान् स्पर्शैः समाश्रितान् स्वभावेन ।
    परिणममान आत्मा स्वयमेव सुखं न भवति देहः ॥६५॥
    इन्द्रिय विषय को प्राप्त कर यह जीव स्वयं स्वभाव से
    सुखरूप हो पर देह तो सुखरूप होती ही नहीं ॥६७॥
    अन्वयार्थ : [स्पशैं: समाश्रितान्] स्पर्शनादिक इन्द्रियाँ जिनका आश्रय लेती हैं ऐसे [इष्टान् विषयान्] इष्ट विषयों को [प्राप्य] पाकर [स्वभावेन] (अपने शुद्ध) स्वभाव से [परिणममानः] परिणमन करता हुआ [आत्मा] आत्मा [स्वयमेव] स्वयं ही [सुख] सुखरूप (इन्द्रिय-सुखरूप) होता है [देह: न भवति] देह सुखरूप नहीं होती ॥६५॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, मुक्त आत्माके सुखकी प्रसिद्धिके लिये, शरीर सुखका साधन होनेकी बातकाखंडन करते हैं । (सिद्ध-भगवान के शरीर के बिना भी सुख होता है यह बात स्पष्ट समझाने के लिये, संसारावस्था में भी शरीर - सुख का -- इन्द्रियसुख का - साधन नहीं है, ऐसा निश्चित करते हैं) :-

    वास्तव में इस आत्मा के लिये सशरीर अवस्था में भी शरीर सुख का साधन हो ऐसा हमें दिखाई नहीं देता; क्योंकि तब भी, मानों उन्माद-जनक मदिरा का पान किया हो ऐसी, प्रबल मोह के वश वर्तने-वाली, 'यह (विषय) हमें इष्ट है' इस प्रकार विषयों की ओर दौड़ती हुई इन्द्रियों के द्वारा असमीचीन (अयोग्य) परिणति का अनुभव करने से जिसकी 'शक्ति की उत्कृष्टता (परम शुद्धता) रुक गई है ऐसे भी (अपने) ज्ञान-दर्शन-वीर्यात्मक स्वभाव में- जो कि (सुख के) निश्चय-कारणरूप है-परिणमन करता हुआ यह आत्मा स्वयमेव सुखत्व को प्राप्त करता है, (सुख-रूप होता है;) और शरीर तो अचेतन ही होने से सुखत्व-परिणति का निश्चय-कारण न होता हुआ किंचित् मात्र भी सुखत्व को प्राप्त नहीं करता ॥६५॥

    जयसेनाचार्य :
    (अब, शरीर सुख का कारण नहीं है - इस तथ्य की प्रतिपादक दो गाथाओं वाला पाँचवे स्थल का दूसरा भाग प्रारम्भ होता है ।)

    अब सिद्धात्माओं के शरीर का अभाव होने पर भी सुख है - यह बताने के लिये शरीर सुख का कारण नहीं है, यह स्पष्ट करते हैं –

    [पप्पा] - प्राप्तकर । किन्हें प्राप्तकर? [इट्ठे विसये] - इष्ट-पंचेन्द्रिय विषयों को प्राप्त कर । कैसे विषयों को प्राप्त कर? [फासेहि समस्सिदे] - स्पर्शनादि इन्द्रियों से रहित शुद्धात्मतत्व से विलक्षण स्पर्शनादि इन्द्रियों द्वारा अच्छी तरह से प्राप्त-ग्रहण करने के योग्य विषयों को प्राप्तकर । उन विषयों को वह कौन प्राप्त कर? [अप्पा] - आत्मारूप कर्ता- इस वाक्य का कर्ता आत्मा उन्हें प्राप्त कर । वह आत्मा किस विशेषता वाला है? [सहावेण परिणममानो] – अनंत-सुख के उपादानभूत शुद्धात्म-स्वभाव से विपरीत अशुद्ध-सुख के उपादानभूत अशुद्धात्म-स्वभाव से परिणमित होता हुआ - ऐसा होता हुआ [सयमेव सुहं] - स्वयं ही इन्द्रिय-सुखरूप परिणमित होता है । [ण हवदि देहो] - तथा शरीर अचेतन होने से सुखरूप नहीं है ।

    यहाँ अर्थ यह है-कर्म से आच्छादित संसारी जीवों के जो इन्द्रिय-सुख है, उसमें भी जीव उपादान कारण है; शरीर नहीं । और शरीर तथा कर्म से रहित मुक्तात्माओं के जो अनन्त अतीन्द्रिय-सुख है, उसमें तो विशेष रूप से आत्मा ही कारण है ।


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    + इसी बात को दृढ़ करते हैं -
    एगंतेण हि देहो सुहं ण देहिस्स कुणदि सग्गे वा । (66)
    विसयवसेण दु सोक्खं दुक्खं वा हवदि सयमादा ॥68॥
    एकान्तेन हि देहः सुखं न देहिनः करोति स्वर्गे वा ।
    विषयवशेन तु सौख्यं दुःखं वा भवति स्वयमात्मा ॥६६॥
    स्वर्ग में भी नियम से यह देह देही जीव को
    सुख नहीं दे यह जीव ही बस स्वयं सुख-दुखरूप हो ॥६८॥
    अन्वयार्थ : [एकान्तेन हि] एकांत से अर्थात् नियम से [स्वर्गे वा] स्वर्ग में भी [देह:] शरीर [देहिनः] शरीरी (आत्मा को) [सुखं न करोति] सुख नहीं देता [विषयवशेन तु] परन्तु विषयों के वश से [सौख्य दुःखं वा] सुख अथवा दुःखरूप [स्वयं आत्मा भवति] स्वयं आत्मा होता है ॥६६॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, इसी बात को दृढ़ करते हैं :-

    यहाँ यह सिद्धांत है कि - भले ही दिव्य वैक्रियिकता प्राप्त हो तथापि 'शरीर सुख नहीं दे सकता'; इसलिये, आत्मा स्वयं ही इष्ट अथवा अनिष्ट विषयों के वश से सुख अथवा दुःखरूप स्वयं ही होता है ॥६६॥

    जयसेनाचार्य :
    अब मनुष्य-शरीर सुख का कारण भले ही न हो, परन्तु देवों का दिव्य शरीर तो सुख का कारण होगा? ऐसी आशंका का निराकरण करते हैं -

    [एगंतेण हि देहो सुहं ण देहिस्स कुणदि] - एकान्त से-नियमरूप से वास्तव में देहरूप कर्ता सुख को नहीं करता है । किसके सुख को नहीं करता है? संसारी जीव के सुख को नहीं करता है । [सग्गे वा] - मनुष्यों का मानव शरीर सुख नहीं करता - यह तथ्य तो रहने दो अर्थात् इसे तो सुखकारक कोई नहीं मानेगा, परन्तु स्वर्ग में जो वह देवों का दिव्य शरीर है - वैक्रियिक शरीर है; वह भी उपचार को छोड़कर (मात्र उपचार से सुख का कारण कहा जाता है, वास्तव में) सुख को नहीं करता । [विसयवसेण दु सोक्खं दुक्खं वा हवदि सयमादा] - किन्तु निश्चय से निर्विषय अमूर्त स्वाभाविक सदानन्द एक सुख-स्वभावी होने पर भी, व्यवहार से अनादि कर्म-बन्ध के वश विषयाधीन-रूप परिणमन कर स्वयं आत्मा ही सांसारिक सुख-दुःख रूप होता है, शरीर सुख-दुःख रूप नहीं होता - यह अभिप्राय है ।

    इसप्रकार मुक्तात्माओं के शरीर का अभाव होने पर भी सुख है - इस परिज्ञान के लिये संसारियों के भी शरीर सुख का कारण नहीं है - इस कथनरूप से दो गाथाये पूर्ण हुईं ।


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    + जैसे निश्चय से शरीर सुख का साधन नहीं है, उसी प्रकार निश्चय से विषय भी सुख के करण नहीं -
    तिमिरहरा जइ दिट्ठी जणस्स दीवेण णत्थि कायव्वं । (67)
    तह सोक्खं सयमादा विसया किं तत्थ कुव्वंति ॥69॥
    तिमिरहरा यदि दृष्टिर्जनस्य दीपेन नास्ति कर्तव्यम् ।
    तथा सौख्यं स्वयमात्मा विषयाः किं तत्र कुर्वन्ति ॥६७॥
    तिमिरहर हो दृष्टि जिसकी उसे दीपक क्या करें
    जब जिय स्वयं सुखरूप हो इन्द्रिय विषय तब क्या करें ॥६९॥
    अन्वयार्थ : [यदि] यदि [जनस्य दृष्टि:] प्राणी की दृष्टि [तिमिरहरा] तिमिर-नाशक हो तो [दीपेन नास्ति कर्तव्यं] दीपक से कोई प्रयोजन नहीं है, अर्थात् दीपक कुछ नहीं कर सकता, [तथा] उसी प्रकार जहाँ [आत्मा] आत्मा [स्वयं] स्वयं [सौख्यं] सुख-रूप परिणमन करता है [तत्र] वहाँ [विषया:] विषय [किं कुर्वन्ति] क्या कर सकते हैं? ॥६७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, आत्मा स्वयं ही सुखपरिणाम की शक्तिवाला होने से विषयों की अकिंचित्करता बतलाते हैं :-

    जैसे किन्हीं निशाचरों के (उल्लू, सर्प, भूत इत्यादि) नेत्र स्वयमेव अन्धकार को नष्ट करने की शक्ति वाले होते हैं इसलिये उन्हें अंधकार नाशक स्वभाव-वाले दीपक-प्रकाशादि से कोई प्रयोजन नहीं होता, (उन्हें दीपक-प्रकाश कुछ नहीं करता,) इसी प्रकार- यद्यपि अज्ञानी 'विषय सुख के साधन हैं' ऐसी बुद्धि के द्वारा व्यर्थ ही विषयों का अध्यास (आश्रय) करते हैं तथापि-संसार में या मुक्ति में स्वयमेव सुखरूप परिणमित इस आत्मा को विषय क्या कर सकते हैं? ॥६७॥

    जयसेनाचार्य :
    (अब इन्द्रिय-विषय भी सुख के कारण नहीं हैं - इस तथ्य की प्रतिपादक दो गाथाओं वाला पाँचवे स्थल का तीसरा भाग प्रारम्भ होता है ।)

    अब आत्मा का, स्वयं ही सुख स्वभाव होने से, जैसे निश्चय से शरीर सुख का साधन नहीं है, उसी प्रकार निश्चय से विषय भी सुख के करण नहीं है; ऐसा प्रतिपादन करते हैं -

    [जइ] यदि [दिट्ठी] निशाचर प्राणियों की दृष्टि [तिमिरहरा] अन्धकार को नष्ट करने वाली है, तो [जणस्स] प्राणी को [दीवेण णत्थि कायव्वं] दीपक से कोई कर्तव्य नहीं रहता । उसे जैसे दीपक से प्रयोजन ही नहीं है [तह सोक्खं सयमादा विसया किं तत्थ कुव्वंति] उसी प्रकार निश्चय से आत्मा ही निर्विषय, अमूर्त, सर्व प्रदेशों से आह्लाद को उत्पन्न करने वाला सहजानन्द एक लक्षण सुख स्वभावी है, वहाँ मुक्त अथवा संसारी दशा में विषय क्या करते हैं? कुछ भी नहीं - यह भाव है ।

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    + आत्मा के सुख-स्वभावता और ज्ञान-स्वभावता अन्य दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं -
    सयमेव जहादिच्चो तेजो उण्हो य देवदा णभसि । (68)
    सिद्धो वि तहा णाणं सुहं च लोगे तहा देवो ॥70॥
    स्वयमेव यथादित्यस्तेजः उष्णश्च देवता नभसि ।
    सिद्धोऽपि तथा ज्ञानं सुखं च लोके तथा देवः ॥६८॥
    जिसतरह आकाश में रवि उष्ण तेजरु देव है
    बस उसतरह ही सिद्धगण सब ज्ञान सुखरु देव हैं ॥७०॥
    अन्वयार्थ : [यथा] जैसे [नभसि] आकाश में [आदित्य:] सूर्य [स्वयमेव] अपने आप ही [तेज:] तेज, [उष्ण:] उष्ण [च] और [देवता] देव है, [तथा] उसी प्रकार [लोके] लोक में [सिद्ध: अपि] सिद्ध भगवान भी (स्वयमेव) [ज्ञानं] ज्ञान [सुखं च] सुख [तथा देव:] और देव हैं ॥६८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अब, आत्मा का सुख-स्वभावत्व दृष्टान्त देकर दृढ़ करते हैं -

    जैसे आकाश में अन्य कारण की अपेक्षा रखे बिना ही सूर्य
    1. स्वयमेव अत्यधिक प्रभा-समूह से चमकते हुए स्वरूप के द्वारा विकसित प्रकाश-युक्त होने से तेज है,
    2. कभी उष्णतारूप परिणमित लोहे के गोले की भाँति सदा उष्णता-परिणाम को प्राप्त होने से उष्ण है, और
    3. देवगति-नामकर्म के धारावाहिक उदय के वशवर्ती स्वभाव से देव है;
    इसी प्रकार लोक में अन्य कारण की अपेक्षा रखे बिना ही भगवान आत्मा स्वयमेव ही
    1. स्व-पर को प्रकाशित करने में समर्थ निर्वितथ (सच्ची) अनन्त शक्ति-युक्त सहज संवेदन के साथ तादात्म्य होनेसे ज्ञान है,
    2. आत्म-तृप्ति से उत्पन्न होने वाली जो परिनिवृत्ति है; उसमें प्रवर्तमान अनाकुलता में सुस्थितता के कारण सौख्य है, और
    3. जिन्हें आत्म-तत्त्व की उपलब्धि निकट है ऐसे बुध जनों के मनरूपी शिलास्तंभ में जिसकी अतिशय द्युति स्तुति उत्कीर्ण है ऐसा दिव्य आत्म-स्वरूपवान होने से देव है ।
    इसलिये इस आत्मा को सुख-साधनाभास (जो सुख के साधन नहीं हैं परन्तु सुख के साधन होने का आभास-मात्र जिनमें होता है ऐसे) विषयों से बस हो ।

    जैसे लोहे का गोला कभी उष्णता-परिणाम से परिणमता है वैसे सूर्य सदा ही उष्पता-परिणाम से परिणमा हुआ है
    परिनिर्वृत्ति = मोक्ष; परिपूर्णता; अन्तिम सम्पूर्ण सुख (परिनिर्वृत्ति आत्म-तृप्ति से होती है अर्थात् आत्म-तृप्ति की पराकाष्ठा ही परिनिर्वृत्ति है)
    शिलास्तंभ = पत्थर का खंभा
    द्युति = दिव्यता; भव्यता, महिमा (गणधरदेवादि बुध जनों के मन में शुद्धात्म-स्वरूप की दिव्यता का स्तुतिगान उत्कीर्ण हो गया है)

    जयसेनाचार्य :
    [सयमेव जहादिच्चो तेजो उण्हो य देवदा णभसि] - अन्य कारणों की अपेक्षा नहीं करके जैसे सूर्य स्वयं ही स्व-पर प्रकाशरूप से तेज है, उसीप्रकार स्वयं ही उष्ण है और वैसे ही अज्ञानी मनुष्यों का देवता है। कहाँ स्थित सूर्य इनरूप है? आकाश में स्थित सूर्य इनरूप है । [सिद्धो वा तहा णाणं सुहं च] - उसी प्रकार सिद्ध भगवान भी अन्य कारणों की अपेक्षा नहीं करके स्वभाव से ही स्व-पर प्रकाशक केवलज्ञान-मय और उसी प्रकार परम संतुष्टि स्वरूप अनाकुलता लक्षण सुखमय हैं । सिद्ध भगवान इनमय कहाँ है? [लोगे] - वे लोक में इनमय हैं । [तहा देवो] - और उसी प्रकार निज-शुद्धात्मा के सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप अभेद रत्नत्रय स्वरूप निर्विकल्प समाधि से उत्पन्न सुन्दर आनन्द के तीव्र प्रवाह-रूप सुखामृत पान के पिपासु गणधर देव आदि परम-योगियों और देवेन्द्र आदि आसन्न-भव्य जीवों के मन में निरन्तर परम आराध्य और वैसे ही अनन्त ज्ञानादि गुणों के स्तवन से स्तुत्य जो पवित्र आत्म-स्वरूप - उस स्वभाव के कारण देव हैं ।

    इससे ज्ञात होता है कि मुक्तात्माओं को विषयों से भी प्रयोजन नहीं है ।

    इसप्रकार स्वभाव से ही सुख-स्वभावी होने से विषय भी मुक्तात्माओं को सुख के कारण नहीं - इस कथनरूप दो गाथायें पूर्ण हुईं ।

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    + श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव पूर्वोक्त लक्षण अनन्त-सुख के आधारभूत सर्वज्ञ को वस्तुस्तवनरूप से नमस्कार करते हैं -
    तेजो दिट्ठी णाणं इड्ढी सोक्खं तहेव ईसरियं ।
    तिहुवणपहाणदैयं माहप्पं जस्स सो अरिहो ॥71॥
    तेजो दिट्ठी णाणं इड्ढी सोक्खं तहेव ईसरियं
    तिहुवणपहाणदैयं माहप्पं जस्स सो अरिहो ॥७१॥
    प्राधान्य है त्रैलोक्य में ऐश्वर्य ऋद्धि सहित हैं
    तेज दर्शन ज्ञान सुख युत पूज्य श्री अरिहंत हैं ॥७१॥
    अन्वयार्थ : जिनके भामण्डल, केवलदर्शन, केवलज्ञान, ऋद्धि, अतीन्द्रिय सुख, ईश्वरता, तीन लोक में प्रधान देव आदि माहात्म्य हैं; वे अरहंत भगवान हैं ॥७१॥

    जयसेनाचार्य :
    (अब सर्वज्ञ-नमस्कार परक दो गाथाओं वाला पाँचवे स्थल का चौथा भाग प्रारम्भ होता है ।)

    [तेजो दिट्ठी णाणं इड्ढी सोक्खं तहेव ईसरियं तिहुवणपहाणदइयं] - [माहप्पं जस्स सो अरिहो] - इसप्रकार का माहात्म्य जिनका है, वे अरहंत कहलाते हैं ।

    इसप्रकार वस्तु-स्तवनरूप से नमस्कार किया गया है ।

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    + उन्हीं भगवान को सिद्धावस्था सम्बन्धी गुणों के स्तवनरूप से नमस्कार -
    तं गुणदो अधिगदरं अविच्छिदं मणुवदेवपदिभावं ।
    अपुणब्भावणिबद्धं पणमामि पुणो पुणो सिद्धं ॥72॥
    तं गुणदो अधिगदरं अविच्छिदं मणुवदेवपदिभावं
    अपुणब्भावणिबद्धं पणमामि पुणो पुणो सिद्धं ॥७२॥
    हो नमन बारम्बार सुरनरनाथ पद से रहित जो
    अपुनर्भावी सिद्धगण गुण से अधिक भव रहित जो ॥७२॥
    अन्वयार्थ : उन गुणों से परिपूर्ण, मनुष्य व देवों के स्वामित्व से रहित, अपुनर्भाव निबद्ध-मोक्ष स्वरूप सिद्ध भगवान को बारंबार प्रणाम करता हूँ ॥७२॥

    जयसेनाचार्य :
    [पणमामि] - नमस्कार करता हूँ । [पुणो पुणो] - बारम्बार । बारम्बार किन्हें नमस्कार करता हूँ? [तं सिद्धं] - परमागम में प्रसिद्ध उन सिद्धों को नमस्कर करता हूँ । वे सिद्ध कैसे हैं? [गुणदो अधिगदरं] -अव्याबाध- अनन्त सुखादि गुणों से अधिकतर-अच्छी तरह विशिष्टाधिक-परिपूर्ण गुणवाले हैं । वे सिद्ध और कैसे हैं? [अविच्छिदं मणुवदेवपदिभावं] - जैसे पहले अरहन्त अवस्था में चक्रवर्ती, देवेन्द्र आदि समवशरण में आकर नमस्कार करते हैं, उससे प्रभुता होती है; उससे उल्लंघित हो जाने के कारण मानवपति, देवपति भाव से रहित हैं । वे सिद्ध और किस विशेषतावाले हैं? [अपुणब्भावणिबद्धं] - द्रव्य क्षेत्रादि पाँच प्रकार के भवों से विलक्षण शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी निजात्मा की प्राप्ति लक्षण जो मोक्ष, उसके अधीन होने से अपुनर्भावनिबद्ध हैं - यह भाव है ।

    इस प्रकार नमस्कार की मुख्यता से दो गाथायें पूर्ण हुईं ।

    इस प्रकार आठ गाथाओं वाला पाँचवा स्थल जानना चाहिये ।

    इसप्रकार अठारह गाथाओं द्वारा पाँच स्थलों में विभक्त 'सुख प्रपंच' नामक चतुर्थ अन्तराधिकार पूर्ण हुआ ।

    इसप्रकार पूर्वोक्त प्रकार से ['एस सुरासुर'] इत्यादि चौदह गाथाओं द्वारा पीठिका पूर्ण हुई उसके बाद सात गाथाओं द्वारा (सामान्य-सर्वज्ञसिद्धि), तदनन्तर तेंतीस गाथाओं द्वारा (ज्ञानप्रपंच) और उसके बाद अठारह गाथाओं द्वारा (सुखप्रपंच) - इसप्रकार सामूहिक बहत्तर गाथाओं द्वारा चार अन्तराधिकार रूप से प्रथम (शुद्धोपयोग अधिकार) पूर्ण हुआ ।

    इसके आगे पच्चीस गाथा पर्यन्त चलनेवाला ['ज्ञानकण्डिका चतुष्टय'] नामक द्वितीयाधिकार प्रारम्भ होता है । वहाँ पच्चीस गाथाओं में सबसे पहले शुभाशुभ के विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['देवदजदिगुरु'] इत्यादि दस गाथा पर्यन्त पहली ज्ञानकण्डिका कहते हैं । उसके बाद आप्त और आत्मा के स्वरूप परिज्ञान के विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['चत्ता पावारंभं'] इत्यादि सात गाथा पर्यन्त दूसरी ज्ञान कण्डिका, अब उसके बाद द्रव्य-गुण-पर्याय सम्बन्धी परिज्ञान के विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['दव्वादिएसु'] इत्यादि छह गाथा पर्यन्त तीसरी ज्ञान कण्डिका है । तत्पश्चात् स्व-पर तत्त्व परिज्ञान सम्बन्धी विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['णाणप्पग'] इत्यादि दो गाथाओं द्वारा चौथी ज्ञान कण्डिका कही गई है ।

    इसप्रकार ज्ञानकण्डिका चतुष्टय नामक दूसरे अधिकार में सामूहिक पातनिका हुई ।

    अब, इस समय पहली ज्ञान कण्डिका अन्तराधिकार में स्वतंत्र व्याख्यानरूप से चार गाथायें, उसके बाद पुण्य जीव को विषयतृष्णा का उत्पादक है - इस कथनरूप से चार गाथायें, उसके बाद उपसंहार रूप से दो गाथायें - इसप्रकार तीन स्थल पर्यन्त क्रम से व्याख्यान करते हैं ।

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    + इन्द्रिय-सुख स्वरूप सम्बन्धी विचारों को लेकर, उसके साधन (शुभोपयोग) का स्वरूप -
    देवदजदिगुरुपूजासु चेव दाणम्मि वा सुसीलेसु । (69)
    उववासादिसु रत्तो सुहोवओगप्पगो अप्पा ॥73॥
    देवतायतिगुरुपूजासु चैव दाने वा सुशीलेषु ।
    उपवासादिषु रक्तः शुभोपयोगात्मक आत्मा ॥६९॥
    देव-गुरु-यति अर्चना अर दान उपवासादि में
    अर शील में जो लीन शुभ उपयोगमय वह आतमा ॥७३॥
    अन्वयार्थ : [देवतायतिगुरुपूजासु] देव, गुरु और यति की पूजा में, [दाने च एव] दान में [सुशीलेषु वा] एवं सुशीलों में [उपवासादिषु] और उपवासादिक में [रक्त: आत्मा] लीन आत्मा [शुभोपयोगात्मक:] शुभोपयोगात्मक है ॥६९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जब यह आत्मा दुःख की साधनभूत ऐसी द्वेष-रूप तथा इन्द्रिय विषय की अनुराग-रूप अशुभोपयोग भूमिका का उल्लंघन करके, देव-गुरु-यति की पूजा, दान, शील और उपवासादिक के प्रीति-स्वरूप धर्मानुराग को अंगीकार करता है तब वह इन्द्रिय-सुख की साधन-भूत शुभोपयोग-भूमिका में आरूढ़ कहलाता है ॥६९॥

    जयसेनाचार्य :
    (अब यहाँ द्वितीयाधिकार के अन्तर्गत प्रथम ज्ञानकण्डिका रूप प्रथम अन्तराधिकार का चार स्वतंत्र गाथा प्रतिपादक चार गाथाओं में निबद्ध पहला स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    वह इसप्रकार - अब यद्यपि पहले छह गाथाओं (६५ से ७०) द्वारा इन्द्रिय-सुख का स्वरूप कहा गया है, तथापि उसे ही और भी विस्तार से कहते हुये उसके साधक शुभोपयोग का प्रतिपादन करते हैं ।

    अथवा दूसरी पातनिका - पीठिका में जिस शुभोपयोग के स्वरूप की सूचना दी थी उसका इस समय इन्द्रिय-सुख का साधक होने से इन्द्रिय-सुख के विशेष विचार के प्रसंग में विशेष विवरण करते हैं -

    [देवदजदिगुरुपूजासु चेव दाणम्मि वा सुसीलेसु] - देवता, यति और गुरु की पूजा में तथा दान और सुशीलों में [उववासादिसु रत्तो] - और उसी प्रकार उपवासादि में आसक्त-लीन [अप्पा] - जीव [सुहोवओगप्पगो] - शुभोपयोगात्मक कहा गया है ।

    वह इसप्रकार -

    पूर्वोक्त देवता, यति, गुरुओं तथा उनके प्रतिबिम्बादि के प्रति यथासम्भव द्रव्य - भावादि पूजा और आहारादि चार प्रकार का दान तथा आचारादि ग्रंथों (चरणानुयोग के ग्रंथों) में कहे हुये शील व्रत और उसी प्रकार जिनगुणसम्पत्ति आदि विधि-विशेषरूप उपवासादि । जो इन शुभ अनुष्ठानों में लीन है और द्वेषरूप, विषयानुरागरूप अशुभ-अनुष्ठानों से विरक्त है, वह जीव शुभोपयोगी है - यह गाथा का अर्थ है ।

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    + शुभोपयोग साधन है और उनका साध्य इन्द्रियसुख है -
    जुत्तो सुहेण आदा तिरिओ वा माणुसो व देवो वा । (70)
    भूदो तावदि कालं लहदि सुहं इन्दियं विविहं ॥74॥
    युक्तः शुभेन आत्मा तिर्यग्वा मानुषो वा देवो वा ।
    भूतस्तावत्कालं लभते सुखमैन्द्रियं विविधम् ॥७०॥
    अरे शुभ उपयोग से जो युक्त वह तिर्यग्गति
    अर देव मानुष गति में रह प्राप्त करता विषयसुख ॥७४॥
    अन्वयार्थ : [शुभेन युक्त:] शुभोपयोग-युक्त [आत्मा] आत्मा [तिर्यक् वा] तिर्यंच, [मानुष: वा] मनुष्य [देव: वा] अथवा देव [भूत:] होकर, [तावत्कालं] उतने समय तक [विविधं] विविध [ऐन्द्रियं सुखं] इन्द्रिय-सुख [लभते] प्राप्त करता है ॥७०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    यह आत्मा इन्द्रिय-सुख के साधनभूत शुभोपयोग की सामर्थ्य से उसके अधिष्ठान-भूत (इन्द्रियसुख के स्थानभूत-आधारभूत ऐसी) तिर्यंच, मनुष्य और देवत्व की भूमिकाओं में से किसी एक भूमिका को प्राप्त करके जितने समय तक (उसमें) रहता है, उतने समय तक अनेक प्रकार का इन्द्रिय-सुख प्राप्त करता है ॥७०॥

    जयसेनाचार्य :
    अब पूर्वोक्त शुभोपयोग द्वारा साध्य इन्द्रिय-सुख को कहते हैं -

    [सुहेण जुत्तो आदा] - जैसे निश्चय रत्नत्रयात्मक शुद्धोपयोग से सहित यह जीव, मुक्त होकर अनन्तकाल तक अतीन्द्रिय सुख पाता रहता है; उसी प्रकार पूर्व गाथा (७३ गाथा) में कहे लक्षण वाले शुभोपयोग से सहित - परिणत यह आत्मा [तिरियो वा माणुसो वा देवो वा भूदो] - तिर्यंच, मनुष्य अथवा देव होकर [तावदि कालं] - अपनी आयु पर्यन्त [लहदि सुहं इंदियं विविहं] - इन्द्रियजन्य विविध सुखों को प्राप्त करता है - यह गाथा का अभिप्राय है ।

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    + इसप्रकार इन्द्रिय-सुख की बात उठाकर अब इन्द्रिय-सुख को दुखपने में डालते हैं -
    सोक्खं सहावसिद्धं णत्थि सुराणं पि सिद्धमुवदेसे । (71)
    ते देहवेदणट्ठा रमंति विसएसु रम्मेसु ॥75॥
    सौख्यं स्वभावसिद्धं नास्ति सुराणामपि सिद्धमुपदेशे ।
    ते देहवेदनार्ता रमन्ते विषयेषु रम्येषु ॥७१॥
    उपदेश से है सिद्ध देवों के नहीं है स्वभावसुख
    तनवेदना से दुखी वे रमणीक विषयों में रमे ॥७५॥
    अन्वयार्थ : [उपदेशे सिद्धं] (जिनेन्द्र-देव के) उपदेश से सिद्ध है कि [सुराणाम्‌ अपि] देवों के भी [स्वभावसिद्धं] स्वभाव-सिद्ध [सौख्यं] सुख [नास्ति] नहीं है; [ते] वे [देहवेदनार्ता] (पंचेन्द्रियमय) देह की वेदना से पीड़ित होने से [रम्येसु विषयेसु] रम्य विषयों में [रमन्ते] रमते हैं ॥७१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    इन्द्रिय-सुख के भाजनों में प्रधान देव हैं; उनके भी वास्तव में स्वाभाविक सुख नहीं है, उल्टा उनके स्वाभाविक दुःख ही देखा जाता है; क्योंकि वे पचेन्द्रियात्मक शरीर-रूपी पिशाच की पीड़ा से परवश होने से भृगुप्रपात के समान मनोज्ञ विषयों की ओर दौड़ते हैं ॥७१॥

    भृगुप्रपात = अत्यंत दुःख से घबराकर आत्मघात करने के लिये पर्वत के निराधार उच्च शिखर से गिरना । (भृगु = पर्वत का निराधार उच्च-स्थान-शिखर प्रपात= गिरना)

    जयसेनाचार्य :
    [सोक्खं सहावसिद्धं] - उपादान-कारणभूत ज्ञानानन्द एक स्वभाव से उत्पन्न जो रागादि उपाधि रहित स्वाभाविक सुख, वह स्वभाव-सिद्ध सुख कहलाता है । [तच्च णत्थि सुराणं पि] - वह सुख मनुष्यादि के तो दूर ही रहो, देवेन्द्रादि के भी नहीं है । [सिद्धमुवदेसे] - ऐसा परमागम में कहा गया है । [ते देहवेदणट्ठा रमंति विसएसु रम्मेसु] - उस प्रकार के स्वभावसिद्ध सुख का अभाव होने से वे देवादि शरीर सम्बन्धी वेदना से पीड़ित-दु:खित होते हुये रम्याभास विषयों में रमण करते हैं ।

    अब इसका विस्तार करते हैं - जैसे कोई पुरुष विशेष सुख मानता है; वैसा यह संसार का सुख है । पूर्वोक्त मोक्षसुख इससे विपरीत है - यह तात्पर्य है ।

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    + इन्द्रिय-सुख के साधनभूत पुण्य को उत्पन्न करनेवाले शुभोपयोग की, दुःख के साधनभूत पाप को उत्पन्न करनेवाले अशुभोपयोग से अविशेषता -
    णरणारयतिरियसुरा भजन्ति जदि देहसंभवं दुक्खं । (72)
    किह सो सुहो व असुहो उवओगो हवदि जीवाणं ॥76॥
    नरनारकतिर्यक्सुरा भजन्ति यदि देहसंभवं दुःखम् ।
    कथं स शुभो वाऽशुभ उपयोगो भवति जीवानाम् ॥७२॥
    नर-नारकी तिर्यंच सुर यदि देहसंभव दु:ख को
    अनुभव करें तो फिर कहो उपयोग कैसे शुभ-अशुभ ? ॥७६॥
    अन्वयार्थ : [नरनारकतिर्यक्सुरा:] मनुष्य, नारकी, तिर्यंच और देव (सभी) [यदि] यदि [देहसंभवं] देहोत्पन्न [दुःखं] दुःख को [भजंति] अनुभव करते हैं, [जीवानां] तो जीवों का [सः उपयोग:] वह (शुद्धोपयोग से विलक्षण- अशुद्ध) उपयोग [शुभ: वा अशुभ:] शुभ और अशुभ-दो प्रकार का [कथं भवति] कैसे है? (अर्थात् नहीं है) ॥७२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    यदि शुभोपयोग-जन्य उदयगत पुण्य की सम्पत्ति वाले देवादिक (अर्थात् शुभोपयोग-जन्य पुण्य के उदय से प्राप्त होने वाली ऋद्धि वाले देव इत्यादि) और अशुभोपयोग-जन्य उदयगत पाप की आपदा वाले नारकादिक-यह दोनों स्वाभाविक सुख के अभाव के कारण अविशेषरूपसे (बिना अन्तर के) पचेन्द्रियात्मक शरीर सम्बन्धी दुःख का ही अनुभव करते हैं, तब फिर परमार्थ से शुभ और अशुभ उपयोग की पृथक्त्व व्यवस्था नहीं रहती ॥७२॥

    जयसेनाचार्य :
    [णरणारयंतिरियसुरा भजंति जदि देहसंभवं दुक्खं] - सहज अतीन्द्रिय, अमूर्त, सदानन्द एक लक्षण वास्तविक सुख को प्राप्त नहीं करते हुये मनुष्य, नारकी, तिर्यंच, देव यदि समानरूप से पूर्वोक्त पारमार्थिक सुख से विलक्षण पंचेन्द्रियात्मक शरीर से उत्पन्न दुःख को ही निश्चयनय से भोगते हैं, [किह सो सुहो व असुहो उवओगो हवदि जीवाणं] - व्यवहार से विशेष भेद होने पर भी निश्चय से शुद्धोपयोग से विलक्षण वह प्रसिद्ध शुभ-अशुभ उपयोग भिन्नता को कैसे प्राप्त हो सकता है? किसी भी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकता - यह भाव है ।

    इस प्रकार स्वतंत्र चार गाथाओं द्वारा प्रथम स्थल पूर्ण हुआ ।

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    + शुभोपयोग-जन्य फलवाला जो पुण्य है उसे विशेषत: दूषण देने के लिये उस पुण्य को (उसके अस्तित्व को) स्वीकार करके, उसकी (पुण्य की) बात का खंडन -
    कुलिसाउहचक्कधरा सुहोवओगप्पगेहिं भोगेहिं । (73)
    देहादीणं विद्धिं करेंति सुहिदा इवाभिरदा ॥77॥
    कुलिशायुधचक्रधराः शुभोपयोगात्मकैः भोगैः ।
    देहादीनां वृद्धिं कुर्वन्ति सुखिता इवाभिरताः ॥७३॥
    वज्रधर अर चक्रधर सब पुण्यफल को भोगते
    देहादि की वृद्धि करें पर सुखी हों ऐसे लगे ॥७७॥
    अन्वयार्थ : [कुलिशायुधचक्रधरा:] वज्रधर और चक्रधर (इन्द्र और चक्रवर्ती) [शुभोपयोगात्मकै: भोगै:] शुभोपयोग-मूलक (पुण्यों के फलरूप) भोगों के द्वारा [देहादीनां] देहादि की [वृद्धिं कुर्वन्ति] पुष्टि करते हैं और [अभिरता:] (इस प्रकार) भोगों में रत वर्तते हुए [सुखिता: इव] सुखी जैसे भासित होते हैं । (इसलिये पुण्य विद्यमान अवश्य है) ॥७३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    शक्रेन्द्र और चक्रवर्ती अपनी इच्छानुसार प्राप्त भोगों के द्वारा शरीरादि को पुष्ट करते हुए-जैसे गोंच (जोंक) दूषित रक्त में अत्यन्त आसक्त वर्तती हुई सुखी जैसी भासित होती है, उसी प्रकार-उन भोगों में अत्यन्त आसक्त वर्तते हुए सुखी जैसे भासित होते हैं; इसलिये शुभोपयोग-जन्य फलवाले पुण्य दिखाई देते हैं । (अर्थात् शुभोपयोगजन्य फलवाले पुण्यों का अस्तित्व दिखाई देता है) ॥७३॥

    जयसेनाचार्य :
    (अब तृष्णोत्पादक पुण्य प्रतिपादक चार गाथाओं में निबद्ध दूसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    अब पुण्य देवेन्द्र, चक्रवर्ती आदि पद देता है - इस प्रकार पहले प्रशंसा करते है । पुण्य की प्रशंसा किसलिये करते हैं? उसके फल के आधार से आगे तृष्णा की उत्पत्तिरूप दुःख दिखाने के लिये पहले उसकी प्रशंसा करते हैं -

    [कुलिसाउहचक्कधरा] - देवेन्द्र और चक्रवर्ती रूप कर्ता - इस वाक्य में कर्ता कारक में प्रयुक्त देवेन्द्र और चक्रवर्ती । [सुहोवओगप्पगेहिं भोगेहिं] - शुभोपयोग के फल से उत्पन्न भोगों द्वारा [देहादीणं वृद्धिं करेंति] - विशेष क्रियाओं के माध्यम से शरीर-परिवार आदि की वृद्धि करते हैं । वे कैसे होते हुये इनकी वृद्धि करते हैं? [सुहिदा इवाभिरदा] - वे सुखी के समान आसक्त होते हुये शरीरादि की वृद्धि करते हैं।

    यहाँ अर्थ यह है - जो परम अतिशय संतुष्टि को उत्पन्न करने वाला और विषय-तृष्णा को नष्ट करने वाला स्वाभाविक सुख है, उसे प्राप्त नहीं करने वाले दूषित रक्त में आसक्त जलयूका (जोंक) के समान आसक्त होते हुये सुखाभास से देहादि की वृद्धि करते हैं । इससे ज्ञात होता है कि उन्हें स्वाभाविक सुख नहीं है।

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    + इस प्रकार स्वीकार किये गये पुण्य दु:ख के बीज (तृष्णा) के कारण हैं -
    जदि संति हि पुण्णाणि य परिणामसमुब्भवाणि विविहाणि । (74)
    जणयंति विसयतण्हं जीवाणं देवदंताणं ॥78॥
    यदि सन्ति हि पुण्यानि च परिणामसमुद्भवानि विविधानि ।
    जनयन्ति विषयतृष्णां जीवानां देवतान्तानाम् ॥७४॥
    शुभभाव से उत्पन्न विध-विध पुण्य यदि विद्यमान हैं
    तो वे सभी सुरलोक में विषयेषणा पैदा करें ॥७८॥
    अन्वयार्थ : [यदि हि] (पूर्वोक्त पकार से) यदि [परिणामसमुद्भवानी] (शुभोपयोग-रूप) परिणाम से उत्पन्न होने वाले [विविधानि पुण्यानि च] विविध पुण्य [संति] विद्यमान हैं, [देवतान्तानां जीवानां] तो वे देवों तक के जीवों को [विषयतृष्णां] विषयतृष्णा [जनयन्ति] उत्पन्न करते हैं ॥७४॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    यदि इस प्रकार शुभोपयोग परिणाम से उत्पन्न होने वाले अनेक पकार के पुण्य विद्यमान हैं ऐसा स्वीकार किया है, तो वे (पुण्य) देवों तक के समस्त संसारियों को विषय-तृष्णा अवश्यमेव उत्पन्न करते हैं (ऐसा भी स्वीकार करना पड़ता है) वास्तव में तृष्णा के बिना; जैसे जोंक (गोंच) को दूषित रक्त में, उसी प्रकार समस्त संसारियों को विषयों में प्रवृत्ति दिखाई न दे; किन्तु वह तो दिखाई देती है । इसलिये पुण्यों की तृष्णायतनता अबाधित ही है (अर्थात् पुण्य तृष्णा के घर हैं ऐसा अविरोध रूप से सिद्ध होता है) ॥७४॥

    जयसेनाचार्य :
    [जदि संति हि पुण्णाणि य] - यदि निश्चय से पुण्य-पाप रहित परमात्मा से विपरीत पुण्य हैं । और वे भी पुण्य किस विशेषता वाले हैं? [परिणामसमुब्भवाणि] - निर्विकार स्वसंवेदन से विलक्षणशुभ परिणामों से उत्पन्न [विविहाणि] - अपने अनन्त भेदों से अनेक प्रकार वाले हैं । तब वे पुण्य क्या करते हैं? [जणयंति विसयतण्हं] - उत्पन्न करते हैं । वे पुण्य क्या उत्पन्न करते हैं? वेविषय-तृष्णा उत्पन्न करते हैं । वे किनकी विषय-तृष्णा उत्पन्न करते हैं? [जीवाणं देवदंताणं] - देखे हुये, सुने हुये, अनुभव किये हुये भोगों की आकांक्षा रूप निदान बंध से लेकर विविध प्रकार के इच्छा रूपी घोड़ों और विकल्प जालों से रहित परमसमाधि (स्वरूपलीनता) से उत्पन्न, सम्पूर्ण आत्म-प्रदेशों में परमाह्लाद को उत्पन्न करने वाले एकाकार परम समरसीभाव स्वरूप, विषयेच्छा रूप अग्नि से उत्पन्न तीव्रदाह की विनाशक, सुखामृत स्वरूप तृप्ति को प्राप्त नहीं करने वाले देवेन्द्रों से लेकर बहिर्मुख संसारी जीवों की विषय-तृष्णा को उत्पन्न करते हैं ।

    यहाँ तात्पर्य यह है कि यदि (उक्त बहिर्मुखी जीवों के) उस प्रकार की विषय-तृष्णा नहीं होती, तो वे दूषित रक्त में आसक्त जलयूका (जोंक) के समान विषयों में प्रवृत्ति कैसे करते? और यदि वे करते है, तो तृष्णा के उत्पादक होने से पुण्य दुःख के कारण ज्ञात होते हैं।

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    + पुण्य में दुःख के बीज की विजय घोषित करते हैं -
    ते पुण उदिण्णतण्हा दुहिदा तण्हाहिं विसयसोक्खाणि । (75)
    इच्छंति अणुभवंति य आमरणं दुक्खसंतत्ता ॥79॥
    ते पुनरुदीर्णतृष्णाः दुःखितास्तृष्णाभिर्विषयसौख्यानि ।
    इच्छन्त्यनुभवन्ति च आमरणं दुःखसंतप्ताः ॥७५॥
    अरे जिनकी उदित तृष्णा दु:ख से संतप्त वे
    हैं दुखी फिर भी आमरण वे विषयसुख ही चाहते ॥७९॥
    अन्वयार्थ : [पुन:] और, [उदीर्णतृष्णा: ते] जिनकी तृष्णा उदित है ऐसे वे जीव [तृष्णाभि: दुःखिता:] तृष्णाओं के द्वारा दुःखी होते हुए, [आमरणं] मरणपर्यंत [विषय सौख्यानि इच्छन्ति] विषय-सुखों को चाहते हैं [च] और [दुःखसन्तसा:] दुःखों से संतप्त होते हुए (दुःख-दाह को सहन न करते हुए) [अनुभवंति] उन्हें भोगते हैं ॥७५॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जिनके तृष्णा उदित है ऐसे देवपर्यन्त समस्त संसारी, तृष्णा दुःख का बीज होने से, पुण्य-जनित तृष्णाओं के द्वारा भी अत्यन्त दुखी होते हुए मृगतृष्णा में से जल की भाँति विषयों में से सुख चाहते हैं और उस दुख-संताप के वेग को सहन न कर सकने से विषयों को तब-तक भोगते हैं, जब तक कि विनाश (मरण) को प्राप्त नहीं होते । जैसे जोंक (गोंच), तृष्णा जिसका बीज है ऐसे विजय को प्राप्त दु:खांकुर से क्रमश: आक्रान्त होने से दूषित रक्त को चाहती है और उसी को भोगती हुई मरण-पर्यन्त क्लेश को पाती है, उसी प्रकार यह पुण्यशाली जीव भी, पापशाली जीवों की भाँति, तृष्णा जिसका बीज है ऐसे विजय-प्राप्त दु:खांकुरों के द्वारा क्रमश: आक्रांत होने से, विषयों को चाहते हुए और उन्ही को भोगते हुए विनाश-पर्यन्त (मरणपर्यन्त) क्लेश पाते हैं ।

    इससे पुण्य सुखाभास ऐसे दुःखका ही साधन है ॥७५॥

    जैसे मृगजल में से जल नहीं मिलता वैसे ही इन्द्रिय-विषयों में से सुख प्राप्त नहीं होता
    दुःखसंताप = दुःखदाह; दुःख की जलन-पीड़ा

    जयसेनाचार्य :
    [ते पुण उदिण्णतण्हा] - सहज शुद्धात्म-तृप्ति का अभाव होने से सर्व संसारी जीव तृष्णा की प्रगटता वाले होते हुये [दुहिदा तण्हाहिं] - स्वसंवेदन से उत्पन्न पारमार्थिक सुख का अभाव होने से पूर्वोक्त तृष्णा से दुःखित होते हुये । तृष्णा से दुःखी वे क्या करते है? [विसयसोक्साणि इच्छंति] - उससे दुःखी वे निर्विषय परमात्मसुख से विलक्षण विषय-सुख की इच्छा करते हैं । वे मात्र उसकी इच्छा ही नहीं करते, अपितु [अणुभंवति य] - अनुभव भी करते हैं । वे विषय-सुख का अनुभव कब तक करते हैं? [आमरण] - वे उसका अनुभव मरण पर्यन्त करते हैं । कैसे होते हुये वे उसका अनुभव करते है? [दुक्खसंतत्ता] - दुःख से संतप्त होते हुये वे उसका अनुभव करते हैं ।

    यहाँ अर्थ यह है - जैसे तृष्णा की वृद्धि से प्रेरित दूषित रक्त की इच्छा करते हुये जलौकस (जोंक) उसके ही अनुभव करते हुये मरण पर्यन्त दुःखी होते है; उसी प्रकार स्वशुद्धात्मा के संवेदन से रहित जीव भी, मृगतृष्णा के कारण जल की इच्छा के समान विषयों को चाहते हुये तथा उनका ही अनुभव करते हुये मरण पर्यन्त दु:खी होते हैं ।

    इससे यह निश्चित हुआ कि तृष्णा रूपी रोग को उत्पन्न करने वाले होने से पुण्य वास्तव में दुःख के कारण हैं ।

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    + पुन: पुण्य-जन्य इन्द्रिय-सुख को अनेक पकार से दुःखरूप प्रकाशित करते हैं -
    सपरं बाधासहियं विच्छिण्णं बंधकारणं विसमं । (76)
    जं इंदिएहि लद्धं तं सोक्खं दुक्खमेव तहा ॥80॥
    सपरं बाधासहितं विच्छिन्नं बन्धकारणं विषमम् ।
    यदिन्द्रियैर्लब्धं तत्सौख्यं दुःखमेव तथा ॥७६॥
    इन्द्रियसुख सुख नहीं दुख है विषम बाधा सहित है
    है बंध का कारण दुखद परतंत्र है विच्छिन्न है ॥८०॥
    अन्वयार्थ : [यत्] जो [इन्द्रियै: लब्धं] इन्द्रियों से प्राप्त होता है [तत् सौख्य] वह सुख [सपरं] पर-सम्बन्ध-युक्त, [बाधासहितं] बाधासहित [विच्छिन्नं] विच्छिन्न [बंधकारणं] बंधका कारण [विषमं] और विषम है; [तथा] इस प्रकार [दुःखम् एव] वह दुःख ही है ॥७६॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    पर-सम्बन्ध-युक्त होने से, बाधा सहित होने से, विच्छन्न होने से, बन्ध का कारण होने से, और विषम होने से - इन्द्रियसुख, पुण्यजन्य होने पर भी, दुःख ही है ।

    इन्द्रियसुख
    1. 'पर के सम्बन्धवाला' होता हुआ पराश्रयता के कारण पराधीन है,
    2. बाधासहित होता हुआ खाने, पीने और मैथुन की इच्छा इत्यादि तृष्णा की व्यक्तियों से (तृष्णा की प्रगटताओं से) युक्त होने से अत्यन्त आकुल है,
    3. 'विच्छिन्न' होता हुआ असाता-वेदनीय का उदय जिसे च्युत कर देता है ऐसे साता-वेदनीय के उदय से प्रवर्तमान होता हुआ अनुभव में आता है, इसलिये विपक्ष की उत्पत्तिवाला है,
    4. 'बन्ध का कारण' होता हुआ विषयोपभोग के मार्ग में लगी हुई रागादि दोषों की सेना के अनुसार कर्म-रज के घन-पटल का सम्बन्ध होने के कारण परिणाम से दु:सह है, और
    5. 'विषम' होता हुआ हानि- वृद्धि में परिणमित होने से अत्यन्त अस्थिर है;
    इसलिये वह (इन्द्रियसुख) दुःख ही है । जब कि ऐसा है (इन्द्रियसुख दुःख ही है) तो पुण्य भी, पाप की भाँति, दुख का साधन है ऐसा फलित हुआ ॥७६॥

    च्युत करना = हटा देना; पदभ्रष्ट करना; (साता-वेदनीय का उदय उसकी स्थिति अनुसार रहकर हट जाता है और असाता-वेदनीय का उदय आता है)
    घन पटल = सघन (गाढ) पर्त, बड़ा झुण्ड

    जयसेनाचार्य :
    [जं इंदियेहिं लद्धं तं सोक्खं दुक्खमेव तहा] - जो इन्द्रियों से प्राप्त संसार-सुख है, वह सुख जिस प्रकार पूर्वोक्त पाँच विशेषणों सहित है, उसी प्रकार दुःख ही है - यह अभिप्राय है ।

    इस प्रकार पुण्य जीव की तृष्णा के उत्पादक होने से दुःख के कारण हैं - इस कथनरूप से दूसरे स्थल में चार गाथायें पूर्ण हुईं ।

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    + पुण्य और पाप की अविशेषता का निश्चय करते हुए उपसंहार -
    ण हि मण्णदि जो एवं णत्थि विसेसो त्ति पुण्णपावाणं । (77)
    हिंडदि घोरमपारं संसारं मोहसंछण्णो ॥81॥
    न हि मन्यते य एवं नास्ति विशेष इति पुण्यपापयोः ।
    हिण्डति घोरमपारं संसारं मोहसंछन्नः ॥७७॥
    पुण्य-पाप में अन्तर नहीं है - जो न माने बात ये
    संसार-सागर में भ्रमें मद-मोह से आच्छन्न वे ॥८१॥
    अन्वयार्थ : [एवं] इसप्रकार [पुण्यपापयो:] पुण्य और पाप में [विशेष: नास्ति] अन्तर नहीं है [इति] ऐसा [यः] जो [न हि मन्यते] नहीं मानता, [मोहसंछन्न:] वह मोहाच्छादित होता हुआ [घोर अपारं संसारं] घोर अपार संसार में [हिण्डति] परिभ्रमण करता है ॥७७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    यों पूर्वोक्त प्रकार से, शुभाशुभ उपयोग के द्वैत की भाँति और सुख-दुःख के द्वैत की भाँति, परमार्थ से पुण्य-पाप का द्वैत नहीं टिकता-नहीं रहता, क्योंकि दोनों में अनात्म-धर्मत्व अविशेष अर्थात् समान है । (परमार्थ से जैसे शुभोपयोग और अशुभोपयोग रूप द्वैत विद्यमान नहीं है, जैसे सुख और दुःखरूप द्वैत विद्यमान नहीं है, उसीप्रकार पुण्य और पाप-रूप द्वैत का भी अस्तित्व नहीं है; क्योंकि पुण्य और पाप दोनों आत्मा के धर्म न होने से निश्चय से समान ही हैं ।) ऐसा होने पर भी, जो जीव उन दोनों मे-सुवर्ण और लोहे की बेड़ी की भाँति- अहंकारिक अन्तर मानता हुआ, अहमिन्द्र-पदादि सम्पदाओं के कारणभूत धर्मानुराग पर अत्यन्त निर्भरमयरूप से (गाढरूप से) अवलम्बित है, वह जीव वास्तव में चित्तभूमि के उपरक्त होने से (चित्त की भूमि कर्मोपाधि के निमित्त से रंगी हुई-मलिन विकृत होने से) जिसने शुद्धोपयोग शक्ति का तिरस्कार किया है, ऐसा वर्तता हुआ संसार-पर्यन्त (-जब तक इस संसार का अस्तित्व है तब तक अर्थात् सदा के लिये) शारीरिक दुःख का ही अनुभव करता है ॥७७॥

    सुख = इन्द्रियसुख
    पुण्य और पाप में अन्तर होने का मत अहंकार-जन्य (अविद्या-जन्य, अज्ञान-जन्य) है

    जयसेनाचार्य :
    (अब उपसंहार परक दो गाथाओं वाला तीसरा स्थल प्रारम्भ होता है ।)

    [ण हि मण्णदि जो एवं] - जो इसप्रकार नहीं मानता है । क्या नहीं मानता है? [णत्थि विसेसो त्ति पुण्णपावाणं] - निश्चय से पुण्य और पाप मे विशेष (भेद-अन्तर) नहीं है - ऐसा नहीं मानता है । वह क्या करता है? [हिंडदि घोरमपारं संसारं] - वह घूमता है । कहाँ घूमता है? संसार में घूमता है । कैसे संसार में घूमता है? अभव्य की अपेक्षा से - वह घोर अपार संसार में घूमता है । वह ऐसे संसार में कैसा होता हुआ घूमता है? [मोहसंछण्णो] - वह मोह से आच्छादित होता हुआ (घिरा हुआ) ऐसे संसार में घूमता है ।

    वह इसप्रकार - व्यवहार से द्रव्य पुण्य-पाप में भेद है, अशुद्ध निश्चयनय से भाव पुण्य-पाप और उनके फलस्वरूप होनेवाले सुख-दुख में भेद है, परन्तु शुद्ध निश्चय से शुद्धात्मा से भिन्न होने के कारण (इनमें) भेद नहीं है । इसप्रकार शुद्ध निश्चयनय से पुण्य और पाप में अभेद को जो नहीं मानता है, वह देवेन्द्र, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव, कामदेव आदि पदों के निमित्त निदानबन्धरूप से पुण्य को चाहता हुआ, निर्मोह शुद्धात्मतत्त्व से विपरीत दर्शनमोह-चारित्रमोह से आच्छादित होता हुआ सोने की बेड़ी और लोहे की बेड़ी के समान पुण्य और पाप दोनों से बंधा हुआ, संसार रहित शुद्धात्मा से विपरीत संसार में भ्रमण करता है - यह अर्थ है ।

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    + इस प्रकार शुभ और अशुभ उपयोग की अविशेषता अवधारित करके, अशेष दुःख का क्षय करने का मन में दृढ़ निश्चय करके शुद्धोपयोग में निवास -
    एवं विदिदत्थो जो दव्वेसु ण रागमेदि दोसं वा । (78)
    उवओगविसुद्धो सो खवेदि देहुब्भवं दुक्खं ॥82॥
    विदितार्थजन परद्रव्य में जो राग-द्वेष नहीं करें
    शुद्धोपयोगी जीव वे तनजनित दु:ख को क्षय करें ॥८२॥
    अन्वयार्थ : [एवं] इसप्रकार [विदितार्थ:] वस्तु-स्वरूप को जानकर [यः] जो [द्रव्येषु] द्रव्यों के प्रति [रागं द्वेषं वा] राग या द्वेष को [न एति] प्राप्त नहीं होता, [स] वह [उपयोगविशुद्ध:] उपयोगविशुद्ध होता हुआ [देहोद्भवं दुःखं] देहोत्पन्न दुःख का [क्षपयति] क्षय करता है ॥७८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जो जीव शुभ और अशुभ भावों के अविशेष दर्शन से (समानता की श्रद्धा से) वस्तु-स्वरूप को सम्यक-प्रकार से जानता है, स्व और पर दो विभागों में रहने वाली, समस्त पर्यायों सहित समस्त द्रव्यों के प्रति राग और द्वेष को निरवशेष रूप से छोड़ता है, वह जीव, एकान्त से उपयोग-विशुद्ध (सर्वथा शुद्धोपयोगी) होने से जिसने पर-द्रव्य का आलम्बन छोड़ दिया है ऐसा वर्तता हुआ-लोहे के गोले में से लोहे के सार का अनुसरण न करने वाली अग्नि की भाँति-प्रचंड घन के आघात समान शारीरिक दुःख का क्षय करता है । (जैसे अग्नि लोहे के तप्त गोले में से लोहे के सत्व को धारण नहीं करती इसलिये अग्नि पर प्रचंड घन के प्रहार नहीं होते, उसी प्रकार पर-द्रव्य का आलम्बन न करने वाले आत्मा को शारीरिक दुःख का वेदन नहीं होता ।) इसलिये यही एक शुद्धोपयोग मेरी शरण है ॥७८॥

    सार = सत्व, घनता, कठिनता

    जयसेनाचार्य :
    [एवं विदिदत्थो जो] - इसप्रकार ज्ञानानन्द एक स्वभावरूप परमात्म-तत्त्व ही उपादेय है, अन्य सर्व हेय हैं - इसप्रकार हेयोपादेय के परिज्ञान से अर्थ--तत्त्व को जानकर, जो [दव्वेसु ण रागमेदि दोसं वा] - निज शुद्धात्म-द्रव्य से भिन्न शुभाशुभ सम्पूर्ण द्रव्यों में राग अथवा द्वेष को प्राप्त नहीं होता है, [उवओगविसुद्धो सो] - रागादि रहित शुद्धात्मानुभूति लक्षण शुद्धोपयोग से विशुद्ध होकर वह [खवेदि देहुब्भवं दुक्खं] - अनाकुलता लक्षण पारमार्थिक सुख से विलक्षण तपे हुये लोह-पिण्ड के समान देह से उत्पन्न तीव्र आकुलता के उत्पादक शारीरिक दुःख को, लोह-पिण्ड से रहित अग्नि के समान, घनघात परम्परा के स्थानीय देह रहित होकर नष्ट कर देता है - यह अभिप्राय है ।

    इसप्रकार उपसंहार रूप से तीसरे स्थल में दो गाथायें पूर्ण हुईं ।

    इसप्रकार शुभाशुभ विषयक मूढ़ता के निराकरण के लिये १० गाथा पर्यन्त ३ स्थलों के समूह द्वारा प्रथम ज्ञानकण्डिका नामक पहला अन्तराधिकार पूर्ण हुआ ।

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    + शुद्धोपयोग के अभाव में शुद्धात्मा को प्राप्त नहीं करता है - व्यतिरेक रूप से दृढ करते हैं -
    चत्ता पावारंभं समुट्ठिदो वा सुहम्मि चरियम्मि । (79)
    ण जहदि जदि मोहादी ण लहदि सो अप्पगं सुद्धं ॥83॥
    त्यक्त्वा पापारम्भं समुत्थितो वा शुभे चरित्रे ।
    न जहाति यदि मोहादीन्न लभते स आत्मकं शुद्धम् ॥७९॥
    सब छोड़ पापारंभ शुभचारित्र में उद्यत रहें
    पर नहीं छोड़े मोह तो शुद्धातमा को ना लहें ॥८३॥
    अन्वयार्थ : [पापारम्भं] पापरम्भ को [त्यक्त्वा] छोड़कर [शुभे चरित्रे] शुभ चारित्र में [समुत्थित: वा] उद्यत होने पर भी [यदि] यदि जीव [मोहादीन्] मोहादि को [न जहाति] नहीं छोड़ता, तो [सः] वह [शुद्धं आत्मकं] शुद्ध आत्मा को [न लभते] प्राप्त नहीं होता ॥७९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जो जीव समस्त सावद्य-योग के प्रत्याख्यान-स्वरूप परम-सामायिक नामक चारित्र की प्रतिज्ञा करके भी धूर्त अभिसारिका (नायिका) की भांति शुभोपयोग-परिणति से अभिसार (मिलन) को प्राप्त होता हुआ (अर्थात् शुभोपयोग-परिणति के प्रेम में फँसता हुआ) मोह की सेना के वश-वर्तनपने को दूर नहीं कर डालता-जिसके महा दुःख संकट निकट हैं ऐसा वह, शुद्ध (विकार रहित, निर्मल) आत्मा को कैसे प्राप्त कर सकता है? (नहीं प्राप्त कर सकता) इसलिये मैने मोह की सेना पर विजय प्राप्त करने को कमर कसी है ॥७९॥

    अभिसारिका = संकेत अनुसार प्रेमी से मिलने जाने वाली स्त्री
    अभिसार = प्रेमी से मिलने जाना

    जयसेनाचार्य :
    (अब आप्त-आत्मा के स्वरूप परिज्ञान विषयक मूढ़ता निराकरण की प्रधानता वाला सात गाथाओं में निबद्ध द्वितीय ज्ञानकण्डिका नामक दूसरा अन्तराधिकार प्रारम्भ होता है ।)

    [चत्ता पावारंभं] - पहले घर में निवास आदि रूप पापारम्भ को छोड़कर [समुट्ठिदो वा सुहम्मि चरियम्हि] - फिर अच्छी तरह स्थित होता है । अच्छी तरह कहाँ स्थित होता है? शुभचारित्र में स्थित होता है। [ण जहदि जदि मोहादि] - यदि राग-द्वेष-मोह को नहीं छोड़ता है, [ण लहदि सो अप्पगं सुद्धं] - वह शुद्धात्मा को प्राप्त नहीं करता है ।

    यहाँ विस्तार करते हैं - यदि कोई मोक्षार्थी, पहले परम-उपेक्षा लक्षण परम सामायिक की प्रतिज्ञा लेकर, बाद में विषय-सुख की साधक शुभोपयोग परिणति से मोहित चित्तवाला होता हुआ, निर्विकल्प समाधि स्वरूप पूर्वोक्त सामायिक का अभाव होने पर निर्मोह शुद्धात्म-तत्त्व से विरुद्ध मोहादि को नहीं छोड़ता है, तो जिन रूप सिद्ध-भगवान के समान निज-शुद्धात्मा को प्राप्त नही करता है -- यह गाथा का अर्थ है ।

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    + शुद्धोपयोग का अभाव होने पर जैसे (जिन के समान) जिन सिद्ध स्वरूप को प्राप्त नहीं करता है -
    तवसंजमप्पसिद्धो सुद्धो सग्गापवग्गमग्गकरो ।
    अमरासुरिंदमहिदो देवो सो लोयसिहरत्थो ॥84॥
    हो स्वर्ग अर अपवर्ग पथदर्शक जिनेश्वर आपही
    लोकाग्रथित तपसंयमी सुर-असुर वंदित आपही ॥८४॥
    अन्वयार्थ : तप और संयम से सिद्ध हुए वे देव स्वर्ग तथा मोक्षमार्ग के प्रदर्शक, देवेन्द्रों-असुरेन्द्रों से पूजित तथा लोक के शिखर पर स्थित हैं ॥८४॥

    जयसेनाचार्य :
    [तवसंजमप्पसिद्धो] - सम्पूर्ण रागादि परभावों की इच्छा के त्याग से, स्व-स्वरूप में प्रतपन-विजयन तप है; बाह्य में इन्द्रिय-संयम और प्राणसंयम के बल से शुद्धात्मा में संयमन पूर्वक समरसी भाव से परिणमन संयम है । उन दोनों से प्रसिद्ध-उत्पन्न-इसप्रकार तप और संयम से प्रसिद्ध [सुद्धो] - क्षुधादि अठारह दोषों से रहित, [सग्गापवग्गमग्गकरो] - स्वर्ग और प्रसिद्ध केवलज्ञानादि अनन्त चतुष्टय लक्षण मोक्ष - उन दोनों का मार्ग करते हैं अर्थात् मार्ग का उपदेश देते हैं - इसप्रकार स्वर्ग-मोक्ष मार्गकर, [अमरासुरिंदमहिदो] - उस पद के इच्छुक देवेन्द्रों-असुरेन्द्रों द्वारा पूजित हैं - इसप्रकार अमरासुरेन्द्र महित, [देवो सो] - इन गुणों से विशिष्ट वे अरहंत देव हैं । [लोयसिहरत्थो] - वे ही भगवान लोक के अग्र शिखर पर स्थित होते हुये सिद्ध हैं - इसप्रकार जिनरूप सिद्ध भगवान का स्वरूप जानना चाहिये ।

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    + इस प्रकार के उन निर्दोषी परमात्मा की जो श्रद्धा करते हैं - उन्हे मानते हैं - वे अक्षय सुख को प्राप्त करते हैं, एसा प्रज्ञापन करते हैं - ज्ञान कराते हैं -
    तं देवदेवदेवं जदिवरवसहं गुरुं तिलोयस्स ।
    पणमंति जे मणुस्सा ते सोक्खं अक्खयं जंति ॥85॥
    देवेन्द्रों के देव यतिवरवृषभ तुम त्रैलोक्यगुरु
    जो नमें तुमको वे मनुज सुख संपदा अक्षय लहें ॥८५॥
    अन्वयार्थ : जो मनुष्य देवेन्द्रों के भी देव - देवाधिदेव, मुनिवरों में श्रेष्ठ, तीनलोकके गुरु (उन निर्दोषी परमात्मा) को नमस्कार करते हैं; वे अक्षय सुख प्राप्त करते हैं ॥८५॥

    जयसेनाचार्य :
    [तं देवदेवदेवं] - सौधर्मेन्द्रादि देवों के भी देव-देवेन्द्र हैं, उनके देव-आराध्य - उन देवाधिदेव को, [जदिवरवसहं] - जितेन्द्रियत्व होने से निजशुद्धात्मा में प्रयत्नशील यति हैं, उनमें श्रेष्ठ गणधर देवादि हैं, उनमें भी प्रधान यतिवर वृषभ--उन यतिवर-वृषभ को [गुरुम् तिलोयस्स] - अनन्त ज्ञानादि महान गुणों के द्वारा तीन लोक के भी गुरु - उन त्रिलोकगुरु को [पणमंति जे मणुस्सा] - इसप्रकार के उन भगवान को जो मनुष्यादि द्रव्य-भाव नमस्कार पूर्वक प्रणाम करते हैं - उनकी आराधना करते हैं, [ते सोक्खं अक्खयं जंति] - वे उस आराधना के फल-स्वरूप परम्परा से अक्षय-अनन्त सौख्य को प्राप्त करते हैं - यह गाथा का भाव है ।

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    + 'मैं मोह की सेना को कैसे जीतूं' - ऐसा उपाय विचारता है -
    जो जाणदि अरहंतं दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं । (80)
    सो जाणदि अप्पाणं मोहो खलु जादि तस्स लयं ॥86॥
    यो जानात्यर्हन्तं द्रव्यत्वगुणत्वपर्ययत्वैः ।
    स जानात्यात्मानं मोहः खलु याति तस्य लयम् ॥८०॥
    द्रव्य गुण पर्याय से जो जानते अरहंत को
    वे जानते निज आतमा दृगमोह उनका नाश हो ॥८६॥
    अन्वयार्थ : [यः] जो [अर्हन्तं] अरहन्त को [द्रव्यत्व-गुणत्वपर्ययत्वै:] द्रव्यपने गुणपने और पर्यायपने [जानाति] जानता है, [सः] वह [आत्मानं] (अपने) आत्मा को [जानाति] जानता है और [तस्य मोह:] उसका मोह [खलु] अवश्य [लयं याति] लय को प्राप्त होता है ॥८०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जो वास्तव में अरहंत को द्रव्य-रूप से, गुण-रूप से और पर्याय-रूप से जानता है वह वास्तव में आत्मा को जानता है, क्योंकि दोनों में निश्चय से अन्तर नहीं है; और अरहन्त का स्वरूप, अन्तिम ताव को प्राप्त सोने के स्वरूप की भाँति, परिस्पष्ट (सर्वप्रकार से स्पष्ट) है, इसलिये उसका ज्ञान होने पर सर्व आत्मा का ज्ञान होता है । वहाँ अन्वय वह द्रव्य है, अन्वय का विशेषण वह गुण है और अन्वय के व्यतिरेक (भेद) वे पर्यायें हैं । सर्वत: विशुद्ध भगवान अरहंत में (अरहंत के स्वरूप का ख्याल करने पर) जीव तीनों प्रकार-युक्त समय को (द्रव्य-गुण-पर्यायमय निज आत्मा को) अपने मन से जान लेता है-समझ लेता है । यथा 'यह चेतन है' इस प्रकार का अन्वय वह द्रव्य है, अन्वय के आश्रित रहनेवाला 'चैतन्य' विशेषण वह गुण है, और एक समय मात्र की मर्यादा वाला काल-परिमाण होने से परस्पर अप्रवृत्त अन्वय-व्यतिरेक वे पर्यायें हैं-जो कि चिद्विवर्तन (आत्मा के परिणमन) की ग्रंथियां (गाठें) हैं ।

    अब, इस प्रकार त्रैकालिक को भी (त्रैकालिक आत्मा को भी) एक काल में समझ लेने वाला वह जीव, जैसे मोतियों को झूलते हुए हार में अन्तर्गत माना जाता है, उसी प्रकार चिद्‌विवर्तों का चेतन में ही संक्षेपण (अंतर्गत) करके, तथा विशेषण-विशेष्यता की वासना का अन्तर्धान होने से-जैसे सफेदी को हार में अन्तर्हित किया जाता है, उसी प्रकार-चैतन्य को चेतन में ही अन्तर्हित करके, जैसे मात्र हार को जाना जाता है, उसीप्रकार केवल आत्मा को जानने पर, उसके उत्तरोत्तर क्षण में कर्ता-कर्म-क्रिया का विभाग क्षय को प्राप्त होता जाता है इसलिये निष्किय चिन्मात्र भाव को प्राप्त होता है; और इस प्रकार मणि की भाँति जिसका निर्मल प्रकाश अकम्प-रूप से प्रवर्तमान है ऐसे उस (चिन्मात्र भाव को प्राप्त) जीव के मोहान्धकार निराश्रयता के कारण अवश्यमेव प्रलय को प्राप्त होता है ।

    यदि ऐसा है तो मैने मोह की सेना को जीतने का उपाय प्राप्त कर लिया है ॥८०॥

    चेतन = आत्मा
    अन्वयव्यतिरेक = एक दूसरे में नहीं प्रवर्तते ऐसे जो अन्वय के व्यतिरेक
    विशेषण गुण है और विशेष्य वो द्रव्य है
    अंतर्धान = अदृश्य हो जाना
    अंतर्हित = गुप्त; अदृश्य
    हार को खरीदने वाला मनुष्य हार को खरीदते समय हार, उसकी सफेदी और उनके मोतियों इत्यादि की परीक्षा करता है, किन्तु बाद में सफेदी और मोतियों को हार में ही समाविष्ट करके उनका लक्ष छोड्कर वह मात्र हार को ही जानता है । यदि ऐसा न करे तो हार के पहिनने पर भी उसकी सफेदी आदि के विकल्प बने रहने से हार को पहनने के सुख का वेदन नहीं कर सकेगा

    जयसेनाचार्य :
    [जो जाणदि अरहंतं] - कर्तारूप जो जानता है - इस कथन में कर्ता कारक में प्रयुक्त जो जानता है । किसे जानता है? जो अरहन्त को जानता है । किस रूप से अरहंत को जानता है? [दव्वत्तगुणत्तपज्जयत्तेहिं] - जो द्रव्यरूप से, गुणरूप से और पर्यायरूप से अरहन्त को जानता है । [सो जाणदि अप्पाणं] - वह पुरुष अरहन्त के परिज्ञान के बाद आत्मा को जानता है, [मोहो खलु जादि तस्स लयं] - उस आत्म-परिज्ञान से उसका मोह-दर्शनमोह विनाश को प्राप्त होता है ।

    वह इसप्रकार - केवलज्ञानादि विशेषगुण, अस्तित्वादि सामान्यगुण, परमौदारिक शरीराकार-रूप जो आत्म-प्रदेशों का अवस्थान (आकार) वह व्यंजन-पर्याय, अगुरुलघुक गुण की षडवृद्धि-हानि रूप से प्रति-समय होने वाली अर्थ-पर्यायें - इन लक्षण वाले गुण-पर्यायों का आधारभूत अमूर्त असंख्यात प्रदेशी शुद्ध चैतन्य के अन्वयरूप (नित्य-वही-वही) द्रव्य है ।

    इसप्रकार द्रव्य-गुण-पर्याय स्वरूप को पहले कहे हुये अरहन्त नामक परमात्मा में जानकर, तदनन्तर निश्चय नय से उसी आगम के सारपदभूत अध्यात्म-भाषा (की अपेक्षा) से स्वशुद्धात्म-भावना के सम्मुख रूप सविकल्प 'स्वसंवेदन ज्ञान से', - उसीप्रकार आगम भाषा (की अपेक्षा) से अध:प्रवृत्तिकरण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण नामक दर्शनमोह के क्षय में समर्थ परिणाम-विशेष के बल से पश्चात् (अपने ज्ञान को) आत्मा में जोड़ता है ।

    इसके बाद निर्विकल्प स्वरूप प्राप्त होने पर, जैसे अभेदनय से पर्याय स्थानीय मुक्ताफल (मोती) और गुण स्थानीय धवलता (सफेदी) हार ही है, उसीप्रकार अभेद नय से पूर्वोक्त द्रव्य-गुण-पर्याय आत्मा ही हैं - इसप्रकार परिणमित होता हुआ (उसका) दर्शन-मोहरूप अन्धकार विनाश को प्राप्त होता है - यह गाथा का भाव है ।

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    + इसप्रकार मैने चिंतामणि-रत्न प्राप्त कर लिया है तथापि प्रमाद चोर विद्यमान है, ऐसा विचार कर जागृत रहता है -
    जीवो ववगदमोहो उवलद्धो तच्चमप्पणो सम्मं । (81)
    जहदि जदि रागदोसे सो अप्पाणं लहदि सुद्धं ॥87॥
    जीवो व्यपगतमोह उपलब्धवांस्तत्त्वमात्मनः सम्यक् ।
    जहाति यदि रागद्वेषौ स आत्मानं लभते शुद्धम् ॥८१॥
    जो जीव व्यपगत मोह हो - निज आत्म उपलब्धि करें
    वे छोड़ दें यदि राग रुष शुद्धात्म उपलब्धि करें ॥८७॥
    अन्वयार्थ : [व्यपगतमोह:] जिसने मोह को दूर किया है और [सम्यक् आत्मन: तत्त्वं] आत्मा के सम्यक् तत्त्व को (सच्चे स्वरूप को) [उपलब्धवान्] प्राप्त किया है ऐसा [जीव:] जीव [यदि] यदि [रागद्वेषौ] रागद्वेष को [जहाति] छोड़ता है, [सः] तो वह [शुद्धं आत्मानं] शुद्ध आत्मा को [लभते] प्राप्त करता है ॥८१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    इस प्रकार जिस उपाय का स्वरूप वर्णन किया है, उस उपाय के द्वारा मोह को दूर करके भी सम्यक् आत्म-तत्त्व को (यथार्थ स्वरूप को) प्राप्त करके भी यदि जीव राग-द्वेष को निर्मूल करता है, तो शुद्ध आत्मा का अनुभव करता है । (किन्तु) यदि पुन:-पुन: उनका अनुसरण करता है, -रागद्वेषरूप परिणमन करता है, तो प्रमाद के अधीन होने से शुद्धात्म-तत्त्व के अनुभव रूप चिंतामणि-रत्न के चुराये जाने से अन्तरंग में खेद को प्राप्त होता है । इसलिये मुझे रागद्वेष को दूर करने के लिये अत्यन्त जाग्रत रहना चाहिये ॥८१॥

    जयसेनाचार्य :
    [जीवो] जीवरूप कर्ता - इस गाथा में कर्ता कारक में प्रयुक्त जीव । वह जीव किस विशेषता वाला है । [ववगदमोहो] शुद्धात्म-तत्त्व की रुचि को रोकने वाले दर्शन-मोह से रहित है । वह और किस विशेषता वाला है? [उवलद्धो] जानने वाला है । किसे जानने वाला है? [तच्चं] परमानन्द एक स्वभावी आत्म-तत्त्व को जानने वाला है । किसके आत्म-तत्त्व को जाननेवाला है? [अप्पणो] निज शुद्धात्मा सम्बन्धी आत्म-तत्त्व को जानने वाला है । निज शुद्धात्म-तत्व को कैसे जानता है? [सम्मं] संशयादि दोषों से रहित होने के कारण अच्छी तरह जानता है । [जहदि जदि रागदोसे] यदि शुद्धात्मानुभूति लक्षण वीतराग-चारित्र को रोकने वाले चारित्र-मोह नामक राग-द्वेष को छोड़ता है, [सो अप्पाणं लहदि सुद्धं] वही अभेद रत्नत्रय परिणत जीव शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी आत्मा को प्राप्त करता है - मुक्त होता है ।

    यहाँ प्रश्न है कि पहली ज्ञान कण्डिका में -

    उवओगविसुद्धो सो खवेदि देहुब्भवं दुक्खं -- (गाथा ८२ उत्तरार्द्ध)

    उपयोग की विशुद्धि (शुद्धोपयोग) वाला वह जीव, देहज दुःखों का क्षय करता है।

    - ऐसा कहा गया है और यहाँ -

    जहदि जदि रागदोसे सो अप्पाणं लहदि सुद्धं -- (प्रकृत गाथा उत्तरार्द्ध)

    यदि वह राग-द्वेष को छोड़ता है तो शुद्धात्मा को प्राप्त करता है - ऐसा कहा गया है । दोनों ही गाथाओं से मोक्ष फलित होता है; अन्तर क्या है?

    आचार्य उसके प्रति उत्तर कहते हैं -- वहाँ (गाथा ८२ मे) निश्चय से शुभाशुभ में समानता जानकर, बाद में शुभ रहित निज शुद्धस्वरूप में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करता है, इस कारण शुभाशुभ-मूढ़ता के निराकरण के लिये (वह) ज्ञानकण्डिका कही गई है । और यहाँ द्रव्य-गुण-पर्याय से आप्त का स्वरूप जानकर, बाद में उसरूप स्व-शुद्धात्मा में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करता है, इस कारण यह आप्त और आत्म-स्वरूप विषयक मूढ़ता के निराकरण के लिए ज्ञान-कण्डिका है - इन दोनों में इतना ही अन्तर है ।

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    + यही एक, भगवन्तों ने स्वयं अनुभव करके प्रगट किया हुआ मोक्ष का पारमार्थिक पंथ है -
    सव्वे वि य अरहंता तेण विधाणेण खविदकम्मंसा । (82)
    किच्चा तधोवदेसं णिव्वादा ते णमो तेसिं ॥88॥
    सर्वेऽपि चार्हन्तस्तेन विधानेन क्षपितकर्मांशाः ।
    कृत्वा तथोपदेशं निर्वृतास्ते नमस्तेभ्यः ॥८२॥
    सर्व ही अरहंत ने विधि नष्ट कीने जिस विधी
    सबको बताई वही विधि हो नमन उनको सब विधी ॥८८॥
    अन्वयार्थ : [सर्वे अपि च] सभी [अर्हन्तः] अरहन्त भगवान [तेन विधानेन] उसी विधि से [क्षपितकर्मांशा:] कर्मांशों का क्षय करके [तथा] तथा उसी प्रकार से [उपदेशं कृत्वा] उपदेश करके [निवृता: ते] मोक्ष को प्राप्त हुए हैं [नम: तेभ्य:] उन्हें नमस्कार हो ॥८२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    अतीत काल में क्रमश हुए समस्त तीर्थंकर भगवान, प्रकारान्तर का असंभव होने से जिसमें द्वैत संभव नहीं है; ऐसे इसी एक प्रकार से कर्मांशों (ज्ञानावरणादि कर्म भेदों) का क्षय स्वयं अनुभव करके (तथा) परमाप्तता के कारण भविष्यकाल में अथवा इस (वर्तमान) काल में अन्य मुमुक्षुओं को भी इसीप्रकार से उसका (कर्म क्षय का) उपदेश देकर नि:श्रेयस (मोक्ष) को प्राप्त हुए हैं; इसलिये निर्वाण का अन्य (कोई) मार्ग नहीं है ऐसा निश्चित होता है । अथवा अधिक प्रलाप से बस होओ! मेरी मति व्यवस्थित हो गई है । भगवन्तों को नमस्कार हो ॥८२॥

    प्रकारान्तर = अन्य प्रकार (कर्म-क्षय एक ही पकार से होता है, अन्य-प्रकार से नहीं होता, इसलिये उस कर्म-क्षय के प्रकार में द्वैत अर्थात् दो-रूपपना नहीं है)
    परमाप्त = परम आप्त; परम विश्वासपात्र (तीर्थंकर भगवान सर्वज्ञ और वीतराग होने से परम आप्त हैं, अर्थात् उपदेष्टा हैं)

    जयसेनाचार्य :
    [सव्वे वि य अरहंता] - और सभी अरहन्त [तेण विधाणेण] - द्रव्य-गुण-पर्याय द्वारा पहले अरहन्त को जानकर बाद में वैसे ही अपने आत्मा में स्थितिरूप-लीनतारूप - उस पूर्वोक्त प्रकार से [खविदकम्मंसा] - विविध कर्मों से रहित होकर [किच्चा तधोवदेसं] - हे भव्यों! निश्चय रत्नत्रयात्मक शुद्धात्मा की प्राप्ति लक्षण यह ही मोक्षमार्ग है, दूसरा नहीं है - ऐसा उपदेश देकर [णिव्वादा] - अक्षय-अनन्त सुख से तृप्त हुये हैं - मुक्त हुये हैं [ते] - वे अरहन्त भगवान । [णमो तेसिं] - इसप्रकार मोक्षमार्ग का निश्चय करके, मोक्ष और मोक्ष-मार्ग - उन दोनों के इच्छुक ('श्री कुंदकुंदाचार्यदेव') उस निज शुद्धात्मानुभूति स्वरूप मोक्षमार्ग तथा उसके उपदेशक अरहंतों को 'उन्हें नमस्कार हो' इस पद द्वारा नमस्कार करते हैं -- यह अभिप्राय है ।

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    दंसणसुद्धा पुरिसा णाणपहाणा समग्गचरियत्था ।
    पूजासक्काररिहा दाणस्स य हि ते णमो तेसिं ॥89॥
    अरे समकित ज्ञान सम्यक्चरण से परिपूर्ण जो
    सत्कार पूजा दान के वे पात्र उनको नमन हो ॥८९॥
    अन्वयार्थ : जो पुरुष सम्यग्दर्शन से शुद्ध, ज्ञान में प्रधान और परिपूर्ण चारित्र में स्थित हैं, वे ही पूजा, सत्कार और दान के योग्य हैं; उन्हें नमस्कार हो ॥८९॥

    जयसेनाचार्य :
    [दंसणसुद्धा] - निज शुद्धात्मा की रुचिरूप, निश्चय सम्यकत्व को साधनेवाले, तीन मूढता आदि पच्चीस दोषों से रहित तत्वार्थ-श्रद्धान लक्षण, दर्शन से शुद्ध - दर्शनशुद्ध हैं । [पुरिसा] - जीव । और वे जीव कैसे हैं? [णाणपहाणा] - उपराग रहित स्वसंवेदन-ज्ञान को साधने वाले वीतराग - सर्वज्ञ द्वारा कहे गये परमागम का अभ्यास लक्षण ज्ञान से प्रधान - ज्ञान से समर्थ - ज्ञान में प्रौढ - ज्ञान प्रधान हैं । और वे जीव कैसे हैं? [समग्गचरियत्था] - विकार रहित, चंचलता रहित आत्मानुभूति लक्षण निश्चय चारित्र को साधने वाले आचारादि शास्त्रों में कहे गये मूलगुणों व उत्तरगुणों के अनुष्ठानादिरूप चारित्र से समग्र - परिपूर्ण - समग्र चारित्रवान हैं, [पूजासक्काररिहा] - द्रव्य व भाव रूप पूजा व गुण - प्रशंसारूप सत्कार - उन दोनों के योग्य हैं । [दाणस्सय हि] - और स्पष्टरूप से दान के योग्य हैं [ते] - वे पहले कहे हुये रत्नत्रय के आधारभूत जीव । [णमो तेसिं] - उन्हें नमस्कार हो - इसप्रकार वे ही नमस्कार-योग्य हैं ।

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    + शुद्धात्म-लाभ के परिपंथी (शत्रु) मोह का स्वभाव और उसमें प्रकारों को व्यक्त करते हैं -
    दव्वादिएसु मूढो भावो जीवस्स हवदि मोहो त्ति । (83)
    खुब्भदि तेणुच्छण्णो पप्पा रागं व दोसं वा ॥90॥
    द्रव्यादिकेषु मूढो भावो जीवस्य भवति मोह इति ।
    क्षुभ्यति तेनावच्छन्नः प्राप्य रागं वा द्वेषं वा ॥८३॥
    द्रव्यादि में जो मूढ़ता वह मोह उसके जोर से
    कर राग रुष परद्रव्य में जिय क्षुब्ध हो चहुंओर से ॥९०॥
    अन्वयार्थ : [जीवस्य] जीवके [द्रव्यादिकेषु मूढ: भाव:] द्रव्यादि सम्बन्धी मूढ़ भाव (द्रव्य-गुण-पर्याय सम्बन्धी जो मूढ़तारूप परिणाम) [मोह: इति भवति] वह मोह है [तेन अवच्छन्न:] उससे आच्छादित वर्तता हुआ जीव [रागं वा द्वेषं वा प्राप्य] राग अथवा द्वेष को प्राप्त कर के [क्षुभ्यति] क्षुब्ध होता है ॥८३॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    धतूरा खाये हुए मनुष्यकी भांति, जीवके जो पूर्व वर्णित द्रव्य-गुण-पर्याय हैं उनमें होनेवाला तत्त्व -अप्रतिपत्तिलक्षण मूढ़ भाव वह वास्तव में मोह है । उस मोह से निजरूप आच्छादित होने से यह आत्मा पर-द्रव्य को स्व-द्रव्य रूप से, पर-गुण को स्व-गुण रूप से, और पर-पर्यायों को स्व-पर्याय रूप समझकर-अंगीकार करके, अति रूढ-दृढ़तर संस्कार के कारण पर-द्रव्य को ही सदा ग्रहण करता हुआ, 'दग्ध इन्द्रियों की रुचि के वश से' अद्वैत में भी द्वैत प्रवृत्ति करता हुआ, रुचिकर-अरुचिकर विषयों में राग-द्वेष करके अति प्रचुर जल-समूह के वेग से प्रहार को प्राप्त सेतु-बन्ध (पुल) की भाँति दो भागों में खंडित होता हुआ अत्यन्त क्षोभ को प्राप्त होता है । इससे मोह, राग और द्वेष -- इन भेदों के कारण मोह तीन प्रकार का है ॥८३॥

    तत्त्व अप्रतिपत्ति लक्षण = तत्त्व की अप्रतिपत्ति (अप्राप्ति, अज्ञान, अनिर्णय) जिसका लक्षण है ऐसा ।
    दग्ध = जली हुई; हलकी; शापित । (’दग्ध’ तिरस्कार-वाचक शब्द है)
    इन्द्रियविषयोंमे-पदार्थों में 'यह अच्छे हैं और यह बुरे' इस प्रकार का द्वैत नहीं है; तथापि वहाँ भी मोहाच्छादित जीव अच्छे-बुरे का द्वैत उत्पन्न कर लेते हैं

    जयसेनाचार्य :
    [दव्वादिएसु] - शुद्धात्मादि द्रव्यों में, उन द्रव्यों के अनंत-ज्ञानादि और अस्तित्वादि विशेष - सामान्य लक्षण गुणों में और शुद्वात्म - परिणति लक्षण सिद्धत्वादि पर्यायों में तथा यथासंभव पहले कहे गये तथा आगे कहे जाने वाले द्रव्य-गुण-पर्यायों में [मूढो भावो] - इन पूर्वोक्त द्रव्य-गुण-पर्यायों में, विपरीत अभिप्राय रूप से तत्त्व में संशय उत्पन्न करनेवाला मूढभाव [जीवस्स हवदि मोहो त्ति] - जीव का इसप्रकार का भाव दर्शनमोह है । [खुब्भदि तेणुच्छण्णो] - उस दर्शनमोह से घिरा हुआ, निराकुल आत्म-तत्त्व से विपरीत आकुलता द्वारा क्षोभ, स्वरूप चंचलता, विपरीतता को प्राप्त होता है । क्या करके स्वरूप विपरीतता को प्राप्त होता है? [पप्पा रागं व दोसं वा] - विकार रहित शुद्धात्मा से विपरीत इष्टानिष्ट इन्द्रिय - विषयों में हर्ष-विषाद रूप चारित्रमोह नामक राग-द्वेष को प्राप्तकर स्वरूप-विपरीतता को प्राप्त होता है ।

    इससे क्या कहा गया है - यह सब कहने का तात्पर्य क्या है? मोह - दर्शनमोह और राग-द्वेष दोनों चारित्रमोह - इसप्रकर मोह तीन भूमिकावाला - तीन भेदवाला है ।

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    + तीनों प्रकार के मोह को अनिष्ट कार्य का कारण कहकर उसका क्षय करने को सूत्र द्वारा कहते हैं -
    मोहेण व रागेण व दोसेण व परिणदस्स जीवस्स । (84)
    जायदि विविहो बंधो तम्हा ते संखवइदव्वा ॥91॥
    मोहेन वा रागेण वा द्वेषेण वा परिणतस्य जीवस्य ।
    जायते विविधो बन्धस्तस्मात्ते संक्षपयितव्याः ॥८४॥
    बंध होता विविध मोहरु क्षोभ परिणत जीव के
    बस इसलिए सम्पूर्णत: वे नाश करने योग्य हैं ॥९१॥
    अन्वयार्थ : [मोहेन वा] मोहरूप [रागेण वा] रागरूप [द्वेषेण वा] अथवा द्वेषरूप [परिणतस्य जीवस्य] परिणमित जीव के [विविध: बंध:] विविध बंध [जायते] होता है; [तस्मात्] इसलिये [ते] वे (मोह-राग-द्वेष) [संक्षपयितव्या:] सम्पूर्णतया क्षय करने योग्य हैं ॥८४॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    इस प्रकार तत्त्व-अप्रतिपत्ति (वस्तु-स्वरूप के अज्ञान) से बंद हुए, मोह-रूप, राग-रूप या द्वेष-रूप परिणमित होते हुए इस जीव को-
    1. घास के ढेर से ढँके हुए खड्डे का संग करने वाले हाथी की भाँति,
    2. हथिनी-रूपी कुट्टनी के शरीर में आसक्त हाथी की भाँति और
    3. विरोधी हाथी को देखकर, उत्तेजित होकर (उसकी ओर) दौड़ते हुए हाथी की भाँति
    विविध प्रकार का बंध होता है; इसलिये मुमुक्षु जीव को अनिष्ट कार्य करने वाले इस मोह, राग और द्वेष का यथावत् निर्मूल नाश हो इस प्रकार क्षय करना चाहिये ॥८४॥

    जयसेनाचार्य :
    [मोहेण व रागेण व दोसेण व परिणदस्स जीवस्स] - मोहादि रहित परमात्मस्वरूप परिणति से रहित मोह, राग, द्वेष परिणत बाह्यदृष्टिवाले (बहिरात्मा) जीव के [जायदि विविहो बंधो] - शुद्धोपयोग लक्षण भाव-मोक्ष तथा उसके बल से जीव-प्रदेश और कर्म-प्रदेशों का अत्यन्त पृथक् होना द्रव्यमोक्ष है -- इसप्रकार द्रव्य-भाव मोक्ष से विलक्षण सभी प्रकार से उपादेयभूत - प्रगट करने योग्य स्वाभाविक सुख से विपरीत नारकादि दुःखों के कारणभूत विविध प्रकार के बंध होते हैं । [तम्हा ते संखवइदव्वा] - क्योंकि राग-द्वेष-मोह परिणत जीव के इसप्रकार बन्ध होता है, इसलिये रागादि से रहित शुद्धात्मा के ध्यान द्वारा, वे राग-द्वेष-मोह अच्छी तरह नष्ट करने योग्य हैं -- यह तात्पर्य है ।

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    + इस मोह-राग-द्वेष को इन चिन्हों के द्वारा पहिचान कर उत्पन्न होते ही नष्ट कर देना चाहिये -
    अट्ठे अजधागहणं करुणाभावो य तिरियमणुएसु । (85)
    विसएसु य प्पसंगो मोहस्सेदाणि लिंगाणि ॥92॥
    अर्थे अयथाग्रहणं करुणाभावश्च तिर्यङ्मनुजेषु ।
    विषयेषु च प्रसङ्गो मोहस्यैतानि लिङ्गानि ॥८५॥
    अयथार्थ जाने तत्त्व को अति रती विषयों के प्रति
    और करुणाभाव ये सब मोह के ही चिह्न हैं ॥९२॥
    अन्वयार्थ : [अर्थे अयथाग्रहणं] पदार्थ का अयथाग्रहण (अर्थात् पदार्थों को जैसे हैं वैसे सत्य-स्वरूप न मानकर उनके विषय में अन्यथा समझ) [च] और [तिर्यङ्मनुजेषु करुणाभाव:] तिर्यच-मनुष्यों के प्रति करुणाभाव, [विषयेषु प्रसंग: च] तथा विषयों की संगति (इष्ट विषयों में प्रीति और अनिष्ट विषयों में अप्रीति) - [एतानि] यह सब [मोहस्य लिंगानि] मोह के चिह्न-लक्षण हैं ॥८५॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    पदार्थों की अयथा-तथ्य रूप प्रतिपत्ति के द्वारा और तिर्यंच-मनुष्य प्रेक्षायोग्य होने पर भी उनके प्रति करुणा-बुद्धि से मोह को (जानकर), इष्ट विषयों की आसक्ति से राग को और अनिष्ट विषयों की अप्रीति से द्वेष को (जानकर) -इस प्रकार तीन लिंगों के द्वारा (तीन पकार के मोह को) पहिचानकर तत्काल ही उत्पन्न होते ही तीनो प्रकार का मोह नष्ट कर देने योग्य है ॥८५॥

    पदार्थों की अयथातथ्य रूप प्रतिपत्ति = पदार्थ जैसे नहीं है उन्हें वैसा समझना अर्थात् उन्हें अन्यथा स्वरूप से अंगीकार करना
    प्रेक्षायोग्य = मात्र प्रेक्षक भाव से- दृष्टा-ज्ञाता रूप से- मध्यस्थ भाव से देखने योग्य

    जयसेनाचार्य :
    [अट्ठे अजधागहणं] - यथास्वरूप (अपने-अपने स्वरूप मे) स्थित होने पर भी शुद्धात्मादि पदार्थों में विपरीत अभिप्राय के कारण जैसा नहीं है, वैसा ग्रहण करना (विपरीत जानना/मानना), [करुणाभावो य] - शुद्धात्मा की प्राप्ति लक्षण परम उपेक्षा संयम से विपरीत करुणा भाव - दया परिणाम अथवा व्यवहार से करुणा का अभाव - किन विषयों में करुणा या करुणा का अभाव भाव? [मणुवतिरिएसु] - मनुष्य और तिर्यंच जीवों में करुणा भाव या करुणा का अभाव [(मोहस्सेदाणि लिंगाणि)] - ये दर्शन मोह के चिन्ह हैं । [विसएसु च प्पसंगो] - विषय रहित सुखरूपी स्वाद से रहित बहिरात्मा जीवों को रुचिकर और अरुचिकर विषयों में जो वह विशेषरूप से संग-संसर्ग प्रवृत्ति है, उसे देखकर प्रीति और अप्रीति के चिन्हों से विवेकियों द्वारा चारित्रमोह नामक राग और द्वेष जाने जाते हैं; इसलिये उनके परिज्ञान के तत्काल बाद ही, निर्विकार निज शुद्धात्मा की भावना से, राग-द्वेष-मोह पूर्णरूप से नष्ट करने योग्य हैं - यह गाथा का अर्थ है ।

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    + मोह-क्षय करने का उपायान्तर (दूसरा उपाय) विचारते हैं -
    जिणसत्थादो अट्ठे पच्चक्खादीहिं बुज्झदो णियमा । (86)
    खीयदि मोहोवचयो तम्हा सत्थं समधिदव्वं ॥93॥
    जिनशास्त्रादर्थान् प्रत्यक्षादिभिर्बुध्यमानस्य नियमात् ।
    क्षीयते मोहोपचयः तस्मात् शास्त्रं समध्येतव्यम् ॥८६॥
    तत्त्वार्थ को जो जानते प्रत्यक्ष या जिनशास्त्र से
    दृगमोह क्षय हो इसलिए स्वाध्याय करना चाहिए ॥९३॥
    अन्वयार्थ : [जिनशास्त्रात्] जिनशास्त्र द्वारा [प्रत्यक्षादिभि:] प्रत्यक्षादि प्रमाणों से [अर्थान्] पदार्थों को [बुध्यमानस्य] जानने वाले के [नियमात्] नियम से [मोहोपचय:] *मोहोपचय [क्षीयते] क्षय हो जाता है [तस्मात्] इसलिये [शास्त्रं] शास्त्र का [समध्येतव्यम्] सम्यक् प्रकार से अध्ययन करना चाहिये ॥८६॥
    *मोहोपचय = मोह का उपचय । (उपचय = संचय; समूह)

    अमृतचंद्राचार्य :
    द्रव्य-गुण-पर्याय स्वभाव से अर्हन्त के ज्ञान द्वारा आत्मा का उस प्रकार का ज्ञान मोह-क्षय के उपाय के रूप में पहले (८० वीं गाथा में) प्रतिपादित किया गया था, वह वास्तव में इस (निम्न-लिखित) उपायान्तर की अपेक्षा रखता है । (वह उपायान्तर क्या है सो कहा जाता है) : -

    जिसने प्रथम भूमिका में गमन किया है ऐसे जीव को, जो सर्वज्ञोपज्ञ होने से सर्व प्रकार से अबाधित है ऐसे, शब्द प्रमाण को (द्रव्य श्रुत-प्रमाण को) प्राप्त करके क्रीड़ा करने पर, उसके संस्कार से विशिष्ट संवेदन (ज्ञान) शक्ति रूप सम्पदा प्रगट करने पर, सहृदय-जनों के हृदय को आनन्द का उद्भेद देने वाले प्रत्यक्ष प्रमाण से अथवा उससे (प्रत्यक्ष प्रमाण से) अविरुद्ध अन्य प्रमाण समूह से तत्त्वतः समस्त वस्तु-मात्र को जानने पर अतत्त्व-अभिनिवेश के संस्कार करने वाला मोहोपचय (मोहसमूह) अवश्य ही क्षय को प्राप्त होता है । इसलिये मोह का क्षय करने में, परम शब्द-ब्रह्म की उपासना का भाव-ज्ञान के अवलम्बन द्वारा दृढ़ किये गये परिणाम से सम्यक् प्रकार अभ्यास करना सो उपायान्तर है । (जो परिणाम भाव-ज्ञान के अवलम्बन से दृढ़ीकृत हो ऐसे परिणाम से द्रव्य-श्रुत का अभ्यास करना सो मोह-क्षय करने के लिये उपायान्तर है) ॥८६॥

    सर्वज्ञोपज्ञ = सर्वज्ञ द्वारा स्वयं जाना हुआ (और कहा हुआ)
    सहृदय = भावुक; शास्त्र में जिस समय जिस भाव का प्रसंग होय उस भाव को हृदय में ग्रहण करने वाला; बुध; पंडित
    उद्भेद = स्फुरण; प्रगटता; फुवारा

    जयसेनाचार्य :
    [जिणसत्थादो अट्ठे पच्चक्खादीहिं बुज्झदो णियमा] जिन-शास्त्र से प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा शुद्धात्मादि पदार्थों को जाननेवाले जीव का निश्चय से । उन्हें जानने का क्या फल है? [खीयदि मोहोवचयो] - उन्हें जानने से विपरीत अभिप्रायरूप संस्कार करनेवाला मोह समूह नष्ट हो जाता है । [तम्हा सत्थं समधिदव्वं] - इसलिये शास्त्र का अच्छी तरह से अध्ययन करना चाहिये ।

    वह इसप्रकार - कोई भव्य, वह इसप्रकार -- निश्चयनय से शरीर में शुद्ध- बुद्ध एकस्वभाव-परमात्मा (त्रिकाली निज भगवान आत्मा) है । शरीर में ही निज परमात्मा है - यह कैसे जाना? सुखादि के समान विकार-रहित स्व-संवेदन प्रत्यक्षरूप से यह जाना जाता है, उसीप्रकार अन्य भी पदार्थ यथासंभव आगम-अभ्यास के बल से उत्पन्न प्रत्यक्ष अथवा अनुमान से जाने जाते हैं । इसलिये भव्य मोक्षार्थी को आगम का अभ्यास करना चाहिये - यह तात्पर्य है ।

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    + जिनेन्द्र के शब्द ब्रह्म में अर्थों की व्यवस्था (पदार्थों की स्थिति) किस प्रकार है सो विचार करते हैं -
    दव्वाणि गुणा तेसिं पज्जाया अट्ठसण्णया भणिया । (87)
    तेसु गुणपज्जयाणं अप्पा दव्व त्ति उवदेसो ॥94॥
    द्रव्याणि गुणास्तेषां पर्याया अर्थसंज्ञया भणिताः ।
    तेषु गुणपर्यायाणामात्मा द्रव्यमित्युपदेशः ॥८७॥
    द्रव्य-गुण-पर्याय ही हैं अर्थ सब जिनवर कहें
    अर द्रव्य गुण-पर्यायमय ही भिन्न वस्तु है नहीं ॥९४॥
    अन्वयार्थ : [द्रव्याणि] द्रव्य, [गुणा:] गुण [तेषां पर्याया:] और उनकी पर्यायें [अर्थसंज्ञया] 'अर्थ' नाम से [भणिता:] कही गई हैं । [तेषु] उनमें, [गुणपर्यायाणाम्‌ आत्मा द्रव्यम्] गुण-पर्यायों का आत्मा द्रव्य है (गुण और पर्यायों का स्वरूप-सत्त्व द्रव्य ही है, वे भिन्न वस्तु नहीं हैं) [इति उपदेश:] इसप्रकार (जिनेन्द्र का) उपदेश है ॥८७॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    द्रव्य, गुण और पर्यायों में अभिधेय-भेद होने पर भी अभिधान का अभेद होने से वे 'अर्थ' हैं (अर्थात् द्रव्यों, गुणों और पर्यायों में वाच्य का भेद होने पर भी वाचक में भेद न दखें तो 'अर्थ' ऐसे एक ही वाचक-शब्द से ये तीनों पहिचाने जाते हैं) । उसमें (इन द्रव्यों, गुणों और पर्यायों में से), जैसे इसीप्रकार अन्यत्र भी है, (इस दृष्टान्त की भाँति सर्व द्रव्य-गुण-पर्यायों में भी समझना चाहिये)

    और जैसे इन सुवर्ण, पीलापन इत्यादि गुण और कुण्डल इत्यादि पर्यायों में (इन तीनों में, पीलापन इत्यादि गुणों का और कुण्डल पर्यायों का) सुवर्ण से अपृथक्त्व होने से उनका (पीलापन इत्यादि गुणों का और कुण्डल इत्यादि पर्यायों का) सुवर्ण ही आत्मा है, उसी प्रकार उन द्रव्य-गुण-पर्यायों में गुण-पर्यायों का द्रव्य से अपृथक्त्व होने से उनका द्रव्य ही आत्मा है (अर्थात् द्रव्य ही गुण और पर्यायों का आत्मा-स्वरूप-सर्वस्व-सत्य है)

    'ऋ' धातु में से 'अर्थ' शब्द बना है । 'ऋ' अर्थात् पाना, प्राप्त करना, पहुँचना, जाना । 'अर्थ' अर्थात् (१) जो पाये-प्राप्त करे-पहुँचे, अथवा (२) जिसे पाया जाये-प्राप्त किया जाये-पहुँचा जाये ।
    जैसे सुवर्ण, पीलापन आदिको और कुण्डल आदि को प्राप्त करता है अथवा पीलापन आदि और कुण्डल आदि के द्वारा प्राप्त किया जाता है (अर्थात् पीलापन आदि और कुण्डल आदिक सुवर्ण को प्राप्त करते हैं) इसलिये सुवर्ण 'अर्थ' है, वैसे द्रव्य 'अर्थ'; जैसे पीलापन आदि आश्रय-भूत सुवर्ण को प्राप्त करता है अथवा आश्रय-भूत सुवर्ण द्वारा प्राप्त किये जाते है (अर्थात् आश्रय-भूत सुवर्ण पीलापन आदि को प्राप्त करता है) इसलिये पीलापन आदि 'अर्थ' हैं, वैसे गुण 'अर्थ' हैं; जैसे कुण्डल आदि सुवर्ण को क्रम-परिणाम से प्राप्त करते हैं अथवा सुवर्ण द्वारा क्रम-परिणाम से प्राप्त किया जाता है (अर्थात् सुवर्ण कुण्डल आदि को क्रम-परिणाम से प्राप्त करता है) इसलिये कुण्डल आदि 'अर्थ' हैं, वैसे पर्यायें 'अर्थ' हैं

    जयसेनाचार्य :
    [दव्वाणि गुणा तेसिं पज्जाया अट्ठसण्णया भणिया] - द्रव्य-गुण और उन द्रव्यों की पर्यायें- तीनों को 'अर्थ' नाम से कहा गया है - इन सभी का अर्थ नाम है - यह अर्थ – भाव है । [तेसु] - उन तीनों द्रव्य-गुण-पर्यायों के मध्य [गुणपज्जयाणं अप्पा] - गुण-पर्यायों का सम्बन्धी आत्मा - स्वभाव है । गुण-पर्यायों का सम्बन्धी आत्मा कौन है? ऐसा पूछने पर [दव्व त्ति उवदेसो] - द्रव्य ही उन गुण-पर्यायों का आत्मा-स्वभाव है - ऐसा उपदेश है । अथवा - द्रव्य का क्या स्वभाव है? ऐसा पूछने पर गुण-पर्यायों का आत्मा - स्वरूप ही उसका स्वभाव है - ऐसा उपदेश है ।

    अब यहाँ उसका विस्तार करते है- जिस कारण अनन्तज्ञान-सुख आदि गुणों को और उसीप्रकार अमूर्तत्व, अतीन्द्रियत्व, सिद्धत्व आदि पर्यायों को प्राप्त करता है - उसरूप से परिणमन करता है - उनका आश्रय लेता है, उसकारण अर्थ कहलाता है । अर्थ कौन कहलाता है? शुद्धात्म-द्रव्य अर्थ कहलाता है ।

    जिस कारण आधारभूत उस शुद्धात्मद्रव्य को प्राप्त करते हैं - उसरूप से परिणमन करते है - उसका आश्रय लेते हैं, उस कारण वे अर्थ कहलाते हें। वे अर्थ कहलाने वाले कौन हैं? वे अर्थ कहलाने वाले ज्ञानत्व आदि गुण तथा सिद्धत्वादि पर्यायें हैं ।

    ज्ञानत्व-सिद्धत्वादि गुण-पर्यायों का आत्मा अर्थात् स्वभाव क्या है? ऐसा पूछने पर शुद्धात्मद्रव्य ही स्वभाव है, अथवा शुद्धात्मद्रव्य का स्वभाव क्या है? ऐसा पूछने पर पूर्वोक्त गुण-पर्यायें ही उसका स्वभाव है।

    इसीप्रकार शेष द्रव्य-गुण-पर्यायों की भी अर्थ संज्ञा जानना चाहिये - यह अर्थ है ।

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    + इस प्रकार मोहक्षय के उपायभूत जिनेश्वर के उपदेश की प्राप्ति होने पर भी पुरुषार्थ अर्थक्रियाकारी है, इसलिये पुरुषार्थ करता है -
    जो मोहरागदोसे णिहणदि उवलब्भ जोण्हमुवदेसं । (88)
    सो सव्वदुक्खमोक्खं पावदि अचिरेण कालेण ॥95॥
    यो मोहरागद्वेषान्निहन्ति उपलभ्य जैनमुपदेशम् ।
    स सर्वदुःखमोक्षं प्राप्नोत्यचिरेण कालेन ॥८८॥
    जिनदेव का उपदेश यह जो हने मोहरु क्षोभ को
    वह बहुत थोड़े काल में ही सब दुखों से मुक्त हो ॥९५॥
    अन्वयार्थ : [यः] जो [जैनं उपदेशं] जिनेन्द्र के उपदेश को [उपलभ्य] प्राप्त करके [मोहरागद्वेषान्] मोह-राग-द्वेष को [निहंति] हनता है, [सः] वह [अचिरेण कालेन] अल्प काल में [सर्वदुःखमोक्षं प्राप्नोति] सर्व दुःखों से मुक्त हो जाता है ॥८८॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    इस अति दीर्घ, सदा उत्पात-मय संसार-मार्ग मे किसी भी प्रकार से जिनेन्द्र-देव के इस तीक्ष्ण असिधारा समान उपदेश को प्राप्त करके भी जो मोह-राग-द्वेष पर अति दृढता पूर्वक प्रहार करता है, वही हाथ में तलवार लिये हुए मनुष्य की भांति शीघ्र ही समस्त दुःखों से परिमुक्त होता है; अन्य (कोई) व्यापार (प्रयत्न; क्रिया) समस्त दुःखों से परिमुक्त नहीं करता । (जैसे मनुष्य के हाथ में तीक्ष्ण तलवार होने पर भी वह शत्रुओं पर अत्यन्त वेग से उसका प्रहार करे तभी वह शत्रु सम्बन्धी दुःख से मुक्त होता है अन्यथा नहीं, उसी प्रकार इस अनादि संसार में महाभाग्य से जिनेश्वर-देव के उपदेश-रूपी तीक्ष्ण तलवार को प्राप्त करके भी जो जीव मोह-राग-द्वेष रूपी शत्रुओं पर अतिदृढ़ता पूर्वक उसका प्रहार करता है वही सर्व दुःखों से मुक्त होता है अन्यथा नहीं) इसीलिये सम्पूर्ण आरम्भ से (प्रयत्नपूर्वक) मोह का क्षय करने के लिये मैं पुरुषार्थ का आश्रय ग्रहण करता हूँ ॥८८॥

    जयसेनाचार्य :
    [जो मोहरागदोसे णिहणदि] - जो मोह-राग-द्वेष को नष्ट करता है । क्या करके उन्हें नष्ट करता है ? [उवलब्भ] - प्राप्तकर उन्हें नष्ट करता है । क्या प्राप्त कर उन्हें नष्ट करता है ? [जोण्हमुवदेसं] - जिनेन्द्र भगवान का उपदेश प्राप्त कर उन्हें नष्ट करता है । [सो सव्वदुक्खमोक्खं पवदि]- वह सर्व दु:खों से मोक्ष (छुटकारा) प्राप्त करता है । कैसे-कब प्राप्त करता है? [अचिरेण कालेण] अल्प समय में--थोड़े ही समय में मोक्ष प्राप्त करता है ।

    वह इस प्रकार - एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रिय, पंचेन्द्रियादि (जीवों की) दुर्लभ परम्परा से जिनेन्द्र भगवान का उपदेश प्राप्त कर मोह-राग-द्वेष से विलक्षण अविनाभावी निश्चय-सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान युक्त अपने शुद्धात्मा की निश्चल अनुभूति लक्षण वीतराग चारित्र नामक तीक्ष्ण (पैनी) तलवार को जो मोह-राग-द्वेष रूपी शत्रुओं के ऊपर दृढ़ता से गिराता है, वही वास्तविक अनाकुलता लक्षण सुख से विपरीत दुःखों का क्षय करता है -- यह अर्थ है ।

    इस प्रकार द्रव्य-गुण-पर्याय के विषय में मूढ़ता निराकरण के लिये छह गाथाओं द्वारा तीसरी ज्ञान-कण्डिका पूर्ण हुई ।

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    + स्व-पर के विवेक की सिद्धि से ही मोह का क्षय हो सकता है, इसलिये स्व-पर के विभाग की सिद्धि के लिये प्रयत्न करते हैं -
    णाणप्पगमप्पाणं परं च दव्वत्तणाहिसंबद्धं । (89)
    जाणदि जदि णिच्छयदो जो सो मोहक्खयं कुणदि ॥96॥
    ज्ञानात्मकमात्मानं परं च द्रव्यत्वेनाभिसंबद्धम् ।
    जानाति यदि निश्चयतो यः स मोहक्षयं करोति ॥८९॥
    जो जानता ज्ञानात्मक निजरूप अर परद्रव्य को
    वह नियम से ही क्षय करे दृगमोह एवं क्षोभ को ॥९६॥
    अन्वयार्थ : [यः] जो [निश्चयत:] निश्चय से [ज्ञानात्मकं आत्मानं] ज्ञानात्मक ऐसे अपने को [च] और [परं] पर को [द्रव्यत्वेन अभिसंबद्धम्] निज-निज द्रव्यत्व से संबद्ध (संयुक्त) [यदि जानाति] जानता है, [सः] वह [मोह क्षयं करोति] मोह का क्षय करता है ॥८९॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जो निश्चय से अपने को स्वकीय (अपने) चैतन्यात्मक द्रव्यत्व से संबद्ध (संयुक्त) और पर को परकीय (दूसरे के) यथोचित द्रव्यत्व से संबद्ध जानता है, वही (जीव), जिसने कि सम्यक्त्व-रूप से स्व-पर के विवेक को प्राप्त किया है, सम्पूर्ण मोह का क्षय करता है । इसलिये मैं स्व-पर के विवेक के लिये प्रयत्नशील हूँ ॥८९॥

    यथोचित = यथायोग्य-चेतन या अचेतन (पुद्गलादि द्रव्य परकीय अचेतन द्रव्यत्व से और अन्य आत्मा परकीय चेतन द्रव्यत्व से संयुक्त हैं)

    जयसेनाचार्य :
    (अब स्व-पर तत्त्व परिज्ञान विषयक मूढ़ता का निराकरण करनेवाला दो गाथाओं में निबद्ध चतुर्थ ज्ञान-कण्डिका नामक चौथा अन्तराधिकार प्रारम्भ होता है ।)

    [णाणप्पगमप्पाणं परं च दव्वत्तणाहिसंबद्धं जाणदि जदि] - यदि ज्ञान-स्वरूपी आत्मा को जानता है । कैसे ज्ञान-स्वरूपी आत्मा को जानता है? अपने शुद्ध चैतन्य द्रव्यत्व से अभिसम्बद्ध - बँधे हुये - जुड़े हुये आत्मा को जानता है । मात्र अपने आत्मा को ही नहीं जानता अपितु अपने-अपने द्रव्यरूप से सम्बन्धित चेतन-अचेतन दूसरे द्रव्यों को जानता है । इन सबको कैसे जानता है? [णिच्छयदो] - निश्चयनय के अनुकूल भेदज्ञान का आश्रय लेकर जानता है । [जो] - जो कर्ता - इस वाक्य का कर्ता जो, [सो] - वह [मोहक्खयं कुणदि] - मोह रहित परमानन्द एक स्वभावी शुद्धात्मा से विपरीत मोह का क्षय करता है - यह गाथा का अर्थ है ।

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    + सब प्रकार से स्व-पर के विवेक की सिद्धि आगम से करने योग्य है, ऐसा उपसंहार करते हैं -
    तम्हा जिणमग्गादो गुणेहिं आदं परं च दव्वेसु । (90)
    अभिगच्छदु णिम्मोहं इच्छदि जदि अप्पणो अप्पा ॥97॥
    तस्माज्जिनमार्गाद्गुणैरात्मानं परं च द्रव्येषु ।
    अभिगच्छतु निर्मोहमिच्छति यद्यात्मन आत्मा ॥९०॥
    निर्मोह होना चाहते तो गुणों की पहिचान से
    तुम भेद जानो स्व-पर में जिनमार्ग के आधार से ॥९७॥
    अन्वयार्थ : [तस्मात्] इसलिये (स्व-पर के विवेक से मोह का क्षय किया जा सकता है इसलिये) [यदि] यदि [आत्मा] आत्मा [आत्मनः] अपनी [निर्मोहं] निर्मोहता [इच्छति] चाहता हो तो [जिनमार्गात्] जिनमार्ग से [गुणै:] गुणों के द्वारा [द्रव्येषु] द्रव्यों में [आत्मानं परं च] स्व और पर को [अभिगच्छतु] जानो (अर्थात् जिनागम के द्वारा विशेष गुणों से ऐसा विवेक करो कि- अनन्त द्रव्यों में से यह स्व है और यह पर है) ॥९०॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    मोह का क्षय करने के प्रति प्रवण बुद्धि वाले बुध-जन इस जगत में आगम में कथित अनन्त गुणों में से किन्हीं गुणों के द्वारा, जो गुण अन्य के साथ योग रहित होने से असाधारणता धारण करके विशेषत्व को प्राप्त हुए हैं उनके द्वारा, अनन्त द्रव्य-परम्परा में स्व-पर के विवेक को प्राप्त करो । (अर्थात् मोह का क्षय करने के इच्छक पंडित-जन आगम कथित अनन्त गुणों में से असाधारण और भिन्न लक्षण-भूत गुणों के द्वारा अनन्त द्रव्य परम्परा में 'यह स्व-द्रव्य हैं और यह परद्रव्य हैं' ऐसा विवेक करो), जो कि इसप्रकार हैं :-

    सत् और अकारण होने से स्वत:सिद्ध, अन्तर्मुख और बहिर्मुख प्रकाश वाला होने से स्व-पर का ज्ञायक-ऐसा जो यह, मेरे साथ सम्बन्ध-वाला, मेरा चैतन्य है उसके द्वारा-जो (चैतन्य) समान-जातीय अथवा असमान-जातीय अन्य द्रव्य को छोडकर मेरे आत्मा में ही वर्तता है, उसके द्वारा - मैं अपने आत्मा को सकल-त्रिकाल में ध्रुवत्व का धारक द्रव्य जानता हूँ । इस प्रकार पृथक् रूप से वर्तमान स्व-लक्षणों के द्वारा-जो अन्य द्रव्य को छोड़कर उसी द्रव्य में वर्तते हैं उनके द्वारा-आकाश, धर्म, अधर्म, काल, पुद्गल और अन्य आत्मा को सकल त्रिकाल में ध्रुवत्व धारक द्रव्य के रूप में निश्चित करता हूँ (जैसे चैतन्य लक्षण के द्वारा आत्मा को ध्रुव द्रव्य के रूप में जाना, उसीप्रकार अवगाहहेतुत्व, गतिहेतुत्व इत्यादि लक्षणों से-जो कि स्व-लक्ष्यभूत द्रव्य के अतिरिक्त अन्य द्रव्यों में नहीं पाये जाते उनके द्वारा-आकाश, धर्मास्तिकाय, इत्यादि को भिन्न-भिन्न ध्रुव द्रव्यों के रूपमें जानता हूँ) इसलिये मैं आकाश नहीं हूँ, मैं धर्म नहीं हूँ, अधर्म नहीं हूँ, काल नहीं हूँ, पुद्गल नहीं हूँ, और आत्मान्तर नहीं हूँ; क्योंकि -- मकान के एक कमरे में जलाये गये अनेक दीपकों के प्रकाशों की भाँति यह द्रव्य इकट्ठे होकर रहते हुए भी मेरा चैतन्य निज-स्वरूप से अच्युत ही रहता हुआ मुझे पृथक् बतलाता है ।

    इसप्रकार जिसने स्व-पर का विवेक निश्चित किया है ऐसे इस आत्मा को विकारकारी मोहांकुर का प्रादुर्भाव नहीं होता ॥९०॥

    प्रवण = ढलती हुई; अभिमुख; रत
    कितने ही गुण अन्य द्रव्यों के साथ सम्बन्ध रहित होने से अर्थात् अन्य द्रव्यों में न होने से असाधारण हैं और इसलिये विशेषणभूत-भिन्न लक्षणभूत है; उसके द्वारा द्रव्यों की भिन्नता निश्चित की जा सकती है
    सत् = अस्तित्ववाला; सत्‌रूप; सत्तावाला
    अकारण = जिसका कोई कारण न हो ऐसा अहेतुक, (चैतन्य सत् और अहेतुक होनेसे स्वयंसे सिद्ध है ।)
    सकल = पूर्ण, समस्त, निरवशेष (आत्मा कोई काल को बाकी रखे बिना संपूर्ण तीनों काल ध्रुव रहता ऐसा द्रव्य है ।)
    जैसे किसी एक कमरे में अनेक दीपक जलाये जायें तो स्थूल-दृष्टि से देखने पर उनका प्रकाश एक दूसरे में मिला हुआ मालूम होता है, किन्तु सूक्ष्म-दृष्टि से विचार पूर्वक देखने पर वे सब प्रकाश भिन्न-भिन्न ही हैं; (क्योंकि उनमें से एक दीपक बुझ जाने पर उसी दीपक का प्रकाश नष्ट होता है; अन्य दीपकों के प्रकाश नष्ट नहीं होते) उसी प्रकार जीवादिक अनेक द्रव्य एक ही क्षेत्र में रहते हैं फिर भी सूक्ष्म-दृष्टि से देखने पर वे सब भिन्न-भिन्न ही हैं, एकमेक नहीं होते ।

    जयसेनाचार्य :
    [तम्हा जिणमग्गादो] - जिस कारण पहले (९६ वीं गाथा मे) स्व-पर भेद-विज्ञान से मोह-क्षय होता है - ऐसा कहा था उस कारण जिनमार्ग से - जिनागम/जिनवाणी से [गुणेहिं] - गुणों द्वारा [आदं] - आत्मा को - स्वयं को, मात्र आत्मा को ही नहीं [परं च] - अपितु परद्रव्य को भी । गुणों द्वारा आत्मा और पर को किनके बीच जानो? [दव्वेसु] - शुद्धात्मादि छह द्रव्यों में [अभिगच्छदु] - जानो । यदि क्या चाहते हो? [णिम्मोहं इच्छदि जदि] - यदि निर्मोह भाव को चाहते हो तो । वह कौन निर्मोह भाव को चाहता है? [अप्पा] - आत्मा निर्मोह भाव को चाहता है तो । किस सम्बन्धी उसे चाहता है? [अप्पणो] - आत्मा का - स्वयं का निर्मोह भाव चाहता है तो ।

    वह इस प्रकार - जो यह मेरा स्व-पर को जानने वाला चैतन्य है, उसके द्वारा मैं कर्तारूप विशुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वभावी अपने आत्मा को जानता हूँ तथा पुद्गलादि पाँच द्रव्य और शेष दूसरे जीव-रूप पर को पररूप से जानता हूँ, इस कारण एक अपवरक - अन्दर के कमरे में जलते हुए अनेक दीपकों के प्रकाश के समान एक साथ रहने पर भी सहज-शुद्ध चिदानन्द एक स्वभावी मेरा सभी द्रव्यों मे किसी के साथ भी मोह नहीं है - यह अभिप्राय है ।

    इसप्रकार स्व और पर की जानकारी के विषय मे मूढ़ता-निराकरण के लिये दो गाथाओं द्वारा चतुर्थ ज्ञान-कण्डिका पूर्ण हुई ।

    इसप्रकार पच्चीस गाथाओं द्वारा ज्ञान-कण्डिका चतुष्टय नामक दूसरा अधिकार पूर्ण हुआ ।

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    + न्याय-पूर्वक ऐसा विचार करते हैं कि- जिनेन्द्रोक्त अर्थों के श्रद्धान बिना धर्म-लाभ (शुद्धात्म-अनुभवरूप धर्म-प्राप्ति) नहीं होता -
    सत्तासंबद्धेदे सविसेसे जो हि णेव सामण्णे । (91)
    सद्दहदि ण सो समणो सत्तो धम्मो ण संभवदि ॥98॥
    सत्तासंबद्धानेतान् सविशेषान् यो हि नैव श्रामण्ये ।
    श्रद्दधाति न स श्रमणः ततो धर्मो न संभवति ॥९१॥
    द्रव्य जो सविशेष सत्तामयी उसकी दृष्टि ना
    तो श्रमण हो पर उस श्रमण से धर्म का उद्भव नहीं ॥९८॥
    अन्वयार्थ : [यः हि] जो (जीव) [श्रामण्ये] श्रमणावस्था में [एतान् सत्ता-संबद्धान् सविशेषतान्] इन 'सत्तासंयुक्त' सविशेष (सामान्य-विशेष) पदार्थों की [न एव श्रद्दधाति] श्रद्धा नहीं करता, [सः] वह [श्रमण: न] श्रमण नहीं है; [ततः धर्म: न संभवति] उससे धर्म का उद्भव नहीं होता (अर्थात् उस श्रमणाभास के धर्म नहीं होता) ॥९१॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जो (जीव) इन द्रव्यों को-कि जो (द्रव्य) सादृश्य-अस्तित्व के द्वारा समानता को धारण करते हुए स्वरूप-अस्तित्व के द्वारा विशेष-युक्त हैं उन्हें स्व-पर के भेदपूर्वक न जानता हुआ और श्रद्धा न करता हुआ यों ही (ज्ञान-श्रद्धा के बिना) मात्र श्रमणता से (द्रव्य-मुनित्व से) आत्मा का दमन करता है वह वास्तव में श्रमण नहीं है; इसलिये, जैसे जिसे रेती और स्वर्ण-कणों का अन्तर ज्ञात नहीं है, उसे धूलधोये को-उसमें से स्वर्ण-लाभ नहीं होता, इसी प्रकार उसमें से (श्रमणाभास में से) निरुपराग आत्म-तत्त्व की उपलब्धि (प्राप्ति) लक्षण वाले धर्म-लाभ का उद्भव नहीं होता ॥९१॥

    'उवसंपयामि सम्मं जत्तो णिव्वाणसंपत्ती' इस प्रकार (पाँचवीं गाथा में) प्रतिज्ञा करके, 'चारित्तं खलु धम्मो धम्मो जो सो समो त्ति णिद्दिट्ठो’ इस प्रकार (७वीं गाथा में) साम्य का धर्मत्व (साम्य ही धर्म है) निश्चित करके ‘परिणमदि जेण दव्यं तक्‍कालं तम्मय त्ति‍ पण्णत्तं, तम्हा धम्मपरिणदो आदा धम्मो मुणेयव्‍वो’ इस प्रकार (८वीं गाथा में) जो आत्मा का धर्मत्व कहना प्रारम्भ किया और जिसकी सिद्धि के लिये ‘धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपओगजुदो, पावदि णिव्‍वाणसुहं’ इस प्रकार (११वीं गाथा में) निर्वाणसुख के साधनभूत शुद्धोपयोग का अधिकार प्रारम्भ किया, विरोधी शुभाशुभ उपयोग को नष्ट किया (हेय बताया), शुद्धोपयोग का स्वरूप वर्णन किया, शुद्धोपयोग के प्रसाद से उत्‍पन्‍न होने वाले ऐसे आत्मा के सहज ज्ञान और आनन्द को समझाते हुए ज्ञान के स्वरूप का और सुख के स्वरूप का विस्तार किया, उसे (आत्मा के धर्मत्व को) अब किसी भी प्रकार शुद्धोपयोग के प्रसाद से सिद्ध करके, परम निस्पृह, आत्मतृप्त (ऐसी) पारमेश्वरी प्रवृत्ति को प्राप्त होते हुये, कृतकृत्यता को प्राप्त करके अत्यन्त अनाकुल होकर, जिनके भेदवासना की प्रगटता का प्रलय हुआ है, ऐसे होते हुए, (आचार्य भगवान) ‘मैं स्वयं साक्षात् धर्म ही हूँ’ इस प्रकार रहते हैं, (-ऐसे भाव में निश्‍चल-स्थित होते हैं)

    अस्तित्व दो प्रकार का है : -सादृश्य-अस्तित्व और स्वरूप-अस्तित्व । सादृश्य-अस्तित्व की अपेक्षा से सर्व द्रव्यों में समानता है, और स्वरूप-अस्तित्व की अपेक्षा से समस्त द्रव्यों में विशेषता है
    निरुपराग = उपराग (मलिनता, विकार) रहित

    जयसेनाचार्य :
    (अब चार स्वतंत्र गाथायें प्रारम्भ होती हैं ।)

    [सत्ता संबद्धे] - महासत्ता के सम्बन्ध से सहित [एदे] - इन पूर्वोक्त (९४, ९६ एवं १७ वीं गाथा में कहे हुये) शुद्ध जीवादि पदार्थों की । वे जीवादि पदार्थ और किस विशेषता वाले हैं? [सविसेसे] - विशेषसत्ता - अवान्तरसत्ता अर्थात् अपनी-अपनी स्वरूप सत्ता से सहित जीवादि पदार्थों की [जो हि णेव सामण्णे सद्दहदि] - जो कर्ता - इस वाक्य का जो कर्ता है वह, द्रव्य श्रामण्य (द्रव्य-मुनिपना) में स्थित होते हुये भी श्रद्धान नहीं करता है, तो वास्तव में [ण सो समणो] - निज शुद्धात्मा की रुचि-रूप निश्चय-सम्यग्दर्शन पूर्वक परमसामायिक-संयम लक्षण श्रामण्य का अभाव होने से वह श्रमण नहीं है । इसप्रकार की भाव-श्रमणता का अभाव होने से [तत्तो धम्मो ण संभवदि] - उस पहले कहे हुये द्रव्यश्रमण से रागादि मलिनता रहित शुद्धात्मानुभूति लक्षण धर्म भी संभव नहीं है - यह गाथा का अर्थ है ।

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    + दूसरी पातनिका - सम्यक्त्व के अभाव में श्रमण (मुनि) नहीं है, उस श्रमण से धर्म भी नहीं है । तो कैसे श्रमण हैं? एसा प्रश्न पूछने पर उत्तर देते हुए ज्ञानाधिकार का उपसंहार करते हैं -
    जो णिहदमोहदिट्ठी आगमकुसलो विरागचरियम्हि । (92)
    अब्भुट्ठिदो महप्पा धम्मो त्ति विसेसिदो समणो ॥99॥
    यो निहतमोहदृष्टिरागमकुशलो विरागचरिते ।
    अभ्युत्थितो महात्मा धर्म इति विशेषितः श्रमणः ॥९२॥
    आगमकुशल दृगमोहहत आरुढ़ हों चारित्र में
    बस उन महात्मन श्रमण को ही धर्म कहते शास्त्र में ॥९९॥
    अन्वयार्थ : [यः आगमकुशल:] जो आगम में कुशल हैं, [निहतमोहदृष्टि:] जिसकी मोह-दृष्टि हत हो गई है और [विरागचरिते अभ्युत्थित:] जो वीतराग-चारित्र में आरुढ़ है, [महात्मा श्रमण:] उस महात्मा श्रमण को [धर्म: इति विशेषित:] (शास्त्र में) 'धर्म' कहा है ॥९२॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    यह आत्मा स्वयं धर्म हो, यह वास्तव में मनोरथ है । उसमें विघ्न डालने वाली एक बहिर्मोह-दृष्टि ही है । और वह (बहिर्मोह-दृष्टि) तो आगम-कौशल्य तथा आत्म-ज्ञान से नष्ट हो जाने के कारण अब मुझ में पुन: उत्पन्न नहीं होगी । इसलिये वीतराग-चारित्र रूप से प्रगटता को प्राप्त (वीतराग-चारित्र रूप पर्याय में परिणत) मेरा यह आत्मा स्वयं धर्म होकर, समस्त विघ्नों का नाश हो जाने से सदा निष्कंप ही रहता है । अधिक विस्तार से बस हो ! जयवंत वर्तो स्याद्वाद-मुद्रित जैनेन्द्र शब्दब्रह्म; जयवंत वर्तो शब्दब्रह्म-मूलक आत्म-तत्त्वोपलब्धि-कि जिसके प्रसाद से, अनादि संसार से बंधी हुई मोह-ग्रंथि तत्काल ही छूट गई है; और जयवंत वर्तो परम वीतराग-चारित्र-स्वरूप शुद्धोपयोग कि जिसके प्रसाद से यह आत्मा स्वयमेव धर्म हुआ है ॥९२॥

    (कलश)
    विलीन मोह-राग-द्वेष मेघ चहुँ ओर के, चेतना के गुणगण कहाँ तक बखानिये ।
    अविचल जोत निष्कंप रत्नदीप सम, विलसत सहजानन्द मय जानिये ॥
    नित्य आनंद के प्रशमरस में मगन, शुद्ध उपयोग का महत्त्व पहिचानिये ।
    नित्य ज्ञानतत्त्व में विलीन यह आत्मा, स्वयं धर्मरूप परिणत पहिचानिये ॥५॥

    इसप्रकार शुद्धोपयोग को प्राप्त करके आत्मा स्वयं धर्म होता हुआ अर्थात् स्वयं धर्मरूप परिणमित होता हुआ नित्य आनन्द के प्रसार से सरस (अर्थात् जो शाश्वत आनन्द के प्रसार से रस-युक्त) ऐसे ज्ञान-तत्त्व में लीन होकर, अत्यन्त अविचलता के कारण, दैदीप्यमान ज्योतिमय और सहजरूप से विलसित (स्वभाव से ही प्रकाशित) रत्न-दीपक की निष्कंप-प्रकाशमय शोभा को पाता है । (अर्थात् रत्न-दीपक की भाँति स्वभाव से ही निष्कंपतया अत्यन्त प्रकाशित होता-जानता-रहता है)

    (कलश)
    आत्मा में विद्यमान ज्ञान तत्त्व पहिचान, पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के शुद्धभाव से ।
    ज्ञानतत्त्वप्रज्ञापन के उपरान्त स अब, ज्ञेयतत्त्वप्रज्ञापन करते हैं चाव से ॥
    सामान्य और असामान्य ज्ञेय तत्त्व सब, जानने के लिए द्रव्य गुण पर्याय से
    मोह अंकुर उत्पन्न न हो इसलिए, ज्ञेय का स्वरूप बतलाते विस्तार से ॥६॥

    आत्मा-रूपी अधिकरण में रहने वाले अर्थात् आत्मा के आश्रित रहने वाले ज्ञान-तत्त्व का इस प्रकार यथार्थतया निश्चय करके, उसकी सिद्धि के लिये (केवल-ज्ञान प्रगट करने के लिये) प्रशम के लक्ष से (उपशम प्राप्त करने के हेतु से) ज्ञेय-तत्त्व को जानने का इच्छुक (जीव) सर्व पदार्थों को द्रव्य-गुण-पर्याय सहित जानता है, जिससे कभी मोहांकुर की किंचित् मात्र भी उत्पत्ति न हो ।

    इस प्रकार (श्रीमद्भगवत्कृन्दकुन्दाचार्यदेव प्रणीत) श्री प्रवचनसार शास्त्र की श्रीमद् अमृतचंद्राचार्य-देव विरचित तत्त्व-दीपिका नामक टीका में ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन नामक प्रथम श्रुतस्कंध समाप्त हुआ ।

    बहिर्मोहदृष्टि = बहिर्मुख ऐसी मोहदृष्टि (आत्मा को धर्मरूप होने में विम्न डालने वाली एक बहिर्मोह-दृष्टि ही है)
    आगम-कौशल्य = आगम में कुशलता-प्रवीणता
    स्याद्वाद-मुद्रित जैनेन्द्र शब्दब्रह्म = स्याद्वादकी छापवाला जिनेन्द्र का द्रव्यश्रुत
    शब्दब्रह्म-मूलक = शब्दब्रह्म जिसका मूल कारण है

    जयसेनाचार्य :
    अब, "[उवसंपयामि सम्मं] - साम्य का आश्रय ग्रहण करता हूँ'', इत्यादि नमस्कार गाथा में जो प्रतिज्ञा की थी, उसके बाद "[चारित्तं खलु धम्मो] - चारित्र वास्तविक धर्म है" - इत्यादि गाथा द्वारा चारित्र का धर्मपना स्थापित किया था । इसके बाद "[परिणमदि जेण दव्वं] - द्रव्य जिसरूप से परिणमित होता है" - इत्यादि गाथा द्वारा आत्मा का धर्मपना कहा था - इत्यादि । वह सब शुद्धोपयोग के प्रसाद से सिद्ध करने योग्य है । अब निश्चय रत्नत्रय परिणत आत्मा ही धर्म है, यह सिद्ध है ।

    अथवा दूसरी पातनिका - सम्यक्त्व के अभाव में श्रमण(मुनि) नहीं है, उस श्रमण से धर्म भी नहीं है । तो कैसे श्रमण हैं? ऐसा प्रश्न पूछने पर उत्तर देते हुये ज्ञानाधिकार का उपसंहार करते हैं -

    [जो णिहदमोहदिट्ठी] - तत्वार्थ-श्रद्धान लक्षण व्यवहार-सम्यक्त्व से उत्पन्न निज शुद्धात्मा की रुचिरूप निश्चय-सम्यक्त्व रूप से परिणत होने के कारण जो मोहदृष्टि - दर्शनमोह से रहित है । और जो किस स्वरूप वाले हैं? [आगमकुसलो] - सर्व-दोष रहित परमात्मा द्वारा कहे गये परमागम के अभ्यास से उपाधि रहित स्व-संवेदन ज्ञान मे होने से आगम में कुशल - चतुर हैं । और जो किस स्वरूप वाले हैं? [विराग चरियम्हि अब्भुट्ठिदो] - व्रत, समित, गुप्ति आदि बाह्य चारित्र के अनुष्ठान के वश से स्व-शुद्धात्मा में निश्चल परिणति रूप वीतराग चारित्रमय परिणत होने के कारण परमवीतराग चारित्र में अच्छी तरह से स्थित हैं - तत्पर हैं । जो और कैसे हैं? [महप्पा] - मोक्ष लक्षण रूप महान अर्थ – पुरुषार्थ के साधक होने से महात्मा हैं, [धम्मो त्ति विसेसिदो समणो] - जीवन-मरण, लाभ-अलाभ आदि में समता भावरूप परिणत जो आत्मा हैं, वे श्रमण (मुनिराज) ही अभेदनय से धर्म हैं - ऐसा मोह और क्षोभ से रहित आत्मपरिणाम-रूप निश्चय धर्म कहा गया है - ऐसा अर्थ है ।

    🏠
    + ऐसे निश्चय रत्नत्रय परिणत महान तपोधन (मुनिराज) की जो वह भक्ति करता है, उसका फल दिखाते हैं -
    जो तं दिट्ठा तुट्ठो अब्भुट्ठित्ता करेदि सक्कारं ।
    वंदणणमंसणादिहिं तत्तो सो धम्ममादियदि ॥100॥
    देखकर संतुष्ट हो उठ नमन वन्दन जो करे
    वह भव्य उनसे सदा ही सद्धर्म की प्राप्ति करे ॥१००॥
    अन्वयार्थ : जो कोई उन्हें (पूर्वोक्त मुनिराज को) देखकर संतुष्ट होता हुआ वन्दन नमस्कार आदि द्वारा सत्कार करता है, वह उनसे धर्म ग्रहण करता है ॥१००॥

    जयसेनाचार्य :
    [जो तं दिट्ठो तुट्ठो] - जो भव्यों में प्रधान जीव उपराग रहित शुद्धात्मा की प्राप्ति लक्षण निश्चय धर्म परिणत पहले (९९ वीं गाथा मे) कहे (स्वरूप वाले) मुनिराज को देखकर (विद्यमान) गुणों से पूर्ण भरे हुये होने के कारण अनुराग से संतुष्ट होता हुआ । संतुष्ट होता हुआ क्या करता है? [अब्भुट्ठित्ता करेदि सक्कारं] - उठकर मोक्ष के साधक सम्यक्त्वादि गुणों की प्रशंसा करता है । [वंदणणमंसणादिहिं तत्तो सो धम्ममादियादि] - "तप से सिद्ध, नय से सिद्ध'' इत्यादि रूप से वन्दना करता है, ''आपको नमस्कार हो", इसप्रकार नमस्कार करता है, इत्यादि रूप से उनके प्रति विशेष भक्ति द्वारा वह भव्य उन मुनिवरों से पुण्य ग्रहण करता है - उनके माध्यम से उस समय पुण्य बन्ध करता है ।

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    + उस पुण्य से दूसरे भव में क्या फल होता है, यह प्रतिपादन करते हैं -
    तेण णरा व तिरिच्छा देविं वा माणुसिं गदिं पप्पा ।
    विहविस्सरियेहिं सया संपुण्णमणोरहा होंति ॥101॥
    उस धर्म से तिर्यंच नर नरसुरगति को प्राप्त कर
    ऐश्वर्य-वैभववान अर पूरण मनोरथवान हों ॥१०१॥
    अन्वयार्थ : मनुष्य और तिर्यंच उस पुण्य द्वारा देव या मनुष्य गति को प्राप्त कर वैभव और ऐश्वर्य से सदा परिपूर्ण मनोरथ वाले होते हैं ॥१०१॥

    जयसेनाचार्य :
    [तेण णरा व तिरिच्छा] - उस पूर्वोक्त पुण्य से इस वर्तमान भव में मनुष्य और तिर्यंच [देविं वा माणुसिं गदिं पप्पा] - दूसरे भव में देव अथवा मनुष्य गति प्राप्त कर [विहविस्सरियेहिं सया संपुण्णमणोरहा होंति] - राजाधिराज, रूप, लावण्य, सौभाग्य, पुत्र, स्त्री आदि परिपूर्ण सम्पत्ति विभव कहलाती है, आज्ञा के फल को ऐश्वर्य कहते हैं । उन विभव और ऐश्वर्य द्वारा परिपूर्ण मनोरथ वाले होते हैं । वही पुण्य भोगादि निदान रहित होने से यदि सम्यक्त्व पूर्वक है तो उससे परम्परा मोक्ष प्राप्त करते हैं - यह भाव है ।

    (इस प्रकार चार स्वतंत्र गाथायें पूर्ण हुई)

    इसप्रकार [श्री जयसेनाचार्य] कृत [तात्पर्य वृत्ति] में पूर्वोक्त प्रकार से [एस सुरासुरमणुसिंदवंदिय] इस प्रकार इस गाथा को आदि लेकर बहत्तर द्वारा शुद्धोपयोगाधिकार; उसके बाद [देवदजदिगुरुपूजासु] - इत्यादि पच्चीस गाथाओं द्वारा 'ज्ञानकण्डिका चतुष्टय' नामक दूसरा अधिकार; और उसके बाद [सत्ता सम्बद्धदे] इत्यादि सम्यक्त्व कथन रूप से पहली गाथा, रत्नत्रय के आधारभूत पुरुष के ही धर्म संभव है, इसप्रकार दो स्वतंत्र गाथाएं; उन निश्चय धर्मधारी मुनिराज की जो भक्ति करता है, उसके फल कथनरूप से [जो तं दिट्ठा] 'इत्यादि दो गाथायें - इस प्रकार पृथग्भूत चार गाथाओं से सहित दो अधिकारों द्वारा एक सौ एक गाथाओं में निबद्ध [ज्ञानतत्व प्रतिपादक] नामक पहला महाधिकार पूर्ण हुआ ।

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    ज्ञेयतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार



    + अब सम्यक्त्व (अधिकार) कहते हैं - -
    तम्हा तस्स णमाईं किच्चा णिच्चं पि तम्मणो होज्ज ।
    वोच्छामि संगहादो परमट्ठविणिच्छयाधिगमं ॥102॥
    समकित सहित चारित्रयुत मुनिराज में मन जोड़कर
    नमकर कहूँ संक्षेप में सम्यक्त्व का अधिकार यह ॥१०२॥
    अन्वयार्थ : इसलिये उन्हे (सम्यकचारित्र युक्त पूर्वोक्त मुनिराजों को) नमस्कार करके तथा हमेशा उनमें ही मन लगाकर, संक्षेप से परमार्थ का निश्चय करानेवाला सम्यक्त्व (अधिकार) कहुंगा ॥

    जयसेनाचार्य :
    [तम्हा तस्स णमाइं किच्चा] क्योंकि सम्यक्त्व के बिना श्रमण नहीं होते इसकारण उन सम्यक्चारित्र युक्त पूर्वोक्त मुनिराजों को नमस्कार करके, [णिच्चं पि तम्मणो होज्ज] हमेशा उनमें ही मन लगाकर [वोच्छामि] मै कर्ता (इस क्रिया को करने वाला मै) कहूँगा [संगहादो] संक्षेप से । नमस्कारादि करके क्या कहेंगे? [परमट्ठविणिच्छयाधिगमं] परमार्थ (त्रिकाली धुवतत्त्व निज भगवान आत्मा) का निश्चय करानेवाले अधिगम-सम्यक्त्व को कहूँगा ।

    परमार्थ का निश्चय कराने वाले अधिगम शब्द से सम्यक्त्व कैसे कहते है? यदि यह प्रश्न हो तो परम अर्थ-परमार्थ-शुद्ध बुद्ध एक स्वभावी परमात्मा, परमार्थ का विशेषरूप से - संशय आदि से रहित निश्चय - परमार्थ विनिश्चयरूप अधिगम है, जो शंका आदि आठ दोषों से रहित, क्योंकि यथार्थरूप से पदार्थों की जानकारी स्वरूप है, इसलिये परमार्थ विनिश्चय अधिगम सम्यक्त्व है - उसे कहूँगा ।

    अथवा, परमार्थ विनिश्चय अर्थात् अनेकान्तात्मक - अनन्त गुणों अथवा परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले धर्म-युगल सहित अनन्त धर्मयुगलों स्वरूप पदार्थ समूह, उनका अधिगम- सम्यग्ज्ञान जिससे होता है, उसे कहूँगा ॥१०२॥


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    + ज्ञेयतत्त्व का प्रज्ञापन करते हैं अर्थात् ज्ञेयतत्त्व बतलाते हैं । उसमें (प्रथम) पदार्थ का सम्यक् (यथार्थ) द्रव्यगुणपर्यायस्वरूप वर्णन करते हैं -
    अत्थो खलु दव्वमओ दव्वाणि गुणप्पगाणि भणिदाणि । (93)
    तेहिं पुणो पज्जाया पज्जयमूढा हि परसमया ॥103॥
    अर्थः खलु द्रव्यमयो द्रव्याणि गुणात्मकानि भणितानि ।
    तैस्तु पुनः पर्यायाः पर्ययमूढा हि परसमयाः ॥९३॥
    गुणात्मक हैं द्रव्य एवं अर्थ हैं सब द्रव्यमय
    गुण-द्रव्य से पर्यायें पर्ययमूढ़ ही हैं परसमय ॥१०३॥
    अन्वयार्थ : पदार्थ वास्तव में द्रव्यमय हैं, द्रव्य गुणात्मक कहे गये हैं, द्रव्य तथा गुणों से पर्यायें होती हैं; और पर्यायमूढ जीव ही परसमय है ।

    अमृतचंद्राचार्य :
    इस विश्‍व में जो कोई जानने में आने वाला पदार्थ है वह समस्त ही विस्तार-सामान्य समुदायात्मक और आयत-सामान्य समुदायात्मक द्रव्य से रचित होने से द्रव्यमय (द्रव्यस्वरूप) है । और द्रव्य एक जिनका आश्रय है ऐसे विस्तार-विशेष स्वरूप गुणों से रचित (गुणों से बने हुए) होने से गुणात्मक है ।

    और पर्यायें — जो कि आयत-विशेषस्वरूप हैं वे—जिनके लक्षण (ऊपर) कहे गये हैं ऐसे द्रव्यों से तथा गुणों से रचित होने से द्रव्यात्मक भी हैं गुणात्मक भी हैं । उसमें, अनेक-द्रव्यात्मक एकता की प्रतिपत्ति की कारणभूत द्रव्यपर्याय है । वह दो प्रकार है । (१) समानजातीय और (२) असमानजातीय । उसमें
    1. समानजातीय वह है—जैसे कि अनेक पुद्‌गलात्मक द्विअणुक, त्रिअणुक इत्यादि;
    2. असमानजातीय वह है,—जैसे कि जीवपुद्‌गलात्मक देव, मनुष्य इत्यादि ।
    गुण द्वारा आयत की अनेकता की प्रतिपत्ति की कारणभूत गुणपर्याय है । वह भी दो प्रकार है । (१) स्वभावपर्याय और (२) विभावपर्याय ।
    1. उसमें समस्त द्रव्यों के अपने-अपने अगुरुलघुगुण द्वारा प्रतिसमय प्रगट होने वाली षट्‌स्‍थानपतित हानि-वृद्धिरूप अनेकत्व की अनुभूत वह स्वभावपर्याय है;
    2. रूपादि के या ज्ञानादि के स्व-पर के कारण प्रवर्तमान पूर्वोत्तर अवस्था में होने वाले तारतम्य के कारण देखने में आने वाले स्वभाव-विशेष-रूप अनेकत्व की आपत्ति विभावपर्याय है ।

    अब यह (पूर्वोक्त कथन) दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं :— वास्तव में यह, सर्व पदार्थों के द्रव्य-गुण-पर्याय स्वभाव की प्रकाशक ११पारमेश्‍वरी व्यवस्था भली-उत्तम-पूर्ण-योग्य है, दूसरी कोई नहीं; क्योंकि बहुत से (जीव) पर्यायमात्र का ही अवलम्बन करके, तत्त्व की अप्रतिपत्ति जिसका लक्षण है ऐसे, मोह को प्राप्‍त होते हुए पर-समय होते हैं ॥१०३॥

    विस्तार-सामान्य-समुदाय = विस्तारसामान्य-रूप समुदाय । विस्तार का अर्थ है कि चौड़ाई । द्रव्य की चौड़ाई की अपेक्षा के (एक-साथ रहने वाले सहभावी) भेदों को (विस्तार-विशेषों को) गुण कहा जाता है; जैसे ज्ञान, दर्शन, चारित्र इत्यादि जीव-द्रव्य के विस्तार-विशेष अर्थात् गुण हैं । उन विस्तार-विशेषों में रहने वाले विशेषत्व को गौण करें तो इन सबमें एक आत्म-स्वरूप सामान्यत्व भासित होता है । यह विस्तारसामान्य (अथवा विस्तार-सामान्य-समुदाय) वह द्रव्य है ।
    आयतसामान्यसमुदाय = आयतसामान्यरूप समुदाय । आयत का अर्थ है लम्बाई अर्थात् कालापेक्षित-प्रवाह । द्रव्य के लम्बाई की अपेक्षा के (एक के बाद एक प्रवर्तमान, क्रमभावी, कालापेक्षित) भेदों को (आयत विशेषों को) पर्याय कहा जाता है । उन क्रमभावी पर्यायों में प्रवर्तमान विशेषत्व को गौण करें तो एक द्रव्यत्वरूप सामान्यत्व ही भासित होता है । यह आयतसामान्य (अथवा आयतसामान्य समुदाय) वह द्रव्य है ।
    अनन्त गुणों का आश्रय एक द्रव्य है ।
    प्रतिपत्ति = प्राप्ति; ज्ञान; स्वीकार ।
    द्विअणुक = दो अणुओं से बना हुआ स्कंध ।
    स्व उपादान और पर निमित्त है ।
    पूर्वोत्तर = पहले की और बाद की ।
    आपत्ति = आपतित, आपड़ना ।
    पट = वस्त्र
    १०द्विपटिक = दो थानों को जोड़कर (सीकर) बनाया गया एक वस्त्र (यदि दोनों थान एक ही जाति के हों तो समान-जातीय द्रव्य-पर्याय कहलाता है, और यदि दो थान भिन्न जाति के हों (जैसे एक रेशमी दूसरा सूती) तो असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय कहलाता है ।
    ११परमेश्वर की कही हुई

    जयसेनाचार्य :
    अर्थ, ज्ञान का विषयभूत पदार्थ, वास्तव में द्रव्यमय है । पदार्थ द्रव्यमय कैसे है? तिर्यक् सामान्य और ऊर्ध्वता सामान्य लक्षण द्रव्य से रचित होने के कारण पदार्थ द्रव्यमय है । तिर्यक् सामान्य और ऊर्ध्वता सामान्य का लक्षण कहते हैं -- अथवा अनेक गाय शरीरों में यह गाय, यह गाय- इसप्रकार गो जाति का ज्ञान तिर्यक् सामान्य है और जैसे एक ही पुरुष सम्बन्धी बाल कुमार आदि अवस्थाओं में 'यह वही देवदत्त है ' -- इसप्रकार का ज्ञान ऊर्ध्वता सामान्य है ।

    द्रव्य गुणात्मक गुणस्वभावी कहे गये है । यह वही-यह वही गुण हैं अथवा साथ-साथ रहने वाले गुण हैं- इसप्रकार गुण का लक्षण है । जैसे सिद्ध जीव द्रव्य अनन्त ज्ञान, सुख आदि विशेष गुणों के साथ और उसीप्रकार अगुरुलघुक आदि सामान्य गुणों के साथ अभिन्नता होने के कारण गुणात्मक हैं । उसीप्रकार अपने-अपने विशेष-सामान्य गुणों के साथ अभिन्नता होने से सभी द्रव्य गुणात्मक हैं ।

    उन पूर्वोक्त लक्षण द्रव्य और गुणों से पर्यायें होती हैं । जो व्यतिरेकि (भिन्न-भिन्न) है, वे पर्यायें हैं अथवा जो क्रम से होती हैं वे पर्यायें है - इसप्रकार पर्याय का लक्षण है । जैसे एक मुक्तात्मा द्रव्य में गति मार्गणा से विलक्षण अन्तिम शरीर के आकार से कुछ कम आकार वाली सिद्ध गति पर्याय तथा अगुरुलघुक गुण की षडवृद्धि-हानि रूप साधारण स्वभाव गुणपर्यायें हैं; उसीप्रकार सभी द्रव्यों में स्वभाव द्रव्य पर्यायें और स्वजातीय-विजातीय विभाव द्रव्य पर्यायें होती हैं और उसीप्रकार 'पंचास्तिकाय' ग्रन्थ में पहले कहे हुये क्रम से 'जिनका अस्ति स्वभाव है' -- इत्यादि गाथा में और उसीप्रकार 'जीवादिक द्रव्य भाव है' इत्यादि गाथा में यथासंभव जानना चाहिये ।

    क्योंकि इसप्रकार द्रव्य -गुण-पर्याय की जानकरी के सम्बन्ध में जो मूढ (अज्ञानी) हैं अथवा 'नारकादि पर्याय रूप मैं नहीं हूँ' - इसप्रकार के भेद-विज्ञान में जो अज्ञानी हैं - वे परसमय मिथ्यादृष्टि हैं । इसलिए यह परमेश्वर (वीतराग-सर्वज्ञ देव) द्वारा कही गई द्रव्य-गुण-पर्याय की व्याख्या समीचीन कल्याणकारी है -- यह अभिप्राय है ॥१०३॥


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    + अनुषंगिक (पूर्व-गाथा के कथन के साथ सम्बन्ध वाली) ऐसी यह ही स्‍वसमय-परसमय की व्‍यवस्‍था (भेद) निश्‍च‍ित (उसका) उपसंहार करते हैं -
    जे पज्जएसु णिरदा जीवा परसमइग त्ति णिद्दिट्ठा । (94)
    आदसहावम्हि ठिदा ते सगसमया मुणेदव्वा ॥104॥
    ये पर्यायेषु निरता जीवाः परसमयिका इति निर्दिष्टाः ।
    आत्मस्वभावे स्थितास्ते स्वकसमया ज्ञातव्याः ॥९४॥
    पर्याय में ही लीन जिय परसमय आत्मस्वभाव में
    थित जीव ही हैं स्वसमय - यह कहा जिनवरदेव ने ॥१०४॥
    अन्वयार्थ : जो जीव पर्यायों में लीन हैं वे परसमय हैं -ऐसा कहा गया है; जो जीव आत्म-स्वभाव में स्थित हैं वे स्वसमय जानना चाहिये ॥

    अमृतचंद्राचार्य :
    जो जीव पुद्‌गलात्मक असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय का जो कि सकल अविद्याओं का एक जड़ है उसका आश्रय करते हुए वास्तव में परसमय होते हैं अर्थात् परसमय-रूप परिणमित होते हैं ।

    और जो असंकीर्ण द्रव्य-गुण-पर्यायों से सुस्थित भगवान आत्मा के स्वभाव का जो कि सकल विद्याओं का एक मूल है उसका आश्रय करके वास्तव में १०स्वसमय होते हैं अर्थात् स्वसमयरूप परिणमित होते हैं ।

    इसलिये स्वसमय ही आत्मा का तत्त्व है ॥१०४॥

    यथोक्त = पूर्व गाथा में कहा जैसा ।
    संभावना = संचेतन; अनुभव; मान्यता; आदर ।
    निरर्गल = अंकुश बिना की; बेहद (जो मनुष्यादि पर्याय में लीन हैं, वे बेहद एकांत-दृष्टि-रूप हैं)
    आत्मव्यवहार = आत्मारूप वर्तन, आत्मारूप कार्य, आत्मारूप व्यापार ।
    मनुष्यव्यवहार = मनुष्यरूप वर्तन (मैं मनुष्य ही हूँ - ऐसी मान्यता-पूर्वक वर्तन)
    जो जीव पर के साथ एकत्व की मान्यता-पूर्वक युक्त होता है, उसे परसमय कहते हैं ।
    असंकीर्ण = एकमेक नहीं ऐसे; स्पष्टतया भिन्न (भगवान आत्म-स्वभाव स्पष्ट भिन्न -- पर के साथ एकमेक नहीं -- ऐसे द्रव्य-गुण-पर्यायों से सुस्थित है)
    परिग्रह = स्वीकार; अंगीकार ।
    संचारित = ले जाये गये । (जैसे भिन्न-भिन्न कमरों में ले जाया गया रत्न-दीपक एकरूप ही है, वह किंचितमात्र भी कमरे के रूप में नहीं होता, और न कमरे की क्रिया करता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न शरीरों में प्रविष्ट होने वाला आत्मा एकरूप ही है, वह किंचितमात्र भी शरीर रूप नहीं होता और न शरीर की क्रिया करता है - इसप्रकार ज्ञानी जानता है ।)
    १०जो जीव स्व के साथ एकत्व की मान्यता-पूर्वक (स्वके साथ) युक्त होता है उसे स्व-समय कहा जाता है ।

    जयसेनाचार्य :
    [जे पज्जयेसु णिरदा जीवा] जो पर्यायों में लीन-आसक्त जीव हैं, [परसमयिग त्ति णिद्दिट्ठा] वे परसमय है- ऐसा कहा गया है । वह इसप्रकार -- मनुष्यादि पर्यायरूप मैं हूँ - ऐसी परिणति को अहंकार कहते हैं । मनुष्यादि शरीर, उस शरीर के आधार से उत्पन्न पाँच इन्द्रियाँ, उनके विषय तथा तज्जन्य सुख -ये मेरे है- ऐसी परिणति ममकार हैं, ममकार- अहंकार रहित परम चैतन्य चमत्कार परिणति से रहित जो जीव उन दोनों रूप परिणत हैं वे जीव कर्म के उदय में उत्पन्न पर-पर्याय में लीन - आसक्त होने से परसमय- मिथ्यादृष्टि कहे गये हैं । [आदसहावम्मिठिदा] और जो आत्म- स्वरूप में स्थित है- लीन हैं [ते सगसमया मुणेदव्वा] वे स्वसमय हैं, ऐसा मानना-जानना चाहिये । वह इसप्रकार-जो अनेक कमरों में ले जाये गये एक रत्नदीप के समान अनेक शरीरों में भी 'मैं एक हूँ' इसप्रकार के दृढ़ संस्कार से निज शुद्धात्मा में स्थित रहते हैं -लीन रहते हैं वे कर्म के उदय से उत्पन्न पर्यायरूप परिणमन से रहित होने के कारण स्वसमय हैं- यह अर्थ है ॥१०४॥

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    + द्रव्य का लक्षण बतलाते हैं -
    अपरिच्चत्त-सहावेणुप्पा-दव्वयधुवत्त-संबद्धं । (95)
    गुणवं च सपज्जयं जं तं दव्वं ति वुच्चंति ॥105॥
    अपरित्यक्तस्वभावेनोत्पादव्ययध्रुवत्वसंबद्धम् ।
    गुणवच्च सपर्यायं यत्तद्द्रव्यमिति ब्रुवन्ति ॥९५॥
    निजभाव को छोड़े बिना उत्पादव्ययध्रुवयुक्त गुण-
    पर्ययसहित जो वस्तु है वह द्रव्य है जिनवर कहें ॥१०५॥
    अन्वयार्थ : जो स्वभाव को छोड़े बिना उत्पाद-व्यय-धौव्य संयुक्त तथा गुणयुक्त और पर्याय सहित है, वह द्रव्य है -- ऐसा जिनेन्द्र भगवान कहते हैं ।

    अमृतचंद्राचार्य :
    यहाँ ( इस विश्व में) जो, स्वभावभेद किये बिना, उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य-त्रय से और गुण-पर्याय-द्वय से लक्षित होता है, वह द्रव्य है । इनमें से (स्वभाव, उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य, गुण और पर्याय में से) द्रव्य का स्वभाव वह अस्तित्व-सामान्य-रूप अन्वय है; अस्तित्व दो प्रकार का कहेंगे:—१ -स्वरूप-अस्तित्व । २-सादृश्य-अस्तित्व । गुण वह विस्तारविशेष हैं । वे सामान्य-विशेषात्मक होने से दो प्रकार के हैं । इनमें, पर्याय आयत-विशेष हैं । वे पूर्व ही (९३ वीं गाथा की टीका में) कथित चार प्रकार की हैं ।

    द्रव्‍य का उन उत्पादादि के साथ अथवा गुणपर्यायों के साथ लक्ष्य-लक्षण भेद होने पर भी स्वरूपभेद नहीं है । स्वरूप से ही द्रव्य वैसा (उत्पादादि अथवा गुणपर्याय वाला) है वस्त्र के समान । जैसे

    उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यत्रय = उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य - यह त्रिपुटी (तीनों का समूह)
    गुणपर्यायद्वय = गुण और पर्याय - यह युगल (दोनों का समूह)
    लक्षित होता है = लक्ष्यरूप होता है, पहिचाना जाता है । (१) उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य तथा (२) गुणपर्याय वे लक्षण हैं और द्रव्य वह लक्ष्य है ।
    अस्तित्व-सामान्य-रूप अन्वय = 'है, है, है' ऐसा एकरूप भाव द्रव्य का स्वभाव है । (अन्वय = एकरूपता सदृशभाव)
    द्रव्य में निज में ही स्वरूप-कर्ता और स्वरूप-करण होने की सामर्थ्य है । यह सामर्थ्य-स्वरूप स्वभाव ही अपने परिणमन में (अवस्थांतर करने में) अन्तरंग साधन है ।


    जयसेनाचार्य :
    [अपरिच्चत्तसहावेण] स्वभाव को नहीं छोड़ने वाले अस्तित्व के साथ अभिन्न [उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं] उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य के साथ संयुक्त [गुणवं च सपज्जायं] गुणयुक्त और पर्याय सहित [जं] जो इसप्रकार सत्ता आदि तीन लक्षणों से सहित है, [तं दव्वं ति वुच्चंति] वह द्रव्य है-ऐसा सर्वज्ञ कहते हैं ।

    यह द्रव्य उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य और गुण-पर्याय के साथ लक्ष्य-लक्षण भेद होने पर भी सत्ता से भिन्न नहीं है । यदि सत्ताभेद नहीं है तो क्या करता है? स्वरूप से ही उस प्रकारता का अवलम्बन करता है । उस प्रकारता का अवलम्बन करता है - इसका क्या अर्थ है? शुद्धात्मा के समान ही उत्पाद-व्यय-धौव्य स्वरूप और गुण-पर्याय स्वरूप परिणमित होता है - यह अर्थ है ।

    वह इसप्रकार -- वैसे ही अनन्त ज्ञानादि गुण, गतिमार्गणा से विपरीत सिद्धगति, इन्द्रिय मार्गणा से विपरीत अतीन्द्रियता आदि लक्षणवाली शुद्ध पर्यायें हैं । जैसे- शुद्ध सत्ता के साथ अभिन्न परमात्म-द्रव्य पूर्वोक्त उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य और गुण-पर्यायों के साथ संज्ञा-लक्षण-प्रयोजन आदि का भेद होने पर भी उनके साथ सत्ताभेद नहीं करता, स्वरूप से ही उस प्रकारता का अवलम्बन करता है । उस प्रकारता का क्या अर्थ है? उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य, गुण-पर्याय स्वरूप से परिणमित होता है-यह अर्थ है ।

    उसी प्रकार सभी द्रव्य अपने-अपने यथोचित उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य और उसी प्रकार गुण-पर्यायों के साथ यद्यपि संज्ञा-लक्षण-प्रयोजन आदि के द्वारा भेद करते हैं; तथापि सत्ता-स्वरूप से भेद नहीं करते हैं, स्वभाव से ही उस प्रकारता का अवलम्बन करते हैं । उस प्रकारता का क्या अर्थ है? उत्पाद-व्यय आदि स्वरूप से परिणमित होते है- यह अर्थ है ।

    अथवा जैसे कपड़ा निर्मल पर्याय से उत्पन्न, मलिन पर्याय से नष्ट और उन दोनों के आधारभूत कपड़े रूप से ध्रुव-अविनश्वर है और उसीप्रकार सफेद रंग आदि गुण तथा नवीन-पुरानी पर्याय सहित है; उसी प्रकार सत् उन उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य और अपने गुण-पर्यायों के साथ संज्ञा आदि भेद होने पर भी सत्तारूप से भेद नहीं करता है । सत्तारूप से भेद नहीं करता है तो क्या करता है? स्वरूप से ही उत्पादादि रूप परिणमित होता है; इसीप्रकार सभी द्रव्य भी जानना चाहिये- यह अभिप्राय है ॥१०५॥

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    + अनुक्रम से दो प्रकार का अस्तित्व कहते हैं । स्वरूप-अस्तित्व और सादृश्य अस्तित्व । इनमें से यह स्वरूपास्तित्व का कथन है -
    सब्भावो हि सहावो गुणेहिं सगपज्जएहिं चित्तेहिं । (96)
    दव्वस्स सव्वकालं उप्पादव्वयधुवत्तेहिं ॥106॥
    सद्भावो हि स्वभावो गुणैः स्वकपर्ययैश्चित्रैः ।
    द्रव्यस्य सर्वकालमुत्पादव्ययध्रुवत्वैः ॥९६॥
    गुण-चित्रमयपर्याय से उत्पादव्ययध्रुवभाव से
    जो द्रव्य का अस्तित्व है वह एकमात्र स्वभाव है ॥१०६॥
    अन्वयार्थ : गुणों तथा अनेक प्रकार की अपनी पर्यायों से और उत्पाद-व्यय-धौव्य रूप से सर्वकाल में द्रव्य का अस्तित्व वास्तव में (द्रव्य का) स्वभाव है ।

    अमृतचंद्राचार्य :
    अस्तित्व वास्तव में द्रव्य का स्वभाव है; और वह (अस्तित्व) अन्य साधन से निरपेक्ष होने के कारण अनादि-अनन्त होने से तथा अहेतुक, एकरूप वृत्ति से सदा ही प्रवर्तता होने के कारण विभावधर्म से विलक्षण होने से, भाव और भाववानता के कारण अनेकत्व होने पर भी प्रदेशभेद न होने से द्रव्य के साथ एकत्व को धारण करता हुआ, द्रव्य का स्वभाव ही क्यों न हो? (अवश्य हो ।) वह अस्तित्व-जैसे भिन्न-भिन्न द्रव्यों में प्रत्येक में समाप्त हो जाता है उसी प्रकार द्रव्य-गुण-पर्याय में प्रत्येक में समाप्त नहीं हो जाता, क्योंकि उनकी सिद्धि परस्पर होती है, इसलिये (अर्थात् द्रव्य-गुण और पर्याय एक दूसरे से परस्पर सिद्ध होते हैं इसलिये,—यदि एक न हो तो दूसरे दो भी सिद्ध नहीं होते इसलिये) उनका अस्तित्व एक ही है; सुवर्ण की भाँति ।

    जैसे द्रव्य, क्षेत्र, काल या भाव से सुवर्ण से जो पृथक् दिखाई नहीं देते; कर्ता-करण-अधिकरणरूप से पीतत्वादि गुणों के और कुण्डलादि पर्यायों के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान सुवर्ण के अस्तित्व से जिनकी उत्पत्ति होती है,—ऐसे पीतत्वादिगुणों और कुण्डलादि पर्यायों से जो सुवर्ण का अस्तित्व है, वह सुवर्ण का स्वभाव है; उसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से जो द्रव्य से पृथक् दिखाई नहीं देते, कर्ता-करण-अधिकरणरूप से गुणों के और पर्यायों के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान द्रव्य के अस्तित्व से जिनकी उत्पत्ति होती है,—ऐसे गुणों और पर्यायों से जो द्रव्य का अस्तित्व है, वह स्वभाव है ।

    (द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से सुवर्ण से भिन्न न दिखाई देने वाले पीतत्वादिक और कुण्डलादिक का अस्तित्व वह सुवर्ण का ही अस्तित्व है, क्योंकि पीतत्वादिक के और कुण्डलादिक के स्वरूप को सुवर्ण ही धारण करता है, इसलिये सुवर्ण के अस्तित्व से ही पीतत्वादिक की और कुण्डलादिक की निष्पत्ति-सिद्ध होती है; सुवर्ण न हो तो पीतत्वादिक और कुण्डलादिक भी न हों, इसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से द्रव्य से भिन्न नहीं दिखाई देने वाले गुणों और पर्यायों का अस्तित्व वह द्रव्य का ही अस्तित्व है, क्योंकि गुणों और पर्यायों के स्वरूप को द्रव्य ही धारण करता है, इसलिये द्रव्य के अस्तित्व से ही गुणों की और पर्यायों की निष्पत्ति होती है, द्रव्य न हो तो गुण और पर्यायें भी न हों । ऐसा अस्तित्व वह द्रव्य का स्वभाव है ।)

    अथवा, जैसे द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से जो पीतत्वादि गुणों से और कुण्डलादि पर्यायों से पृथक् नहीं दिखाई देता; कर्ता-करण-अधिकरणरूप से सुवर्ण के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान पीतत्वादि गुणों और कुण्डलादि पर्यायों से जिसकी निष्पत्ति होती है,—ऐसे सुवर्ण का, मूल-साधनपने से उनसे निष्‍पन्न होता हुआ, जो अस्तित्व है, वह स्वभाव है; उसी प्रकार द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से या भाव से गुणों से और पर्यायों से जो पृथक् नहीं दिखाई देता, कर्ता-करण-अधिकरणरूप से द्रव्य के स्वरूप को धारण करके प्रवर्तमान गुणों और पर्यायों से जिसकी निष्पत्ति होती है,—ऐसे द्रव्य का, मूलसाधनपने से उनसे निष्पन्न होता हुआ जो अस्तित्व है, वह स्वभाव है ।

    (पीतत्वादिक से और कुण्डलादिक से भिन्न न दिखाई देने वाले सुवर्ण का अस्तित्व वह पीतत्वादिक और कुण्डलादिक का ही अस्तित्व है, क्योंकि सुवर्ण के स्वरूप को पीतत्वादिक और कुण्डलादिक ही धारण करते