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आत्मानुशासन
























- आ-गुणभद्र



nikkyjain@gmail.com
Date : 17-Nov-2022


Index


गाथा / सूत्रविषय
001) मंगलाचरण पूर्वक ग्रन्थ-रचना करने की प्रतिज्ञा
002) पापनाशक और सुखदायक उपदेश
003) कटु उपदेश से भी भयभीत न होने की प्रेरणा
004) सच्चे उपदेशों की दुर्लभता
005) उपदेशदाता वक्‍ता का स्वरूप
006) उपदेशदाता वक्‍ता का स्वरूप
007) सच्चे श्रोता का स्वरूप
008) धर्माचरण की प्रेरणा
009) आप्त की उपासना की प्रेरणा
010) सम्यग्दर्शन का स्वरूप और भेद-प्रभेद
011) सम्यक्त्व के आज्ञा आदि दस भेद
012) आज्ञा मार्ग और उपदेश सम्यक्त्व का स्वरूप
013) सूत्र, बीज और संक्षेप सम्यक्त्व का स्वरूप
014) विस्तार, अर्थ, अवगाढ़ और परमावगाढ़ सम्यक्त्व का स्वरूप
015) सम्यग्दर्शन से ही मंदकषाय, शास्त्रज्ञान, चारित्र और तप की पूज्यता
016) सुकुमार (सरल) क्रिया करने का उपदेश
017) अणुव्रत ग्रहण करने की प्रेरणा
018) संसार के सभी प्राणियों को धर्म करने का उपदेश
019) विषय सुख भोगते हुए भी धर्म की रक्षा करने की प्रेरणा
020) धर्माचरण से सुख भंग होने के भय का निराकरण
021) कृषक के उदाहरण से धर्म रक्षा की प्रेरणा
022) धर्म का फल बिना मांगे ही
023) आत्मा के परिणामों से ही पुण्यऔर पाप की उत्पत्ति
024) धर्म संचय न करनेवालों की निन्‍दा
025) विषय सुख भोगते हुए भी धर्मोपार्जन सम्भव है
026) धर्म का फल
027) धर्म का घात करने से पाप होता है
028) शिकारादि कार्य प्रत्यक्ष दुःख के कारण
029) शिकार आदि में आसक्ति अत्यन्त निर्दयता
030) झूठ और चोरी के त्याग की प्रेरणा
031) पुण्यशालियों को उपसर्ग भी दुःखदायक नहीं
032) पुण्योदय बिना पुरुषार्थ भी कार्यकारी नहीं
033) हिंसादिक के त्यागी सत्पुरुष आज भी हैं
034) लौकिक जीवों की मूर्खतापूर्ण प्रवृत्ति
035) विषयान्ध पुरुष की दुर्दशा का वर्णन
036) विषयाभिलाषा की व्यर्थता
037) पुण्योपार्जन की प्रेरणा
038) विषयों का स्वाद अत्यन्त कटु
039) तृष्णा की विकरालता
040) परिग्रह त्याग की प्रेरणा
041) गृहस्थाश्रम के त्याग की प्रेरणा
042) गृहस्थाश्रम में होनेवाले निरर्थक क्लेशों का वर्णन
043) आशारूपी अनि से दग्ध व्यक्ति की चेष्टा
044) पुण्योदय के बिना कार्यसिद्धि नहीं
045) न्यायोपार्जित धन से कभी सम्पदा नहीं बढ़ती
046) धर्म, सुख, ज्ञान और गति का स्वरूप
047) धनोपार्जन छोड़कर धर्म-साधन की प्रेरणा
048) बाह्य पदार्थों में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि के त्याग की प्रेरणा
049) आशारूपी नदी के पार होने की प्रेरणा
050) विषयाभिलाषा से व्याकुल जीव की चेष्टा
051) आशा के वशीभूत जीव का अविवेक
052) जगत की क्षणभंगुरता
053) वर्तमान दु:खों का वर्णन
054) आत्म कल्याण की प्रेरणा
055) तृष्णा से उत्पन्न दुःख का वर्णन
056) मोहरूपी अग्नि की विशेषता
057) मोह-निद्रा का वर्णन
058) मोह-निद्रा के वश हुए प्राणी की दशा
059) शरीर की बन्दीगृह से तुलना
060) घर-कुटुम्ब आदि का स्वरूप
061) समभाव धारण करने की प्रेरणा
062) लक्ष्मी की अस्थिरता
063) शरीर की नश्वरता
064) विषयों के त्याग की प्रेरणा
065-066) परिग्रह रहित यती ही महासुखी
067) मुनियों के गुणों की प्रशंसा
068) मुनियों के गुणों की प्रशंसा
069) शरीर का विनाश निश्चित
070) इस नश्वर आयु और शरीरादिकों के द्वारा अविनश्वर पद प्राप्त किया जा सकता है
071) आयु की क्षणभंगुरता
072) आयु की क्षणभंगुरता
073) श्वास की उत्पत्ति में ही दुःख
074) संसार में जीवन बहुत थोड़ा
075) अनेक प्रयत्नों के बाद भी मनुष्यों की रक्षा संभव नहीं
076) काल से अधिक बलवान कोई नहीं
077) काल द्वारा प्राणियों को मारने की विधि
078) यमराज का आकस्मिक आगमन
079) मरण से रहित कोई नहीं
080) स्त्री शरीर से प्रीति छोड़ने की प्रेरणा
081) मनुष्य पर्याय की काने गन्ने से तुलना
082) आयु की अनिश्चितता
083) कुटुम्बीजन हितकारी नहीं
084) विवाहादि में सहायक बन्धुजन ही वास्तविक शत्रु
085) तृष्णारूपी अग्नि में जलने पर शांति की भ्रान्ति
086) बाल सफेद होने का यथार्थ आशय
087) संसार-समुद्र का स्वरूप
088) ज्ञान-ज्योतिवन्त जीव धन्य हैं
089) बाल्यादि तीनों अवस्थाओं में धर्म की दुर्लभता
090) बाल्यादि तीनों अवस्थाओं में कर्म जनित दुःख
091) वृद्धावस्था से आत्महित की प्रेरणा
092) विषयी जीवों को युक्तिपूर्वक उपालम्भ
093) व्यसनी को हिताहित का अभाव
094) बुद्धिमानों का प्रमादी होना शोचनीय
095) ज्ञानियों का राजादिक का दास होना विचारणीय
096) धर्म प्राप्ति का विधान
097) यतियों का पर-हित के प्रति अनुराग
098) शरीर : समस्त आपदाओं का स्थान
099) गर्भावस्‍था के दुःख
100) अज्ञानी की मूर्खता
101) कामजन्य वेदना
102) उत्तरोत्तर उत्कृष्ट त्याग के उदाहरण
103) विरक्ति होने पर सम्पत्ति के त्याग में क्या आश्चर्य ?
104) लक्ष्मी का त्याग होने पर विभिन्न परिणामवाले त्यागी
105) शरीर से मोह-त्याग की प्रेरणा
106) रागादि छोड़ने की प्रेरणा
107) दया-दम आदि के मार्ग पर चलने की प्रेरणा
108) भेद-ज्ञान और वीतरागता की प्रेरणा
109) बाल-ब्रह्मचारियों की प्रशंसा
110) परमात्मा बनने का रहस्य
111) तप करने की प्रेरणा
112) ध्यान तप का ध्येय और फल
113) तप ही समस्त सिद्धियों का साधन है
114) तप की महिमा
115) समाधि में ध्यान को सुरक्षित रखने की प्रेरणा
116) तप करने में ज्ञान की महिमा
117) इस शरीर के साथ आधे क्षण भी रहना सह्य नहीं
118) परीषह सहने की प्रेरणा
119) विधि का विलास अलंघ्य है
120) संयमधारियों की महिमा
121) ज्ञानियों की दीपक से तुलना
122) अशुभ और शुभ छोड़ने का क्रम
123) ज्ञानियों का तप और श्रुत के प्रति अनुराग कल्याणकारी है
124) अशुभराग में दोष की अधिकता
125) मोक्षमार्ग की यात्रा
126) स्त्रियों का महाविषमय स्वरूप
127) स्त्रीरूपी सर्प के विष की औषधि नहीं
128) मुक्ति-स्त्री से ही अनुराग की प्रेरण
129) नारी को सरोवर की उपमा
130) नारी, काम द्वारा निर्मित घातस्थल है
131) नारी के प्रति आसक्ति में निर्लज्जता
132) काम सेवन में खेद
133) स्त्री की योनि का वीभत्सरूप
134) विषय-सुख का पोषण करनेवाले ठग
135) नारी विष से भी अधिक भयानक है
136) स्त्रियों को चन्द्रमा की उपमा देना उचित नहीं है
137) मन की नपुंसकता
138) तप की श्रेष्ठता
139) गुण हीनता से हानि होती है
140) दोष का अंश भी निन्‍द्य है
141) दोष बतानेवाले दुर्जन भी हितकारी हैं
142) गुरु के कठोर वचन भी हितकारी हैं
143) धर्मात्माओं की दुर्लभता
144) विवेकी जन प्रशंसा में सन्तुष्ट नहीं होते
145) ज्ञानियों में श्रेष्ठ कौन ?
146) अहित का त्याग और हित में प्रवर्तन करने की प्रेरणा
147) गुणों का ग्रहण और दोषों के त्याग की प्रेरणा
148) विवेकियों का कर्त्तव्य
149) यथार्थ चारित्र पालनेवाले मुनि विरले ही हैं !
150) स्वच्छन्द प्रवृत्ति करनेवालों की संगति का निषेध
151) अयाचक वृत्ति धारण करने की प्रेरणा
152) कौन दीन और कौन अभिमानी
153) याचक का गौरव दाता में चला जाता है
154) वाञ्छक और अवाञ्छक की स्थिति
155) दरिद्रता की श्रेष्ठता !
156) आशारूपी खाई की अगाधता
157) आशाएरूपी खाई भरने का उपाय : तृष्णा का परित्याग
158) निर्ग्रन्थों द्वारा परिग्रह-ग्रहण का निषेध
159) कलि-काल का चक्रवर्तित्व
160) कर्मों के निमित्त से होनेवाली हानि
161) इन्द्रिय-सुख के लिए भी धैर्य की आवश्यकता
162) महामुनियों का कुछ भी बिगाड़ने में कर्म असमर्थ
163) आशा को निराश करनेवालों का कर्म कुछ नहीं बिगाड़ सकता
164) स्तुत्य और निद्य व्यक्तियों की चरम स्थिति
165) विषयाभिलाषियों द्वारा तप छोड़ने पर आश्चर्य
166) तप से च्युत होनेवालों की निर्भयता पर आश्चर्य
167) तप को मलिन करनेवालों की निन्‍दा
168) आश्चर्य-उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण
169) रागादि का नाश करने की प्रेरणा
170) शास्त्राभ्यास की प्रेरणा
171) वस्तु का अनेकान्तिक स्वरूप
172) प्रमाण से सिद्ध वस्तु का अनेकान्तिक स्वरूप
173) परस्पर विरुद्ध धर्ममय सभी पदार्थ
174) आत्मा का असाधारण स्वरूप
175) ज्ञान का फल और मोह की महिमा
176) भव्य और अभव्य में अंतर
177) ध्यान की प्रक्रिया
178) अज्ञानी को कर्म-बन्ध पूर्वक होने वाली निर्जरा
179) अविपाक निर्जरा की प्रेरणा
180) बन्ध और मुक्ति का कारण
181) पाप, पुण्य और मुक्ति का कारण
182) राग-द्वेष का कारण
183) मोह का स्वरूप और उसके विनाश का उपाय
184) मृत्यु के पश्चात्‌ मित्र भी शत्रु हैं
185) इष्ट-वियोग में शोक करनेवाले की स्थिति
186) शोक का कारण और फल तथा उसके अभाव की प्रेरणा
187) पर-लोक में कौन सुखी और कौन दुःखी ?
188) जन्म की मरण से समानता
189) लाभ और पूजादि की कामना का निषेध
190) तप और श्रुत का वास्तविक फल
191) विषयाभिलाषा से अनर्थ
192) विषयों का दोष जानकर भी उनके सेवन में आश्चर्य
193) आत्म-हितकारी आचरण की प्रेरणा
194) बाह्य तप करने की प्रेरणा
195) शरीर ही अनर्थों की परम्परा का कारण है
196) अज्ञानियों द्वारा शरीर-पोषण का प्रयोजन
197) अज्ञानियों द्वारा शरीर-पोषण का प्रयोजन
198) इससे तो गृहस्थ अवस्था ही श्रेष्ठ है
199) शरीर और स्त्री से राग छोड़ने की प्रेरणा
200) दो द्रव्यों में एकत्व होना असम्भव
201) शरीर से ममत्व और सुख की आशा रखना आश्चर्यजनक है
202) शरीर को धिक्कार है
203) सच्चे ज्ञान और सच्चे साहस का स्वरूप
204) रोग होने पर ज्ञानियों की परिणति
205) रोग होने पर ज्ञानियों की परिणति
206) रोग मिटने से सुख मानना अज्ञान है
207) असाध्य रोग होने पर शरीर से उदास होने की प्रेरणा
208) शरीर का ग्रहण जन्म का और त्याग मुक्ति का कारण है
209) शरीर के कारण जीव भी अस्पृश्य
210) शरीर के तीन प्रकार
211) शरीर के तीन प्रकार
212) कषाय-शत्रु को जीतना आसान
213) कषायों के रहते हुए गुणों की प्राप्ति होना दुर्लभ
214) कषायों के आधीन होनेवालों का उपहास
215) साधर्मियों के प्रति ईर्ष्या के त्याग की प्रेरणा
216) क्रोध से होनेवाली हानि
217) मान से होनेवाली हानि
218) मान के त्याग की प्रेरणा
219) सब पदार्थ एक दूसरे से बढ़कर हैं, अतः गर्व करना व्यर्थ है
220) माया से होनेवाली हानि
221) माया से होनेवाली हानि
222) माया से होनेवाली हानि
223) लोभ से होनेवाली हानि
224) निकट भव्य जीवों को होनेवाले भाव
225) निकट भव्य जीवों को होनेवाले भाव
226) गुणों से मण्डित मुनिराज ही मुक्ति के पात्र
227) रत्नत्रय की रक्षा करने की प्रेरणा
228) संयम के उपकरणों से भी अनुराग करने का निषेध
229) तप और श्रुतरूपी निधि की रक्षा करने की प्रेरणा
230) आशारूपी शत्रु से सावधान रहने की शिक्षा
231) मोह का सर्वथा नाश करने की प्रेरणा
232) वीतरागता के अभाव में दुःख
233) इन्द्रिय-सुख से दुःखों की शान्ति असम्भव
234) ज्ञान-चारित्ररूपी मूल्य चुकाकर मोक्ष प्राप्त करने की प्रेरणा
235) भोग्य और अभोग्य के विकल्पों से पार
236) प्रवृत्ति और निवृत्ति से पार अवस्था प्राप्त करने की प्रेरणा
237) प्रवृत्ति, निवृत्ति और उनके कारण
238) अपूर्व-अपूर्व भाव करने की प्रेरणा
239) हेय-उपादेय का स्वरूप
240) अशुभादि के त्याग का क्रम
241) आत्मा और बन्ध की सिद्धि पूर्वक मोक्ष की सिद्धि
242) शरीरादि से प्रीति ही आपत्ति
243) देह के प्रति एकत्व बुद्धि के त्याग की प्रेरणा
244) विद्वानों का अपूर्व कौशल
245) बन्ध और निर्जरा की परिपाटी
246) योगी कौन ?
247) प्रतिज्ञाओं के बाँध से तपरूपी सरोवर की सुरक्षा
248) अल्प दोष भी बहुत हानिकारक है
249) पर- निन्‍दा के त्याग की प्रेरणा
250) गुणवानों के अल्प दोष भी प्रसिद्ध
251) ज्ञानियों की वैचारिक दशा
252) विवेकियों का आचरण
253) तन और चेतन की भिन्नता
254) शरीर से राग छोड़ने की प्रेरणा
255) मोह-त्याग की प्रेरणा
256) साधुओं को सभी पदार्थ सुख के निमित्त
257) कर्मोदय होने पर मुनिराज को खेद नहीं होता
258) मुनिराज की ध्यानस्थ अवस्था
259) निस्पृह मुनिराज से प्रार्थना
260) चारित्रवन्त साधु धन्य हैं !
261) भेद-विज्ञान की महिमा
262) सज्जनों द्वारा परिग्रह-त्यागी वन्दनीय
263) कर्मोदय में उदासीन जीव को नवीन कर्म-बन्ध नहीं
264) यतियों की वृत्ति आश्चर्य की भूमि
265) मुक्ति में ज्ञानादि गुणों का नाश मानना मिथ्या
266) आत्मा का स्वरूप
267) अनन्त सुखमय हैं सिद्ध भगवान
268) ग्रन्थ के अभ्यास का फल
269) गुरुवर जिनसेनाचार्य का स्मरण
270) अन्तिम मङ्गलाचरण



!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम: !!

श्रीमद्‌-भगवत्गुणभद्राचार्य-देव-प्रणीत

श्री
आत्मानुशासन

मूल संस्कृत गाथा

आभार :

🏠
!! नम: श्रीसर्वज्ञवीतरागाय !!

ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नम: ॥1॥

अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकलभूतलकलंका
मुनिभिरूपासिततीर्था सरस्वती हरतु नो दुरितान् ॥2॥

अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥3॥

॥ श्रीपरमगुरुवे नम:, परम्पराचार्यगुरुवे नम: ॥

सकलकलुषविध्वंसकं, श्रेयसां परिवर्धकं, धर्मसम्बन्धकं, भव्यजीवमन: प्रतिबोधकारकं, पुण्यप्रकाशकं, पापप्रणाशकमिदं शास्त्रं श्रीआत्मानुशासन नामधेयं, अस्य मूलाग्रन्थकर्तार: श्रीसर्वज्ञदेवास्तदुत्तरग्रन्थकर्तार: श्रीगणधरदेवा: प्रतिगणधरदेवास्तेषां वचनानुसारमासाद्य श्रीमद्‌-भगवत्गुणभद्राचार्य विरचितं, श्रोतार: सावधानतया शृणवन्तु ॥



मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्‌ ॥
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारकं
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम्‌ ॥


जो न्यूनता विपरीतता अर अधिकता से रहित है ।
सन्देह से भी रहित है स्पष्टता से सहित है ॥
जो वस्तु जैसी उसे वैसी जानता जो ज्ञान है ।
जाने जिनागम वे कहें वह ज्ञान सम्यग्ज्ञान है ॥र.क.श्रा.-42॥
मुक्तिमग के मग तथा जो ललित में भी ललित हैं ।
जो भविजनों के कर्ण-अमृत और अनुपम शुद्ध हैं ॥
भविविजन के उग्र दावानल शमन को नीर हैं ।
मैं नमूँ उन जिनवचन को जो योगिजन के वंद्य हैं ॥नि.सा.-क.१५॥


🏠
+ मंगलाचरण पूर्वक ग्रन्थ-रचना करने की प्रतिज्ञा -
लक्ष्मीनिवासनिलयं विलीनविलयं निधाय हृदि वीरम् ।
आत्मानुशासनमहं वक्ष्ये मोक्षाय भव्यानाम् ॥१॥
अन्वयार्थ : जो वीर जिनेंद्र लक्ष्मीके निवासस्थानस्वरूप हैं तथा जिनका पाप कर्म नष्ट हो चुका है उन्हें हृदय में धारण करके मैं भव्य जीवों को मोक्ष प्राप्ति के निमित्तभूत आत्मानुशासन अर्थात् आत्मस्वरूप की शिक्षा देने वाले इस ग्रंथ को कहूंगा ॥१॥

भावार्थ :
यहां प्रस्तुत ग्रन्थ के कर्ता श्री गुणभद्राचार्य ने ग्रन्थ के प्रारम्भ में अन्तिम तीर्थंकर श्री वर्धमान जिनेंद्र का स्मरण करके उस आत्मानुशासन ग्रन्थ के रचने की प्रतिज्ञा की है जो भव्य जीवोंको आत्मा के यथार्थ स्वरूप की शिक्षा देकर उन्हें मोक्ष की प्राप्ति करा सके । यहां श्लोकमें मंगलस्वरूप से जिस 'वीर' शब्द का प्रयोग किया गया है उससे अन्तिम तीर्थंकर श्री वर्धमान जिनेंद्र का तो स्पष्टतया बोध होता ही है, साथ ही उससे समस्त तीर्थंकर समूह का भी बोध होता है। यथा--' विशिष्टाम् ई राति इति वीरः, तं वीरम् ' इस निरुक्ति के अनुसार यहां वीर ( वि-ई-र ) पद में स्थित 'वि' उपसर्ग का अर्थ 'विशिष्ट' है, ई शब्द का अर्थ है लक्ष्मी, तथा र का अर्थ देनेवाला है। इस प्रकार समदायरूप में उसका यह अर्थ होता है कि जो विशिष्ट अर्थात् अन्य में न पायी जाने वाली समवसरणादिरूप बाह्य एवं अनन्तचतुष्टयरूप अन्तरंग लक्ष्मीको देने वाला है वह वीर कहा जाता है । इस प्रकार चूंकि अन्तरंग और बहिरंग दोनों ही प्रकार को लक्ष्मी से सम्पन्न सब ही तीर्थंकर अपने दिव्य उपदेश के द्वारा भव्य जीवों के लिये विशिष्ट लक्ष्मी के देने में समर्थ होते हैं अतएव वीर शब्द से यहां उन सबका ही ग्रहण हो जाता है । इस प्रकार मंगलरूप में श्री वर्धमान जिनेन्द्र अथवा समस्त ही तीर्थंकर समुदाय का ध्यान करके ग्रन्थकर्ता ने इस ग्रन्थ के रचने का यह प्रयोजन भी प्रगट कर दिया है कि चूंकि सब ही प्राणी सुख को चाहते हैं और दुख से डरते हैं अतएव मैं उन भव्य जीवों के लिये इस ग्रन्थ के द्वारा उस आत्मतत्त्व की शिक्षा दूंगा कि जिसके निमित्त से वे जन्ममरण के असह्य दुख से छूटकर अविनश्वर एवं निर्बाध सुख को प्राप्त कर सकेंगे ॥१॥

🏠
+ पापनाशक और सुखदायक उपदेश -
दुःखाद्विभेषि नितरामभिवाञ्छसि सुखमतोऽहमप्यात्मन् ।
दुःखापहारि सुखकरमनुशास्मि तवानुमतमेव ॥२॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन् ! तू दुख से अत्यन्त डरता है और सुख की इच्छा करता है, इसलिये मैं भी तेरे लिये अभीष्ट उसी तत्त्व का प्रतिपादन करता हूं जो कि तेरे दुःख को नष्ट करके सुख को करनेवाला है ॥२॥

भावार्थ :

🏠
+ कटु उपदेश से भी भयभीत न होने की प्रेरणा -
यद्यपि कदाचिदस्मिन् विपाकमधुरं तदात्वकटु किंचित् ।
त्वं तस्मान्मा भैषीर्यथातुरो भेषजादुग्रात् ॥३॥
अन्वयार्थ : यद्यपि इस (आत्मानुशासन) में प्रतिपादित किया जानेवाला कुछ सम्यग्दर्शनादि का उपदेश कदाचित् सुनने में अथवा आचरण के समय में थोडा सा कडुआ (दुःखदायक) प्रतीत हो सकता है, तो भी वह परिणाम में मधुर (हितकारक) ही होगा। इसलिये हे आत्मन् ! जिस प्रकार रोगी तीक्ष्ण (कडुवी) औषधि से नहीं डरता है उसी प्रकार तू भी उससे डरना नहीं ॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार ज्वर आदि से पीडित बुद्धिमान् मनुष्य उसको नष्ट करने के लिये चिरायता आदि कडुवी भी औषधि को प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करता है,उसी प्रकार संसार के दुःख से पीडित भव्य जीवों को इस उपदेश को सुनकर प्रसन्नतापूर्वक तदनुसार आचरण करना चाहिये। कारण यह कि यद्यपि आचरण के समय वह कुछ कष्टकारक अवश्य दिखेगा तो भी उसका फल मधुर (मोक्षप्राप्ति) होगा॥३॥

🏠
+ सच्चे उपदेशों की दुर्लभता -
जना घनाश्च वाचालाः सुलभाः स्युर्वथोत्थिताः।
दुर्लभा ह्यन्तरार्द्रास्ते जगदभ्युज्जिहीर्षवः ॥४॥
अन्वयार्थ : जिनका उत्थान (उत्पत्ति और प्रयत्न) व्यर्थ है ऐसे वाचाल मनुष्य और मेघ दोनों ही सरलता से प्राप्त होते हैं। किन्तु जो भीतर से आर्द्र (दयालु और जल से पूर्ण ) होकर जगत का उद्धार करना चाहते हैं ऐसे वे मनुष्य और मेघ दोनों ही दुर्लभ हैं ॥४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो मेघ गरजते तो हैं, किंतु जलहीन होने से बरसते नहीं हैं, वे सरलता से पाये जाते हैं। परन्तु जो जल से परिपूर्ण होकर वर्षा करने के उन्मुख हैं, वे दुर्लभ ही होते हैं। ठीक इसी प्रकार से जो उपदेशक अर्थहीन अथवा अनर्थकारी उपदेश करते हैं वे तो अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं किंतु जो स्वयं मोक्षमार्ग में प्रवृत्त होकर दयार्द्रचित्त होते हुए अन्य उन्मार्गगामी प्राणियों को उससे उद्धार करनेवाले सदुपदेश को करते हैं वे कठिनता से ही प्राप्त होते हैं। ऐसे ही उपदेशकों का प्रयत्न सफल होता है ॥४॥

🏠
+ उपदेशदाता वक्‍ता का स्वरूप -
प्राप्तसमस्तशास्त्रहृदयः प्रव्यक्तलोकस्थितिः
प्रास्ताशः प्रतिभापरः प्रशमवान् प्रागेव दृष्टोत्तरः।
प्रायः प्रश्नसहः प्रभुः परमनोहारी परानिन्दया
ब्रू याद्धर्मकथां गणी गुणनिधिः प्रस्पष्टमिष्टाक्षरः॥५॥
अन्वयार्थ : जो त्रिकालवर्ती पदार्थों को विषय करनेवाली प्रज्ञा से सहित है, समस्त शास्त्रों के रहस्य को जान चुका है, लोकव्यवहार से परिचित है, अर्थलाभ और पूजा-प्रतिष्ठा आदि की इच्छा से रहित है, नवीन नवीन कल्पना की शक्तिरूप अथवा शीघ्र उत्तर देने की योग्यतारूप उत्कृष्ट प्रतिभा से सम्पन्न है, शान्त है, प्रश्न करने के पूर्व में ही वैसे प्रश्न के उपस्थित होने की सम्भावना से उसके उत्तर को देख चुका है, प्रायः अनेक प्रकार के प्रश्नों के उपस्थित होने पर उनको सहन करनेवाला है अर्थात् न तो उनसे घबडाता है और न उतेजित ही होता है, श्रोताओं के ऊपर प्रभाव डालने वाला है, उनके (श्रोताओं के) मन को आकर्षित करनेवाला अथवा उनके मनोगत भाव को जाननेवाला है, तथा उत्तमोत्तम अनेक गुणों का स्थानभूत है; ऐसा संघ का स्वामी आचार्य दूसरों को निन्दा न करके स्पष्ट एवं मधुर शब्दों में धर्मोपदेश देने का अधिकारी होता है॥५॥

भावार्थ :

🏠
+ उपदेशदाता वक्‍ता का स्वरूप -
श्रुतमविकलं शुद्धा वृत्तिः परप्रतिबोध ने
परिणतिरुरूद्योगो मार्गप्रवर्तन सद्विधौ ।
बुधनुतिरनुत्सेको लोकज्ञता मृदुताऽस्पृहा
यतिपति गुणा यस्मिन्नन्ये च सोऽस्तु गुरुः सताम् ॥६॥
अन्वयार्थ : जिसके परिपूर्ण श्रुत है अर्थात् जो समस्त सिद्धान्त का जानकार है; जिसका चारित्र अथवा मन, वचन व काय की प्रवृत्ति पवित्र है; जो दूसरों को प्रतिबोधित करने में प्रवीण है, मोक्षमार्ग के प्रचाररूप समीचीन कार्य में अतिशय प्रयत्नशील है, जिसकी अन्य विद्वान् स्तुति करते हैं तथा जो स्वयं भी विशिष्ट विद्वानों की प्रशंसा एवं उन्हें नमस्कार आदि करता है, जो अभिमान से रहित है, लोक और लोकमर्यादा का जानकार है, सरल परिणामी है, इस लोकसम्बन्धी इच्छाओं से रहित है, तथा जिसमें और भी आचार्य पद के योग्य गुण विद्यमान हैं; वही हेयोपादेय-विवेकज्ञान के अभिलाषी शिष्यों का गुरु हो सकता है ॥६॥

भावार्थ :

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+ सच्चे श्रोता का स्वरूप -
भव्य: किं कुशलं ममेति विमृशन् दुःखाद् भृशं भीतवान्।
सौख्येषी श्रवणादिबुद्धिविभवः श्रुत्वा विवार्य स्फुटम् ।
धर्म शर्मकरं दयागुणमयं युक्त्यागमाभ्यां स्थितं
गृण्हन् धर्मकथां श्रुतावधिकृतः शास्यो निरस्ताग्रहः ॥७॥
अन्वयार्थ : जो भव्य है; मेरे लिये हितकारक मार्ग कौनसा है, इसका विचार करनेवाला है; दुख से अत्यन्त डरा हुआ है, यथार्थ सुख का अभिलाषी है, श्रवण आदिरूप बुद्धिविभव से सम्पन्न है, तथा उपदेश को सुनकर और उसके विषय में स्पष्टता से विचार करके जो युक्ति व आगम से सिद्ध ऐसे सुखकारक दयामय धर्म को ग्रहण करनेवाला है; ऐसा दुराग्रह से रहित शिष्य धर्मकथा के सुनने में अधिकारी माना गया है ॥७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां धर्मोपदेश के सुनने का अधिकारी कौन है, इस प्रकार श्रोता के गुणों का विचार करते हुए सबसे पहिले यह बतलाया है कि भव्य होना चाहिये। जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र को प्राप्त करके भविष्य में अनन्तचतुष्टयस्वरूप से परिणत होनेवाला है वह भव्य कहलाता है। यदि श्रोता इस प्रकारका भव्य नहीं है तो उसे उपदेश देना व्यर्थ ही होगा। कारण कि जिस प्रकार पानी के सींचनेसे मिट्टी गीलेपन को प्राप्त हो सकती है उस प्रकार पत्थर नहीं हो सकता, अथवा जिस प्रकार नवीन घट के ऊपर जलबिन्दुओं के डालने पर वह उन्हें आत्मसात् कर लेता है उस प्रकार घी आदि से चिक्कणताको प्राप्त हुआ घट उन्हें आत्मसात् नहीं कर सकता है-वे इधर उधर बिखर कर नीचे गिर जाती हैं। ठीक यही स्थिति उस श्रोता की भी है-जिस श्रोता का हृदय सरल है वह सदुपदेश को ग्रहण करके तदनुसार प्रवृत्ति करने में प्रयत्नशील होता है, किन्तु जिसका हृदय कठोर है उसके ऊपर सदुपदेश का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता। अतएव सबसे पहिले उसका भव्य होना आवश्यक है । दूसरी विशेषता उसकी यह निर्दिष्ट की गई है कि उसे हिताहितका विवेक होना चाहिये। कारण कि मेरा आत्मकल्याण किस प्रकार से हो सकता है, यह विचार यदि श्रोता के रहता है तब तो वह सदुपदेश को सुनकर तदनुसार कल्याणमार्ग में चलनेके लिये उद्यत हो सकता है । परन्तु यदि उसे आत्महित की चिन्ता अथवा हित और अहित का विवेक ही नहीं है तो वह मोक्षमार्ग में प्रवृत्त नहीं हो सकेगा। किन्तु जब और जिस प्रकार का अनुकूल या प्रतिकूल उपदेश उसे प्राप्त होगा तदनुसार वह अस्थिरता से आचरण करता रहेगा। इस प्रकार से वह दुखी ही बना रहेगा। इसीलिये उसमें आत्महित का विचार और उसके परीक्षण की योग्यता अवश्य होनी चाहिये। इसी प्रकार उसे दुख का भय और सुख की अभिलाषा भी होनी चाहिये, अन्यथा यदि उसे दुख से किसी प्रकार का भय नहीं है या सुख की अभिलाषा नहीं है तो फिर भला वह दुख को दूर करने वाले सुख के मार्ग में प्रवृत्त ही क्यो होगा? नहीं होगा। अतएव उसे दुख से भयभीत और सुखाभिलाषी भी अवश्य होना चाहिये। इसके अतिरिक्त उसमें निम्न प्रकार बुद्धि का विभव या श्रोता के आठ गुण भी होने चाहिये-- " शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा। स्मृत्यूहापोहनिर्णीतिः श्रोतुरष्टौ गुणान् विदुः॥" सबसे पहिले उसे उपदेश सुनने की उत्कंठा (शुश्रूषा ) होनी चाहिये, अन्यथा तदनुसार आचरण करना तो दूर रहा किन्तु वह उसे रुचिपूर्वक सुनेगा भी नहीं। अथवा शुश्रूषा से अभिप्राय गुरू की सेवा का भी हो सकता है, क्योंकि वह भी ज्ञानप्राप्ति का साधन है। इसके अनन्तर श्रवण (सुनना), सुने हुये अर्थ को ग्रहण करना, ग्रहण किये हुए अर्थ को हृदय में धारण करना, उसका स्मरण रखना, उसके योग्यायोग्य का युक्तिपूर्वक विचार करना, इस विचार से जो योग्य प्रमाणित हो उसे ग्रहण करके अयोग्य अर्थ को छोडना, तथा योग्य तत्त्व के विषय में दृढ रहना; ये श्रोता के आठ गुण हैं जो उसमें होने चाहिये। उपर्युक्त गुणों के अतिरिक्त श्रोता में हठाग्रह का अभाव भी होना चाहिये, क्योंकि यदि वह हठाग्रही है तो वह यथावत् वस्तुस्वरूप का विचार नहीं कर सकेगा। कहा भी है-"आग्रही बत निनीषति युक्ति तत्र यत्र मतिरस्य निविष्टा। पक्षपातरहितस्य तु युक्तियत्र तत्र मतिरेति निवेशम्॥" अर्थात् दुराग्रही मनुष्य ने जो पक्ष निश्चित कर रखा है वह युक्ति को उसी ओर ले जाना चाहता है। किन्तु जो आग्रह से रहित होकर निष्पक्ष दृष्टि से विचार करना चाहता है वह युक्ति का अनुसरण करके उसके ऊपर विचार करता और तदनुसार वस्तुस्वरूप का निश्चय करता है। इस प्रकार जिस श्रोता में ये गुण विद्यमान होंगे वह सुरूचिपूर्वक धर्मोपदेश को सुन करके तदनुसार आत्महित के मार्ग में अवश्य प्रवृत्त होगा॥७॥


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+ धर्माचरण की प्रेरणा -
पापाद् दुःखं धर्मात् सुखमिति सर्वजनसुप्रसिद्धमिदम् ।
तस्माद्विहाय पावं चरतु सुखार्थी सदा धर्मम् ॥८॥
अन्वयार्थ : पाप से दुख और धर्म से सुख होता है, यह बात सब जनों में भले प्रकार प्रसिद्ध है-इसे सब ही जानते हैं। इसलिये जो भव्य प्राणी सुख की अभिलाषा करता है उसे पाप को छोडकर निरन्तर धर्म का आचरण करना चाहिये॥८॥

भावार्थ :

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+ आप्त की उपासना की प्रेरणा -
सर्वः प्रेप्सति सत्सुखाप्तिमचिरात् सा सर्वकर्मक्षयात्
सद्वृतात् स च तच्च बोधनियतं सोऽप्यागमात् स श्रुतेः।
सा चाप्तात् स च सर्वदोषरहितो रागादयस्तेऽप्यतः
तं युक्त्या सुविचार्य सर्वसुखदं सन्तः श्रयन्तु श्रिये ॥९॥
अन्वयार्थ : सब प्राणी शीघ्र ही यथार्थ सुख को प्राप्त करने की इच्छा करते हैं, वह सुख की प्राप्ति समस्त कर्मों का क्षय हो जाने पर होती है, वह कर्मों का क्षय भी सम्यक् चारित्र के निमित्त से होता है, वह सम्यक्चारित्र भी सम्यग्ज्ञान के अधीन है, वह सम्यग्ज्ञान भी आगम से प्राप्त होता है, वह आगम भी द्वादशांगरूप श्रुत के सुनने से होता है, वह द्वादशांग श्रुत भी आप्त से आविर्भूत होता है, आप्त भी वही हो सकता है जो समस्त दोषों से रहित है, तथा वे दोष भी रागादिस्वरूप हैं। इसलिये सुख के मूल कारणभूत आप्त का (देव का) युक्ति (परीक्षा) पूर्वक विचार करके सज्जन मनुष्य बाह्य एवं अभ्यन्तर लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये सम्पूर्ण सुख देनेवाले उसी आप्त का आश्रय करें॥९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां यह बतलाया है कि क्षुधा-तृषा आदि अठारह दोषों से रहित आप्त की दिव्यध्वनि को सुनकर गणधरों के द्वारा द्वादशांग श्रुत की रचना की जाती है। उसको सुनकर आरातीय आचार्य आगम का प्रणयन करते हैं जिसके कि अभ्यास से साधारण प्राणियों को हिताहित का बोध प्राप्त होता है। इस प्रकार जब प्राणी को हिताहित विवेक के साथ वस्तुस्थिति का ज्ञान हो जाता है तब उसका सम्यक्चारित्र (तप-संयम आदि) की ओर झुकाव होता है और इससे वह सम्पूर्ण कर्मों को आत्मा से पृथक् करके शीघ्र ही अविनश्वर निराकुल सुख को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार परम्परा से उसके मनोरथ की पूर्ति का मूल कारण रागादि दोषों से रहित सर्वदर्शी आप्त ही ठहरता है। अतएव सुखाभिलाषी प्राणियों को ऐसे ही आप्त का स्मरण, चिन्तन एवं उपासना आदि करनी चाहिये॥९॥

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+ सम्यग्दर्शन का स्वरूप और भेद-प्रभेद -
श्रद्धानं द्विविधं त्रिधा दशविधं मौढ्याद्य पोढं सदा
संवेगादिविवर्धितं भवहरं व्यज्ञानशुद्धिप्रदम् ।
निश्चिन्वन् नव सप्ततत्त्वमचलप्रासादमारोहतां
सोपानं प्रथमं विनेयविदुषामाद्येयमाराधना ॥१०॥
अन्वयार्थ : तत्त्वार्थश्रद्धान का नाम सम्यग्दर्शन है। वह निसर्गज और अधिगमज के भेद से दो प्रकार का; औपशमिक, क्षायोपशमिक और क्षायिक के भेद से तीन प्रकार का; तथा आगे कहे जानेवाले आज्ञासम्यक्त्व आदि के भेद से दस प्रकार का भी है। मूढता आदि (3 मूढता, 8 मद, 6 अनायतन और 8 शंका-कांक्षा आदि) दोषों से रहित होकर संवेग आदि गुणों से वृद्धि को प्राप्त हुआ वह श्रद्धान (सम्यग्दर्शन) निरन्तर संसार का नाशक; कुमति, कुश्रुत एवं विभंग इन तीन मिथ्याज्ञानों की शुद्धि (समीचीनता) का कारण; तथा जीवाजीवादि सात अथवा इनके साथ पुण्य और पाप को लेकर नौ तत्त्वों का निश्चय करानेवाला है। वह सम्यग्दर्शन स्थिर मोक्षरूप भवन के ऊपर चढने वाले बुद्धिमान् शिष्यों के लिये प्रथम सीढीके समान है। इसीलिये इसे चार आराधनाओं में प्रथम आराधनास्वरूप कहा जाता है ॥१०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां सम्यग्दर्शनके जो दो भेद निर्दिष्ट किये गये हैं वे हैं निसर्गज और अधिगमज सम्यग्दर्शन। इनमें जो तत्त्वार्थश्रद्धान साक्षात् बाह्य उपदेश आदि को अपेक्षा न करके स्वभाव से ही उत्पन्न होता है उसे निसर्गज तथा जो बाह्य उपदेश की अपेक्षा से उत्पन्न होता है उसे अधिगमज सम्यग्दर्शन कहते हैं। प्रत्येक कार्य अन्तरङग और बाह्य इन दो कारणों से उत्पन्न होता है। तदनुसार यहां सम्यग्दर्शन का अन्तरङग कारण जो दर्शनमोहनीय का उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम है वह तो इन दोनों ही सम्यग्दर्शनों में समान है। विशेषता उन दोनों में इतनी ही है कि निसर्गज सम्यग्दर्शन साक्षात् बाह्य उपदेश को अपेक्षा न करके जिनमहिमा आदि के देखने से प्रगट हो जाता है, परन्तु अधिगमज सम्यग्दर्शन बाह्य उपदेश के बिना नहीं प्रगट होता है। इसके आगे जो उसके तीन भेद निर्दिष्ट किये हैं वे अन्तरङग कारण की अपेक्षा से हैं। यथा- जो सम्यग्दर्शन अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व, सम्यक्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व इन सात प्रकृतियों के उपशम से उत्पन्न होता है उसे औपशमिक तथा जो इन्हीं सात प्रकृतियों के क्षय से उत्पन्न होता है उसे क्षायिक सम्यग्दर्शन कहते हैं। अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व इनके उदयाभावी क्षय व सदवस्थारूप उपशमसे तथा देशघाती स्पर्धकस्वरूप सम्यक्त्व प्रकृति के उदय से जो सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है उसे क्षायोपशमिक कहा जाता है। आगे जो यहां उस सम्यग्दर्शन के दस भेदों का निर्देश किया है उनका वर्णन ग्रन्थकार स्वयं ही आगे करेंगे, अतएव उनके सम्बन्ध में यहां कुछ नहीं कहा जा रहा है। जिन दोषों के कारण यह सम्यग्दर्शन मलिनता को प्राप्त होता है वे पच्चीस दोष निम्न प्रकार हैं- 3 मूढता, 8 मद, 6 अनायतन और 8 शंका आदि । मूढताका अर्थ अज्ञानता है। वह मूढता तीन प्रकारकी है । (1) लोकमूढता- कल्याणकारी समझकर गंगा आदि नदियों अथवा समुद्र में स्नान करना, बालु या पत्थरों का स्तूप बनाना, पर्वत से गिरना, तथा अग्नि में जलकर सती होना आदि । (2) देवमूढता- अभीष्ट फल प्राप्त करने की इच्छा से इसी भव में आशायुक्त होकर राग-द्वेष से दूषित देवताओं की आराधना करना। (3) गुरुमूढता- जो परिग्रह, आरम्भ एवं हिंसा से सहित तथा संसारपरिभ्रमण के कारणीभूत विवाहादि कार्यों में रत हैं ऐसे मिथ्यादृष्टि साधुओं की प्रशंसा आदि करना। कहीं कहीं इस गुरुमूढता के स्थान में समयमूढता पायी जाती है जिसका अभिप्राय है समीचीन और मिथ्या शास्त्रों की परीक्षा न कर कुमार्ग में प्रवृत्त करने वाले शास्त्रों का अभ्यास करना। ज्ञान, प्रतिष्ठा, कुल (पितृवंश), जाति (मातृवंश), शारीरिक बल, धन-सम्पत्ति, अनशनादिस्वरूप तप और शरीर सौन्दर्य इन आठ के विषय में अभिमान प्रगट करने से आठ मद होते हैं । अनायतन का अर्थ है धर्म का अस्थान। वे अनायतन छह हैं- कुगुरु, कुदेव, कुधर्म कुगुरुभक्त, कुदेवभक्त और कुधर्मभक्त। निर्मल सम्यग्दृष्टि जीव राजा आदि के भय से, आशा से, स्नेह से तथा लोभ से भी कभी इनकी प्रशंसा आदि नहीं करता है । 8 शंका आदि- (1) शंका- सर्वज्ञ देव के द्वारा उपदिष्ट तत्त्व के विषय में ऐसी आशंका रखना कि जिस प्रकार यहां अमुक तत्त्व का स्वरूप बतलाया गया है क्या वह वास्तव में ऐसा ही है अथवा अन्य प्रकार है। (2) कांक्षा- पाप एवं दुख के कारणीभूत कर्माधीन सांसारिक सुख को स्थिर समझकर उसकी अभिलाषा रखना। (3) विचिकित्सा- मुनि आदि के मलिन शरीर को देखकर उससे घृणा करना । यद्यपि यह मनुष्य शरीर स्वभावतः अपवित्र है, फिर भी चूंकि सम्यग्दर्शन आदिरूप रत्नत्रय का लाभ एक मात्र इसी मनुष्य शरीर से हो सकता है अतएव वह घृणा के योग्य नहीं है। यदि वह घृणा के योग्य है तो केवल विषयभोग को दृष्टि से ही है, न कि आत्मस्वरूपलाभ की दृष्टि से। (4) मूढदृष्टि- कुमार्ग अथवा कुमार्गगामी जीवों की मन, वचन अथवा काय से प्रशंसा करना ! (5) अनुपगूहन-- अज्ञानी अथवा अशक्त (व्रतादि के परिपालन में असमर्थ) जनों के कारण पवित्र मोक्षमार्ग के विषय में यदि किसी प्रकार को निन्दा होती हो तो उसके निराकरण का प्रयत्न न करके उसमें सहायक होना। (6) अस्थितीकरण- मोक्षमार्ग से डिगते हुए भव्य जीवों को देख करके भी उन्हें उसमें दृढ करनेका प्रयत्न न करना। (7) अवात्सल्य-- धर्मात्मा जीवों का अनुरागपूर्वक आदरसत्कार आदि न करना, अथवा उसे कपटभाव से करना। (8) अप्रभावना- जैनधर्म के विषय में यदि किन्हीं को अज्ञान अथवा विपरीत ज्ञान है तो उसे दूर करके उसकी महिमा को प्रकाशित करने का उद्योग न करना । इस प्रकार ये सम्यग्दर्शन के पच्चीस दोष हैं जो उसे मलिन करते हैं। इतना यहां विशेष समझना चाहिये कि इन दोषों की सम्भावना केवल क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शन के विषय में ही हो सकती है, कारण कि वहां सम्यक्त्वप्रकृति का उदय रहता है। औपशमिक और क्षायिक सम्यग्दर्शन के विषय में उक्त दोषों को सम्भावना नहीं है। श्लोक में जिन संवेग अर्थात् संसार के दुःखों से निरंतर भयभीत रहना, अथवा धर्म में अनुराग रखना। (2) निर्वेद-- संसार, शरीर एवं भोगों से विरक्ति। (3) निन्दा-- अपने दोषों के विषय में पश्चाताप करना। (4) गर्हा- किये गये दोषों को गुरु के आगे प्रगट करके निन्दा करना। (5) उपशम-- क्रोधादि विकारों को शान्त करना। (6) भक्ति-- सम्यग्दर्शन आदि के विषय में अनुराग रखना। (7) वात्सल्य-- धर्मात्मा जन से प्रेमपूर्ण व्यवहार करना। (8) अनुकम्पा-- प्राणियों के विषय में दयाभाव रखना। इस प्रकार इन गुणों से सहित और उपर्युक्त पच्चीस दोषों से रहित वह सम्यग्दर्शन मोक्षरूपी प्रासाद को प्रथम सीढी के समान है। इसीलिये उसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और तप इन चार आराधनाओं में प्रथम स्थान प्राप्त है ॥10॥

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+ सम्यक्त्व के आज्ञा आदि दस भेद -
आज्ञामार्गसमुद्भवमुपदेशात्सूत्रबीजसंक्षेपात्
विस्तारार्थाभ्यां भवमवपरमावादिगाढं च ॥११॥
अन्वयार्थ : वह सम्यग्दर्शन आज्ञासमुद्भव, मार्गसमुद्भव, उपदेशसमुद्भव, सूत्रसमुद्भव, बीजसमुद्भव, संक्षेपसमुद्भव, विस्तारसमुद्भव, अर्थसमुद्भव, अवगाढ और परमावगाढ; इस प्रकारसे दस प्रकारका है ॥११॥

भावार्थ :

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+ आज्ञा मार्ग और उपदेश सम्यक्त्व का स्वरूप -
आज्ञा सम्यक्त्वमुक्तं यदुत विरुचितं वीतरागाज्ञयैव
त्यक्तग्रन्थप्रपञ्चं शिवममृतपथं श्रद्दधन्मोहशान्तेः ।
मार्गश्रद्धानमाहुः पुरुषवरपुराणोपदेशोप जाता
या सज्ञानागमाब्धि प्रसुतिभिरुपदेशादिरादेशि दृष्टिः ॥१२॥
अन्वयार्थ : दर्शनमोह के उपशान्त होने से ग्रन्थश्रवण के बिना केवल वीतराग भगवान की आज्ञा से हो जो तत्त्वश्रद्धान उत्पन्न होता है उसे आज्ञासम्यक्त्व कहा गया है। दर्शनमोह का उपशम होने से ग्रन्थश्रवण के बिना जो कल्याणकारी मोक्ष मार्ग का श्रद्धान होता है उसे मार्गसम्यग्दर्शन कहते हैं। त्रेसठ शलाकापुरुषों के पुराण (वृत्तान्त) के उपदेश से जो सम्यग्दर्शन (तत्त्वश्रद्धान) उत्पन्न होता है उसे सम्यग्ज्ञान को उत्पन्न करने वाले आगमरूप समुद्र में प्रवीण गणधर देवादि ने उपदेश सम्यग्दर्शन कहा है ॥१२॥

भावार्थ :

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+ सूत्र, बीज और संक्षेप सम्यक्त्व का स्वरूप -
आकर्ण्याचारसूत्रम् मुनिचरणविधेः सूचनं श्रद्दधानः
सूक्तासौ सूत्रदृष्टिर्दुरधिगमगतेरर्थसार्थस्य बीजैः ।
कैश्चिज्जातोपलब्धेरसमशमवशाब्दीजदृष्टिः पदार्थान्
संक्षेपेणैव बुद्ध्वा रुचिमुपगतवान् साधु संक्षेपदृष्टिः ॥१३॥
अन्वयार्थ : मुनि के चरित्र (सकलचरित्र) के अनुष्ठान को सूचित करने वाले आचारसूत्र को सुनकर जो तत्त्वश्रद्धान होता है उसे उत्तम सूत्र सम्यग्दर्शन कहा गया है। जिन जीवादि पदार्थों के समूह का अथवा गणितादि विषयों का ज्ञान दुर्लभ है उनका किन्हीं बीजपदों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने वाले भव्य जीव के जो दर्शनमोहनीय के असाधारण उपशमवश तत्त्वश्रद्धान होता है उसे बीजसम्यग्दर्शन कहते हैं। जो भव्य जीव पदार्थों के स्वरूप को संक्षेप से ही जान करके तत्त्वश्रद्धानं (सम्यग्दर्शन) को प्राप्त हुआ है उसके उस सम्यग्दर्शनको संक्षेपसम्यग्दर्शन कहा जाता है ॥१३॥

भावार्थ :

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+ विस्तार, अर्थ, अवगाढ़ और परमावगाढ़ सम्यक्त्व का स्वरूप -
यः श्रुत्वा द्वादशाङगी कृतरुचिरथ तं विद्धि विस्तार दृष्टिम्
संजातार्थात्कुतश्चित्प्रवचनवचनान्यन्तरेणार्थदृष्टि:।
दृष्टिः साङ्गाङ्गबाह्यप्रवचनमवगाह्योत्थिता यावगाढा
कैवल्यालोकितार्थे रुचिरिह परमावादिगाढेति रूढा ॥१४॥
अन्वयार्थ : जो भव्य जीव बारह अंगोंको सुनकर तत्त्वश्रद्धानी हो जाता है उसे विस्तार सम्यग्दर्शन से युक्त जानो, अर्थात् द्वादशांग के सुनने से जो तत्त्वश्रद्धान होता है उसे विस्तारसम्यग्दर्शन कहते हैं। अंगबाह्य आगमों के पढने के बिना भी उनमें प्रतिपादित किसी पदार्थ के निमित्त से जो अर्थश्रद्धान होता है अर्थसम्यग्दर्शन कहलाता है। अंगों के साथ अंगबाह्य श्रुत का अवगाहन करके जो सम्यग्दर्शन उत्पन्न होता है उसे अवगाढ सम्यग्दर्शन कहते हैं। केवलज्ञान के द्वारा देखे गये पदार्थों के विषय में रुचि होती है वह यहां परमावगाढसम्यग्दर्शन इस नाम से प्रसिद्ध है ॥१४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- श्लोक 12, 13 और 14 में सम्यग्दर्शन के जिन दस भेदों का स्वरूप निर्दिष्ट किया गया है वे प्रायः उत्तरोत्तर विकास को प्राप्त हुए हैं। यथा- प्रथम आज्ञासम्यक्त्व में जीव शास्त्राभ्यास के बिना केवल सर्वज्ञ वीतराग देव की आज्ञा पर ही विश्वास करता है। उसे यह निश्चल श्रद्धान होता है कि जिनेन्द्र देव चूंकि सर्वज्ञ और वीतराग (राग-द्वेषरहित) हैं अतएव वे अन्यथा उपदेश नहीं दे सकते हैं, उन्होंने जो तत्त्व का स्वरूप बतलाया है वह सर्वथा ठीक है। दूसरे मार्गसम्यग्दर्शन में भी जीव के आगम का अभ्यास नहीं होता । वह केवल सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्रस्वरूप मोक्षमार्ग को कल्याणकारी समझकर उस पर श्रद्धान करता है। तीसरे उपदेशसम्यग्दर्शन में प्राणी प्रथमानुयोग में वर्णित तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, प्रतिनारायण एवं बलभद्र आदि महापुरुषों के चारित्र को सुनकर और उससे पुण्य-पाप के फल को विचारकर तत्त्वश्रद्धान करता है। चौथे सूत्रसम्यग्दर्शन में जीव चरणानुयोग में वर्णित मुनियों के चारित्र को सुनकर तत्त्वरूचि को उत्पन्न करता है । पांचवें बीजसम्यग्दर्शन में करणानुयोग से सम्बद्ध गणित आदि की प्रधानता से वर्णित जिन दुर्गम तत्त्वों का ज्ञान सर्वसाधारण के लिये दुर्लभ होता है उसे जीव किन्हीं बीजपदों के निमित्त से प्राप्त करके तत्त्वश्रद्धान करता है । छठे संक्षेपसम्यग्दर्शन में द्रव्यानुयोग में तर्क को प्रधानता से वर्णित जीवा-जीवादि पदार्थों को संक्षेप से जानकर प्राणी तत्त्वरुचि को प्राप्त होता है। सातवे विस्तारसम्यग्दर्शन में जीव द्वादशांगश्रुत को सुनकर तत्त्वश्रद्धानी बनता है। आठवें अर्थसम्यग्दर्शन में विशिष्ट क्षयोपशम से सम्पन्न जीव श्रुत के सुनने के बिना ही उसमें प्ररूपित किसी अर्थविशेष से तत्वश्रद्धानी होता है। नौवें अवगाढसम्यग्दर्शन में अंगप्रविष्ट और अंगबाह्य दोनों ही प्रकार के श्रुत को ज्ञात करके जीव दृढश्रद्धानी बनता है। यह सम्यग्दर्शन श्रुतकेवली के होता है। अन्तिम परमावगाढसम्यग्दर्शन सचराचर विश्व को प्रत्यक्ष देखनेवाले केवली भगवान के होता है॥१४॥

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+ सम्यग्दर्शन से ही मंदकषाय, शास्त्रज्ञान, चारित्र और तप की पूज्यता -
शमबोधवृत्ततपसां पाषाणस्येव गौरवं पुंसः ।
पूज्यं महामणेरिव तदेव सम्यक्त्वसंयुक्तम् ॥१५॥
अन्वयार्थ : पुरुष के सम्यक्त्व से रहित शान्ति, ज्ञान, चारित्र और तप इनका महत्त्व पत्थर के भारीपन के समान व्यर्थ है। परन्तु वही उनका महत्त्व यदि सम्यक्त्व से सहित है तो वह मूल्यवान् मणि के महत्व के समान पूजनीय है॥१५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- साधारण पाषाण और मणिरूप पाषाण ये दोनों यद्यपि पाषाणस्वरूपसे समान हैं, फिर भी गुण की अपेक्षा उन दोनों में महान् अन्तर है । कारण कि यदि किसी मनुष्य के पास विशाल भी साधारण पाषाण हो तो उससे उसका कोई भी अभीष्ट सिद्ध होने वाला नहीं है, बल्कि वह उसके लिये भारभूत (कष्टप्रद) ही बना रहता है। किन्तु जिसके पास वह मणिरूप पाषाण है वह उससे अपने अभीष्ट प्रयोजन को अवश्य सिद्ध कर लेता है। कारण कि उसका मूल्य बहुत अधिक है । इससे उसकी जनसमुदायमें प्रतिष्ठा भी अधिक होती है । ठीक इसी प्रकार से जो जीव सम्यग्दर्शन से रहित है वह भले ही शान्ति, ज्ञान, चारित्र एवं तप का भी आचरण क्यों न करे; किन्तु इससे वह कल्याण के मार्ग में नहीं प्रवृत्त हो पाता है । कारण कि सम्यग्दर्शन के बिना उक्त शान्ति आदि का कोई मूल्य नहीं होता। किन्तु मणि के समान बहुमूल्य सम्यग्दर्शन को प्राप्त कर लेने पर उन सब शान्ति आदि का महत्त्व बढ जाता है। उस समय वे प्राणी को मोक्षमार्ग में प्रवृत्त करके शाश्वतिक सुख की प्राप्ति में सहायक हो जाते हैं । अतएव उक्त शान्ति आदि की अपेक्षा सम्यग्दर्शन ही विशेष पूज्य है ॥१५॥

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+ सुकुमार (सरल) क्रिया करने का उपदेश -
मिथ्यात्वातङ्कवतो हिताहितप्राप्त्यनाप्तिमुग्धस्य ।
बालस्येव तवेयं सुकुमारैव क्रिया क्रियते ॥१६॥
अन्वयार्थ : मिथ्यात्वरूप रोग से सहित होकर हित की प्राप्ति और अहित के परिहार को न समझ सकने वाले बालक के समान तेरे लिये यह सम्यक्त्वआराधनारूप सरल चिकित्सा की जाती है ॥१६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार कठिन रोग से ग्रस्त हुआ बालक अपने हित-अहित को न समझ सकने के कारण जब उस रोग को नष्ट करनेवाली किसी तीक्ष्ण औषधि को नहीं लेना चाहता है तब चतुर वैद्य बताशा आदि में औषधि को रखकर अथवा वस्त्र आदि में उसका प्रयोग करके सरलता से उसकी चिकित्सा करता है। उसी प्रकार मिथ्यात्वरूप रोग से ग्रस्त हुआ प्राणी जब अपने हित-अहित का विवेक न होनेसे दुद्धर तपश्चरण आदि में असमर्थ होता है तब उसके हित को चाहने वाला गुरु सर्व प्रथम उसके लिये इस सम्यक्त्व आराधना का उपदेश करता है। कारण कि इसका वह सरलता से आराधना कर सकता है। इसके अतिरिक्त वह (सम्यक्त्व) आगे की क्रियाओं (संयम व तप आदि) का मूल कारण भी है ॥१६॥

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+ अणुव्रत ग्रहण करने की प्रेरणा -
विषयविषभाशनोत्थितमोहज्वरजनिततीव्रतृष्णस्य।
निःशक्तिकस्य भवतः प्रायः पेयाधुपक्रमः श्रेयान् ॥१७॥
अन्वयार्थ : विषयरूप विषम भोजन से उत्पन्न हुए मोहरूप ज्वर के निमित्त से जो तीव्र तृष्णा (विषयाकांक्षा और प्यास) से सहित है तथा जिसकी शक्ति उत्तरोत्तर क्षीण हो रही है ऐसे तेरे लिये प्रायः पेय (पीने के योग्य सुपाच्य फलों का रस आदि तथा अणुव्रत आदि) आदि की चिकित्सा अधिक श्रेष्ठ होगी॥१७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यदि कोई मनुष्य प्रकृति के विरुद्ध अथवा मात्रा से अधिक भोजन करने के कारण ज्वर आदि से पीडित होकर तीव्र प्यास से व्याकुल होता है तो ऐसी अवस्था में चतुर वैद्य उसकी शारीरिक शक्तिको क्षीण होती हुई देखकर समुचित औषधि के साथ उसके लिये पीने के योग्य फलों के रस या दूध आदिरूप सुपाच्य भोजन की व्यवस्था करता है। कारण कि स्निग्ध व गरिष्ठ भोजन से उसका उक्त रोग कम न होकर और भी अधिक बढ़ सकता है। इस विधि से उसका रोग सरलता से दूर हो जाता है । ठीक इसी प्रकार से जो प्राणी इन्द्रियविषयों में मुग्ध होकर उस विषयतृष्णा से अतिशय व्याकुल हो रहा है तथा इसीलिये जिसकी स्वाभाविक आत्मशक्ति क्षीणता को प्राप्त हो रही है उसके लिये सद्गुरु प्रथमतः अणुव्रत आदि के परिपालन का जिनका परिपालन वह सरलता से कर सकता है- उपदेश करता है। कारण कि वैसी अवस्था में यदि उसे महाव्रतों के धारण करने का उपदेश दिया गया और तदनुसार उसने उन्हें ग्रहण भी कर लिया, परन्तु आत्मशक्ति के न रहने से यदि वह उनका परिपालन न कर सका तो इससे उसका और भी अधिक अहित हो सकता है । अतएव उस समय उसके लिये अणुव्रतों का उपदेश ही अधिक कल्याणकारी होता है ॥१७॥

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+ संसार के सभी प्राणियों को धर्म करने का उपदेश -
सुखितस्य दुःखितस्य च संसारे धर्म एव तव कार्यः ।
सुखितस्य तदभिवृद्धयै दुःखभुजस्तदुपघाताय ॥१८॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! तू चाहे सुख का अनुभव कर रहा हो और चाहे दुख का, किन्तु संसार में इन दोनों ही अवस्थाओं में तेरा एक मात्र कार्य धर्म ही होना चाहिये । कारण यह है कि वह धर्म यदि तू सुख का अनुभव कर रहा है तो तेरे उस सुख की वृद्धि का कारण होगा, और यदि तू दुख का अनुभव कर रहा है तो वह धर्म तेरे उस दुख के विनाश का कारण होगा॥१८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो प्राणियों के दुख को दूर करके उन्हें उत्तम सुख में धारण कराता है वही धर्म कहलाता है। इससे धर्म के दो प्रयोजन सिद्ध होते हैं- दुख को दूर करना और सुख को प्राप्त कराना। इसीलिये यहां यह उपदेश दिया गया है कि प्राणियों को चाहे तो वे सुखी हों और चाहे दुखी, दोनों ही अवस्था में उन्हें धर्म का आचरण करना चाहिये। कारण कि यदि वे सुखी हैं तो इससे उनका वह सुख और भी वृद्धिंगत होगा, और यदि वे दुखी हैं तो इससे उनके उस दुख का विनाश होगा ॥१८॥

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+ विषय सुख भोगते हुए भी धर्म की रक्षा करने की प्रेरणा -
धर्मारामतरूणां फलानि सर्वेन्द्रियार्थसौख्यानि ।
संरक्ष्य तांस्ततस्तान्युञ्चिनु यैस्तैरुपायैस्त्वम् ॥१९॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियविषयों के सेवन से उत्पन्न होने वाले सब सुख इस धर्मरूप उद्यान में स्थित वृक्षों (क्षमा-मार्दवादि) के ही फल हैं । इसलिये हे भव्य जीव ! तू जिन किन्हीं उपायों से उन धर्मरूप उद्यान के वृक्षों की भले प्रकार रक्षा करके उनसे उपर्युक्त इन्द्रियविषयजन्य सुखों रूप फलों का संचय कर ॥१९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- ऊपर श्लोक 18 में जो धर्म को सुख का कारण और दुख का विनाशक बतलाया गया है उसमें यह आशंका हो सकती थी कि जब धर्म प्रत्यक्ष में सुख का विघातक है, तब उसे यहाँ सुख का कारण किस प्रकार कहा? कारण कि धर्माचरण में विषयभोगों के अनुभव से प्राप्त होने वाले सुख को छोडकर अनशनादिजनित दुख को ही सहना पडता है । इस आशंका के निराकरणार्थ यहां यह बतलाया है कि जिस प्रकार अंगूर, सेब एवं आम आदि उत्तम फलों की इच्छा करने वाला मनुष्य प्रथमतः कुछ कष्ट सहकर भी उन फलों को उत्पन्न करने वाले वृक्षों का जलसिंचना के द्वारा परिवर्धन एवं संरक्षण करता है, तत्पश्चात् वह समयानुसार उनसे अभीष्ट फलों को प्राप्त करके अतिशय आनन्द का उपभोग करता है । यदि वह पहिले जलसिंचनादि के कष्ट से डरकर उन वृक्षों का परिवर्धन और संरक्षण न करता तो उसे उन अभीष्ट फलों का प्राप्त होना असंभव ही था। ठीक इसी प्रकार से वर्तमान में जो इन्द्रियविषयभोगजनित सुख प्राप्त हो रहा है वह पूर्वकृत धर्म का ही परिणाम है । अतएव आगे भी यदि उक्त सुख को स्थिर रखना है तो उसके कारणभूत धर्म का आचरण अवश्य ही करना चाहिये । इससे वह धर्म फलीभूत होकर भविष्य में भी उक्त इन्द्रियविषयजनित सुखरूप फलों को स्थिर रखेगा, अन्यथा भविष्य में उससे रहित होकर दुख का अनुभव करना अनिवार्य होगा ॥१९॥

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+ धर्माचरण से सुख भंग होने के भय का निराकरण -
धर्मः सुखस्य हेतुर्हेतुर्न विराधकः स्वकार्यस्य ।
तस्मात्सुखभङ्गभिया माभूधर्मस्य विमुखस्त्वम् ॥२०॥
अन्वयार्थ : धर्म सुख का कारण है और कारण कुछ अपने कार्य का विरोधी होता नहीं है। इसलिये तू सुखनाश के भय से धर्म से विमुख न हो॥२०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- धर्म के आचरण में विषयसुख का विनाश होता है, इसी आशंका का निराकरण करते हुए और भी यहां यह बतलाया है कि जब धर्म सुख का कारण है तब वह उस सुख का विघातक नहीं हो सकता है। यदि कारण ही अपने कार्य का विरोधी बन जाय तो फिर कार्य-कारणभाव को नियम व्यवस्था भी कैसे बन सकेगी? नहीं बन सकेगी । इस प्रकार से तो समस्त लोकव्यवहार का ही विरोध हो जावेगा। इसलिये धर्म से सुख का विनाश होता है, यह कल्पना भ्रमपूर्ण है ॥२०॥

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+ कृषक के उदाहरण से धर्म रक्षा की प्रेरणा -
धर्मादवाप्तविभवो धर्म प्रतिपाल्य भोगमनुभवतु।
बीजादवाप्तधान्यः कृषीवलस्तस्य बीजमिव॥२१॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार किसान बीज से उत्पन्न धान्य (गेहूं व चावल आदि) को प्राप्त करता हुआ उसमें से भविष्य के लिये कुछ बीज के निमित्त सुरक्षित रखकर ही उसका उपभोग करता है उसी प्रकार हे भव्य जीव ! तूने जो यह सुख-सम्पत्ति प्राप्त की है वह धर्म के ही निमित्त से प्राप्त की है, इसलिये तू भी उक्त सुखसम्पत्ति के बीजभूत उस धर्म का रक्षण करके ही उसका उपभोग कर ॥२१॥

भावार्थ :

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+ धर्म का फल बिना मांगे ही -
संकल्प्यं कल्पवृक्षस्य चिन्त्यं चिन्तामणेरपि ।
असंकल्प्यमसंचिन्त्यं फलं धर्मादवाप्यते ॥२२॥
अन्वयार्थ : कल्पवृक्ष का फल संकल्प (प्रार्थना) के अनुसार प्राप्त होता है तथा चिन्तामणि का भी फल चिन्ता (मनकृत विचार) के अनुसार प्राप्त होता है, परन्तु धर्म से जो फल प्राप्त होता है वह अप्रार्थित एवं अचिन्त्य ही प्राप्त होता है ॥२२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में कल्पवृक्ष और चिन्तामणि अभीष्ट फल के देने वाले माने जाते हैं । परन्तु कल्पवृक्ष जहाँ वचन द्वारा की गई प्रार्थना के अनुसार अभीष्ट फल देता है वहां चिन्तामणि मन की कल्पना के अनुसार वह फल देता है । किन्तु धर्म एक ऐसा अपूर्व पदार्थ है कि जिससे अभीष्ट फल प्राप्ति के लिये न किसी प्रकार की याचना करनी पड़ती है और न मन में कल्पना भी। तात्पर्य यह कि धर्म का आचरण करने से प्राणी को स्वयमेव ही अभीष्ट सुख प्राप्त होता है। जैसे यदि मनुष्य सघन वृक्ष के नीचे पहुंचता है तो उसे उसकी छाया स्वयमेव प्राप्त होती है,उसके लिये वृक्ष से कुछ याचना आदि नहीं करनी पडती॥२२॥

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+ आत्मा के परिणामों से ही पुण्यऔर पाप की उत्पत्ति -
परिणाममेव कारणमाहुः खलु पुण्यपापयोः प्राज्ञाः।
तस्मात् पापापचयः पुण्योपचयश्च सुविधेयः ॥२३॥
अन्वयार्थ : विद्वान् मनुष्य निश्चय से आत्मपरिणाम को ही पुण्य और पाप का कारण बतलाते हैं। इसलिये अपने निर्मल परिणाम के द्वारा पूर्वसंचित पाप की निर्जरा, नवीन पाप का निरोध और पुण्य का उपार्जन करना चाहिये॥२३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- 'शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य' (तत्त्वा. 6-3) इस सूत्र में आचार्यप्रवर श्री उमास्वामी ने यह बतलाया है कि शुभ योग पुण्य तथा अशुभ योग पाप के आस्रवका कारण है। यहां शुभ परिणाम से उत्पन्न मन, वचन एवं काय की प्रवृत्ति को शुभ योग तथा अशुभ परिणाम से उत्पन्न मन, वचन एवं काय की प्रवृत्ति को अशुभ योग समझना चाहिये। इस प्रकार जब पुण्य का कारण अपना ही शुभ परिणाम तथा पाप का कारण भी अपना ही अशुभ परिणाम ठहरता है तब आत्महित की अभिलाषा करने वाले भव्य जीवों को अपने परिणाम सदा निर्मल रखने चाहिये, जिससे कि उनके पुण्य का संचय और पूर्वसंचित पाप का विनाश होता रहे ॥२३॥

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+ धर्म संचय न करनेवालों की निन्‍दा -
कृत्वा धर्मविघातं विषयसुखान्यनुभवन्ति ये मोहात् ।
आच्छिद्य तरून् मूलात् फलानि गृण्हन्ति ते पापाः॥२४॥
अन्वयार्थ : जो प्राणी अज्ञानता से धर्म को नष्ट करके विषयसुखों का अनुभव करते हैं वे पापी वृक्षों को जड से उखाडकर फलों को ग्रहण करना चाहते हैं ॥२४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार उत्तम फलों को चाहनेवाला मनुष्य उन फलों को उत्पन्न करने वाले वृक्षों को जड-मूल से उखाडकर कभी उन अभीष्ट फलों को नहीं प्राप्त कर सकता है उसी प्रकार विषयसुख की अभिलाषा करने वाले प्राणी भी उस सुख के कारणभूत धर्म को नष्ट करके कभी उक्त विषयसुख को नहीं प्राप्त कर सकते हैं। इसलिये यदि विषयसुख की अभिलाषा है तो उसके कारणभूत धर्म का रक्षण अवश्य करना चाहिये ॥२४॥

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+ विषय सुख भोगते हुए भी धर्मोपार्जन सम्भव है -
कर्तृत्वहेतुकर्तृत्वानुमतेः स्मरणचरणवचनेषु ।
यः सर्वथाभिगम्यः स कथं धर्मो न संग्राह्यः ॥२५॥
अन्वयार्थ : जो धर्म मन से स्मरण, शरीर के द्वारा आचरण तथा वचनकृत उपदेश को विषय करनेवाले कर्तृत्व (कृत), हेतुकर्तृत्व (प्रेरणा-कारित) और अनुमोदन के द्वारा सब प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है उस धर्म का संग्रह कैसे नहीं करना चाहिये ? अर्थात् सब प्रकारसे उसका संग्रह अवश्य करना चाहिये॥२५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो भी शुभ अथवा अशुभ कार्य स्वयं किया जाता है वह कृत, जो दूसरों के द्वारा प्रेरणापूर्वक कराया जाता है वह कारित, तथा दूसरों के द्वारा किये जाने पर जिसकी स्वयं प्रशंसा की जाती है वह अनुमत कहा जाता है। ये तीनों ही मन, वचन और काय से सम्बन्ध रखते हैं। यथा- मनकृत, मनकारित, मनानुमत, वचनकृत वचनकारित, वचनानुमत, कायकृत, कायकारित और कायानुमत । इस तरह चूंकि इन नौ प्रकारों से सुखप्रद धर्म का संग्रह भले प्रकार किया जा सकता है अतएव सुखाभिलाषी प्राणियों को उक्त प्रकार से उस धर्म का संग्रह करना चाहिये, यही उपदेश यहां दिया गया है ॥२५॥

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+ धर्म का फल -
धर्मो वसेन्मनसि यावदलं स ताव
द्धन्ता न हन्तुरपि पश्य गतेऽथ तस्मिन् ।
दृष्टा परस्परहतिर्जनकात्मजानां
रक्षा ततोऽस्य जगतः खलु धर्म एव॥२६॥
अन्वयार्थ : देखो, जब तक वह धर्म मन में अतिशय निवास करता है तब तक प्राणी अपने मारने वाले का भी घात नहीं करता है। और जब वह धर्म मन में से निकल जाता है तब पिता और पुत्र का भी परस्पर में घात देखा जाता है। इसलिये इस विश्व की रक्षा उस धर्म के रहने पर ही हो सकती है ॥२६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- धर्मका स्वरूप दया है। वह धर्म जिसके हृदय में स्थित रहता है वह दूसरों की तो बात ही क्या है, किन्तु अपने घातक का भी अनिष्ट नहीं करता है । जैसे- यदि कोई दुष्ट जन किसी अहिंसा महाव्रत के धारक साधु के लिये गाली देता है या प्राणहरण भी करता है तो भी वह अपने उस घातक का प्रतीकार नहीं करता, प्रत्युत इसके विपरीत वह उसके हित का ही चिन्तन करता है। वह सोचता है कि यह बिचारा अज्ञानी प्राणी अज्ञानवश कुमार्ग में प्रवृत्त हो रहा है, वह कब कुमार्ग को छोडकर सन्मार्ग में प्रवृत्त होगा, आदि। इसके विपरीत जिसके हृदय में वह दयामय धर्म नहीं रहता है वह और की तो बात क्या, किन्तु अपने पिता और पुत्र का भी घात कर डालता है। ऐसे उदाहरण देखने व सुनने में जब तब आते ही रहते हैं । इससे यही सिद्ध होता है कि विश्व का कल्याण करने वाला यदि कोई है तो वह एक धर्म ही हो सकता है ॥२६॥

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+ धर्म का घात करने से पाप होता है -
न सुखानुभवात् पापं पापं तद्धेतुघातकारम्भात् ।
नाजीर्णम् मिष्टान्नान्ननु तन्मात्राद्यतिक्रमणात् ॥२७॥
अन्वयार्थ : पाप सुख के अनुभव से नहीं होता है, किन्तु वह उपर्युक्त धर्म के हेतुभूत अहिंसा आदि को नष्ट करने वाले प्राणिवधादि के आरम्भ से होता है । ठीक ही है- अजीर्ण कुछ मिष्टान्न के खाने से नहीं होता है, किन्तु वह निश्चय से उसके प्रमाण के अतिक्रमण से ही होता है ॥२७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार स्वाद के निमित्त परिमित मिष्टान्न आदि के खाने से कभी अजीर्ण नहीं होता, किन्तु वह जिह्वालम्पट होकर उसे अधिक प्रमाण में खाने पर ही- होता है; उसी प्रकार विषयसुख के अनुभव मात्र से कुछ पाप नहीं होता, किन्तु वह उस सुख की प्राप्ति के निमित्त अन्याय आचरण करने से- जैसे प्राणिहत्या, असत्यभाषण, चोरी, परस्त्री या वेश्या का सेवन अथवा अत्यासक्ति से स्वस्त्री का भी सेवन और तृष्णा की अधिकता आदि से- होता है। यदि प्राणी पूर्वकृत धर्म के प्रभाव से प्राप्त हुई सामग्री में ही सन्तोष रखकर धर्म का घात न करता हुआ अनासक्तिपूर्वक उस विषयसुख का अनुभव करता है तो इससे वह पाप से विशेष लिप्त नहीं होता है । इसके लिये असाधारण वैभव का उपभोग करने वाले भरत चक्रवर्ती आदि के उदाहरण भी पुराणों में देखे ही जाते हैं । यही तो सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि के आचरण में भेद है । कारण कि चारित्रमोह के उदय से इन्द्रिजन्य सुख के भोगने में वे दोनों ही समानरूप से प्रवृत्त होते हैं, फिर भी विशेषता उनमें यही है कि एक (सम्यग्दृष्टि) तो हेय-उपादेय के विवेकपूर्वक उसमें अनासक्ति से प्रवृत्त होता है जब कि दूसरा उक्त विवेक को छोडकर अत्यासक्ति के साथ ही उसमें प्रवृत्त होता है। इसलिए यह नहीं समझना चाहिये कि विषयसुख का अनुभव करते हुए प्राणी के केवल पाप ही होता है और धर्म नहीं होता ॥२७॥

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+ शिकारादि कार्य प्रत्यक्ष दुःख के कारण -
अप्येतन्मृगयादिकं यदि तव प्रत्यक्षदुःखास्पदं
पापराचरितं पुरातिमयदं सौख्याय संकल्पतः ।
संकल्पं तमनुज्झितेन्द्रियसुखैरासेविते धीधनै:
धर्म्ये कर्मणि किं करोति न भवाँल्लोकद्वयश्रेयसि॥२८॥
अन्वयार्थ : हे भव्य जीव ! जो शिकार आदि व्यसन प्रत्यक्ष में ही दुख के स्थानभूत हैं, जिनमें पापी जीव ही प्रवृत्त होते हैं, तथा जो परभव में दुखदायक होने से अतिशय भयानक हैं; वे भी यदि संकल्प मात्र से तेरे सुख के लिये हो सकते हैं तो फिर विवेकी जन इन्द्रियसुख को न छोडकर जिस धर्मयुक्त आचरण को करते हैं तथा जो दोनों ही लोकों में कल्याणकारक है उस धर्ममय आचरण में तू उक्त संकल्प को क्यों नहीं करता है ? अर्थात् उसमें ही तुझे सुख की कल्पना करना चाहिये ॥२८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- सुख और दुख वास्तव में अपने मन की कल्पना के ऊपर निर्भर हैं। इस कल्पना के अनुसार प्राणी जिन पदार्थों को इष्ट समझता है उनकी प्राप्ति में वह सुख तथा उनकी अप्राप्ति में दुख का अनुभव करता है। उसी प्रकार जिन पदार्थों को उसने अनिष्ट समझ रक्खा है उनके संयोग में वह दुखी तथा वियोग में सुखी होता है । परन्तु यथार्थ में यदि विचार किया जाय तो कोई भी वस्तु न तो सर्वथा इष्ट है और न सर्वथा अनिष्ट भी। उदाहरण के रूप में एक ही समय में जहाँ किसी एक के घर पर इष्ट सम्बन्धी का मरण होता है वहीं दूसरे के घर पर पुत्रविवाहादि का उत्सव भी संपन्न होता है। अब जिसके यहां इष्टवियोग हुआ है वह उस एक ही मुहूर्त को अनिष्ट कहकर रुदन करता है और दूसरा उसे ही शुभ घडी मानकर अतिशय आनन्द का अनुभव करता है । इससे निश्चित प्रतीत होता है कि जिस प्रकार वह घडी (मुहूर्त) वास्तव में इष्ट और अनिष्ट नहीं है उसी प्रकार कोई भी बाह्य पदार्थ स्वरूप से इष्ट और अनिष्ट नहीं हो सकता है । उन्हें केवल कल्पना से ही प्राणी इष्ट व अनिष्ट समझने लगते हैं। प्रकृत में जिन शिकार आदि दुष्कृत्यों में प्रत्यक्ष में ही प्राणिवियोगादिजन्य दुख देखा जाता है उनके सम्पन्न होने पर शिकारी जन सुख की कल्पना करते हैं। पर भला विचार तो कीजिये कि दूसरे दीन प्राणियों को कष्ट पहुंचाने वाले वे कार्य क्या यथार्थ में सुख कारक हो सकते हैं ? नहीं हो सकते। इसीलिये यहां यह उपदेश दिया गया है कि जब सुख और दुख कल्पना के ऊपर ही निर्भर हैं तब विवेकी जन को उभय लोकों में कष्ट देने वाले उन प्राणिवधादिरूप दुष्कार्यों में सुख की कल्पना न करके जो अहिंसा एवं सत्य संभाषणादि उत्तम कार्य उभय लोकों में सुखदायक हैं तथा जिनकी सबके द्वारा प्रशंसा की जाती है उनमें ही सुख की कल्पना करके प्रवृत्त होना चाहिये ॥२८॥

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+ शिकार आदि में आसक्ति अत्यन्त निर्दयता -
भीतमूर्तीर्गतत्राणा निर्दोषा देहवित्तकाः।
दन्तलग्नतृणा घ्नन्ति मृगीरन्येषु का कथा॥२९॥
अन्वयार्थ : जिन हिरणियों का शरीर सदा भय से कांपता रहता है, जिनका वन में कोई रक्षक नहीं है, जो किसी का अपराध (अनिष्ट) नहीं करती हैं, जिनके एक मात्र अपने शरीर को छोडकर दूसरा कोई धन नहीं है, तथा जो दांतो के बीच में अटके हुए तृणों को धारण करती हैं; ऐसी हिरणियों का भी घात करने से जब शिकारी जन नहीं चूकते हैं तब भला दूसरे (सापराध) प्राणियों के विषय में क्या कहा जा सकता है ? अर्थात् उनका घात तो वे करेंगे ही ॥२९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह प्रायः लोक में प्रसिद्ध ही है कि सच्चे शूर-वीर युद्धनीति के अनुसार ऐसे किसी भी प्राणी के ऊपर शस्त्र का प्रहार नहीं करते हैं जो कि कायरता को प्रगट कर रहा हो, अरक्षित हो, निरपराध हो सैन्य व शस्त्रादि से रहित हो, अथवा दातों में तृणों को धारण करके अपने पराजय को प्रकट कर रहा हो। इसके अतिरिक्त वे स्त्रियों और बालकों का घात तो किसी भी अवस्थामें नहीं करते हैं। परंतु खेद है कि शिकारी जन का वह कार्य इससे सर्वथा विपरीत होता है- जहां वीर पुरुष उपयुक्त अवस्थाओं में से किसी एक ही अवस्था के होने पर प्राणी का घात नहीं करते हैं. वहां शिकारी जन हिरणियों में उन सभी अवस्थाओं (कायरता, अरक्षितता, निरपराधता, शस्त्रादिहीनता, दन्तस्थतृणता और स्त्रीत्व) के रहने पर उनका निर्दयता से घात करते हैं । ऐसी अवस्था में वे अन्य सापराध प्राणियों का घात किये बिना भला कैसे रह सकते हैं? अतएव उनका कार्य सर्वथा निन्दनीय तो है ही, साथ में वह उभय लोकों में उन्हे दुःख देनेवाला भी है ॥२९॥

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+ झूठ और चोरी के त्याग की प्रेरणा -
पैशुन्यदैन्यदम्भस्तेयानृतपातकादिपरिहारात।
लोकद्वयहितमर्जय धर्मार्थयश:सुखायार्थम् ॥३०॥
अन्वयार्थ : हे भव्य जीव ! तू परनिन्दा दीनता, छल-कपट, चोरी और असत्य भाषण आदि पापों को छोडकर उनके प्रतिपक्षभूत सत्यसंभाषण एवं अचौर्य व्रतों को-जो दोनों ही लोक में हितकारक हैं- धारण कर। कारण कि ये सबके लिये धर्म, धान, कीर्ति और सुख के कारणभूत हैं ॥३०॥

भावार्थ :

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+ पुण्यशालियों को उपसर्ग भी दुःखदायक नहीं -
पुण्यं कुरुष्व कृतपुण्यमनीदृशोऽपि
नोपद्रवोऽभिभवति प्रभवेच्च भूत्यै ।
संतापयञ्जगदशेषमशीतरश्मिः
पद्मेषु पश्य विदधात्रि विकाशलक्ष्मीम्॥३१॥
अन्वयार्थ : हे भव्य जीव ! तू पुण्य कार्य को कर, क्योंकि पुण्यवान् प्राणी के ऊपर असाधारण भी उपद्रव कुछ प्रभाव नहीं डाल सकता है। इतना ही नहीं बल्कि वह उपद्रव भी उसके लिये सम्पत्ति का साधन बन जाता है। देखो, समस्त संसार को संतप्त करने वाला भी सूर्य कमलों में विकासरूप लक्ष्मी को ही करता है ॥३१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार सूर्य दूसरों को संतापकारक भले ही हो, किन्तु वह कमलों को तो प्रफुल्लित ही करता है, उसी प्रकार जो उपद्रव अन्य पापी प्राणियों के लिये कष्टदायक होता है वही पुण्यात्मा जीवों के लिये सुख का साधन बन जाता है । देखो, अग्नि प्राणघातक है यह सब ही अनुभव करते हैं, परन्तु वह प्रज्वलित भयानक अग्नि भी सीता महासती के लिये जलरूप परिणत हो गई थी। यह सब उस पुण्य का ही प्रभाव है । इसीलिये सुख की अभिलाषा करने वाले भव्य जीवों के लिये पाप कार्यों को छोडकर सदा पुण्य कार्यों में प्रवृत्त होना चाहिये ॥३१॥

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+ पुण्योदय बिना पुरुषार्थ भी कार्यकारी नहीं -
नेता यत्र बृहस्पतिः प्रहरणं वज्रं सुराः सैनिकाः
स्वर्गौ दुर्यमनुग्रहः खलु हरेरैरावणो वारणः ।
इत्याश्चर्यबलान्वितोऽपि बलभिद्भग्नः परैः सङ्गरे
तद्वयक्तं ननु दैवमेव शरणं धिग्धिग्वृथा पौरुषम् ॥३२॥
अन्वयार्थ : जिसका मंत्री बृहस्पति था, शस्त्र वज्र था, सैनिक देव थे, दुर्ग (किला) स्वर्ग था, हाथी ऐरावण था, तथा जिसके ऊपर विष्णु का अनुग्रह (सहायता) था; इसप्रकार अद्भुत बल से संयुक्त भी वह इन्द्र युद्ध में दैत्यों (अथवा रावण आदि) द्वारा पराजित हुआ है । इसीलिये यह स्पष्ट है कि निश्चय से दैव (भाग्य) ही प्राणी का रक्षक है। पुरुषार्थ व्यर्थ है, उसके लिये बारम्बार धिक्कार हो ॥३२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- इससे पूर्व के श्लोक में पुण्य को प्रधान बतलाकर उसको उपजित करने की प्रेरणा की गई है । इस पर शंका उपस्थित हो सकती थी कि शत्रु आदि के द्वारा जो उपद्रव आरम्भ किया जाता है उसे पुरुषार्थ के बल पर ही नष्ट किया जा सकता है, न कि दैव के ऊपर निर्भर रहते हुए अकर्मण्य बनकर । इसलिये अनुभवसिद्ध पुरुषार्थ को छोडकर अदृष्ट दैव के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है। इस आशंका को ध्यान में रखकर यहां इन्द्र का उदाहरण देते हुए यह बतलाया है कि देखो जो इन्द्र बृहस्पति आदिरूप असाधारण साधन सामग्री से सम्पन्न था वह भी मनुष्य कहे जाने वाले रावण आदि के द्वारा पराजित किया गया है (प. च. पर्व १२) । यदि पुरुषार्थ ही कार्य सिद्ध का कारण होता तो वह देवों का अधीश्वर कहा जानेवाला इन्द्र रावण आदि पुरूषों के द्वारा कभी पराजित नहीं हो सकता था, क्योंकि, उसका पुरुषार्थ असाधारण था। परन्तु वह पराजित अवश्य हुआ है। इससे यह सिद्ध होता है कि देव के आगे पुरुषार्थ कुछ कार्यकारी नहीं है। यह उन लोगों को लक्ष्य करके कथन किया गया है जो सर्वथा देव की उपेक्षा करके केवल पुरुषार्थ के बल पर ही कार्यसिद्धि करना चाहते हैं । वास्तव में यदि विचार किया जाय तो सर्वथा पुरुषार्थ के द्वारा कार्य की सम्भावना नहीं दिखती । कारण कि हम देखते हैं कि समानरूप से पुरुषार्थ करने वाले अनेक व्यक्तियों में कुछ यदि सफलता को प्राप्त करते हैं तो कुछ विफलता को भी। एक ही कक्षा में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों में कुछ तो गुरु के द्वारा उपदिष्ट तत्त्व को शीघ्रता से ही ग्रहण करते हैं, कुछ उसे धीरे धीरे समझने में समर्थ होते हैं, और कुछ प्रयत्न करते हुए भी उसे ग्रहण करने में असमर्थ ही रहते हैं। इसी प्रकार उनके परीक्षा में बैठने पर जिनके प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की आशा की जाती थी वे अनुत्तीर्ण होते हुए देखे जाते हैं तथा जिनके उत्तीर्ण होने की सम्भावना नहीं थी वे उत्तम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हुए देखे जाते हैं । इससे निश्चित होता है कि अकेला पुरुषार्थ ही कार्यकारी नहीं है, अन्यथा किया गया पुरुषार्थ कभी निष्फल ही नहीं होना चाहिये था। इसी तरह जिस प्रकार केवल पुरुषार्थ से कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती है उसी प्रकार केवल दैव से भी कार्य की सिद्धि सम्भव नहीं है। कारण यह कि यदि सर्वथा दैव को ही कार्यसाधक स्वीकार किया जाय तो यह शंका होती है कि वह दैव भी उत्पन्न कैसे हुआ ? यदि वह दैव पूर्व पुरुषार्थ के द्वारा निष्पन्न हुआ है तब तो सर्वथा दैव की प्रधानता नहीं रहती है, और यदि वह भी अन्य पूर्व दैव के निमित्त से आविर्भूत हुआ है तो फिर वैसी अवस्था में दैव की परम्परा के चलते रहने से कभी मोक्ष की भी सिद्धि नहीं हो सकेगी। इसलिये मोक्ष के निमित्त किया जानेवाला प्रयत्न निष्फल ही सिद्ध होगा । अतएव जब उन दोनों में अन्य की उपेक्षा करके किसी एक (दैव या पुरुषार्थ) के द्वारा कार्य की सिद्धि नहीं हो सकती है तब यहां ऐसा निश्चय करना चाहिये कि प्रत्येक कार्य की सिद्धि में वे दोनों ही कारण होते हैं। हां, यह अवश्य है कि उनमें से यदि कहीं दैव की प्रधानता और पुरुषार्थ की गौणता भी होती है तो कहीं पुरुषार्थ की प्रधानता और दैव की गौणता भी होती है। जैसे कि स्वामी समन्तभद्राचार्य ने कहा भी है- अबुद्धिपूर्वापेक्षायामिष्टानिष्टं स्वदैवतः । बुद्धिपूर्वव्यपेक्षायामिष्टानिष्टं स्वपौरुषात् ॥ आ. मी. ९१ ॥ अभिप्राय इसका यह है कि पूर्व में वैसा कुछ विचार न करने पर भी जब कभी अकस्मात् ही इष्ट अथवा अनिष्ट घटना घटती है, तब उसमें दैव को प्रधान और पुरुषार्थ को गौण समझना चाहिये । जैसे- अकस्मात् भूमि के खोदने आदि में धन की प्राप्ति अथवा यात्रा करते हुए किसी दुर्घटना में मरण की प्राप्ति । उसी प्रकार पूर्वापर विचार करने के पश्चात वैसा प्रयत्न करते हुए जो इष्ट अथवा अनिष्ट फल प्राप्त होता है उसमें पुरुषार्थ की प्रधानता और दैव की गौणता समझनी चाहिये । जैसे- व्यापार आदि कार्य करके धन का प्राप्त करना अथवा विषभक्षण आदि के द्वारा मरण का प्राप्त करना ॥३२॥

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+ हिंसादिक के त्यागी सत्पुरुष आज भी हैं -
भर्तारः कुलपर्वता इव भुवो मोहं विहाय स्वयं
रत्नानां निधयः पयोधय इव व्यावृत्तवित्तस्पहाः ।
स्पृष्टाः कैरपि नो नभो विभुतया विश्वस्य विश्रान्तये
सन्त्यद्यापि चिरन्तनान्तिकचराः सन्तः कियन्तोऽप्यमी ॥३३॥
अन्वयार्थ : जो स्वयं मोह को छोडकर कुलपर्वतों के समान पृथिवी का उद्धार करने वाले हैं, जो समुद्रों के समान स्वयं धन की इच्छा से रहित होकर रत्नों के स्वामी हैं, तथा जो आकाश के समान व्यापक होने से किन्हीं के द्वारा स्पृष्ट न होकर विश्व की विश्रान्ति के कारण हैं; ऐसे अपूर्व गुणों के धारक पुरातन मुनियों के निकट में रहने वाले वे कितने ही साधु आज भी विद्यमान हैं ॥३३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां यह आशंका हो सकती थी कि दैव के ऊपर विश्वास रखकर व्रतों का आचरण करने वाले मनुष्य इस समय सम्भव नहीं हैं, उनकी केवल पुराणों में ही बात सुनी जाती है । इस आशंका का परिहार करते हुए यहां यह बतलाया है कि वैसे साधु पुरुष कुछ थोडे-से आज भी यहां विद्यमान हैं, उनका सर्वथा अभाव अभी भी नहीं है । जिस प्रकार हिमालय आदि कुलपर्वत मोह से रहित होकर पृथिवी को धारण करते हैं उसी प्रकार वे साधुजन भी निर्मोह होकर पृथिवी के प्राणियों का उद्धार करते हैं, जिस प्रकार समुद्र मोती आदि बहुमूल्य रत्नों का आश्रय (रत्नाकर) होकर भी स्वयं उनकी इच्छा नहीं करता है उसी प्रकार वे साधु पुरुष भी सम्यग्दर्शन आदिरूप गुणरत्नों के आश्रय होकर धन की इच्छा से रहित होते हैं, तथा जिस प्रकार आकाश किन्हीं पदार्थों से लिप्त न होकर अपने व्यापकत्व गुण से समस्त पदार्थों को आश्रय देता है; उसी प्रकार वे साधु जन भी रागादि दोषों से लिप्त न होकर अपने महात्म्य से समस्त प्राणियों के संक्लेश को दूर करके उनको आश्रय देते हैं ॥३३॥

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+ लौकिक जीवों की मूर्खतापूर्ण प्रवृत्ति -
पिता पुत्रं पुत्रः पितरमभिसंधाय बहुधा
विमोहादीहेते सुखलवमवाप्तुं नृपपदम् ।
अहो मुग्धो लोको मृतिजननदंष्ट्रान्तरगतो
न पश्यत्यश्रान्तं तनुमपहरन्तं यमममुम् ॥३४॥
अन्वयार्थ : पिता पुत्र को तथा पुत्र पिता को धोखा देकर प्रायः वे दोनों ही मोह के वश होकर अल्प सुखवाले राजा के पद (सम्पत्ति) को प्राप्त करने के लिये प्रयत्न करते हैं । परन्तु आश्चर्य है कि मरण और जन्मरूप दाढों के बीच में प्राप्त हुआ यह मूर्ख प्राणी निरन्तर शरीर को नष्ट करनेवाले उस उद्यत यम को नहीं देखता है ॥३४॥

भावार्थ :

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+ विषयान्ध पुरुष की दुर्दशा का वर्णन -
अन्धादयं महानन्धो विषयान्धीकृतेक्षणः ।
चक्षषान्धो न जानाति विषयान्धो न केनचित् ॥३५॥
अन्वयार्थ : जिसके नेत्र इन्द्रियविषयों के द्वारा अन्धे कर दिये गये हैं अर्थात् विषयों में मुग्ध रहने से जिसकी विवेकबुद्धि नष्ट हो चुकी है ऐसा यह प्राणी उस लोकप्रसिद्ध अन्धे से भी अधिक अन्धा है, क्योंकि अन्धा प्राणी तो केवल चक्षु के ही द्वारा नहीं जान पाता है, परन्तु वह विषयान्ध मनुष्य इन्द्रियों और मन आदि में से किसी के द्वारा भी वस्तुस्वरूप को नहीं जान पाता है ॥३५॥

भावार्थ :

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+ विषयाभिलाषा की व्यर्थता -
आशागर्तः प्रतिप्राणि यस्मिन् विश्वमणूपमम् ।
कस्य किं कियदायाति वृथा वो विषयैषिता ॥३६॥
अन्वयार्थ : आशारूप वह गड्ढा प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थित है जिसमें कि विश्व परमाणु के बराबर प्रतीत होता है । फिर उसमें किसके लिये क्या और कितना आ सकता है ? अर्थात् प्रायः नहीं के समान ही कुछ आ सकता है। अतएव हे भव्यजीवों ! तुम्हारी उन विषयों की अभिलाषा व्यर्थ है॥३६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय इसका यह है कि प्रत्येक प्राणी की तृष्णा इतनी अधिक बढी हुई है कि समस्त विश्व की सम्पत्ति भी यदि उसे प्राप्त हो जाय तो भी उसकी वह तृष्णा कभी शान्त नहीं हो सकती है। फिर भला जरा विचार तो कीजिये कि प्राणी तो अनन्त हैं और उनमें से प्रत्येक की विषयतृष्णा उसी प्रकार से वृद्धिंगत है। ऐसी अवस्था में यदि विश्व की समस्त सम्पत्ति को भी उनमें विभाजित किया जाय तो उसमें से प्रत्येक प्राणी के लिये जो कुछ प्राप्त हो सकता है वह नगण्य ही होगा। अतएव यहां यह उपदेश दिया गया है कि जब प्राणी की विषयतृष्णा कभी पूर्ण नहीं हो सकती, बल्कि वह उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती है; तब उन विषयों की इच्छा करना ही व्यर्थ है ॥३६॥

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+ पुण्योपार्जन की प्रेरणा -
आयुःश्रीवपुरादिकं यदि भवेत्पुण्यं पुरोपार्जितं
स्यात् सर्व न भवेन्न तच्च नितरामायासितेऽप्यात्मनि ।
इत्यार्याः सुविचार्य कार्यकुशलाः कार्येऽत्र मन्दोद्यमा
द्रागागामिभवार्थमेव सततं प्रीत्या यतन्ते तराम् ॥३७॥
अन्वयार्थ : यदि पूर्व में प्राप्त किया हुआ पुण्य है तो आयु, लक्ष्मी और शरीर आदि भी यथेच्छित प्राप्त हो सकते हैं । परन्तु यदि वह पुण्य नहीं है तो फिर अपने को क्लेशित करने पर भी वह सब (इष्ट आयु आदि) बिल्कुल भी नहीं प्राप्त हो सकता है। इसीलिये योग्यायोग्य कार्य का विचार करने वाले श्रेष्ठ जन भले प्रकार विचार करके इस लोक सम्बन्धी कार्य के विषय में विशेष प्रयत्न नहीं करते हैं, किन्तु आगामी भवों को सुन्दर बनाने के लिये ही वे निरन्तर प्रीतिपूर्वक अतिशय प्रयत्न करते हैं ॥३७॥

भावार्थ :

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+ विषयों का स्वाद अत्यन्त कटु -
कः स्वादो विषयेष्वसौ कटुविषप्रख्येष्वलं दुःखिना
यानम्वेष्टुमिव त्वयाऽशुचिकृतं येनाभिमानामृतम् ।
आज्ञातं करणैर्मनः प्रणिधिभिः पित्तज्वराविष्टवत्
कष्टं रागरसैः सुधीत्स्वमपि सन् व्यत्यासितास्वादनः ॥३८॥
अन्वयार्थ : कडुए विष के सदृश संताप उत्पन्न करने वाले उन विषयों में वह कौन-सा स्वाद (आनन्द) है कि जिसके निमित्त से उक्त विषयों को खोजने के लिये दुखी होकर तूने अपने स्वाभिमान (आत्मगौरव) रूप अमृत को मलिन कर डाला है ? अरे, मुझे निश्चय हो चुका है कि तू विद्वान् होकर भी पित्तज्वर से पीडित मनुष्य की तरह मन की दूती के समान होकर विषयों में आनन्द मानने वाली इन्द्रियों के द्वारा विपरीत स्वादवाला कर दिया गया है ॥३८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार विष के भक्षण से प्राणी को संताप आदि उत्पन्न होता है उसी प्रकार उन विषयों के उपभोग से भी प्राणी को संताप आदि उत्पन्न होता है। अतएव वे विषय विष के ही समान हैं । फिर भी प्राणी उन्हें सुख के कारणभूत एवं स्थायी मानकर उनको प्राप्त करने के लिये जो अयोग्य आचरण करता हुआ आत्मप्रतिष्ठा को भी नष्ट कर डालता है उसका कारण यह है कि जिस प्रकार पित्तज्वर से युक्त पुरुष को जीभ का स्वाद विपरीत हो जाता है, जिससे कि उसे मधुर दूध भी कडुआ प्रतिभासित होने लगता है, ठीक उसी प्रकार मन से प्रेरित होकर विषयों में अनुरक्त हुई इन्द्रियों के दास बने हुए इस संसारी प्राणी को भी मोहवश विषतुल्य उन विषयों के भोगने में आनन्द का अनुभव होता है तथा विषयनिवृत्तिरूप जो निराकुल सुख है वह उसे कडुआ प्रतीत होता है ॥३८॥

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+ तृष्णा की विकरालता -
अनिवृत्तेर्जगत्सर्वं मुखादवशिनष्टि यत् ।
तत्तस्याशक्तितो भोक्तुं वितनोर्भानुसोमवत् ॥३९॥
अन्वयार्थ : तृष्णा की निवृत्ति से रहित अर्थात् अधिक तृष्णा से युक्त होकर भी तेरे मुख से जो सब जगत् अवशिष्ट बचा है वह तेरी भोगने की शक्ति न रहने से ही शेष रहा है। जैसे- राहु के मुख से शेष रहे सूर्य और चंद्र ॥३९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार यद्यपि राहु सूर्य और चन्द्र को पूर्ण ग्रास ही करना चाहता है, फिर भी जो उनका भाग शेष बचा रहता है वह उसकी अशक्ति के कारण ही बचा रहता है,उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी की तृष्णा तो इतनी अधिक होती है कि वह समस्त जगत को ही स्वाधीन करना चाहता है,फिर भी जो समस्त जगत उसके स्वाधीन नहीं हो पाता है उसमें उसकी अशक्ति कारण है, न कि विषय-तृष्णा की न्यूनता॥३९॥

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+ परिग्रह त्याग की प्रेरणा -
साम्राज्यं कथमप्यवाप्य सुचिरात्संसारसारं पुनः
तत्यक्त्वैव यदि क्षितीश्वरवराः प्राप्ताः श्रियं शाश्वतीम् ।
त्वं प्रागेव परिग्रहान् परिहर त्याज्यान गृहीत्वापि ते
मा भूभौतिकमोदकव्यतिकरं संपाद्य हास्यास्पदम् ॥४०॥
अन्वयार्थ : जिस किसी प्रकार से संसार के सारभूत साम्राज्य (सार्वभौम राज्य) को चिरकाल में प्राप्त करके भी यदि चक्रवर्ती उसे छोडने के पश्चात् ही अविनश्वर मोक्ष-लक्ष्मी को प्राप्त हुए हैं तो फिर तुम त्यागने के योग्य उन परिग्रहों (विषयों) को ग्रहण करने के पहिले ही छोड दो । इससे तुम परिव्राजक के लड्डू के समान विषयों का सम्पादन करके हंसी के पात्र न बन सकोगे ॥४०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- संसार में सबसे श्रेष्ठ चक्रवर्ती का साम्राज्य समझा जाता है, परन्तु उसको कष्टपूर्वक प्राप्त करके भी अन्त में मोक्षसुख की इच्छा से उन्हें भी वह छोडना ही पड़ा है। और तो क्या कहा जाय, किन्तु तीर्थंकर भी प्राप्त राज्य लक्ष्मी को छोड देने के पश्चात् ही जगत का कल्याण करने वाली आर्हन्त्य लक्ष्मी और अन्त में मोक्ष-लक्ष्मी को प्राप्त करते हैं । इस प्रकार जब समस्त विषयों का छोडना अनिवार्य है तब सबसे उत्तम तो यही है कि ममत्वबुद्धि को छोडकर उन्हें ग्रहण ही न किया जाय, अन्यथा यदि उन्हें ग्रहण करने के पश्चात् छोडा तो फिर उस साधु के समान हंसी का पात्र बनना पड़ेगा जो भिक्षा में प्राप्त हुए लड्डू के विष्ठा में गिर जाने पर उसे धोने के पश्चात् छोडता है। अभिप्राय यह है कि जो प्राणी तदनुकूल धर्म के आचरण के बिना ही मोहवश विषयों को प्राप्त करने के लिये निष्फल प्रयत्न करते हैं वे लोगों की हंसी के पात्र बनते हैं। अतएव वास्तविक सुख का साधन जो धर्म है उसका ही परिपालन करना योग्य है। इससे ऐहिक एवं परलौकिक सुख की प्राप्ति स्वयमेव होगी ॥४०॥

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+ गृहस्थाश्रम के त्याग की प्रेरणा -
सर्व धर्ममयं क्वचित्क्वचिदपि प्रायेण पापात्मकं
क्वाप्येतद् द्वयवत्करोति चरितं प्रज्ञाधनानामपि ।
तस्मादेष तदन्धरज्जुवलनं स्नानं गजस्याथवा
मत्तोन्मत्तविचेष्टितं न हि हितो गेहाश्रमः सर्वथा ॥४१॥
अन्वयार्थ : गृहस्थाश्रम विद्वज्जनों के भी चरित्र को प्रायः किसी सामायिक आदि शुभ कार्य में पूर्णतया धर्मरूप, किसी विषयभोगादिरूप कार्य में पूर्णतया पापरूप तथा किसी जिनगृहादि के निर्मापणादिरूप कार्य में उभय (पुण्य-पाप) रूप करता है। इसलिये यह गृहस्थाश्रम अन्धे के रस्सी भांजने के समान, अथवा हाथी के स्नान के समान अथवा शराबी या पागल की प्रवृत्ति के समान सर्वथा हितकारक नहीं है ॥४१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अन्धा मनुष्य आगे आगे रस्सो को भांजता है, परन्तु वह पीछे से उकलती जाती है, अतएव जिस प्रकार उसका वह रस्सी भांजना व्यर्थ है; अथवा हाथी पहिले स्नान करता है और तत्पश्चात् वह पुनः अंग पर धूलि डाल लेता है, इसलिये जिस प्रकार उक्त हाथी का स्नान करना व्यर्थ है; अथवा शराबी या पागल मनुष्य कभी उत्तम और कभी निकृष्ट चेष्टा करता है, परन्तु वह विवेकशून्य होने से जिस प्रकार हितकारक नहीं है; उसी प्रकार यह गृहस्थाश्रम भी हितकारक नहीं है । कारण यह कि उक्त गृहस्थाश्रम में रहता हुआ मनुष्य जहां जिनपूजा, स्वाध्याय एवं दानादिरूप शुभ कार्यों को करता है वहां वह अर्थोपार्जन के लिये हिंसाजनक आरम्भ एवं विषयसेवनादिरूप पापाचरण भी करता ही है । अतएव अन्धे के रस्सी भांजने आदि के समान वह गृहस्थाश्रम कभी कल्याणकारी नहीं हो सकता है । जीव का सच्चा कल्याण उक्त गृहस्थाश्रम को छोड करके निर्ग्रन्थ अवस्था की प्राप्ति में ही सम्भव है ॥४१॥

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+ गृहस्थाश्रम में होनेवाले निरर्थक क्लेशों का वर्णन -
कृष्ट्वोप्त्वा नृपतीन्निषेव्य बहुशो भ्रान्त्वा वनेऽम्भोनिधौ
किं क्लिश्नासि सुखार्थमत्र सुचिरं हा कष्टमज्ञानतः।
तैलं त्वं सिकतास्वयं मृगयसे वाञ्छेद्विषाज्जीवितुं
नन्वाशाग्रहनिग्रहात्तव सुखं न ज्ञातमेतत्त्वया ॥४२॥
अन्वयार्थ : तुम यहां सुख को प्राप्त करने की आशा से भूमि को जोतकर और बीज बोकर के अर्थात् खेती करके, राजाओं की सेवा करके अर्थात् दासकर्म करके, तथा बहुत बार वन में और समुद्र में परिभ्रमण करके अर्थात् व्यापार करके बहुत काल से क्यों कष्ट सह रहे हो? खेद है कि तुम अज्ञानता से यह जो कष्ट सह रहे हो उससे ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि तुम बालु में तेल की खोज कर रहे हो अथवा विषभक्षण से जीने की इच्छा कर रहे हो। अभिप्राय यह कि जिस प्रकार बालु में तेल की प्राप्ति असम्भव है अथवा विष के भक्षण से जीवित रहना असम्भव है उसी प्रकार उक्त कृषि आदि के द्वारा यथार्थ सुख का प्राप्त होना भी असम्भव है। हे भव्य ! क्या तुझे यह ज्ञात नहीं है कि तेरा वह अभीष्ट सुख निश्चयतः आशा (विषयाभिलाषा) रूप पिशाची के नष्ट करने से ही प्राप्त हो सकता है ? ॥४२॥

भावार्थ :

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+ आशारूपी अनि से दग्ध व्यक्ति की चेष्टा -
आशाहुताशनग्रस्तवस्तूच्चैर्वंशजां जनाः ।
हा किलैत्य सुखच्छायां दुःखधर्मापनोदिनः ॥४३॥
अन्वयार्थ : खेद है कि अज्ञानी प्राणी आशारूप अग्नि से व्याप्त भोगोपभोग वस्तुओं रूप ऊंचे वांसों से उत्पन्न हुई सुख की छाया (सुखाभास = दुख) को प्राप्त करके दुखरूप सन्ताप को दूर करना चाहते हैं॥४३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो अज्ञानी प्राणी विषयतृष्णा के वश होते हुए अभीष्ट भोगोपभोग वस्तुओं को प्राप्त करके यथार्थ सुख प्राप्त करना चाहते हैं उनका यह प्रयत्न इस प्रकार का है जिस प्रकार कि सूर्य के ताप से पीडित होकर कोई मनुष्य उस संताप को दूर करने के लिए अग्नि से जलते हुए ऊंचे बांसों की छाया को प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। अभिप्राय यह है कि प्रथम तो ऊंचे बांसों को कुछ उपयुक्त छाया ही नहीं पडती है, दूसरे वे अग्नि से जल भी रहे हैं, अतएव ऐसे बांसों की छाया का आश्रय लेनेवाले प्राणी का वह संताप जिस प्रकार नष्ट न होकर और अधिक बढता ही है उसी प्रकार विषयतृष्णा को शान्त करने की अभिलाषा से जो प्राणी इष्ट सामग्री के संचय में प्रवृत्त होता है इससे उसकी वह तृष्णा भी उतरोत्तर बढती ही है, परन्तु कम नहीं होती। जैसा कि समन्तभद्र स्वामीने भी कहा है " तृष्णार्चिषः परिदहन्ति न शान्तिरासामिष्टेन्द्रियार्थविभवै: परिवृद्धिरेव । स्थित्यैव कायपरितापहरं निमित्तमित्यात्मवान् विषयसौख्यपराङ्मुखोऽभूत् ॥ बृ. स्व. 82॥ अर्थात् विषयतृष्णारूप अग्नि की ज्वालायें प्राणी को सब ओर से जलाती हैं । इनकी शान्ति इन्द्रियविषयों की वृद्धि से नहीं होती, बल्कि उससे तो वे और भी अधिक बढती हैं। यह उस तृष्णा का स्वभाव ही है। प्राप्त हुए इष्ट इन्द्रियविषय कुछ थोडे-से समय के लिए केवल शरीर के संताप को दूर कर सकते हैं । इस प्रकार विचार करके हे जितेन्द्रिय कुन्थु जिनेन्द्र ! आप चक्रवर्ती की भी विभूति को छोडकर उस विषयजन्य सुख से पराङ्मुख हुए हैं ॥४३॥

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+ पुण्योदय के बिना कार्यसिद्धि नहीं -
खातेऽभ्यासजलाशयाऽजनि शिला प्रारब्धनिर्वाहिणा
भयोऽभेदि रसातलावधि ततः कृच्छात्सुतुच्छं किल ।
क्षारं वायुदगात्तदप्युपहतं पूतिकृमिश्रेणिभिः
शुष्कं तच्च पिपासतोऽस्य सहसा कष्ट विधेश्चेष्टितम् ॥४४॥
अन्वयार्थ : निकट में जलप्राप्ति की इच्छा से भूमि को खोदने पर चट्टान प्राप्त हुई। तब प्रारम्भ किये हुए इस कार्य का -निर्वाह करते हुए उसने पाताल पर्यन्त खोदकर उस चट्टान को तोड दिया । तत्पश्चात् वहां बडे कष्ट से कुछ थोडा-सा जो खारा जल प्रगट हुआ वह भी दुर्गन्धयुक्त और क्षुद्र कीडों के समूह से व्याप्त था। इसको भी जब वह पीने लगा तब वह भी शीघ्र सूख गया । खेद है कि दैव की लीला विचित्र है ॥४४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां एक उदाहरण द्वारा पुरुषार्थ को गौण करके दैव की प्रधानता निर्दिष्ट की गई है । कल्पना कीजिये कि कोई एक मनुष्य प्यास से अतिशय पीडित था। इसलिये जल प्राप्त करने के लिये वह भूमि को खोदने लगता है । किन्तु कुछ थोडा-सा खोदने पर वहां एक विशाल कठोर चट्टान आ जाती है। इतने पर भी वह अपने प्रारब्ध कार्य को चालू रखते हुए उस चट्टान को तोड कर उसे बहुत अधिक गहरा खोद डालता है। तब कहीं उसे वहां कुछ थोडा-सा जल दिखायी देता है, सो भी खारा, दुर्गन्धयुक्त और कीडों से परिपूर्ण । फिर भी जब वह उसे भी पीना प्रारम्भ करता है तो वह भी देखते ही देखते सूख जाता है। इसको ही दैव की प्रतिकूलता समझनी चाहिये। तात्पर्य यह कि यदि पाप का उदय है तो प्राणी इष्ट विषयसामग्री को प्राप्त करने के लिये कितना भी अधिक प्रयत्न क्यों न करे, परंतु वह उसे प्राप्त नहीं हो सकती है । यदि किसी प्रकार कुछ थोडी-सी प्राप्त भी हुई तो इससे उसकी तृष्णा अग्नि में डाले हुए घी के समान और भी अधिक बढती जाती है जिससे कि उसे शांति मिलने के बजाय अशांति ही अधिक प्राप्त होती है। अतएव सुखी रहने का सरल उपाय यही है कि पूर्व पुण्य से प्राप्त हुई सामग्री में संतोष रखकर भविष्य के लिये पवित्र आचरण करे । कारण यह कि सुख का हेतु एक धर्माचरण ही है, न कि केवल (देवनिरपेक्ष) पुरुषार्थ ॥४४॥

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+ न्यायोपार्जित धन से कभी सम्पदा नहीं बढ़ती -
शुद्धैर्धनैविवर्धन्ते सतामपि न संपदः।
न हि स्वच्छाम्बुभिः पूर्णाः कदाचिदपि सिन्धवः॥४५॥
अन्वयार्थ : शुद्ध धन के द्वारा सज्जनों की भी सम्पत्तियां विशेष नहीं बढ़ती हैं ! ठीक है- नदियां शुद्ध जल से कभी भी परिपूर्ण नहीं होती हैं ॥४५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार नदियां कभी आकाश से बरसते हुए शुद्ध जल से परिपूर्ण नहीं होती हैं, किन्तु वे इधर उधर की गंदी नालियों आदि के बहते हुए जल से ही परिपूर्ण होती हैं; उसी प्रकार सम्पत्तियां भी कभी किसी के न्यायोपार्जित धन के द्वारा नहीं बढती हैं, किन्तु वे असत्यभाषण, मायाचार एवं चोरी आदि के द्वारा अन्य प्राणियों को पीडित करने पर ही वृद्धि को प्राप्त होती हुई देखी जाती हैं। इससे यहां यह सूचित किया गया है कि जो सज्जन मनुष्य यह सोचते हैं कि न्यायमार्ग से धन-सम्पत्तिको बढाकर उससे सुख का अनुभव करेंगे उनका वह विचार योग्य नहीं है ॥४५॥

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+ धर्म, सुख, ज्ञान और गति का स्वरूप -
स धर्मो यत्र नाधर्मस्तत्सुखं यत्र नासुखम् ।
तज्ज्ञानं यत्र नाज्ञानं सा गतिर्यत्र नागतिः॥४६॥
अन्वयार्थ : धर्म वह है जिसके होने पर अधर्म न हो, सुख वह है जिसके होने पर दुख न हो, ज्ञान वह है जिसके होने पर अज्ञान न रहे, तथा गति वह है जिसके होने पर आगमन न हो ॥४६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ – जो प्राणी यह विचार करते हैं कि भले ही सम्पत्ति न्याय अथवा अन्याय मार्ग से क्यों न प्राप्त होवे, फिर भी उससे धर्म, सुख, ज्ञान और शुभ गति की तो सिद्धि होती ही है, अतएव उसको उपार्जित करना योग्य ही है । ऐसा विचार करने वालों को लक्ष्य में रखकर यहां यह बतलाया गया है कि वैसी सम्पत्ति धर्म, सुख, ज्ञान और सुगति इनमें से किसी को भी सिद्ध नहीं कर सकती है । कारण यह कि धर्म का स्वरूप यह है कि जो दुख को दूर करे । वह धर्म समस्त धन-धान्यादि परिग्रह एवं राग-द्वेषादि को छोडकर यथाख्यातचारित्र के प्राप्त होने पर ही हो सकता है, अतः उसकी सिद्धि पापोत्पादक सम्पत्ति के द्वारा कभी नहीं हो सकती है । इसी प्रकार सुख भी वास्तविक वही हो सकता है जिसमें दुख का लेश न हो। ऐसा सुख उस सम्पत्ति से सम्भव नहीं है। सम्पत्ति के द्वारा प्राप्त होने वाला सुख आकुलता को उत्पन्न करनेवाला है तथा वह स्थायी भी नहीं है । अतएव वह सम्पत्ति सुख की भी साधक नहीं है । तथा जिसके प्रगट होने पर समस्त विश्व हाथ की रेखाओं के समान स्पष्ट दिखने लगता है वही ज्ञान यथार्थ ज्ञान कहलाने के योग्य है। वह ज्ञान (केवलज्ञान) भी उक्त संपत्ति से सिद्ध नहीं हो सकता। जिस गति से पुनः संसार में आगमन नहीं होता है वह पंचमगति (मोक्ष) ही सुगति है । वह सम्यग्दर्शन आदिरूप अपूर्व रत्नत्रय के द्वारा सिद्ध होती है, न कि धन-धान्य आदि के द्वारा । अतएव वैसा विचार करना अविवेकता से परिपूर्ण है ॥४६॥

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+ धनोपार्जन छोड़कर धर्म-साधन की प्रेरणा -
वार्तादिभिर्विषयलोल विचारशून्यम्
क्लिश्नासि यन्मुहुरिहार्यपरिग्रहार्थम् ।
तच्चेष्टितं यदि सकृत्परलोकबुद्धया
न प्राप्यते ननु पुनर्जननादि दुःखम् ॥४७॥
अन्वयार्थ : हे विषयलम्पट ! तू यहां विषयों में मुग्ध होकर विवेक से रहित होता हुआ जो खेती, पशुपालन एवं व्यापार आदि के द्वारा धन कमाने के लिये बार बार कष्ट सहता है वैसी कष्टमय प्रवृत्ति (तपश्चरणादि) परलोक की बुद्धि से अर्थात् आगामी भव को सुखमय बनाने के लिये यदि एक बार भी करता तो फिर निश्चय से बार बार जन्म-मरण आदि के दुःखको न प्राप्त करता ॥४७॥

भावार्थ :

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+ बाह्य पदार्थों में इष्ट-अनिष्ट बुद्धि के त्याग की प्रेरणा -
संकल्प्येदमनिष्टमिष्टमिदमित्यज्ञातयाथात्म्यको
बाह्ये वस्तुनि किं वृथैव गमयस्यासज्य कालं मुहुः ।
अन्तःशान्तिमुपैहि यावददयप्राप्तान्तकप्रस्फुर
ज्ज्वालाभीषणजाठरानलमुखे भस्मीभवेन्नो भवान् ॥४८॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू पदार्थ के यथार्थ स्वरूप को न जानकर 'यह इष्ट है और यह अनिष्ट है' इस प्रकार मानता हुआ बाह्य वस्तुओं (स्त्री पुत्र एवं धन आदि) में आसक्त होकर व्यर्थ में ही क्यों बार बार समय को बिताता है ? जब तक तू प्राप्त हुए निर्दय काल (मरण) की प्रगट ज्वालाओं से भयानक औदार्य अग्नि के मुख में पडकर भस्मसात् नहीं होता है तबतक राग-द्वेषादि के परिहारस्वरूप आन्तरिक शान्ति को प्राप्त कर ले॥४८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- किसका कब मरण होगा, इसे कोई भी प्राणी नहीं जानता है । इसलिये यहां परलोक को सुखमय बनाने के लिये यह उपदेश दिया गया है कि हे जीव! तू अविवेकी होकर बाह्य परपदार्थों में राग और द्वेष करता हुआ अपने समय को यों ही न बिता । कारण कि ऐसा करते हुए तुझे कभी निराकुलता प्राप्त न हो सकेगी। पहिली बात तो यह है कि ये बाह्य पदार्थ अपनी इच्छा अनुसार प्रायः प्राप्त ही नहीं होते हैं, फिर यदि पुण्य के उदय से कुछ प्राप्त भी हुए तो वे चिरस्थायी नहीं हैं--किसी न किसी प्रकार उनका वियोग अवश्य होने वाला है। अतएव हे भव्यजीव ! उन अस्थिर बाह्य पदार्थो में राग-द्वेष न करके तू अहिंसा आदि सद्व्रतों का आचरण करता हुआ स्थिर व निराबाध आत्मीक सुख को प्राप्त करने का प्रयत्न कर । यदि तूने ऐसा न किया और इस बीच मृत्यु का ग्रास बन गया तो फिर यह जो आत्महित की साधक सामग्री (मनुष्यभव आदि) तुझे सौभाग्य से प्राप्त हो गई है वह दुर्लभ हो जावेगी॥४८॥

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+ आशारूपी नदी के पार होने की प्रेरणा -
आयातोऽस्यतिदूरमङग परवानाशासरित्प्रेरितः
कि नावैषि ननु त्वमेव नितरामेनां तरीतुं क्षमः।
स्वातन्त्र्यं व्रज यासि तीरमचिरान्नो चेद् दुरन्तान्तक ग्राहव्यात्तगभीरवक्त्रविषमे मध्ये भवाब्धेर्भवेः ॥४९॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू पराधीन बनकर तृष्णारूपी नदी से प्रेरित होता हुआ बहुत दूर आ गया है। क्या तू यह नहीं जानता है कि निश्चय से इस तृष्णारूप नदी को पार करने के लिये तू ही अतिशय समर्थ है ? अतएव तू स्वतन्त्रता का अनुभव कर जिससे कि शीघ्र ही उस तृष्णानदी के किनारे जा पहुंचे । यदि तू ऐसा नहीं करता है तो फिर उस विषयतृष्णारूप नदी के प्रवाह में बहकर दुर्दम यमरूप मगर के खुले हुए गम्भीर मुख से भयानक ऐसे संसाररूप समुद्र के मध्य में जा पहुंचेगा ॥४९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार कोई मनुष्य यदि नदी के प्रवाहमें पड़ जाता है तो वह दूर तक बहता हुआ चला जाता है । ऐसी अवस्था में यदि वह अपने तैरने के सामर्थ्य का अनुभव करके उसे पार करने का प्रयत्न करे तो वह निश्चित ही उससे पार हो सकता है। परन्तु यदि वह व्याकुल होकर अपनी तैरने की कला का स्मरण नहीं करता है तो फिर वह उसके साथ बहता हुआ उस भयानक अपार समुद्र के बीच में जा पहुंचेगा जहां उसे खाने के लिये मुख को फाडकर हिंस्र जलजन्तु (मगर व घडयाल आदि) तत्पर रहेंगे। ठीक इसी प्रकार से अज्ञानी प्राणी नदी के समान भयावह विषयों की तृष्णा में फंसकर उसके कारण मोक्षमार्ग से बहुत दूर हो जाता है । वह यदि यह विचार करे कि मैं स्वयं ही इस विषयतृष्णा में फंसा हूं, अतः इससे छुटकारा पाने में भी मैं पूर्णतया स्वतन्त्र हूं, मुझे दूसरा कोई परतन्त्र करने वाला नहीं है; तो वह उक्त विषयतृष्णा को छोडकर मोक्षमार्ग में प्रवृत्त हो सकता है । परन्तु यदि वह अपनी ही अज्ञानता से ऐसा नहीं करता है तो यह निश्चित है कि इससे वह समुद्र के समान अथाह और अपरिमित उस संसार (निगोदादि पर्याय) के मध्य में जा पहुंचेगा कि जहां से उसका निकलना अशक्य होगा और जहां उसे अनन्त बार जन्ममरण के दुख को सहना पडेगा ॥४९॥

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+ विषयाभिलाषा से व्याकुल जीव की चेष्टा -
आस्वाद्याद्य यदुज्झितं विषयिभिर्व्यावृत्तकौतूहलै स्तद्भूयोऽप्यविकुत्सयन्नभिलषस्यप्राप्तपूर्वं यथा
जन्तो किं तव शान्तिरस्ति न भवान् यावद् दुराशामिमा
मंहःसंहतिवीरवैरिपृतनाश्रीवैजयन्ती हरेत् ॥५०॥
अन्वयार्थ : जिन स्त्री आदि भोगों को विषयी जनों ने भोग करके अनुराग के हट जाने से छोड दिया है उनको (उच्छिष्ट को) तू घृणा से रहित होकर फिर से भी इस प्रकार से भोगने की इच्छा करता है जैसे कि मानों वे कभी पूर्व में प्राप्त ही न हुए हो। हे क्षुद्रप्राणी ! जब तक तू पापसमूहरूप वीर शत्रु की सेना की फहराती हुई ध्वजा के समान इस दुष्ट विषयतृष्णा को नष्ट नहीं कर देता है तब तक क्या तुझे शान्ति प्राप्त हो सकती है ? अर्थात् नहीं हो सकती है ॥५०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार युद्ध भूमि में जब तक शत्रुसेना की ध्वजा फहराती रहती है तबतक शूर-वीरों को शान्ति नहीं मिलती है- तब तक वे उस ध्वजा को गिराने के लिये भीषण रण में ही उद्युक्त रहते हैं। इस प्रकार जब वे उस शत्रु की ध्वजा को छिन्नभिन्न कर डालते हैं तब ही उन्हें अभूतपूर्व आनन्द का अनुभव होता है। ठीक उसी प्रकार से यह प्राणी भी जबतक शत्रुसेना की ध्वजा के समान उस दुष्ट विषयवासना को नष्ट नहीं कर देता है तबतक शान्ति (सन्तोष) को प्राप्त नहीं होता-- वह उन विषयों को प्राप्त करने के लिये नाना प्रकार के कष्टों को ही सहता है। किन्तु जैसे ही वह विवेक को प्राप्त होकर उक्त विषयतृष्णा को नष्ट कर देता है वैसे ही उसे अनुपम शान्ति का अनुभव होने लगता है । इससे यह निश्चित है कि सुख का कारण अभीष्ट विषयों की प्राप्ति नहीं है, किन्तु उनका परित्याग ही है ॥५०॥

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+ आशा के वशीभूत जीव का अविवेक -
भङ्क्त्वा भाविभवांश्च भोगिविषमान् भोगान् बुभुक्षुर्भृशं
मृत्वापि स्वयमस्तभीतिकरुणः सर्वान्जिघांसुर्मुधा।
यद्यत्साधुविगर्हितं हतमतिस्तस्यैव धिक् कामुकः कामक्रोधमहाग्रहाहितमनाः किं किं न कुर्याज्जनः ॥५१॥
अन्वयार्थ : जो स्वर्गादिरूप आगामी भव भोगी जनों के लिये विषम हैं, अर्थात् जो विषयी जनों को कभी नहीं प्राप्त हो सकते हैं, उनको कष्ट करके जो अज्ञानी प्राणी सर्प के समान भयंकर उन भोगों के भोगने की अतिशय इच्छा करता है वह भय और दया से रहित होकर स्वयं मर करके भी व्यर्थ में दूसरों को मारने की इच्छा करता है । जिस जिस निकृष्ट कार्य की साधु जनों ने निन्दा की है, धिक्कार है कि वह दुर्बुद्धि उसी कार्य को चाहता है। ठीक है- जिनका मन काम और क्रोध आदिरूप महाग्रहों से पीडित है वे प्राणी कौन कौन-सा निन्द्य कार्य नहीं करते हैं ? अर्थात् सब ही निन्द्य कार्य को वे करते हैं ॥५१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- ये इन्द्रियविषय सर्प के समान भयंकर हैं- जिस प्रकार सर्प के काटने से प्राणी को संताप एवं मरण आदि का दुख प्राप्त होता है उसी प्रकार उन विषयभोगों के कारण विषयी जनों को भी संताप एवं मरण आदि का दुख सहना पडता है । फिर भी जो अज्ञानी उन विषयों के भोगने की इच्छा करते हैं उन्हें न तो अपने मरण का भय रहता है और न दूसरे प्राणियों का घात करने में दया भी उत्पन्न होती है। वे उन विषयों को प्राप्त करने के लिये स्वयं मर करके भी दूसरों के मारनेमें उद्यत होते हैं । अथवा वे उन विषयों में पडकर स्वयं तो मरते ही हैं- अपना सर्वनाश करते ही हैं, साथ ही दूसरों को भी उन विषयों में प्रवृत्त करके उनका भी घात करते हैं- सर्व नाश करते हैं । कामी जन की बुद्धि ऐसी भ्रष्ट हो जाती है कि जिससे वे उस असदाचरण में प्रवृत्त होते हैं जिसकी कि साधु जन सदा निन्दा किया करते हैं। ये काम और क्रोध आदि दुष्ट पिशाच के समान हैं। उनसे पीडित होकर प्राणी हेयादेय का विचार न करके जिस किसी भी कार्य को करता है ॥५१॥

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+ जगत की क्षणभंगुरता -
श्वो यस्यानि यः स एव दिवसो ह्यस्तस्य संपद्यते
स्थैर्यं नाम न कस्यचिज्जगदिदं कालानिलोन्मूलितम् ।
भ्रातर्भान्तिमपास्य पश्यसि तरां प्रत्यक्षमक्ष्णोर्न किं
येनात्रैव मुहुर्मुहुर्बहुतरं बद्धस्पृहो भ्राम्यसि ॥५२॥
अन्वयार्थ : जो दिन जिस वस्तु के लिये कल (आगामी दिन) था वह उसके लिये कल (बीता हुआ दिन) हो जाता है। यहां कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है, यह सब संसार कालरूप वायु से परिवर्तित किया जानेवाला है। हे भ्रात ! क्या तुम भ्रम को छोडकर आखों से प्रत्यक्ष नहीं देखते हो, जिससे कि इन नश्वर बाह्य वस्तुओं के विषय में ही बार बार इच्छा करके बहुत काल से परिभ्रमण करते हो? ॥५२॥

भावार्थ :

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+ वर्तमान दु:खों का वर्णन -
संसारे नरकादिषु स्मृतिपथेप्युद्वेगकारिण्यलं
दुःखानि प्रतिसेवितानि भवता तान्येवमेवासताम्।
तत्तावत्स्मर सस्मरस्मितशितापाङपैरनङगायुधै
र्वामानां हिमदग्धमुग्धतरुवद्यत्प्राप्तवान्निर्धन॥५३॥
अन्वयार्थ : जो संसार स्मरण मात्र से भी अतिशय संताप को उत्पन्न करनेवाला है उसके भीतर नरकादि दुर्गतियों में पडकर तूने जिन दुःखोंको सहन किया है वे तो यों ही रहें, अर्थात् उन परोक्ष दुःखों की चर्चा करना तो व्यर्थ है। किन्तु हे भव्य ! धन से रहित तूने काम के शस्त्रों (बाणों) के समान स्त्रियों के कामोत्पादक मन्द हास्ययुक्त तीक्ष्ण कटाक्षों से बिद्ध होकर बर्फ से जले हुए कोमल वृक्ष के समान जो दुःख प्राप्त किया है उसका तो भला स्मरण कर ॥५३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय इसका यह है कि जो प्राणी सदा विषयभोगों में ही लिप्त रहते हैं उन्हें दोनों ही लोकों में दुख भोगना पडता है। इस लोक में तो उन्हें इसलिये दुख भोगना पड़ता है कि जिन सुन्दर स्त्रियों के मन्द हास्य एवं कटाक्षपात आदि के द्वारा वे काम से पीडित होने पर उन्हें प्राप्त करके अपनी वासना को पूर्ण करना चाहते हैं वे उपयुक्त धन आदि के न रहने से उन्हें प्राप्त होती नहीं हैं। फिर भी वे यों ही संतप्त होकर उसके लिये कष्टकारक निष्फल प्रयत्न करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त उस विषयतृष्णा से जो पाप का बन्ध होता है उसका उदय होने पर नरकादि दुर्गतियों में जाकर परलोक में भी वे दुःसह दुःखों को सहते हैं॥५३॥

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+ आत्म कल्याण की प्रेरणा -
उत्पन्नोऽस्यसि दोषधातुमलवद्देहोऽसि कोपादिवान्
साधिव्याधिरसि प्रहीणचरितोऽस्यस्यात्मनो वञ्चकः।
मृत्युव्यात्तमुखान्तरोऽसि जरसा ग्रास्योऽसि जन्मिन् वृथा
किं मत्तोऽस्यसि किं हितारिरहिते किं वासि बद्धस्पृहः ॥५४॥
अन्वयार्थ : हे बार बार जन्म को धारण करनेवाले प्राणी! तू उत्पन्न हुआ है; वात-पित्तादि दोषों, रस-रुधिरादि सात धातुओं एवं मल-मूत्रादि से सहित शरीर का धारक है; क्रोधादि कषायों से सहित है; आधि (मानसिक पीडा) और व्याधि (शारीरिक पीडा) से पीडित है, दुश्चरित्र है, अपने आप को धोका देनेवाला है, मृत्यु के द्वारा फैलाये गये मुख के मध्य में स्थित अर्थात् मरणोन्मुख है, तथा जरा (बुढापा) का ग्रास बनने वाला है। फिर ये अज्ञानी प्राणी! यह समझ में नहीं आता कि तू उन्मत्त होकर अपने ही हित का शत्रु (घातक) होता हुआ उन अहितकारक विषयों की अभिलाषा क्यों करता है? ॥५४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार पागल या शराबी मनुष्य हिताहित के विवेक से रहित होकर स्वच्छंद प्रवृत्ति करता है तथा उसको अपने मरण का भी भय नहीं रहता है उसी प्रकार यह विषयोन्मत्त प्राणी भी अपने भले बुरे का ध्यान न रखकर जो हिंसादि कार्य आत्मा का अहित करनेवाले हैं उनमें तो प्रवृत्त होता है तथा जो अहिंसा, सत्य, अचौर्य, स्वदारसंतोष ( या पूर्णतया ब्रह्मचर्य) एवं अपरिग्रह आदि कार्य आत्मा का हित करनेवाले हैं उनसे विमुख रहता है । ऐसा करते हुए उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि अब मैं बूढा हो गया हूं, मुझे किसी भी समय मृत्यु अपना ग्रास बना सकती है,उसके पहिले क्यों न मैं कुछ आत्महित कर लूं। यही कारण है जो वह उस विषयतृष्णा के साथ मरण को प्राप्त होकर पुनः उस शरीर को धारण करता है जो स्वभावतः अपवित्र, रोगादि से ग्रसित एवं राग-द्वेषादि का कारण है । इस प्रकार से वह दूसरों के साथ स्वयं अपने आपको भी धोका देकर इस दुखमय संसार में बार बार परिभ्रमण करता रहता है ॥५४॥

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+ तृष्णा से उत्पन्न दुःख का वर्णन -
उग्रग्रीष्मकठोरधर्मकिरणस्फूर्जद्गभस्तिप्रभैः
संतप्तः सकलेन्द्रियैरयमहो संवृद्धतृष्णो जनः।
अप्राप्याभिमतं विवेकविमुखः पापप्रयासाकुल-
स्तोयोपान्तदुरन्तकर्दमगतक्षीणोक्षयत् क्लिश्यते॥५५॥
अन्वयार्थ : तीक्ष्ण ग्रीष्म काल के कठोर सूर्य की दैदीप्यमान किरणों की प्रभा के समान संताप को उत्पन्न करने वाली समस्त इन्द्रियों से संतप्त होकर यह प्राणी वृद्धिंगत विषयतृष्णा से युक्त होता हुआ विवेक को नष्ट कर देता है और फिर इसीलिये अभीष्ट विषयों को प्राप्त करने के लिये वह पापाचारम प्रवृत्त होकर व्याकुल होता है। परंतु जब उसे वे अभीष्ट विषय नहीं प्राप्त होते हैं तब वह इस प्रकार से क्लेश को प्राप्त होता है जिस प्रकार कि प्यास से पीडित होकर पानी के निकट अगाध कीचड में फंसा हुआ निर्बल बैल क्लेश को प्राप्त होता है ॥५५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार कोई दुर्बल बैल ग्रीष्म कालीन सूर्य के संताप से पीडित होकर तृष्णा (प्यास) से युक्त होता हुआ किसी जलाशय के पास जाता है और वहां पानी के समीप में स्थित भारी कीचड में फंसकर दुःसह दुख को सहता है उसी प्रकार यह अज्ञानी प्राणी भी ग्रीष्मकालीन सूर्य के समान संतापजनक इन्द्रियों से पीडित होकर तृष्णा (विषयवांछा) से युक्त होता हुआ उन विषयों को प्राप्त करने के लिये कठोर परिश्रम करता है और इसके लिये वह धर्म-अधर्म का भी विचार नहीं करता। परंतु वैसा पुण्य शेष न रहने से जब वे विषयभोग उसे नहीं प्राप्त होते हैं तब उसकी गति भी उक्त बैल के ही समान होती है- वह इच्छित भोगों को न पाकर उस बढी हुई तृष्णा से निरंतर संक्लिष्ट रहता है ॥५५॥

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+ मोहरूपी अग्नि की विशेषता -
लब्धेन्धनो ज्वलत्यग्निः प्रशाम्यति निरिन्धनः ।
ज्वलत्युभयथाप्युच्चैरहो मोहाग्निरुत्कटः॥५६॥
अन्वयार्थ : अग्नि इन्धन को पाकर जलती है और उससे रहित होकर बुझ जाती है। परंतु आश्चर्य है कि तीव्र मोहरूपी अग्नि दोनों भी प्रकार से ऊंची (अतिशय) जलती है ॥५६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ-जिस प्रकार अग्नि प्राणी को संतप्त करती है उसी प्रकार मोह भी राग-द्वेष उत्पन्न करके प्राणी को संतप्त करता है। इसीलिये मोह को अग्नि की उपमा दी जाती है। परंतु विचार करने पर वह मोहरूप अग्नि उस स्वाभाविक अग्नि की अपेक्षा भी अतिशय भयानक सिद्ध होती है। कारण यह है कि अग्नि तो जबतक इन्धन मिलता है तभी तक प्रदीप्त होकर प्राणी को संतप्त करती है- इन्धन के न रहने पर वह स्वयमेव शान्त हो जाती है, किन्तु वह मोहरूप अग्नि इन्धन (विषयभोग) के रहने पर भी संतप्त करती है और उसके न रहने पर भी संतप्त करती है। अभिप्राय यह है कि जैसे जैसे अभीष्ट विषय प्राप्त होते जाते हैं वैसे वैसे ही कामी जनों की वह विषयतृष्णा उत्तरोत्तर और भी बढती जाती है जिससे कि उन्हें कभी आनन्दजनक संतोष नहीं प्राप्त हो पाता । इसके विपरीत इच्छित विषयसामग्री के न मिलने पर भी वह दुखदायक तृष्णा शान्त नहीं होती। इस प्रकार यह विषय तृष्णा उक्त दोनों ही अवस्थाओं में प्राणी को संतप्त किया करती है ॥५६॥

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+ मोह-निद्रा का वर्णन -
किं मर्माभ्यभिनन्न भीकरतरो दुःकर्मगर्मुद्गजः
किं दुःखज्वलनावलीविलसितैर्नालेढि देहश्चिरम् ।
किं गर्जद्यमतूरभैरवरवान्नाकर्णयन्निर्णयं
येनायं न जहाति मोहविहितां निद्रामभद्रां जनः ॥५७॥
अन्वयार्थ : हे भव्यजीव ! क्या अत्यन्त भयानक पापकर्मरूपी मधुमक्खियों के समूह ने इस प्राणी के मर्म को नहीं विदीर्ण किया है ? अवश्य किया है। क्या दुखरूप अग्नि की ज्वालाओं से इसका शरीर चिर काल से नहीं व्याप्त किया गया है ? अवश्य किया गया है । क्या इसने गरजते हुए यम (मृत्यु) के बाजों के भयानक शब्दों को नहीं सुना है ? अवश्य सुना है। फिर क्या कारण है जो यह प्राणी निश्चय से दुखोत्पादक उस मोहनिर्मित निद्रा (अज्ञान) को नहीं छोड़ रहा है ॥५७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में देखा जाता है कि प्राणी प्रगाढ निद्रा में भी यदि सो रहा है तो भी वह मधुमक्खियों के काट लेनेसे, निकटवर्ती अग्नि की ज्वालाओं से, अथवा मृतक के आगे बजने वाले गम्भीर बाजों के शब्दों से अवश्य जाग उठता है। परन्तु खेद है कि यह अज्ञानी प्राणी उन मधुमक्खियों के समान कष्टदायक पाप कर्मों से ग्रसित, अग्नि के समान सन्ताप देने वाले अनेक प्रकार के दुःखों से व्याप्त, तथा बाजों के साथ ले जाते हुए मृतक को देखकर शरीर की अनित्यता को जानता हुआ भी दुखदायक अज्ञानरूप निद्रा को नहीं छोडता है। इससे यह निश्चित प्रतीत होता है कि वह मोहनिद्रा उस प्राकृत निद्रा से भी प्रबल है। यही कारण है जो स्वाभाविक निद्रा तो प्राणी की थकावट को दूर करके उसे कुछ शान्ति ही प्रदान करती है, परन्तु वह मोहनिद्रा उसे विषय तृष्णावश उत्तरोत्तर किये जानेवाले परिश्रम से पीडित ही करती है ॥५७॥

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+ मोह-निद्रा के वश हुए प्राणी की दशा -
तादात्म्यं तनुभिः सदानुभवनं पाकस्य दुःकर्मणो
व्यापारः समयं प्रति प्रकृतिभिर्गाढं स्वयं बन्धनम् ।
निद्रा विश्रमणं मृतेः प्रतिभयं शश्वग्मृतिश्च ध्रुवं
जन्मिन् जन्मनि ते तथापि रमसे तत्रैव चित्रं महत् ॥५८॥
अन्वयार्थ : हे जन्म लेने वाले प्राणी! इस जन्म-मरणरूप संसार में तेरा शरीर के साथ तादात्म्य है अर्थात् तू उत्तरोत्तर धारण किये जाने वाले शरीरों के भीतर स्थित होकर सदा उनके अधीन रहता है, तू निरन्तर पाप कर्म के फल स्वरूप दुख का अनुभव करता है, प्रत्येक समय में जो तेरा ज्ञानावरणादि कर्मप्रकृतियों से स्वयं बन्धन (सम्बन्ध) होता है वही तेरा व्यापार है, निद्रा जो है वही तेरा विश्राम है; तथा मरण से तुझे सदा भय रहता है, परन्तु वह निश्चय से आता अवश्य है । फिर आश्चर्य यही है कि ऐसी दुखमय अवस्था के होने पर भी तू उसी संसार के भीतर रमण करता है ॥५८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह संसारी प्राणी बाह्य पर पदार्थों में राग-द्वेष करता हुआ मरण को प्राप्त होकर निरन्तर नवीन नवीन शरीर को धारण करता रहता है। इस प्रकार से वह निरन्तर जन्म-मरण के दुख को सहता है । इसके अतिरिक्त पूर्वोपार्जित कर्म के अनुसार और भी अनेक कष्टों का वह अनुभव किया करता है। उसका कार्य निरन्तर अपने राग-द्वेषादि परिणामों के अनुसार कर्मप्रकृतियों के बांधने का रहता है। जब उसे कुछ निद्रा आती है तभी विश्राम मिलता है । वह मृत्यु से यद्यपि सदा भयभीत रहता है, परन्तु उससे उसे छुटकारा नहीं मिलता। इस विषय में स्वामी समन्तभद्राचार्य ने यह बिलकुल ठीक कहा है-

बिभेति मृत्योर्न ततोऽस्ति मोक्षो नित्यं शिवं वाञ्छति नास्य लाभः । तथापि बालो भय-कामवश्यो वृथा स्वयं तप्यत इत्यवादीः ॥

अर्थात हे सुपार्श्व जिन ! यह प्राणी मृत्यु से निरन्तर डरता है, पर उससे उसे छुटकारा नहीं मिलता। वह सदा कल्याण की इच्छा करता है, परन्तु उसका उसे लाभ नहीं होता। फिर भी वह अज्ञानी प्राणी मृत्यु के भय और काम (सुख की इच्छा) के वशीभूत होकर स्वयं ही व्यर्थ में संतप्त हो रहा है । बृ. स्व. 34. इस प्रकार से वह प्राणी शरीर को धारण करके उसके सम्बन्ध से संसार में उपर्युक्त दुःखों को सहता है, तो भी वह उसी संसार में रमण करता है, यह महान् आश्चर्य की बात है॥५८॥

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+ शरीर की बन्दीगृह से तुलना -
अस्थिस्थूलतुलाकलापघटितं नद्धं शिरास्नायुभि
श्चर्माच्छादितमस्रसान्द्रपिशितैर्लिप्तं सुगुप्तं खलैः कर्मारातिभिरायुरुद्घनिगलालग्नं शरीरालयं
कारागारमवैहि ते हतमते प्रीतिं वृथा मा कृथाः ॥५९॥
अन्वयार्थ : हे नष्टबुद्धि प्राणी! हड्डियोंरूप स्थूल लकडियों के समूह से रचित, सिराओं और नसों से सम्बद्ध, चमडा से ढका हुआ, रुधिर एवं सघन मांस से लिप्त, दुष्ट कर्मोरूप शत्रुओं से रक्षित, तथा आयुरूप भारी सांकल से संलग्न; ऐसे इस शरीररूप गृह को तू अपना कारागार (बन्दीगृह) समझकर उसके विषय में व्यर्थ अनुराग मत कर॥५९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां शरीर में गृह का आरोप करते हुए उसे बन्दीगृह के समान बतला कर उसमें अनुराग न रखने की प्रेरणा की गई है । बन्दीगृह से समानता बतलाने का कारण यह है कि जिस प्रकार बन्दीगृह लकडी के खम्भों आदि से निर्मित होता है उसी प्रकार यह शरीर भी हड्डियों से निर्मित है, बन्दीगृह यदि रस्सियों से बंधा होता है तो यह शरीर भी नसों से सम्बद्ध है, बन्दीगृह जहां छत अथवा कबेलू आदि से आच्छादित होता है वहां यह शरीर चमडे से आच्छादित है, बन्दीगृह जिस प्रकार गोबर एवं मिट्टी आदि से लिप्त (लीपा गया) होता है उसी प्रकार यह शरीर रुधिर और मांस से लिप्त है, बन्दीगृह की रक्षा यदि दुष्ट पहरेदार करते हैं तो शरीर की रक्षा दुष्ट कर्मरूप शत्रु करते हैं, तथा बन्दीगृह जहां बडी बडी सांकलों से संयुक्त होता है वहां यह शरीर आयुरूप सांकल से संयुक्त है, इसीलिये जैसे सांकलों के लगे रहने से उसमें से बन्दी (कैदी) बाहिर नहीं निकल सकते हैं उसी प्रकार विवक्षित (मनुष्यादि) आयु कर्म का उदय रहने तक प्राणी भी उस शरीर से नहीं निकल सकता है। इस प्रकार जब बन्दीगृह और शरीर में कुछ भेद नहीं है तब यहां यह उपदेश दिया गया है कि जिस प्रकार कोई भी विचारशील मनुष्य दुखदायक बन्दीगृह में नहीं रहना चाहता है उसी प्रकार हे भव्यजीव! यदि तू भी उस बन्दीगृह के समान कष्टदायक इस शरीर में नहीं रहना चाहता है तो उससे अनुराग न कर॥५९॥

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+ घर-कुटुम्ब आदि का स्वरूप -
शरणमशरणं वो बन्धवो बन्धमूलं
चिरपरिचितदारा द्वारमापद्गृहाणाम् ।
विपरिमृशत पुत्राः शत्रवः सर्वमेतत्
त्यजत भजत धर्मं निर्मलं शर्मकामाः ॥६०॥
अन्वयार्थ : हे भव्यजीवों ! जिसे तुम शरण (गृह) मानते हो वह तुम्हारा शरण (रक्षक) नहीं है, जो बन्धुजन हैं वे राग-द्वेष के निमित्त होने से बन्ध के कारण हैं, दीर्घ कालसे परिचय में आई हुई स्त्री आपत्तियोंरूप गृहों के द्वार के समान है, तथा जो पुत्र हैं वे अतिशय रागद्वेष के कारण होने से शत्रु के समान हैं; ऐसा विचार कर यदि आप लोगों को सुख की अभिलाषा है तो इन सबको छोडकर निर्मल धर्म की आराधना करें॥६०॥

भावार्थ :

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+ समभाव धारण करने की प्रेरणा -
तत्कृत्यं किमिहेन्धनैरिव धनैराशग्निसंधुक्षणैः
संबन्धेन किमङ्ग शश्वदशुभैः संबन्धिभिर्बन्धुभिः।
किं मोहाहिमहाबिलेन सदृशा देहेन गेहेन वा
देहिन् याहि सुखाय ते समममुं मा गाः प्रमादं मुधा ॥६१॥
अन्वयार्थ : हे शरीरधारी प्राणी ! इन्धन के समान तृष्णारूप अग्नि को प्रज्वलित करने वाले धन से यहां तुझे क्या प्रयोजन है ? अर्थात् कुछ भी नहीं। पाप के कारणभूत सम्बधियों (नातेदारों) एवं अन्य बंधुओं (भ्राता आदि) के साथ संबंध रखने से तुझे क्या प्रयोजन है ? कुछ भी नहीं। मोहरूप सर्प के दीर्घ बिल (बांवी) के समान शरीर अथवा गृह से भी तुझे क्या प्रयोजन है? कुछ भी नहीं । ऐसा विचार कर हे भव्य जीव! तू सुख के निमित्त उस तृष्णा की शांति को प्राप्त हो,इसमें व्यर्थ प्रमाद न कर ॥६१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- सुख वास्तव में वही हो सकता है जिसमें आकुलता न हो । वह सुख धान के द्वारा नहीं प्राप्त हो सकता है। कारण यह कि जितना जितना धन बढता है उतनी ही अधिक उत्तरोत्तर तृष्णा भी बढती जाती है, जैसे कि घी के डालने से उत्तरोत्तर अग्नि अधिक बढती है । इस प्रकार जहां तृष्णा है- आकुलता है- वहां भला सुख कहां से मिल सकता है ? इसके अतिरिक्त जितना कष्ट धन के उपार्जन में होता है उससे भी अधिक कष्ट उसकी रक्षा में होता है। यदि रक्षण करते हुए भी वह दुर्भाग्य से कदाचित् नष्ट हो गया तो फिर प्राणी के दुख का पारावार भी नहीं रहता है । इसीलिये तो उसे भी प्राण कहा जाता है । इतना ही नहीं, बहुत-से धनान्धा मनुष्य तो उस धनरूप प्राण की रक्षा करने में वास्तविक प्राण भी दे देते हैं। इससे निश्चित होता है कि धन वास्तव में सुख का कारण नहीं है । इसी प्रकार से माता, पिता, पुत्र एवं अन्य सम्बन्धी जनों का भी उस सुख का कारण नहीं हो सकता है। इसका कारण यह है कि उनका संयोग होने पर यदि उनकी प्रवृति अनुकूल हुई तब तो उनमें अनुरागबुद्धि उत्पन्न होती है, जिससे कि उनके भरण-पोषण एवं रक्षण आदि की चिंता उदित होती है। और यदि उनकी प्रवृत्ति प्रतिकूल हुई तो इससे उद्वेग उत्पन्न होता है। ये दोनों (राग-द्वेष) ही कर्मबन्ध के कारण हैं । उक्त बन्धुवर्ग में भी मुख्यता स्त्री की होती है । कारण कि उसके ही निमित्त से कुटुम्ब की वृद्धि और तदर्थ धनार्जन की चिन्ता होती है इसीलिये तो यह कहने की आवश्यकता हई कि " स्त्रीतः चित्त निवृतं चेन्ननु वित्तं किमीहसे । मृतमण्डनकल्पो हि स्त्रीनिरीहे धनग्रहः॥" अर्थात् हे मन ! यदि तू स्त्री की ओर से हट गया है- तुझे स्त्री की चिंता नहीं रही है तो फिर तू धन की इच्छा क्यों करता है? अर्थात् फिर धन की इच्छा नहीं रहना चाहिये,क्योंकि स्त्री की इच्छा न रहने पर फिर धन का उपार्जन करना इस प्रकार व्यर्थ है जिस प्रकार से कि मृत शरीर का आभूषण आदि से श्रृंगार करना । सा. ध 6-36. इसी प्रकार जिस शरीर को अपना समझकर अभीष्ट आहार आदि के द्वारा पुष्ट किया जाता है वह भी सुख का कारण न होकर दुख का ही कारण होता है। कारण यह कि वह अनेक रोगोंका स्थान है और उसके रोगाक्रान्त होने पर जो वेदना उत्पन्न होती है उसके निवारण के लिये प्राणी विकल होकर प्रयत्न करता है। फिर भी कभी-न कभी वह छूटता ही है। इसके अतिरिक्त उपर्युक्त स्त्री एवं पुत्र आदि कौटुम्बिक सम्बन्ध भी इस शरीर के ही आश्रित हैं उनका सम्बन्ध कुछ अमूर्तिक आत्मा के साथ नहीं है। इस प्रकार उपर्यक्त सब ही दुःखों का मूल कारण वह शरीर ही ठहरता है। अब जब निरंतर साथ में रहनेवाला वह शरीर भी सुख का कारण नहीं है तब भला गृह आदि अन्य पदार्थ तो सुख के कारण हो ही कैसे सकते हैं ? इस प्रकार विचार करने पर सुख का कारण उस तृष्णा का अभाव (संतोष) ही सिद्ध होता है । वह यदि प्राप्त है तो धन के अधिक न होने पर भी प्राणी निराकुल रहकर सुख का अनुभव करता है, किन्तु उसके बिना अटूट सम्पत्ति के होने पर भी प्राणी निरंतर विकल रहता है ॥६१॥

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+ लक्ष्मी की अस्थिरता -
आदावेव महावलैरविचलं पट्टेन बद्धा स्वयं
रक्षाध्यक्षभुजासिपञ्जरवृता सामन्तसंरक्षिता।
लक्ष्मीर्दीपशिखोपमा क्षितिमतां हा पश्यतां नश्यति
प्रायः पातितचामरानिलहतेवान्यत्र काशा नृणाम् ॥६२॥
अन्वयार्थ : जो राजाओं की लक्ष्मी सर्वप्रथम महाबलवान् मंत्री और सेनापति आदि के द्वारा स्वयं पट्टबन्ध के रूप में निश्चलता से बांधी जाती है,जो रक्षाधिकारी (पहारेदार) पुरुषों के हाथों में स्थित खड्गसमूह से वेष्टित की जाती है,तथा जो सैनिक पुरुषों के द्वारा रक्षित रहती है,वह दीपक की लौ के समान अस्थिर राजलक्ष्मी भी ढुराये जाने वाले चामरों के पवन से ताडित हुई के समान जब देखते ही देखते नष्ट हो जाती है तब भला अन्य साधारण मनुष्यों की लक्ष्मी की स्थिरता के विषय में क्या आशा की जा सकती है? अर्थात् नहीं की जा सकती है॥६२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जिस राजलक्ष्मी की रक्षा करने में अतिशय बलवान् सुभट एवं अन्य बुद्धिमान् मंत्री आदि भी सदा उद्यत रहते हैं वह भी जब पवन से प्रेरित दीपक की शिखा के समान क्षणभर में नष्ट हो जाती है तब साधारण मनुष्यों की अल्प संपत्ति, जिसका कि कोई रक्षण करनेवाला नहीं है, कैसे स्थिर रह सकती है? अर्थात् नहीं रह सकती है । अतएव अविनश्वर सुख की प्राप्ति के लिये विनश्वर धन-संपत्ति की अभिलाषा को छोडकर सन्तोष का ही आश्रय लेना हितकर है॥६२॥

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+ शरीर की नश्वरता -
दीप्तोभयाग्रवातारिदारूदरगकीटवत् ।
जन्ममृत्युसमाश्लिष्टे शरीरे बत सीदसि॥६३॥
अन्वयार्थ : हे भव्यजीव ! जिसके दोनों अग्रभाग अग्नि से जल रहे हैं ऐसी एरण्ड (अण्डा) को लकडी के भीतर स्थित कीडे के समान और मृत्यु से व्याप्त शरीर में स्थित होकर तू दुख पा रहा है, यह खेद की बात है ॥६३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार दोनों ओर से जलती हुई पोली लकडी के भीतर स्थित कीडे का मरण अवश्य होनेवाला है उसी प्रकार जन्म और मरण से संयुक्त इस शरीर में स्थित रहने पर प्राणी का भी अहित अवश्य होनेवाला है । इसीलिये कल्याण के अभिलाषी भव्यजीव शरीर से निर्ममत्व होकर रत्नत्रय की प्राप्तिपूर्वक उसे छोडने का ही प्रयत्न करते हैं ॥६३॥

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+ विषयों के त्याग की प्रेरणा -
नेत्रादीश्वरचोदितः सकलुषो रूपादिविश्वाय किं
प्रेष्यः सीदसि कुत्सितव्यतिकरैरंहांस्यलं बृहयन् ।
नीत्वा तानि भुजिष्यतामकलुषो विश्वं विसृज्यात्मवा
नात्मानं धिनु सत्सुखी धुतरजाः सद्वृत्तिभिर्निर्वृतः ॥६४॥
अन्वयार्थ : हे भव्यप्राणी ! तू नेत्रादि इन्द्रियोंरूप स्वामी से अथवा नेत्रादि इन्द्रियों के स्वामीस्वरूप मन से प्रेरित दास के समान होकर संक्लेशयुक्त होता हुआ रूपादिरूप समस्त विषयों को प्राप्त करने के लिये हीनाचरणों के द्वारा क्यों अतिशय पापों को बढाता है और खेदखिन्न होता है ? तू उन इन्द्रियों को ही अपना दास बनाकर संक्लेश से रहित होता हुआ उन रूपादि समस्त विषयों को छोड दे और जितेन्द्रिय होकर अपनी आत्मा को प्रसन्न कर । इससे तू सदाचरणों के द्वारा पाप से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त करता हुआ समीचीन सुख का अनुभव कर सकता है ॥६४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह प्राणी जबतक इन्द्रियों का दास बनकर उनको सन्तुष्ट करने के लिये अनेक प्रकार से अयोग्य आचरण करता है तब तक उसके अशुभ कर्मों का बन्ध होता रहता है जिससे कि उसे कभी शान्ति प्राप्त नहीं होती। परन्तु जब वह जितेन्द्रिय होकर उन इन्द्रियोंको स्वयं दास बना लेता है तब उसकी वह दुराचारमय प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है- बढती हुई विषयाकांक्षा नष्ट हो जाती है। इससे वह शुभ ध्यान (धर्म व शुक्ल) में प्रवृत्त होकर रत्नत्रय को पूर्ण करता हुआ मोक्ष को प्राप्त कर लेता है और वहां निरन्तर अव्याबाध सुख का अनुभव करता है ॥६४॥

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+ परिग्रह रहित यती ही महासुखी -
अर्थिनो धनमप्राप्य धनिनोऽप्यवितृप्तितः।
कष्टं सर्वेऽपि सीदन्ति परमेकः सुखी सुखी॥६५॥
परायत्तात् सुखाद् दुःखं स्वायत्तं केवलं वरम् ।
अन्यथा सुखिनामानः कथमासंस्तपस्विनः ॥६६॥
अन्वयार्थ : धनाभिलाषी निर्धन मनुष्य तो धन को न पाकर दुखी होते हैं और धनवान् मनुष्य सन्तोष के न रहने से दुखी होते हैं। इस प्रकार खेद है कि सब ही (धनी और निर्धन भी) प्राणी दुख का अनुभव करते हैं। यदि कोई सुखी है तो केवल एक सन्तोषी (तृष्णा से रहित) मुनि ही सुखी है । धनवानों का सुख पराधीन है। उस पराधीन सुख की अपेक्षा तो आत्माधीन दुख अर्थात् अपनी इच्छानुसार किये गये अनशन आदि के द्वारा होनेवाला दुख ही अच्छा है । कारण कि यदि ऐसा न होता तो फिर तपश्चरण करनेवाले साधुजन 'सुखी' इस नाम से युक्त कैसे हो सकते थे? अर्थात नहीं हो सकते थे ॥६५-६६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यदि विचार कर देखा जाय तो संसार में कोई भी प्राणी सुखी नहीं है प्रायः सब ही दुखी हैं। उनमें निर्धन जन तो इसलिये दुखी हैं कि बिना धन के वे अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर पाते हैं। इसलिये वे उनकी पूर्ति के योग्य धन को प्राप्त करने के लिये निरन्तर चिन्तातुर रहते हैं, परन्तु वह उन्हें प्राप्त होता नहीं है । इसके अतिरिक्त वे जब अपने सामने धनवानों के टाट-वाट (रहन-सहन) को देखते हैं तो इससे उन्हें ईर्ष्या होती है, इस कारण भी वे सदा संतप्त रहते हैं। इससे यदि कोई यह सोचे कि धनवान् मनुष्य सुखी रहते होंगे, सो भी बात नहीं है- वे भी दुखी ही रहते हैं। उनके दुख का कारण असन्तोष-- उत्तरोत्तर बढनेवाली तृष्णा- है । उन्हें इच्छानुसार कितनी भी अधिक धन-सम्पत्ति क्यों न प्राप्त हो जावे फिर भी उन्हें उतने से सन्तोष नहीं प्राप्त होता- उससे भी अधिक की चाह उन्हें निरन्तर बनी रहती है । इससे ज्ञात होता है कि जिस प्रकार धन सुख का कारण नहीं है उसी प्रकार निर्धनता दुख की भी कारण नहीं है। सुख का कारण वास्तव में सन्तोष और दुख का कारण असन्तोष (तृष्णा) है। यही कारण है जो साधु जन सब प्रकार के धन से रहित होकर भी एक मात्र उसी सन्तोष-धन से अतिशय सुखी, तथा चिन्ताकुल धनवान् भी मनुष्य अतिशय दुखी देखे जाते हैं । इसके अतिरिक्त वह जो विषयजनित सुख है वह पराधीन है- वह उसके योग्य पुण्य एवं धन आदि की अपेक्षा रखता है । जब ऐसे पुण्य आदि का संयोग होगा तब ही वह सुख प्राणी को प्राप्त हो सकता है। इसके अतिरिक्त पराधीन होने से वह चिरस्थायी भी नहीं है- थोडे ही समय तक रहनेवाला है। अतएव जहां पराधीनता नहीं है उसे ही वास्तविक सुख समझना चाहिये। उस पराधीन सुख की अपेक्षा तो स्वतन्त्रता से आचरित अनशनादि तपों से उत्पन्न होने वाला दुख भी कहीं अच्छा है, क्योंकि, उससे भविष्य में स्वाधीन सुख प्राप्त होनेवाला है। परन्तु वह पराधीन क्षणिक सुख उत्तरोत्तर दुख का कारण होने से वास्तव में दुख ही है॥६५-६६॥

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+ मुनियों के गुणों की प्रशंसा -
यदेतत्स्वच्छन्दं विहरणमकार्पण्यमशनं
सहायै: संवासः श्रुतमुपशमैकश्रमफलम् ।
मनो मन्दस्पन्दं बहिरपि चिरायाति विमृशन्
न जाने कस्येयं परिणतिरुदारस्य तपसः ॥६७॥
अन्वयार्थ : साधु जनों का जो यह स्वतन्त्रतापूर्वक विहार (गमनागमन प्रवृत्ति), दीनता (याचना) से रहित भोजन, गुणी जनों की संगति, शास्त्रस्वाध्यायजनित परिश्रम के फलस्वरूप रागादि की उपशान्ति, तथा बाह्य पर पदार्थों में मन्द प्रवृत्तिवाला मन है; वह सब कौन-से महान तप का परिणाम है, इसे मैं बहुत काल से अतिशय विचार करने पर भी नहीं जानता हूं ॥67॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां गृहस्थों की अपेक्षा साधु जनों को किस प्रकार का सुख प्राप्त होता है, इसका विचार करते हुए सबसे पहिले यह बतलाया है कि उनका गमनागमन व्यवहार स्वतन्त्रता से होता है- वे अज्ञानी प्राणियों को सम्बोधित करने के लिये जहां भी जाना चाहते हैं निर्भयतापूर्वक जाते हैं। परन्तु गृहस्थों का जाना-आना व्यापारादि की परतन्त्रता के कारण से ही होता है। इसलिये उन्हें उससे सुख नहीं प्राप्त होता । इसके अतिरिक्त उनके पास कुछ न कुछ परिग्रह भी रहता है, इसलिये वे उन निर्ग्रन्थ साधुओं के समान यत्र तत्र स्वतन्त्रता से जा-आ भी नहीं सकते हैं- उन्हें चोर एवं हिंस्र जन्तुओं आदि का भय भी पीडित करता है । इसके अलावा मुनियों का भोजन जिस प्रकार याचना से रहित होता है उस प्रकार का भोजन गृहस्थों का नहीं होता। कारण यह कि उन गृहस्थों में जो दरिद्र हैं वे तो प्रत्यक्ष में याचना करके ही उदरपूर्ति करते हैं। किन्तु जो धनवान् हैं वे भी जिह्वालम्पटता के कारण घर में तैयार किये गये अनेक प्रकार के पदार्थों में इच्छानुसार स्वादिष्ट पदार्थों की याचना किया ही करते हैं। फिर भी उन्हें जिह्वाइन्द्रिय पर विजय प्राप्त कर लेनेवाले उन मुनियों के समान सुख नहीं प्राप्त होता जो कि केवल शरीर को स्थिर रखने के लिये विधिपूर्वक अयाचकवृत्ति से ही आहार ग्रहण करते हैं, न कि स्वादपरतासे । तथा जिस प्रकार मुनियों का सहवास गुणवान् अन्य मुनिजनों के साथ और योग्य सद्गृहस्थों के साथ ही होता है उस प्रकार गृहस्थों का नहीं होता- वे स्वार्थवश योग्यायोग्य का विचार न करके जिस किसी के भी साथ सहवास करते हैं । मुनि जहां अपने समय को राग-द्वेषादि को दूर करनेवाले शास्त्रस्वाध्यायादि कार्यों में बिताते हैं वहां गृहस्थ का सब समय प्रायः विषयों के संग्रह में ही बीतता है, जिससे कि वह सदा राग-द्वेष से कलुषित और व्याकुल रहता है। मुनियों का मन जहां कदाचित ही बाह्य पदार्थों की ओर जाता है वहां गृहस्थों का मन प्रायः निरन्तर बाह्य पदार्थों में ही प्रवृत्त रहता है । इस प्रकार वह साधुओं की प्रवृत्ति अवश्य ही किसी महान् तप के फलस्वरूप है जो कि सर्वसाधारण को दुर्लभ ही है। इससे निश्चित है कि जो सुख स्वतन्त्रता में है वह पराधीनता में कभी नहीं प्राप्त हो सकता है ॥६७॥

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+ मुनियों के गुणों की प्रशंसा -
विरतिरतुला शास्त्रे चिन्ता तथा करुणा परा
मतिरपि सदैकान्तध्वान्तप्रपञ्चविभेदिनी।
अनशनतपश्चर्या चान्ते यथोक्तविधानतो
भवति महतां नाल्पस्येदं फलं तपसो विधेः ॥६८॥
अन्वयार्थ : इसके अतिरिक्त विषयों का अनुपम त्याग, श्रुत का अभ्यास, उत्कृष्ट दया,निरन्तर एकान्तरूप अन्धकार के विस्तार को नष्ट करने वाली बुद्धि, तथा अन्त में आगमोक्त विधि से अनशन तप का आचरण अर्थात् आहार के परित्यागपूर्वक समाधिमरण; यह सब महात्माओं की प्रवृत्ति किसी थोडे-से तप के अनुष्ठान का फल नहीं है, किन्तु महान् तप का ही वह फल है ॥६८॥

भावार्थ :

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+ शरीर का विनाश निश्चित -
उपायक्रोटिदूरक्षे स्वतस्तत इतोऽन्यतः ।
सर्वतः पतनप्राये काये कोऽयं तवाग्रहः ॥६९॥
अन्वयार्थ : करोडों उपायों को करके भी जिस शरीर का रक्षण न स्वयं किया जा सकता है और अन्य किसी के द्वारा कराया जा सकता है, किन्तु जो सब प्रकार से नष्ट ही होनेवाला है, उस शरीर की रक्षा के विषय में तेरा कौन-सा आग्रह है ? अर्थात् जब किसी भी प्रकार से उक्त शरीर की रक्षा नहीं की जा सकती है तब हठपूर्वक सब प्रकार से उसकी रक्षा का प्रयत्न करना निरर्थक है ॥६९॥

भावार्थ :

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+ इस नश्वर आयु और शरीरादिकों के द्वारा अविनश्वर पद प्राप्त किया जा सकता है -
अवश्यं नश्वरैरेभिरायुःकायादिभिर्यदि ।
शाश्वतं पदमायाति मुधायातमवैहि ते ॥७०॥
अन्वयार्थ : इसलिये यदि अवश्य नष्ट होने वाले इन आयु और शरीर आदिकों के द्वारा तुझे अविनश्वर पद (मोक्ष) प्राप्त होता है तो तू उसे अनायास ही आया समझ ॥७०॥

भावार्थ :

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+ आयु की क्षणभंगुरता -
गन्तुमुच्छ्वासनिःश्वासैरभ्यस्यतज संततम् ।
लोकः पृथग (गि)तो वाञ्छत्यात्मानमजरामरम् ॥७१॥
अन्वयार्थ : यह जीव निरंतर उच्छवास और निःश्वासों के द्वारा जाने का अभ्यास करता है। परंतु अज्ञानी जन उन उच्छ्वास और निःश्वासों के द्वारा आत्मा को अजर-अमर अर्थात् जरा और मरण से रहित मानता है ॥७१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जिस क्रम से प्राणी के उच्छ्वास और निःश्वास निकलते हैं उसी क्रम से उसकी पूर्वबद्ध आयु (जीवित) कम होती जाती है। फिर भी बहुत से प्राणी अज्ञानतावश यह समझते हैं कि उन उच्छ्वास-निःश्वासों को जितना अधिक रोका जा सकेगा उतनी ही अधिक आयु बढेगी तथा इस प्रकार से प्राणी वृद्धत्व से भी रहित होगा । यह उनका मानना अज्ञानता से परिपूर्ण है, यही यहां सूचित किया गया है ॥७१॥

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+ आयु की क्षणभंगुरता -
मलत्यायुः प्रायः प्रकटितघटीयन्त्रसलिलं
खलः कायोऽप्यायुर्गतिमनुपतत्येव सततम् ।
किमस्यान्यैरन्यैर्द्वमयमिदं जीवितमिह
स्थितो भ्रान्त्या नावि स्वमिव मनुते स्थास्नुमपधीः ॥७२॥
अन्वयार्थ : यह आयु प्रायः अरहट की घटिकाओं में स्थित जल के समान प्रतिसमय क्षीण हो रही है तथा यह दुष्ट शरीर भी निरंतर उस आयु की गति (नश्वरता) का अनुकरण कर रहा है। फिर भला इस प्राणी का अपने से भिन्न अन्य स्त्री एवं पुत्र-मित्रादि से क्या प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है ? अर्थात् कुछ भी नहीं। कारण यह कि यहां इन दोनों (आयु और शरीर) स्वरूप ही तो यह जीवित है । फिर भी अविवेकी प्राणी नाव में स्थित मनुष्य के समान भ्रम से अपने को स्थिरशील मानता है॥७२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार अरहट की घटिकाओं का जल प्रतिसमय नष्ट होता रहता है उसी प्रकार प्राणी की आयु भी निरंतर क्षीण होती रहती है। तथा जिस क्रम से आयु क्षीण होती है उसी क्रम से उसका शरीर भी कृश होता जाता है । जिस आयु और शरीर स्वरूप यह जीवन है उन दोनों ही की जब यह दशा है तब पुत्र और स्त्री आदि जो प्रगट में भिन्न हैं,वे भला कैसे स्थिर हो सकते हैं तथा उनसे प्राणी का कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ? कुछ भी नहीं। फिर भी जिस प्रकार नाव के ऊपर बैठा हुआ मनुष्य अपने आधारभूत उस नाव के चलते रहने पर भी भ्रांतिवश अपने को स्थिर मानता है उसी प्रकार आयु के साथ प्रतिक्षण क्षीण होनेवाले शरीर के आश्रित होकर भी यह प्राणी अज्ञानता से अपने को स्थिर मानता है। यदि वह यह समझने का प्रयत्न करे कि जिस प्रकार यह शरीर क्षीण होता जा रहा है उसी प्रकार आयु भी घटती जा रही है और मृत्यु निकट आ रही है, तो फिर वह उसको स्थिर रखने का प्रयत्न न करके जिस शरीर के संयोग से यह परिभ्रमण हो रहा है उसे ही छोड देने का प्रयत्न कर सकता है और तब ऐसा करने से उसे अविनश्वर सुख भी अवश्य प्राप्त हो सकता है ॥७२॥

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+ श्वास की उत्पत्ति में ही दुःख -
उच्छ्वासः खेदजन्यत्वाद् दुःखमेषोऽत्र जीवितम् ।
तद्विरामो भवेन्मृत्युर्नृणां भणं कुतः सुखम् ॥७३॥
अन्वयार्थ : उच्छवास कष्ट से उत्पन्न होने के कारण दुखरूप है और यह उच्छ्वास ही यहां जीवन तथा उसका विनाश ही मरण है । फिर बतलाईये कि मनुष्यों को सुख कहां से हो सकता है? नहीं हो सकता है ॥७३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि श्वासोच्छ्वास का चालू रहना,यही तो जीवन है। सो वह श्वासोच्छ्वास चूंकि कष्ट से उत्पन्न होता है अतएव इससे समस्त जीवन ही दुखमय हो जाता है। और उस श्वासोच्छवास के नष्ट हो जाने पर जब मरण अनिवार्य है तब उसके पश्चात सुख भोगनेवाला रहेगा कौन ? इस प्रकार संसार में सर्वदा दुख ही है ॥७३॥

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+ संसार में जीवन बहुत थोड़ा -
जन्मतालद्रुमाज्जन्तुफलानि प्रच्युतान्यधः।
अप्राप्य मृत्युभूभागमन्तरे स्युः कियच्चिरम् ॥७४॥
अन्वयार्थ : जन्मरूप ताड के वृक्ष से नीचे गिरे हुए प्राणीरूप फल मृत्युरूप पृथिवीतल को न प्राप्त होकर अन्तस्तल में कितने काल रह सकते हैं ? ॥७४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार ऊंचे भी ताडवृक्ष से नीचे गिरे हुए फल क्षण मात्र अन्तराल में रहकर निश्चित ही पृथ्वीतल का आश्रय ले लेते हैं उसी प्रकार ताडवृक्ष के समान जन्म से उत्पन्न होने वाले प्राणी अल्प काल ही बीच में रहकर निश्चय से इस पृथ्वीतल के समान मृत्यु को प्राप्त करते ही हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार वृक्ष से गिरा हुआ फल पृथ्वी के ऊपर अवश्य गिरता है उसी प्रकार जो प्राणी जन्म लेते हैं वे मरते भी अवश्य हैं-स्थिर रहनेवाला कोई भी नहीं है ॥७४॥

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+ अनेक प्रयत्नों के बाद भी मनुष्यों की रक्षा संभव नहीं -
क्षितिजलधिभिः संख्यातीतैर्बहिः पवनस्त्रिभिः
परिवृतमतः खेनाधस्तात्खलासुरनारकान् ।
उपरि दिविजान मध्ये कृत्वा नरान् विधिमन्त्रिणा
पतिरपि नृणां त्राता नैको ह्यलंघ्यतमोऽन्तकः ॥७५॥
अन्वयार्थ : विधि (ब्रह्मा या कर्म) रूप मंत्री ने इस लोक में नीचे दुष्ट असुरकुमार देवों और नारकियों को तथा ऊपर वैमानिक देवों को करके मध्य में मनुष्यों को स्थापित किया और उनके निवास भूत उस मनुष्यलोक को असंख्यात पृथिवीस्वरूप द्वीपों और समुद्रों से वेष्टित किया। उनके भी बाहिर तीन (घनवातवलय, अम्बुवातवलय, और तनुवातवलय) वातवलयों से तथा उनके भी आगे उसे आकाश से वेष्टित किया। इतने पर भी न तो वह विधिरूप मंत्री ही उन मनुष्यों की रक्षा कर पाता है और न चक्रवर्ती आदि भी। कारण यह कि लोक में अतिशय दुर्गम एक वह यम (मृत्यु) ही है ॥७५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार किसी राजा का सुयोग्य मंत्री राजा और उसके राज्य की रक्षा के लिये कोट एवं गहरी खाई से वेष्टित नगर का निर्माण कराकर उसके बीच में दुर्गम दुर्ग (किला) का निर्माण कराता है उसी प्रकार मंत्री के समान विधि ने मनुष्यों की सुरक्षा के लिये उनके निवासस्थान (मनुष्यलोक) को कोट और खाई के समान एक दो नहीं किन्तु असंख्यात द्वीप-समुद्रों से, इसके पश्चात् तीन वायुमण्डलों और तत्पश्चात् भी आकाश से वेष्टित किया; तथा उनके नीचे व्यन्तरों, भवनवासियों एवं नारकियों को और ऊपर वैमानिक देवों को स्थापित किया। इतना करने पर भी वह उन मनुष्यों को मरने से नहीं बचा सका- आयु के पूर्ण होने पर समयानुसार उन सबका मरण होता ही है। अभिप्राय यह है कि उपर्युक्त जो लोक की रचना है वह स्वाभाविक ही है । उसके उपर यहां यह उत्प्रेक्षा की गई है कि यह लोक की रचना क्या है, मानो ब्रह्मा ने मनुष्यों की रक्षा के लिये ही यह सब किया है, फिर भी खेद है कि वे मृत्यु से सुरक्षित नहीं रह सके । तात्पर्य यह कि मनुष्य ही नहीं, किन्तु जितने भी शरीरधारी प्राणी हैं वे सब समयानुसार मरण को अवश्य प्राप्त होने वाले हैं- उन्हें मृत्यु से बचाने वाला कोई भी नहीं है ॥७५॥

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+ काल से अधिक बलवान कोई नहीं -
अविज्ञातस्थानो व्यपगततनुः पापमलिनः
खलो राहुर्भास्वद्दशशतकराक्रान्तभुवनम् ।
स्फुरन्तं भास्वन्तं किल गिलति हा कष्टमपरः
परिप्राप्ते काले विलसति विधौ को हि बलवान् ॥७६॥
अन्वयार्थ : जिसका स्थान अज्ञात है, जो शरीर से रहित है, तथा जो पाप से मलिन अर्थात् काला है वह दुष्ट राहु निश्चय से प्रकाशमान एक हजार किरणों रूप हाथों से लोक को व्याप्त करने वाले प्रतापी सूर्य को कवलित करता है; यह बडे खेद की बात है । ठीक है- समयानुसार कर्म का उदय आने पर दूसरा कौन बलवान् है ? आयु के पूर्ण होने पर ऐसा कोई भी बलिष्ठ प्राणी नहीं है जो मृत्यु से बच सके ॥७६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में सूर्य अतिशय प्रतापी माना जाता है । उसके एक हजार किरण (कर) क्या हैं मानो आक्रामक हाथ ही हैं । ऐसे अपूर्व बलशाली तेजस्वी सूर्य को भी ग्रहण के समय वह काला राहु ग्रसित करता है जिसके न तो स्थान का पता है और न जिसके शरीर भी है । जिस प्रकार वह प्रतापशाली भी सूर्य राहु के आक्रमण से आत्मरक्षा नहीं कर सकता है उसी प्रकार कितना भी बलवान् प्राणी क्यों न हो, किन्तु वह भी काल से (मृत्यु से) अपनी रक्षा नहीं कर सकता है-- समयानुसार मरण को प्राप्त होता ही है । कारण यह कि राहु के समान वह काल भी ऐसा है कि न तो उसके स्थान का ही पता है और न उसके शरीर भी है जिससे कि उसका कुछ प्रतिकार किया जा सके॥७६॥

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+ काल द्वारा प्राणियों को मारने की विधि -
उत्पाद्य मोहमदविव्हलमेव विश्वं
वेधाः स्वयं गतघृणष्ठकवद्ययेष्टम् ।
संसारभीकरमहागहनान्तराले
हन्ता निवारयितुमत्र हि कः समर्थः ॥७७॥
अन्वयार्थ : कर्मरूप ब्रह्मा समस्त विश्व को ही मोहरूप शराब से मूर्छित करके तत्पश्चात् स्वयं ही ठग (चोर-डाक) के समान निर्दय बनकर इच्छानुसार संसाररूप भयानक महावन के मध्य में उसका घात करता है। उससे रक्षा करने के लिये भला यहां दूसरा कौन समर्थ है ? अर्थात् कोई नहीं है ॥७७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार कोई चोर या डाकू बीहड जंगल में किसी मनुष्य को पाकर प्रथमतः उसे शराब आदि मादक वस्तु पिलाकर मूर्छित करता है और तत्पश्चात् उसके पास जो कुछ भी रुपया-पैसा आदि होता है उसे लूट कर मार डालता है। उसी प्रकार यह कर्म भी प्राणी को पहिले तो मोहरूप शराब पिलाकर मूर्छित करता है-- हेयोपादेय के ज्ञान से रहित करता है, और तत्पश्चात् उसके रत्नत्रय स्वरूप धन को लूटकर मार डालता है- दुर्गति में प्राप्त कराकर दुखी करता है । इस प्रकार जैसे उस बीहड जंगल में चोर के हाथों में पडे हुए, उस मनुष्य की कोई रक्षा करनेवाला नहीं है उसी प्रकार इस भयानक संसार में कर्मोदय से मोह को प्राप्त हुए प्राणी की भी रक्षा करनेवाला कोई नहीं है। हां, यदि वह स्वयं ही मोह से रहित होकर हिताहित के विवेक को प्राप्त कर लेता है तो अवश्य ही वह संसार के सन्ताप से बच सकता है। प्रकारान्तर से यहां यह भी सूचित किया गया है कि जो ब्रह्मा स्वयं ही विश्व को उत्पन्न करता है वही यदि उसका संहारक हो जाय तो फिर दूसरा कौन उसकी रक्षा कर सकता है ? कोई नहीं ॥७७॥

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+ यमराज का आकस्मिक आगमन -
कदा कथं कुतः कस्मिन्नित्यतर्क्यः खलोऽन्तकः ।
प्राप्नोत्येव किमित्याध्वं यतध्वं श्रेयसे बुधाः ॥७८॥
अन्वयार्थ : जिस काल के विषय में कब वह आता है, कैसे आता है, कहां से आता है, और कहां पर आता है; इस प्रकार का विचार नहीं किया जा सकता है वह दुष्ट काल प्राप्त तो होता ही है । फिर हे विद्वानों ! आप निश्चिन्त क्यों बैठे हैं ? अपने कल्याण के लिये प्रयत्न कीजिये । अभिप्राय यह है कि प्राणी के मरण का न तो कोई समय ही नियत है और न स्थान भी। अतएव विवेकी जन को सदा सावधान रहकर आत्महित में प्रवृत्त रहना चाहिये ॥७८॥

भावार्थ :

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+ मरण से रहित कोई नहीं -
असामवायिकं मृत्योरेकमालोक्य कंचन ।
देशं कालं विधिम् हेतुं निश्चिन्ताः सन्तु जन्तवः ॥७९॥
अन्वयार्थ : मृत्यु से सम्बन्ध न रखने वाले किसी एक देश को, काल को, विधान को और कारण को देखकर प्राणी निश्चिन्त हो जावें॥७९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व श्लोक में यह बतलाया गया है कि प्राणी का मरण कब, कहां और किस प्रकार से होगा; इस प्रकार जब कोई नहीं जान सकता है तब विवेकी जीवों को यों ही निश्चिन्त होकर नहीं बैठना चाहिये, किन्तु उससे आत्मरक्षा का कुछ प्रयत्न करना चाहिये । इस पर शंका हो सकती थी कि जब उसके काल और स्थान आदि का पता ही नहीं है, तब भला उसका प्रतीकार करके आत्मरक्षा की ही कैसे जा सकती है ? इसके उत्तरस्वरूप यहां यह बतलाया है कि यदि उस काल (मरण) के स्थान आदि का पता नहीं है तो न रहे, किन्तु हे प्राणी ! ऐसे किसी सुरक्षित स्थान को प्राप्त कर ले जहां कि वह पहुंच ही नहीं सकता हो । ऐसा करने से उसका प्रतीकार करने के बिना ही तेरी रक्षा अपने आप हो जावेगी। ऐसे सुरक्षित स्थान का विचार करने पर वह केवल मोक्षपद ही ऐसा दिखता है जहां कि मृत्यु का वश नहीं चलता । अतएव बाह्य वस्तुओं में इष्टानिष्ट की कल्पना को छोडकर मोक्षमार्ग में ही प्रवृत्त होना चाहिये, इसी में जीव का आत्मकल्याण है ॥७९॥

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+ स्त्री शरीर से प्रीति छोड़ने की प्रेरणा -
अपिहितमहाघोरद्वारं न किं नरकापदा
मुपकृतवतो भूयः किं तेन चेदमपाकरोत् ।
कुशलविलयज्वालाजाले कलत्रकलेवरे
कथमिव भवानत्र प्रीतः पृथग्जनदुर्लभे ॥८०॥
अन्वयार्थ : जिस स्त्री के शरीर को अज्ञानी जन दुर्लभ मानते हैं उस स्त्री के शरीर में हे भव्य ! तू किसलिये अनुरक्त हो रहा है ? वह स्त्री का शरीर पुण्य (सुख) को भस्मीभूत करने के लिये अग्नि की ज्वालाओं के समूह के समान होकर नरक के दुःखों को प्राप्त करने के लिये खुले हुए महा भयानक द्वार के समान है । तथा जिस स्त्री शरीर को तूने वस्त्राभरणादि से अलंकृत कर बार बार उपकृत किया है उसने क्या तेरा प्रतिकूल आचरण करके अपकार नहीं किया है ? अर्थात् अवश्य किया है । अतएव ऐसे कृतघ्न स्त्री के शरीर में अनुराग करना उचित नहीं है ॥८०॥

भावार्थ :

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+ मनुष्य पर्याय की काने गन्ने से तुलना -
व्यापत्पर्वमयं विरामविरसं मूलेऽप्यभोग्योचितं
विष्वक् क्षुत्क्षतपातकुष्ठकुथिता द्युग्रामयश्छिद्रितम् ।
मानुष्यं घुणभक्षितेक्षुसदृशं नामैकरम्यं पुनः
निःसारं परलोकबीजमचिरात्कृत्वेह सारीकुरु ॥८१॥
अन्वयार्थ : आपत्तियों रूप पोरों से निर्मित, अन्त में नीरस, मूल में भी उपभोग के अयोग्य तथा सब ओर से भूख, क्षतपात (घाव), कोढ और दुर्गन्ध आदि तीव्र रोगों से छेद युक्त की गई ऐसी यह मनुष्य पर्याय धुनों (लकडी के कीडों) से खाये हुए गन्ने के समान केवल नाम से ही रमणीय है । हे भव्य! तू इस निःसार मनुष्य पर्याय को शीघ्र यहां परभव का बीज (साधन) करके सारयुक्त कर ले ॥८१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां मनुष्य पर्याय को काने गन्ने के समान नि:स्सार बतलाकर उसके द्वारा योग्य संयम एवं तप आदि का आचरण करके परभव को सुधारने की प्रेरणा की गई है । उन दोनों में समानता इस प्रकार से है- जैसे गन्ना पोरों से संयुक्त होता है वैसे वह मनुष्य पर्याय अनेक प्रकार के दुःखोंरूप पोरों से संयुक्त है, जिस प्रकार गन्ना अन्त (अन्तिम भाग) में नीरस या फीका होता है उसी प्रकार मनुष्य शरीर भी अन्त में (वृद्धावस्था में) नीरस (आनन्द से रहित) होता है, गन्ना यदि मूल (जड) में उपभोग्य के (चूसने के) योग्य नहीं होता है तो वह मनुष्य शरीर भी मूल (बाल्यावस्था) में उपभोग के अयोग्य होता है, गन्ना जहां वनस्पति में होने वाले रोगों से ग्रसित होकर यत्र तत्र छेदयुक्त हो जाता है वहां मनुष्य शरीर भी क्षुधा एवं घाव आदि रोगों से छेदयुक्त (दुर्बल) हो जाता है, तथा जिस प्रकार गन्ना भीतर सारभाग से रहित होता है उसी प्रकार मनुष्य शरीर भी सार (श्रेष्ठवस्तु) से रहित होता है इस प्रकार दोनों में समानता होने पर जिस प्रकार किसान उस गन्ने को गांठों को बीज के रूपमें सुरक्षित रखकर उनसे पुन: उसकी सुन्दर फसल को उत्पन्न करता है उसी प्रकार विवेकी जन का भी कर्तव्य है कि वे उस निःसार मनुष्य शरीर को आगामी भव का (देवादि पर्याय अथवा सिद्ध पर्याय) का बीज (साधन) बनाकर उसे सफलीभूत करें ॥८१॥

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+ आयु की अनिश्चितता -
प्रसुप्तो मरणाशंकां प्रबुद्धो जीवितोत्सवम् ।
प्रत्यहं जनयन्नेष तिष्ठेत् काये कियच्चिरम् ॥८२॥
अन्वयार्थ : जब प्राणी सोता तब वह मृतवत् होकर मरने की आशंका उत्पन्न करता है और जब जागृत रहता है तब जीने के उत्सव को करता है। इस प्रकार प्रतिदिन आचरण करने वाला यह प्राणी कितने काल तक उस शरीर में रह सकेगा ? अर्थात् बहुत ही थोडे समय तक रह सकता है, पश्चात् उस शरीर को छोडना ही पडेगा ॥८२॥

भावार्थ :

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+ कुटुम्बीजन हितकारी नहीं -
सत्यं वदात्र यदि जन्मनि बन्धुकृत्य
माप्तं त्वया किमपि बन्धुजनाद्धितार्थम् ।
एतावदेव परमस्ति मृतस्य पश्चात्
संभूय कायमहितं तव भस्मयन्ति ॥८३॥
अन्वयार्थ : हे प्राणी ! यदि तूने संसार में भाई-बन्धु आदि कुटुम्बी जनों से कुछ भी हितकर बंधुत्व का कार्य प्राप्त किया है तो उसे सत्य बतला । उनका केवल इतना ही कार्य है कि मर जाने के पश्चात् वे एकत्रित होकर तेरे अहितकारक शरीर को जला देते हैं ॥८३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- बंधु का अर्थ हितैषी होता है । परंतु जिन कुटुम्बी जनों को बन्धु समझा जाता है वे वास्तव में प्राणी का कुछ भी हित नहीं करते हैं बल्कि, इसके विपरीत वे राग-द्वेष के कारण बनकर उसका अहित ही करते हैं । इसीलिये विवेकी जन को बन्धुजन में अनुरक्त न होकर अपने आत्महित में ही लगना चाहिये ॥८३॥

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+ विवाहादि में सहायक बन्धुजन ही वास्तविक शत्रु -
जन्मसंतानसंपादिविवाहादिविधायिनः ।
स्वाः परेऽस्य सकृत्प्राणहारिणो न परे परे ॥८४॥
अन्वयार्थ : जो कुटुम्बी जन जन्म-परंपरा (संसार) को बढाने वाले विवाहादि कार्य को करते हैं वे इस जीव के शत्रु हैं, दूसरे जो एक ही बार प्राणों का अपहरण करने वाले हैं वे यथार्थ में शत्रु नहीं हैं॥८४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो अपना अहित करे वही वास्तव में शत्रु है- किन्तु जिसे प्राणी शत्रु मानता है वह सचमुच में शत्रु नहीं है । कारण यह कि यदि वह अधिक से अधिक अहित करेगा तो केवल एक बार प्राणों का वियोग कर सकता है, इससे अधिक वह और कुछ भी नहीं कर सकता है । किन्तु जो कुटुम्बीजन विवाहादि को करके प्राणी को संसारवृद्धि के कारणों में प्रवृत्त करते हैं वास्तविक शत्रु तो वे ही हैं, क्योंकि उनके द्वारा अनेक भवों का घात होने वाला है- राग-द्वेषादि की वृद्धि के कारण होने से वे अनेक भवों को दुखमय बनानेवाले हैं ॥८४॥

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+ तृष्णारूपी अग्नि में जलने पर शांति की भ्रान्ति -
धनरन्धनसंभारं प्रक्षिप्याशाहुताशने ।
ज्वलन्तं मन्यते भ्रान्तः शान्तं संघक्षणक्षणे ॥८५॥
अन्वयार्थ : आशा (विषयतृष्णा) रूप अग्नि में धनरूप इन्धन के समूह को डालकर भ्रान्ति को प्राप्त हुआ प्राणी उस जलती हुई आशारूप अग्नि को जलने के समय में शान्त मानता है ॥८५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार अग्नि में इन्धन के डालने से वह उत्तरोत्तर बढती ही है- कम नहीं होती- उसी प्रकार अधिक अधिक धन के संचय से यह विषयतृष्णा भी उत्तरोत्तर बढती ही है- कम नहीं होती । अग्नि जब इन्धन को पाकर अधिक भडक उठती हैं तब मूर्ख से मूर्ख प्राणी भी उसे शान्त नहीं मानता। परन्तु आश्चर्य है कि विषयसामग्रीरूप इन्धन को पाकर उस तृष्णारूप अग्नि के भडक उठने पर भी यह प्राणी उसे (विषयतृष्णाग्नि को) और उसमें जलते हुए अपने को भी शान्त मानता है । यह उसकी बडी अज्ञानता है॥८५॥

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+ बाल सफेद होने का यथार्थ आशय -
पलितच्छलेन देहान्निर्गच्छति शद्धिरेव तव बद्धे: ।
कथमिव परलोकार्थ जरी वराकस्तदा स्मरति ॥८६॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! बालों को धवलता के मिषसे तेरी बुद्धि की निर्मलता ही शरीर से निकलती जा रही है। ऐसी अवस्था में बिचारा वृद्ध उस समय परभव में हित करने वाले कार्यों का कैसे स्मरण कर सकता है ? अर्थात् नहीं कर सकता है ॥८६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर बाल सफेद होने लगते हैं। इसके ऊपर यहां यह उत्प्रेक्षा की गई है कि वह बालों की सफेदी क्या है मानों निर्मल बुद्धि ही शरीर से निकलकर बाहिर आ रही है। अभिप्राय उसका यह है कि वृद्धावस्था में जैसे जैसे शरीर शिथिल होता जाता है वैसे ही वैसे प्राणी की बुद्धी भी भ्रष्ट होती जाती है । उस समय उसकी विचारशक्ति नष्ट हो जाती है तथा करने योग्य कार्य का स्मरण भी नहीं रहता है। ऐसी दशा में यदि कोई मनुष्य यह विचार करे कि अभी मैं युवा हूं, इसलिये इस समय इच्छानुसार धन कमाकर विषयसुख का अनुभव करूंगा और तत्पश्चात् वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर आत्मकल्याण के मार्ग में लगूंगा । ऐसा विचार करनेवाले प्राणियों को ध्यान में रखकर यहां यह बतलाया है कि वृद्धावस्था में इन्द्रियां शिथिल और बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है तथा व्रत एवं जप-तप आदि करने का शरीर में सामर्थ्य भी नहीं रहता है । इसके अतिरिक्त मृत्यु का भी कोई नियम नहीं है वह वृद्धावस्था के पूर्व में भी आ सकती है । अतएव वृद्धावस्था के ऊपर निर्भर न रहकर उसके पहिले ही, जब कि शरीर स्वस्थ रहता है, आत्मकल्याण के मार्ग में- व्रतादि के आचरण में- प्रवृत्त हो जाना अच्छा है ॥८६॥

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+ संसार-समुद्र का स्वरूप -
इष्टार्थोद्यदनाशितं भवसुखक्षाराम्भसि प्रस्फुरन् नानामानसदुःखवाडवशिखासंदीपिताभ्यन्तरे ।
मृत्यूत्पत्तिजरातरङ्गचपले संसारघोरार्णवे
मोहग्राहविदारितास्यविवराद्दूरे चरा दुर्लभाः ॥८७॥
अन्वयार्थ : जो संसाररूप भयानक समुद्र मनोहर पदार्थों के निमित्त से उत्पन्न होनेवाले असन्तोषजनक सुखरूप खारे जल से परिपूर्ण है, जिसका भीतरी भाग अनेक प्रकार के मानसिक दुखों रूप बडवानल की ज्वालाओं से जल रहा है; तथा जो मरण, जन्म एवं वृद्धत्वरूप लहरों से चंचल है; उस भयानक संसार-समुद्र में जो विवेकी प्राणी मोहरूप हिंस्र जलजन्तुओं (मगर आदि) के फाडे हुए मुखरूप बिल से दूर रहते हैं वे दुर्लभ हैं ॥८७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह संसार भयानक समुद्र के समान है- समुद्र में जहां तृष्णा (प्यास) को न शान्त कर सकने वाला खारा जल रहता है वहां संसार में तृष्णा (विषयाभिलाषा) को न शान्त कर सकनेवाला इष्ट विषयभोगजनित सुख रहता है, समुद्र में यदि बडवानल की ज्वालाओं से उसका जल जलता रहता है तो संसार में भी प्राणी अनेक प्रकार के मानसिक दुःखों से जलते (संतप्त) रहते हैं; समुद्र में जहां उसको क्षुब्ध करने वाली बडी बडी लहरों की परम्परा चलती है यहां संसार में भी प्राणी को पीडित करने वाली लहरों के समान जन्म, जरा और मरण की परम्परा चलती रहती है; तथा समुद्र में यदि मगर एवं घडियाल आदि हिंसक जन्तु रहते हैं तो संसार में भी घातक मोह रहता है । इस प्रकार संसार और समुद्र इन दोनों के समान होने पर जिस प्रकार गम्भीर एवं अपार समुद्र में गिरे हुए प्राणियों का उसमें स्थित मगर-मत्स्यादि के मुख से बचना अशक्य है- विरला ही कोई भाग्यवान् बचता है, उसी प्रकार संसार में स्थित प्राणियों का मोह से बचना अशक्य है-- विरले ही विवेकी जीव उसके प्रभाव से बचते हैं ॥८७॥

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+ ज्ञान-ज्योतिवन्त जीव धन्य हैं -
अव्युच्छिन्नैः सुखपरिकरैर्लालिता लोलरम्ये:
श्यामाङ्गीनां नयनकमलैरर्चिता यौवनान्तम् ।
धन्योऽसि त्वं यदि तनुरियं लब्धबोधेर्मृगीभि
र्दग्धारण्ये स्थलकमलिनीशङ्कयालोक्यते ते ॥८८॥
अन्वयार्थ : निरन्तर प्राप्त होने वाली सुख-सामग्री से पालित और यौवन के मध्य में सुन्दर स्त्रियों के चंचल एवं रमणीय नेत्रों रूप कमलों से पूजित अर्थात् देखा गया ऐसा वह तेरा शरीर विवेकज्ञान के प्राप्त होने पर यदि जले हुए वन में हिरणियों के द्वारा स्थलकमलिनी की आशंका से देखा जाता है तो तू धन्य है- प्रशंसा के योग्य है ॥८८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिसने निरन्तर सुखसामग्री को प्राप्त करके विषयसुख का अनुभव किया है तथा यौवन के समय में जिसको अनेक सुन्दर स्त्रियां चाहती रही हैं वह यदि विवेकज्ञान को प्राप्त करके वन में स्थित होता हुआ दुर्द्धर तप का आचरण करता है तो तप से कृश उसके सुकुमार शरीर को देखकर हिरणियों को जंगल में आग से जली हुई स्थलकमलिनी का भ्रम होने लगता है। ऐसे वे भव्यजीव ही वास्तवमें पुण्यशाली हैं जिन्हें समस्त सुखसामग्री के सुलभ रहने पर भी आत्मकल्याण के लिये उसे छोडने में किसी प्रकार क्लेश का अनुभव नहीं हुआ। वे स्तुति के योग्य हैं। आश्चर्य तो उन जीवों के ऊपर होता है जो कि यथेष्ट सुखसामग्री के न मिलने से निरन्तर दुखी रहकर भी तद्विषयक मोह को नहीं छोडना चाहते हैं॥८८॥

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+ बाल्यादि तीनों अवस्थाओं में धर्म की दुर्लभता -
बाल्ये वेत्सि न किंचिदप्यपरिपूर्णाङगो हितं वाहितं
कामान्धः खलु कामिनीद्रुमघने भ्राम्यन् वने यौवने ।
मध्ये वुद्धतृषार्जितुं वसु पशुः क्लिश्नासि कृष्यादिभि
र्वार्द्धिक्येऽर्धमृतः क्व जन्म फलि ते धर्मो भवेन्निर्मलः ॥८९॥
अन्वयार्थ : प्राणी बाल्यावस्था में शरीर के पुष्ट न होने से कुछ भी हित-अहित को नहीं जानता है । यौवन अवस्था में काम से अन्धा होकर स्त्रियों रूप वृक्षों से सघन उस यौवनरूप वन में विचरता है, इसलिये यहाँ भी वह हिताहित को नहीं जानता है । मध्यम (अधेड) अवस्था में पशु के समान अज्ञानी होकर बढी हुई तृष्णा को शान्त करने के लिये खेती व वाणिज्य आदि के द्वारा धन के कमाने में तत्पर रहकर खिन्न होता है,अतः इस समय भी हिताहित को नहीं जानता है तथा वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर वह अधमरे के समान होकर शरीर से शिथिल हो जाता है, इसलिये यहां भी हिताहित का विवेक नहीं रहता है। ऐसी दशा में हे भव्यजीव ! कौन-सी अवस्था में धर्म का आचरण करके तू अपने जन्म को सफल कर सकता है ? ॥८९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- बाल्यावस्था में शरीर के परिपुष्ट न होनेसे प्राणी अपने हिताहित को ही नहीं समझ सकता है । यौवन अवस्था में प्रायः वह काम से पीडित होकर विषयसामग्री की खोज में रहता है। इसके पश्चात् अधेड अक्स्था में वह धन के कमाने में आसक्त होकर उसके द्वारा वृद्धिंगत धन की तृष्णा को समाप्त करना चाहता है,परंतु इससे उसका शांत होना तो दूर ही रहा,वह उत्तरोत्तर बढती ही अधिक है। अब रही वृद्धावस्था, सो यहां समस्त इन्द्रियां शिथिल हो जाती हैं, शरीर रोगाक्रांत हो जाता है, तथा स्मृति भी जाती रहती है । इस प्रकार से वे सब अवस्थायें यों ही बीत जाती हैं और वह अज्ञानी प्राणी कुछ भी आत्महित नहीं कर पाता । किन्तु हां जो विवेकी प्राणी हैं वे यौवन अवस्था में विषय सुख को भोग करके तत्पश्चात् उसे उच्छिष्ट के समान छोड देते हैं और आत्मकल्याण के मार्ग में प्रवृत्त हो जाते हैं। कुछ ऐसे भी महापुरुष होते हैं जो उन कष्टदायक विषयों में अनुरक्त न होकर प्रारम्भ में ही संयम एवं तप आदि के साधने में प्रवृत्त हो जाते हैं। परन्तु ऐसे महापुरुष विरले ही हैं, अधिक प्राणी तो वे ही अज्ञानी जीव हैं जो पूर्वोक्त अवस्थाओं से किसी भी अवस्था में आत्महित को नहीं करते हैं॥८९॥

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+ बाल्यादि तीनों अवस्थाओं में कर्म जनित दुःख -
बाल्येऽस्मिन् यदनेन ते विरचितं स्मर्तुं च तन्नोचितं
मध्ये चापि धनार्जनव्यतिकरैस्तन्नास्ति यत्नापितः ।
वार्द्धिक्येऽप्यभिभूय दन्तदलनाद्याचेष्टितं निष्ठुरं
पश्याद्यापि विधेर्वशेन चलितुं वाउछत्यहो दुर्मते ॥९०॥
अन्वयार्थ : हे दुर्बुद्धि प्राणी! इस विधि (कर्म) ने बाल्यकाल में जो तेरा अहित किया है उसका स्मरण करना भी योग्य नहीं है । मध्यम अवस्था में भी ऐसा कोई दुख नहीं है जिसे कि उसने धनोपार्जन आदि कष्टप्रद कार्यों के द्वारा तुझे न प्राप्त कराया हो। वृद्धावस्था में भी उसने तुझे तिरस्कृत करके निर्दयतापूर्वक दांत तोड देने आदि का प्रयत्न किया है। फिर देख तो सही कि तेरा इतना अहित करने पर भी आज भी तू उक्त कर्म के ही वशीभूत होकर प्रवृत्ति करने की इच्छा करता है ॥९०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह अज्ञानी प्राणी दूसरों के विषय में हित और अहित की कल्पना करके तदनुसार उन्हें मित्र और शत्रु समझने लगता है। परन्तु वास्तव में जो उसका अहितकारी शत्रु कर्म है उसकी ओर इसका ध्यान ही नहीं जाता है । जीव बाल्यावस्था में जो गर्भ एवं जन्म आदि के असह्य दुख को भोगता है उसका कारण वह कर्म ही है । तत्पश्चात् यौवन अवस्था में भी कुछ कर्म के ही उदय से प्राणी कुटुम्ब के भरण-पोषण की चिन्ता से व्याकुल होकर धन के कमाने आदि में लगता है और निरन्तर दुःसह दुःख को सहता है। इसी कर्म के निमित्त से वृद्धावस्था में इन्द्रियां शिथिल पड़ जाती हैं, शरीर विकृत हो जाता है, और दांत टूट जाते हैं। इस प्रकार जो कर्म सब ही अवस्थाओं में उसका अनिष्ट कर रहा है उसे अहितकर न मानकर यह अज्ञानी प्राणी आगे भी उसी के वश में रहना चाहता है। लोक में देखा जाता है कि जो मनुष्य किसी का एक बार भी अनिष्ट करता है उससे वह भविष्य में किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखता। इसी प्रकार यदि कोई दांत तोडना तो दूर रहा, किन्तु यदि दांत तोडने के लिये कहता ही है तो मनुष्य उसे अपना अपमान करने वाला मानकर यथाशक्ति उसके प्रतीकार के लिये प्रयत्न करता है । फिर देखो कि जो कर्म एक बार ही नहीं, किन्तु बार बार प्राणी का अनिष्ट करता है तथा दांत तोडने के लिये कहता ही नहीं, बल्कि वृद्धावस्था में उन्हें तोड ही डालता है; उस अहितकर कर्म के ऊपर इस प्राणी को क्रोध नहीं आता । इसीलिये उसका प्रतीकार करना तो दूर रहा, किन्तु वह भविष्य में भी उसी कर्म के अधीन रहना चाहता है ॥९०॥

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+ वृद्धावस्था से आत्महित की प्रेरणा -
अश्रोत्रीव तिरस्कृतापरतिरस्कारश्रुतीनां श्रुतिः
चक्षुर्वीक्षितुमक्षमं तव दशां दूष्यामिवान्ध्यं गतम् । भीत्येवाभिमुखान्तकादतितरां कायोऽप्ययं कम्पते
निष्कम्पस्त्वमहो प्रदीप्तमवनेऽप्यासे (स्से) जराजर्जरे ॥९१॥
अन्वयार्थ : हे वृद्ध ! तेरे कान दूसरों के निन्दावाक्यों को नहीं सुनने की इच्छा से ही मानो तिरस्कृत अर्थात् नष्ट हो गये- बहरे हो गये । नेत्र मानो तेरी घृणित अवस्था को देखने में असमर्थ होकर ही अन्धेपन को प्राप्त हो गये हैं । यह शरीर भी तेरे सन्मुख आने वाले यम (मृत्यु) से मानो भयभीत हो करके ही अतिशय कांप रहा है। फिर भी आश्चर्य है कि तू जलते हुए घर के समान उस वृद्धत्व से शिथिल हुए शरीर में निश्चल रह रहा है॥९१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- वृद्धावस्था में कान बहरे हो जाते हैं,आंखें अन्धी हो जाती हैं,और शरीर कांपने लगता है । यह शरीर की अवस्था बुढापे में स्वभावतः हो जाया करती है। इसपर यहां यह उत्प्रेक्षा की गई है कि बुढापे में प्रायः घर व बाहिर के सब ही जन तिरस्कार करने लगते हैं, उन निन्दावाक्यों को न सुनने की ही इच्छा से मानो वृद्ध के कान बहरे हो जाते हैं। इसी प्रकार उस अवस्था में मुंह से लार बहने लगती है,कपडों में मल-मूत्रादि हो जाता है, तथा निरन्तर खांसी व कफ आदि बना रहता है । इस प्रकार की घृणाजनक अवस्था को न देख सकने के ही कारण मानो वृद्ध की आंखें अन्धी हो जाती हैं । वह बुढापा क्या है मरण की निकटता की सूचना ही है, उसी के भय से मानो वृद्ध का शरीर कांपने लगता है । वह वृद्धावस्था का शरीर आग से जलते हुए महल के समान नष्ट हो जाने वाला है। फिर भी आश्चर्य है कि जब घर में आग लग जाती है तब उसके भीतर स्थित प्राणी व्याकुल होकर बाहिर निकलने का प्रयत्न करते हैं; परन्तु वह बेसुध हुआ वृद्ध उस नष्ट प्राय शरीर से मोह को नहीं छोडता और इसीलिये वह परभव को सुखमय बनाने के लिये कुछ प्रयत्न भी नहीं करता है ॥९१॥

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+ विषयी जीवों को युक्तिपूर्वक उपालम्भ -
अतिपरिचितेष्ववज्ञा नवे भवेत् प्रीतिरिति हि जनवादः।
तं किमिति मृषा कुरुषे दोषासक्तो गुणेष्वरतः ॥९२॥
अन्वयार्थ : अत्यन्त परिचित वस्तु में अनादरबुद्धि और नवीन में प्रेम होता है, यह जो किंवदन्ती (प्रसिद्धि) है उसे तू दोषों में आसक्त तथा गुणों में अनुराग रहित होकर क्यों असत्य करता है ? ॥९२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में प्रसिद्धि है कि जो वस्तुएं अनेक बार परिचय में (उपभोग में) आ चुकी हैं उनमें अनुराग नहीं रहता है, इसके विपरीत जो वस्तु पूर्व में कभी परिचय में नहीं आयी है उसके विषय में प्राणी का विशेष अनुराग हुआ करता है । परन्तु पूर्वोक्त जीव की दशा इसके सर्वथा विपरीत है- जो दोष (राग-द्वेषादि) जीव के साथ चिर काल से सम्बद्ध हैं उनसे वह अनुराग करता है तथा जो सम्यग्दर्शनादि गुण उसे पूर्व में कभी भी नहीं प्राप्त हुए हैं उनमें वह अनुराग नहीं करता है । इस प्रकार से वह उपर्युक्त लोकोक्ति को भी असत्य करना चाहता है ॥९२॥

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+ व्यसनी को हिताहित का अभाव -
हंसैर्न भुक्तमतिकर्कशमम्भसापि
नो संगतं दिनविकासि सरोजमित्थम् ।
नालोकितं मधुकरेण मृतं वृथैव
प्रायः कुतो व्यसनिनां स्वहिते विवेकः ॥९३॥
अन्वयार्थ : कमल को हंस नहीं खाते हैं, वह जल में उत्पन्न होकर भी उससे चूंकि संगत नहीं होता है अतएव कठोर है, तथा वह दिन में विकसित होकर रात्रि में मुकुलित हो जाता है। यह सब विचार भ्रमर नहीं करता है। इसलिये वह उसकी गन्ध में आसक्त होता हुआ रात्रि में उसके संकुचित हो जाने पर उसीके भीतर मरण को प्राप्त होता है । ठीक है- व्यसनी जन को अपने हिताहित का विचार नहीं रहता है ॥९३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां भ्रमर का उदाहरण देकर यह बतलाया है कि जिस प्रकार भ्रमर कमल के विषय में यह नहीं सोचता है कि इसका भक्षण हंस नहीं करते हैं, वह (कृतघ्न) जिस जल में उत्पन्न हुआ है उसी से अलिप्त रहता है, तथा वह रात्रि में मुकुलित होकर प्राणों का घातक बनेगा; इसीलिए वह उसमें आसक्त रहकर वहीं मरण को प्राप्त होता है। ठीक इसी प्रकार से विषयी जन भी यह विचार नहीं करते हैं कि इन विषयों का उपभोग हंसों के समान महात्मा पुरुषों ने नहीं किया है. ये सर्वदा रहने वाले नहीं हैं- देखते देखते नष्ट होनेवाले हैं, तथा आत्मस्वभाव के प्रतिकूल होकर प्राणी को नरकादि दुर्गतियों में ले जाने वाले हैं; इसीलिए वे उनमें आसक्त होकर उसी भ्रमर के समान जन्म-मरणादि के अनेक दुःखों को सहते हैं । सो यह कुछ आश्चर्यजनक बात नहीं है, कारण कि व्यसनी जनों का ऐसा स्वभाव ही होता है- उन्हें कभी अपने हित का विवेक नहीं रहता है ॥९३॥

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+ बुद्धिमानों का प्रमादी होना शोचनीय -
प्रजैव दुर्लभा सुष्ठु दुर्लभा सान्यजन्मने ।
तां प्राप्य ये प्रमाद्यन्ते ते शोच्याः खलु धीमताम् ॥९४॥
अन्वयार्थ : प्रथम तो हिताहित का विचार करनेरूप बुद्धि ही दुर्लभ है, फिर वह परभव के हित का विवेक तो और भी दुर्लभ है। उस विवेक को प्राप्त करके भी जो जीव प्रमाद करते हैं वे बुद्धिमानों के लिये सोचनीय होते हैं ॥९४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- संसार में एकेन्द्रिय आदि को लेकर चौइन्द्रिय तक सब ही प्राणी मन से रहित होते हैं, इसीलिये उन्हें विचारात्मक बोध ही नहीं प्राप्त होता है। पंचेन्द्रियों में भी सभी जीवों के मन नहीं होता- कुछ के ही होता है । जिनके वह होता है उनको भी प्रायः आत्महित का विवेक नहीं रहता। फिर जो आत्महित का विवेक होने पर भी तदनुरूप आचरण करने में असावधान रहते हैं उनके ऊपर बुद्धिमानों को खेद होता है। कारण यह कि वे उपयुक्त सामग्री को प्राप्त करके भी हित के मार्ग में प्रवृत्त नहीं होते और इस प्रकार से उक्त सामग्री के विनष्ट हो जाने पर फिर उसका पुनः प्राप्त होना कठिन ही है ॥९४॥

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+ ज्ञानियों का राजादिक का दास होना विचारणीय -
लोकाधिपाः क्षितिभुजो भुवि येन जाताः
तस्मिन् विधौ सति हि सर्वजनप्रसिद्ध ।
शोच्यं तदेव यदमी स्पृहणीयवीर्या
स्तेषां बुधाश्च बत किंकस्तां प्रयान्ति ॥९५॥
अन्वयार्थ : जिस विधि (पुण्य) से पृथिवी के ऊपर लोक के अधिपति राजा हुए हैं उस विधि के सर्व जनों में प्रसिद्ध होने पर भी यही खेद की बात है कि जो विशिष्ट पराक्रमी और विद्वान हैं वे भी उक्त राजा लोगों की दासता को प्राप्त होते हैं-सेवा करते हैं ॥९५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह सब ही जानते हैं कि राजा, महाराजा चक्रवर्ती एवं तीर्थंकर आदि जितने भी महापुरुष होते हैं वे सब पूर्वोपार्जित पुण्य के प्रभाव से ही होते हैं। फिर खे दकी बात तो यही है कि अनेक पराक्रमी एवं विद्वान् भी ऐसे हैं जो कि उक्त पुण्य के ऊपर विश्वास न करके लक्ष्मी की इच्छा से उन राजा आदि की ही सेवा करते हैं। वे यदि पुण्य के ऊपर विश्वास रखकर उसका उपार्जन करते तो उन्हें राजा आदि की सेवा न करने पर भी वह लक्ष्मी स्वयमेव प्राप्त हो जाती। इसके विपरीत पुण्योपार्जन के बिना कितनी भी वे राजा आदि की सेवा क्यों न करें, किन्तु उन्हें वह यथेष्ट लक्ष्मी कभी भी प्राप्त नहीं हो सकती है ॥९५॥

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+ धर्म प्राप्ति का विधान -
यस्मिन्नस्ति स भूभृतो धृतमहावंशाः प्रदेशः परः।
प्रज्ञापारमिता धृतोन्नतिधनाः मूर्ध्ना ध्रियन्ते श्रियै ।
भूयांस्तस्य भुजङगदुर्गमतमो मार्गो निराशस्ततो
व्यक्तं वक्तुमयुक्तमार्यमहतां सर्वार्यसाक्षात्कृतः ॥९६॥
अन्वयार्थ : जो पर्वत बडे बडे बांसों को धारण करते हैं, जिनका अन्त बुद्धि से ही जाना सकता है, तथा जो उंचाईरूप धन को धारण करने वाले हैं; ऐसे वे पर्वत जिस प्रदेश (निधानस्थान) में शोभा के निमित्त स्थित हैं वह उत्कृष्ट प्रदेश है । उसका लंबा मार्ग सर्पों से अत्यन्त दुर्गम और दिशाओं से रहित अर्थात् दिग्भ्रम को उत्पन्न करने वाला है। इसीलिये हे आर्य ! उसके विषय में महापुरुषों के लिए स्पष्ट बतलाना अयोग्य है । वह सर्वार्य नाम के द्वितीय मंत्री के द्वारा प्रत्यक्ष में देखा गया है । प्रकृत श्लोक का यह एक अर्थ उदाहरण स्वरूप है । दूसरा मुख्य अर्थ उसका इस प्रकार है- प्रदेश शब्द का अर्थ यहां धर्म है, क्योंकि 'प्रदिश्यते परस्मै प्रतिपाद्यते इति प्रदेशः' अर्थात् दूसरों के लिये जिसका उपदेश किया जाता है वह प्रदेश (धर्म) है, ऐसी उसकी निरुक्ति हैं। जिस धर्म के होने पर इक्ष्वाकु आदि उत्तम वंश को धारण करने वाले (कुलीन), बुद्धि के पारगामी (अतिशय विद्वान) तथा गुणों से उन्नत होकर धन के धारक ऐसे राजा लो ग अन्य जनोंके द्वारा लक्ष्मी प्राप्ति के निमित्त शिर से धारण किये जाते हैं वह धर्म उत्कृष्ट है । उस धर्म का मार्ग (उपाय) दान-संयमादि के भेद से अनेक प्रकार का है जो आशा (विषयवांछा) से रहित होता हुआ भुजंगी-कामी जनों के लिये दुर्लभ है। इस कारण महापुरुषों के लिये उसका स्पष्टतया व्याख्यान करना अशक्य है । वह धर्म सर्वार्य अर्थात् सबों से पूजने योग्य सर्वज्ञ के द्वारा प्रत्यक्ष में देखा गया है ॥९६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार कृष्णराजा का कोष (खजाना) अनेक उन्नत विशाल पर्वतों से घिरे हुए एवं सादि हिंस्र जन्तुओं से व्याप्त दुर्गम स्थान में निक्षिप्त था और उसके संबंध में सर्वार्य नामक राजा के द्वितीय मंत्री को छोडकर अन्य कोई कुछ भी नहीं जानता था तथा दूसरों के लिये चोरी आदि के भय से उसके संबंध कुछ बतलाया भी नहीं जा सकता था। उसी प्रकार यह धर्म का स्वरूप भी साधारण जनों के लिये दुर्गम है। उसको प्रत्यक्ष रूप से तो सर्वज्ञ ही जानता है तथा उस सर्वज्ञ के द्वारा किये गये व्याख्यान से अन्य गणधर आदि भी यथा योग्य जानते हैं । साधारण मनुष्य अन्य जनों के लिये उसका स्पष्टतया व्याख्यान नहीं कर सकते हैं, किंतु विशिष्ट बुद्धि को धारण करने वाले ही उसका स्पष्ट प्रतिपादन कर सकते हैं। जिन-महाराजा आदि की अन्य मनुष्य सेवा किया करते हैं वे इसी धर्म के प्रभाव से होते हैं । अतएव जो ऐहिक एवं पारलौकिक सुख की अभिलाषा करते हैं उन्हें व्रत, संयम, जप-तप एवं दानादि के भेद से अनेक प्रकार के उस मर्म का आचरण करना चाहिये ॥९६॥

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+ यतियों का पर-हित के प्रति अनुराग -
शरीरेऽस्मिन् सर्वाशुचिनि बहुदुःखेऽपि निवसन्
व्यरंसीन्नो नैव प्रथयति जनः प्रीतिमधिकाम् ।
इदं दृष्ट्वाप्यस्माद्विरमयितुमेनं च यतते
यतिर्याताख्यानै: परहितरर्ति पश्य महतः ॥९७॥
अन्वयार्थ : जो शरीर सब प्रकार से अपवित्र और बहुत दुःखों को उत्पन्न करने वाला है ऐसे इस शरीर में रहने वाला प्राणी उससे विरक्त नहीं होता है, बल्कि वह उक्त शरीर को देख करके भी उससे अधिक प्रीति नहीं करता हो सो बात नहीं, किन्तु अधिक ही प्रीति करता है । उसको हितैषी मुनि श्रेष्ठ उपदेशों के द्वारा इस अपवित्र शरीर से विरक्त करने के लिये प्रयत्न करते हैं। ऐसे महापुरुषों का दूसरों के हितविषयक अनुराग देखने योग्य है-प्रशंसनीय है ॥९७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह शरीर अतिशय अपवित्र एवं तीव्र दुःखों का कारण है। फिर भी अज्ञानी प्राणी उससे अनुराग करना नहीं छोडता है । इतना ही नहीं, बल्कि वह उत्तरोत्तर उसमें अधिक ही आसक्त होता है। यह देखकर दयालु साधु उसे अनेक प्रकार से समझा करके उससे विरक्त करने का निरन्तर प्रयत्न करते हैं। दूसरे प्राणियों के कल्याण में निरत रहना यह महात्माओं का स्वभाव ही हुआ करता है। ऐसे साधु पुरुषों का समागम दुर्लभ है। संसार में ऐसे निकृष्ट जन ही अधिक देखे जाते हैं जो दूसरों के साथ मधुर भाषण करके उन्हें धोखा देने में उद्यत रहते हैं ॥९७॥

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+ शरीर : समस्त आपदाओं का स्थान -
इत्थं तथेति बहुना किमुदीरितेन
भूयस्त्वयैव ननु जन्मनि भुक्तमुक्तम् ।
एतावदेव कथितं तव संकलय्य
सर्वापदां पदमिदं जननं जनानाम् ॥९८॥
अन्वयार्थ : हे भव्यजीव ! यह शरीर ऐसा है और वैसा है, इस प्रकार बहुत कहने से क्या प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है ? तूने स्वयं ही इस संसार में उसे अनेक बार भोगा है और छोडा है । संक्षेप में संग्रहरूप से तुझे यही उपदेश दिया है कि यह प्राणियों का शरीर सब दुःखों का घर है॥९८॥

भावार्थ :

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+ गर्भावस्‍था के दुःख -
अन्तर्वान्तं वदनविवरे क्षुत्तृषार्तः प्रतीच्छन्
कर्मायत्तः सुचिरमुदरावस्करे वृद्धगृद्धया।
निष्पन्दात्मा कृमिसहचरो जन्मनि क्लेशभीतो
मन्ये जन्मिन्नपि च मरणात्तन्निमिताद्विभेषि ॥९९॥
अन्वयार्थ : यह प्राणी गर्भावस्था में कर्म के अधीन होकर चिर काल तक माता के पेटरूप विष्ठागृह (संडास) में स्थित रहता है और वहां भूख-प्यास से पीडित होकर बढी हुई तृष्णा से माता के द्वारा खाये हुए भोजन (उच्छिष्ट) की मुंह खोलकर प्रतीक्षा किया करता है। वहां वह स्थान के संकुचित होने से हाथ-पैर आदि शरीर के अवयवों को हिला-डुला नहीं सकता है तथा उदरस्थ कीडों के साथ रहकर जन्म के कष्ट से भयभीत होता है। हे जन्म लेने वाले प्राणी ! तू जो मरण से डरता है सो मैं ऐसा समझता हूं कि वह मरण चूंकि अगले जन्म का कारण है, इसीलिये मानो उस मरण से डरता है, क्योंकि जन्म का कष्ट तुझे अनुभव में आ ही चुका है ॥९९॥

भावार्थ :

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+ अज्ञानी की मूर्खता -
अजाकृपाणीयमनुष्ठितं त्वया विकल्पमुग्धेन भवादितः पुरा ।
यदत्र किंचित्सुखरूपमाप्यते तदार्य विद्धयन्धकवर्तकीयम् ॥१००॥
अन्वयार्थ : हे आर्य ! तूने इस (सम्यग्दर्शनयुक्त) भव से पहिले संसार में हेय और उपादेय के विचार में मूढ होकर अजाकृपाणीय के समान कार्य किया है। यहां जो कुछ सुखरूप सामग्री प्राप्त होती है वह अन्धक-वर्तकीय न्याय से ही प्राप्त होती है ॥१००॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- प्राणी को जब तक सम्यग्दर्शन का लाभ नहीं होता है तब तक उसे अनेक दुख सहने पड़ते हैं । कारण यह है कि सम्यग्दर्शन के बिना उसे यह त्याज्य है और यह ग्राह्य है, इस प्रकार का विवेक नहीं हो पाता है । इसीलिये वह ऐसे भी अनेकों कार्यों को स्वयं करता है कि जिनसे मारने के लिए ले जायी गई बकरी के समान वह अपने आप ही विपत्ति में पडता है। जैसे- कोई एक व्यक्ति मारने के लिये बकरी को ले गया, किन्तु उसके मारने के लिये उसके पास कृपाण (तलवार या छुरी) नहीं था। इस बीच उस बकरी ने पैर से जमीन को खोदना प्रारंभ किया और इसके घातक को वहां भूमि में खड्ग प्राप्त हो गया जिससे कि उसने उसका वध कर डाला । इसी को 'अजा-कृपाणीय' न्याय कहा जाता है । इसी प्रकार सम्यग्दर्शन के बिना यह प्राणी भी अपने लिये ही कष्टकारक उपायों को करता रहता है। उसे जो अल्प समय के लिये कुछ अभीष्ट सामग्नी भी प्राप्त होती है वह ऐसे प्राप्त होती है जैसे कि अन्धा मनुष्य कभी हाथों को फैलाये और उनके बीच में वटेर पक्षी फंस जाय । ऐसा कदाचित् ही होता है, अथवा प्रायः वह असम्भव ही है। यही अवस्था संसारी प्राणियों के सुख की प्राप्ति की भी है ॥१००॥

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+ कामजन्य वेदना -
हा कष्टमिष्टवनिताभिरकाण्ड एव
चण्डो विखण्डयति पण्डितमानिनोऽपि ।
पश्याद्भुतं तदपि धीरतया सहन्ते
दग्धुं तपोऽग्निभिरमुं न समुत्सहन्ते ॥१०१॥
अन्वयार्थ : बडे खेद की बात है कि जो अपने को पण्डित समझते हैं उनको भी यह अतिशय क्रोधी कामदेव (विषयवांछा) असमय में ही इष्ट स्त्रियों के द्वारा खण्डित करता है। फिर भी देखो यह आश्चर्य की बात है कि वे उसे (कामकृत खण्डन को) भी धीरतापूर्वक सहन करते हैं, किन्तु तपरूप अग्नि के द्वारा उस काम को जलाने के लिये उत्साह को नहीं करते हैं ॥१०१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि कामी जन विषयान्ध होकर इच्छापूर्ति के लिये स्त्री आदि की खोज करते हैं और उन्हें प्राप्त करके वे उनमें इतने आसक्त हो जाते हैं कि फिर उनको अपने हिताहित का विवेक ही नहीं रहता। इस प्रकार से वे दोनों ही लोकों को नष्ट करते हैं। यहां इस बात पर खेद प्रगट किया गया है कि विद्वान् मनुष्य भी उस विषयतृष्णा के वशीभूत होकर उसकी पूर्ति के लिये तो असह्य दुख को सहते हैं, किन्तु तप-संयमादि के द्वारा उस विषयतृष्णा को ही नष्ट करने का अल्प दुख नहीं सहते जो कि वस्तुतः परिणाम में सुखकारक ही है । लोक में देखा जाता है कि यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य का शिरच्छेद करने के लिये शस्त्र का प्रयोग करता है तो इसके प्रतिकारस्वरूप दूसरा भी उसका शिरच्छेद करनेके लिये उद्यत होता है । परन्तु कामीजन की दशा इससे विपरीत है, क्योंकि काम तो उनका खण्डन करता है- उनके सुख को नष्ट करता है, परन्तु उसका खण्डन करने के लिये वे स्वयं उद्यत नहीं होते। इतना ही नहीं, किन्तु उस घातक को भी वे अपना मित्र मानकर अनुराग ही करते हैं ॥१०१॥

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+ उत्तरोत्तर उत्कृष्ट त्याग के उदाहरण -
आर्थिभ्यस्तृणवद्विचिन्त्य विषयान् कश्चिच्छ्यिं दत्तवान्
पापां तामवितर्पिणीं विगणयन्नादात् परस्त्यक्तवान् ।
प्रागेवाकुशलां विमृश्य सुभगोऽप्यन्यो न पर्यग्रहीत्
एते ते विदितोत्तरोत्तरवराः सर्वोत्तमारत्यागिनः ॥१०२॥
अन्वयार्थ : कोई विद्वान् मनुष्य विषयों को तृण के समान तुच्छ समझकर लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) को याचकों के लिये दे देता है; दूसरा कोई विवेकी जीव उक्त लक्ष्मी को पाप का कारण और असन्तोषजनक जानकर किसी दूसरे के लिये नहीं देता है, किन्तु उसे यों ही छोड़ देता है । तीसरा कोई महाविवेकी जीव उसको पहिले ही अहितकारक मानकर ग्रहण नहीं करता है । इस प्रकार वे ये त्यागी उत्तरोत्तर त्याग की उत्कृष्टता के जाननेवाले हैं- उत्तरोत्तर उत्कृष्टता को प्राप्त हैं ॥१०२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- विषयतृष्णा का कारण धन-सम्पत्ति है। कारण यह कि उसके होने पर वह विषयभोगाकांक्षा और भी अधिक बढती है । इसीलिये विवेकी जन विषयतृष्णा की मूलभूत उस सम्पत्ति का ही परित्याग करते हैं। प्रकृत श्लोक में उसका परित्याग करने वाले तीन प्रकार के बतलाये गये हैं- (1) पहिले प्रकार के त्यागी वे हैं कि जिन्होंने उस लक्ष्मी को तुच्छ समझते हुए दूसरों (पुत्रादि) को दे करके छोडा है। इन्होंने यद्यपि आत्महित का तो ध्यान रक्खा है, किन्तु जिनके लिये वह दी गई है उनके हित का उन्होंने अनुरागवश ध्यान नहीं रक्खा । (2) दूसरे प्रकार के त्यागी वे हैं कि जिन्होंने उसे पापजनक और तृष्णा को बढानेवाली जानकर स्वयं छोड दिया है तथा दूसरों को भी नहीं दिया है । ऐसे त्यागी अपने समान दूसरों के भी हित का ध्यान रखने के कारण पूर्वोक्त त्यागियों की अपेक्षा श्रेष्ठ होते हैं। (3) तीसरे प्रकार के त्यागी वे हैं कि जिन्होंने अकल्याणकारी समझकर उसे प्रारम्भ में ही नहीं ग्रहण किया। ऐसे त्यागी सर्वोत्कृष्ट त्यागी माने जाते हैं । इसका कारण यह है कि पूर्वोक्त दोनों प्रकार के त्यागियों ने तो भोगने के पश्चात् उसे छोडा है, किन्तु इन्हें उसके स्वरूप को जानकर ही इतनी विरक्ति हुई कि जिससे उन्होंने उसे स्वीकार ही नहीं किया ॥१०२॥

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+ विरक्ति होने पर सम्पत्ति के त्याग में क्या आश्चर्य ? -
विरज्य संपदः सन्तस्त्यजन्ति किमिहाद्भुतम् ।
मा वमीत् किं जुगुप्सावान् सुभुक्तमपि भोजनम् ॥१०३॥
अन्वयार्थ : यदि सज्जन पुरुष विरक्त हो करके उन सम्पत्तियों को छोड देते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? कुछ भी नहीं । ठीक ही है- जिस पुरुष को घृणा उत्पन्न हुई है वह क्या भले प्रकार खाये गये भोजन का भी वमन (उलटी) नहीं करता है ? अर्थात् करता ही है ॥१०३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- किसी व्यक्ति ने भोजन तो बडे आनन्द के साथ किया है, किन्तु यदि पीछे उसे उसमें विषादि की आशंका से घृणा उत्पन्न हो गई है तो इससे या तो उसे स्वयं का हो जाता है; अन्यथा वह प्रयत्नपूर्वक वमन करके उस मुक्त भोजन को निकाल देता है। इसमें वह कष्ट का अनुभव न करके विशेष आनन्द ही मानता है । ठीक इसी प्रकार से जिन विवेकी जनों को परिणाम में अहितकारक जानकर उस सम्पत्ति से घृणा उत्पन्न हो गई है उन्हें उसका परित्याग करनेमें किसी प्रकार का क्लेश नहीं होता, प्रत्युत उन्हें इससे अपूर्व आनन्द का ही अनुभव होता है। उसके परित्याग में कष्ट उन्हीं को होता है जो उसे हितकारी मानकर उसमें अतिशय अनुरक्त रहते हैं ॥१०३॥

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+ लक्ष्मी का त्याग होने पर विभिन्न परिणामवाले त्यागी -
श्रियं त्यजन् जडः शोकं विस्मयं सात्त्विकः स ताम् ।
करोति तत्त्वविच्चित्रं न शोकं न च विस्मयम् ॥१०४॥
अन्वयार्थ : मूर्ख पुरुष लक्ष्मी को छोडता हुआ शोक करता है, तथा पुरुषार्थी मनुष्य उस लक्ष्मी को छोडता हुआ विशेष अभिमान करता है, परन्तु तत्त्व का जानकार उसके परित्याग में न तो शोक करता है और न विशिष्ट अभिमान ही करता है ॥१०४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो मूर्ख जन पुरुषार्थ से रहित होते हैं उनकी सम्पत्ति यदि दुर्भाग्य से नष्ट हो जाती है तो वे इससे बहुत दुखी होते हैं। वे पश्चात्ताप करते हैं कि बडे परिश्रम से यह धन कमाया था, वह कैसे नष्ट हो गया, हाय अब उसके बिना कैसे जीवन बीतेगा आदि। इसके विपरीत जो पुरुषार्थी मनुष्य होते हैं वे जैसे धनको कमाते हैं वैसे ही उसका दानादि में सदुपयोग भी करते हैं । इस प्रकार के त्याग में उन्हें एक प्रकारका स्वाभिमान ही होता है। वे विचार किया करते हैं कि जब मैंने इसे कमाया है तो उसे सत्कार्य में खर्च भी करना ही चाहिये। इससे वह कुछ कम होनेवाला नहीं है । मैं अपने पुरुषार्थ से फिर भी उसे कमा सकता हूं आदि । यदि कदाचित् वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है तो भी अपने पुरुषार्थ के बल पर उन्हें इसमें किसी प्रकार का खेद नहीं होता है। परन्तु इन दोनों के विपरीत जो तत्त्वज्ञानी हैं वे विचार करते हैं कि ये सब धन-सम्पत्ति आदि पर पदार्थ हैं, ये न मेरे और न मैं इनका स्वामी हूं। कर्म के उदय से उनका संयोग और वियोग हुआ ही करता है। ऐसा विचार करते हुए उन्हें सम्पत्ति के परित्याग में न तो शोक होता है और न अभिमान भी॥१०४॥

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+ शरीर से मोह-त्याग की प्रेरणा -
विमृश्योच्चैर्गर्भात् प्रभृति मृतिपर्यन्तमखिलं मुधाप्येतत्क्लेशाशुचिभयनिकाराद्यबहुलम् ।
बुधैस्त्याज्यं त्यागाद्यदि भवति मुक्तिश्च जडधीः
स कस्त्यक्तुं नालं खलजनसमायोगसदृशम् ॥१०५॥
अन्वयार्थ : गर्भ से लेकर मरण पर्यन्त यह जो समस्त शरीरसम्बन्धित आचरण है वह व्यर्थ में प्रचुर क्लेश, अपवित्रता, भय और तिरस्कार आदि से परिपूर्ण हैं; ऐसा जानकर विद्वानों को उसका परित्याग करना चाहिये । उसके त्याग से यदि मोक्ष प्राप्त होता है तो फिर वह कौन-सा मूर्ख है जो दुष्ट जन की संगति के समान उसे छोडने के लिये समर्थ न हो? अर्थात् विवेकी प्राणी उसे छोडते ही हैं ॥१०५॥

भावार्थ :

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+ रागादि छोड़ने की प्रेरणा -
कुबोधरागादिविचेष्टितैः फलं
स्वयापि भूयो जननादिलक्षणम् ।
प्रतीहि भव्य प्रतिलोमवृत्तिभिः
ध्रुवं फलं प्राप्स्यसि तद्विलक्षणम् ॥१०६॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तूने बार बार मिथ्याज्ञान एवं राग-द्वेषादि जनित प्रवृत्तियों से जो जन्म-मरणादिरूप फल प्राप्त किया है उसके विरुद्ध प्रवृत्तियों- सम्यग्ज्ञान एवं वैराग्यजनित आचरणों के द्वारा तू निश्चय से उसके विपरीत फल- अजर-अमर पद- को प्राप्त करेगा, ऐसा निश्चय कर ॥१०६॥

भावार्थ :

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+ दया-दम आदि के मार्ग पर चलने की प्रेरणा -
दयादमत्यागसमाधिसंततेः पथि प्रयाहि प्रगुणं प्रयत्नवान् ।
नयत्यवश्यं वचसामगोचरं विकल्पदूरं परमं किमप्यसौ ॥१०७॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू प्रयत्न करके सरल भाव से दया, इन्द्रियदमन, दान और ध्यान की परम्परा के मार्ग में प्रवृत्त हो जा । वह मार्ग निश्चय से किसी ऐसे उत्कृष्ट पद (मोक्ष) को प्राप्त कराता है जो वचन से अनिर्वचनीय एवं समस्त विकल्पों से रहित है ॥१०७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- दीन-दुखी प्राणियों को देखकर उनके साथ जो हृदय में सहानुभूति का भाव उदित होता है वह दया कहलाती है। यह धर्म की जड है, क्योंकि उसके बिना धर्म स्थिर रह नहीं सकता। कहा भी है-

धर्मो नाम कृपामूलं सा तु जीवानुकम्पनम्।

अशरण्यशरण्यत्वमतो धार्मिकलक्षणन् ॥

अर्थात् धर्म की आधारभूत दया है और उसका लक्षण है प्राणियों के साथ सहानुभूति । इसलिये जो अरक्षित प्राणियों की रक्षा करता है वही धार्मिक माना जाता है ॥क्ष. चू. 5--35॥

दूसरे शब्द से इस दया को अहिंसा कहा जा सकता है और उस अहिंसा में चूंकि सत्यादि का भी अन्तर्भाव होता है अतएव वह दया पंचव्रतात्मक ठहरती है। दम का अर्थ है राग-द्वेष के दमनपूर्वक इन्द्रियों का दमन करना- उन्हें अपने नियन्त्रण में रखना अथवा स्वेच्छाचार में प्रवृत्त न होने देना । इसे दूसरे शब्द से संयम भी कहा जा सकता है जो इन्द्रियसंयम और प्राणिसंयम के भेद से दो प्रकार का है। त्याग से अभिप्राय बाह्य और अभ्यन्तर परिग्रह के त्याग एवं दान का है। समाधि से तात्पर्य धर्म और शुक्लरूप समीचीन ध्यान से हैं । इस प्रकार जो विवेकी जीव मन, वचन और काय की सरलतापूर्वक उपर्युक्त दया आदि चारों की परम्परा का अनुसरण करता है वह निश्चय से अविनश्वर पद को प्राप्त करता है ॥१०७॥

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+ भेद-ज्ञान और वीतरागता की प्रेरणा -
विज्ञाननिहतमोहं कुटीप्रवेशो विशुद्धकायमिव ।
त्यागः परिग्रहाणामवश्यमजरामरं कुरुते ॥१०८॥
अन्वयार्थ : विवेकज्ञान के द्वारा मोह के नष्ट हो जाने पर किया गया परिग्रहों का त्याग निश्चय से जीव को जरा और मरण से रहित इस प्रकार कर देता है जिस प्रकार कि कुटीप्रवेश क्रिया शरीर को विशुद्ध कर देती है ॥१०८॥

भावार्थ :

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+ बाल-ब्रह्मचारियों की प्रशंसा -
अभुक्त्वापि परित्यागात् स्वोच्छिष्टं विश्वमासितम् ।
येन चित्रं नमस्तस्मै कौमारब्रह्मचारिणे ॥१०९॥
अन्वयार्थ : आश्चर्य है कि जिसने स्वयं न भोगते हुए त्याग करके अपने उच्छिष्टरूप विश्व का उपभोग कराया है उस बालब्रह्मचारी के लिये नमस्कार हो॥१०९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिसने राज्यलक्ष्मी आदि के भोगने का अवसर प्राप्त होने पर भी उसे नहीं भोगा और तुच्छ समझकर यों ही छोड दिया है वह सर्वोत्कृष्ट त्यागी माना गया है। जैसे किसी को पहिले कुमारियों ने वरण कर लिया है, परंतु पश्चात् उसने उनके साथ विवाह न करके ब्रह्मचर्य को ही स्वीकार किया हो वह बालब्रह्मचारी उत्कृष्ट ब्रह्मचारी गिना गया है। यहां ऐसे ही सर्वोत्कृष्ट त्यागी को नमस्कार किया गया है कि जिसने लक्ष्मीके उपभोग का अवसर प्राप्त होने पर भी उसे नहीं भोगा, किंतु जो बालब्रह्मचारी के समान उससे अलिप्त रहा है। यहां इस बात पर आश्चर्य भी प्रगट किया गया हैं कि लोक में कोई भी उच्छिष्ट (उलटी या वांति) का उपभोग नहीं करता,परंतु ऐसे महापुरुषों ने अपने उच्छिष्ट का-बिना भोगे ही छोडी गई राज्यलक्ष्मी आदि का-भी दूसरों को उपभोग कराया। तात्पर्य यह कि जो महापुरुष राज्यलक्ष्मी आदि का अनुभव न करके पहिले ही उसे छोड़ देते हैं वे अतिशय प्रशंसनीय हैं । तथा इसके विपरीत जो अविवेकी जन उनके द्वारा तृणवत् छोडी गई उक्त राज्यलक्ष्मी को भोगने के लिये उत्सुक रहते हैं वे अतिशय निंदनीय हैं॥१०९॥

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+ परमात्मा बनने का रहस्य -
अकिंचनोऽहमित्यास्स्व त्रैलोक्याधिपतिर्भवेः ।
योगिगम्यं तव प्रोक्तं रहस्यं परमात्मनः ॥११०॥
अन्वयार्थ : हे भव्य! तू 'मेरा कुछ भी नहीं है' ऐसी भावना के साथ स्थित हो। ऐसा होने पर तू तीन लोक का स्वामी (मुक्त) हो जायगा । यह तुझे परमात्मा का रहस्य (स्वरूप) बतला दिया है जो केवल योगियों के द्वारा प्राप्त करने के योग्य या उनके ही अनुभव का विषय है ॥११०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि पर पदार्थों को अपना समझकर जब तक जीव का उनमें ममत्वभाव रहता है तबतक वह राग-द्वेष से परिणत होकर कर्मों को बांधता हुआ संसारमें परिभ्रमण करता है । और जैसे ही उसका पर पदार्थों से वह ममत्वभाव हटता है वैसे ही वह निर्ममत्व होकर आत्मस्वरूप का चिंतन करता हुआ स्वयं भी परमात्मा बन जाता है ॥११०॥

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+ तप करने की प्रेरणा -
दुर्लभमशुद्धमासुखमविदितमृतिसमयमल्पपरमायुः
मानुष्यमिहैव तपो मुक्तिस्तसैव तत्तप: कार्यम् ॥१११॥
अन्वयार्थ : यह मनुष्य पर्याय दुर्लभ, अशुद्ध और सुख से रहित (दुखमय) है। मनुष्य अवस्था में मरण का समय नहीं जाना जा सकता है। तथा मनुष्य की पूर्वकोटि प्रमाण उत्कृष्ट आयु भी देवायु आदि की अपेक्षा स्तोक है । परन्तु तप इस मनुष्य पर्याय में ही किया जा सकता है और मुक्ति उस तप से ही प्राप्त की जाती है। इसलिये तप का आचरण करना चाहिये ॥१११॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- मुक्ति की प्राप्ति तप के द्वारा होती है और वह तप एक मात्र मनुष्य पर्याय में ही सम्भव है- अन्य किसी देवादि पर्याय में वह सम्भव नहीं है । अतएव उस मनुष्य पर्याय को पा करके तप का आचरण अवश्य करना चाहिये । कारण यह है कि वह मनुष्य पर्याय अतिशय दुर्लभ है । जीवों का अधिकांश समय नरक निगोद आदि में ही बीतता है। वह मनुष्य पर्याय यद्यपि स्वभावतः अशुद्ध ही है, फिर भी चूंकि रत्नत्रय को प्राप्त करके तप का आचरण एक उस मनुष्य पर्याय में ही किया जा सकता है, अतएव वह सर्वथा निन्दनीय भी नहीं है। आचार्य समन्तभद्र स्वामी निर्विचिकित्सित अंग का स्वरूप बतलाते हुए कहते हैं कि-

“स्वभावतोऽशुचौ काये रत्नत्रयपवित्रिते।

निर्जुगुप्सा गुणप्रीतिर्मता निर्विचिकित्सिता॥

अर्थात् यह मनुष्य शरीर यद्यपि स्वभाव से अपवित्र है, फिर भी वह रत्नत्रय की प्राप्ति का कारण होने से पवित्र भी है। अतएव रत्नत्रय का साधक होने से उसके विषय में घृणा न करके गुणों के कारण प्रेम ही करना चाहिये । इसी का नाम निर्विचिकित्सित अंग है ॥ र. श्रा. 13॥

इसके अतिरिक्त वह मनुष्य शरीर कुछ देवशरीर के समान सुख का भी साधन नहीं है कि जिससे सुख को छोडकर उसे तप के खेद में न लगाया जा सके। वह तो आधि और व्याधि का स्थान होने से सदा दुखरूप ही है। यहां पर यह शंका हो सकती थी कि उससे जो कुछ भी विषयसुख प्राप्त हो सकता है उसके भोगने के बाद वृद्धावस्था में उसे तपश्चरण में लगाना ठीक है, न कि उसके पूर्व में। इस शंका के परिहार स्वरूप ही यहां यह बतलाया है कि मृत्यु कब प्राप्त होगी, यह किसी को विदित नहीं हो सकता है । कारण कि देव-नारकियों के समान मनुष्यों में उसका समय नियत नहीं है- वह वृद्धावस्था में भी आ सकती है और उसके पूर्व बाल्यावस्था या युवावस्था में भी आ सकती है। इसके अतिरिक्त जहां देवों और नारकियों की आयु अकालमृत्यु से रहित होकर तेतीस सागरोपम तक होती है वहां मनुष्यों की आयु अधिक से अधिक एक पूर्वकोटि प्रमाण ही हो सकती है । अतएव अच्छा यही है कि सौभाग्य से यदि वह मनुष्य पर्याय प्राप्त हो गई है तो जल्दी से जल्दी उससे प्राप्त करने योग्य रत्नत्रय को प्राप्त कर लें, अन्यथा उसके व्यर्थ नष्ट हो जाने पर फिर से उसे प्राप्त करना अशक्य होगा ॥१११॥

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+ ध्यान तप का ध्येय और फल -
आराध्यो भगवान् जगत्त्रयगुरुर्वृत्तिः सतां संमता
क्लेशस्तच्चरणस्मृतिः क्षतिरपि प्रप्रक्षयः कर्मणाम् ।
साध्यं सिद्धिसुखं कियान् परिमितः कालो मनः साधनं
सम्यक्चेतसि चिन्तयन्तु विधुरं किं वा समाधौ बुधाः ॥११२॥
अन्वयार्थ : ध्यान में तीनों लोकों का स्वामी परमात्मा आराधना करने के योग्य है । इस प्रकार की प्रवृत्ति सज्जनों को अभीष्ट है। उसमें यदि कुछ कष्ट है तो केवल भगवान के चरणों का स्मरण ही है। उससे जो हानि भी होती है वह अनिष्ट कर्मों की ही हानि (नाश) होती है । उससे सिद्ध करने के योग्य मोक्षसुख है। उसमें काल भी कितना लगता है ? अर्थात् कुछ विशेष काल नहीं लगता- अन्तर्मुहूर्त मात्र ही लगता है । उसका साधन (कारण) मन है । अतएव हे विद्वानो! चित्त में उस परमात्मा का भले प्रकार विचार कीजिये, क्योंकि, उसके ध्यान में कष्ट ही क्या है ? कुछ भी नहीं है ॥११२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां यह बतलाया गया है कि जो भव्य जीव मोक्षसुख के अभिलाषी हैं उन्हें सर्वज्ञ वीतराग परमात्मा का ध्यान करना चाहिये । उसका ध्यान करने से ध्याता स्वयं भी परमात्मा बन जाता है । जैसे कि आचार्य कुमुदचन्द्र ने भी कहा है-

" ध्यानाज्जिनेश भवतो भविनः क्षणेन देहं विहाय परमात्मदशां व्रजन्ति । तीव्रानलादुफ्लभावमपास्य लोके चामीकरत्वमचिरादिव धातुभेदाः ॥ "

अर्थात् हे जिनेन्द्र ! आपके ध्यान से भव्यजीव क्षणभर में ही इस शरीर को छोडकर परमात्मा अवस्था को इस प्रकार से प्राप्त हो जाते हैं जिस प्रकार कि धातुभेद (सुवर्णपाषाण) तीव्र अग्नि के संयोग से पत्थर के स्वरूप को छोडकर शीघ्र ही सुवर्णरूपता को प्राप्त हो जाते हैं ॥कल्याण 15॥

यहां उस ध्यान की उपादेयता को बतलाते हुए यह भी निर्देश कर दिया है कि उस ध्यान के करने में न तो कुछ क्लेश है और न किसी प्रकार की हानि भी है। उसमें यदि कुछ क्लेश है तो वह केवल जिनचरणों के स्मरणरूप ही है जो नगण्य है, तथा उससे जो हानि होनेवाली है वह है कर्मों की हानि, सो वह सबको अभीष्ट ही है। वह निरर्थक या अनिष्ट फलदायक भी नहीं है, बल्कि इष्ट फलप्रद (मोक्षसुखदायक) ही है। उसमें बहुत अधिक समय भी नहीं लगता है- उसका समय अधिक से अधिक अन्तर्मुहूर्त परिमित है । इसके अतिरिक्त उसके लिये विशेष साधनसामग्री की भी आवश्यकता नहीं होती, वह केवल अपने मन की एकाग्रता से ही होता है । इस प्रकार जब वह ध्यान सब प्रकार के क्लेश एवं हानि से रहित है, परिमित समय में ही अभीष्ट मोक्षसुख को देनेवाला है, तथा अपने मन के अतिरिक्त अन्य किसी भी कारण की अपेक्षा भी नहीं रखता है तब विवेकी जनों का यह कर्तव्य है कि वे उस कष्टरहित जिनचरणों का ध्यान अवश्य करें ॥११२॥

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+ तप ही समस्त सिद्धियों का साधन है -
द्रविणपवनप्राध्मातानां सुखं किमिहेक्ष्यते
किमपि किमयं कामव्याधः खलीकुरुते खलः ।
चरणमपि किं स्प्रष्टुं शक्ताः पराभवपांसवः
वदत तपसोऽप्यन्यन्मान्यं समीहितसाधनम् ॥११३॥
अन्वयार्थ : धनरूप वायु (तृष्णा) से मर्दित (संतप्त) प्राणियों को भला कौन-सा सुख हो सकता है ? कुछ भी नहीं । अर्थात् जो सुख तपश्चरण से प्राप्त होता है वह सुख धनाभिलाषी प्राणियों को कभी नहीं प्राप्त हो सकता है । उस तप के होते हुए क्या यह कामरूप दुष्ट व्याध (भील) किसी प्रकार का दुष्ट आचरण कर सकता है ? अर्थात् नहीं कर सकता है । इसके अतिरिक्त उक्त तप के होने पर क्या तिरस्काररूप धूलि तपस्वी के चरण को भी छूने के लिये समर्थ हो सकती है ? नहीं हो सकती। हे भव्यप्राणियो! यदि तप से दूसरा कोई अभीष्ट सुख का साधक हो तो उसे बतलाओ। अभिप्राय यह कि यदि प्राणी के मनोरथ को कोई सिद्ध कर सकता है तो वह केवल तप ही है, उसको छोडकर दूसरा कोई भी प्राणी के मनोरथ को पूर्ण करने वाला नहीं है ॥११३॥

भावार्थ :

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+ तप की महिमा -
इहैव सहजान् रिपून् विजयते प्रकोपादिकान्
गुणाः परिणमन्ति यानसुभिरप्ययं वाञ्छति ।
पुरश्च पुरुषार्थसिद्धिरचिरात्स्वयं यायिनी
नरो न रमते कयं तपसि तापसंहारिणि ॥११४॥
अन्वयार्थ : जिस तप के प्रभाव से प्राणी इस लोक में क्रोधादि कषायोंरूप स्वाभाविक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है तथा जिन गुणों को वह अपने प्राणों से भी अधिक चाहता है वे गुण उसे प्राप्त हो जाते हैं । इसके अतिरिक्त उक्त तप के प्रभाव से परलोक में उसे मोक्षरूप पुरुषार्थ की सिद्धि स्वयं ही शीघ्रता से प्राप्त होती है। इस प्रकार से जो तप प्राणियों के संताप को दूर करता है उसके विषय में मनुष्य कैसे नहीं रमता है? अर्थात् रमना ही चाहिये ॥११४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां यह बतलाया गया है कि वह तप प्राणी के लिये उभय लोकों में ही हितकारक है। इस लोक में तो वह इसलिये हितकारक है कि जो क्रोध आदि कषायें अनादि काल से प्राणी का अहित कर रही हैं उनको वह तप नष्ट कर देता है । कारण यह है कि जबतक क्रोधादि कषायें जागृत रहती हैं तबतक वह इच्छानिरोधात्मक तप संभव ही नहीं है । इसके अतिरिक्त वह तप इसी लोक में क्षमा,शांति एवं विशिष्ट ऋद्धि आदि दुर्लभ गुणों को भी प्राप्त कराता है। वह चूंकि परलोक में मोक्ष पुरुषार्थ को सिद्ध कराता है अतएव वह परलोक में भी हित का साधक है । इस प्रकार विचार करके जो विवेकी जीव हैं वे उभय लोक के संताप को दूर करनेवाले उस तप में अवश्य प्रवृत्त होते हैं ॥११४॥

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+ समाधि में ध्यान को सुरक्षित रखने की प्रेरणा -
तपोवल्ल्यां देहः समुपचितपुण्योर्जितफल:
शलाट्वग्रे यस्य प्रसव इव कालेन गलितः।
व्यशुष्यच्चायुष्यं सलिलमिव संरक्षितपयः
स धन्यः संन्यासाहुतभुजि समाधानचरमम् ॥११५॥
अन्वयार्थ : जिसका शरीर तपरूप बेलि के ऊपर पुण्यरूप महान् फल को उत्पन्न करके समयानुसार इस प्रकार से नष्ट हो जाता है जिस प्रकार कि कच्चे फल के अग्रभाग से फूल नष्ट हो जाता है,तथा जिसकी आयु सन्यासरूप अग्नि में रक्षा करनेवाले जल के समान धर्म और शुक्ल ध्यानरूप समाधि की रक्षा करते हुए सूख जाती है वह धन्य है-प्रशंसनीय है ॥११५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ – जिस प्रकार लता में उत्पन्न हुआ फूल फल को उत्पन्न करके उस कच्चे फल के अग्रभाग से स्वयं नष्ट हो जाता है उसी प्रकार जिसका शरीर तपश्चरण के द्वारा महान् पुण्य को उत्पन्न करके तत्पश्चात् स्वयं नष्ट हो जाता है तथा जिस प्रकार आग पर रखे हुए दूध में रहनेवाला पानी स्वयं जलता है, परंतु वह दूध की रक्षा करता है; उसी प्रकार जिस महा पुरुष की आयु ध्यानरूप अग्नि में स्वयं शुष्क होती है, परंतु धर्म एवं शुक्लरूप ध्यान की रक्षा करती है वह महात्मा सराहनीय है- उसी का मनुष्यजन्म पाना सफल है ॥११५॥

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+ तप करने में ज्ञान की महिमा -
अमी प्ररूढवैराग्यास्तनुमप्यनुपाल्य यत्
तपस्यन्ति चिरं तद्धि ज्ञातं ज्ञानस्य वैभवम् ॥११६॥
अन्वयार्थ : जिनके हृदय में विरक्ति उत्पन्न हुई है वे शरीर की रक्षा करके जो चिरकाल तक तपश्चरण करते हैं वह निश्चय से ज्ञान का ही प्रभाव है, ऐसा निश्चित प्रतीत होता है ॥११६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में प्रायः यह देखा जाता है कि जो जिसकी ओर से विरक्त या उदासीन होता है वह उसका रक्षण नहीं करता है । परन्तु विवेकी जन शरीर की ओर से उदासीन (अनुरागरहित) हो करके भी यथायोग्य प्राप्त हुए आहार के द्वारा उसका रक्षण करते हैं। इसका कारण यह है कि वे यह जानते हैं कि इस मनुष्यशरीर से हमें अपना प्रयोजन (मुक्ति) सिद्ध करना है, हमने यदि इसकी रक्षा न की तो यह असमय में ही नष्ट हो जावेगा और तब ऐसी अवस्था में हम उससे अपना प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकेंगे। इसका भी कारण यह है कि यदि यह मनुष्य पर्याय यों ही नष्ट हो गई तो फिर देवादि किसी दूसरी गति में तप का आचरण संभव नहीं है और वह मनुष्य पर्याय कुछ बार बार प्राप्त होती नहीं है। इस प्रकार की विवेकबुद्धि के रहने से ही साधुजन उस शरीर का रक्षण करते हैं, अन्यथा वे उसकी रक्षा न भी करते । हां, यह अवश्य है कि वह शरीर किसी असाध्य रोगादि से आक्रांत होकर यदि अभीष्ट की सिद्धि में ही बाधक बन जाता है तो फिर वे उसकी रक्षा नहीं करते हैं, बल्कि उसे सल्लेखनापूर्वक छोडकर धर्म की ही रक्षा करते हैं ॥११६॥

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+ इस शरीर के साथ आधे क्षण भी रहना सह्य नहीं -
क्षणार्धमपि देहेन साहचर्य सहेत कः।
यदि प्रकोष्ठमादाय न स्याद्वोधो निरोधकः ॥११७॥
अन्वयार्थ : यदि ज्ञान पोंचे (हथेली के ऊपर का भाग) को ग्रहण करके रोकनेवाले न होता तो कौन-सा विवेकी जीव उस शरीर के साथ आधे क्षण के लिये भी रहना सहन करता? अर्थात् नहीं करता ॥११७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- प्राणी जो अनेक प्रकार के दुखों को सहता है वह केवल शरीर के ही संबंध से सहता है, इसीलिये कोई भी विवेकी जीव क्षणभर भी उसके साथ नहीं रहना चाहता है । फिर भी जो वह उसके साथ रहता है, इसका कारण उसका उपर्युक्त (अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धिविषयक) विचार ही है ॥११७॥

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+ परीषह सहने की प्रेरणा -
समस्तं साम्राज्यं तृणमिव परित्यज्य भगवान्
तपस्यन् निर्माणः क्षुधित इव दीनः परगृहान् ।
किलाद्भिक्षार्थी स्वयमलभमानोऽपि सुचिरं
न सोढव्यं किं वा परमिह परैः कार्यवशतः ॥११८॥
अन्वयार्थ : जिन ऋषभ देव ने समस्त राज्य-वैभव को तृण के समान तुच्छ समझकर छोड दिया था और तपश्चरण को स्वीकार किया था वे भी निरभिमान होकर भूखे दरिद्र के समान भिक्षा के निमित्त स्वयं दूसरों के घरों पर घूमे । फिर भी उन्हें निरन्तराय आहार नहीं प्राप्त हुआ। इस प्रकार उन्हें छह मास घूमना पडा । फिर भला अन्य साधारण जनों या महापुरुषों को अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिये यहां क्या (परीषह आदि) नहीं सहन करना चाहिये ? अर्थात् उसकी सिद्धि के लिये उन्हें सब कुछ सहन करना ही चाहिये ॥११८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यह पुराणप्रसिद्ध बात है कि भगवान् ऋषभ देव दीक्षा लेने के बाद छह मास के उपवास को पूर्ण करके आहार के लिये छह माह घूमे थे, परंतु भोगभूमि के बाद उस समय कर्म भूमि का पादुर्भाव होने से कोई भी आहार दान की विधि को नहीं जानता था। इसीलिये उन्हें छह माह तक विधिपूर्वक निरन्तराय आहार नहीं प्राप्त हो सका था । अन्त में जब राजा श्रेयांस को जातिस्मरण हुआ तब उसने जिस विधि से श्रीमती के भव में आहारदान दिया था उसी विधि से भगवान् आदि जिनेन्द्र को आहार दिया इस प्रकार दैववशात् जब भगवान् ऋषभनाथ जैसे महापुरुष को भी निरभिमान होकर भिक्षा के लिये छह माह तक घर-घर घूमना पड़ा और वह नहीं प्राप्त हुई तो फिर यदि साधारण जनों को अपने अभीष्ट प्रयोजन की सिद्धि में कष्ट उपस्थित होता है तो उन्हें वह सहन करना ही चाहिये ॥११८॥

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+ विधि का विलास अलंघ्य है -
पुरा गर्भादिन्द्रो मुकुलितकरः किंकर इव
स्वयं स्रष्टा सृष्टेः पतिरथ निधीनां निजसुतः ।
क्षुधित्वा षण्मासान् स किल पुरुरप्याट जगती
महो केनाप्यस्मिन् विलसितमलङ्घ्यं हतविधेः ॥११९॥
अन्वयार्थ : जिस आदिनाथ जिनेन्द्र के गर्भ में आने के पूर्व छह महिने से ही इन्द्र दास के समान हाथ जोडे हुए सेवा में तत्पर रहा, जो स्वयं ही सृष्टि की रचना करनेवाला था, अर्थात् जिसने कर्मभूमि के प्रारम्भ में आजीविका के साधनों से अपरिचित प्रजा के लिये आजीविकाविषयक शिक्षा दी थी, तथा जिसका पुत्र भरत निधियों का स्वामी (चक्रवर्ती) था; वह इन्द्रादिकों से सेवित आदिनाथ तीर्थंकर जैसा महापुरुष भी बुभुक्षित होकर छह महिने तक पृथ्वी पर घूमा; यह आश्चर्यकी बात है । ठीक है- इस संसार में कोई भी प्राणी दुष्ट दैव के विधान को लांघने में समर्थ नहीं है ॥११९॥

भावार्थ :

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+ संयमधारियों की महिमा -
प्राक् प्रकाशप्रधानः स्यात् प्रदीप इव संयमी।
पश्चात्तापप्रकाशाभ्यां भास्वानिव हि भासताम् ॥१२०॥
अन्वयार्थ : साधु पहिले दीपक के समान प्रकाशप्रधान होता है । तत्पश्चात वह सूर्य के समान ताप और प्रकाश दोनों से शोभायमान होता है ॥१२०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार दीपक केवल प्रकाश से संयुक्त होकर घट-पटादि पदार्थों को प्रकाशित करता है उसी प्रकार साधु भी प्रारम्भ में ज्ञानरूप प्रकाश से संयुक्त होकर स्व और पर के स्वरूप को प्रकाशित करता है। यद्यपि इस समय उसके प्रकाश (ज्ञान) के साथ ही कुछ तप का तेज भी अवश्य रहता है, फिर भी उस समय उसकी प्रधानता नहीं होती जिस प्रकार कि तापकी दीपक में। परन्तु आगे की अवस्था में उसका वह प्रकाश (ज्ञान) सूर्य के प्रकाश के समान समस्त पदार्थों का प्रकाशक हो जाता है। इस अवस्था में उसके जैसे प्रकाश की प्रधानता होती है वैसे ही तेज (तपश्चरण) की भी प्रधानता हो जाती है ॥१२०॥

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+ ज्ञानियों की दीपक से तुलना -
भूत्वा दीपोपमो धीमान् ज्ञानचारित्रभास्वरः ।
स्वमन्यं भासयत्येष प्रोद्वमत्कर्म (न् कर्म) कज्जलम् ॥१२१॥
अन्वयार्थ : वह बुद्धिमान् साधु दीपक के समान होकर ज्ञान और चारित्र से प्रकाशमान होता है। तब वह कर्मरूप काजल को उगलता हुआ स्व के साथ पर को प्रकाशित करता है ॥१२१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार दीपक प्रकाश और तेज से युक्त होकर काजल को छोडता है और घट-पटादि पदार्थों को प्रगट करता है उसी प्रकार साधु भी ज्ञान और चारित्र से दीप्त होकर कर्म की निर्जरा करता है तथा आत्म-परस्वरूप को जानता भी है॥१२१॥

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+ अशुभ और शुभ छोड़ने का क्रम -
अशुभाच्छुभमायातः शुद्धः स्यादयमागमात् ।
रवेरप्राप्तसंध्यस्य तमसो न समुद्गमः ॥१२२॥
अन्वयार्थ : यह आराधक भव्यजीव आगमज्ञान के प्रभाव से अशुभस्वरूप असंयम अवस्था से शुभरूप संयम अवस्था को प्राप्त हुआ समस्त कर्ममल से रहित होकर शुद्ध हो जाता है । ठीक है- सूर्य जबतक सन्ध्या (प्रभातकाल) को नहीं प्राप्त होता है तबतक वह अन्धकार को नष्ट नहीं करता है ॥१२२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार सूर्य प्रथमतः रात्रि अन्धकार से निकलकर प्रभातकाल को प्राप्त करता है और तब फिर कहीं वह अन्धकार से रहित होता है, उसी प्रकार आराधक भी पहिले रात्रिगत अन्धकार के समान अशुभ से निकलकर प्रभात के समान शुभ (सरागसंयम) को प्राप्त करता है और तब फिर कहीं कर्मकलंकरूप अन्धकार से रहित होता है। अभिप्राय यह है कि प्राणी का आचरण पूर्व में प्रायः असंयमप्रधान रहता है, तत्पश्चात् वह यथाशक्ति असंयममय प्रवृत्ति को छोडकर संयम के मार्ग में प्रवृत्त होता है। यह हुई उसकी अशुभ से शुभ में प्रवृत्ति । यद्यपि कर्मबन्ध (पराधीनता) की अपेक्षा इन दोनों में कोई विशेष भेद नहीं है, फिर भी जहां अशुभ से पाप कर्म का बन्ध होता है वहां शुभ से पुण्यकर्म का बन्ध होता है। इस प्रकार से उसे शुद्ध होने की साधनसामग्री उपलब्ध होने लगती है, जो कि पापबन्ध के होने पर असम्भव ही रहती है। उदाहरण के रूप में जैसे प्रभात-काल में यद्यपि रात्रिगत अन्धकार की सघनता नहीं होती है, फिर भी कुछ अंश में तब भी अन्धकार रहता है, पूर्ण अन्धकार का विनाश तो दिन में ही हो पाता है । इस प्रकार वह शुभ में स्थित रहकर अन्त में अपने शुद्ध स्वरूप को भी प्राप्त कर लेता है ॥१२२॥

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+ ज्ञानियों का तप और श्रुत के प्रति अनुराग कल्याणकारी है -
विधूततमसो रागस्तपःश्रुतनिबन्धनः ।
संध्याराग इवार्कस्य जन्तोरभ्युदयाय सः ॥१२३॥
अन्वयार्थ : अज्ञानरूप अन्धकार को नष्ट कर देनेवाले प्राणी के जो तप और शास्त्रविषयक अनुराग होता है वह सूर्य को प्रभातकालीन लालिमा के समान उसके अभ्युदय (अभिवृद्धि) के लिये होता है ॥१२३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार प्रभातकाल में उदित होनेवाले सूर्य की लालिमा उसकी अभिवृद्धि का कारण होती है उसी प्रकार अज्ञान से रहित हुए विवेकी जीव का भी तप एवं श्रुत से सम्बद्ध अनुराग उसकी अभिवृद्धि का- स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति का कारण होता है। जो अनुराग हानि (दुर्गति) का कारण होता है वह अज्ञानी का ही होता है और वह भी विषयभोगविषयक अनुराग विवेकी (सम्यग्दृष्टि) जीव का वह तप आदिविषयक अनुराग कभी हानि का कारण नहीं हो सकता है॥१२३॥

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+ अशुभराग में दोष की अधिकता -
विहाय व्याप्तमालोकं पुरस्कृस्य पुनस्तमः ।
रविवद्रागमागच्छन् पातालतलमृच्छति ॥१२४॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार सूर्य फैले हुए प्रकाश को छोडकर और अन्धकार को आगे करके जब राग (लालिमा) को प्राप्त होता है तब वह पाताल को जाता है- अस्त हो जाता है, उसी प्रकार जो प्राणी वस्तुस्वरूप को प्रकाशित करनेवाले ज्ञानरूप प्रकाश को छोडकर अज्ञान को स्वीकार करता हुआ राग (विषयवांछा) को प्राप्त होता है वह पातालतल को- नरकादि दुर्गति को- प्राप्त होता है ॥१२४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- सूर्य जिस प्रकार प्रभात समय में लालिमा को धारण करता है उसी प्रकार वह सन्ध्या समय में भी उक्त लालिमा को धारण करता है । परन्तु जहां प्रभातकालीन लालिमा उसके अभ्युदय (उदय या वृद्धि ) का कारण होती है वहां वह सन्ध्या समय की लालिमा उसके अधःपतन (अस्तगमन) का कारण होती है । ठीक इसी प्रकार से जो प्राणी अज्ञान को छोडकर तप एवं श्रुत आदि के विषय में राग को प्राप्त होता है वह राग उसके अभ्युदय-स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति- का कारण होता है, किन्तु जो प्राणी विवेक को नष्ट करके अज्ञानभाव को प्राप्त होता हुआ विषयानुराग को धारण करता है वह अनुराग उसके अधःपतन का- नरक-निगोदादि की प्राप्ति का- कारण होता है। इस प्रकार तपश्रुतानुराग और विषयानुराग इन दोनों में अनुरागरूप से समानता के होने पर भी महान् अन्तर है- एक ऊर्ध्वगमन का कारण है और दूसरा अधोगमन का कारण है ॥१२४॥

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+ मोक्षमार्ग की यात्रा -
ज्ञानं यत्र पुरःसरं सहचरी लज्जा तपः संबलं
चारित्रं शिबिका निवेशनभुवः स्वर्गा गुणा रक्षकाः ।
पन्थाश्च प्रगुणः शमाम्बुबहुलश्छाया दयाभावना
यानं तं मुनिमापयेदभिमतं स्थानं विना विप्लवैः ॥१२५॥
अन्वयार्थ : जिस यात्रा (गमन) में ज्ञान मार्गदर्शक है, लज्जा मित्र के समान सदा साथ में रहनेवाली है, तपरूप पाथेय (मार्ग में खाने योग्य भोजन) है, चारित्र शिविका (पालकी) है, निवेशस्थान (पडाव) स्वर्ग है, रक्षा करने वाले वीतरागता आदि गुण हैं, मार्ग (रत्नत्रयरूप) सरल (मन, वचन च काय की कुटिलता से रहित) एवं शान्तिरूप प्रचुर जल से परिपूर्ण है, तथा छाया दयाभावना है ; वह यात्रा उस मुनि को विघ्न-बाधाओं से रहित होकर अभीष्ट स्थान को प्राप्त कराती है ॥१२५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस पथिक के पास सुपरिचित मार्गदर्शक हो, मित्र साथ में हो, नाश्ता पास में हो, सवारी उत्तम हो, बीच में ठहरने का स्थान सुरक्षित हो, रक्षक साथ में हो; तथा मार्ग सरल (सीधा), जल से सहित एवं छायायुक्त सघन वृक्षों से व्याप्त हो; वह पथिक जिस प्रकार नव विघ्न-बाधाओं से रहित होकर निश्चित ही अपने अभीष्ट स्थान को पहुंच जाता है उसी प्रकार जिस मुक्ति-पुरी के पथिक के पास ज्ञान मार्गदर्शक के समान है, पापवृत्ति से बचाने वाली लज्जा हितैषी मित्र के समान सदा साथ में रहनेवाली है, पाथेय का काम करनेवाला तप विद्यमान है, सवारी का काम करनेवाला चारित्र है, स्वर्ग पडाव के समान हैं, उत्तम क्षमा आदि गुण राग-द्वेषादिरूप चोरों से रक्षा करनेवाले हैं, तथा रत्नत्रय स्वरूप मार्ग सरल (मन, वचन एवं काय की कुटिलता से रहित), शान्तिरूप जल से परिपूर्ण एवं दयाभावनारूप छाया से सहित है; वह मुक्ति का पथिक साधु सब प्रकार की विघ्न-बाधाओं से रहित होता हुआ अवश्य ही अपने अभीष्ट पद (मोक्ष) को प्राप्त करता है। अभिप्राय यह है कि जो मुनि सम्यग्दर्शन आदि चार आराधनाओं का आराधान करता है वह निःसन्देह मोक्ष को प्राप्त करता है। प्रस्तुत श्लोक में जिस प्रकार ज्ञान,तप और चारित्र इन तीन आराधनाओं का पृथक् पृथक् उल्लेख किया है वैसा सम्यग्दर्शन आराधना का पृथक् उल्लेख नहीं किया गया है, किन्तु उसे ज्ञानाराधना के अन्तर्गत ग्रहण किया गया है । इसका कारण सम्यग्ज्ञान का उक्त सम्यग्दर्शन के साथ अविनाभाव है- उसका सम्यग्दर्शन के विना आविर्भूत नहीं होना है। इसीलिये उसका पृथक् उल्लेख नहीं किया है॥१२५॥

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+ स्त्रियों का महाविषमय स्वरूप -
मिथ्या दृष्टिविषान् वदन्ति फणिनो दृष्टं तदा सुस्फुटम् यासामर्धविलोकनैरपि जगद्दम् दह्यते सर्वतः ।
तास्त्वय्येव विलोमवर्तिनि भृशं भ्राम्यन्ति बद्धक्रुधः
स्त्रीरूपेण विषं हि केवलमतस्तद्गोचरं मा स्म गाः ॥१२६॥
अन्वयार्थ : व्यवहारी जन जो सर्पों को दृष्टिविष कहते हैं वह असत्य हैं, क्योंकि,वह दृष्टिविषत्व तो उन स्त्रियों में स्पष्टतया देखा जाता है जिनके अर्धविलोकन रूप कटाक्षों के द्वारा ही संसार (प्राणी) सब ओर से अतिशय संतप्त होता है । हे साधो ! तू जो उनके विरुद्ध आचरण कर रहा है सो वे तेरे ही विषय में अतिशय क्रोध को प्राप्त होकर इधर उधर घूम रही हैं । वे स्त्री के रूप में केवल विष ही हैं। इसीलिये तू उनका विषय न बन॥१२६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व के श्लोक में यह बतलाया था कि जो सम्यग्दर्शनादि आराधनाओं का आराधान करता है उसे मुक्ति पद की प्राप्ति में कोई बाधा नहीं उपस्थित हो सकती है । इस पर यह शंका हो सकती थी ऐसी कौन-सी वे बाधायें हैं जिनकी कि मोक्षमार्ग में प्रवृत्त हुए साधु के लिये सम्भावना की जा सकती है ? इस शंका के निराकरणस्वरूप ही यहां बतलाना चाहते हैं कि उक्त साधु के मार्ग में स्त्री आदि के द्वारा बाधा उपस्थित की जा सकती है, अतएव साधुजन को उनकी ओर से विमुख रहना चाहिये । कारण यह कि ये सर्प की अपेक्षा भी अधिक कष्ट दे सकती हैं । लोक में सर्पों की एक दृष्टिविष जाति प्रसिद्ध है । इस जाति का सर्प जिसकी ओर केवल नेत्र से ही देखता है वह विष से संतप्त हो जाता है । ग्रन्थकार कहते हैं कि उक्त जाति के सर्पों को दृष्टिविष न कहकर वास्तव में उन स्त्रियों को दृष्टिविष कहना चाहिये जिनकी कि अर्ध दृष्टि के (कटाक्ष के) पडने मात्र से ही प्राणी विष से व्याप्त-काम से संतप्त हो उठता है। जो साधु उनकी ओर से विरक्त रहना चाहता है उसे वे अपनी ओर आकृष्ट करने के लिये अनेक प्रकार की हाव-भाव एवं विलासादिरूप चेष्टाए करती हैं। इसलिये यहां यह प्रेरणा की गई है कि जो भव्य प्राणी अपना हित चाहते हैं वे ऐसी स्त्रियों के समागम से दूर रहें ॥१२६॥

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+ स्त्रीरूपी सर्प के विष की औषधि नहीं -
क्रुद्धाः प्राणहरा भवन्ति भुजगा दष्ट्वैव काले क्वचित्
तेषामौषधयश्च सन्ति बहवः सद्यो विषब्युच्छिदः ।
हन्युः स्त्रीभुजगाः पुरेह च मुहुः क्रुद्धाः प्रसन्नास्तथा
योगीन्द्रानपि तान् निरौषधविषा दृष्टाश्च दृष्ट्वापि च ॥१२७॥
अन्वयार्थ : सर्प तो किसी विशेष समय में क्रोधित होते हुए केवल काटकर ही प्राणों का नाश करते हैं, तथा वर्तमान में उनके विष को नष्ट करनेवाली बहुत-सी औषधियां भी हैं । परंतु स्त्रीरूप सर्प क्रोधित होकर तथा प्रसन्न हो करके भी उन प्रसिद्ध महर्षियों को भी इस लोक में और पर लोक में भी बार बार मार सकती हैं । वे जिसकी ओर देखें उसका तथा जो उनकी ओर देखता है उसका भी-दोनों का ही-घात करती हैं तथा उनके विष को दूर करने वाली कोई औषधि भी नहीं हैं ॥१२७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व श्लोक में स्त्रियों को जो दृष्टिविष सर्प की अपेक्षा भी अधिक दुखप्रद बतलाया है उसी का स्पष्टीकरण प्रस्तुत श्लोक के द्वारा किया जा रहा है । यथा- सर्प जब किसी के द्वारा बाधा को प्राप्त होता है तब ही वह क्रुद्ध होकर किसी विशेष काल और किसी विशेष देश में ही काटता है तथा उसके विष को नष्ट करने में समर्थ ऐसी कितनी ही औषधियां भी पायी जाती हैं । फिर भी यदि वह अधिक से अधिक कष्ट दे सकता है तो केवल एक बार मरण का ही कष्ट दे सकता है। परंतु स्त्रियां जिसके ऊपर क्रुद्ध हो जाती हैं उसे तो वे विषप्रयोग आदि के उपायों से मारती ही हैं, किन्तु जिसके ऊपर वे प्रसन्न रहती हैं उसे भी मारती हैं- कामासक्त करके इस लोक में तो रुग्णता व बन्दीगृह आदि के कष्ट को दिलाती हैं तथा परलोक में नरकादि दुर्गतियों के दुख के भोगने में निमित्त होती हैं । साधारण जन की तो बात ही क्या है, किन्तु वे बडे बडे तपस्वियों को भी भ्रष्ट कर देती हैं । इसके अतिरिक्त दृष्टिविष सर्प जिसकी ओर देखता है उसे ही वह विष से संतप्त करता है, किन्तु वे स्त्रियां जिसकी ओर स्वयं दृष्टिपात (कटाक्षपात) करती हैं उसे काम से संतप्त करती हैं और जिसकी ओर वे न भी देखें, पर जो उनकी ओर देखता है उसे भी वे काम से संतप्त करती हैं । इसके अतिरिक्त सर्प के विष से मूर्छित हुए प्राणी के विष को दूर करनेवाली औषधियां भी उपलब्ध हैं, पर स्त्रीविष से मूर्छित (कामासक्त) प्राणी को उससे मुक्त कराने वाली कोई भी औषधि उपलब्ध नहीं है । इस प्रकार जब स्त्रियां सर्प से भी अधिक दुख देने वाली हैं तब आत्महितैषियों को उनकी ओर से विरक्त ही रहना चाहिये ॥१२७॥

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+ मुक्ति-स्त्री से ही अनुराग की प्रेरण -
एतामुत्तमनायिकामभिजनावर्ज्यां जगत्प्रेयसीं
मुक्तिश्रीललनां गुणप्रणयिनीं गन्तुं तवेच्छा यदि ।
तां त्वं संस्कुरु वर्जयान्यवनितावार्तामपि प्रस्फुतटं
तस्यामेव रतिम् तनुष्व नितरां प्रायेण सेर्ष्याः स्त्रियः ॥१२८॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! जो यह मुक्तिरूप सुन्दर महिला उत्तम नायिका है, कुलीन जनों को ही प्राप्त हो सकती है, विश्व की प्रियतमा है, तथा गुणों से प्रेम करनेवाली है; उसको प्राप्त करने की यदि तेरी इच्छा है तो तू उसको संस्कृत कर- रत्नत्रयरूप अलंकारों से विभूषित कर- और दूसरी (लोक प्रसिद्ध) स्त्री की बात भी न कर । केवल तू उसके विषय में ही अतिशय अनुराग कर; क्योंकि, स्त्रियां प्रायः ईर्ष्यालु होती हैं ॥१२८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- एक ओर लोकप्रसिद्ध स्त्री है और दूसरी ओर मुक्तिरूपी अपूर्व स्त्री है। इनमें लोकप्रसिद्ध स्त्री जहां कुलीन एवं अकुलीन सब ही जनों को प्राप्त हो सकती है वहां मुक्ति ललना केवल कुलीन जन को ही प्राप्त हो सकती है वह नीच एवं दुराचारी जनों को दुर्लभ है । लौकिक स्त्री केवल कामी जनों को ही प्यारी होती है, परन्तु मुक्ति-कान्ता समस्त विश्व को ही प्यारी है । लौकिक स्त्री जहां केवल धन-सम्पत्ति आदि में ही अनुराग रखती है वहां मुक्ति-सुन्दरी केवल उत्तमोत्तम गुणों में ही अनुराग रखती है। लौकिक स्त्री से यदि ऐहिक क्षणिक सुख प्राप्त होता है तो मुक्ति-रमणी से पारलौकिक अविनश्वर सुख प्राप्त होता है। इस प्रकार से इन दोनों का स्वभाव सर्वथा भिन्न है । अतएव जो लौकिक स्त्रीको चाहता है उसे मुक्ति-वल्लभा दुर्लभ है तथा जो मुक्ति-वल्लभा को चाहता है उसे लौकिक स्त्री से मोह छोडना पडता है, कारण कि इसके बिना वह प्राप्त हो ही नहीं सकती है। इसीलिये तो यह नीति प्रसिद्ध है कि स्त्रियां प्रायः करके अत्यन्त ईर्ष्यायुक्त होती हैं। ऐसी स्थिति में जो भव्य मुक्ति-रमा को चाहता है उसे लौकिक स्त्री की चाह तो दूर रही, किन्तु उसे उसका नाम भी नहीं लेना चाहिये, इसके अतिरिक्त लौकिक स्त्री को प्रसन्न करने के लिये जिस प्रकार उसे कटिसूत्र, केयूर एवं हार आदि अलंकारोंसे अलंकृत किया जाता है उसी प्रकार मुक्ति-कान्ता को प्रसन्न करने के लिये उसे सम्यग्दर्शनादिरूप रत्नमय आभूषणों से विभूषित करना चाहिये ॥१२८॥

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+ नारी को सरोवर की उपमा -
वचनसलिलैर्हासस्वच्छैस्तरङ्गसुखोदरैः
वदनकमलैर्बाह्ये रम्याः स्त्रियः सरसीसमाः।
इह हि बहवः प्रास्तप्रज्ञास्तटेऽपि पिपासवो
विषयविषमग्राहग्रस्ताः पुनर्न समुद्गताः ॥१२९॥
अन्वयार्थ : वे स्त्रियां सरसी (छोटा तालाब) के समान बाहिर से ही रमणीय दिखती हैं- सरसी जिस प्रकार चंचल तरंगों से युक्त स्वच्छ जल एवं कमलों से सुशोभित होती है उसी प्रकार वे स्त्रियां भी तरंगों के समान चंचल (अस्थिर) सुख को उत्पन्न करने वाले हास्ययुक्त मनोहर वचनोंरूप जल से तथा मुखरूप कमलों से रमणीय होती हैं । जिस प्रकार बहुत-से बुद्धिहीन (मूर्ख) प्राणी प्यास से पीडित होकर सरोवर पर जाते हैं और किनारे पर ही भयानक हिंस्र जलजन्तुओं के ग्रास बनकर- उनके द्वारा मरण को प्राप्त होकर-फिर नहीं निकल पाते हैं उसी प्रकार बहुत-से अज्ञानी प्राणी भी विषयतृष्णा से व्याकुल होकर उन स्त्रियों के पास पहुंचते हैं और हिंस्र जलजन्तुओं के समान अतिशय भयानक विषयों से ग्रस्त होकर- उनमें अतिशय आसक्त होकर-फिर नहीं निकलते अर्थात् नरकादि दुर्गतियों में पडकर फिर उत्तम मनुष्यादि पर्याय को नहीं पाते हैं ॥१२९॥

भावार्थ :

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+ नारी, काम द्वारा निर्मित घातस्थल है -
पापिष्ठैर्जगतीविधीतमभितः प्रज्वाल्य रागानलं
क्रुद्धैरिन्द्रियलुब्धकैर्भयपदैः संत्रासिताः सर्वतः ।
हन्तैते शरणैषिणो जनमृगाः स्त्रीछद्मना निर्मितं
घातस्थानमुपाश्रयन्ति मदनव्याधाधिपस्याकुलाः ॥१३०॥
अन्वयार्थ : अतिशय पापी, क्रूर एवं भय को उत्पन्न करनेवाले इन्द्रियों रूप अहेरियों (शिकारियों) के द्वारा संसाररूप विधीत (मृग व सिंहादि के रहने का स्थान) के चारों ओर रागरूप अग्नि को जलाकर सब ओर से पीडा को प्राप्त कराये गये ये मनुष्यरूप हिरण रक्षा की इच्छा से व्याकुल होकर स्त्री के छल से बनाये गये कामरूप व्याधराज (अहेरियों का स्वामी) के घातस्थान (मरणस्थान) को प्राप्त होते हैं, यह खेद की बात है ॥१३०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- दुष्ट अहेरी मृगादिकों का घात करने के लिये उनके निवासस्थान के चारों ओर आग जला देते हैं जिससे वे भयभीत होकर रक्षा की दृष्टि से उस स्थान को प्राप्त होते हैं जो कि अहेरियों के द्वारा उनका ही घात करने के लिये बनाया गया है। इस प्रकार से वे वहां जाकर उनके द्वारा मारे जाते हैं ठीक इसी प्रकार से उन अहेरियों के समान दुष्ट इन्द्रियां इस संसार में प्राणियों को विषयासक्त करने के लिये उन विषयों के प्रति राग को उत्पन्न कराती हैं, जिससे व्याकुल होकर वे प्राणी उन मृगों के ही समान शान्ति प्राप्त करने की इच्छा से उस स्त्रीरूप घातस्थान को प्राप्त होते हैं जो मानों उनके नष्ट-भ्रष्ट करने के लिये ही बनाया गया है। अभिप्राय यह है जिस प्रकार हिरण अज्ञानता से अपना ही वध कराने के लिये शिकारियों द्वारा निर्मित वधस्थान में जा फंसते हैं उसी प्रकार ये अविवेकी प्राणी भी विषयतृष्णा के वशीभूत होकर उसको शान्त करने की इच्छा से स्त्री का आश्रय लेते हैं । परन्तु होता है उससे विपरीत- जिस विषयतृष्णा को वे शान्त करना चाहते थे वह स्त्री का आश्रय पाकर उत्तरोत्तर अधिकाधिक वृद्धि को ही प्राप्त होती है । परिणाम यह होता है कि इस प्रकार विषयविमूढ होकर प्राणी धर्माचरण को भूल जाता है और पाप का संचय करता है जिससे कि वह दुर्गति में पडकर अनेक दुःखों को भोगता है ॥१३०॥

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+ नारी के प्रति आसक्ति में निर्लज्जता -
अपत्रप तपोऽग्निना भयजुगुप्सयोरास्पदं
शरीरमिदमर्धदग्धशववन्न किं पश्यसि ।
वृथा व्रजसि किं रतिम् ननु न भीषयस्यातुरो
निसर्गतरलाः स्त्रियस्त्वदिह ताः स्फुटं बिभ्यति ॥१३१॥
अन्वयार्थ : हे निर्लज्ज ! यह तेरा शरीर तपरूप अग्नि से अधजले शव (मृत शरीर) के समान भय और घृणा का स्थान बन रहा है । क्या तू उसे नहीं देखता है? फिर तू उत्सुक होकर व्यर्थ में क्यों स्त्रियों के विषय में अनुराग को प्राप्त होता है। ऐसे शरीर को धारण करता हुआ तू उन स्त्रियों के लिये भय को न उत्पन्न कराता हो सो बात नहीं है, किन्तु उन्हें निश्चय से भय को प्राप्त कराता ही है । संसार में स्त्रियां स्वभाव से ही कातर होती हैं । वे तेरे भयानक शरीर को देखकर स्पष्टतया भयभीत होती हैं॥१३१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो भव्य जीव सब इन्द्रियविषयों को छोडकर मुनिधर्म को स्वीकार करता है और तपश्चरण में प्रवृत्त हो जाता है वह यदि तत्पश्चात् स्त्रियों के विषय में अनुरक्त होता है तो यह उसके लिये लज्जा की बात है । ऐसे ही साधु के लक्ष्य में रखकर यहां यह कहा गया है कि हे निर्लज्ज ! तेरा यह शरीर तप के कारण मलिन एवं बीभत्स हो गया है । तू जिन स्त्रियों को चाहता है वे तेरे इस घृणित शरीर को देखकर इस प्रकार से भयभीत होगी जिस प्रकार कि मनुष्य अधजले मृतशरीर (मुर्दा) को देखकर भयभीत होते हैं । ऐसी अवस्था में यह तू ही बता कि जैसे तू उन स्त्रियों को चाहता है वैसे ही क्या वे भी तुझे चाहेगी या नहीं ? चाहना तो दूर ही रहा, किन्तु वे तुझे देखकर भय से दूर ही भागेगीं। फिर भला तू उनके विषय में अनुरक्त होकर व्यर्थ में अपने आपको क्यों दुर्गति में डालता है ? यह तेरे लिये उचित नहीं है ॥१३१॥

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+ काम सेवन में खेद -
उत्तुङगसंगतकुचाचलदुर्गदूर
माराद्वलित्रयसरिद्विषमावतारम् ।
रोमावलीकुसृतिमार्गमनङगमूढाः
कान्ताकटीविवरमेत्य न केऽत्र खिन्नाः ॥१३२॥
अन्वयार्थ : जो स्त्री की योनि ऊंचे एवं परस्पर मिले हुए स्तनोंरूप पर्वतीय दुर्ग से दुर्गम है, पास ही उदर में स्थित त्रिवलीरूप नदियों से जहां पहुंचना भयप्रद है, तथा जो रोमपंक्तिरूप इधर उधर भटकानेवाले मार्ग से संयुक्त हैं; ऐसी उस स्त्री की योनि को पाकर कौन-से कामान्ध प्राणी यहां खेद को नहीं प्राप्त हुए हैं ? अर्थात् वे सभी दुख को प्राप्त हुए हैं ॥१३२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस स्थान का मार्ग ऊंचे पर्वतों से दुर्गम हो, जिसके मध्य में नदियां पडती हों, तथा जो भयानक वन से व्याप्त हो,ऐसे मार्ग में उस स्थान को जानेवाले प्राणी जैसे अतिशय खेद को प्राप्त होते हैं वैसे ही पर्वत जैसे उन्नत स्तनों से सहित, त्रिवलीरूप नदियों से वेष्टित और रोमपंक्तिरूप वनराजि से व्याप्त उस योनिस्थान को प्राप्त करनेवाले कामीजन भी इस लोक में खेद को (आकुलता को) प्राप्त होते हैं तथा इस प्रकार से पाप का संचय करके वे परलोक में भी दुखी होते है॥१३२॥

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+ स्त्री की योनि का वीभत्सरूप -
वर्चोंगृहं विषयिणां मदनायुधस्य नाडीव्रणं विषमनिर्वृतिपर्वतस्य । प्रच्छन्नपादुकमनङगमहाहिरन्ध्रमाहुर्बुधाः जघनरन्ध्रमदः सुदत्याः॥१३३॥
अन्वयार्थ : सुन्दर दांतोंवाली स्त्री का यह जो जांघों के बीच में स्थित छिद्र है उसे पण्डित जन कामी पुरुषों के मल (वीर्य) का घर, कामदेव के शस्त्र का नाडीव्रण अर्थात् नस के ऊपर (उत्पन्न हुआ) घाव, दुर्गम मोक्षरूप पर्वत का ढका हुआ गड्ढा तथा कामरूप महासर्प का छिद्र (बांवी) बतलाते हैं ॥१३३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- कामी जन स्त्री के जिस योनिस्थान में क्रीडा करते हुए आनन्द का अनुभव करते हैं वह कितना घृणास्पद और अनर्थ का कारण है, इसका यहां विचार करते हुए यह बतलाया है कि वह योनिस्थान पुरीषालय (संडास) के समान है- जैसे मनुष्य पुरीषालय में मल-मूत्र का क्षेपण करते हैं वैसे ही कामी जन इसमें घृणित वीर्य का क्षेपण करते हैं। फिर भी आश्चर्य है कि जो विषयी जन पुरीषालय में जाते हुए तो कष्ट का अनुभव करते हैं, किन्तु उसमें क्रीडा करते हुए वे कष्ट के स्थान में आनन्दका अनुभव करते हैं । वह योनिस्थान क्या है- जिस प्रकार शत्रु बाण आदि किसी शस्त्र प्रहार से घाव को उत्पन्न करता है उसी प्रकार कामरूप शत्रु ने अपने बाण को मारकर मानो वह घाव ही उत्पन्न कर दिया है। फिर भी खेद इस बात का है कि जो लोग शरीर में थोडा-सा भी घाव उत्पन्न होने पर दुःखी होते हैं वे ही इस घाव को आनंददायक मानते हैं इसमें उन्हें किसी प्रकार दुःख नहीं होता। जिस प्रकार किसी ऊंचे विषम (ऊंचा-नीचा) पर्वत के उपान्त में गहरा गड्ढा हो और वह भी घास एवं पत्तों आदि से आच्छादित हो तो उसके ऊपर चढनेवाला मनुष्य उक्त गड्ढे को न देख सकने के कारण उसमें गिर जाता है और वहीं पर मरणको प्राप्त होता है । ठीक उसी प्रकार से वह योनिस्थान भी मोक्षरूप उन्नत पर्वत पर चढ़नेवालों के लिये उस पर्वत के गड्ढे के ही समान है जिसमें कि पडकर वे फिर निकल नहीं पाते- कामासक्त होकर विषयों में रमते हुए दुर्गति के पात्र बनते हैं। इसके अतिरिक्त जिस प्रकार सर्प की बांवी प्राणी को दुःखदायक होती है उसी प्रकार स्त्री का वह योनिस्थान भी कामी जनों के लिये दुःख का देनेवाला है। इसका कारण यह है जिस प्रकार बांवी में हाथ डालनेवाले प्राणियों को उसके भीतर स्थित सर्प काट लेता है, जिससे कि वह मरण को प्राप्त करता है, उसी प्रकार उस योनिस्थान में क्रीडा करनेवालों को वह कामरूप सर्प काट लेता है, जिससे कि वे भी हिताहित के विवेक से रहित होकर विषयों में आसक्त होते हुए मरण को प्राप्त होते हैं- अपनेको दुःख में डालते हैं । इसलिये जो पथिक सावधान होते हैं वे चूंकि मार्ग को भले प्रकार देख-भाल करके ही पर्वत के ऊपर चढते हैं इसीलिये जैसे वे अभीष्ट स्थान में जा पहुंचते हैं वैसे ही जो विवेकी जीव हैं वे भी उस गड्ढे से बचकर-विषयभोग से रहित होकर अपने अभीष्ट मोक्षरूप पर्वत पर चढ जाते हैं ॥१३३॥

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+ विषय-सुख का पोषण करनेवाले ठग -
अध्यास्यापि तपोवनं बत परे नारीकटीकोटरे
व्याकृष्टा विषयै: पतन्ति करिणः कूटावपाते यया ।
प्रोचे प्रीतिकरीं जनस्य जननीं प्राग्जन्मभूमिं च यो
व्यक्तं तस्य दुरात्मनो दुरुदितैर्मन्ये जगद्वञ्चितम् ॥१३४॥
अन्वयार्थ : दूसरे मनुष्य तप के निमित्त वन का आश्रय ले करके भी इन्द्रियविषयों के द्वारा खीचे जाकर स्त्री के योनिस्थान में इस प्रकार से गिरते हैं जिस प्रकार कि हाथी अपने पकडने के लिये बनाये गये गड्ढे में गिरते हैं । जो योनिस्थान प्राणी के जन्म की भूमि होने से माता के समान है उसे जो दुष्ट कवि प्रीति का कारण बतलाते हैं वे स्पष्टतया अपने दुष्ट वचनों के द्वारा विश्व को ठगाते हैं॥१३४॥

भावार्थ :

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+ नारी विष से भी अधिक भयानक है -
कण्ठस्थः कालकूटोऽपि शम्भोः किमपि नाकरोत् ।
सोऽपि दंदह्यते स्त्रीभिः स्त्रियो हि विषमं विषम् ॥१३५॥
अन्वयार्थ : जिस महादेव के कण्ठ में स्थित हो करके भी विष ने उसका कुछ भी अहित नहीं किया वही महादेव स्त्रियों के द्वारा संतप्त किया जाता है । ठीक है- स्त्रियां भयानक विष हैं ॥१३५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- कहा जाता है कि देवों ने जब समुद्रका मंथन किया था तो उन्हें उसमें से पहिले विष प्राप्त हुआ था और उसका पान महादेव ने किया था। उक्त विष के पी लेने पर भी जिस महादेव को विषजनित कोई वेदना नहीं हुई थी वही महादेव पार्वती आदि स्त्रियों के द्वारा काम से संतप्त करके पीडित किया जाता है । इससे यह निश्चित होता है कि लोग जिस विष को दुःखदायक मानते हैं वह वास्तव में उतना दुःखदायक नहीं है- उससे अधिक दुःख देनेवालीं तो स्त्रियां हैं । अतएव उन स्त्रियों को ही विषम विष समझना चाहिये। कारण कि उपर्युक्त विष की तो चिकित्सा भी की जा सकती है, किन्तु स्त्रीरूप विष की चिकित्सा नहीं की जा सकती है॥१३५॥

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+ स्त्रियों को चन्द्रमा की उपमा देना उचित नहीं है -
तव युवतिशरीरे सर्वदोदोषैकपात्रे
रतिरमृतमयूखाद्यर्थसाधर्म्यतश्चेत् ।
ननु शुचिषु शुभेषु प्रीतिरेष्वेव साध्वी
मदनमधुमदान्धे प्रायशः को विवेकः ॥१३६॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! सब दोषों के अद्वितीय स्थानभूत स्त्री के शरीर में यदि चन्द्र आदि पदार्थों के साधर्म्य (समानता) से तेरा अनुराग है तो फिर निर्मल और उत्तम इन्हीं (चन्द्रादि) पदार्थों के विषय में अनुराग करना श्रेष्ठ है। परन्तु कामरूप मद्य के मद (नशा) से अन्धे हुए प्राणी में प्रायः वह विवेक ही कहां होता है ? अर्थात् उसमें वह विवेक ही नहीं होता है ॥१३६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- स्त्री का शरीर अतिशय निन्द्य एवं अनेक दोषों का स्थान है। फिर भी कविजन उसके मुख को चन्द्र की, नेत्रों को कमल की, दांतों को हीरे की, तथा स्तनों को अमृतकलशों आदि की उपमा देते हैं जिससे कि बेचारे भोले प्राणी उसके निन्द्य शरीर को सुन्दर मानकर उसमें अनुराग करते हैं। वे यह नहीं समझते कि जिन चन्द्रादि की समानता बतलाकर स्त्री के शरीर को सुन्दर बतलाया जाता है वास्तव में तो वे ही सुन्दर कहलाये, अतः उनमें ही अनुराग करना उत्तम है, न कि उस घृणित स्त्री के शरीरमें । परन्तु क्या किया जाय ? जिस प्रकार मद्यपान करने वाले मनुष्य को उन्मत्त हो जाने के कारण कुछ भी भले बुरे का ज्ञान नहीं रहता है उसी प्रकार काम से उन्मत्त हुए प्राणियों को भी अपने हिताहितका विवेक नहीं रहता है । इसलिये वे मल-मूत्रादि से परिपूर्ण स्त्री के उस निन्द्य शरीर में तो अनुराग करते हैं, किन्तु उन व्रत-संयमादि में अनुराग नहीं करते जो कि उन्हें संसार के दुःख से उद्धार करानेवाले है ॥१३६॥

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+ मन की नपुंसकता -
प्रियामनुभवत्स्वयं भवति कातरं केवलं
परेष्वनुभवत्सु तां विषयिषु स्फुटं ल्हादते ।
मनो ननु नपुंसकं त्विति न शब्दतश्चार्थतः
सुधीः कथमनेन सन्नुमयथा पुमान् जीयते ॥१३७॥
अन्वयार्थ : जो मन प्रिया का अनुभव करते हुए केवल अधीर होता है उसे भोग नहीं सकता है, तथा जो दूसरे विषयी जनों को--इन्द्रियों को उसका भोग करते हुए देखकर भले प्रकार आनन्दित होता है, वह मन तो शब्द से और अर्थ से भी निश्चयतः नपुंसक है । फिर इस नपुंसक मन के द्वारा जो सुधी (उत्तम बुद्धि का स्वामी) शब्द और अर्थ दोनों ही प्रकार से पुरुष है वह कैसे जीता जाता है ? अर्थात् नहीं जीता जाना चाहिये था ॥१३७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो लोग यह कहा करते हैं कि मन अतिशय बलिष्ठ है, उसकी प्रेरणा से ही प्राणियों की प्रवृत्ति विषयभोगादि में होती है। उन्हें यह समझना चाहिये कि वह मन जिस प्रकार शब्द की दृष्टि से- व्याकरण की अपेक्षा- नपुंसक (नपुंसकलिंग) है उसी प्रकार वह अर्थ से भी नपुंसक है। कारण यह कि लोक में नपुंसक वही गिना जाता है जो कि पुरुषार्थ में असमर्थ होता है । सो वह मन ऐसा ही है, क्योंकि जिस प्रकार नपुंसक स्त्री के भोगने की अभिलाषा रखता हुआ भी इन्द्रिय की विकलता से उसे स्वयं तो भोग नहीं सकता है, परन्तु दूसरे जनोंको भोगते हुए देख-सुनकर वह आनन्दित अवश्य होता है। उसी प्रकार वह मन भी स्त्री के भोग के लिये व्याकुल तो होता है, पर भोग सकता नहीं है, भोगती वे स्पर्शनादि इन्द्रियां हैं जिन्हें कि भोगते हुए देखकर वह प्रसन्न होता है। इस प्रकार वह मन शब्द और अर्थ दोनों से ही नपुंसक सिद्ध है । अब जरा पुरुष की भी अवस्था को देखिये- वह शब्द और अर्थ दोनों से ही पुरुष है । वह शब्द से पुरुष (पुल्लिंग) है, यह तो व्याकरण से सिद्ध ही है । साथ ही वह अर्थ से भी पुरुष है । कारण यह कि वह सुधी है- विवेकी है- इसलिये जब वह अपने स्वरूप को समझ लेता है, तब लौकिक साधारण स्त्रियों की तो बात ही क्या, वह तो मुक्ति-रमणी के भी भोगने में समर्थ होता है । अतएव यह समझना भूल है कि मन पुरुष के ऊपर प्रभाव डालता है । वस्तुस्थिति तो यह है कि पुरुष ही उसे अपने नियन्त्रण में रखता है। अभिप्राय यह हुआ कि जो पुरुष कहला करके भी यदि अपने मन के ऊपर नियन्त्रण नहीं रख सकता है तो वह वास्तव में पुरुष कहलाने के योग्य नहीं है ॥१३७॥

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+ तप की श्रेष्ठता -
राज्यं सौजन्ययुक्तं श्रुतवदुरुतपः पूज्यमत्रापि यस्मात्
त्यक्त्वा राज्यं तपस्यन् न लघुरतिलघुः स्यात्तपः प्रोह्य राज्यम् ।
राज्यात्तस्मात्प्रपूज्यं तप इति मनसालोच्य धीमानुदग्रं
कुर्यादार्यः समग्रं प्रभवभयहरं सत्तपः पापभीरुः ॥१३८॥
अन्वयार्थ : सुजनता (न्याय-नीति) से सहित राज्य और शास्त्रज्ञान से सहित महान तप, दोनो यहां पूज्य हैं। परन्तु इन दोनों में भी चूंकि राज्य को छोडकर तपश्चरण करने वाला मनुष्य लघु नहीं रहता- महान हो जाता है, और इसके विपरीत तप को छोडकर राज्य करने वाला मनुष्य अतिलघु- अतिशय निन्द्य- माना जाता है; इसीलिये राज्य की अपेक्षा तप अतिशय पूज्य है। इस प्रकार मन से विचार करके जो बुद्धिमान मनुष्य पाप से डरता है उसे, जो तप संसार के भय को नष्ट करने वाला एवं महान है उस समीचीन सम्पूर्ण तप को करना चाहिये॥१३८॥

भावार्थ :

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+ गुण हीनता से हानि होती है -
पुरा शिरसि धार्यन्ते पुष्पाणि विबुधैरपि ।
पश्चात्पादोऽपि नास्प्राक्षीत् किं न कुर्याद् गुणक्षतिः ॥१३९॥
अन्वयार्थ : जिन पुष्पों को पहिले देव भी शिरपर धारण करते हैं उनको पीछे पांव भी नहीं छूता है। ठीक ही है- गुण की हानि क्या नहीं करती है ? अर्थात् वह सब कुछ अनर्थ करती है ॥१३९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व श्लोक में यह बतलाया था कि जो साधु तप को छोडकर राज्यलक्ष्मी का उपभोग करने लगता है वह अतिलघु- अतिशय निन्दा का पात्र- बन जाता है । इसी बात को पुष्ट करनेके लिये यहां यह उदाहरण दिया गया है कि जिस प्रकार जब तक फूल मुरझाते नहीं और अपनी सुगन्धि को नहीं छोडते हैं तब तक उन्हें देव भी शिरपर धारण करते हैं, किन्तु वे ही जब मुरझाकर सुगन्धि से रहित हो जाते हैं तब उन्हें कोई पांव से भी नहीं छूता है । ठीक इसी प्रकार से जब तक साधु तप-संयम आदि में स्थित रहता है तब तक साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है, किन्तु महान देव भी उसकी पूजा करते हैं । परन्तु पीछे यदि वही तप से भ्रष्ट होकर विषयों में प्रवृत्त हो जाता है तो फिर उसको कोई भी नहीं पूछता है- सभी उसकी निन्दा करते हैं । अभिप्राय यह है कि पूजा-प्रतिष्ठा का कारण गुण हैं, न कि बाह्य धन-सम्पत्ति आदि॥१३९॥

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+ दोष का अंश भी निन्‍द्य है -
हे चन्द्रमः किमिति लाञ्छनवानभूस्त्वं
तद्वान् भवेः किमिति तन्मय एव नाभूः ।
किं ज्योत्स्नया मलमलं तव घोषयन्त्या
स्वर्भानुवन्ननु तथा सति नासि लक्ष्यः ॥१४०॥
अन्वयार्थ : हे चन्द्र ! तू मलिनतारूप दोष से सहित क्यों हुआ? यदि तुझे मलिनता से सहित ही होना था तो फिर पूर्णरूप से उस मलिनतास्वरूप ही क्यों नहीं हुआ? तेरी उस मलिनता को अतिशय प्रगट करने वाली चांदनी से क्या लाभ है ? कुछ भी नहीं । यदि तू सर्वथा मलिन हुआ होता तो वैसी अवस्थामें राहु के समान देखने में तो नहीं आता ॥१४०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां चन्द्र को लक्ष्य बनाकर ऐसे साधु की निन्दा की गई है जो कि साधु के वेष में रहकर उसको (साधुत्व को) मलिन करता है । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार चन्द्र में आल्हादजनकत्व आदि अनेक गुणों के होने पर भी उसमें जो थोडी-सी कालिमा दृष्टिगोचर होती है वह उसके अन्य गुणों की प्रतिष्ठा नहीं होने देती है। इतना ही नहीं, बल्कि वह उस थोडे-से दोष के कारण कलङ्की कहा जाता है ! यदि वह कदाचित् राहु के समान पूर्णरूप से काला होता तो फिर उसकी ओर किसी का ध्यान भी नहीं जाता। उसकी इस मलिनता को प्रगट करनेवाली उसकी ही वह निर्मल चांदनी है। ठीक इसी प्रकार से जो साधु व्रत-संयमादिक पालन करते हुए भी यदि उस साधुत्व को मलिन करने वाले किसी दोष से संयुक्त होता है तो फिर वह उक्त चन्द्रमा के समान कलंकी (निन्द्य) हो जाता है। इससे तो यदि कहीं वह गृहस्थ होता तो अच्छा था-वैसी अवस्था में उसकी ओर किसी की दृष्टि भी नहीं जाती । कारण इसका यह है कि बहुत-से गुणों के होने पर यदि कोई दोष होता है वह लोगों की दृष्टि में अवश्य आ जाता है। जैसे कि यदि किसी स्वच्छ कपडे पर कहीं से काला धब्बा पड जाता है तो वह अवश्य ही देखने में आ जाता है,किन्तु वैसा ही धब्बा यदि किसी मलिन वस्त्र पर पड जाता है तो न तो प्रायः वह देखने में ही आता है और न कोई उसके ऊपर किसी प्रकार की टीका-टिप्पणी भी करता है । तात्पर्य यह है कि साधु को अपने निर्मल मुनिधर्म को सुरक्षित रखने के लिये छोटे-से भी छोटे दोष से बचना चाहिये, अन्यथा उसे इस लोक में निन्दा और परलोक में दुर्गति का पात्र बनना ही पडेगा ॥१४०॥

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+ दोष बतानेवाले दुर्जन भी हितकारी हैं -
दोषान् कांश्चन तान् प्रवर्तकतया प्रच्छाद्य गच्छत्ययं
साधं तैः सहसा म्रियेद्यदि गुरुः पश्चात्करोत्येष किम् ।
तस्मान्मे न गुरुगुरुर्गुरुतरान् कृत्वा लघूंश्च स्फुटं
ब्रूते यः सततं समीक्ष्य निपुणं सोऽयं खलः सद्गुरुः ॥१४१॥
अन्वयार्थ : यदि यह गुरु शिष्य के उन किन्हीं दोषों को प्रवृत्ति कराने की इच्छा से अथवा अज्ञानता से आच्छादित करके-प्रकाशित न करके-चलता है और इस बीच में यदि वह शिष्य उक्त दोषों के साथ मरण को प्राप्त हो जाता है तो फिर यह गुरु पीछे क्या कर सकता है? कुछ भी उसका भला नहीं कर सकता है। ऐसी स्थिति में वह शिष्य विचार करता है कि मेरे दोषों को आच्छादित करनेवाला वह गुरु वास्तव में मेरा गुरु (हितैषी आचार्य) नहीं है। किन्तु जो दुष्ट मेरे क्षुद्र भी दोषों को निरन्तर सूक्ष्मता से देख करके और उन्हें अतिशय महान् बना करके स्पष्टता से कहता है वह यह दुष्ट ही मेरा समीचीन गुरु है ॥१४१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- गुरु वास्तव में वह होता है जो कि शिष्य के दोषों को दूर करके उसे उत्तमोत्तम गुणों से विभूषित करता है। इस कार्य में यदि उसे कुछ कठोरता का भी व्यवहार करना पडे, जो कि उस समय शिष्य को प्रतिकूल भी दिखता हो तो भी उसे इसकी चिन्ता नहीं करना चाहिये । कारण कि ऐसा करने से उस शिष्य का भविष्य में कल्याण ही होने वाला है। परंतु इसके विपरीत जो गुरु शिष्य के दोषों को देखता हुआ भी यह सोचता है कि यदि अभी इन दोषों को दूर कराने का प्रयत्न करूंगा तो शायद वह अभी उन्हें दूर न कर सके या क्रुद्ध होकर संघ से अलग हो जावे, ऐसी अवस्था में संघ की प्रवृत्ति नहीं चल सकेगी; इसी विचार से जो उसके दोषों को प्रकाश में नहीं लाता है वह गुरु वास्तव में गुरु पद के योग्य नहीं है। कारण यह कि मृत्यु का समय कुछ निश्चित नहीं है, ऐसी अवस्था में यदि इस बीच में उन दोषों के रहते हुए शिष्य का मरण हो गया तो वह दुर्गति में जाकर दुःखी होगा। इसीलिये ऐसे गुरु की अपेक्षा उस दुष्ट को ही अच्छा बतलाया है जो कि भले ही दुष्ट अभिप्राय से भी दूसरे के सूक्ष्म भी दोषों को बढ़ा-चढाकर प्रगट करता है । कारण यह कि ऐसा करने से जो आत्महित का अभिलाषी है वह उन दोषों को दूर करके आत्मकल्याण कर लेता है ॥१४१॥

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+ गुरु के कठोर वचन भी हितकारी हैं -
विकाशयन्ति भव्यस्य मनोमुकुलमंशवः ।
रवेरिवारविन्दस्य कठोराश्च गुरूक्तयः ॥१४२॥
अन्वयार्थ : कठोर भी गुरु के वचन भव्य जीव के मन को इस प्रकार से प्रफुल्लित (आनन्दित) करते हैं जिस प्रकार कि सूर्य की कठोर (सन्तापजनक) भी किरणें कमल की कली को प्रफुल्लित किया करती हैं ॥१४२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व श्लोक में शिष्य के दोषों को प्रगट न करने वाले जिस गुरु की निन्दा की गई है उसके विषय में यह शंका उपस्थित हो सकती थी कि वह जो अपने शिष्य के दोषों को प्रगट नहीं करता है वह इस कारण से कि शिष्य किसी प्रकार की चिंता में न पडे या ऐसा करने से उसे किसी प्रकार का कष्ट न हो । अतएव वह गुरु निन्द्य नहीं कहा जा सकता है । इस शंका के उत्तरस्वरूप यहां यह बतलाया गया है कि जिस प्रकार सूर्य की किरणें अन्य प्राणियों के लिये यद्यपि कठोर (संतापकारक) प्रतीत होती हैं तो भी उनसे कमलकलिका तो प्रफुल्लित ही होती है। इसी प्रकार जो शिष्य आत्म हित से विमुख हैं उन्हें ही गुरु के हितकारक भी वचन कठोर प्रतीत होते हैं, किन्तु जो शिष्य आत्महित की अभिलाषा रखते हैं उनको तत्क्षण कठोर प्रतीत होने वाले भी वे वचन परिणाम में आनन्दजनक ही प्रतीत होते हैं- उन्हें इन कठोर वचनों से किसी प्रकार की चिन्ता व खेद नहीं होता है। इसके अतिरिक्त यह नीति भी तो प्रसिद्ध है कि " हितं मनोहारि च दुर्लभं वच:"। इस नीति के अनुसार छद्मस्थ प्राणियों के जो वचन परिणाम में हितकारक होते हैं वे प्रायः मनोहर नहीं प्रतीत होते हैं और जो वचन बाह्य में मनोहर प्रतीत होते हैं वे परिणाम में हितकारक नहीं होते हैं । अतएव शिष्य के हित को चाहने वाले गुरु को उसे योग्य मार्ग पर ले जाने के लिये यदि कदाचित् कठोर व्यवहार भी करना पडे तो दयाचित्त होकर उसे भी करना ही चाहिये । इस प्रकार से वह अपने कर्तव्य से च्युत नहीं होता है- उसका पालन ही करता है॥१४२॥

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+ धर्मात्माओं की दुर्लभता -
लोकद्वयहितं वक्तुं श्रोतुं च सुलभाः पुरा ।
दुर्लभाः कर्तुमद्यत्वे वक्तुं श्रोतुं च दुर्लभाः ॥१४३॥
अन्वयार्थ : पूर्व काल में जिस धर्म के आचरण से इस लोक और परलोक दोनों ही लोको में हित होता है उस धर्म का व्याख्यान करने के लिये तथा उसे सुनने के लिये भी बहुत से जन सरलता से उपलब्ध होते थे, परन्तु तदनुकूल आचरण करने के लिये उस समय भी बहुत जन दुर्लभ ही थे। किन्तु वर्तमान में तो उक्त धर्म का व्याख्यान करने के लिये और सुनने के लिये भी मनुष्य दुर्लभ हैं, फिर उसका आचरण करने वाले तो दूर ही रहे ॥१४३॥

भावार्थ :

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+ विवेकी जन प्रशंसा में सन्तुष्ट नहीं होते -
गुणागुणविवेकिभिर्विहितमप्यलं दूषणं
भवेत् सदुपदेशवन्मतिमतामतिप्रीतये ।
कृतं किमपि धाष्टर्यतः स्तवनमप्यतीर्थोषितैः
न तोषयति तन्मनांसि खलु कष्टमज्ञानता ॥१४४॥
अन्वयार्थ : जो गुण और दोष का विचार करने वाले सज्जन हैं वे यदि कदाचित् किसी दोष को भी अतिशय प्रगट करते हैं तो वह बुद्धिमान् मनुष्यों के लिये उत्तम उपदेश के समान अत्यन्त प्रीति का कारण होता है। परन्तु जो आगमज्ञान से रहित हैं ऐसे अविवेकी जनों के द्वारा यदि धृष्टता से कुछ प्रशंसा भी की जाती है तो वह उन बुद्धिमान् मनुष्यों के मन को सन्तुष्ट नहीं करती है। निश्चय से वह अज्ञानता ही दुःखदायक है ॥१४४॥

भावार्थ :

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+ ज्ञानियों में श्रेष्ठ कौन ? -
त्यक्तहेत्वन्तरापेक्षौ गुणदोषनिबन्धनौ।
यस्यादानपरित्यागौ स एव विदुषां वरः ॥१४५॥
अन्वयार्थ : जो अन्य कारणों की अपेक्षा न करके केवल गुण के कारण किसी वस्तु (सम्यग्दर्शनादि) को ग्रहण करता है और दोष के कारण उसका (मिथ्यात्व आदि का) परित्याग करता है वही विद्वानों में श्रेष्ठ गिना जाता है ॥१४५॥

भावार्थ :

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+ अहित का त्याग और हित में प्रवर्तन करने की प्रेरणा -
हितं हित्वाऽहिते स्थित्वा दुर्धीर्दुखायसे भृशम् ।
विपर्यये तयोरेधि त्वं सुखायिष्यसे सुधीः ॥१४६॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू दुर्बुद्धि (अज्ञानी) होकर जो सम्यग्दर्शन आदि तेरा हित करने वाले हैं उनको तो छोडता है और जो मिथ्यादर्शनादि तेरा अहित करनेवाले हैं उनमें स्थित होता है । इस प्रकार से तू अपने आपको दुःखी करता है । तू विवेकी होकर इससे विपरीत प्रवृत्ति कर, अर्थात् अहितकारक मिथ्यादर्शनादि को छोडकर हितकारक सम्यग्दर्शनादि को ग्रहण कर । इस प्रकार से तू अपने को सुखी करेगा ॥१४६॥

भावार्थ :

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+ गुणों का ग्रहण और दोषों के त्याग की प्रेरणा -
इमे दोषास्तेषां प्रभवनभमीभ्यो नियमतः
गुणाश्चैते तेषामपि भवनमेतेभ्य इति यः ।
त्यजंस्त्याज्यान् हेतून् झटिति हितहेतून् प्रतिभजन्
स विद्वान् सद्वृत्तः स हि स हि निधिः सौख्ययशसोः ॥१४७॥
अन्वयार्थ : ये (मिथ्यादर्शन आदि) दोष हैं और इनकी उत्पत्ति नियमतः इनसे (दर्शनमोहनीय आदि से) होती है, तथा ये (सम्यग्दर्शनादि) गुण हैं और उनकी भी उत्पत्ति इनसे (दर्शनमोहनीय के उपशम, क्षय और क्षयोपशम आदि से) होती है, ऐसा निश्चय करके जो छोडने योग्य कारणों को छोडता है और हित के कारणों को स्वीकार करता है वह विद्वान् है, वही सम्यक्चारित्र से सम्पन्न है, और वही सुख एवं कीर्ति का घर भी है ॥१४७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिसे गुण और दोष के विषय में विवेक उत्पन्न हो चुका है उसे यह निश्चय हो जाता है कि सम्यग्दर्शनादि गुण हैं, क्योंकि वे आत्मा का कल्याण करने वाले हैं; तथा इनके विपरीत मिथ्यादर्शन आदि दोष हैं, क्योंकि वे आत्मा का अहित करनेवाले हैं। कहा भी है-

न सम्यक्त्वसमं किंचित् त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि।

श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यत्तनूभृताम् ॥

अर्थात् तीनों काल और तीनों लोकों में सम्यक्त्व के समान दूसरा कोई प्राणियों का हितकारक नहीं है और मिथ्यात्व के समान अन्य कोई अहितकारक नहीं है ॥र. श्रा. 34॥

इस प्रकार गुण-दोषों का निश्चय हो जाने पर जो दोषों के कारणों को- मिथ्या उपदेश एवं विषयकांक्षा आदि को- खोजकर उन्हें छोड देता है और गुणों के कारणों को- सदुपदेश एवं विषयतृष्णानिवृत्ति आदि को- खोजकर उन्हें ग्रहण कर लेता है वह मोक्षमार्ग का पथिक हो जाता है। कारण यह कि उसे जो विवेकपूर्वक गुण-दोष का परिज्ञान हुआ है वह तो हुआ सम्यग्दर्शनपूर्वक सम्यग्ज्ञान; तथा गुण के कारणों का ग्रहण और दोष के कारणों का परित्याग यह हुआ सम्यक्चारित्र; इस प्रकार से वह रत्नत्रयस्वरूप मोक्षमार्ग में प्रवृत्त होकर शीघ्र ही अविनश्वर सुख को प्राप्त कर लेता है ॥१४७॥

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+ विवेकियों का कर्त्तव्य -
साधारणौ सकलजन्तुषु वृद्धिनाशौ
जन्मान्तरार्जितशुभाशुभकर्मयोगात् ।
धीमान् स यः सुगतिसाधनवृद्धिनाशः
तत्यत्ययाद्विगतधीरपरोऽभ्यधायि ॥१४८॥
अन्वयार्थ : पूर्व जन्म में संचित किये गये पुण्य और पाप कर्म के उदय से जो आयु, शरीर एवं धन-सम्पत्ति आदि की वृद्धि और उनका नाश होता है वे दोनों तो समस्त प्राणियों में ही समानरूप से पाये जाते हैं । परन्तु जो सुगति अर्थात् मोक्ष को सिद्ध करने वाले वृद्धि एवं नाश को अपनाता है वह बुद्धिमान्, तथा दूसरा इनकी विपरीतता से- दुर्गति के साधनभूत वृद्धि-नाश को अपनाने से- निर्बुद्धि (मूर्ख) कहा जाता है ॥१४८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में जिसके पास धन-सम्पत्ति आदि की वृद्धि होती है वह बुद्धिमान् तथा जिसके पास उसका अभाव होता है वह मूर्ख माना जाता है । परन्तु यथार्थ में यह अज्ञानता है, क्योंकि धन-सम्पत्ति आदि वृद्धि का कारण बुद्धि नहीं है, बल्कि प्राणी के पूर्वोपार्जित पुण्य का उदय ही उसका कारण है । इसी प्रकार उक्त सम्पत्ति के नाश का कारण भी मूर्खता नहीं है, बल्कि प्राणी के पूर्वोपार्जित पाप का उदय ही उसका कारण है । बुद्धिमान् तो वास्तव में उसे समझना चाहिये कि जो समीचीन सुख (मोक्ष) के साधनभूत सम्यग्दर्शनादि को बढाता है तथा उसमें बाधा पहुंचाने वाले मिथ्यादर्शनादि को नष्ट करता है । और जो इसके विपरीत आचरण करता है- नरकादि दुर्गति के साधनभूत मिथ्यादर्शनादि को बढाता है तथा उसको रोकने वाले सम्यग्दर्शनादि को नष्ट करता है- उसे वास्तव में मूर्ख समझना चाहिये॥१४८॥

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+ यथार्थ चारित्र पालनेवाले मुनि विरले ही हैं ! -
कलौ दण्डो नीतिः स च नृपतिभिस्ते नृपतयो
नयन्त्यर्थार्थं तं न च धनमदोऽस्त्याश्रमवताम् ।
नतानामाचार्या न हि नतिरताः साधुचरिताः
तप:स्थेषु श्रीमन्मणय इव जाताः प्रविरलाः ॥१४९॥
अन्वयार्थ : इस कलिकाल में (पंचम काल में) एक दण्ड ही नीति है, सो वह दण्ड राजाओं के द्वारा दिया जाता है । वे राजा उस दण्ड को धन का कारण बनाते हैं और वह धन वनवासी साधुओं के पास होता नहीं है । इधर वन्दना आदि में अनुराग रखने वाले आचार्य नम्रीभूत शिष्य साधुओं को सन्मार्ग पर चला नहीं सकते हैं । ऐसी अवस्था में तपस्वियों के मध्य में समुचित साधुधर्म का परिपालन करने वाले शोभायमान मणियों के समान अतिशय विरल हो गये हैं- बहुत थोडे रह गये हैं ॥१४९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- वर्तमान में जो जीवों की सन्मार्ग में कुछ प्रवृत्ति देखी जाती है, वह प्रायः दण्ड के भय से ही देखी जाती है। परंतु वह दण्ड राजा के आश्रित है- वह जिनसे धनादि का लाभ देखता है उन्हें दण्डित करता है। इससे यद्यपि साधारण जनता में कुछ सदाचार की प्रवृत्ति हो सकती है, तथापि उस दण्ड के भय से साधुजनों में उसकी सम्भावना नहीं की जा सकती है। कारण यह है कि साधुओं के पास धन तो रहता नहीं है जिससे कि राजा उनकी ओर दृष्टिपात करे । दूसरे, धर्मनीति के अनुसार यह कार्य राजा के अधिकार का है भी नहीं । ऐसी अवस्था उक्त साधुओं को यदि सन्मार्ग में प्रवृत्त करा सकते हैं तो उनके आचार्य ही करा सकते हैं । परंतु वे आचार्य वर्तमान में आत्मप्रतिष्ठा के इच्छुक अधिक हैं, इससे वे शिष्यों को यथेच्छ प्रवृत्ति को देख करके भी उन्हें दण्ड नहीं देते हैं । इसका कारण यह है कि दण्ड देते हुए उन्हें यह भय रहता है कि यदि दण्ड देने से वे शिष्य असंतुष्ट हो गये तो फिर मुझे प्रणाम आदि न करेंगे । इसके अतिरिक्त यह भी संभव है कि वे मेरे संघ से पृथक् हो जाय । ऐसी अवस्थामें मेरे इस आचार्य पद की क्या प्रतिष्ठा रहेगी? बस इसी भय से वे उन्हें दण्ड देने में असमर्थ हो जाते हैं । परिणाम इसका यह होता है कि उनकी उच्छृंखल प्रवृत्ति उत्तरोत्तर बढती ही जाती है और इस प्रकार से मुनिव्रतों को उत्तम रीति से परिपालन करने वाले विरले ही दिखने लगे हैं। यह साधुओं की दुरवस्था ग्रन्थकार श्री गुणभद्राचार्य के भी समय में हो चुकी थी। इसीलिये उन्होंने यहां यह स्पष्ट संकेत किया है कि प्रतिष्ठा लोलुपी आचार्यों का अपने संघों पर समुचित शासन न रह सकने से समीचीन साधुधर्म का आवरण करनेवाले साधु कान्तिमान् मणियों के समान बहुत ही थोडे रह गये हैं ॥१४९॥

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+ स्वच्छन्द प्रवृत्ति करनेवालों की संगति का निषेध -
एते ते मुनिमानिनः कवलिताः कान्ताकटाक्षेक्षणै रङगालग्नशरावसन्नहरिणप्रख्या भ्रमन्त्याकुलाः ।
संघर्तुं विषयाटवीस्थलतले स्वान् क्वाप्यहो न क्षमाः
मा वाजीन्मरुदाहताभ्रचपलैः संसर्गमेभिर्भवान् ॥१५०॥
अन्वयार्थ : ये जो अपने को मुनि मानने वाले साधु हैं वे स्त्रियों के कटाक्षपूर्ण अवलोकनों के ग्रास बनकर शरीर में लगे हुए बाणों से खेद को प्राप्त हुए हरिणों के समान व्याकुल होकर परिभ्रमण करते हैं । परन्तु खेद है कि वे विषयरूप वनस्थली के मध्य में अपने को कहीं पर भी स्थिर रखने के लिये समर्थ नहीं होते हैं । हे भव्य! तू वायु से ताडित हुए मेघों के समान अस्थिरता को प्राप्त हुए इन साधुओं की संगति को प्राप्त न हो॥१५०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार अहेरी के द्वारा मारे गये बाणों से व्यथित हुए हिरण इधर ऊधर वन में भागते हैं परन्तु कहीं भी अपने को स्थिर नहीं रख पाते हैं उसी प्रकार मुनिधर्म से भ्रष्ट होकर भी अपने को मुनि मानने वाले जो साधु स्त्रियों की कटाक्षपूर्ण चिंतवन से पीडित होकर विषय-वन में विचरण करते हुए कहीं पर भी स्थिर नहीं रहते हैं, किन्तु एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे आदि विषयों की सदा अभिलाषा रखकर संतप्त होते हैं,वे मुनि ऐसे अस्थिरचित्त हैं जैसे कि वायु से प्रेरित होकर बादल अस्थिर होते हैं । ऐसे साधुओं के संसर्ग में रहकर कोई भी प्राणी आत्महित नहीं कर सकता है । इसीलिये यहां यह उपदेश दिया गया है कि जो भव्य जीव अपना हित करना चाहते हैं उन्हें ऐसे भ्रष्ट साधुओं से दूर ही रहना चाहिये॥१५०॥

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+ अयाचक वृत्ति धारण करने की प्रेरणा -
गेहं गुहाः परिदधासि दिशो विहायः
संव्यानमिष्टमशनं तपसोऽभिवृद्धिः।
प्राप्तागमार्थ तव सन्ति गुणा: कलत्र
मप्रार्थ्यवृत्तिरसि यासि वृथैव याञ्चाम् ॥१५१॥
अन्वयार्थ : हे आगम के रहस्य के जानकार साधु ! तेरे लिये गुफायें ही घर हैं, दिशायें एवं आकाश ही तेरा वस्त्र है उसे तू पहिन, तप की वृद्धि ही तेरा इष्ट भोजन है, तथा स्त्री के स्थान में तू सम्यग्दर्शनादि गुणों से अनुराग कर । इस प्रकार तुझे याचना के योग्य कुछ भी नहीं है । अतएव तू वृथा ही याचनाजनित दीनता को न प्राप्त हो ॥१५१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- याचना करने से स्वाभिमान नष्ट होकर मनुष्य में दीनता उत्पन्न हुए यह बतलाया है कि जिन पदार्थों की दूसरों से याचना की जाती है वे तेरे पास स्वाभाविक हैं। यथा- मनुष्य दूसरो से अर्थ (धन) की याचना करता है, सो तेरे लिये आगम का अर्थ (रहस्य) प्राप्त है ही। यह उस लौकिक घन से अधिक कल्याणकारी है । इसके अतिरिक्त तुझे रहने के लिये गुफायें विद्यमान हैं,अतएव घर की याचना करने की आवश्यकता नहीं रहती। दिशायें ही तेरे लिये वस्त्र हैं। लौकिक वस्त्र तो चिन्ता का कारण है, अतएव उसको छोडकर दिगम्बर रह और निश्चिन्त होकर तप की वृद्धि कर। यह तप की वृद्धि तेरे अभीष्ट भोजन का काम करेगी। स्त्री के स्थान में तेरे पास उत्तमक्षमा आदि गुण विद्यमान हैं, तू इनसे अधिक से अधिक अनुराग कर । इस प्रकार तेरे पास सब आवश्यक सामग्री विद्यमान है, अतएव दीन बनकर व्यर्थ में किसी से याचना मत कर । याचना करने से मनुष्य श्रीहीन होकर निर्लज्ज बन जाता है, उसकी बुद्धि और धैर्य नष्ट हो जाता है, तथा अपयश बढता है । किसी ने यह ठीक कहा है-

देहीति वचनं श्रुत्वा देहस्थाः पञ्चदेवताः ।

मुखान्निर्गत्य गच्छन्ति श्री-ह्री-धी-धृति-कीर्तयः ॥

अर्थात् ' देहि (मुझे कुछ दो)' इस वचन को सुनकर शोभा, लज्जा, बुद्धि, धैर्य और कीर्ति ये शरीररूप भवन में रहनेवाले पांच देवता 'देहि' इस वचन के साथ ही मुख से निकल कर चले जाते हैं। अतएव ऐसी याचना का परित्याग करना ही योग्य है ॥१५१॥

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+ कौन दीन और कौन अभिमानी -
परमाणोः परं नाल्पं नभसो न महत्परम् ।
इति ब्रुवन् किमद्राक्षीन्नेनौ दीनाभिमानिनौ ॥१५२॥
अन्वयार्थ : परमाणु से दूसरा कोई छोटा नहीं है और आकाश से दूसरा कोई बड़ा नहीं है, ऐसा कहलाने वाले क्या इन दीन और अभिमानी मनुष्यों को नहीं देखा है ? ॥१५२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में सबसे छोटा परमाणु समझा जाता है। परन्तु विचार करें तो याचक को उस परमाणु से भी छोटा (तुच्छ) समझना चाहिये। कारण यह कि याचना करने से उसके सब ही उत्तम गुण नष्ट हो जाते हैं । वह दीन बनकर सबके मुंह की ओर देखता है, परन्तु उसकी ओर कोई दृष्टिपात भी नहीं करता। इस प्रकार उसकी सब प्रतिष्ठा जाती रहती है । इसके विपरीत आकाश से कोई बड़ा नहीं माना जाता है । परन्तु यथार्थ में देखा जाय तो जो स्वाभिमानी दूसरे से याचना नहीं करता है उसे इस आकाश से भी बडा (महान्) समझना चाहिये। इस अयाचक वृति में उसके सब गुण सुरक्षित रहते हैं। स्वाभिमानी संकट में पडकर भी उस दुख को साहसपूर्वक सहता है, किन्तु कभी किसी से याचना नहीं करता। अभिप्राय यह कि याचना की वृत्ति मनुष्य को अतिशय हीन बनाने वाली है॥१५२॥

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+ याचक का गौरव दाता में चला जाता है -
याचितुगौरवं दातुर्मन्ये संक्रान्तमन्यया ।
तदवस्थौ कथं स्यातामेतो गुरुलघू तदा ॥१५३॥
अन्वयार्थ : याचक पुरुष का गौरव दाता के पास चला जाता है, ऐसा मैं मानता हूं। यदि ऐसा न होता तो फिर उस समय देनेरूप अवस्था से संयुक्त दाता तो गुरु (महान्) और ग्रहण करनेरूप अवस्था से संयुक्त याचक लघु (क्षुद्र) कैसे दिखता? अर्थात् ऐसे नहीं दिखने चाहिये थे ॥१५३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस समय याचक किसी दाता के यहां पहुंचकर उससे कुछ याचना करता है और तदनुसार वह दाता उसे कुछ देता भी है उस समय उन दोनों के मुख पर अलग अलग भाव अंकित दिखते हैं। उस समय जहां याचक के मुख पर दीनता, संकोच एवं कृतज्ञता का भाव दृष्टिगोचर होता है, वहां दाता के मुख पर प्रफुल्लता एवं अभिमान का भाव स्पष्टतया देखने में आता है। इसके ऊपर यहां यह उत्प्रेक्षा की गई है कि उस समय मानों याचक का आत्मगौरव उसके पास से निकलकर दाता के पास ही चला जाता है। तभी तो उन दोनों में यह विषमता देखी जाती है, अन्यथा इसके पूर्व में तो दोनों समान ही थे । तात्पर्य यह कि याचना का कार्य अतिशय हीन एवं निन्द्य है ॥१५३॥

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+ वाञ्छक और अवाञ्छक की स्थिति -
अधो जिघृक्षवो यान्ति यान्त्यूर्ध्वमजिघृक्षवः।
इति स्पष्टं वदन्तौ वा नामोन्नामौ तुलान्तयोः ॥१५४॥
अन्वयार्थ : तराजू के दोनों ओर क्रम से होने वाला नीचापन और ऊंचापन स्पष्टतया यह प्रगट करता है कि लेने की इच्छा करने वाले प्राणी नीचे और न लेने की इच्छा करने वाले ऊपर जाते हैं ॥१५४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार तराजू के एक ओर जब कोई वस्तु रक्खी जाती है तो उधर का भाग नीचा और दूसरी ओर का खाली भाग ऊंचा हो जाता है उसी प्रकार जो मनुष्य दूसरे से याचना करके कुछ ग्रहण करता है वह नीचेपन (हीनता) को प्राप्त होता है तथा जो दाता देता है वह उत्कृष्टता को प्राप्त करता है। इस प्रकार से तराजू भी मानों यही शिक्षा देती है॥१५४॥

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+ दरिद्रता की श्रेष्ठता ! -
तस्वमाशासते सर्वे न स्वं तत्सर्वर्पि यत् । अर्थिवैमुख्यसंपादिसस्वत्वान्निःस्वता वरम् ॥१५५॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य धन से सहित होता है उससे सब लोग आशा रखते हैं- मांगने की इच्छा करते हैं। परन्तु ऐसा वह धन नहीं है जो कि सब ही याचकों को सन्तुष्ट कर सके। अतएव याचक जन की विमुखता को उत्पन्न करनेवाले धनाढ्यपने की अपेक्षा तो कहीं निर्धनता ही श्रेष्ठ है ॥१५५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिसके पास धन रहता है उसके पास से धन प्राप्त करने की बहुत जन अपेक्षा करते हैं। परन्तु उसके पास कितना भी अधिक धन क्यों न हो, रहेगा वह सीमित ही । और उधर याचक असीमित तथा अभिलाषा भी उनकी असीमित ही रहती है। ऐसी अवस्था में यदि वह धनवान अपने समस्त ही धन को याचकों में वितीर्ण कर दे तो भी क्या वे सब याचक तृप्त हो सकते हैं? नहीं हो सकते। इसलिए जो मनुष्य यह सोचकर धन के कमाने में उद्यत होता है कि मैं धन का संचय करके याचकों को दूंगा और उनकी अभिलाषा को पूर्ण करूंगा, उसका वैसा विचार करना अज्ञानता से परिपूर्ण है। अतएव ऐसे धन की अपेक्षा निर्धन (निर्ग्रन्थ) रहना ही अधिक श्रेष्ठ है। कारण कि ऐसा करने से जो निराकुलता धनवान को कभी नहीं प्राप्त हो सकती है वह इस निर्धन (साधु) को अनायास ही प्राप्त हो जाती है और इस प्रकारसे वह आत्यन्तिक सुख को भी प्राप्त कर लेता है ॥१५५॥

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+ आशारूपी खाई की अगाधता -
आशाखनिरतीवाभूदगाधा निधिभिश्च या।
सापि येन समीभूता तत्ते मानधनं धनम् ॥१५६॥
अन्वयार्थ : जो अत्यन्त गहरी आशारूप खान (गड्ढा) निधियों के द्वारा भी समान (पूर्ण) नहीं हो सकती है वह तेरे जिस स्वाभिमानरूप धन से समान हो सकती है वह स्वाभिमानरूप धन ही तेरा यथार्थ धन है॥१५६॥

भावार्थ :

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+ आशाएरूपी खाई भरने का उपाय : तृष्णा का परित्याग -
आशाखनिरगाधेयमधःकृतजगत्त्रया।
उत्सर्योत्सर्प्य तत्रस्थानहो सद्भिः समीकृता ॥१५७॥
अन्वयार्थ : तीनों लोकों को नीचे करने वाली यह आशारूप खान अथाह है। फिर भी यह आश्चर्य की बात है कि उक्त आशारूप खान में स्थित धनादिकों का उत्तरोत्तर परित्याग करके सज्जन पुरुषों ने उसे समान कर दिया है॥१५७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- प्राणी की आशा या इच्छा एक प्रकार का गड्ढा है जो इतना गहरा है कि यदि उसमें तीनों ही लोकों की सम्पदा भर दी जाय तो भी वह पूरा नहीं होगा। यहां इस बात पर आश्चर्य प्रगट किया गया है कि इतने गहरे भी उस आशारूप गड्ढे में स्थित पदार्थों को उसमें से बाहिर निकालकर सज्जन पुरुषों ने उसे पृथिवीतल के समान कर दिया है । सो है भी यह आश्चर्य की सी बात । कारण कि लोक में तो ऐसा देखा जाता है कि जिस गड्ढे के भीतर से मिट्टी, पत्थर या चांदी-सोना आदि जितने अधिक प्रमाण में बाहिर निकाला जाता है उतना ही वह गड्ढा और भी अधिक गहरा होता जाता है। परन्तु सज्जन पुरुषों ने उस आशारूप गड्ढे में स्थित (अभीष्ट) पदार्थों को उससे बाहिर निकालकर गहरा करने के बदले उसे पूरा कर दिया है । अभिप्राय यह है कि जितनी जितनी इच्छा की पूर्ति होती जाती है उतनी ही अधिक तृष्णा और भी बढती जाती है । इसीलिये विवेकी मनुष्य जब उस तृष्णा को बढाने वाले विषयभोगों की आशा ही नहीं करते हैं तब उनका वह आशारूप गड्ढा क्यों न पूर्ण होगा? अवश्य ही पूर्ण होगा ॥१५७॥

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+ निर्ग्रन्थों द्वारा परिग्रह-ग्रहण का निषेध -
विहितविधिना देहस्थित्यै तपांस्युपबृंहय
न्नशनमपरैर्भक्त्या दत्तं क्वचित्कियदिच्छति।
तदपि नितरां लज्जाहेतुः किलास्य महात्मनः
कथमयमहो गृण्हात्यन्यान् परिग्रहदुर्ग्रहान् ॥१५८॥
अन्वयार्थ : तपों को बढाने वाला मुनि आगम में कही गई विधि के अनुसार शरीर को स्थिर रखने के लिये किसी कालविशेष (चर्याकाल) में दूसरों के (श्रावकों के) द्वारा भक्तिपूर्वक दिये गये कुछ थोडे-से आहार को ग्रहण करने की इच्छा करता है। वह भी इस महात्मा के लिये अतिशय लज्जा का कारण होता है। फिर आश्चर्य है कि यह महात्मा अन्य परिग्रहरूप दुष्ट पिशाचों को कैसे ग्रहण कर सकता है ? नहीं करता है ॥१५८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- तप की वृद्धि का कारण शरीर है। यदि शरीर स्वस्थ होगा तो उसके आश्रय से अनशनादि तपों को भले प्रकार किया जा सकता है, और यदि वह स्वस्थ नहीं है अशक्त है- तो फिर उसके आश्रय से तपश्चरण करना सम्भव नहीं है। इसीलिये साधु तपश्चरण की अभिलाषा से शरीर को स्थिर रखने के लिये दाता के द्वारा नवधा भक्तिपूर्वक दिये गये आहार को स्वल्प मात्रा में ग्रहण करता है । इसके लिये भी वह स्वयं आहार को नहीं बनाता है और अन्य से भी नहीं बनवाता है सो तो ठीक ही है,किन्तु वह अपने निमित्त से बनाये गये (उद्दिष्ट) भोजन को भी नहीं ग्रहण करता है । साथ ही वह इन्द्रियदमन और सहनशीलता प्राप्त करने के लिये एक-दो गृह आदि का नियम भी करता है। इस प्रकार से यदि उसे निरंतराय आहार प्राप्त होता है तो वह उसे ग्रहण करता है, अन्यथा वापिस चला आता है और इससे किसी प्रकार के खेद का अनुभव नहीं करता है- निरंतराय आहार के न प्राप्त होने से वह दाता को बुरा नहीं समझ सकता है । उक्त प्रकार से प्राप्त हुए आहार को ग्रहण करता हुआ भी साधु इस परवशता के लिये कुछ लज्जा का अनुभव करता है । ऐसी स्थिति में वह साधु आहार के अतिरिक्त अन्य (धन अथवा वसतिका आदि) किसी वस्तु की अपेक्षा करेगा,यह तो सर्वथा ही असम्भव हैं ॥१५८॥

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+ कलि-काल का चक्रवर्तित्व -
दातारो गृहचारिणः किल धनं देयं तदत्राशनं
गृण्हन्तः स्वशरीरतोऽपि विरताः सर्वोपकारेच्छया ।
लज्जैषैव मनस्विनां ननु पुनः कृत्वा कथं तत्फलं
रागद्वेषवशीभवन्ति तदिदं चक्रेश्वरत्वं कलेः ॥१५९॥
अन्वयार्थ : दाता तो गृहस्थ हैं और वह देय धन (देने योग्य धन) यहां पात्र के लिये भक्तिपूर्वक दिया जाने वाला भोजन है । सबके उपकार की इच्छा से जो उस आहाररूप धन को ग्रहण करने वाले साधु हैं वे अपने शरीर से भी विरत (निःस्पृह) होते हैं । यह आहारग्रहण की इच्छा भी उन स्वाभिमानियों के लिये लज्जा का ही कारण होती है। फिर भला उस आहार को निमित्त बना करके वे (साधु और दाता) राग-द्वेष के वशीभूत कैसे होते हैं ? वह इस पंचम काल का ही प्रभाव है ॥१५९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- दान के निमित्त तीन हैं- दाता, पात्र और देय । सो यहां दाता तो गृहस्थ, पात्र मुनि और देय धन आहार मात्र है । जो मुनि उस आहार को ग्रहण करते हैं वे भी केवल इस विचार से करते हैं कि इससे शरीर स्थिर रहेगा, जिससे कि हम तपश्चरण आदि करके आत्महित के साथ ही सदुपदेशादि के द्वारा दूसरों का भी हित कर सकेंगे। इतने पर भी जो स्वाभिमानी विद्वान् हैं वे उस आहार मात्र के ग्रहण करने में भी लज्जित होते हैं। यह है सत्पात्र और निरभिमानी सद्गृहस्थ दाताओं की स्थिति । इसके विपरीत जो दाता उस आहारदान के निमित्त से यह समझता है कि मैं ही उत्कृष्ट दाता हूं, अन्य दाता निकृष्ट हैं, तथा मैं इन साधुओं पर उपकार कर रहा हूं; वह दाता निन्दनीय है। इसी प्रकार जो साधु भी उस आहार के निमित्त से किसी दाता की प्रशंसा करता है कि इसने उत्तम आहार दिया है, तथा अन्य दाता की निन्दा करता है कि इसने निष्कृष्ट आहार दिया है, वह भी जो इस प्रकार से राग व द्वेष के वशीभूत होता है उसका कारण इस कलिकाल के प्रभाव को ही समझना चाहिये । अन्यथा पूर्व में जहां दाता यह समझता था कि सत्पात्र को दान देना यह गृहस्थ का आवश्यक कर्तव्य है तथा इस गृहस्थ जीवन की सफलता भी इसी में है, वह सुअवसर मुझे पुण्योदय से ही प्राप्त हुआ है आदि; वहां वे सत्पात्र (साधु) भी दाता के द्वारा जैसा कुछ भी रूखा-सूखा भोजन प्राप्त होता था उसी में संतुष्ट होते थे- दाता के प्रति कभी भी राग-द्वेष नहीं करते थे। वे दाता और पात्र आज नहीं उपलब्ध होते हैं। इससे यही निश्चय होता है कि दाता और पात्रों की जो वर्तमान में यह दुरवस्था हो रही है वह कलिकाल के ही प्रभाव से हो रही है॥१५९॥

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+ कर्मों के निमित्त से होनेवाली हानि -
आमष्टं सहजं तव त्रिजगतोबोधाधिपत्यं तथा
सौख्यं चात्मसमुद्भवं विनिहतं निर्मूलतः कर्मणा ।
दैन्यात्तद्विहितैस्त्वमिन्द्रियसुखैः संतृप्यसे निस्त्रपः
स त्वं यश्चिरयातनाकदशनैर्बद्धस्थितस्तुष्यसि ॥१६०॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन् ! तीनों लोकों को विषय करने वाले ज्ञान (केवलज्ञान) के ऊपर तेरा जो स्वाभाविक स्वामित्व था उसे इस कर्म ने लुप्त कर दिया है तथा पर पदार्थों की अपेक्षा न करके केवल आत्मा मात्र से उत्पन्न होने वाले तेरे उस स्वाभाविक सुख को भी उक्त कर्म ने पूर्णरूप से नष्ट कर दिया है । जो तू चिरकाल से उपवासादि के कष्टपूर्वक कुत्सित भोजनों (नीरस एवं नमक से हीन आदि) के बन्धन में स्थित रहा है वही तू निर्लज्ज होकर उस कर्म के द्वारा किये गये इन्द्रियसुखों (विषयसुखों) से दीनतापूर्वक संतुष्ट होता है ॥१६०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जीव स्वभाव से अनन्तज्ञान एवं अनन्त सुख से संपन्न है । किन्तु कर्म का आवरण रहने से वह प्रगट नहीं है- लुप्त हो रहा है । जो प्राणी अज्ञानता से अपनी अनन्त शक्ति का अनुभव नहीं करते हैं वे ही उस कर्म के द्वारा निर्मित तुच्छ इन्द्रियसुखों (आहारादिजनित) से सन्तुष्ट होते हैं । इसमें वे अपनी दीनता को प्रगट करते हुए लज्जित भी नहीं होते हैं । ऐसे इन्द्रियलोलुपी जीव उपवास आदि के कष्ट को सहकर जैसा कुछ रूखासूखा भोजन प्राप्त होता है उसमें सन्तुष्ट होते हैं। यदि वे अपनी स्वाभाविक आत्मशक्ति का अनुभव करें तो ऐसे दीनतापूर्ण आचरण में उन्हें संतोष के स्थान में लज्जा का ही अनुभव होगा। उदाहरणार्थ यदि कोई बलवान् मनुष्य किसी अन्य व्यक्ति की सम्पत्ति आदि का अपहरण करके उसको अपने आधीन रखता हुआ अपनी ही इच्छा से भोजन आदि देता है तो आधीनस्थ मनुष्य यदि कायर है तब तो वह अपना सर्वस्व खो करके भी उसके द्वारा कुछ भी रूखा-सूखा भोजन आदि दिया जा रहा है उसी पर सन्तुष्ट होता है और किसी प्रकार की लज्जा का अनुभव नहीं करता है । किन्तु जिसे अपनी शक्ति का अभिमान है वह अन्य के द्वारा दिये जाने वाले भोजन आदि के लिये लज्जित होता है तथा उस अवसर की खोज में रहता है कि जब कि उस अपने शत्रु को नष्ट करके अपनी हरी गई सम्पत्ति को वापिस प्राप्त कर ले । ठीक इसी प्रकार से जो अविवेकी प्राणी हैं वे कर्मरूप शत्रु के द्वारा जो अपनी स्वाभाविक सम्पत्ति (अनन्त ज्ञानादि) हरी गई है उसे प्राप्त करनेका उद्योग नहीं करते, बल्कि उक्त कर्म के द्वारा दिये जाने वाले तुच्छ एवं क्षणिक इन्द्रिय सुख में ही सन्तुष्ट होते हैं। किन्तु जो विवेकी जीव हैं वे उस कर्म- शत्रु के द्वारा लुप्त की गई अपनी उस स्वाभाविक सम्पत्ति को प्राप्त करने का निरंतर उद्योग करते हैं और वह जब तक उन्हें प्राप्त नहीं होती है तब तक उसकी प्राप्ति के साधनभूत शरीर को स्थिर रखने के लिये उक्त कर्म के निमित्त से प्राप्त होने वाले भोजन को ग्रहण तो करते हैं, किन्तु उसे स्वाभिमानपूर्वक लज्जा के साथ ही ग्रहण करते हैं, न कि निर्लज्ज व दीन बनकर । इस प्रकार से अन्त में वे अपनी उस स्वाभाविक सम्पत्ति (अनन्तचतुष्टय) को अवश्य प्राप्त कर लेते हैं ॥१६०॥

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+ इन्द्रिय-सुख के लिए भी धैर्य की आवश्यकता -
तृष्णा भोगेषु चेद्भिक्षो सहस्वाल्पं स्वरेव ते ।
प्रतीक्ष्य पाकं कि पीत्वा पेयं भुक्तिं विनाशये:॥१६१॥
अन्वयार्थ : हे साधो! यदि तुझे भोगों के विषय में अभिलाषा है तो तू कुछ समय के लिये व्रतादि के आचरण से होने वाले थोडे-से कष्ट को सहन कर । ऐसा करने से तुझे स्वर्ग प्राप्त होगा, वे भोग वहां पर ही हैं । तू पाक की प्रतीक्षा करता हुआ पानी आदि को पी करके क्यों भोजन को नष्ट करता है ? ॥१६१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो साधु बाह्य विषयभोगों की अभिलाषा करता है उसको लक्ष्य में रखकर यहां यह कहा गया है कि यदि तुझे विषयभोगों की ही अभिलाषा है तो तू कुछ समय के लिये व्रतादि के आचरण से जो थोडा-सा कष्ट होने वाला है उसे स्थिरता से सहन कर । कारण यह कि ऐसा करने से तुझे तेरी ही इच्छा के अनुसार स्वर्ग में उन विषयभोगों की प्राप्ति हो जावेगी। फिर तू सागरोपम काल तक उस विषयसुख का अनुभव करते रहना। और यदि तू ऐसा नहीं करता है तो फिर तेरी ऐसी अवस्था होगी जैसी कि अवस्था उस मनुष्य की होती है जो कि थोडे-से काल के लिये भोजन के परिपाक की प्रतीक्षा न करके भूख से पीडित होता हुआ पानी आदि को पी करके ही उस भूख को नष्ट करके भोजन के आनन्द को भी नष्ट कर देता है । अभिप्राय यह है कि जो विषयतृष्णा के वशीभूत होकर व्रतादि के आचरण को छोड़ देता है उसे मोक्षसुख मिलना तो दूर ही रहा, किन्तु वह विशिष्ट विषयसुख भी उसे प्राप्त नहीं होता जो कि स्वर्गादि में जाकर प्राप्त किया जा सकता था ॥१६१॥

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+ महामुनियों का कुछ भी बिगाड़ने में कर्म असमर्थ -
निर्धनत्वं धनं येषां मृत्युरेव हि जीवितम् ।
किं करोति विधिस्तेषां सतां ज्ञानकचक्षुषाम् ॥१६२॥
अन्वयार्थ : जिन साधुओं के निर्धनता (उत्तम आकिंचन्य) ही धन है तथा मृत्यु ही जिनका जीवन है उन ज्ञानरूप अद्वितीय नेत्र को धारण करने वाले साधुओं का भला कर्म क्या अनिष्ट कर सकता है ? अर्थात् कुछ भी नहीं कर सकता है ॥१६२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार अन्य जनों को प्राणों से अधिक धन प्रिय होता है उसी प्रकार साधुओं को भी निर्धनता (दिगम्बरत्व) अधिक प्रिय होती है । कारण कि उनका वही एक अपूर्व धन है, जिसकी कि वे सदा से रक्षा करते हैं । ऐहिक सुख की अभिलाषा करने वाले प्राणियों को जैसे जीवन प्रिय होता है वैसे ही परमार्थिक सुख की अभिलाषा रखने वाले साधु पुरुषों को मरण प्रिय होता है । वे वृद्धत्व एवं किसी असाध्य रोग आदि के उपस्थित होने पर धर्म का रक्षण करते हुए प्रसन्नता से समाधिमरण को स्वीकार करते हैं। उन मनस्वियों को किंचित् भी मरण का भय नहीं होता। उसका भय तो केवल अज्ञानी जीवों को ही हुआ करता है । ऐसी अवस्था में देव भला उनका क्या अनिष्ट कर सकता है ? कुछ भी नहीं । कारण यह कि दैव यदि कुछ अनिष्ट कर सकता है तो यही कर सकता है कि वह धन को नष्ट कर देगा, इससे भी अधिक कुछ अनिष्ट वह कर सकता है तो प्राणों का अपहरण कर लेगा । सो यह उक्त मनस्वी जीवोंको इष्ट ही है । तब उसने उनका अनिष्ट किया ही क्या ? कुछ नहीं ॥१६२॥

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+ आशा को निराश करनेवालों का कर्म कुछ नहीं बिगाड़ सकता -
जीविताशा धनाशा च येषां तेषां विधिर्विधिः ।
किं करोति विधिस्तेषां येषामाशा निराशता ॥१६३॥
अन्वयार्थ : जिन जीवों के जीवन की अभिलाषा और धन की अभिलाषा रहती है उन्हीं जीवों का कर्म कुछ अनिष्ट कर सकता है- वह उनके प्रिय जीवन और धन को नष्ट करके हानि कर सकता है। परन्तु जिन जीवों की आशा- जीने की इच्छा और विषयतृष्णा- निःशेषतया नष्ट हो चुकी है उनका वह कर्म भला क्या अनिष्ट कर सकता है ? कुछ भी नहीं- यदि वह उनके जीवन और धन का अपहरण करता है तो वह उनके अभीष्ट को ही सम्पादित करता है ॥१६३॥

भावार्थ :

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+ स्तुत्य और निद्य व्यक्तियों की चरम स्थिति -
परां कोटिम् समारूढौ द्वावेव स्तुतिनिन्दयोः ।
यस्त्यजेत्तपसे चक्रं यस्तपो विषयाशया ॥१६४॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य तप के लिये चक्रवर्ती की विभूति को छोडता है तथा इसके विपरीत जो विषयों की अभिलाषा से उस तप को छोडता है वे दोनों ही क्रमशः स्तुति और निन्दा की उत्कृष्ट सीमा पर पहुंचते हैं ॥१६४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो विवेकी जीव चक्रवर्ती जैसी विभूति को पाकर भी उसे आत्महित में बाधक जानकर तुच्छ तृण के समान छोड देता है और निर्ग्रन्थ होकर दुर्धर तप को स्वीकार करता है वह सबसे अधिक प्रशंसा के योग्य है । इसके विपरीत जो कारण पाकर विरक्ति को प्राप्त होता हुआ प्रथम तो राज्यवैभव को छोडकर तप को स्वीकार करता है, और फिर पीछे उन्हीं पूर्वभुक्त भोगों की अभिलाषा से उस दुर्लभ तप को छोडकर पुनः उस सम्पत्ति का उपभोग करने लगता है, वह सबसे अधिक निन्दा का पात्र है- उसकी अज्ञानता को धिक्कार है ॥१६४॥

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+ विषयाभिलाषियों द्वारा तप छोड़ने पर आश्चर्य -
त्यजतु तपसे चक्रं चक्री यतस्तपसः फलं
सुखमनुपमं स्वोत्थं नित्यं ततो न तदद्भुतम् ।
इदमिह महच्चित्रं यत्तद्विषं विषयात्मकं
पुनरपि सुधीस्त्यक्तं भ क्तुं जहाति महत्तपः ॥१६५॥
अन्वयार्थ : चूंकि तप का फल जो सुख है वह सुख अनुपम- समस्त संसारी जीवों को दुर्लभ, कर्म की अपेक्षा न करके केवल आत्ममात्र की अपेक्षा से उत्पन्न होनेवाला, और सदा रहने वाला (अविनश्वर) है; इसीलिये यदि चक्रवर्ती उस तप के लिये साम्राज्य को छोड़ देता है तो वह कुछ आश्चर्य की बात नहीं है । आश्चर्य तो महान् इस बात का है कि जो बुद्धिमान् पूर्व में विषयों को विष के समान घातक समझकर छोड देता है और तत्पश्चात् उन्हीं छोडे हुए विषयों को फिर से भोगने के लिये ग्रहण किये हुए उस महान् तप को भी छोड देता है ॥१६५॥

भावार्थ :

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+ तप से च्युत होनेवालों की निर्भयता पर आश्चर्य -
शय्यातलादपि तुकोऽपि भयं प्रपातात्
तुङ्गात्ततः खलु विलोक्य किलात्मपीडाम् ।
चित्रं त्रिलोकशिखरादपि दूरतुङ्गाद्
धीमान स्वयं न तपसः पतनाद्विभेति ॥१६६॥
अन्वयार्थ : देखो, बालक भी ऊंचे शय्यातल (पलंग) से गिर जाने पर होने वाली अपनी पीडा को देखकर निश्चयतः उससे भय को प्राप्त होता है । परन्तु आश्चर्य है कि बुद्धिमान साधु तीन लोक के शिखर से भी अतिशय ऊंचे (महान् ) उस तप से स्वयं च्युत होता हुआ भय को प्राप्त नहीं होता है ॥१६६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- तप तीनों लोकों में अतिशय पूज्य एवं अविनश्वर सुख का कारण है, इसीलिये उसे तीन लोक के शिखर से भी उन्नत बतलाया गया है । जो बालक हिताहित के विवेक से रहित होता है वह भी जब ऊंचे किसी पलंग - या पालने आदि में स्थित होता है तब वहां से गिर पडने की आशंका से भयभीत होता है। परन्तु जो साधु विवेकी है और इसीलिये जिसने विषयतृष्णा को छोडकर तप को स्वीकार किया था वह फिर से भी उस उच्छिष्टक समान विषयसुख के उपभोग के लिये आतुर होता हुआ ग्रहण किए हुए उस तप को छोडकर दुर्गति में पडने से भयभीत नहीं होता, यह कितने आश्चर्य की बात है। ऐसे साधु को उस अज्ञान बालक से भी अधिक मूर्ख समझना चाहिये ॥१६६॥

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+ तप को मलिन करनेवालों की निन्‍दा -
विशुद्धयति दुराचारः सर्वोऽपि तपसा ध्रुवम् ।
करोति मलिनं तच्च किल सर्वाधरः परः ॥१६७॥
अन्वयार्थ : जिस तप के द्वारा नियमतः सब ही दुष्ट आचरण शुद्धि को प्राप्त होता है उस तप को भी दूसरा निकृष्ट मनुष्य मलिन करता है ॥१६७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो जल वस्तु की मलिनता को दूरकर उसे शुद्ध करता है उस जल को ही यदि कोई गंदला करता है तो वह जिस प्रकार निन्दा का पात्र होता है, उसी प्रकार जो तप पूर्वोपार्जित पाप को नष्ट करके आत्मा को शुद्ध करने वाला है उसे ही यदि कोई दुश्चरित्र साधु अपने पापाचरण से मलिन करता है तो वह सबसे नीच ही कहा जावेगा। इस प्रकार के दुराचरण से न जाने उसको कितने महान् दुख सहने पडेंगे ॥१६७॥

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+ आश्चर्य-उत्पत्ति के दो प्रमुख कारण -
सन्त्येव कौतुकशतानि जगत्सु किं तु
विस्मापकं तदलमेतदिह द्वयं नः ।
पीत्वामृतं यदि वमन्ति विसृष्टपुण्याः
संप्राप्य संयमनिधिम् यदि च त्यजन्ति ॥१६८॥
अन्वयार्थ : लोक आश्चर्यजनक सैकडों कौतुक हैं, परन्तु उनमें से ये दो कार्य हमें अतिशय आश्चर्यजनक प्रतीत होते हैं। प्रथम तो आश्चर्य हमको उन पर होता है जो कि पहिले तो अमृत का पान करते हैं और फिर पीछे वमन करके उसे निकाल देते हैं । दुसरा आश्चर्य उनके ऊपर होता है जो कि पूर्व में तो विशुद्ध संयमरूप निधि को ग्रहण करते हैं और तत्पश्चात् उसे छोड भी देते हैं । अभिप्राय यह है कि पूर्व में तप-संयमादि को स्वीकार करके भी जो पीछे फिर से विषयों में अनुरक्त होकर उसे छोड़ देता है इस प्रकार का हीन मनुष्य समझना चाहिये जो कि पूर्व में अमृत को पी करके फिर पीछे उसे वमन द्वारा बाहिर निकाल देता है ॥१६८॥

भावार्थ :

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+ रागादि का नाश करने की प्रेरणा -
इह विनिहतबह्वारम्भबाह्योरुशत्रो
रूपचितनिजशक्तेर्नापरः कोप्यपाय:।
अशनशयनयानस्थानदत्तावधान:
कुरु तव परिरक्षामान्तरान् हन्तुकामः ॥१६९॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! बहुत पापकर्म के आरम्भरूप बाहिरी शत्रु को नष्ट करके अपनी आत्मीक शक्ति को बढा लेने वाले तेरे लिये अन्य कोई भी दुख का कारण नहीं हो सकता है । तू राग-द्वेषादिरूप आन्तरिक शत्रुओं को नष्ट करने का अभिलाषी होकर भोजन,शयन, गमन एवं स्थिति आदि क्रियाओं के विषयमें सावधान होता हुआ अपने संयम की रक्षा कर ॥१६९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार राजा को राज्य को भ्रष्ट कर देने वाले बाह्य और अभ्यन्तर दो प्रकार के शत्रु होते हैं उसी प्रकार मुनियों को भी उस पद से भ्रष्ट कर देनेवाले वे ही दो प्रकार के शत्रु होते हैं । यदि राजा बुद्धिमान है तो वह जिस प्रकार अपने बाह्य शत्रुओं को- विद्वेषी अन्य राजा आदि को- अपने अधीन रखता है, उसी प्रकार वह अपने काम, क्रोध, लोभ, मद, मान और हर्ष रूप अन्तरंग शत्रुओं ( अयुक्तितः प्रणीताः काम-क्रोध-लोभ-मद-मान-हर्षाः क्षितीशानाम तरङगोऽरिषड्वर्गः । नी. वा. अरिषड्वर्गसमुद्देश १. ) को भी वश में रखता है । इस प्रकार से उसका राज्य निःसन्देह सुरक्षित रहता है। इसी प्रकार से जो विवेकी साधु मुनिपद से भ्रष्ट करने वाले हिंसाजनक आरम्भादिरूप बाह्य शत्रुओं से रहित होकर राग-द्वेषादिरूप अन्तरङग शत्रुओं को भी जीतने के लिये भोजन-शयनादि क्रियाओं में सदा सावधान रहता है संयम व तप से भ्रष्ट नहीं होता है- वह भी निश्वय से अपने साधुपद को सुरक्षित रखकर निराकुल सुख को प्राप्त करता है ॥१६९॥

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+ शास्त्राभ्यास की प्रेरणा -
अनेकान्तात्मार्थप्रसवफलभारातिविनते
वचःपर्णाकीर्णे विपुलनयशाखाशतयुते ।
समुत्तुङगे सम्यक् प्रततमतिमूले प्रतिदिनं
श्रुतस्कन्धे धीमान्, रमयतु मनोमर्कटममुम् ॥१७०॥
अन्वयार्थ : जो श्रुतस्कन्धरूप वृक्ष अनेक धर्मात्मक पदार्थरूप फूल एवं फलों के भार से अतिशय झुका हुआ है, वचनोंरूप पत्तों से व्याप्त है, विस्तृत नयोंरूप सैकडो शाखाओं से युक्त है, उन्नत है, तथा समीचीन एवं विस्तृत मतिज्ञानरूप जड से स्थिर है उस श्रुतस्कन्धरूप वृक्ष के ऊपर बुद्धिमान साधु के लिये अपने मनरूपी बंदर को प्रतिदिन रमाना चाहिये ॥१७०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार बंदर स्वभाव से यद्यपि अतिशय चंचल होता है, परंतु यदि उसे फल-फूलों से परिपूर्ण कोई विशाल वृक्ष उपलब्ध हो जाता है तो वह उपद्रव करना छोडकर उसके ऊपर रम जाता है। इसी प्रकार प्राणियों का मन भी अतिशय चंचल होता है, उसके निमित्त से ही प्राणी बाह्य पर पदार्थों में इष्टानिष्ट की कल्पना करके राग-द्वेष को प्राप्त होते हैं। साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या, किन्तु कभी कभी साधुओं का भी मन चंचल हो उठता है- वे भोजनादि के विषय में राग-द्वेष का अनुभव करने लगते हैं। इसीलिये यहां ऐसे ही साधु को लक्ष्य करके यह उपदेश दिया गया है कि वह बन्दर के समान चंचल अपने मन को श्रुतरूप वृक्ष के ऊपर रमावे- उसके चिन्तन में प्रवृत्त करें। जिस प्रकार वृक्ष फूलों और फलों के भार से झुका हुआ होता है उसी प्रकार वह श्रुतरूप वृक्ष भी अनेक धर्मात्मक पदार्थों के भार से (विचार से) नम्रीभूत है, वृक्ष यदि पत्रों से व्याप्त होता है तो यह श्रुतरूप वृक्ष भी पत्तों के समान अर्धमागधी आदि भाषाओंरूप वचनों से व्याप्त हैं, वृक्ष में जहां अनेकों शाखाओं का विस्तार होता है वहां इस श्रुतरूप वृक्ष में भी उन शाखाओं के समान नयों का विस्तार अधिक है, जैसे वृक्ष उन्नत (ऊंचा) होता है वैसे ही श्रुतवृक्ष भी उन्नत (महान्-साधारण जनों को दुर्लभ) है,तथा जिस प्रकार वृक्ष को स्थिर रखनेवाली उसकी कितनी ही जडें फैली होती हैं,तथा उसी प्रकार अनेक (336) भेदोंरूप जो विस्तृत मतिज्ञान है वह इस श्रुतरूप वृक्ष की गहरी जड के समान है जिसके कि निमित्त से वह स्थिर होता है। इस प्रकार उस चंचल मन को बाह्य विषयों की ओर से खींचकर इस श्रुतरूप वृक्ष के ऊपर रमाने से-श्रुत के अभ्यास में लगाने से- उसके निमित्त से होनेवाली राग-द्वेषरूप प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। इससे कर्मों की संवरपूर्वक निर्जरा होकर मोक्षसुख की प्राप्ति होती है॥१७०॥

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+ वस्तु का अनेकान्तिक स्वरूप -
तदेव तदतद्रूपं प्राप्नुवन्न विरंस्यति ।
इति विश्वमनाद्यन्तं चिन्तयेद्विश्ववित् सदा ॥१७१॥
अन्वयार्थ : वह जीवादिरूप वस्तु तदतत्स्वरूप अर्थात् नित्यानित्यादिस्वरूप को प्राप्त होकर विराम को नहीं प्राप्त होती है, इस प्रकार समस्त तत्त्व का जानकार विश्व की अनादिनिधनता का विचार करे ॥१७१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व श्लोक में यह निर्देश किया था कि साधु के लिये अपने चंचल मन को श्रुत के अभ्यासमें लगाना चाहिये। इस का स्पष्टीकरण करते हुए यहां यह बतलाया है कि आगम में वर्णित जीवजीवादि पदार्थों में से प्रत्येक विवक्षाभेद से भिन्न भिन्न स्वरूपवाला है । जैसे- एक ही आत्मा जहां द्रव्य की प्रधानता से नित्य है वहां वह पर्याय की प्रधानता से अनित्य भी है। कारण यह कि आत्मा का जो चैतन्य द्रव्य है उसका कभी नाश सम्भव नहीं है, वह उसकी समस्त पर्याय में विद्यमान रहता है। जैसे- सुवर्ण से उत्तरोत्तर उत्पन्न होने वाली कडा, कुण्डल एवं सांकल आदि पर्यायों में सुवर्णसामान्य विद्यमान रहता है। अतएव वह द्रव्यार्थिक नय की प्रधानता से नित्य कहा जाता है। परन्तु वही चूंकि पर्याय की अपेक्षा अनेक अवस्थाओं में भी परिणत होता है- एक रूप नहीं रहता, इसीलिये पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा उक्त आत्मा को अनित्य भी कहा जाता है । लोकव्यवहार में भी कहा जाता है कि अमुक मनुष्य मर गया है, अमुक के यहां पुत्रजन्म हुआ है, आदि । यद्यपि नित्यत्व और अनित्यत्व ये दोनों ही धर्म परस्पर विरुद्ध अवश्य दिखते हैं तो भी विवक्षाभेद से उनके मानने में कोई विरोध नहीं आता । जैसे- एक ही देवदत्त नाम का व्यक्ति अपने पुत्र की अपेक्षा जिस प्रकार पिता कहा जाता है उसी प्रकार वह अपने पिता की अपेक्षा पुत्र भी कहा जाता है। इस प्रकार का व्यवहार लोक में स्पष्टतया देखा जाता है, इसमें किसी को भी विरोध प्रतीत नहीं होता। परन्तु हां, यदि कोई जिस पुत्र की अपेक्षा किसी को पिता कहता है उसी पुत्र की ही अपेक्षा से यदि उसे पुत्र भी कहता है तो उसका वैसा कहना निश्चित ही विरुद्ध होगा और इसीलिये वह निन्दा का पात्र होगा ही। इसी प्रकार जिस द्रव्य की अपेक्षा वस्तु को नित्य माना जाता है उसी द्रव्य की अपेक्षा यदि कोई उसे अनित्य समझ ले तो उसके समझने में अवश्य ही विरोध रहेगा। परन्तु एक ही वस्तु को द्रव्य की अपेक्षा नित्य और पर्याय की अपेक्षा अनित्य मानने में किसी प्रकार के भी विरोध की सम्भावना नहीं रहती । इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु को अपेक्षाभेद से सत् और असत्, एक और अनेक तथा भिन्न और अभिन्न आदि स्वरूपों के मानने में किसी प्रकार का विरोध नहीं होता; बल्कि इसके विपरीत उसे दुराग्रहवश एक ही स्वरूप मानने में अवश्य विरोध होता है । इस प्रकार साधु को श्रुत के चिन्तन में- वस्तुस्वरूप के विचार में- अपने मन को लगाना चाहिये। ऐसा करने से वह साथ निठल्ले मन के द्वारा उत्पन्न होने वाली राग-द्वेषमय प्रवृत्ति से अवश्य ही रहित होगा॥१७१॥

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+ प्रमाण से सिद्ध वस्तु का अनेकान्तिक स्वरूप -
एकमेकक्षणे सिद्धं ध्रौव्योत्पत्तिव्ययात्मकम् । अबाधितान्यतत्प्रत्ययान्यथानुपपत्तितः ॥१७२॥
अन्वयार्थ : एक ही वस्तु विवक्षित एक ही समय में ध्रौव्य, उत्पाद और नाशस्वरूप सिद्ध है; क्योंकि इसके बिना उक्त वस्तु में जो भेद और अभेदरूप निर्बाध ज्ञान होता है वह घटित नहीं हो सकता है ॥१७२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- बाह्य और आभ्यन्तर निमित्त को पाकर जीव और अजीव द्रव्य अपनी जाति को न छोडते हुए जो अवस्थान्तर को प्राप्त होते हैं, इसका नाम उत्पाद है- जैसे अपनी पुद्गल जाति को न छोडकर मिट्टी के पिण्डक घट पर्याय को प्राप्त करना। उक्त दोनों ही कारणों से द्रव्य की जो पूर्व अवस्था का नाश होता है इसे व्यय (नाश) कहा जाता है- जैसे उस घट की उत्पत्ति में उसी मिट्टी के पिण्ड की पिण्डरूप पूर्व पर्याय का नाश । अनादि पारिणामिक स्वभाव से वस्तु का उत्पाद और नाश से रहित होकर स्थिर रहने का नाम ध्रौव्य है । ये तीनों ही अवस्थायें प्रत्येक वस्तु में प्रति समय रहती हैं। कारण यह कि प्रत्येक पदार्थ सामान्य-विशेषात्मक है, अतएव जहां विशेषरूप से वस्तु (घट) का उत्पाद होता है वहीं उसका (मृत्पिण्ड का) नाश भी होता है। परन्तु सामान्य (पौद्गलिकत्व) स्वरूप से न वस्तु का उत्पाद होता है और न नाश भी- वह सामान्य (पुद्गल) स्वरूप से दोनों (घट और मृत्पिण्ड) ही अवस्थाओं में विद्यमान रहती है । इस बात का समर्थन स्वामी समन्तभद्राचार्य ने निम्न दृष्टान्त के द्वारा किया है-

घट-मौलि-सुवर्णार्थी नाशोत्पादस्थितिष्वयम् ।

शोक-प्रमोद-माध्यस्थ्यं जनो याति सहेतुकम् ॥

अर्थात् किसी सुनार ने सुवर्ण के घट को तोडकर उससे मुकुट को बनाया। इसको देखकर जो व्यक्ति घट को चाहता था वह तो पश्चात्ताप करता है, जो मुकुट को चाहता था वह हर्षित होता है, और जो सुवर्ण मात्र को चाहता था वह हर्ष-विषाद दोनों से रहित होकर मध्यस्थ ही रहता है ॥ आ. मी. ५९॥

इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक वस्तु प्रत्येक समय में उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यस्वरूप है । ऐसा मानने पर ही उसके विषय में होने वाली भेदबुद्धि और अभेदबुद्धि संगत होती है, अन्यथा वह घटित नहीं हो सकती है; और वैसी बुद्धि होती अवश्य है। तभी तो भेदबुद्धि के कारण घट को टूटा हुआ देखकर उसका अभिलाषी दुखी और मुकुट का अभिलाषी हर्षित होता है। किन्तु उन दोनों ही अवस्थाओं में अभेदबुद्धि के रहने से सुवर्ण का अभिलाषी न दुखी होता है और न हर्षित भी। इसलिये प्रत्येक पदार्थ प्रतिसमय उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वरूप है; ऐसा निश्चय करना चाहिये॥१७२॥

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+ परस्पर विरुद्ध धर्ममय सभी पदार्थ -
न स्थास्नु न क्षणविनाशि न बोधमात्रं
नाभावमप्रतिहतप्रतिभासरोधात् ।
तत्त्वं प्रतिक्षणभवत्तदतत्स्वरूप
माद्यन्तहीनमखिलं च तथा यथैकम् ॥१७३॥
अन्वयार्थ : जीव-अजीव आदि कोई भी वस्तु न सर्वथा स्थिर रहने वाली (नित्य) है, न क्षण-क्षण में नष्ट होनेवाली (अनित्य) है, न ज्ञानमात्र है, और न आत्मस्वरूप ही है; क्योंकि वैसा निर्बाध प्रतिभास नहीं होता है। जैसा कि निर्बाध प्रतिभास होता है, तदनुसार वह वस्तु प्रतिक्षण उत्पन्न होने वाले तदतत्स्वरूप अर्थात् नित्य-अनित्यादिस्वरूप से संयुक्त व अनादिनिधन है । जिस प्रकार एक तत्त्व नित्यानित्य, एक-अनेक एवं भेदाभेद स्वरूपवाला है उसी प्रकार समस्त तत्त्वों का भी स्वरूप समझना चाहिये ॥१७३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- (1) सांख्य दर्शन में वस्तु को सर्वथा नित्य स्वीकार किया गया है। उसका निराकरण करते हुए यहां यह कहा गया है कि वस्तु सर्वथा नित्य नहीं है, क्योंकि वैसी निर्बाध प्रतीति नहीं होती है। यदि वस्तु सर्वथा नित्य ही होती तो वह सदा एक स्वरूप में ही देखने में आना चाहिये थी, परन्तु ऐसा है नहीं समयानुसार वह परिवर्तित रूप में ही देखी जाती है । जो पूर्व में दूध था वह कारण पाकर दही के रूप में परिणत देखा जाता है तथा जो पूर्व में बालक था वह समयानुसार कुमार, युवा एवं वृद्ध भी देखा जाता है । यह अनुभूयमान परिवर्तन कूटस्थ नित्य अवस्था में सम्भव नहीं है । वैसी अवस्था में तो जो वस्तु अपने द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के अनुसार जितने प्रमाण में हैं उतने ही प्रमाण में सदा उपलब्ध होनी चाहिये, सो वैसा है नहीं । अतएव वस्तु सर्वथा नित्य नहीं है । (2) बौद्ध प्रत्येक वस्तु को क्षणनश्वर स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि वस्तु प्रत्येक क्षण में भिन्न ही होती है, पूर्व पर्याय से उत्तर पर्याय का कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। बौद्ध दर्शन में पूर्वोत्तर पर्यायों में अन्वयस्वरूप से प्रतिभासमान सामान्य को वस्तुभूत नहीं स्वीकार किया गया है, किन्तु वहां स्वलक्षणस्वरूप विशेष को ही वस्तुभूत माना गया है। इस बौद्धाभिप्राय को असंगत बतलाते हुए यहां यह निर्देश किया है कि तत्त्व सर्वथा क्षणनश्वर भी नहीं है,क्योंकि उक्त वस्तु जैसे सर्वथा नित्य प्रतिभासित नहीं होती है वैसे ही वह सर्वथा (पुद्गलस्वरूप से भी) भिन्न ही हों तो बिना दूध के भी दही की उत्पत्ति होनी चाहिये थी । परन्तु ऐसा नहीं है, जो पूर्व में किसी न किसी स्वरूप से सत् है वही उत्तर काल में दूसरी पर्यायस्वरूप से परिणत होता है। यदि पूर्वोतर पर्यायों को सर्वथा भिन्न ही माना जाएगा तो मिट्टी से ही घट की उत्पत्ति हो और तन्तुओं से ही पट की उत्पत्ति हो,ऐसा कुछ भी उपादान का नियम नहीं रह सकेगा- वैसी अवस्था में तो कोई भी वस्तु किसी भी उपादान से उत्पन्न हो सकेगी। परन्तु ऐसा है नहीं,क्योंकि, भिन्न भिन्न कार्यों की उत्पत्ति के लिये बद्धिमान् मनुष्य भिन्न भिन्न कारणों (उपादन) का ही अन्वेषण करते देखे जाते हैं- बालु से तेल निकालने का प्रयत्न कोई भी बुद्धिमान नहीं करता है । इसके अतिरिक्त वस्तु को सर्वथा अनित्य मानने पर यह वही देवदत्त है जिसे कि दस वर्ष पूर्व में देखा था, ऐसा अनुभवसिद्ध प्रत्यभिज्ञान भी नहीं हो सकेगा । परन्तु वह होता अवश्य है अतएव वस्तु जिस प्रकार सर्वथा नित्य नहीं है उसी प्रकार वह सर्वथा अनित्य भी नहीं है। किन्तु द्रव्य (सामान्य) की अपेक्षा से वह कथंचित् नित्य और पर्याय (विशेष) की अपेक्षा से कथंचित् अनित्य भी है, ऐसा स्वीकार करना चाहिये। कारण कि ऐसी ही निर्बाध प्रतीति भी होती है । (३) विद्वानाद्वैतवादी एक मात्र विज्ञान को ही स्वीकार करते हैं- विज्ञान को छोडकर अन्य कोई पदार्थ उनके यहां वस्तुभूत नहीं माने गये हैं । उनका अभिप्राय है कि घट-पटादि जो भी पदार्थ देखने में आते हैं वे काल्पनिक हैं- अवस्तुभूत हैं। इस कल्पना का कारण अनादि अविद्यावासना है। उनके इस अभिप्राय का निराकरण करते हुए यहां यह कहा गया है कि वस्तुतत्त्व केवल ज्ञानमात्र ही नहीं है, क्योंकि वैसी निर्बाध प्रतीति नहीं होती है । इसके अतिरिक्त एक मात्र विज्ञान को ही वस्तुभूत स्वीकार करने पर कारक और क्रिया आदि का जो भेद देखा जाता है वह विरोध को प्राप्त होगा। जो भी उत्पन्न होते हुए कार्य देखे जाते हैं, कोई भी कार्य अपने आप से नहीं उत्पन्न हो सकता है । दूसरे, जिस अविद्या की वासना से अनुभूयमान पदार्थों को अवस्तुभूत माना जाता है वह अविद्या भी यदि अवस्तुभूत है तब तो उसके निमित्त से उक्त पदार्थों को अवस्तुभूत नहीं समझना चाहिये, क्योंकि, अवस्तुभूत गधे के सींग किसी को कष्ट देते हुए नहीं देखे जाते हैं । इसके अतिरिक्त उक्त अद्वैत की कल्पना में पुण्यपाप, सुख-दुःख, लोक-परलोक, विद्या-अविद्या और बन्ध-मोक्ष आदि की व्यवस्था न बन सकने से समस्त लोकव्यवहार ही समाप्त हो जाता है। अतएव विज्ञानाद्वैत के समान [पुरुषाद्वैत, चित्राद्वैत एवं शब्दाद्वैत आदि कोई भी अद्वैत युक्तिसंगत नहीं है; ऐसा समझना चाहिये । (4) माध्यमिक (शून्यकान्तवादी) चराचर जगत को शून्य या अभावस्वरूप मानते हैं । उनका कहना है कि जिस प्रकार स्वप्न में विविध प्रकार की वस्तुएँ एवं कार्य आदि देखने में आते हैं, किन्तु निद्राभंग होते ही वे सब विलीन हो जाते हैं- अवस्तुभूत प्रतिभासित होने लगते हैं, उसी प्रकार घट-पटादिस्वरूप से प्रतिभासित होने वाले समस्त ही पदार्थ स्वप्न में देखे हुए पदार्थों के ही समान अवस्तुभूत हैं । उनका कैसा प्रतिभास अज्ञानता से होता है । इस मत का खण्डन करते हुए यहां यह कहा है कि तत्त्व अभावस्वरूप भी नहीं है, क्योंकि वैसी निर्बाध प्रतीति नहीं होती है। किंतु वह प्रतीति उसके विपरीत ही होती है- प्रत्यक्ष में देखे जाने वाले समस्त पदार्थ और उनके निमित्त से होने वाला सारा लोकव्यवहार यथार्थ ही प्रतीत होता है, न कि स्वप्न के समान अयथार्थ । यदि जगत को सर्वथा शून्य ही माना जावे तो फिर शून्यकान्तवादी न तो अपने ही अस्तित्व को सिद्ध कर सकेंगे और न अन्य श्रोताओं के भी । ऐसी अवस्था में जगत् की उस शून्यता को कौन और किसके प्रति सिद्ध करेगा, यह सब ही सोचनीय हो जाता है । इस प्रकार युक्ति से विचार करने पर तत्त्व को सर्वथा अभावस्वरूप स्वीकार करना भी उचित नहीं प्रतीत होता । तत्त्व की यथार्थ व्यवस्था तो अनेकान्त के आश्रय से विवक्षा भेद के अनुसार ही हो सकती है, न कि सर्वथा एकान्तस्वरूप से ॥१७३॥

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ज्ञानस्वभावः स्यादात्मा स्वभावावाप्तिरच्युतिः।
तस्मादच्युतिमाकांक्षन् भावयेज्ज्ञानभावनाम् ॥१७४॥
अन्वयार्थ : आत्मा ज्ञान स्वभाववाला है और उस अनंतज्ञानादि स्वभाव की जो प्राप्ति है, यही उस आत्मा की अच्युति अर्थात् मुक्ति है। इसलिये मुक्ति की अभिलाषा करने वाले भव्य को उस ज्ञानभावना का चिन्तन करना काहिये ॥१७४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व श्लोक में यह बतलाया था कि जितने भी जीवाजीवादि पदार्थ हैं वे सब ही विवक्षाभेद से नित्यानित्यादि अनेक स्वभाववाले हैं। यह कथंचित् नित्यानित्यादिरूपता उक्त सब ही पदार्थों का साधारण स्वरूप है । इस पर प्रश्न उपस्थित होता है कि जब यह समस्त पदार्थों का साधारण स्वरूप है तब आत्मा का असाधारण स्वरूप क्या है जिसका कि चिन्तन किया जा सके। इसके उत्तर स्वरूप यहां यह बतलाया है कि आत्मा का असाधारण स्वरूप ज्ञान है और वह अविनश्वर है । जो भी जिस पदार्थ का असाधारण स्वरूप होता है वह सदा उसके साथ ही रहता है- जैसे कि अग्नि का उष्णत्व स्वरूप । इस प्रकार यद्यपि आत्मा का स्वरूप ज्ञान है और वह अविनश्वर भी है तो भी वह अनादि काल से ज्ञानावरण एवं मोहनीय आदि कर्मों के निमित्त से विकृत (राग-द्वेषबुद्धिस्वरूप) हो रहा है जैसे कि अग्नि के संयोग से जल का शीतल स्वभाव विकृत होता है। अग्नि का संयोग हट जाने पर जिस प्रकार वह जल अपने स्वभाव में स्थित हो जाता है उसी प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मों के हट जाने पर आत्मा भी अपने स्वाभाविक अनन्तचतुष्टय में स्थित हो जाता है। बस इसी का नाम मोक्ष है। इसीलिये यहां मुमुक्षु जन से यह प्रेरणा की गई है कि आप लोग यदि उस मोक्ष की अभिलाषा करते हैं तो आत्मा का स्वरूप जो ज्ञान है उसी का बार बार चिन्तन करें, क्योंकि, एक मात्र वही अविनश्वर स्वभाव उपादेय है- शेष सब विनश्वर पर पदार्थ (स्त्री-पुत्र एवं धन आदि) हेय हैं। इस प्रकार की भावना से उस मोक्ष की प्राप्ति हो सकेगी ॥१७४॥

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ज्ञानमेव फलं ज्ञाने ननु श्लाघ्यमनश्वरम् ।
अहो मोहस्य माहात्म्यमन्यदप्यत्र मृग्यते ॥१७५॥
अन्वयार्थ : ज्ञानस्वभाव का विचार करने पर प्राप्त होनेवाला उसका फल भी वही ज्ञान है जो कि प्रशंसनीय एवं अविनश्वर है। परन्तु आश्चर्य है कि अज्ञानी प्राणी उस ज्ञानभावना का फल ऋद्धि आदि की प्राप्ति भी खोजते हैं, यह उनके उस प्रबल मोह की महिमा है ॥१७५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- उक्त ज्ञानभावना के चिन्तन से क्या फल प्राप्त हो सकता है, इस जिज्ञासा की पूर्तिस्वरूप यहां यह बतलाया है कि उक्त ज्ञानभावना (श्रुतचिन्तन) का फल भी उसी ज्ञान की प्राप्ति है । कारण यह कि श्रुतज्ञान का विचार करने पर साक्षात फल तो उन उन पदार्थों के विषय में जो अज्ञान था वह नष्ट होकर तद्विषयक ज्ञान की परिप्राप्ति है, तथा उसका पारम्परित फल निर्मल एवं अविनश्वर केवलज्ञान की प्राप्ति है। इस तरह दोनों भी प्रकार से उसका फल ज्ञान की ही प्राप्ति है । उसका फल जो ऋद्धि-सिद्धि आदि माना जाता है वह अज्ञानता से ही माना जाता है। कारण यह कि जिस प्रकार खेती का वास्तविक फल अन्न का उत्पादन होता है, न कि भूसा आदि- वह तो अन्न के साथ में अनुषंगस्वरूप से होने वाला ही है । इसी प्रकार श्रुतभावना का भी वास्तविक फल केवलज्ञान की प्राप्ति ही है, उनके निमित्त से उत्पन्न होने वाली ऋद्धियों आदि की प्राप्ति तो उक्त भूसे के समान उसका आनुषंगिक फल है। अतएव जिस प्रकार कोई भी किसान भूसप्राप्ति के विचार से कभी खेती नहीं करता है, किन्तु अन्नप्राप्ति के ही विचार से करता है। उसी प्रकार विवेकी जनों को भी उक्त केवलज्ञान की प्राप्ति के विचार से ही श्रुतभावना का चिन्तन करना चाहिये, न कि ऋद्धि आदि की प्राप्ति इच्छा से ॥१७५॥

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शास्त्राग्नौ मणिवद्भव्यो विशुद्धो भाति निर्वृतः।
अङ्गारवत् खलो दीप्तो मली वा भस्म वा भवेत् ॥१७६॥
अन्वयार्थ : शास्त्ररूप अग्नि में प्रविष्ट हुआ भव्य जीव तो मणि के समान विशुद्ध होकर मुक्ति को प्राप्त करता हुआ शोभायमान होता है। किन्तु दुष्ट जीव (अभव्य) उस शास्त्ररूप अग्नि में प्रदीप्त होकर मलिन व भस्मस्वरूप हो जाता है ॥१७६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार पद्मरागादि मणि को अग्नि में रखने पर वह मल से रहित होकर अतिशय निर्मल हो जाता है और सदा वैसा ही रहता है उसी प्रकार श्रुतभावना का विचार करने पर भव्य जीव भी राग-द्वेषादिरूप मल से रहित होकर विशुद्ध होता हुआ मुक्त हो जाता है और सदा उसी अवस्था में प्रकाशमान रहता है। इसके विपरीत जिस प्रकार अग्नि के मध्य में स्थित अंगार यद्यपि उस समय अतिशय दैदीप्यमान होता है तो भी पीछे वह मलिन कोयला अथवा भस्म बन जाता है उसी प्रकार उक्त श्रुतभावना के विचार से अभव्य जीव भी यद्यपि उस समय ज्ञानादि के प्रभाव से प्रकाशमान होता है तो भी वह मिथ्याज्ञान से पदार्थों को जान करके मलिन तथा मिथ्यादर्शन व अनन्तानुबन्धी के प्रभाव में उनमें राग-द्वेषबुद्धि को प्राप्त होकर भस्म के समान पदार्थज्ञान से रहित हो जाता है । यहां शास्त्र में जो अग्नि का आरोप किया गया है वह इसलिये किया गया है कि जिस प्रकार अग्नि वस्तु को प्रकाशित करती है और इन्धन को जलाती भी है उसी प्रकार शास्त्र भी वस्तुस्वरूप को प्रकाशित करता है और कर्मरूप इन्धन को जलाता भी है । इस प्रकार उन दोनों में प्रकाशकत्व एवं दाहकत्वरूप समान धर्मों को देखकर ही वैसा आरोप किया गया है ॥१७६॥

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मुहुः प्रसार्य संज्ञानं पश्यन् भावान् यथास्थितान् ।
प्रीत्यप्रीती निराकृत्य ध्यायेदध्यात्मविन्मुनिः ॥१७७॥
अन्वयार्थ : आत्मतत्त्व का जानकार मुनि बार बार सम्यग्ज्ञान को फैलाकर जैसा कि पदार्थों का स्वरूप है उसी रूप से उनको देखता हुआ राग और द्वेष को दूर करके ध्यान करे ॥१७७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि आत्महितैषी जीव को सबसे पहिले सम्यग्ज्ञान के द्वारा जीवाजीवादि पदार्थों के यथार्थ स्वरूप को जानने का प्रयत्न करना चाहिये। ऐसा होने पर आत्मस्वरूप की जानकारी हो जाने से उसकी उस ओर रुचि होगी। इसके अतिरिक्त बाह्य पर पदार्थों में इष्टानिष्टबुद्धि के न रहने से रागद्वेषरूप प्रवृत्ति भी नष्ट हो जावेगी जिससे कि वह एकाग्र चित्त होकर ध्यान में लीन हो सकेगा। कारण यह कि राग-द्वेषरूप प्रवृत्ति के होते हुए उस ध्यान की सम्भावना नहीं है॥१७७॥

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वेष्टनोद्वेष्टने यावत्तावद् भ्रान्तिर्भवार्णवे।
आवृत्तिपरिवृत्तिभ्यां जन्तोर्मन्थानुकारिणः ॥१७८॥
अन्वयार्थ : मथनी का अनुकरण करने वाले जीव के जब तक रस्सी के बंधने और खुलने के समान कर्मों का बन्ध और निर्जरा (सविपाक) होती है तब तक उक्त रस्सी के खींचने और ढीली करने के समान राग और द्वेष से उसका संसाररूप समुद्र में परिभ्रमण होता ही रहेगा ॥१७८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यहां जीव को मन्थनदण्ड (मथानी) के समान बतलाया है। उससे सम्बद्ध कर्म उस मन्थनदण्ड के ऊपर लिपटी हुई रस्सी के समान हैं, उसकी राग और द्वेषमय प्रवृत्ति उक्त रस्सी को एक ओर से खींचने और दूसरी ओर से कुछ ढीली करने के समान है, तथा उससे होनेवाला बन्ध और सविपाक निर्जरा उस रस्सी के बंधने और उकलने के समान है । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार मथानी में लिपटी हुई रस्सी को एक ओर से खींचने और दूसरी ओर से ढीली करने पर वह रस्सी बंधती व उकलती ही रहती है तथा इस प्रकार से वह मथनदण्ड बराबर घूमता ही रहता है- उसे विश्रान्ति नहीं मिलती। हां, यदि उस रस्सी को एक ओर से सर्वथा छोडकर दूसरी ओर से पूरा ही खींच लिया जाय तो फिर उसका इस प्रकार से बंधना और उकलना चालू नहीं रह सकेगा। तब मन्थनदण्ड स्वयमेव स्थिर- परिभ्रमण से रहित- हो जावेगा। ठीक इसी प्रकार से जब तक जीव की राग-द्वेषरूप प्रवृत्ति चालू रहती है तबतक वह कर्मों का बन्ध करके और उनका फल भोगकर निर्जरा भी करता ही रहता है । कारण यह कि राग-द्वेष से जिन नवीन कर्मों का बन्ध होता है उनके उदय में आने पर जीव तत्कृत सुखदुःखरूप फल को भोगता हुआ फिर भी राग-द्वेषरूप परिणमन करता है । इस प्रकार से यह क्रम जब तक चालू रहता है तबतक प्राणी चतुर्गतिरूप इस संसार में परिभ्रमण करता ही रहता है । परन्तु यदि वह रागद्वेष से बांधे गये उन कर्मों को तपश्चरणादि के द्वारा अविपाक निर्जरास्वरूप से नष्ट कर देता है तो फिर राग-द्वेषरूप परिणति से रहित हो जाने के कारण उसके नवीन कर्मों का बन्ध नहीं होता है । और तब संवर एवं निर्जरा के आश्रय से उसका संसारपरिभ्रमण भी नष्ट हो जाता है । इससे यह निष्कर्ष निकला कि जबतक प्राणी राग-द्वेषरूप परिणमन करता है तक उसका चित्त स्थिर नहीं रह सकता है, और जबतक चित्त स्थिर नहीं होता है तबतक ध्यान की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अतएव ध्यान की प्राप्ति के लिये राग-द्वेष से रहित होना अनिवार्य है॥१७८॥

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मुच्यमानेन पाशेन भ्रान्तिर्बन्धश्च मन्थवत् ।
जन्तोस्तथासौ मोक्तव्यो येनाभ्रान्तिरबन्धनम् ॥१७९॥
अन्वयार्थ : छोडी जानेवाली रस्सी की फांसी के द्वारा मथानी के समान जीव के नवीन बन्ध और परिभ्रमण चालू रहता है। अतएव उसको इस प्रकार से छोडना चाहिये कि जिससे फिर से बन्धन और परिभ्रमण न हो सके ॥१७९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार मथानी में फांसी के समान लिपटी हुई रस्सी यदि एक ओर से खींचने के साथ दूसरी ओर से ढीली की जाती है तब तो मथानी का बंधना व घुमना बराबर चालू ही रहता है। किन्तु यदि उस रस्सी को दोनों ओर से ही ढीला कर दिया जाता है तो फिर मथानी के घूमने की क्रिया सर्वथा बन्द हो जाती है । ठीक इसी प्रकार से जीव की फांसी स्वरूप सम्बद्ध कर्म को यदि सविपाक निर्जरा के द्वारा राग-द्वेषरूप प्रवृत्ति के साथ छोडते हैं- निर्जीर्ण करते हैं- तब जो जीव के नवीन कर्मों का बन्ध और संसार परिभ्रमण पूर्ववत् बराबर चालू रहता है । परन्तु यदि उक्त कर्मरूप फांसी को अविपाक निर्जरापूर्वक राग-द्वेष से रहित होकर छोडा जाता है तो फिर उसके नवीन कर्मों का बन्ध और संसारपरिभ्रमण दोनों ही रुक जाते है। अतएव सविपाक निर्जरा हेय और अविपाक निर्जरा उपादेय है, यह अभिप्राय यहां ग्रहण करना चाहिये ॥१७९॥

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रागद्वेषकृताभ्यां जन्तोर्बन्धः प्रवृत्त्यवृत्तिभ्याम्।
तत्त्वज्ञानकृताभ्यां ताभ्यामेवेक्ष्यते मोक्षः ॥१८०॥
अन्वयार्थ : राग और द्वेष के द्वारा की गई प्रवृत्ति और निवृत्ति से जीव के बन्ध होता है तथा तत्त्वज्ञानपूर्वक की गई उसी प्रवृत्ति और निवृत्ति के द्वारा उसका मोक्ष देखा जाता है ॥१८०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जीव जब तक बाह्य पर पदार्थों में इष्ट और अनिष्ट की कल्पना करता है तब तक उसके जिस प्रकार इस पदार्थ के संयोग में हर्ष और उसके वियोग में विषाद होता है उसी प्रकार अनिष्ट पदार्थ के संयोग में द्वेष और उसके वियोग में हर्ष भी होता है। इस प्रकार से जब तक उसकी इष्ट वस्तु के ग्रहणादि में प्रवृत्ति और अनिष्ट वस्तु के विषय में निवृत्ति होती है तब तक उसके कर्मों का बन्ध भी अवश्य होता है । इसके विपरीत जब वह तत्त्वज्ञानपूर्वक अनिष्ट हिंसा आदि के परिहार और इष्ट (तप-संयम आदि) के ग्रहण में प्रवृत्त होता है तब उसके नवीन कर्मों के बन्ध का अभाव (संवर) और पूर्वसंचित कर्मों की निर्जरा होकर मोक्ष की प्राप्ति होती है । इसलिये यह ठीक ही कहा गया है कि 'रागी बध्नाति कर्माणि वीतरागो विमुच्यते । ' अर्थात् रागी जीव तो कर्म को बांधता है और वीतराग उससे मुक्त होता है- निर्जरा करता है। इसी प्रकार पुरुषार्थसिद्धयुपाय (२१२-२१४) में भी राग को बन्ध का कारण और रत्नत्रय को बन्धाभावका कारण बतलाया गया है ॥१८०॥

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द्वेषानुरागबुद्धिर्गुणदोषकृता करोति खलु पापम् ।
तद्विपरीता पुण्यं तदुभयरहितं तयोर्मोक्षम् ॥१८१॥
अन्वयार्थ : गुण के निमित्त से की गई द्वेषबुद्धि तथा दोष के निमित्त से की गई अनुरागबुद्धि, इनसे पाप का उपार्जन होता है। इसके विपरीत गुण के निमित्त से होनेवाली अनुरागबुद्धि और दोष के निमित्त से होनेवाली द्वेषबुद्धि से पुण्य का उपार्जन होता है । तथा उन दोनों से रहित-अनुराग बुद्धि और द्वेषबुद्धि के बिना- उन दोनों (पाप-पुण्य) का मोक्ष अर्थात् संवरपूर्वक निर्जरा होती है ॥१८१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जीव की प्रवृत्ति तीन प्रकार की होती है- अशुभ, शुभ और शुद्ध । इनमें अशुभ प्रवृत्ति व्रत-संयमादि से द्वेष रखकर दुर्व्यसनादि में अनुराग रखने से होती है और वह पापबंधन की कारण होती है। इसके विपरीत शुभ प्रवृत्ति उन दुर्व्यसनादि को अनिष्ट समझकर व्रत-संयमादि में अनुराग रखने से होती है और वह पुण्यबन्ध की कारण होती है। इनके अतिरिक्त राग और द्वेष इन दोनों से ही रहित होकर जो आत्मध्यानरूप जीव की प्रवृत्ति होती है वह है उसकी शुद्ध प्रवृत्ति और वह उपर्युक्त पाप और पुण्य दोनों के ही नाश का कारण होती है । यह अन्तिम प्रवृत्ति (शुद्धोपयोग) ही जीव को उपादेय है । परंतु जबतक वह शुद्धोपयोगरूप प्रवृत्ति सम्भव नहीं है तबतक जीव के लिये उस अशुभ प्रवृत्ति को छोडकर शुभप्रवृत्ति को अपनाना भी योग्य है । परंतु अशुभ प्रवृत्ति तो सर्वथा और सर्वदा हेय ही है। उदाहरण के रूप में जैसे ब्रह्मचर्य सर्वदा और सर्वथा ही उपादेय है। परंतु जो उसका सर्वथा पालन नहीं कर सकता है उसके लिये यह भी अच्छा है कि किसी योग्य कन्या को सहधर्मिणी के रूप में स्वीकार करके अन्य स्त्रियों की ओर से विरक्त होता हुआ केवल उसी के साथ अनासक्तिपूर्वक विषयसुख का अनुभव करे । इसके विपरीत स्वस्त्री और परस्त्री आदि का भेद न करके स्वेच्छाचारिता से आसक्ति के साथ विषयभोग करना, यह सर्वथा निन्द्य ही समझा जाता है- उसकी प्रशंसा कभी भी किसी के द्वारा नहीं की जाती है यही भाव यहां अशुभ, शुभ और शुद्ध उपयोग के भी विषय में समझना चाहिये ॥१८१॥

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मोहबीजाद्रतिदद्वेषौ बीजान्मूलाङ्कुराविव ।
तस्माज्ज्ञानाग्निना दाह्यं तदेतौ निर्दिधिक्षुणा ॥१८२॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार बीज से जड और अंकुर उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार मोहरूप बीज से राग और द्वेष उत्पन्न होते हैं । इसलिये जो इन दोनों (राग-द्वेष) को जलाना चाहता है उसे ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा उस मोहरूप बीजको जला देना चाहिये ॥१८२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार वृक्ष की जड और अंकुर का कारण बीज है उसी प्रकार राग और द्वेष की उत्पत्ति का कारण मोह (अविवेक) है अतएव जो वृक्ष के अंकुर और जड को नहीं उत्पन्न होने देना चाहता है वह जिस प्रकार उक्त वृक्ष के बीज को ही जला देता है। उसी प्रकार जो आत्महितैषी उन राग और द्वेष को नहीं उत्पन्न होने देना चाहता है उसे उनके कारण भूत उस मोह को ही सम्यग्ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा जलाकर नष्ट कर देना चाहिये । इस प्रकार से वे राग-द्वेष फिर न उत्पन्न हो सकेंगे ॥१८२॥

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पुराण ग्रहदोषोत्थो गम्भीरः सगतिः सरुक् ।
त्यागजात्यादिना मोहव्रणः शुद्धयति रोहति ॥१८३॥
अन्वयार्थ : मोह एक प्रकार का घाव है, क्योंकि वह घाव के समान ही पीडाकारक है । जिस प्रकार पुराना (बहुत समय का), शनि आदि ग्रह के दोष से उत्पन्न हुआ, गहरा, नस से सहित और पीडा देने वाला घाव औषधयुक्त घी (मलहम) आदि से शुद्ध होकर- पीव आदि से रहित होकर- भर जाता है उसी प्रकार पुराना अर्थात् अनादिकाल से जीव के साथ रहने वाला, परिग्रह के ग्रहणरूप दोष से उत्पन्न हुआ, गम्भीर (महान्), नरकादि दुर्गति का कारण और आकुलतारूप रोग से सहित ऐसा वह घाव के समान कष्टदायक मोह भी उक्त परिग्रह के परित्यागरूप मलहम से शुद्ध होकर (नष्ट होकर) ऊर्ध्वगमन (मुक्तिप्राप्ति) में सहायक होता है ॥१८३॥

भावार्थ :

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सुहृदः सुखयन्तः स्युर्दुःखयन्तो यदि द्विषः ।
सुहृदोऽपि कथं शोच्या द्विषो दुःखयितुं मृताः ॥१८४॥
अन्वयार्थ : यदि सुख को उत्पन्न करने वाले मित्र और दुख को उत्पन्न करने वाले शत्रु माने जाते हैं तो फिर जब मित्र भी मर करके वियोगजन्य दुख को करने वाले हैं तब वे भी शत्रु ही हुए। फिर उनके लिये शोक क्यों करना चाहिये? नहीं करना चाहिये ॥१८४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जो प्राणी को सुख देता है वह मित्र माना जाता है और जो दुख देता है वह शत्रु माना जाता है। यह लोकप्रसिद्ध बात है । अब यदि विचार करें तो प्राणी जिन पिता, पुत्र एवं बन्धु आदि को मित्र के समान सुखदायक मानता है वे भी सदा सुख देने वाले नहीं होते । कारण कि जब उनका मरण होता है तब उनके वियोग में वह अत्यधिक दुखी होता है । ऐसी अवस्था में वे मित्र कैसे रहे- दुखदायक होने से वे भी शत्रु ही हुए। फिर उनके निमित्त जो यह प्राणी शोकसंतप्त होता है वह अपनी अज्ञानता के कारण ही होता है । अतएव अज्ञानता के कारणभूत उस मोह को ही नष्ट करना चाहिये ॥१८४॥

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अपरमरणे मत्वात्मीयानलङ्घ्यतमे रुदन्
विलपति तरां स्वस्मिन् मृत्यो तथास्य जडात्मनः ।
विभयमरणे भूयः साध्यं यशः परजन्म वा
कथमिति सुधीः शोकं कुर्यान्मृतेऽपि न केनचित् ॥१८५॥
अन्वयार्थ : जो जडबुद्धि जीव दूसरे स्त्री, पुत्र एवं मित्र आदि के अपरिहार्य मरण के होने पर उन्हें अपना समझ करके रोता हुआ अतिशय विलाप करता है तथा अपने मरण के भी उपस्थित होने पर जो उसी प्रकार से विलाप करता है उस जडबुद्धि के निर्भयतापूर्वक मरण (समाधिमरण) को प्राप्त होने पर जिस महती कीर्ति और परलोक की सिद्धि हो सकती थी वह कैसे हो सकती है ? अर्थात् नहीं हो सकती है। अतएव बुद्धिमान् मनुष्य को मरण के प्राप्त होने पर किसी प्रकार से शोक नहीं करना चाहिये ॥१८५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिसने जन्म लिया है वह मरेगा भी अवश्य- कोई भी उसके मरण को रोक नहीं सकता है । इस प्रकार जब यह एक निश्चित सिद्धान्त है तब जो स्त्री, पुत्र एवं मित्र आदि प्रत्यक्ष में अपने से भिन्न हैं- अपने नहीं हैं- उन्हें अपना मानकर यह प्राणी उनका मरण होने पर क्यों रोता व शोक करता है, यह शोचनीय है। इसी प्रकार जब वह स्वयं भी मरणोन्मुख होता है तब भी विलाप करता है। इससे उसकी अपकीर्ति तो होती ही है, साथ ही परलोक भी बिगडता है। अतएव यदि वह निर्भयतापूर्वक समाधिमरण को स्वीकार करता है तो इससे उसकी कीर्ति का भी प्रसार होगा, साथ ही परलोक में स्वर्गादि अभ्युदय की भी सिद्धि अवश्य होगी। इसीलिये विवेकी जन का यह कर्तव्य है कि जब मरण सबका अनिवार्य है तब वह अपने और अन्य किसी सम्बन्धी के भी मरण के समय शोक न करे॥१८५॥

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हानेः शोकस्ततो दुःखं लाभाद्रागस्ततः सुखम् ।
तेनः हानावशोकः सन् सुखी स्यात्सर्वदा सुधीः ॥१८६॥
अन्वयार्थ : इष्ट वस्तु की हानि से शोक और फिर उससे दुख होता है तथा उसके लाभ से राग और फिर उससे सुख होता है । इसीलिये बुद्धिमान् मनुष्य को इष्ट की हानि में शोक से रहित होकर सदा सुखी रहना चाहिये ॥१८६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ--- दुख का कारण शोक और उस शोक का भी कारण इष्टसामग्री का अभाव है। इसी प्रकार सुख का कारण राग और उस राग का भी कारण उक्त इष्टसामग्री की प्राप्ति है। परन्तु यथार्थ में यदि विचार करें तो कोई भी बाह्य पदार्थ न तो इष्ट है और न अनिष्ट भी- यह तो अपनी रुचि के अनुसार प्राणी की कल्पना मात्र है। कहा भी है-

अनादौ सति संसारे केन कस्य न बन्धुता।

सर्वथा शत्रुभावश्च सर्वमेतद्धि कल्पना ॥

अर्थात् संसार अनादि है । उसमें जो किसी समय बन्धु रहा है वहीं अन्य समय में शत्रु भी रह सकता है। इससे यही निश्चित होता है कि इस अनादि संसार में न तो वास्तव में कोई मित्र है और न कोई शत्रु भी। यह सब प्राणी की कल्पना मात्र है ॥ क्ष. चू . 1-61 ॥

इसीलिये विवेकी जन ममत्वबुद्धि से रहित होकर इष्ट की हानि में कभी शोक नहीं करते । इससे वे सदा ही सुखी रहते हैं ॥१८६॥

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सुखी सुखमिहान्यत्र दुःखी दुःखं समश्नुते ।
सुखं सकलसंन्यासो दुःखं तस्य विपर्ययः ॥१८७॥
अन्वयार्थ : जो प्राणी इस लोक में सुखी है वह परलोक में भी सुख को प्राप्त होता है तथा जो इस लोक में दुखी है वह परलोक में भी दुख को प्राप्त करता है। कारण यह कि समस्त इन्द्रियविषयों से विरक्त होने का नाम सुख और उनमें आसक्त होने का नाम ही दुख है ॥१८७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- आकुलता का नाम दुख और उसके अभाव का नाम सुख है। जो प्राणी विषयभोगोंकी तृष्णा से युक्त होकर अपनी इच्छानुसार उन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न करता है वह व्याकुल होकर जैसे इस लोक में परिश्रमजन्य दुख को सहता है वैसे ही वह उक्त विषयों के लाभालाभ में हर्ष व विवाद को प्राप्त होता हुआ पापकर्म को उपार्जित करके परलोक में भी दुर्गति के दुख को सहता है । इसके विपरीत जो स्वेच्छा से उन विषय-भोगों की अभिलाषा न करके उन्हें छोड देता है और तप-संयम को स्वीकार करता है वह निराकुल रहकर जैसे इस लोक में सुख का अनुभव करता है वैसे ही वह राग-द्वेष से रहित हो जाने के कारण पाप कर्म से रहित होकर परलोक (स्वर्गादि) में भी सुख का अनुभव करता है ॥१८७॥

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मृत्योर्मृत्यन्तरप्राप्तिरुत्पत्तिरिह देहिनाम् ।
तत्र प्रमुदितान् मन्ये पाश्चात्ये पक्षपातिनः ॥१८८॥
अन्वयार्थ : यहां संसार में एक मरण से जो दूसरे मरण की प्राप्ति है, यही प्राणियों की उत्पत्ति है। इसलिये जो जीव उत्पत्ति में हर्ष को प्राप्त होते हैं वे पीछे होनेवाली मृत्यु के पक्षपाती हैं, ऐसा मैं समझता हूं ॥१८८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में जब किसी के यहां पुत्रादि का जन्म होता है तब तो कुटुम्बी जन अतिशय हर्ष को प्राप्त होकर उत्सव मनाते हैं और जब किसी इष्ट का मरण होता है तब वे दुखी होकर रुदन करते हैं। वे यह नहीं विचार करते कि वह जन्म क्या है, आखिर आगे होने वाली मृत्यु का ही तो वह निमन्त्रण है । फिर जब वे पुत्रादि के जन्म में उत्सव मनाते हैं तो यही क्यों न समझा जाय कि वे आगे होने वाली उसकी मृत्यु का ही उत्सव मना रहे हैं। कारण यह कि जब वह उत्पन्न हुआ है तो मरेगा भी अवश्य ही। कहा भी है-

संयुक्तानां वियोगश्च भविता हि नियोगतः ।

किमन्यैरङ्गतोऽप्यङ्गी निःसंगो हि निवर्तते ॥

अर्थात् जिनका संयोग हुआ है उनका वियोग भी अवश्यंभावी है। अन्य की तो बात ही क्या है, किन्तु प्राणी सब कुछ यहीं पर छोडकर इस शरीर से भी अकेला ही निकलकर जाता है ॥ क्ष. चू. 1-60 ॥

अभिप्राय यह है कि प्राणी की मृत्यु और जन्म ये दोनों परस्पर अविनाभावी हैं । अतएव विवेकी जीव को न तो जन्म में हर्षित होना चाहिये और न मरण से दुखी भी। अन्यथा वह इस भव में तो दुखी है ही,साथ ही इस प्रकार से असातावेदनीय आदि का बन्ध करके परभव में भी दुखी ही रहनेवाला है ॥१८८॥

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अधीत्य सकलं श्रुतं चिरमुपास्य घोरं तपो
यदीच्छसि फलं तयोरिह हि लाभपूजादिकम् ।
छिनत्सि सुतपस्तरोः प्रसवमेव शून्याशयः
कथं समुपलप्स्यसे सुरसमस्य पक्वं फलम् ॥१८९॥
अन्वयार्थ : समस्त आगम का अभ्यास और चिरकाल तक घोर तपश्चरण करके भी यदि उन दोनों का फल तू यहां सम्पत्ति आदि का लाभ और प्रतिष्ठा आदि चाहता है तो समझना चाहिये कि तू विवेकहीन होकर उस उत्कृष्ट तपरूप वृक्ष के फूल को ही नष्ट करता है। फिर ऐसी अवस्था में तू उसके सुन्दर व सुस्वादु पके हुए रसीले फल को कैसे प्राप्त कर सकेगा ? नहीं कर सकेगा ॥१८९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार कोई मनुष्य वृक्ष को लगाता है, जलसिंचन आदि से उसे बढाता है, और आपत्तियों से उसका रक्षण भी करता है । परन्तु समयानुसार जब उसमें फूल आते हैं तब वह उन्हें तोड लेता है और इसी संतोष का अनुभव करता है। इस प्रकार से वह मनुष्य भविष्य में आनेवाले उसके फलों से वंचित ही रहता है। कारण यह कि फलों को उत्पत्ति के कारण तो वे फूल ही थे जिन्हें कि उसने तोडकर नष्ट कर दिया है। ठीक इसी प्रकार से जो प्राणी आगम का अभ्यास करता है और घोर तपश्चरण भी करता है परंतु यदि वह उनके फलस्वरूप प्राप्त हुई ऋद्धियों एवं पूजा-प्रतिष्ठा आदि में ही सन्तुष्ट हो जाता है तो उसको उस तप का जो यथार्थ फल स्वर्ग-मोक्ष का लाभ था वह कदापि नहीं प्राप्त हो सकता है। अतएव तपरूप वृक्ष के रक्षण एवं संवर्धन का परिश्रम उसका व्यर्थ हो जाता है। अभिप्राय यह हुआ कि यदि तप से ऋद्धि आदि को प्राप्तिरूप लौकिक लाभ होता है तो इससे साधु को न तो उसमें अनुरक्त होना चाहिये और न किसी प्रकारका अभिमान भी करना चाहिये । इस प्रकार से उसे उसके वास्तविक फलस्वरूप उत्तम मोक्षसुख की प्राप्ति अवश्य होगी ॥१८९॥

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तथा श्रुतमधीष्व शश्वदिह लोकपंक्ति विना
शरीरमपि शोषय प्रथितकायसंक्लेशनैः ।
कषायविषयद्विषो विजयसे यथा दुर्जयान्
शमं हि फलमामनन्ति मुनयस्तपःशास्त्रयोः ॥१९०॥
अन्वयार्थ : हे भव्यजीव ! तू लोकपंक्तिके विना अर्थात् प्रतिष्ठा आदि की अपेक्षा न करके निष्कपटरूप से यहां इस प्रकार से निरन्तर शास्त्र का अध्ययन कर तथा प्रसिद्ध कायक्लेशादि तपों के द्वारा शरीर को भी इस प्रकार से सुखा कि जिससे तू दुर्जय कषाय एवं विषयरूप शत्रुओं को जीत सके । कारण कि मुनिजन राग-द्वेषादि की शान्ति को ही तप और शास्त्राभ्यास का फल बतलाते हैं ॥१९०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय इतना ही है कि प्राप्त हुए विशिष्ट आगमज्ञान एवं तप के निमित्त से किसी प्रकार के अभिमान आदि को न प्राप्त होकर जो राग-द्वेष एवं विषयवांछा आदि परमार्थ सुख की प्राप्ति में बाधक हैं उन्हें ही नष्ट करना चाहिये। यही उस आगमज्ञान एवं तप का फल है ॥१९०॥

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दृष्ट्वा जनं व्रजसि किं विषयाभिलाषं
स्वल्पोऽप्यसौ तव महज्जनयत्यनर्थम् ।
स्तेहाद्युपक्रमजुषो हि यथातुरस्य
दोषो निषिद्धचरणं न तथेतरस्य ॥१९१॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू विषयी जन को देखकर स्वयं विषय की अभिलाषा को क्यों प्राप्त होता है ? कारण कि थोडी-सी भी वह विषयाभिलाषा तेरे अधिक अनर्थ (अहित) को उत्पन्न करती है । ठीक ही है- जिस प्रकार कि तेल आदि स्निग्ध पदार्थों का सेवन करने वाले रोगी मनुष्य के लिये दोष जनक होने से उनका सेवन करना निषिद्ध नहीं है उस प्रकार वह दूसरे के लिये नहीं है ॥१९१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो विषयों से विरक्त होकर तप में प्रवृत्त हुआ है वह यदि स्त्रीजन आदि को देखकर फिर से विषय की इच्छा करता है तो इससे उसका बहुत अधिक अहित होनेवाला है । जैसे कि कोई रोगी यदि तेल-घी आदि अपथ्य वस्तुओं का सेवन करता है तो इससे उसका रोग अधिक ही बढता है और तब वह इससे भी अधिक कष्ट में पडता है । परन्तु जो स्वस्थ है उसके लिये उन घी-तेल आदि पदार्थों का सेवन निषिद्ध नहीं है । कारण कि वह उनको पचा सकता है । इसी प्रकार यदि कोई गृहस्थ स्त्री आदि को देखकर विषयसुख की इच्छा करता है तो इससे उसका कुछ विशेष अहित होने वाला नहीं है । कारण यह कि वह गृहस्थ अवस्था में स्थित है- अभी वह उनका परित्याग नहीं कर सका है। परन्तु जो साधु अवस्था में स्थित है और जो उनका परित्याग कर चुका है वह यदि फिर से उनमें अनुरक्त होता है तो यह उसके लिये लज्जाजनक तो है ही, साथ ही इससे उसकी परलोक में भी बहुत अधिक हानि होनेवाली है ॥१९१॥

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अहितविहितप्रीतिः प्रीतं कलत्रमपि स्वयं
सकृदपकृतं श्रुत्वा सद्यो जहाति जनोऽप्ययम् ।
स्वहितनिरतः साक्षाद्दोषं समीक्ष्य भवे भवे
विषयविषवद्ग्रासाभ्यासं कथं कुरुते बुधः ॥१९२॥
अन्वयार्थ : अहित कारक विषयों में अनुराग करने वाला यह ज्ञानी मनुष्य भी यदि एक बार भी दुराचरण को सुनता है तो वह अतिशय प्यारी स्त्री को भी शीघ्र छोड देता है । फिर हे भव्य! तू विद्वान् एवं आत्महित में लीन हो करके प्रत्यक्ष में अनेक भवों में विषयों के दोष को देखता हुआ भी उन विषयोंरूप विषमिश्रित ग्रास का बार बार कैसे सेवन करता है ? ॥१९२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो मनुष्य हिताहित के विवेक से रहित होकर विषयों में अनुरक्त रहता है वह भी यदि कभी अपनी प्यारी स्त्री के विषय में कुछ दुराचरण आदि को सुनता है तो उस स्त्री का परित्याग कर देता है । परन्तु आश्चर्य है कि जो विद्वान् आत्महित में तत्पर है तथा जिसने एक भव में ही नहीं, बल्कि अनेक भवों में विषयों से उत्पन्न होनेवाले दोषों का प्रत्यक्ष में अनुभव भी कर लिया है ; वह विष के समान अनिष्ट उन विषयों को नहीं छोडता है। इससे अधिक लज्जा की बात भला और क्या हो सकती है॥१९२॥

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आत्मन्नात्मविलोपनात्मचरितैरासीर्दुरात्मा चिरं
स्वात्मा स्याः सकलात्मनीनचरितैरात्मीकृतैरात्मनः ।
आत्मेत्यां परमात्मतां प्रतिपतन् प्रत्यात्मविद्यात्मकः
स्वात्मोत्थात्मसुखो निषीदसि लसन्नध्यात्ममध्यात्मना ॥१९३॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! तू आत्मस्वरूप को नष्ट करने वाले अपने आचरणों के द्वारा चिर काल से दुरात्मा अर्थात् बहिरात्मा रहा है अब तू आत्मा का हित करने वाले ऐसे अपने समस्त आचरणों को अपनाकर उनके द्वारा उत्तम आत्मा अर्थात् अन्तरात्मा हो जा। इससे तू अपने आपके द्वारा प्राप्त करने योग्य परमात्मा अवस्था को प्राप्त हो करके केवलज्ञानस्वरूप से संयुक्त, विषयादि की अपेक्षा न करके केवल अपनी आत्मा के आश्रय से ही उत्पन्न हुए आत्मीक सुख का अनुभव करने वाला और अपनी आत्मा द्वारा प्राप्त किये गये निज स्वरूप से सुशोभित होकर सुखी हो सकता है ॥१९३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि यह प्राणी अनादि काल से बहिरात्मा- आत्म-अनात्म के विवेक से रहित- रहा है। इसीलिये उस समय उसका समस्त आचरण आत्मस्वरूप का घातक- हेय-उपादेय के विचार से रहित-होकर राग-द्वेषादि से परिपूर्ण रहा है। जब इसको सम्यग्दर्शन प्राप्त हो जाता है तब उसके आत्म पर का विवेक उत्पन्न हो जाता है। इसीलिये उसके आचरण में भी परिवर्तन हो जाता है। तब वह ऐसी ही क्रियाओं को करता है जिनसे कि आत्मा का हित होने वाला है । यद्यपि चारित्रमोहनीय का उदय विद्यमान रहने से वह जब तब विषयोपभोग में भी प्रवृत्त होता है, फिर भी वह उसे हेय ही समझता है- उपादेय नहीं समझता और न आसक्ति के साथ भी वह उन विषयों में प्रवृत्त होता है । तब उसकी अन्तरात्मा संज्ञा हो जाती है यही अन्तरात्मा जब संसार के कारणभूत विषयों से पूर्णतया विरक्त होकर तप-संयम को स्वीकार करता है तब वह उनके द्वारा संवर और निर्जरा को प्राप्त होता हुआ चार घातिया कर्मों का क्षय करके आर्हन्त्य अवस्था को प्राप्त करता है । उस समय वह सकल परमात्मा कहा जाता है । तत्पश्चात् वह शेष चार घातिया कर्मों को भी नष्ट करके निकल परमात्मा (सिद्ध) हो जाता है। इस समय जो निराकुल सुख उसे प्राप्त होता है वह आत्मा के द्वारा आत्मा में ही उत्पन्न किया गया आत्मीक सुख है जो शाश्वतिक (अविनश्वर) है। इस प्रकार यहां यह उपदेश दिया गया है कि हे आत्मन् ! तू अनादि काल से बहिरात्मा (मिथ्यादृष्टि) रहा है। उस समय तूने न्याय-अन्याय का विचार न करके जो मनमाना आचरण किया है उसके कारण अनेक दुःखों को सहा है। इसलिये अब तू सम्यग्दर्शन को प्राप्त करके अन्तरात्मा बन जा और जो व्रत-संयम आदि आत्मा के हितकारक हैं उनमें प्रवृत्त होकर परमात्मा बनने का प्रयत्न कर । ऐसा करने पर ही तुझे वास्तविक सुख प्राप्त हो सकेगा ॥१९३॥

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अनेन सुचिरं पुरा त्वमिह दासवद्वाहित
स्ततोऽनशनसाभिभक्तरसवर्जनादिक्रमैः।
क्रमेण विलयावधि स्थिरतपोविशेषैरिदं
कदर्थय शरीरकं रिपुभिवाद्य हस्तागतम् ॥१९४॥
अन्वयार्थ : पूर्व समय में इस शरीर ने तुझे संसार में बहुत काल तक दास के समान घुमाया है। इसलिये तू आज इस घृणित शरीर को हाथ में आये हुए शत्रु के समान जबतक कि वह नष्ट नहीं होता है तबतक अनशन, ऊनोदर एवं रसपरित्याग आदिरूप विशेष तपों के द्वारा क्रम से कृश कर ॥१९४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में जो जिसका अहित करता है वह उसका शत्रु माना जाता है। इस स्वरूप से तो यह शरीर ही अपना वास्तविक शत्रु सिद्ध होता है । कारण यह कि शत्रु तो कभी किसी विशेष समय में ही प्राणी को कष्ट देता है, परन्तु यह शरीर तो जीव को अनादि काल से अनेक योनियों में परिभ्रमण कराता हुआ कष्ट देता रहा है। अतएव जिस प्रकार वह लोकप्रसिद्ध शत्रु जब मनुष्य के हाथ में आ जाता है तब वह उसे पूर्ण भोजन आदि न दे करके अथवा अनिष्ट भोजन आदिके द्वारा संतप्त करके नष्ट करनेका प्रयत्न करता है, उसी प्रकार तू भी इस शरीरको उस शत्रुसे भी भयानक समझकर उसे अनशनादि तपों के द्वारा क्षीण करनेका प्रयत्न कर। इस प्रकारसे तू उसके नष्ट होनेके पूर्वमें अपने प्रयोजन (मोक्षप्राप्ति) को सिद्ध कर सकेगा। और यदि तूने ऐसा न किया तथा वह बीच में ही नष्ट हो गया तो वह तुझे फिर भी अनेक योनियों में परिभ्रमण करा कर दुखी करेगा। अभिप्राय यह है कि जब यह दुर्लभ मनुष्यशरीर प्राप्त हो गया है तो इसे यों ही नष्ट नहीं कर देना चाहिये, किन्तु उससे जो अपना अभीष्ट सिद्ध हो सकता है- संयमादि के द्वारा मुक्तिलाभ हो सकता है- उसे अवश्य सिद्ध कर लेना चाहिये ॥१९४॥

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आदौ तनोर्जननमत्र हतेन्द्रियाणि
काङ्क्षन्ति तानि विषयान् विषयाश्च मान
हानिप्रयासभयपापकुयोनिदाः स्यु
मूलं ततस्तनुरनर्थपरंपराणाम् ॥१९५॥
अन्वयार्थ : प्रारम्भ में शरीर उत्पन्न होता है, इस शरीर में दुष्ट इन्द्रियां होती हैं, वे अपने अपने विषयों को चाहती हैं; और वे विषय मानहानि (अपमान), परिश्रम, भय, पाप एवं दुर्गति को देने वाले हैं। इस प्रकार से समस्त अनर्थों की परम्परा का मूल कारण वह शरीर ही है ॥१९५॥

भावार्थ :

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शरीरमपि पुष्णन्ति सेवन्ते विषयानपि ।
नास्त्यहो दुष्करं नृणां विषाद्वाञ्छन्ति जीवितुम् ॥१९६॥
अन्वयार्थ : अज्ञानी जन शरीर को पुष्ट करते हैं और विषयों का भी सेवन करते हैं । ठीक है- ऐसे मनुष्यों को कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है- वे सब ही अकार्य कर सकते हैं। वे वैसा करते हुए मानो विष से जीवित रहने की इच्छा करते हैं ॥१९६॥

भावार्थ :

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इतस्ततश्च त्रस्यन्तो विभावर्यां यथा मृगाः ।
वनाद्विशन्त्युपग्रामं कलौ कष्टं तपस्विनः ॥१९७॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार हिरण वन में इधर उधर दुखी होकर- सिंहादिकों से भयभीत होकर- रात्रि में उस वन से गांव के निकट आ जाते हैं उसी प्रकार इस पंचम काल में मुनिजन भी वन में इधर उधर दुखी होकर- हिंसक एवं अन्य दुष्ट जनों से भयभीत होकर- रात्रि में वन को छोडकर गांव के समीप रहने लगे हैं, यह खेद की बात है ॥१९७॥

भावार्थ :

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वरं गार्हस्थ्यमेवाद्य तपसो भाविजन्मनः।
श्वः स्त्रीकटाक्षलुण्टाकलोप्यवैराग्यसंपदः ॥१९८॥
अन्वयार्थ : आज जो तप ग्रहण किया गया है वह यदि कल स्त्रियों के कटाक्षोंरूप लुटेरों के द्वारा वैराग्यरूप सम्पत्ति से रहित किया जाता है तो जन्मपरम्परा (संसार) को बढ़ानेवाले उस तप की अपेक्षा तो कहीं गृहस्थ जीवन ही श्रेष्ठ था ॥१९८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जिसने पूर्व में विषयों से विरक्त होकर समस्त परिग्रह के परित्यागपूर्वक तप को स्वीकार किया है वह यदि पीछे स्त्रियों के कटाक्षपात एवं हाव-भावादि से पीडित होकर उस वैराग्यरूप सम्पत्ति को नष्ट करता है और अनुराग को प्राप्त होता है तो वह अतिशय निन्दा का पात्र बनता है। इससे तो कहीं वह गृहस्थ ही बना रहता तो अच्छा था। कारण कि इससे उसकी संसारपरम्परा तो न बढती जो कि गृहीत तप को छोड देने से अवश्य ही बढनेवाली है ॥१९८॥

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स्वार्थभ्रंशं त्वमविगणयंस्त्यक्तलज्जाभिमानः
संप्राप्तोऽमिन् परिभवशतैर्दुःखमेतत्कलत्रम् ।
नान्वेति त्वां पदमपि पदाद्विप्रलब्धोऽसि भूयः
सख्यं साधो यदि हि मतिमान् मा ग्रहीर्विग्रहेण ॥१९९॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! इस शरीर के होने पर ही तूने इस दुखदायक स्त्री को स्वीकार किया है और ऐसा करते हुए तूने लज्जा और स्वाभिमान को छोडकर-निर्लज्ज एवं दीन बनकर-उसके निमित्त से होने वाले न तो सैकडों तिरस्कारों को गिना और न अपने आत्मप्रयोजन से-तप-संयमादि को धारण करके उसके द्वारा प्राप्त होने वाले मोक्षसुख से- भ्रष्ट होने को भी गिना। वह शरीर और स्त्री तेरे साथ निश्चय से एक पद (कदम) भी जाने वाले नहीं हैं इनसे अनुराग करके तू फिर से भी धोका खावेगा। इसलिये हे साधो! यदि तू बुद्धिमान् है तो उस शरीर से मित्रता को न प्राप्त हो- उसके विषय ममत्वबुद्धि को छोड दे ॥१९९॥

भावार्थ :

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न कोऽप्यन्योऽन्येन व्रजति समवायं गुणवता
गुणी केनापि त्वं समुपगतवान् रूपिभिरमा ।
न ते रूपं ते यानुपव्रजसि तेषां गतमतिः
ततश्च्द्येद्यो भेद्यो भवसि बहुदुःखो भववने ॥२००॥
अन्वयार्थ : कोई भी अन्य गुणवान् किसी अन्य गुणवान् के साथ अभेदस्वरूपता को नहीं प्राप्त होता है । परन्तु तू (अरूपी) किसी कर्म के वश उन रूपी शरीरादि के साथ अभेद को प्राप्त हो रहा है । जिन शरीरादि को तू अभिन्न मानता है वे वास्तव में तुझ स्वरूप नहीं हैं । इसीलिये तू उनमें ममत्वबुद्धि को प्राप्त होकर आसक्त रहने से इस संसाररूप वन में छेदा भेदा जाकर बहुत दुखी होता है ॥२००॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में जो भी घटपटादि भिन्न भिन्न वस्तुएं देखने में आती हैं वे मूर्तिकरूप से समान होकर भी एक दूसरे के साथ अभेदरूपता को प्राप्त नहीं होती हैं। परन्तु यह अज्ञानी प्राणी स्वयं अमूर्तिक होकर भी अपने से भिन्न स्त्री-पुत्र एवं धन सम्पत्ति आदि मूर्तिक पदार्थों के अभेद को प्राप्त होता है- उन्हें अपना मानता है। यह उसके कर्मोदय का प्रभाव समझना चाहिये। जब जीव स्वयं रूप-रसादि से रहित (अमूर्तिक) एवं चैतन्यरूप है तब उसकी एकता रूपादिसहित (मूर्तिक) एवं जडस्वरूप उन स्त्री-पुत्रादि के साथ भला कैसे हो सकती है ? नहीं हो सकती है। फिर जो यह अपनी अज्ञानता से उक्त भिन्न पदार्थों को अपना समझकर उनके साथ अनुराग को प्राप्त होता है उसका फल यह होगा कि उसे नरक और तिर्यंच गतियों में जाकर छेदने भेदने आदि के दुस्सह दुःखों को सहना पडेगा॥२००॥

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माता जातिः पिता मृत्युराधिव्याधी सहोद्गतौ ।
प्रान्ते जन्तोर्जरा मित्रम् तथाप्याशा शरीरके ॥२०१॥
अन्वयार्थ : इस शरीर की उत्पत्ति तो माता है, मरण पिता है, आधि (मानसिक दुख) एवं व्याधि (शारीरिक दुख) सहोदर (भाई) हैं, तथा अन्त में प्राप्त होने वाला बुढापा पास में रहनेवाला मित्र है; फिर भी उस निन्द्य शरीर के विषय में प्राणी आशा करता है ॥२०१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यदि किसी कुटुम्ब में स्थित व्यक्ति के माता-पिता, भाई-बन्धु एवं मित्र आदि सब ही प्रतिकूल स्वभाववाले हों तो ऐसे कुटुम्बसे सम्बन्ध रखनेवाले उस व्यक्ति से किसीको भी अनुराग नहीं रहता है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि यह अज्ञानी प्राणी ऐसे प्रतिकूल कुटुम्ब के बीच में रहने वाले शरीर से भी कुछ आशा रखता हुआ उससे अनुराग करता है। उस शरीर के कुटुम्ब में उत्पत्ति (जन्म) माता और मरण पिता है जो परस्पर खूब अनुराग रखते हैं एक के बिना दूसरा नहीं रहना चाहता है । जीव को जो शारीरिक एवं मानसिक कष्ट होते हैं वे उस शरीर के सहोदर हैं- उसके साथ में ही उत्पन्न होने वाले हैं। बुढापा उसका प्यारा मित्र है। अभिप्राय यह है कि जिस शरीरके साथ जीव को निरन्तर जन्म-मरण, रोग, चिंता एवं बुढापा आदि के दुःसह दुख सहने पडते हैं उससे अनुराग न रखकर उसे सदा के लिये ही छोड देने (मुक्त होने) का प्रयत्न करना चाहिये ॥२०१॥

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शुद्धोऽप्यशेषविषयावगमोऽप्यमूर्तोs
प्यात्मन् त्वमप्यतितरामशुचीकृतोऽसि।
मूर्तम् सदाशुचि विचेतनमन्यदत्र
किं वा न दूषयति धिग्धिगिदं शरीरम् ॥२०२॥
अन्वयार्थ : हे आत्मन् ! तू स्वभाव से शुद्ध, समस्त विषयों का ज्ञाता और रूप-रसादि से रहित (अमूर्तिक) हो करके भी उस शरीर के द्वारा अतिशय अपवित्र किया गया है । ठीक है- वह मूर्तिक, सदा अपवित्र और जड शरीर यहां कौन-सी पवित्र वस्तु (गन्ध विलेपनादि) को मलिन नहीं करता है ? अर्थात् सबको ही वह मलिन करता है । इसलिये ऐसे इस शरीर को बार बार धिक्कार है ॥२०२॥

भावार्थ :

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हा हतोऽसि तरां जन्तो येनास्मिंस्तव सांप्रतम् ।
ज्ञानं कायाशुचिज्ञानं तत्त्यागः किल साहसम् ॥२०३॥
अन्वयार्थ : हे प्राणी ! तू चूंकि इस शरीर के विषय में अतिशय दुखी हुआ है इसीलिये उस शरीर के सम्बन्ध में जो तुझे इस समय अपवित्रता का ज्ञान हुआ है वह योग्य है। अब उस शरीर का परित्याग करना,यह तेरा अतिशय साहस होगा॥२०३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जो शरीर अत्यन्त अपवित्र है उसे पवित्र मानकर यह अज्ञानी प्राणी अब तक दुखी रहा है । इसलिये उसका कर्तव्य है कि उक्त शरीर के विषय में प्रथम तो वह 'यह अपवित्र है' ऐसे सम्यग्ज्ञान को प्राप्त करे और तत्पश्चात् उसे साहसपूर्वक छोडने का प्रयत्न करे । इस प्रकार से वह शरीर के निमित्त से जो दुख सह रहा था उससे छुटकारा पा जावेगा॥२०३॥

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अपि रोगादिभिर्वृद्धर्न यतिः खेदमृच्छति ।
उडुपस्थस्य कः क्षोभः प्रवृद्धेऽपि नदीजले ॥२०४॥
अन्वयार्थ : साधु अतिशय वृद्धि को प्राप्त हुए भी रोगादिकों के द्वारा खेद को नहीं प्राप्त होता है। ठीक है- नाव में स्थित प्राणी को नदी के जल में अधिक वृद्धि होने पर भी कौन-सा भय होता है ? अर्थात् उसे किसी प्रकार का भी भय नहीं होता है ॥२०४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार स्थिर नाव में बैठे हुए मनुष्य को नदी में जल के बढ जाने पर भी किसी प्रकार का खेद नहीं होता है। कारण कि वह यह समझता है कि नदी के जल में वृद्धि होने पर भी मैं इस नाव के सहारे से उसके पार जा पहुँचूंगा । ठीक उसी प्रकार से जिसको शरीर का स्वभाव ज्ञात हो चुका है कि वह अपवित्र, रोगादि का घर तथा नश्वर है; वह विवेकी साधु उक्त शरीर के कठिन रोग से व्याप्त हो जाने पर भी किसी प्रकार से खेद को नहीं प्राप्त होता है ॥२०४॥

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जातामयः प्रतिविधाय तनौ वसेद्वा
नो चेत्तनुं त्यजतु वा द्वितयी गतिः स्यात् ।
लग्नाग्निमावसति वन्हिममोह्य गेहं
निर्याय वा व्रजति तत्र सुधी किमास्ते ॥२०५॥
अन्वयार्थ : रोग के उत्पन्न होने पर उसका औषधादि के द्वारा प्रतीकार करके उस शरीर में स्थित रहना चाहिये । परन्तु यदि रोग असाध्य हो और उसका प्रतीकार नहीं किया जा सकता हो तो फिर उस शरीर को छोड देना चाहिये, यह दूसरी अवस्था है। जैसे- यदि घर अग्नि से व्याप्त हो चुका है तो यथासम्भव उस अग्नि को बुझाकर प्राणी उसी घर में रहता है। परन्तु यदि वह अग्नि नहीं बुझाई जा सकती है तो फिर उसमें रहने वाला प्राणी उस घर से निकलकर चला जाता है। क्या कोई बुद्धिमान् प्राणी उस जलते हुए घर में रहता है ? अर्थात् नहीं रहता है ॥२०५॥

भावार्थ :

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शिरःस्थं भारमुत्तार्य स्कन्धे कृत्वा सुयत्नतः ।
शरीरस्थेन भारेण अज्ञानी मन्यते सुखम् ॥२०६॥
अन्वयार्थ : शिर के ऊपर स्थित भार को उतारकर और उसे प्रयत्नपूर्वक कन्धे के ऊपर करके अज्ञानी प्राणी उस शरीरस्थ भार से सुख की कल्पना करता है ॥२०६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार कोई मनुष्य शिर के ऊपर रखे हुए बोझ से पीडित होता हुआ उसे प्रयत्नपूर्वक शिर से उतारकर कन्धे के ऊपर रखता है और उस अवस्था में अपने को सुखी मानता है । परन्तु वह अज्ञानी प्राणी यह नहीं सोचता कि वह बोझा तो अभी भी शरीर के ही ऊपर स्थित है। भेद इतना ही हुआ है कि उसे शिर से उतारकर कन्धे पर रख लिया है और ऐसा करने से उसके कष्ट में कुछ थोडी-सी कमी अवश्य हुई है । परन्तु वास्तव में इससे उसे सुख का लेश भी नहीं प्राप्त हुआ है। ठीक इसी प्रकार से यह अविवेकी प्राणी भी शरीर में उत्पन्न हुए रोग को यथायोग्य औषधि आदि से नष्ट करके अपने को सुखी मानता है। परन्तु वह यह नहीं विचार करता कि रोगों का घर जो शरीर है उसका संयोग तो अभी भी बना है, ऐसी अवस्था में सुख भला कैसे प्राप्त हो सकता है ? सच्चा सुख तो तब ही प्राप्त हो सकेगा जब कि उसका शरीर के साथ सदा के लिये सम्बन्ध छूट जायगा । उसकी उपर्युक्त सुख की कल्पना तो ऐसी है जैसे कि शिर से बोझ को उतारकर उसे कन्धे के ऊपर रखनेवाला मनुष्य सुख की कल्पना करता है ॥२०६॥

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यावदस्ति प्रतीकारस्तावत्कुर्यात्प्रतिक्रियाम् ।
तथाप्यनुपशान्तानामनुद्वेगः प्रतिक्रिया ॥२०७॥
अन्वयार्थ : जब तक रोगों का प्रतीकार हो सकता है तब तक उसे करना चाहिये। परन्तु फिर भी यदि वे नष्ट नहीं होते हैं तो इससे खेद को प्राप्त नहीं होना चाहिये । यही वास्तव में उन रोगों का प्रतीकार है ॥२०७॥

भावार्थ :

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यदादाय भिवेज्जन्मी त्यक्त्वा मुक्तो भविष्यति ।
शरीरमेव तत्त्याज्यं किं शेषैः क्षुद्रकल्पनैः ॥२०८॥
अन्वयार्थ : जिस शरीर को ग्रहण करके प्राणी जन्मवान् अर्थात् संसारी बना हुआ है तथा जिसको छोडकर वह मुक्त हो जावेगा उस शरीर को ही छोड देना चाहिये । अन्य क्षुद्र विचारों से क्या प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है ? कुछ भी नहीं ॥२०८॥

भावार्थ :

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नयेत् सर्वाशुचिप्रायः शरीरमपि पूज्यताम् ।
सोऽप्यात्मा येन न स्पृश्यो दुश्चरित्रं धिगस्तु तत् ॥२०९॥
अन्वयार्थ : जो आत्मा प्रायः करके सब ओर से अपवित्र ऐसे उस शरीर को भी पूज्य पद को प्राप्त कराता है उस आत्मा को भी जो शरीर स्पर्श के योग्य भी नहीं रहने देता है उसको धिक्कार है ॥२०९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जीव जब संयम और तप आदि को धारण करता है तब उसका शरीर लोकवन्द्य बन जाता है। इस प्रकार से जो आत्मा उस घृणित एवं अपवित्र शरीर को लोकपूज्य बनाता है उसका अनुकरण न कर वह शरीर उसे निन्द्य चाण्डालादि पर्याय में प्राप्त कराकर स्पर्श करने के योग्य भी नहीं रहने देता है । इस तरह उस शरीर को देव-मनुष्यादि के द्वारा पूज्य बनाकर आत्मा तो उसका उपकार करता है, परन्तु वह शरीर कृतघ्न होकर उस उपकारी आत्मा के साथ इतना दुष्टतापूर्ण आचरण करता है कि उसे निन्द्य पर्याय में प्राप्त कराकर ऐसा हीन बना देता है कि विवेकी जन उसका स्पर्श भी नहीं करना चाहते हैं । अभिप्राय यह है कि जब आत्मा उस शरीर के सम्बन्ध से ही लोकनिन्द्य होकर अनेक प्रकार के दुःखों को सहता है तब ऐसे अहितकर शरीर के सम्बन्ध को सदा के लिये छोड देना चाहिये ॥२०९॥

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रसादिराद्यो भागः स्याज्जानावृत्त्यादिरन्वतः ।
ज्ञानादयस्तृतीयस्तु संसार्येवं त्रयात्मकः ॥२१०॥
अन्वयार्थ : संसारी प्राणी का रस आदि सात धातुओं रूप पहिला भाग है, इसके पश्चात् ज्ञानावरणादि कर्मों रूप उसका दूसरा भाग है, तथा तीसरा भाग उसका ज्ञानादिरूप है; इस प्रकारसे संसारी जीव तीन भागस्वरूप है ॥२१०॥

भावार्थ :

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भागत्रयमयं नित्यमात्मानं बन्धवर्तिनम् ।
भागद्वयात्पृथक् कर्तुं यो जानाति स तत्त्ववित् ॥२११॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार इन तीन भागोंस्वरूप व कर्मबन्ध से सहित नित्य आत्मा को जो प्रथम दो भागों से पृथक करने के विधान को जानता है उसे तत्त्वज्ञानी समझना चाहिये ॥२११॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- ऊपर संसारी जीव को जिन तीन भागोंस्वरूप बतलाया है उनमें प्रथम दो भाग-सप्तधातुमय शरीर और कार्मण शरीर-आत्मस्वरूप से भिन्न, जड एवं पौद्गलिक हैं तथा तीसरा भाग जो ज्ञानादिस्वरूप है वह आत्मस्वरूप चेतन है और वही उपादेय है। इस प्रकार जो जानता है तथा तदनुरूप आचरण भी करता है वह तत्त्वज्ञ है। इसके विपरीत जो प्रथम दो भागों को ही आत्मा समझता है और इसीलिये जो उनसे आत्मा को पृथक् करने का प्रयत्न नहीं करता है वह अज्ञानी है ॥२११॥

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करोतु न चिरं घोरं तपः क्लेशासहो भवान् ।
चित्तसाध्यान् कषायारीन् न जयेद्यत्तदज्ञता ॥२१२॥
अन्वयार्थ : यदि तू कष्ट को न सहने के कारण घोर तप का आचरण नहीं कर सकता है तो न कर । परन्तु जो कषायादिक मन से सिद्ध करने योग्य हैं- जीतने योग्य हैं- उन्हें भी यदि नहीं जीतता है तो वह तेरी अज्ञानता है ॥२१२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- तपश्चरण में भूख आदि के दुख को सहना पडता है, इसलिये यदि अनशन आदि तपों को नहीं किया जा सकता है तो न भी किया जाय । परन्तु जो राग,द्वेष,एवं क्रोधादि आत्मा का अहित करने वाले हैं उनको तो भले प्रकार से जीता जा सकता है । कारण कि उनके जीतने में न तो तप के समान कुछ कष्ट सहना पडता है और न मन के अतिरिक्त किसी अन्य सामग्री की अपेक्षा भी करनी पड़ती है । इसलिये उक्त रागद्वेषादि को तो जीतना ही चाहिये । फिर यदि उनको भी प्राणी नहीं जीतना चाहता है तो यह उसकी अज्ञानता ही कही जावेगी॥२१२॥

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हृदयसरसि यावन्निर्मलेऽप्यत्यगाधे
वसति खलु कषायग्राहचक्रं समन्तात् ।
श्रयति गुणगुणोऽयं तन्न तावद्विशङ्कं
सयमशमविशेषस्तान् विजेतुं यतस्व ॥२१३॥
अन्वयार्थ : निर्मल और अथाह हृदयरूप सरोवर में जब तक कषायोंरूप हिंस्र जल जन्तुओं का समूह निवास करता है तब तक निश्वय से यह उत्तम क्षमादि गुणों का समुदाय निःशंक होकर उस हृदयरूप सरोवर का आश्रय नहीं लेता है । इसीलिये हे भव्य ! तू व्रतों के साथ तीव्र-मध्यमादि उपशम भेदों से उन कषायों के जीतने का प्रयत्न कर ॥२१३॥

भावार्थ :

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हित्वा हेतुफले किलात्र सुधियस्तां सिद्धिमामुत्रिकीं
वाञ्छन्तः स्वयमेव साधनतया शंसन्ति शान्तं मनः।
तेषामाखुबिडालिकेति तदिद्धं धिधिक्कलेः प्राभवं
येनैतेऽपि फलद्वयप्रलयनाद् दूरं विपर्यासिताः ॥२१४॥
अन्वयार्थ : जो विद्वान् परिग्रह के त्यागरूप हेतु तथा उसके फलभूत मन की शान्ति को छोडकर उस पारलौकिक सिद्धि की अभिलाषा करते हुए स्वयं ही उसके साधनस्वरूप से शान्त मन की प्रशंसा करते हैं उनका यह कार्य आखु-बिडालिका के समान है । यह सब कलिकाल का प्रभाव है, उसके लिये धिक्कार हो। इस कलिकाल के प्रभाव से ये विद्वान् भी इस लोक और परलोक सम्बन्धी फल को नष्ट करने से अतिशय ठगे जाते हैं॥२१४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिन्होंने न तो परिग्रह को छोडा है और न कषायों को भी उपशान्त किया है वे विद्वान् पारलौकिक सिद्धि की अभिलाषा करके उसके साधन भूत अपने शान्त मन की केवल प्रशंसा करते हैं। उनके इन दोनों कार्यों में बिल्ली और चूहे के समान परस्पर जातिविरोध है । कारण कि जब तक परिग्रह और राग-द्वेषादि का परित्याग नहीं किया जाता है तब तक मन शान्त हो ही नहीं सकता। ऐसे लोग इस लोक और परलोक दोनों ही लोकों के सुख को नष्ट करते हैं ।इस लोक के सुख से तो वे इसलिये वंचित हुए कि उन्होंने बाह्य विषयों को छोड़ दिया है । साथ ही चूंकि वे अपने मन को शान्त कर नहीं सके हैं, इसलिये पाप कर्म का उपार्जन करने से परलोक के भी सुख से वंचित होते हैं ॥२१४॥

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उद्युक्तस्त्वं तपस्यस्यधिकमभिभवं त्वामगच्छन् कषायाः प्राभूद्वोधोऽप्यगाधो जलमिव जलधौ किं तु दुर्लक्ष्यमन्यैः ।
निर्व्यूढेऽपि प्रवाहे सलिलमिव मनाग्निम्न देशेष्ववश्यं
मात्सर्यं ते स्वतुल्ये भवति परवशाद् दुर्जयं तज्जहीहि ॥२१५॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू तपश्चरण में उद्यत हुआ है, कषायों का तूने अतिशय पराभव कर दिया है, तथा समुद्र में स्थित आगाध जल के समान तेरे में अगाध ज्ञान भी प्रगट हो चुका है; तो भी जैसे प्रवाह के सूख जाने पर भी कुछ नीचे के भाग में पानी अवश्य रह जाता है जो कि दूसरों के द्वारा नहीं देखा जा सकता है, वैसे ही कर्म के वश से जो अपने समान अन्य व्यक्ति में तेरे लिये मात्सर्य (ईर्ष्या भाव) होता है वह दुर्जय तथा दूसरों के लिये अदृश्य है । उसको तू छोड दे ॥२१५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो जीव घोर तपश्चरण कर रहा है, कषायों को शान्त कर चुका है, तथा जिसे अगाध ज्ञान भी प्राप्त हो चुका है, फिर भी उसके हृदय में अपने समान गुणवाले अन्य व्यक्ति के विषय में जब कभी मात्सर्यभाव का प्रादुर्भाव हो सकता है जो कि दूसरों के द्वारा नहीं देखा जा सकता है । जैसे- जलप्रवाह के सूख जाने पर भी कुछ नीचे के भागों में जल शेष रह जाता है । उस मात्सर्य भाव को भी छोड देनेका यहां उपदेश दिया गया है ॥२१५॥

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चित्तस्थमप्यनवबुद्धय हरेण जाड्यात्
क्रुद्ध्वा बहिः किमपि दग्धमनङगबुद्धया ।
घोरामवाप स हि तेन कृतामवस्थां
क्रोधोदयाद्भवति कस्य न कार्यहानिः ॥२१६॥
अन्वयार्थ : जिस महादेव ने क्रोध के वश होते हुए अज्ञानता से चित्त में भी कामदेव को न जानकर उस कामदेव के भ्रम से किसी बाह्य वस्तु को जला दिया था वह महादेव उक्त काम के द्वारा की गई भयानक अवस्था को प्राप्त हुआ है। ठीक है- क्रोध के कारण किसके कार्य की हानि नहीं होती है ? अर्थात् उसके कारण सब ही जन के कार्य की हानि होती है॥२१६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जब महादेव तपस्या कर रहे थे तब उनको प्रसन्न करने के लिये पार्वती कामदेव के साथ वहां पहुंची और नृत्यादि के द्वारा उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करने लगी, इधर कामदेव ने भी बसन्त ऋतु का निर्माण कर उनके ऊपर पुष्पबाणों को छोडना प्रारम्भ कर दिया। इससे क्रोधित होकर महादेव ने तीसरे नेत्र से अग्नि को प्रगट कर उक्त कामदेव को भस्म ही कर दिया । ऐसी कथा महाकवि कालिदासकृत कुमारसम्भव आदि में प्रसिद्ध है। इसी कथा को लक्ष्य में रखकर यहां बतलाया है कि महादेव ने जिस कामदेव को क्रोध के वश होकर भस्म किया था वह तो वास्तव में कामदेव नहीं था, सच्चा कामदेव तो उनके हृदय में स्थित था जिसे उन्होंने जाना ही नहीं। इसीलिये उस कामदेव ने पीछे पार्वती के साथ विवाह हो जाने पर उनकी वह दुरवस्था की थी। यह सब अनर्थ एक क्रोध के कारण हुआ। अतएव ऐसे अनर्थकारी क्रोध का परित्याग ही करना चाहिये॥२१६॥

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चक्रं विहाय निजदक्षिणबाहुसंस्थं
यत्राव्रजन्ननु तदैव स तेन मुञ्चेत् ।
क्लेशं तमाप किल बाहुबली चिराय
मानो मनागपि हतिम् महतीं करोति ॥२१७॥
अन्वयार्थ : अपनी दाहिनी भुजा के ऊपर स्थित चक्र को छोडकर जिस समय बाहुबली ने दीक्षा ग्रहण की थी उसी समय उन्हें उस तप के द्वारा मुक्त हो जाना चाहिये था। परन्तु वे चिरकाल तक उस क्लेश को प्राप्त हुए। ठीक है- थोडा-सा भी मान बडी भारी हानि को करता है ॥२१७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- भरत चक्रवर्ती जब भरत क्षेत्र के छहों खण्डों को जीतकर वापिस अयोध्या आये तब उनका चक्ररत्न अयोध्या नगरी के मुख्य द्वार पर ही रुक गया-वह उसके भीतर प्रविष्ट न हो सका । कारण का पता लगाने पर भरत को यह ज्ञात हुआ कि मेरा छोटा भाई बाहुबली मेरी अधीनता स्वीकार नहीं करता है । एतदर्थ भरत ने अपने दूत को भेजकर बाहुबली को समझाने का प्रयत्न किया, किन्तु वह निष्फल हुआ- बाहुबली ने भरत की अधीनता स्वीकार नहीं की । अन्त में युद्ध में निरर्थक होनेवाले प्राणिसंहार से डरकर उन दोनों के बुद्धिमान् मंत्रियों द्वारा भरत और बाहुबली के बीच जलयुद्ध, दृष्टियुद्ध और बाहुयुद्ध ये जो तीन युद्ध निर्धारित किये गये थे, उन तीनों ही युद्धों में भरत तो पराजित हुए और बाहुबली विजयी हुए। इस अपमान के कारण क्रोधित होकर भरत ने चक्ररत्न का स्मरण कर उसे बाहुबली के ऊपर चला दिया । परन्तु वह उनका घात न करके उनके हाथ में आकर स्थित हो गया। इस घटना से बाहुबली को विरक्ति हुई । तब उन्होंने समस्त परिग्रह को छोडकर जिनदीक्षा धारण कर ली। उस समय उन्होंने एक वर्ष का प्रतिमायोग धारण किया । तब तक वे भोजनादि का त्याग करके एक ही आसन से स्थित होते हुए ध्यान करते रहे। इस प्रतिमायोग के समाप्त होने पर भरत चक्रवर्ती ने आकर उनकी पूजा की और तब उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इसके पूर्व उनके हृदय में कुछ थोडी-सी ऐसी चिन्ता रही कि मेरे द्वारा भरत चक्रवर्ती संक्लेश को प्राप्त हुआ है । इसीलिये सम्भवतः तबतक उन्हें केवलज्ञान नहीं प्राप्त हुआ और भरतचक्रवर्ती के द्वारा पूजित होने पर वह केवलज्ञान उन्हें तत्काल प्राप्त हो गया (देखिए महापुराण पर्व 36) । पउमचरिउ (5, 13, 19) के अनुसार ‘मैं भरत के क्षेत्र (भूमि) में स्थित हूं' ऐसी थोडी-सी कषाय के विद्यमान रहने से तब तक उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई । बाहुबली का हृदय मानकषाय से कलुषित रहा, ऐसा उल्लेख

'देहादिचत्तसंगो माणकसाएण कलुसिओ धीर ।

अत्तावणेण जादो बाहुबली कित्तियं कालं ॥४४॥'

इस भावप्राभृत की गाथा में भी पाया जाता है। इस प्रकार देखिये कि थोडा-सा भी अभिमान कितनी भारी हानि को प्राप्त कराता है ॥२१७॥

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सत्यं वाचि मतौ श्रुतं हृदि दया शौर्यं भुजे विक्रमे
लक्ष्मीर्दानमनूनमर्थिनिचये मार्गो गतौ निर्वृतेः ।
येषां प्रागजनीह तेऽपि निरहंकाराः श्रुतेर्गोचराः
चित्रं संप्रति लेशतोऽपि न गुणास्तेषां तथाप्युद्धताः ॥२१८॥
अन्वयार्थ : पूर्व में यहां जिन महापुरुषों के वचन में सत्यता, बुद्धि में आगम, हृदय में दया, बाहु में शूरवीरता, पराक्रम में लक्ष्मी, प्रार्थी जनों के समूह को परिपूर्ण दान तथा मुक्ति के मार्ग में गमन; ये सब गुण रहे हैं वे भी अभिमान से रहित थे; ऐसा आगम (पुराणों) से जाना जाता है। परन्तु आश्चर्य है कि इस समय उपर्युक्त गुणों का लेश मात्र भी न रहने पर मनुष्य अतिशय गर्व को प्राप्त होते हैं ॥२१८॥

भावार्थ :

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वसति भुवि समस्तं सापि संधारितान्यैः
उदरमुपनिविष्टा सा च ते वा परस्य ।
तदपि किल परेषां ज्ञानकोणे निलीनं
वहति कथमिहान्यो गर्वमात्माधिकेषु ॥२१९॥
अन्वयार्थ : जिस पृथिवी के ऊपर सब ही पदार्थ रहते हैं वह पृथिवी भी दूसरों के द्वारा- घनोदधि, घन और तनु वातवलयों के द्वारा-- धारण की गई है । वह पृथिवी और वे तीनों ही वातवलय भी आकाश के मध्य में प्रविष्ट हैं, और वह आकाश भी केवलियों के ज्ञान के एक कोने में विलीन है। ऐसी अवस्था में यहां दूसरा अपने से अधिक गुणवालों के विषय में कैसे गर्व धारण करता है ? ॥२१९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- व्यक्ति जिस विषय में अभिमान करता है उस विषय में उसका अभिमान तभी उचित कहा जा सकता है जब कि वह प्रकृत विषय में परिपूर्णता को प्राप्त हो। परन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि लोक में प्रत्येक विषय में एक से दूसरा और दूसरे से तीसरा इस क्रम से अधिकाधिक पाया जाता है । जैसे पृथिवी महाप्रमाणवाली है, उसमें जगत की सब ही वस्तुएं समायी हुई हैं । परन्तु वह विशाल पृथिवी भी वातवलयों के आश्रित है। उस पृथिवी और उन वातवलयों से भी महान् आकाश है जो उन सबको भी अपने भीतर धारण करता है । तथा इस आकाश से भी महान् प्रमाणवाला सर्वज्ञ का ज्ञान है जो उस अनन्त आकाश को भी अपने विषय स्वरूप से ग्रहण करता है। इस प्रकार सर्वत्र ही जब उत्कर्ष की तरतमता पायी जाती है तब कोई भी किसी विषय में पूर्णता का अभिमान नहीं कर सकता है ॥२१९॥

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यशो मारीचीयं कनकमृगमायामलिनितं
हतोऽश्वत्थामोक्त्या प्रणयिलघुरासीद्यमसुतः ।
सकृष्णः कृष्णोऽभूत्कपटबदुवेषेण नितरा
मपि च्छमाल्पं तद्विषमिव हि दुग्धस्य महतः ॥२२०॥
अन्वयार्थ : यह मरीचि की कीर्ति सुवर्णमग के कपट से मलिन की गई है, 'अश्वत्थामा हतः' इस वचन से युधिष्ठिर स्नेही जनों के बीच में हीनता को प्राप्त हुए, तथा कृष्ण वामनावतार में कपटपूर्ण बालक के वेष से श्यामवर्ण हुए- अपयशरूप कालिमा से कलंकित हुए । ठीक है- थोडा-सा भी वह कपटव्यवहार महान् दूध में मिले हुए विष के समान घातक होता है ॥२२०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- मायाव्यवहार के कारण प्राणियों को किस प्रकार का दुख सहना पडता है यह बतलाते हुए यहां मरीचि, युधिष्ठिर और कृष्ण के उदाहरण दिये गये हैं । इनमें इन्हीं गुणभद्राचार्य के द्वारा विरचित उत्तरपुराण में (देखिए पर्व 68) मरीचि का वह कथानक इस प्रकार पाया जाता है- अयोध्यापुरी में महाराज दशरथ राजा राज्य करते थे। किसी समय अवसर पाकर रामचन्द्र और लक्ष्मण ने प्रार्थना की कि वाराणसी पुरी पूर्व में हमारे आधीन रही है । इस समय उसका कोई शासक नहीं है। अतएव यदि आप आज्ञा दे तो हम दोनों उसे वैभव से परिपूर्ण कर दें। इस प्रकार उनके अतिशय आग्रह को देखकर दशरथ राजा ने कष्टपूर्वक उन्हें वाराणसी जाने की आज्ञा दे दी। वाराणसी जाते समय दशरथ ने रामचन्द्र को राजपद और लक्ष्मण को युवराजपद प्रदान किया। वे दोनों वहां जाकर न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करते हुए उसके स्नेहभाजन बन गये । उधर लंका में प्रतापी रावण राज्य कर रहा था । उसे तीन खण्डों के अधिपति होने का बडा अभिमान था। उसके पास एक दिन नारदजी जा पहुंचे। रावण द्वारा आगमन का कारण पूछने पर वे बोले कि मैं आज वाराणसी से आ रहा हूं। वहां दशरथ राजा का पुत्र रामचन्द्र राज्य करता है। उसे मिथिला के स्वामी राजा जनक ने यज्ञ के बहाने वहां बुलाकर अपनी रूपवती सौभाग्यशालिनी कन्या दी है। वह आपके योग्य थी। राजा जनक ने आप जैसे तीन खण्डों के अधिपति के होते हुए भी रामचन्द्र को कन्या देकर आपका अपमान किया है । यह मुझे सहन नहीं हुआ। इसीलिये स्नेहवश इधर चला आया। यह सुनकर रावण काम से संतप्त हो उठा। तब उसने अपने मारीच नामक मंत्री को बुलाकर उससे कहा कि दशरथ राजा के पुत्र राम और लक्ष्मण बहुत अभिमानी हो गये हैं, वे मेरे पद को प्राप्त करना चाहते हैं । अतएव उन दोनों को मारकर रामचन्द्र की पत्नी सीता के हरण का कोई उपाय सोचो। इसपर मारीच ने रावण को बहुत कुछ समझाया। पर जब वह न माना तो सीता की इच्छा जानने के लिये उसके पास सूर्पणखा को भेजा गया। उस समय बसन्त ऋतु का समय होने से रामचन्द्र सीता के साथ चित्रकूट नाम के उद्यान में जाकर क्रीडा कर रहे थे। वहां जब वह सूर्पणखा स्त्री का रूप धारण कर सीता के पास पहुंची तब अन्य रानियां उसकी हंसी करने लगी। यह देखकर वह उनसे बोली कि आप सब बहुत सौभाग्यशालिनी हैं । आप लोगों ने पूर्व में कौन-सा पुण्यकार्य किया है, उसे मुझे बतलाइये । मैं भी तदनुसार अनुष्ठान करके इस राजा की पत्नी होना चाहती हूं। यह सुनकर स्त्री-पर्याय की निन्दा करते हुए सीता ने जो उसे उपदेश दिया उससे हतोत्साह होकर वह वापिस चली गई । उसे निश्चय हो गया कि कदाचित् सुमेरु विचलित हो सकता है, पर सीता का मन विचलित नहीं हो सकता है । सूर्पणखा से यह समाचार जानकर रावण उसके ऊपर क्रोधित होता हुआ, मारीच के साथ पुष्पक विमान पर आरूढ हुआ और उधर चल दिया। इस प्रकार चित्रकूट उद्यान में जाकर उसने मारीच को मणिमय सुन्दर हरिण बनकर सीता के सामने से जाने की आज्ञा दी। तदनुसार उसके सीता के सामने से निकलने पर उसे देखकर सीता की उत्सुकता बढ गई । उसकी उत्सुकता को देखकर रामचन्द्र उसे पकडने के लिये उसके पीछे चल पडे । इस प्रकार बहुत दूर जाने पर वह कपटी हरिण आकाश में उडकर चला गया । उधर रावण रामचन्द्र के वेष में सीता के पास पहुंचा और बोला कि हे प्रिये ! मैंने उस हरिण को पकड़ कर भेज दिया है। अब सन्ध्या हो गई है, इसलिये पालकी में सवार होकर नगर को वापिस चलें । यह कहते हुए उसने माया से पुष्पक विमान को पालकी के रूप में परिणत कर दिया और अपने आपको इस प्रकार दिखलाया जैसे रामचन्द्र घोडे पर चढकर पृथिवी पर चल रहे हों। इस प्रकार भोली सीता अज्ञानता से उस पर चढ गई और तब रावण उसे लंका ले गया। इस प्रकार सीता के अपहरण का कारण मारीच का वह कपटपूर्ण व्यवहार ही था जिसके कारण पृथिवी पर उसका अपयश फैला। 'अश्वत्थामा हतः' इस वाक्य का उच्चारण करने वाले युधिष्ठिर का वह वृत्तान्त महाभारत (द्रोण पर्व अध्याय 190-92) में इस प्रकार पाया जाता है- महाभारत युद्ध में जब पाण्डव द्रोणाचार्य के बाणों से बहुत त्रस्त हो गये थे और उन्हें जय की आशा नहीं रही थी तब उन्हें पीडित देखकर कृष्ण अर्जुन से बोले कि द्रोणाचार्य को संग्राम में इन्द्र के साथ देव भी नहीं जीत सकते हैं। उन्हें युद्ध में मनुष्य तब ही जीत सकते जब कि वे शस्त्रसन्यास ले लें। इसके लिये हे पाण्डवो ! धर्म को छोडकर कोई उपाय करना चाहिये । मेरी समझ से अश्वत्थामा के मर जानेपर वे युद्ध न करेंगे और इस प्रकार से तुम सबकी रक्षा हो सकती है । इसके लिये कोई मनुष्य युद्ध में उनसे अश्वत्थामा के मरने का वृत्तान्त कहे । यह कृष्ण की सम्मति अर्जुन को नहीं रुची, युधिष्ठिर को वह कष्ट के साथ रुची, परंतु अन्य सबको वह खूब रुची । तब भीम ने मालव इन्द्रवर्मा के अश्वत्थामा नामक भयंकर हाथी को अपनी गदा के प्रहार से मार डाला और युद्ध में द्रोणाचार्य के सामने जाकर अश्वत्थामा हतः- अश्वत्थामा मर गया' इस वाक्य का जोर से उच्चारण किया। उस समय चूंकि अश्वत्थामा नाम का हाथी मर ही गया था, अतः ऐसा मन में सोचकर भीम ने यह मिथ्या भाषण किया। इस वाक्य को सुनकर यद्यपि द्रोणाचार्य को खेद तो बहुत हुआ फिर भी अपने पुत्र के पराक्रम को देखते हुए उस वाक्य के विषय में संदिग्ध होकर उन्होंने धैर्य को नहीं छोडा। उस समय उन्होंने धृष्टद्युम्न के ऊपर तीक्ष्ण बाणों की वर्षा की । यह देखकर बीस हजार पंचालों ने युद्ध में उन्हें बाणों से ऐसा व्याप्त कर दिया जैसे कि वर्षा ऋतु में मेघों से सूर्य व्याप्त हो जाता है । तब द्रोणाचार्य ने क्रोधित होकर उन सबके वध के लिये ब्रह्म अस्त्र उत्पन्न किया और उन हजारों सुभटों के साथ दस हजार हाथियों और इतने ही घोडों को मारकर उनके शवों से पृथिवी को व्याप्त कर दिया। इस प्रकार द्रोणाचार्य को क्षत्रियों से रहित पृथिवी को करते हुए देखकर अग्नि को आगे करते हुए विश्वमित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम,वसिष्ठ कश्यप और अत्रि आदि ऋषि उन्हें ब्रह्मलोक में ले जाने की इच्छा से वहां शीघ्र ही आ पहुंचे। वे सब उनसे बोले कि हे द्रोण ! तुमने अधर्म से युद्ध किया है, अब तुम्हारी मृत्यु निकट है, अतएव तुम युद्ध में शस्त्र को छोडकर यहां स्थित हम लोगों की ओर देखो। अब इसके पश्चात् तुम्हें ऐसा अतिशय क्रूर कार्य करना योग्य नहीं है । तुम वेदवेदांग के वेत्ता और सत्य धर्म में लवलीन हो । इसलिये और विशेषकर ब्राह्मण होने से तुम्हें यह कृत्य शोभा नहीं देता। तुमने शस्त्र से अनभिज्ञ मनुष्यों को ब्रह्मास्त्र से दग्ध क्रिया है । हे विप्र ! यह जो तुमने दुष्कृत्य किया है वह योग्य नहीं है । अब तुम युद्ध में आयुध को छोड दो। इस प्रकार उन महर्षियों के वचनों को सुनकर तथा भीमसेन के वाक्य (अश्वस्थामा हतः) का स्मरण करके द्रोणाचार्य युद्ध की ओर से उदास हो गये। तब उन्होंने भीम के वचन में सन्दिग्ध होकर अश्वत्थामा के मरने व न मरने बावत युधिष्ठिर से पूछा । कारण यह है कि उन्हें यह दृढ विश्वास था युधिष्ठिर कभी असत्य नहीं बोलेगा । इधर कृष्ण को जब यह ज्ञात हुआ कि द्रोणाचार्य पृथिवी को पाण्डवों से रहित कर देना चाहते हैं तब वे दुखित होकर धर्मराज (युधिष्ठिर) से बोले कि यदि द्रोणाचार्य क्रोधित होकर आधे दिन भी युद्ध करते हैं तो मैं सच कहता हूं कि तुम्हारी सब सेना नष्ट हो जावेगी। इसलिये आप हम लोगों की रक्षा करें । इस समय सत्य की अपेक्षा असत्य बोलना कहीं अधिक प्रशंसनीय होगा । जो जीवित के लिये असत्य बोलता है वह असत्यजनित पाप से लिप्त नहीं होता है । कृष्ण और युधिष्ठिर के इस उपर्युक्त वार्तालाप के समय भीमसेन युधिष्ठिर से बोला कि हे महाराज ! द्रोणाचार्य के वधके उपाय को सुनकर मैने मालव इन्द्रवर्मा के अश्वत्थामा नाम से प्रसिद्ध हाथी को मार डाला और तब द्रोणाचार्य से कह दिया कि हे ब्रह्मन्! अश्वत्थामा मर गया है,अब तुम युद्ध से विमुख हो जाओ। परंतु उन्होंने मेरे कहने पर विश्वास नहीं किया । अब आप कृष्ण के वचनों को मानकर विजय की इच्छा से द्रोणाचार्य से अश्वत्थामा के मर जाने बाबत कह दें । हे राजन् ! आपके वैसा कह देने से द्रोणाचार्य कभी भी युद्ध नहीं करेंगे। कारण कि आप तीनों लोकों में सत्यवक्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार भीमसेन के कथन को सुनकर और कृष्ण की प्रेरणा पाकर युधिष्ठिर वैसा कहने को उद्यत हो गये। तब उन्होंने 'अश्वत्थामा हतः' इस वाक्यांश को जोर से कहकर पीछे अस्पष्ट स्वर से यह भी कह दिया कि 'उत कुञ्जरो हत:-अश्वत्थामा मरा है अथवा हाथी मरा है। जब तक युधिष्ठिर ने उक्त वाक्यका उच्चारण नहीं किया था तब तक उनका रथ पृथिवी से चार अंगुल ऊंचा था। परंतु जैसे ही उन्होंने उसका उच्चारण किया कि वैसे ही उनके उस रथ के घोडे पृथिवी का स्पर्श करने लगे। उधर युधिष्ठिर के मुख से उस वाक्य को सुनकर द्रोणाचार्य पुत्र के मरण से संतप्त होते हुए जीवन की ओर से निराश हो गये। उस समय वे ऋषियों के कथनानुसार अपने को महात्मा पाण्डवों का अपराधी समझने लगे। इस प्रकार वे पुत्रमरण के समाचार से उद्विग्न एवं विमनस्क होकर धृष्टद्युम्न को देखते हुए भी उससे युद्ध करने के लिये समर्थ नहीं हुए।

यह कथानक संक्षेप में कुछ थोडे-से परिवर्तन के साथ श्री शुभचन्द्रविरचित पाण्डवपुराण (पर्व 20, श्लोक 218-233) तथा देवप्रभसूरिविरचित पाण्डवचरित्र (13, 498-514) में भी पाया जाता है ।

कृष्ण के कपटपूर्ण बटुवेष का उपाख्यान वामनपुराण (अ.३१) में इस प्रकार पाया जाता है-विरोचनका पुत्र एक बलि नाम का दैत्य था,जो अतिशय प्रतापी था। उसके अशना नाम की पत्नी से सौ पुत्र उत्पन्न हुए थे। एक समय वह यज्ञ कर रहा था। उस समय अकस्मात् पर्वतों के साथ समस्त पृथिवी क्षुभित हो उठी थी । पृथिवी के इस प्रकार से क्षुभित देखकर बलि ने शुक्राचार्य को नमस्कार कर उनसे इसका कारण पूछा । उत्तर में वे बोले कि भगवान् कृष्ण ने वामन के रूप में कश्यप के यहां अवतार लिया है । वे तुम्हारे यज्ञ में आ रहे हैं । उनकी पादप्रक्षेप से पृथिवी विचलित हो उठी है। यह उस जगद्धाता कृष्ण की माया है। शुक्राचार्य के इन वचनों को सुनकर बलि को बहुत हर्ष हुआ, उसने अपने को अतिशय पुण्यशाली समझा। उनका यह वार्तालाप चल ही रहा था कि उसी समय कृष्ण वामन के वेष में वहां आ पहुंचे । तब बलि ने अर्घ लेकर उनकी पूजा करते हुए कहा कि मेरे पास सुवर्ण, चांदी, हाथी, घोडे, स्त्रियां, अलंकार एवं गायें आदि सब कुछ हैं, इनमें से जो कुछ भी मांगो उसे मैं दूंगा। इसपर हंसकर कृष्ण ने वामन के रूप में कहा कि तुम मुझे तीन पाद मात्र पृथिवी दो। सुवर्ण आदि तो उनको देना जो उनके ग्रहण की इच्छा करते हो। इसे स्वीकार करते हुए बलि ने उनके हाथ पर जलधारा छोडी । उस जलधारा के गिरते ही कृष्ण ने वामनाकार को छोडकर अपने सर्व देवमय विशाल रूप को प्रकट कर दिया। इस प्रकार से कृष्ण ने तीन लोकों को जीतकर और प्रमुख असुरों का संहार कर उन तीनों लोकों को इन्द्र के लिये दे दिया। इसके साथ ही उन्होंने सुतल नामक पाताल बलि के लिये भी दिया। उस समय वे बलि से बोले कि तुमने जलधारा दी है और मैंने उसे हाथ से ग्रहण किया है, अतएव तुम्हारी आयु कल्पप्रमाण हो जावेगी, वैवस्वत मनु के पश्चात् सावर्णिक मनु के प्रादुर्भूत होने पर तुम इन्द्र होओगे, इस समय मैंने समस्त लोक इन्द्र को दे दिया है । जब तुम देवों और ब्राह्मणों से विरोध करोगे तब तुम वरुण के पाश से बंधे जाओगे। इस समय जो तुमने बहुत दानादि सत्कार्य किये हैं वे उस समय अपना फल देंगे। इस प्रकार कृष्ण ने मायापूर्ण व्यवहारसे बलि पर विजय पायी थी, अतएव वे अपयशरूप कालिमा से लिप्त हुए ॥२२०॥

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भेयं मायामहागर्तान्मिथ्याघनतमोमयात् ।
यस्मिंल्लीना न लक्ष्यन्ते क्रोधादिविषमाहयः ॥२२१॥
अन्वयार्थ : जो मायाचाररूप बडा गढ्ढा मिथ्यात्वरूप सघन अन्धकार से परिपूर्ण है तथा जिसके भीतर छिपे हुए क्रोधादि कषायोंरूप भयानक सर्प देखने में नहीं आते हैं उस मायारूप गड्ढे से भयभीत होना चाहिये॥२२१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार सघन अन्धकार से परिपूर्ण एवं सर्पादिकों से व्याप्त गहरे गड्ढे में यदि कोई प्राणी असावधानी से गिर जाता है तो उससे उसका उद्धार होना अशक्य है- सर्पादिकों के द्वारा काटने से वहां ही वह मरण को प्राप्त होता है। उसी प्रकार यह मायाचार भी एक प्रकार का गहरा गड्ढा ही है- गड्ढा यदि अन्धकार से पूर्ण होता है तो वह मायाचार भी असत्यसम्भाषणादिरूप अन्धकार से पूर्ण है तथा गड्ढे में जहां दुष्ट सर्पादि छिपे रहते हैं वहां मायाचार में भी उक्त सर्पो के समान कष्टप्रद क्रोधादि कषायें छिपीं रहती हैं । अतएव आत्महितैषी जीवों को उस भयानक मायाचाररूप गड्ढे से दूर ही रहना चाहिये ॥२२१॥

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प्रच्छन्नकर्म मम कोऽपि न वेति धीमान्
ध्वंसं गुणस्य महतोऽपि हि मेति मंस्थाः ।
कामं गिलन् धवलदीधितिधौतदाहं।
गूढोऽप्यबोधि न विधुं स विधुन्तुदः कैः ॥२२२॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! कोई भी बुद्धिमान् मेरे गुप्त पापकर्म को तथा मेरे महान् गुण के नाश को भी नहीं जानता है, ऐसा तू न समझ । ठीक है- अपनी धवल किरणों के द्वारा प्राणियों के संताप को दूर करनेवाले चन्द्र को अतिशय ग्रसित करनेवाला गुप्त भी वह राहु किनके द्वारा नहीं जाना गया है ? अर्थात् वह सभी के द्वारा देखा जाता है ॥२२२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- मायावी मनुष्य प्रायः यह समझता है कि मैं जो यह कपटपूर्ण आचरण कर रहा हूं न उसे ही कोई जानता देखता है और न उसके कारण होने वाली गुण की हानि को भी। परन्तु यह समझना उसकी भूल है । देखो, जो चन्द्र अपनी निर्मल शीतल किरणों से संसार के संताप को दूर करके उसे आल्हादित करता है उसे राहु कितनी भी गुप्त रीति से क्यों न ग्रसित करे, परन्तु वह लोगों की दृष्टि में आ ही जाता है- वह छिपा नहीं रहता है । अभिप्राय यह है कि मनुष्य जो कपटपूर्ण व्यवहार करता है वह तत्काल भले ही प्रगट न हो, किन्तु कालान्तर में वह प्रगट हो ही जाता है। अतएव ऐसा समझकर मायापूर्ण व्यवहार कभी भी न करना चाहिये ॥२२२॥

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वनचरभयाद्भावन् दैवाल्लताकुलबालधिः
किल जडतया लोलो बालव्रजेऽविचलं स्थितः।
बत स चमरस्तेन प्राणैरपि प्रवियोजितः
परिणततृषां प्रायेणैवंविधा हि विपत्तयः ॥२२३॥
अन्वयार्थ : वन में संचार करने वाले सिंहादि अथवा भील के भय से भागते हुए जिस चमर मृग की पूंछ दुर्भाग्य से लतासमूह में उलझ गई है तथा जो अज्ञानता से उस पूंछ के बालों के समूह में लोभी होकर वहीं पर निश्चलता से खडा हो गया है, वह मृग खेद है कि उक्त सिहादि अथवा व्याध के द्वारा प्राणों से भी रहित किया जाता है। ठीक है- जिनकी तृष्णा वृद्धिंगत है उनके लिये प्रायः करके ऐसी ही विपत्तियां प्राप्त होती हैं॥२२३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोभी प्राणी को कैसा कष्ट भोगना पडता है, इसका उदाहरण देते हुए यहां यह बतलाया है कि देखो जो चमर मृग दौडने में अतिशय प्रवीण होता है उसकी पूंछ जब व्याधादिक भय से दौडते हुए लताओं में फंस जाती है तब वह बालों के लोभ से मेरी पूंछ के सुन्दर बाल टूट न जावें इस विचार से दौडना बंद करके वहीं पर रुक जाता है और इसीलिये वह व्याधादि के द्वारा केवल उन बालों से ही रहित नहीं किया जाता है, किन्तु उनके साथ प्राणों से भी रहित किया जाता है । इसी प्रकार सभी लोभी जीवों को उक्त लोभ के कारण दुःसह दुःख सहना पडता है ॥२२३॥

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विषयविरतिः संगत्यागः कषायविनिग्रहः शमयमदमास्तत्त्वाभ्यासस्तपश्चरणोद्यमः।
नियमितमनोवृत्तिर्भक्तिर्जिनेषु दयालुता
भवति कृतिनः संसाराब्धेस्तटे निकटे सति ॥२२४॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियविषयों से विरक्ति, परिग्रह का त्याग, कषायों का दमन, राग-द्वेष की शान्ति, यम-नियम, इन्द्रियदमन, सात तत्त्वों का विचार, तपश्चरण में उद्यम, मन की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण,जिन भगवान में भक्ति, और प्राणियों पर दयाभाव; ये सब गुण उसी पुण्यात्मा जीव के होते हैं जिसके कि संसाररूप समुद्र का किनारा निकट में आ चुका है ॥२२४॥

भावार्थ :

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यमनियमनितान्तः शान्तबाह्यान्तरात्मा
परिणमितसमाधिः सर्वसत्त्वानुकम्पी।
विहितहितमिताशी क्लेशजालं समूलं
दहति निहतनिद्रो निश्चिताध्यात्मसारः ॥२२५॥
अन्वयार्थ : जो यम-यावज्जीवन किये गये व्रत, तथा नियम में-परिमित काल के लिये धारण किये गये व्रत में-उद्यत है, जिसको अन्तरात्मा (अन्तःकरण ) बाह्य इन्द्रियविषयों से निवृत्त हो चुकी है, जो ध्यान में निश्चल रहता है, सब प्राणियों के विषय में दयालु है, आगमोक्त विधि से हितकारक (पथ्य) एवं परिमित भोजन को ग्रहण करने वाला है, निद्रा से रहित है,तथा जो अध्यात्म के रहस्य को जान चुका है। ऐसा जीव समस्त क्लेशों के समूह को जडमूल से नष्ट कर देता है ॥२२५॥

भावार्थ :

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समधिगतसमस्ताः सर्वसावद्यदूराः
स्वहितनिहितचित्ताः शान्तसर्वप्रचाराः।
स्वपरसफलजल्पाः सर्वसंकल्पमुक्ताः
कथमिह न विमुक्तेर्भार्जनं ते विमुक्ताः ॥२२६॥
अन्वयार्थ : जो समस्त हेय-उपादेय तत्त्व के जानकार हैं, सब प्रकार की पापक्रियाओं से रहित हैं, आत्महित में मन को लगाकर समस्त इन्द्रियव्यापार को शान्त करने वाले हैं, स्व और पर के लिये हितकर वचन का व्यवहार करते हैं, तथा सब संकल्प-विकल्पों से रहित हो चुके हैं; ऐसे वे मुनि यहां कैसे मुक्ति के पात्र न होंगे ? अवश्य होंगे ॥२२६॥

भावार्थ :

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दासत्वं विषयप्रभोर्गतवतामात्मापि येषां परस्
तेषां भो गुणदोषशून्यमनसां किं तत्पुनर्नश्यति ।
भेतव्यं भवतैव यस्य भुवनप्रद्योति रत्नत्रयं
भ्राम्यन्तीन्द्रियतस्कराश्च परितस्त्वां तन्मुहुर्जागृहि ॥२२७॥
अन्वयार्थ : जो विषयरूप राजा की दासता को प्राप्त हुए हैं तथा जिनका आत्मा भी पर(पराधीन) है ऐसे उन गुण-दोष के विचार से रहित मनवाले प्राणियों का भला वह क्या नष्ट होता है ? अर्थात् उनका कुछ भी नष्ट नहीं होता है। परन्तु हे साधो ! चूंकि तेरे पास लोक को प्रकाशित करनेवाले अमूल्य तीन (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र) रत्न विद्यमान हैं अतएव तुझको ही डरना चाहिये। कारण कि तेरे चारों ओर इन्द्रियरूप चोर घूम रहे हैं। इसलिये तू निरन्तर जागता रह ॥२२७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोक में देखा जाता है कि जिनके पास कुछ भी नहीं है उन्हें चोर आदि का कुछ भी भय नहीं रहता । वे रात्रि में निश्चिन्त होकर गाढ निद्रा में सोते हैं । किन्तु जिनके पास धन-संपत्ति आदि होती है वे सदा भयभीत रहते हैं। उन्हें चोर-डाकू आदि से उसकी रक्षा करनी पड़ती है। इसीलिये वे रात्रि में सदा सावधान रहते हैं- निश्चिन्तता से नहीं सोते हैं । यदि कोई धनवान् निश्चिन्ता से सोता है तो चोरों द्वारा उसका धन लूट लिया जाता है। इसी प्रकार से जो प्राणी विषयों के दास बने हुए हैं उनके पास तो बहुमूल्य संपत्ति (सम्यग्दर्शनादि) कुछ भी नहीं है । इसीलिये वे चाहे सावधान रहे और चाहे असावधान, दोनों ही अवस्थायें उनके लिये समान हैं। परन्तु जिसके पास सम्यग्दर्शनादिरूप अमूल्य संपत्ति है तथा जिसे चुराने के लिये उसके चारों ओर इन्द्रियरूप चोर भी घूम रहे हैं उसे तो उसकी रक्षा करने के लिये सदा ही सावधान रहना चाहिये । कारण यह कि यदि उसने इस विषय में थोडी-सी भी असावधानी की तो उसकी यह बडे परिश्रम से प्राप्त की गई संपत्ति उक्त चोरों के द्वारा अवश्य लूट ली जावेगी-नष्ट कर दी जावेगी । इसीलिये यहां ऐसे ही साधु को लक्ष्य करके यह प्रेरणा की गई है कि तू सदा सावधान रहकर अपने रत्नत्रय की रक्षा कर ॥२२७॥

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रम्येषु वस्तुवनितादिषु वीतमोहो
मुह्येद् वृथा किमिति संयमसाधनेषु ।
धीमान् किमामयभयात्परिहृत्य भुक्ति
पीत्वौषधिम् व्रजति जातुचिदप्यजीर्णम् ॥२२८॥
अन्वयार्थ : हे भव्य! जब तू रमणीय बाह्य अचेतन वस्तुओं एवं चेतन स्त्री-पुत्रादि के विषय में मोह से रहित हो चुका है तब फिर संयम के साधनभूत पीछी-कमण्डल आदि के विषय में क्यों व्यर्थ में मोह को प्राप्त होता है ? क्या कोई बुद्धिमान् रोग के भय से भोजन का परित्याग करता हुआ औषधि को पीकर कभी अजीर्ण को प्राप्त होता है? अर्थात् नहीं प्राप्त होता है॥२२८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जो बुद्धिमान् मनुष्य रोग के भय से भोजन का परित्याग करता है वह कभी औषधि को अधिक मात्रामें पीकर उसी रोग को निमंत्रण नहीं देता है । और यदि वह ऐसा करता है तो फिर वह बुद्धिमान् न कहला कर मूर्ख ही कहा जावेगा। इसी प्रकार जो बुद्धिमान् मनुष्य चेतन (स्त्री-पुत्रादि) और अचेतन (धन-धान्यादि) पदार्थो से मोह को छोडकर महाव्रतों को स्वीकार करता है वह कभी संयम के उपकरणस्वरूप पीछी एवं कमण्डलु आदि के विषय में अनुराग को नहीं प्राप्त होता है। और यदि वह ऐसा करता है तो समझना चाहिये कि वह अतिशय अज्ञानी है। कारण कि इस प्रकार से उसका परिग्रह को छोडकर मुनिधर्म को ग्रहण करना व्यर्थ ठहरता है। इसीलिये यहां यह उपदेश दिया गया है कि हे साधो! जब तू स्त्री आदि समस्त बाह्य वस्तुओं से अनुराग छोड चुका है तो फिर पीछी कमण्डलु आदि के विषय में भी व्यर्थ में अनुराग न कर । अन्यथा तू इस लोक के सुख से तो रहित हो ही चुका है, साथ ही वैसा करने से परलोक के भी सुख से वंचित हो जावेगा॥२२८॥

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तपः श्रुतमिति द्वयं बहिरुदीर्य रूढं यदा
कृषीफलमिवालये समुपलीयते स्वात्मनि ।
कृषीवल इवोज्झितः करणचौरबाधादिभिः
तदा हि मनुते यतिः स्वकृतकृत्यतां धीरधीः ॥२२९॥
अन्वयार्थ : बाहिर उत्पन्न होकर वृद्धिंगत हुई कृषी के फल (अनाज) को जब चोर आदि की बाधाओं से सुरक्षित रखकर घर पहुंचा दिया जाता है तब जिस प्रकार धीर बुद्धि किसान अपने को कृतकृत्य (सफलप्रयत्न) मानता है, उसी प्रकार बाह्य में उत्पन्न होकर वृद्धि को प्राप्त हुए तप और आगमज्ञान इन दोनों को इन्द्रियोंरूप चोरों की बाधाओं से सुरक्षित रखकर जब अपनी आत्मा में स्थिर करा देता है तब धीर बुद्धि साधु भी अपने को कृतकृत्य मानता है ॥२२९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार साहसी किसान पहिले योग्य भूमि में बीजको बोता है और जब वह अंकुरित हो जाता है तो वह उसकी पशु आदि से रक्षा करता है । इस क्रम से उसके पक जाने पर जब किसान उस चोरों आदि से बचाकर अपने घर पहुंचा देता है तब ही वह अपने परिश्रम को सफल मानकर हर्षित होता है। इसी प्रकार से जो साधु बाह्य में तपश्चरण करता है तथा आगम का अभ्यास भी करता है उसके ये दोनों कार्य उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त होकर जब इन्द्रियों की बाधाओं से सुरक्षित रहते हुए आत्मा में स्थिरता को प्राप्त हो जाते हैं तब ही उसे अपना परिश्रम सफल समझना चाहिये । ऐसी अवस्था में ही वह अपने साध्य (मोक्ष) को सिद्ध कर सकता है, अन्यथा नहीं । यहां श्लोक में जो 'धीरधी ' (धीरबुद्धि) विशेषण दिया गया है उसका यह भाव है कि जिस प्रकार किसान बीज बोते समय अधीर होकर यह कभी विचार नहीं करता है कि यदि फसल अच्छी तैयार न हुई तो मुझे बीज की हानि सहनी पडेगी, किन्तु इसके विपरीत वह साहस रखकर फलप्राप्ति की आशा से ही उसे बोता है । उसी प्रकार जो समस्त बाह्य परिग्रह को छोडकर तपश्चरण को स्वीकार करता है उसे भी अधीर होकर कभी ऐसा विचार नहीं करना चाहिये कि जिस तप के फल (स्वर्ग-मोक्ष) की प्राप्ति की आशा से मैं वर्तमान सुख को छोडकर उसे स्वीकार कर रहा हूं वह फल यदि न प्राप्त हुआ तो मुझे व्यर्थ ही कष्ट सहना पडेगा । किन्तु इसके विपरीत उसे यही निश्चय करना चाहिये कि तप का फल जो स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति है वह मुझे प्राप्त होगा ही। तदनुसार उसे साहस के साथ उसकी प्रतीक्षा भी करनी चाहिये ॥२२९॥

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दृष्टार्थस्य न मे किमप्ययमिति ज्ञानावलेपादमुं
नोपेक्षस्व जगत्त्रयैकडमरं निःशेषयाशाद्विषम् । पश्याम्भोनिधिमप्यगाधसलिलं बाबाध्यते वाडवः
क्रोडीभूतविपक्षकस्य जगति प्रायेण शान्तिः कुतः ॥२३०॥
अन्वयार्थ : मैं पदार्थों के स्वरूप को जान चुका हूं, इसलिये यह आशारूप शत्रु मेरा कुछ बिगाड नहीं कर सकता है। इस प्रकार ज्ञान के अभिमान से तू तीनों लोकों में अतिशय भय को उत्पन्न करनेवाले उस आशारूप शत्रु की उपेक्षा न करके उसे निर्मल नष्ट कर दे। देखो, अथाह जल से परिपूर्ण भी समुद्र को वाडवाग्नि अतिशय बाधा पहुंचाती है । ठीक है- जिसकी गोद में (समीप में) शत्रु स्थित है उसे भला संसार में प्रायः शान्ति कहांसे प्राप्त हो सकती है ? अर्थात् नहीं प्राप्त हो सकती है ॥२३०॥

भावार्थ :

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स्नेहानुबद्धहृदयो ज्ञानचरित्रान्वितोऽपि न श्लाघ्यः ।
दीप इवापादयिता कज्जलमलिनस्य कार्यस्य ॥२३१॥
अन्वयार्थ : जिसका हृदय स्नेह (राग) से सम्बद्ध है वह ज्ञान और चारित्र से युक्त होकर भी चूंकि स्नेह (तेल) से सम्बद्ध दीपक के समान कज्जल जैसे मलिन कर्मों को उत्पन्न करता है अतएव वह प्रशंसा के योग्य नहीं है ॥२३१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार दीपक स्नेह (तेल) से सम्बन्ध रखकर निकृष्ट काले कज्जल को उत्पन्न करता है उसी प्रकार जो साधु स्नेह से सम्बन्ध रखता है- हृदय में बाह्य वस्तुओं से अनुराग करता है-वह ज्ञान और चारित्र से युक्त होता हुआ भी उक्त अनुराग के वश होकर कज्जल के समान मलिन पाप कर्मों को उत्पन्न करता है । अतएव उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती है । हां, यदि वह उक्त स्नेह से रहित होकर- राग-द्वेष को छोडकर- उन ज्ञान और चारित्र को धारण करता है तो फिर वह चूंकि उक्त मलिन कर्मों को नहीं बांधता है- उनकी केवल निर्जरा ही करता है- अतएव वह लोक का वंदनीय हो जाता है। दीपक भी जब स्नेह से रहित हो जाता है- उसका तेल जलकर नष्ट हो जाता है- तब वह कज्जलरूप कार्य को नहीं उत्पन्न करता है ॥२३१॥

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रतेररतिमायातः पुना रतिमुपागतः ।
तृतीयं पदमप्राप्य बालिशो बत सीदसि ॥२३२॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू राग से हटकर द्वेष को प्राप्त होता है और तत्पश्चात् उससे भी रहित होकर फिर से उसी राग को प्राप्त होता है । इस प्रकार खेद है कि तू तीसरे पद को- राग-द्वेष के अभावरूप समताभाव को- न प्राप्त करके यों ही दुखी होता है ॥२३२॥

भावार्थ :

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तावद् दुःखाग्नितप्तात्मायःपिण्डः सुखसीकरैः ।
निर्वासि निर्वृत्ताम्भोधौ यावत्त्वं न निमज्जसि ॥२३३॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! जब तक तू मोक्षसुखरूप समुद्र में नहीं निमग्न होता है तब तक तू दुखरूप अग्नि से तपे हुए लोहे के गोले के समान विषयजनित क्षणिक लेशमात्र सुख से सुखी नहीं हो सकता है ॥२३३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार अग्नि से संतप्त लोहे के गोले को यदि थोडे-से पानीमें डाला जाय तो वह उतने मात्र से शान्त (शीतल) नहीं होता है, किन्तु जब उसे अधिक पानी के भीतर पूरा डुबा दिया जाता है तब ही वह शान्त होता है । इसी प्रकार जन्ममरणादि के अनेक दुःखों से संतप्त प्राणी को यदि थोडा-सा विषयजन्य क्षणिक सुख प्राप्त होता है तो इससे वह वास्तव में सुखी नहीं हो सकता है। वह पूर्णतया सुखी तो तब ही हो सकता है जब कि कर्मबन्धन से रहित होकर अनन्त शाश्वतिक सुख को प्राप्त कर ले ॥२३३॥

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मञ्क्षु मोक्षं सुसम्यक्त्व सत्यंकारस्वसात्कृतम् ।
ज्ञानचारित्रसाकल्यमूल्येन स्वकरे कुरु ॥२३४॥
अन्वयार्थ : हे भव्य ! तू निर्मल सम्यग्दर्शनरूप ब्याना देकर अपने आधीन किये हुए मोक्ष को सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप पूरा मूल्य देकर शीघ्र ही अपने हाथ में करले॥२३४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- लोकव्यवहार में जब कोई किसी वस्तु को खरीदना चाहता है तो वह इसके लिये पहिले कुछ ब्याना (मैं निश्चित ही इसे खरीदूंगा, इस प्रकारका वायदा करते हुए उसके मूल्य का कुछ भाग जो पूर्व में दिया जाता है) देकर उक्त वस्तु को अपने आधीन कर लेता है, जिससे कि उक्त वस्तु का स्वामी उसे किसी अन्य व्यक्ति को न बेच सके । तत्पश्चात् वह उक्त वस्तु का पूरा मूल्य देकर उसे अपने हाथ में कर लेता है। ठीक इसी प्रकार से जो भव्य जीव मोक्ष को प्राप्त करना चाहता है उसे पहिले ब्याना के रूप में सम्यक्त्व को देना चाहिये- धारण करना चाहिये। तत्पश्चात् सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्ररूप पूर्ण मूल्य के द्वारा उक्त मोक्ष को अपने हाथ में कर लेना चाहिये । अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार ब्याना देने से अभिलषित वस्तु उस ब्याना देनेवाले के लिये निश्चित हो जाती है उसी प्रकार सम्यक्त्व की प्राप्ति से अर्धपुद्गलपरावर्तन प्रमाणकाल के भीतर मोक्ष का लाभ भी निश्चित हो जाता है। इतने काल के भीतर जब भी वह पूर्ण मूल्य के समान सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्र को प्राप्त कर लेता है तब ही उसे अपने अभीष्ट उक्त मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है ॥२३४॥

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अशेषमद्वैतमभोग्यभोग्यं निवृत्तिवृत्यो: परमार्थकोट्याम् । अभोग्यभोग्यात्मविकल्पबुद्धया निवृत्तिमभ्यस्यतु मोक्षकांक्षी ॥२३५॥
अन्वयार्थ : यह समस्त संसार एकरूप है- वास्तव में भोग्य और अभोग्य की कल्पना से रहित है। फिर भी वह प्रवृत्ति और निवृत्ति की अतिशय प्रकर्षता में प्रवृत्ति की अपेक्षा भोग्य और निवृत्ति की अपेक्षा अभोग्य होता है । जो भव्य प्राणी मोक्ष की इच्छा करता है उसे भोग्य और अभोग्यरूप विकल्पबबुद्धि से निवृत्ति का अभ्यास करना चाहिये ॥२३५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- विश्व एक रूप ही है। किन्तु जो जीत्व राग-द्वेष से सहित है वह जिसे इष्ट समझता है उसके तो ग्रहण करने में प्रवृत्त होता है तथा जिसे वह अनिष्ट समझता है उसके छोडने में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार वह समस्त विश्व को ही भोगना चाहता है। परन्तु जो विवेकी जीव राग-द्वेष से रहित होता है उसे इष्ट अनिष्ट की कल्पना ही नहीं होती । इसीलिये वह एक मात्र अपने चैतन्यस्वरूप को छोडकर अन्य सभी बाह्य वस्तुओं से निवृत्त रहता है- उसे सब ही अभोग्य प्रतीत होता है । यही निवृतिमार्ग उपादेय है। मोक्ष सुखाभिलाषी जीव को प्रवृतिमार्ग से अलग रहकर इस निवृत्तिमार्ग का ही अभ्यास करना चाहिये ॥२३५॥

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निवृत्तिं भावयेद्यावन्निवृत्यं तदभावतः ।
न वृत्तिर्न निवृत्तिश्च तदेव पदमव्ययम् ॥२३६॥
अन्वयार्थ : जब तक छोडने के योग्य शरीरादि बाह्य वस्तुओं से सम्बन्ध है तब तक निवृत्ति का विचार करना चाहिये और जब छोडने के योग्य कोई वस्तु शेष नहीं रहती है तब न तो प्रवृत्ति रहती है और न निवृत्ति भी । वही अविनश्वर मोक्षपद है ॥२३६॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जब तक बाह्य वस्तुओं से अनुराग है तब तक निवृत्ति का अभ्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् जब उन बाह्य वस्तुओं से अनुराग नष्ट हो जाता है तब उनका संयोग भी हट जाता है और इसीलिये उस समय प्रवृत्ति ओर निवृत्ति से रहित अविनश्वर मोक्ष पद प्राप्त हो जाता है ॥२३६॥

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रागद्वेषौ प्रवृत्तिः स्यान्निवृत्तिस्तन्निषेधनम् ।
तौ च बाह्यार्थसंबद्धौ! तस्मात्तान् सुपरित्यजेत् ॥२३७॥
अन्वयार्थ : राग और द्वेष का नाम प्रवृत्ति तथा इन दोनों के अभाव का नाम ही निवृत्ति है। चूंकि वे दोनों (राग और द्वेष) बाह्य वस्तुओं से सम्बन्ध रखते हैं । अतएव उन बाह्य वस्तुओं का ही परित्याग करना चाहिये ॥२३७॥

भावार्थ :

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भावयामि भवावर्ते भावनाः प्रागभाविताः ।
भावये भाविता नेति भवाभावाय भावनाः ॥२३८॥
अन्वयार्थ : मैंने संसारस्वरूप भंवर में पडकर पहिले कभी जिन सम्यग्दर्शनादि भावनावों का चिन्तन नहीं किया है उनका अब चिन्तन करता हूं और जिन मिथ्यादर्शनादि भावनाओं का बार बार चिन्तन कर चुका हूं उनका अब मैं चिन्तन नहीं करता हूं। इस प्रकार मैं अब पूर्व भावित भावनाओं को छोडकर उन अपूर्व भावनाओं को भाता हूं, क्योंकि, इस प्रकार की भावनायें संसारविनाश की कारण होती हैं ॥२३८॥

भावार्थ :

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शुभाशुभे पुण्यपापे सुखदुःखे च षट् त्रयम् ।
हितमाद्यमनुष्ठेयं शेषत्रयमथाहितम् ॥२३९॥
अन्वयार्थ : शुभ और अशुभ, पुण्य और पाप तथा सुख और दुख ; इस प्रकार ये छह हुए । इन छहों के तीन युगलों से आदि के तीन- शुभ, पुण्य और सुख- आत्मा के लिये हितकारक होने से आचरण के योग्य हैं । तथा शेष तीन- अशुभ, पाप और दुख- अहित-कारक होने से छोडने के योग्य हैं॥२३९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जिनपूजनादिरूप शुभ क्रियाओं के द्वारा पुण्य कर्म का बन्ध होता है और उस पुण्य कर्म के उदय में प्राप्त होने पर उससे सुख की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत हिंसा एवं असत्यसंभाषणादिरूप अशुभ क्रियायों के द्वारा पाप का बन्ध होता है और उस पाप कर्म के उदय में प्राप्त होने पर उससे दुख की प्राप्ति होती है । इसीलिये उक्त छह में से शुभ, पुण्य और सुख ये तीन उपादेय तथा अशुभ, पाप और दुख ये तीन हेय हैं ॥२३९॥

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तत्राप्याद्यं परित्याज्यं शेषौ न स्तः स्वतः स्वयम् ।
शुभं च शुद्धे त्यक्त्वान्ते प्राप्नोति परमं पदम् ॥२४०॥
अन्वयार्थ : पूर्व श्लोक में जिन तीन को-शुभ, पुण्य और सुख को-हितकारक बतलाया है उनमें भी प्रथम का (शुभ का) परित्याग करना चाहिये । ऐसा करनेसे शेष रहे पुण्य और सुख ये दोनों स्वयं ही नहीं रहेंगे, इस प्रकार शुभ को छोडकर और शुद्ध स्वभाव में स्थित होकर जीव अन्त में उत्कृष्ट पद (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है ॥२४०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- ऊपर जो इस श्लोक का अर्थ लिखा गया है वह संस्कृत टीकाकार श्री प्रभाचंद्राचार्य के अभिप्रायानुसार लिखा गया है । उपर्युक्त श्लोक का अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है- श्लोक २३९ में जो अशुभ, पाप और दुख ये तीन अहितकारक बतलाये गये हैं उनमें भी प्रथम अशुभ का ही त्याग करना चाहिये । कारण यह कि ऐसा होने पर शेष दोनों पाप और दुख-स्वयमेव नहीं रह सकेंगे, क्योंकि, इनका मूल कारण अशुभ ही है । इस प्रकार जब मूल कारणभूत वह अशुभ न रहेगा तब उसका साक्षात् कार्यभूत पाप स्वयमेव नष्ट हो जावेगा,और जब पाप ही न रहेगा तो उसके कार्यभूत दुख की भी कैसे सम्भावना की जा सकती है-नहीं की जा सकती है । इस प्रकार उक्त अहितकारक तीन के नष्ट हो जाने पर शेष तीन जो शुभादि हितकारक रहते हैं वे भी वास्तव में हितकारक नहीं है (देखिये आगे श्लोक २६२) । उनको जो हितकारक व अनुष्ठेय बतलाया गया है वह अतिशय अहितकारी अशुभादि की अपेक्षा ही बतलाया है । यथार्थ में तो वे भी परतन्त्रता के ही कारण हैं । भेद इतना ही है कि जहां अशुभादिक जीव को नारक एवं तिर्यंच पर्याय में प्राप्त कराकर केवल दुख का ही अनुभव कराते हैं वहां वे शुभादिक उसको मनुष्यों और देवों में उत्पन्न कराकर दुखमिश्रित सुख का अनुभव कराते हैं । इसीलिये यहां यह बतलाया है कि उन अशुभादिक तीन को छोड देने के पश्चात् शुद्धोपयोग में स्थित होकर उस शुभ को भी छोड देना चाहिये। इस प्रकार अन्त में उस शुभ के अविनाभावी पुण्य व सांसारिक सुख के भी नष्ट हो जाने पर जीव उस निर्बाध मोक्ष पद को प्राप्त कर लेता है जो कि अनन्त काल तक स्थिर रहनेवाला है ॥२४०॥

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अस्त्यात्मास्तमितादिबन्धनगतस्तद्वन्धनान्यास्रवैः
ते क्रोधादिकृताः प्रमादजनिताः क्रोधादयस्तेऽव्रतात् ।
मिथ्यात्वोपचितात्स एव समल: कालादिलब्धौ क्वचित् सम्यक्त्वव्रतदक्षताकलुषतायोगैः क्रमान्मुच्यते ॥२४१॥
अन्वयार्थ : आत्मा है और वह अनादि परम्परा से प्राप्त हुए बन्धनों में स्थित है । वे बन्धन मन,वचन एवं शरीर को शुभाशुभ क्रियाओं रूप आस्रवों से प्राप्त हुए हैं; वे आस्रव क्रोधादि कषायों से किये जाते हैं; क्रोधादि प्रमादों से उत्पन्न होते हैं, और वे प्रमाद मिथ्यात्व से पुष्ट हुई अविरति के निमित्त से होते हैं । वही कर्म-मल से सहित आत्मा किसी विशिष्ट पर्याय में कालादिलब्धि के प्राप्त होने पर क्रम से सम्यग्दर्शन, व्रत, दक्षता अर्थात् प्रमादों का अभाव, कषायों का विनाश और योगनिरोध के द्वारा उपर्युक्त बन्धनों से मुक्ति पा लेता है॥२४१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ-चार्वाक आत्मा का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते हैं । उनका अभिप्राय है कि जिस प्रकार कोयला, अग्नि, जल एवं वायु आदि के संयोग से जो प्रबल वाष्प उत्पन्न होता है वह भारी रेल गाडी आदि के भी चलाने में समर्थ होता है, उसी प्रकार पृथिवी आदि चार भूतों के संयोग से वह शक्ति उत्पन्न होती है जो शरीर को गमनागमनादि क्रियाओं एवं पदाथों के जानने-देखने आदि में सहायक होती है । उसे ही चेतना शब्द से कहा जाता है । और वह जब तक उन भूतों का संयोग रहता है तभी तक (जन्म से मरण पर्यन्त) रहती है, न कि उससे पूर्व और पश्चात् भी उनके इस मत के निराकरणार्थ यहां श्लोक में सबसे पहिले 'अस्त्यात्मा' कहकर यह प्रमाणित किया है कि आत्मा नाम से प्रसिद्ध कोई वस्तु अवश्य है । यदि आत्मा न होता तो बहुतों को जो अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो जाता है वह नहीं होना चाहिये। इसके अतिरिक्त भूत-पिशाचादिकों को भी अपने और दूसरों के पूर्वभवों को बतलाते हुए देखा जाता है। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा नाम की कोई वस्तु अवश्य है जो विवक्षित जन्म के पूर्व में भी था और मरण के पश्चात् भी रहती है। इसी प्रकार सांख्य आत्मा को स्वीकार करके भी उसे सर्वदा शुद्ध-कर्म से अलिप्त मानते हैं । उसके निराकरणार्थ यहां उस आत्मा को अनादिबन्धनगत निर्दिष्ट किया है। इसका अभिप्राय यह है कि शुद्ध स्वभाव की अपेक्षा यद्यपि प्रत्येक आत्मा कर्म से अलिप्त होकर अपने ही शुद्ध चैतन्यरूप द्रव्य में अवस्थित है। स्वभाव से एक द्रव्य का दूसरे द्रव्य के ऊपर कोई प्रभाव नहीं पडता है । जैसे- सुवर्ण में यदि तांबे का मिश्रण भी हो तो भी सुवर्णपरमाणु सुवर्णस्वरूप से और तांबे के परमाणु तत्स्वरूप से ही अपनी पृथक् पृथक् स्वतन्त्र सत्ता रखते हैं। यही कारण है जो सुनार के द्वारा उन दोनों को पृथक् कर दिया जाता है। किन्तु यह द्रव्य के उस शुद्ध स्वभाव की अपेक्षा ही सम्भव है, न कि वर्तमान अशुद्ध पर्याय की अपेक्षा भी। पर्याय की अपेक्षा तो संसारी आत्मा अनादि सन्तति स्वरूप से आनेवाले नवीन नवीन कर्मों के बन्ध से सम्बद्ध ही रहता है । और जब वह पर्याय की अपेक्षा कर्मबन्धन में बद्ध होकर अपने शुद्ध चैतन्य स्वभाव को छोडता हुआ राग-द्वेषादिरूप विभाव में परिणत होता है तब उसको अपने शुद्ध स्वभाव में स्थिर रखने के लिये प्रयत्न करना भी- तपश्चरण आदि करना भी उचित है । यदि वह द्रव्य के समान पर्याय से भी शुद्ध हो तो फिर तपश्चरणादि व्यर्थ ठहरते हैं। अतएव यही समझना चाहिये कि वह आत्मा जिस प्रकार स्वभाव से शुद्ध है उसी प्रकार पर्याय की अपेक्षा वह अशुद्ध भी है । अब जब वह पर्याय से अशुद्ध या कर्मबन्ध से सहित है तब यह प्रश्न उठता है कि कब से वह कर्मबन्धन में बद्ध है तथा किस प्रकार वह उससे छूट सकता है । इसके उत्तर में यहां यह बतलाया है कि वह अनादि से उस कर्मबन्धन में बद्ध है । उसके इस कर्मबन्ध के कारण मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग हैं । इनमें पूर्व पूर्व कारण के रहने पर उत्तर उत्तर कारण अवश्य रहते हैं। जैसे- यदि मिथ्यात्व है तो आगे के अविरति आदि चार कारण अवश्य रहेंगे, इसी प्रकार यदि अविरति है तो उसके आगे के प्रमाद आदि तीन कारण अवश्य रहेंगे। इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिये। यही बात यहां प्रकारान्तर से प्रकृत श्लोक में निर्दिष्ट की गई है। यह बन्ध की परम्परा बीज और अंकुर के समान अनादि से है- जिस प्रकार बीज से अंकुर व उससे पुनः बीज उत्पन्न होता है, इस प्रकार से जैसे इनकी परम्परा अनादि है उसी प्रकार उपर्युक्त मिथ्यात्वादि से कर्मबन्ध और फिर उससे पुनः मिथ्यात्वादि उत्पन्न होते हैं, इस प्रकार यह बन्धपरम्परा भी अनादि है। परन्तु जिस प्रकार बीज या अंकुर में से किसी एक के नष्ट हो जाने पर वह अनादि भी बीजांकुर की परम्परा नष्ट हो जाती है उसी प्रकार उन मिथ्यात्वादि के विपरीत क्रम से सम्यग्दर्शन, व्रत, दक्षता (अप्रमाद), अकलुषता (अकषाय) और अयोग अवस्था के प्राप्त हो जाने पर वह अनादि बन्धपरम्परा भी नष्ट हो जाती है। इस प्रकार से वह आत्मा मुक्तिअको प्राप्त करता ॥२४१॥

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ममेदमहमस्येति प्रीतिरीतिरिवोत्थिता।
क्षेत्रे क्षेत्रीयते यावत्तावत्काशा तपःफले ॥२४२॥
अन्वयार्थ : 'यह मेरा है और मैं इसका हूं' इस प्रकार का अनुराग जबतक ईति के समान खेत (शरीर) के विषय में उत्पन्न होकर खेत के स्वामी के समान आचरण करता है तब तक तप के फलभूत मोक्ष के विषय में भला क्या आशा की जा सकती है? नहीं की जा सकती है॥२४२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अतिवृष्टि, अनावृष्टि, शलभ (टिड्डी), चूहा, तोता, स्वचक्र और परचक्र (अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभा मूषका शुकाः । स्वचक्र परचक्र व सप्तैता ईतयः स्मृताः ॥ ) ये सात ईति मानी जाती हैं। जिस प्रकार इन ईतियों में से कोई भी ईति यदि खेत के मध्यमें उत्पन्न होती है तो वह उस खेत को (फसल को) नष्ट कर देती है। इससे वह कृषक कृषी के फल (अनाज) को नहीं प्राप्त कर पाता है। इसी प्रकार तपस्वी को यदि शरीर के विषय में अनुराग है और इसीलिये यदि वह यह समझता है कि यह शरीर मेरा है और मैं इसका स्वामी हूं तो उसका वह अनुराग ईति के समान उपद्रवकारी होकर तप के फल को- मोक्ष को- नष्ट कर देता है ॥२४२॥

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मामन्यमन्यं मां मत्वा भ्रान्तो भ्रान्तौ भवार्णवे । नान्योऽहमहमेवाहमन्योऽन्योऽहमस्ति न ॥२४३॥
अन्वयार्थ : मुझको (आत्मा को) अन्य शरीरादिरूप तथा शरीरादि को मैं (आत्मा) समझकर यह प्राणी उक्त भ्रम के कारण अबतक संसाररूप समुद्र में घूमा है । वास्तव में मैं अन्य नहीं हूं- शरीरादि नहीं हूं, मैं मैं ही हूं; और अन्य (शरीरादि) अन्य ही है, अन्य मैं नहीं हूं; इस प्रकार जब अभ्रान्त ज्ञान (विवेक) उत्पन्न होता है तब ही प्राणी उक्त संसाररूप समुद्र के परिभ्रमण से रहित होता है ॥२४३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जीव जब तक शरीर को ही आत्मा मानता है- शरीर से भिन्न शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मा को उससे पृथक् नहीं मानता है- तब तक वह इस भ्रम के कारण परपदारर्थों में राग-द्वेष करके कर्मोदय से संसार में परिभ्रमण करता हुआ दुख सहता है। और जब उसका उपर्युक्त भ्रम हट जाता है- तब वह आत्मा को आत्मा एवं शरीरादि परपदार्थों को पर मानने लगता है- तब वह राग-द्वेष से रहित होकर उक्त संसारपरिभ्रमण से छूट जाता है ॥२४३॥

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बन्धो जन्मनि येन येन निबिडं निष्पादितो वस्तुना
बाह्यार्थैकरतेः पुरा परिणतप्रज्ञात्मनः सांप्रतम् ।
तत्तत्तन्निधनाय साधनमभूद्वैराग्यकाष्ठास्पृशो
दुर्बोधं हि तदन्यदेव विदुषामप्राकृतं कौशलम् ॥२४४॥
अन्वयार्थ : संसार के भीतर बाह्य पदार्थों में अतिशय अनुराग रखने वाले जीव के पहिले जिस जिस वस्तु के द्वारा दृढ बन्ध उत्पन्न हुआ था उसी के इस समय यथार्थज्ञान से परिणत होकर वैराग्य की चरम सीमा को प्राप्त होने पर वह वह वस्तु उक्त बन्ध के विनाश का कारण हो रही है । विद्वानों की वह अलौकिक कुशलता अनुपम ही है जो दुर्बोध है- बडे कष्ट से जानी जाती है॥२४४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- बन्ध के कारण राग-द्वेष हैं । जीव के जबतक आत्म-परविवेक प्रगट नहीं होता है तबतक उसके राग-द्वेष की विषयभूत हुई परवस्तुओं के निमित्त से बन्ध ही हुआ करता है । परन्तु जब उसके वह आत्म-परविवेक आविर्भूत हो जाता है तब वह पूर्व में जिन वस्तुओं से राग-द्वेष करके दृढ कर्मबन्ध करता था वे ही, अब उसकी चूंकि उपेक्षा की विषयभूत हो जाती हैं अतएव उन्हीं के निमित्त से अब उक्त बन्ध का विनाश-संवर और निर्जरा-होने लगती है । यह ज्ञान और वैराग्य का ही माहात्म्य है ॥२४४॥

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अधिकः क्वचिदाश्लेषः क्वचिद्धीनः क्वचित्समः ।
क्वचिद्विश्लेष एवायं बन्धमोक्षक्रमो मतः ॥२४५॥
अन्वयार्थ : किसी जीवके अधिक कर्मबन्ध होता है, किसीके अल्प कर्म, बन्ध होता है,किसी के समान ही कर्मबन्ध होता है, और किसी के कर्म का बन्ध न होकर केवल उसकी निर्जरा ही होती है। यह बन्ध और मोक्षका क्रम माना गया है ॥२४५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- बन्ध और निर्जरा की हीनाधिकता परिणामों के ऊपर निर्भर है। यथा-अभव्य जीव के परिणाम चूंकि निरन्तर संक्लेशरूप रहते हैं, अतः उसके बन्ध अधिक और निर्जरा कम होती है । आसन्नभव्य के परिणाम निर्मल होने से उसके बन्ध कम और निर्जरा अधिक होती है । दूरभव्य के मध्यम जाति के परिणाम होने से उसके बन्ध और निर्जरा दोनों समानरूप में होते हैं। तथा जीवन्मुक्त अवस्था में बन्ध का अभाव होकर केवल निर्जरा ही होती है । यह बन्ध और निर्जरा का क्रम नाना जीवों की अपेक्षा से है । यदि उसका विचार एक जीव की अपेक्षा से करें तो वह इस प्रकार से किया जा सकता है मिथ्यात्व गुणस्थान में बन्ध अधिक और निर्जरा कम होती है, अविरतसम्यग्दृष्टि आदि गुणस्थानों में बन्ध कम और निर्जरा अधिक होती है, मिश्र गुणस्थान में बंध और निर्जरा दोनों समानरूप में होते हैं, तथा क्षीणकषायादि गुणस्थानों में बंध का-स्थिति व अनुभागबंध का-अभाव होकर केवल निर्जरा ही होती है । वहां जो बंध होता है वह एक मात्र साता वेदनीय का होता है, सो भी केवल प्रकृति और प्रदेशरूप ॥२४५॥

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यस्य पुण्यं च पापं च निष्फलं गलति स्वयम् ।
स योगी तस्य निर्वाणं न तस्य पुनरात्रवः ॥२४६॥
अन्वयार्थ : जिस वीतराग के पुण्य और पाप दोनों फलदान के बिना स्वयं अविपाक निर्जरा स्वरूप से निर्जीणं होते हैं वह योगी कहा जाता है और उसके कर्मों का मोक्ष होता है, किन्तु आस्रव नहीं होता है ॥२४६॥

भावार्थ :

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महातपस्तडागस्य संभृतस्य गुणाम्भसा।
मर्यादापालिबन्धेऽल्पामप्युपेक्षिष्ट मा क्षतिम् ॥२४७॥
अन्वयार्थ : हे साधो ! गुणरूप जल से परिपूर्ण महातपरूप तालाब के प्रतिज्ञारूप पालिबंध (बांध) के विषय में तू थोडी-सी भी हानि की उपेक्षा न कर॥२४७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- मुनिधर्म एक तालाब के समान है। जिस प्रकार तालाब जल से परिपूर्ण होता है उसी प्रकार वह मुनिधर्म सम्यग्दर्शनादि गुणों से परिपूर्ण होता है । यदि तालाब का बांध कहीं थोडा सा भी गिर जाता है तो उसमें फिर पानी स्थिर नहीं रह सकता है । इसीलिये बुद्धिमान् मनुष्य सावधानी के साथ उसको ठीक करा देता है । ठीक इसी प्रकार से यदि साधुधर्म में भी की गई व्रतपरिपालन की प्रतिज्ञा में कुछ त्रुटि होती है तो बुद्धिमान् साधु को उसकी उपेक्षा न करके उसे शीघ्र ही प्रायश्चित्त आदि के विधान से सुधार लेना चाहिये । अन्यथा उसके सम्यग्दर्शनादि गुण स्थिर न रह सकेंगे॥२४७॥

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दृढगुप्तिकपाटसंवृतिर्धृतिभित्तिर्मतिपादसंभृतिः ।
यतिरल्पमपि प्रपद्य रंध्रम् कुटिलैर्विक्रियते गृहाकृतिः ॥२४८॥
अन्वयार्थ : दृढ गुप्तियों (मनोगुप्ति, वचनगुप्ति, कायगुप्ति) रूप किवाडों से सहित, धैर्यरूप भित्तियों के आश्रित और बुद्धिरूप नीव से परिपूर्ण, इस प्रकार गृह के आकार को धारण करने वाला मुनिपद थोडे-से भी छिद्र को पाकर कुटिल राग-द्वेषादिरूप सर्पों के द्वारा विकृत कर दिया जाता है ॥२४८॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- मुनिपद एक प्रकार का घर है । मुनि जिन तीन गुप्तियों को धारण करते हैं वे ही इस घर के किवाड हैं, धैर्य जो है वही इस घर की भित्ति है, तथा घर जहां दृढ नीवक आश्रित होता है वहां वह मुनिपद भी बुद्धिरूप नीव के आश्रित होता है । इस प्रकार मुनिपद में घर की समानता के होने पर जिस दृढ किवाडों आदि से संयुक्त भी घर में यदि कहीं कोई छोटासा भी छिद्र रह जाता तो उसके द्वारा कुटिल सर्पादिक उसके भीतर प्रविष्ट होकर उसे भयानक बना देते हैं । इसी प्रकार उक्त घर के समान मुनिपद में भी कहीं कोई छोटा-सा भी छिद्र (दोष) रहता है तो उक्त छिद्र के द्वारा उस मुनिपद में भी उन विषैले सर्पों के समान कुटिल रागद्वेषादि प्रवेश करके उस मुनिपद को भी नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं । अतएव मोक्षाभिलाषी साधु को यदि अज्ञानता या प्रमाद से कोई दोष उत्पन्न होता है तो उसे शीघ्र ही नष्ट कर देने का प्रयत्न करना चाहिये॥२४८॥

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स्वान् दोषान् हन्तुमुद्युक्तस्तपोभिरतिदुर्धरैः ।
तानेव पोषयत्यज्ञः परदोषकथाशनैः ॥२४९॥
अन्वयार्थ : जो साधु अतिशय दुष्कर तपों के द्वारा अपने जिन दोषों के नष्ट करने में उद्यत है वह अज्ञानतावश दूसरों के दोषों के कथन (परनिन्दा) रूप भोजनों के द्वारा उन्हीं दोषोंको पुष्ट करता है ॥२४९॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- यदि कोई व्यक्ति अजीर्णादि रोगों को शांत करने के लिये औषधि तो लेता है, किंतु भोजन छोडता नहीं है- उसे वह बराबर चालू ही रखता है तो ऐसी अवस्था में जिस प्रकार वे अजीर्णादि रोग कभी शांत नहीं हो सकते हैं उसी प्रकार जो साधु रागादि दोषों को शान्त करने की इच्छा से घोर तपश्चरण तो करता किन्तु परनिन्दारूप भोजन को छोडता नहीं है; उसके वे रागादि दोष भी कभी नष्ट नहीं हो सकते हैं । कारण कि परनिन्दा करनेवाला ईर्ष्यालु मनुष्य मान कषाय के वश हो करके दूसरे में न रहने वाले दोषों को प्रगट करता है तथा जो गुण अपने में नहीं हैं उन्हे वह प्रकाशित किया करता है । इस प्रकार उसके वे राग-द्वेषादि घटने के बजाय बढते ही हैं॥२४९॥

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दोषः सर्वगुणाकरस्य महतो दैवानुरोधात्क्वचि
ज्जातो यद्यपि चन्द्रलाञ्छनसमस्तं द्रष्टुमन्धोऽप्यलम् ।
द्रष्टाप्नोति न तावतास्य पदवीमिन्दोः कलङ्कं जगद्
विश्वं पश्यति तत्प्रभाप्रकटितं किं कोऽप्यगात्तत्पदम् ॥२५०॥
अन्वयार्थ : समस्त गुणों के आधारभूत महात्मा के यदि दुर्भाग्यवश कहीं चारित्र आदि के विषय में कोई दोष उत्पन्न हो जाता है तो चन्द्रमा के लांछन के समान उसको देखने के लिये यद्यपि अन्धा (मन्दबुद्धि) भी समर्थ होता है तो भी वह दोषदर्शी इतने मात्र से कुछ उस महात्मा के स्थान को नहीं प्राप्त कर लेता है । जैसे- अपनी ही प्रभा से प्रगट किये गये चन्द्र के कलंक को समस्त संसार देखता है, परन्तु क्या कभी कोई उक्त चन्द्र की पदवी को प्राप्त हुआ है ? अर्थात कोई भी उसकी पदवी को नहीं प्राप्त हुआ है॥२५०॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जहां अनेक गुणों का समुदाय होता है वहां कभी एक आध दोष भी उत्पन्न हो सकता है। जैसे चन्द्र में आल्हादजनकत्व आदि अनेक गुण हैं, फिर भी उनके साथ उसमें एक दोष भी है जो कलंक कहा जाता है । वह दोष भी उसकी ही प्रभा (चांदनी) के द्वारा प्रगट किया जाता है, अन्यथा वह उक्त चन्द्र के पास तक न पहुंच सकने के कारण किसी की दृष्टि में ही नहीं आ सकता था। इसी प्रकार जिस साधु में अनेक गुणों के साथ यदि कोई एक आध दोष भी विद्यमान है तो वह अन्य साधारण प्राणियों की भी दृष्टि में अवश्य आ जाता है । परन्तु ऐसा होने पर भी कोई साधु उसके उस दोष को देखकर यदि अन्य जनों के समक्ष उसकी निन्दा करता है तो इससे कुछ वह उस महात्मा के समान उत्कृष्ट नहीं बन जाता है, बल्कि इसके विपरीत उसके अन्य उत्तमोत्तम गुणों के ऊपर दृष्टिपात न करके केवल दोषग्रहण के कारण वह हीन ही अधिक होता है। जैसे कि चन्द्रमा के दोष को (कलंक को) देखने वाले तो बहुत हैं, किन्तु उनमें ऐसा कोई भी नहीं है जो कि उसके समान विश्व को आल्हादित करने वाला हो सके । अभिप्राय यह है कि दूसरों के दोषों को देखने और उनका प्रचार करने से कोई भी जीव अपनी उन्नति नहीं कर सकता है । कारण कि वह आत्मोन्नति तो आत्मदोषों को देखकर उन्हें छोडने और दूसरों के प्रशस्त गुणों को देखकर उन्हें ग्रहण करने से ही हो सकती है । जैसा कि कवि वादीभसिंह ने भी कहा है- अन्यदीयमिवात्मीयमपि दोषं प्रपश्यता । कः समः खलु मुक्तोऽयं युक्तः कायेन चेदपि । अर्थात् जो जीव अन्य प्राणियों के समान अपने भी दोष को देखता है उसके समान कोई दूसरा नहीं हो सकता है । वह यद्यपि शरीर से संयुक्त है, फिर भी वह मुक्त के ही समान है ॥२५०॥

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यद्यद चरितं पूर्वं तत्तदज्ञानचेष्टितम् ।
उत्तरोतरविज्ञानाद्योगिनः प्रतिभासते ॥२५१॥
अन्वयार्थ : पूर्व में जो जो आचरण किया है- दूसरे के दोषों को और अपने गुणों को जो प्रगट किया है- वह सब योगी के लिये आगे आगे विवेकज्ञान की वृद्धि होने से अज्ञानतापूर्ण किया गया प्रतीत होता है ॥२५१॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- अभिप्राय यह है कि जबतक विवेकबुद्धि का उदय नहीं होता है तब तक ही व्यक्ति दूसरे की निन्दा और आत्मप्रशंसा आदिरूप हीन आचरण करता है। किन्तु आगे ज्यों ज्यों उसका विवेक बढता है त्यों त्यों उसे वह अपना पूर्व आचरण अज्ञानतावश किया गया स्पष्ट प्रतीत होने लगता है। इसीलिये तब वह दूसरों के दोषों पर ध्यान न देकर अपने आत्मगुणों के विकास का ही अधिकाधिक प्रयत्न करता है ॥२५१॥

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अपि सुतपसामाशावल्लीर्शिखा तरुणायते
भवति हि मनोमूले यावन्ममत्वजलार्द्रता ।
इति कृतधियः कृच्छारम्भैश्चरन्ति निरन्तरं
चिरपरिचिते देहेऽप्यस्मिन्नतीव गतस्पृहाः ॥२५२॥
अन्वयार्थ : जबतक मनरूपी जड के भीतर ममत्वरूप जल से निर्मित गीलापन रहता है तब तक महालपस्वियों की भी आशारूप बेल की शिखा जवान-सी रहती है। इसीलिये विवेकी जीव चिर काल से परिचित इस शरीर में भी अत्यन्त निःस्पृह होकर सुख-दुःख एवं जीवन-मरण आदि में समान होकर- निरन्तर कष्टकारक आरम्भों में- ग्रीष्मादि ऋतुओं के अनुसार पर्वत की शिला, वृक्षमूल एवं नदीतट आदि के ऊपर स्थित होकर किये जाने वाले ध्यानादि कार्यों में प्रवृत्त रहते हैं ॥२५२॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार वेल की जड में जबतक जल के सिंचन से गीलापन रहता है तब तक वह अपनी जवानी में रहती है- हरीभरी बनी रहती है, उसी प्रकार मन में भी जबतक ममत्वभाव रहता है तबतक बडे बडे तपस्वियों की भी आशा (विषयवांछा) तरुण रहती है- अतिशय प्रबल होती है । इसीलिये विवेकी जीव इस सत्य को जानकर अनादि काल से साथ में रहने वाले इस शरीर से भी जब अनुराग छोड देते हैं तब भला प्रत्यक्षमें भिन्न दिखनेवाले स्त्री-पुत्रादिसे उनका अनुराग कैसे रह सकता है? नहीं रह सकता। इस कारण उनकी वह आशा-लता मुरझाकर सूख जाती है ॥२५२॥

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क्षीरनीरवदभेदरूपतस्तिष्ठतोरपि च देहदेहिनोः ।
भेद एव यदि भेदवत्स्वलं बाह्यवस्तुषु वदात्र का कथा ॥२५३॥
अन्वयार्थ : जब कि दूध और पानी के समान अभेदस्वरूप से रहने वाले शरीर और शरीरधारी (आत्मा) इन दोनों में ही अत्यन्त भेद है तब भिन्न बाह्य वस्तुओं की-स्त्री,पुत्र, मित्र एवं धन-सम्पत्ति आदि की तो बात ही क्या है; बताओ। अर्थात् वे तो भिन्न हैं ही ॥२५३॥

भावार्थ :

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तप्तोऽहं देहसंयोगाज्जलं वानलसंगमात् ।
इति देहं परित्यज्य शीतीभूताः शिवैषिणः ॥२५४॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार अग्नि के संयोग से जल संतप्त होता है उसी प्रकार में शरीर के संयोग से संतप्त हुआ हूं- दुखी हुआ हूं। इसी कारण मोक्ष की अभिलाषा करने वाले भव्य जीव इस शरीर को छोड करके सुखी हुए हैं ॥२५४॥

भावार्थ :

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अनादिचयसंवृद्धो महामोहो हृदि स्थितः।
सम्यग्योगेन यैर्वान्तस्तेषामूर्ध्वम् विशुद्धयति ॥२५५॥
अन्वयार्थ : हृदय में स्थित जो महान् मोह अनादि काल से समान वृद्धि के द्वारा वृद्धि को प्राप्त हुआ है उसको जिन महापुरुषों ने समीचीन समाधि के द्वारा श्रान्त कर दिया है- नष्ट कर दिया है- उनका आगे का भव विशुद्ध होता है॥२५५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- किसी व्यक्ति के उदर में यदि बहुत काल से संचित होकर मल की वृद्धि हो जाती है तो उसका शरीर अस्वस्थ हो जाता है । ऐसी अवस्था में यदि वह बुद्धिमान् है तो योग्य औषधि के द्वारा वमन-विरेचन आदि करके उस संचित मल को नष्ट कर देता है। इससे वह स्वस्थ हो जाता है और उसका आगे का समय भी स्वस्थता के साथ आनन्दपूर्वक बीतता है । ठीक इसी प्रकार से सब संसारी जीवों के अनादि काल से महामोह की वृद्धि हो रही है। इससे वे निरन्तर दुखी रहते हैं। उनमें जो विवेकी जीव हैं वे बाह्य वस्तुओं से राग और द्वेष को छोडकर तप का आचरण करते हुए उस मोह को कम करते हैं । इस प्रकार अन्त में समीचीन ध्यान (धर्म व शुक्ल) के द्वारा उस महामोह को सर्वथा नष्ट करके वे भविष्य में अविनश्वर अनुपम सुख का अनुभव करते हैं ॥२५५॥

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एकैश्वर्यमिहैकतामभिमतावाप्तिम् शरीरच्युतिम्
दुःखं दुःकृतिनिष्कृतिम् सुखमलं संसारसौख्योज्झनम् ।
सर्वत्यागमहोत्सवव्यतिकरं प्राणव्ययं पश्यतां
किं तद्यन्न सुखाय तेन सुखिनः सत्यं सदा साधवः ॥२५६॥
अन्वयार्थ : जो साधुजन संसार में एकाकीपन को- अकेले रहने को- साम्राज्य के समान सुखप्रद समझते हैं, शरीर के नाश को इच्छित वस्तु की प्राप्ति के समान आनन्ददायक मानते हैं, दुष्ट कर्मों की निर्जरा को उससे प्राप्त होने वाले क्षणिक विषयसुख को- दुखरूप ही जानते हैं, सांसारिक सुख के परित्याग को अतिशय सुखकारक समझते हैं, तथा जो प्राणों के नाश को सब कुछ देकर किये जाने वाले महोत्सव के समान आनन्ददायक मानते हैं; उन साधु पुरुषों के लिये ऐसी कौन-सी वस्तु है जो सुखकर न प्रतीत होती हो? अर्थात् राग-द्वेष से रहित हो जाने के कारण उन्हें सब ही अनुकूल व प्रतिकूल सामग्री सुखकर ही प्रतीत होती है । इसी कारण सचमुच में वे साधु ही निरन्तर सुखी हैं ॥२५६॥

भावार्थ :

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आकृष्योग्रतपोबलैरुदयगोपुच्छं यदानीयते
तत्कर्म स्वयमागतं यदि विदः को नाम खेदस्ततः ।
यातव्यो विजिगीषुणा यदि भवेदारम्भकोऽरिः स्वयं
वृद्धिः प्रत्युत्त नेतुरप्रतिहता तद्विग्रहे कः क्षयः ॥२५७॥
अन्वयार्थ : जो विद्वान् साधु पीछे उदयमें आने योग्य कर्मस्वरूप उदयगोपुच्छ को- गाय की पूंछ के समान उत्तरोत्तर हीनता को प्राप्त होने वाले कर्मपरमाणुओं को- तीव्र तप के प्रभाव से स्थिति का अपकर्षण करके वर्तमान में उदय को प्राप्त कराता है वह कर्म यदि स्वयं ही उदय को प्राप्त हो जाता है तो इससे उस साधु को क्या खेद होनेवाला है ? कुछ भी नहीं । ठीक है- जो सुभट विजय की अभिलाषा से शत्रु के ऊपर आक्रमण करने के लिये उद्यत हो रहा है उसका वह शत्रु यदि स्वयं ही आकर युद्ध प्रारम्भ कर देता है तो इससे उस सुभट को बिना किन्हीं विघ्न-बाधाओं के अपने आप विजय प्राप्त होती है । वैसी अवस्था में उसके साथ युद्ध करने में भला उसकी क्या हानि होनेवाली है ? कुछ भी नहीं ॥२५७॥

भावार्थ :

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एकाकित्वप्रतिज्ञाः सकलमपि समुत्सृज्य सर्वसहत्वाद्
भ्रान्त्याचिन्त्याः सहायं तनुमिव सहसालोच्य किंचित्सलज्जाः ।
सज्जीभूताः स्वकार्ये तदपगमविधिम् बद्धपल्यङ्कबन्धाः
भ्यायन्ति ध्वस्तमोहा गिरिगहनगुहागुह्यगेहे नृसिंहाः ॥२५८॥
अन्वयार्थ : जिन योगियों ने सब परिषहों के सहने में समर्थ होते हुए सब ही बाह्याभ्यंतर परिग्रह को छोडकर एकाकी (असहाय) रहने की प्रतिज्ञा कर ली है, जिनके विषय में भ्रांति कुछ सोच ही नहीं सकती है अर्थात् जो सब प्रकार की भ्रांति से रहित हैं, जो शरीर जैसे सहायक की सहसा समीक्षा करके कुछ लज्जा को प्राप्त हुए हैं- अर्थात् जो वस्तुतः असहायक शरीर को अब तक सहायक समझने के कारण कुछ लज्जा का अनुभव करते हैं,तथा जो अपने कार्य में (मुक्तिप्राप्ति में) तत्पर हो चुके हैं; वे मनुष्यों में सिंह के समान पराक्रमी योगी मोह से रहित होकर पर्वत, भयानक वन और गुफा जैसे एकान्त स्थान में पल्यंक आसन से स्थित होते हुए उस शरीर के नष्ट करने के उपाय का - परमात्मा के स्वरूप या रत्नत्रय का- ध्यान करते हैं ॥२५८॥

भावार्थ :

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येषां भूषणमङगसंगतरजः स्थानं शिलायास्तलं
शय्या शर्करिला मही सुविहिता गेहं गुहा द्वीपिनाम् । आत्मात्मीयविकल्पवीतमतयस्त्रुटयत्तमोग्रन्थयः
ते नो ज्ञानधना मनांसि पुनतां मुक्तिस्पृहा निस्पृहाः ॥२५९॥
अन्वयार्थ : शरीर में लगी हुई धूलि ही जिनका भूषण है, स्थान जिनका शिला का तलभाग है, शय्या जिनकी कंकरीली भूमि है, भलीभांत रची गई (प्रकृतिसिद्ध) सिंहों की गुफा ही जिनका घर है, जो आत्मा और आत्मीयरूप विकल्पबुद्धि से-ममत्वबुद्धि से-रहित हो चुके हैं, जिनके अज्ञान की गांठ खुल चुकी हैं,तथा जो मुक्ति के सिवाय अन्य किसी बाह्य वस्तु की इच्छा नहीं रखते हैं ; ऐसे ज्ञानरूप धन के धारक वे साधु हमारे मन को पवित्र करें ॥२५९॥

भावार्थ :

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दूरारूढतपोऽनुभावजनितज्योतिःसमुत्सर्पणैर्
अन्तस्तत्त्वमदः कथं कथमपि प्राप्य प्रसादं गताः।
विश्रब्धं हारिणीविलोलनयनैरापीयमाना वने
धन्यास्ते गमयन्त्यचिन्त्यचरितैर्धीराश्चिरं वासरान् ॥२६०॥
अन्वयार्थ : जो अतिशय वृद्धिंगत तप के प्रभाव से उत्पन्न हुई ज्ञानरूप ज्योति के प्रसार से येन केन प्रकारेण (कष्टपूर्वक) इस आत्मस्वरूप को प्राप्त करके-जान करके-प्रसन्नता को प्राप्त हुए हैं तथा जो मन में हिरणियों के चंचल नेत्रों के द्वारा विश्वासपूर्वक देखे जाते हैं जिनकी शान्त मुद्रा को देखकर स्वभावतः भयभीत रहने वाली हिरणियों को किसी प्रकार का भय उत्पन्न नहीं होता है- वे ऋषि धन्य हैं। वे अपने अनुपम आचरणों के द्वारा दिनों को (समय को) धीरतापूर्वक चिर काल तक बिताते हैं ॥२६०॥

भावार्थ :

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येषां बद्धिरलक्ष्यमाणभिदयोराशात्मनोरन्तरं
गत्वोच्चैरविधाय भेदमनयोरारान्न विश्राम्यति ।
यैरन्तर्विनिवेशिताः शमधनैर्बाढम् बहिर्व्याप्तयः
तेषां नोऽत्र पवित्रयन्तु परमाः पादोस्थिताः पांसवः ॥२६१॥
अन्वयार्थ : अज्ञानी जीवों को आशा और आत्मा इन दोनों के बीच भेद नहीं दिखता है । परन्तु जिन महर्षियों की बुद्धि इन दोनों के मध्य में जाकर उनका भेद करने के बिना बीच में विश्राम को नहीं प्राप्त होती है- भेद को प्रगट करके ही विश्राम लेती है , तथा शांतिरूप अपूर्व धन को धारण करने वाले जिन महर्षियों ने बाह्य विकल्पों को आत्म स्वरूप में स्थापित कर दिया है, उनके चरणों से उत्पन्न हुई उत्कृष्ट धूलि यहां हमें पवित्र करें ॥२६१॥

भावार्थ :

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यत्प्राग्जन्मनि संचितं तनुभृता कर्माशुभं वा शुभं
तद्दैवं तदुदीरणादनुभवन् दुःखं सुखं वागतम् ।
कुर्याद्यः शुभमेव सोऽप्यभिमतो यस्तूभयोच्छित्तये सर्वारम्भपरिग्रहग्रहपरित्यागी स वन्द्यः सताम् ॥२६२॥
अन्वयार्थ : प्राणी ने पूर्वभव में जिस पाप या पुण्य कर्म का संचय किया है वह दैव कहा जाता है। उसकी उदीरणा से प्राप्त हुए दुख अथवा सुख का अनुभव करता हुआ जो बुद्धिमान् शुभ को ही करता है पापकार्यों को छोडकर केवल पुण्यकार्यों को ही करता है- वह भी अभीष्ट है-प्रशंसाके योग्य है । किन्तु जो विवेकी जीव उन दोनों (पुण्य-पाप) को ही नष्ट करने के लिये समस्त आरम्भ व परिग्रहरूप पिशाच को छोडकर शुद्धोपयोग में स्थित होता है वह तो सज्जन पुरुषों के लिये वन्दनीय (पूज्य) है ॥२६२॥

भावार्थ :

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सुखं दुःखं वा स्यादिह विहितकर्मोदयवशात्
कुतः प्रीतिस्तापः कुत इति विकल्पाद्यदि भवेत् ।
उदासीनस्तस्य प्रगलति पुराणं न हि नवं
समास्कन्दत्येष स्फुरति सुविदग्धो मणिरिव ॥२६३॥
अन्वयार्थ : संसार में पूर्वकृत कर्म के उदय से जो भी सुख अथवा दुख होता है उससे प्रीति क्यों और खेद भी क्यों, इस प्रकार के विचार से यदि जीव उदासीन होता है-राग और द्वेष से रहित होता है तो उसका पुराना कर्म तो निर्जीर्ण होता है और नवीन कर्म निश्चय से बन्ध को प्राप्त नहीं होता है । ऐसी अवस्था में यह संवर और निर्जरा से सहित जीव अतिशय निर्मल मणि के समान प्रकाशमान होता है- स्व और पर को प्रकाशित करने वाले केवलज्ञान से सुशोभित होता है ॥२६३॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- पूर्व में जिस शुभ अथवा अशुभ कर्म का बन्ध किया है उसका उदय आने पर सुख अथवा दुख प्राणी को प्राप्त होता ही है । किंतु जो अज्ञानी जीव है वह चूंकि पुण्य के फलस्वरूप सुख में तो अनुराग करता है और पाप के फलभूत दुख में द्वेष करता है, इसीलिये उसके पुनः नवीन कर्मों का बन्ध होता है । परन्तु जो जीव विवेकी है वह यह विचार करता है कि पूर्वकृत पुण्य के उदय से यह जो सुख प्राप्त हुआ है वह अस्थायी है- सदा रहने वाला नहीं है। इसलिये उसमें अनुराग करना उचित नहीं है । इसी प्रकार दुख पापकर्म के उदय से होता है । यदि पूर्व में पापकर्म का संचय किया है तो उसके फल को भोगना ही पडेगा। फिर भला उसमें खेद क्यों ? इस प्रकार के विचार से विवेकी जीव सुख और दुख में चूंकि हर्ष और विषाद से रहित होता है, अतएव उसके पुनः नवीन कर्म का बन्ध नहीं होता है । साथ ही उसके पूर्वसंचित कर्म की निर्जरा भी होती है । इस प्रकार से वह संवर एवं निर्जरा से युक्त होकर समस्त कर्मों से रहित होता हुआ मुक्त हो जाता है ॥२६३॥

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सकलविमलबोधो देहगेहे विनिर्यन्
ज्वलन इव स काष्ठं निष्ठुरं भस्मयित्वा ।
पुनरपि तदभावे प्रज्वलत्युज्ज्वलः सन्
भवति हि यतिवृत्तं सर्वथाश्चर्यभूमिः ॥२६४॥
अन्वयार्थ : सम्पूर्ण निर्मल ज्ञान (केवलज्ञान) शरीररूप गृह में प्रगट होकर जिस प्रकार लकडी में प्रगट हई अग्नि निर्दयतापूर्वक उस लकडी को भस्म करके उसके अभाव में फिर भी निर्धूम जलती रहती है उसी प्रकार वह भी शरीर को पूर्णतया नष्ट करके उसके अभाव में भी निर्मलतया प्रकाशमान रहता है। ठीक है- मुनियों का चरित्र सब प्रकार से आश्वर्यजनक है ॥२६४॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- जिस प्रकार लकडी में लगी हुई अग्नि जबतक वह लकडी शेष रहती है तबतक तो जलती ही है, किन्तु उसके पश्चात् भी- उक्त लकडी के निःशेष हो जाने पर भी- वह निर्मलता से जलती ही रहती है, उसी प्रकार शरीर में प्रगट हुआ केवलज्ञान जबतक वह शरीर रहता है तब भी- आर्हन्त्य अवस्था में भी- प्रकाशित रहता है तथा उस शरीर के नष्ट हो जाने पर सिद्धावस्था में भी वह स्पष्टतया अनन्त काल तक प्रकाशित रहता है । यह क्षीणकषाय एवं अयोगी जिनके उस यथाख्यातचारित्र का प्रभाव है जो छद्मस्थ जीवों को आश्चर्य उत्पन्न करने वाला है ॥२६४॥

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गुणी गुणमयस्तस्य नाशस्तन्नाश इष्यते।
अत एव हि निर्वाणं शून्यमन्यैर्विकल्पितम् ॥२६५॥
अन्वयार्थ : गुणवान् आत्मा गुणस्वरूप है- गुण से अभिन्न है । अतएव गुण के नाश का मानना गुणी के ही नाश का मानना है । इसीलिये अन्य वादियों ने (बौद्धों ने) आत्मा के निर्वाण को शून्य के समान कल्पित किया है तथा जैनों ने उस निर्वाण को अन्य राग-द्वेषादिरूप शुभाशुभ भावों से शून्य कल्पित किया है ॥२६५॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- नैयायिक और वैशेषिक गुण और गुणी में सर्वथा भेद को स्वीकार करते हैं। उनके मतानुसार गुणी में गुण समवाय सम्बन्ध से रहते हैं । वह समवाय नित्य, व्यापक और एक है । वे मुक्तावस्था में आत्मा के बुद्धि, सुख, दुख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और संस्कार इन नौ गुणों का नाश मानते हैं। परन्तु उपर्युक्त प्रकार से गुण और गुणी में सर्वथा भेद मानना उचित नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर आत्मा स्वरूपतः ज्ञानादि गुणों से रहित होने के कारण जड (अचेतन) सिद्ध होता है जो योग्य नहीं है । इसलिये आत्मा को उक्त ज्ञानादि गुणों से अभिन्न मानना चाहिये । और जब वह आत्मा ज्ञानादि गुणों से अभिन्न सिद्ध है तब भला मुक्तावस्था में उन ज्ञानादि गुणों का नाश स्वीकार करने से आत्मा का भी नाश क्यों न स्वीकार करना पडेगा? परन्तु वह बौद्धों के समान वैशेषिकों को इष्ट नहीं है । वैसी मुक्ति तो बौद्ध ही स्वीकार करते हैं। उनका कहना है कि जिस प्रकार तेल के समाप्त हो जाने पर विनष्ट हुआ दीपक न किसी दिशा को जाता है, न किसी विदिशा को जाता है, न पृथिवी में जाता है; और न आकाश में भी जाता है, किन्तु वह केवल शान्ति को प्राप्त होता है। उसी प्रकार मुक्ति को प्राप्त हुआ जीव भी कहीं न जाकर केवल शान्ति को- शून्यता को-प्राप्त होता है । इस प्रकार उन्होंने जीव के निर्वाण को प्रदीप के निर्वाण के समान शून्यरूप माना है। अतएव गुण और - गुणी में कथंचित् भेदाभेद को स्वीकार करना चाहिये, अन्यथा उपर्युक्त प्रकार से बौद्धमत का प्रसंग दुर्निवार होगा ॥२६५॥

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अजातोऽनश्वरोऽमूर्तः कर्ता भोक्ता सुखी बुधः।
देहमात्रो मलैर्मुक्तो गत्वोर्ध्वमचलः प्रभुः ॥२६६॥
अन्वयार्थ : आत्मा द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा जन्म से और मरण से भी रहित होकर अनादिनिधन है। वह शुद्ध स्वभाव की अपेक्षा अमूर्त होकर रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श से रहित है। वह व्यवहार की अपेक्षा शुभ व अशुभ कर्मों का कर्ता तथा निश्चय से अपने चेतन भावों का ही कर्ता है। इसी प्रकार वह व्यवहार से पूर्वकृत कर्म के फलभूत सुख व दुख का भोक्ता तथा निश्चय से वह अनन्त सुख का भोक्ता है। वह स्वभाव से सुखी और ज्ञानमय होकर व्यवहार से प्राप्त हुए हीनाधिक शरीर के प्रमाण तथा निश्चय से वह असंख्यातप्रदेशी लोक के प्रमाण है । वह जब कर्ममल से रहित होता है तब स्वभावतः ऊर्ध्वगमन करके तीनों लोकों का प्रभु होता हुआ सिद्धशिला पर स्थिर हो जाता है ॥२६६॥

भावार्थ :

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स्वाधीन्याद्दुःखमप्यासीत्सुखं यदि तपस्विनाम् ।
स्वाधीनसुखसंपन्ना न सिद्धाः सुखिनः कथम् ॥२६७॥
अन्वयार्थ : तपस्वी जो स्वाधीनतापूर्वक कायक्लेशादि के कष्ट को सहते हैं वह भी जब उनको सुखकर प्रतीत होता है तब फिर जो सिद्ध स्वाधीन सुख से सम्पन्न हैं वे सुखी कैसे न होंगे? अर्थात् अवश्य होंगे॥२६७॥

भावार्थ :
विशेषार्थ- ऊपर के श्लोक में सिद्धों को सुखी बतलाया गया है। इस पर यह शंका हो सकती थी कि सुख की साधनभूत जो सम्पत्ति आदि है वह तो सिद्धों के पास है नहीं, फिर वे सुखी कैसे हो सकते हैं ? इसके उत्तर में यहां यह बतलाया है कि पराधीनता का जो अभाव है वही वास्तव में सुख है, और वह सिद्धों के पूर्णतया विद्यमान है । सम्पत्ति आदि के संयोग से जो सुख होता है वह पराधीन है । इसलिये तदनुरूप पुण्य के उदय से जब तक उन पर पदार्थों की अनुकूलता है तभी तक वह सुख रह सकता है- इसके पश्चात् वह नष्ट ही होनेवाला है। परन्तु सिद्धों का जो स्वाधीन सुख है वह शाश्वतिक है- अविनश्वर है। देखो, साधुजन अपनी इच्छानुसार कायक्लेशादिरूप अनेक प्रकार के दुख को सहते हैं, परन्तु इसमें उन्हे दुख का अनुभव न होकर सुख का अनुभव होता है । इस प्रकार स्वाधीनता से सहा जाने वाला दुख भी जब उनको सुखस्वरूप प्रतिभासित होता है तब भला प्राप्त हुए उस स्वाधीन सुख से सिद्ध जीव क्यों न सुखी होंगे? वे तो अतिशय सुखी होंगे ही ॥२६७॥

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इति कतिपयवाचां गोचरीकृत्य कृत्यं
रचितमुचितमुच्चैश्चेतसां चितरम्यम् ।
इदमविकलमन्तः संततं चिन्तयन्तः
सपदि विपदपेतामाश्रयन्ते श्रियं ते ॥२६८॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार कुछ थोडे-से वचनों का विषय करके उनका आश्रय ले करके- जो यह योग्य कृत्य-अनुष्ठान के योग्य चार प्रकार की आराधना का स्वरूप-रचा गया है वह उदार विचार वाले मनुष्यों के चित्त को आनन्द देने वाला है । जो भव्य जीव इसका निरन्तर पूर्णरूप से चित्त में चिन्तन करते हैं वे शीघ्र ही समस्त विपत्तियों से रहित मोक्षरूप लक्ष्मी का आश्रय करते हैं ॥२६८॥

भावार्थ :

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जिनसेनाचार्यपादस्मरणाधीनचेतसाम् ।
गुणभद्र भदन्तानां कृतिरात्मानुशासनम् ॥२६९॥
अन्वयार्थ : जिन भगवान की सेनारूप साधुओं के आचार्यस्वरूप जो गणधर देव हैं उनके चरणों के स्मरण में चित्त को लगाने वाले एवं कल्याणकारी अनेक गुणों से संयुक्त ऐसे पूज्य आचार्यों की यह आत्मस्वरूप के विषय में शिक्षा देने वाली कृति (रचना) है । दूसरा अर्थ श्री जिनसेनाचार्य के चरणों के स्मरण में चित्त को अर्पित करने वाले गुणभद्राचार्य की यह आत्मानुशासन नामक कृति है- ग्रन्थरचना है ॥२६९॥ समाप्त

भावार्थ :

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ऋषभो नाभिसूनूर्यो भूयात्स भविकाय वः ।
यज्ज्ञानसरसि विश्वं सरोजमिव भासते ॥270॥
अन्वयार्थ : जिनके ज्ञानसरोवर में सकल जगत् कमलवत् भासित होता है वे नाभिराजा के पुत्र (भगवान्) ऋषभदेव तुम्हारे कल्याण के निमित्त होवें ।

भावार्थ :

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