आराधना-कथा-कोश
























- ब्र-नेमिदत्त



nikkyjain@gmail.com
Date : 19-Sep-2020


Index


गाथा / सूत्रविषयगाथा / सूत्रविषय
001) पात्रकेसरी की कथा002) भट्टाकलंकदेव की कथा
003) सनत्कुमार चक्रवर्त्ती की कथा004) समन्‍त भद्राचार्य की कथा
005) संजयन्त मुनि की कथा006) अंजन चोर की कथा
007) अनन्‍तमतीकी कथा008) उद्दायन राजा की कथा
009) रेवती रानी की कथा010) जिनेन्द्रभक्त की कथा
011) वारिषेण मुनि की कथा012) विष्णुकुमार मुनि की कथा
013) वज्रकुमार की कथा014) नागदत्त मुनि की कथा
015) शिवभूति पुरोहित की कथा016) पवित्र हृदय वाले एक बालक की कथा
017) धनदत्त राजा की कथा018) ब्रह्मदत्त की कथा
019) श्रेणिक राजा की कथा020) पद्मरथ राजा की कथा
021) पंच नमस्कारमंत्र-माहात्म्य कथा022) यम मुनि की कथा
023) दृढ़सूर्य की कथा024) यमपाल चांडाल की कथा
025) मृगसेन धीवर की कथा026) वसुराजाकीकथा
027) श्रीभूति - पुरोहित की कथा028) नीली की कथा
029) कडारपिंग की कथा030) देवरति राजा की कथा
031) गोपवती की कथा032) वीरवती की कथा
033) सुरतराजा की कथा034) विषयों में फँसे हुए संसारी जीव की कथा
035) चारूदत्त सेठ की कथा036) पाराशर मुनि की कथा
037) सात्‍यकि और रूद्र की कथा038) लौकिक ब्रह्मा की कथा
039) परिग्रह से डरे हुए दो भाइयों की कथा040) धन से डरे हुए सागरदत्त की कथा
041) धन के लोभ से भ्रम में पड़े कुबेरदत्त की कथा042) पिण्‍याकगन्‍ध की कथा
043) लुब्‍धक सेठ की कथा044) वशिष्‍ठ तापसी की कथा
045) लक्ष्‍मीमती की कथा046) पुष्‍पदत्ता की कथा
047) मरीचि की कथा048) गन्‍धमित्र की कथा
049) गन्‍धर्वसेना की कथा050) भीमराज की कथा
051) नागदत्ता की कथा052) द्वीपायन मुनि की कथा
053) शराब पीने वालों की कथा054) सगर चक्रवर्ती की कथा
055) मृगध्वज की कथा056) परशुराम की कथा
057) सुकुमाल मुनि की कथा058) सुकौशल मुनि की कथा
059) गजकुमार मुनि की कथा060) पणिक मुनि की कथा
061) भद्रबाहु मुनिराज की कथा062) बत्तीस सेठ पुत्रों की कथा
063) धर्मघोष मुनि की कथा064) श्रीदत्त मुनि की कथा
065) वृषभसेन की कथा066) कार्तिकेय मुनि की कथा
067) अभयघोष मुनि की कथा068) विद्युच्चर मुनि की कथा
069) गुरूदत्त मुनि की कथा070) चिलात-पुत्र की कथा
071) धन्य मुनि की कथा072) पाँच सौ मुनियों की कथा
073) चाणक्य की कथा074) वृषभसेन की कथा
075) शालिसिक्थ मच्छ के भावों की कथा076) सुभौम चक्रवर्ती की कथा
077) शुभ राजा की कथा078) सुदृष्टि सुनार की कथा
079) धर्मसिंह मुनि की कथा080) वृषभसेन की कथा
081) जयसेन राजा की कथा082) शकटाल मुनि की कथा
083) श्रद्धायुक्त मनुष्य की कथा084) आत्मनिन्दा करने वाली की कथा
085) आत्मनिन्दा की कथा086) सोमशर्म मुनि की कथा
087) कालाध्ययन की कथा088) अकाल में शास्त्राभ्यास करनेवाले की कथा
089) विनयी पुरूष की कथा090) अवग्रह-नियम लेनेवाले की कथा
091) अभिमान करने वाली की कथा092) निह्नव-असल बात को छुपाने वाले की कथा
093) अक्षरहीन अर्थ की कथा094) अर्थहीन वाक्य की कथा
095) व्यंजनहीन अर्थ की कथा096) सुव्रत मुनिराज की कथा
097) हरिषेण चक्रवर्ती की कथा098) हरिषेण चक्रवर्ती की कथा
099) दूसरों के गुण ग्रहण करने की कथा100) जिनाभिषेक से प्रेम करने वाले की कथा
101) भावानुराग-कथा102) प्रेमानुराग-कथा
103) दूसरों के गुण ग्रहण करने की कथा104) धर्मानुराग-कथा
105) दूसरों के गुण ग्रहण करने की कथा106) सम्यक्त्व को न छोड़ने वाले की कथा
107) सम्‍यग्‍दर्शन के प्रभाव की कथा108) रात्रिभोजन-त्‍याग-कथा
109) दान करने वालों की कथा110) औषधिदान की कथा
111) शास्त्र-दान की कथा112) अभयदान की कथा
113) करकण्डु राजा की कथा114) जिनपूजन-प्रभाव-कथा
115) कुंकुम-व्रत कथा116) जम्बूस्वामी की विनती



!! श्रीसर्वज्ञवीतरागाय नम: !!

श्री‌-ब्र. नेमिदत्त-प्रणीत

श्री
आराधना कथा कोश

ब्रह्मचारी श्री नेमिदत्त द्वारा रचित जैन धर्म पर आधारित ११६ कथाएँ

आभार : श्री उदयलालजी कासलीवाल

!! नम: श्रीसर्वज्ञवीतरागाय !!

ओंकारं बिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नम: ॥१॥

अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकलभूतलकलंका
मुनिभिरूपासिततीर्था सरस्वती हरतु नो दुरितान् ॥२॥

अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नम: ॥३॥

॥ श्रीपरमगुरुवे नम:, परम्पराचार्यगुरुवे नम: ॥

सकलकलुषविध्वंसकं, श्रेयसां परिवर्धकं, धर्मसम्बन्धकं, भव्यजीवमन: प्रतिबोधकारकं, पुण्यप्रकाशकं, पापप्रणाशकमिदं शास्त्रं श्री-आराधना-कथा-कोश नामधेयं, अस्य मूल-ग्रन्थकर्तार: श्री-सर्वज्ञ-देवास्तदुत्तर-ग्रन्थ-कर्तार: श्री-गणधर-देवा: प्रति-गणधर-देवास्तेषां वचनानुसार-मासाद्य आचार्य श्री-ब्र. नेमिदत्त विरचितं ॥



॥ श्रोतार: सावधान-तया शृणवन्तु ॥

मंगलं भगवान् वीरो मंगलं गौतमो गणी
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्‌ ॥
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारकं
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम्‌ ॥



+ पात्रकेसरी की कथा -
पात्रकेसरी की कथा
पात्रकेसरी आचार्य ने सम्‍यग्‍दर्शन का उद्योत किया था । उनका चरित मैं लिखता हूँ, वह सम्‍यग्‍दर्शन की प्राप्ति का कारण है ।

भगवान् के पंचकल्‍याणों से पवित्र और सब जीवों को सुख के देने वाले इस भारत वर्ष में एक मगध नामका देश है । वह संसार के श्रेष्‍ठ वैभव का स्‍थान है । उसके अन्‍तर्गत एक अहिछत्र नामका सुन्‍दर शहर है । उसकी सुन्‍दरता संसार को चकित करने वाली है ।

नगर वासियों के पुण्‍य से उसका अवनिपाल नाम का राजा बड़ागुणी था, सब राजविद्याओं का पंडित था । अपने राज्‍य का पालन वह अच्‍छी नीति के साथ करता था । उसके पास पाँच सौ अच्‍छे विद्वान् ब्राह्मण थे । वे वेद और वेदांग के जानकार थे । राजकार्य में वे अवनिपालको अच्‍छी सहायता देते थे । उनमें एक अवगुण था, वह यह कि उन्‍हें अपने कुल का बड़ाघमण्‍ड था । उससे वे सबको नीची दृष्टि से देखा करते थे । वे प्रातः काल और सायंकाल नियम पूर्वक अपना सन्‍ध्‍यावन्‍दनादि नित्‍यकर्म करते थे । उनमें एक विशेष बात थी, वह यह कि वे जब राजकार्य करने को राज सभा में जाते, तब उसके पहले कौतूहल से पार्श्‍वनाथ जिनालय में श्री पार्श्‍वनाथ की पवित्र प्रतिमा का दर्शन कर जाया करते थे ।

एक दिन की बात है वे जब अपना सन्‍ध्‍यावन्‍दनादि नित्‍यकर्म करके जिन मन्दिर में आये तब उन्‍होंने एक चारित्र भूषण नाम के मुनिराज की भगवान् के सम्‍मुख देवागम नाम का स्‍तोत्र का पाठ करते देखा । उन सब में प्रधान पात्रकेसरी ने मुनि से पूछा, क्‍या आप इस स्‍तोत्र का अर्थ भी जानते हैं ? सुनकर मुनि बोले—मैं इसका अर्थ नहीं जानता । पात्रकेसरी फिर बोले-साधुराज, इस स्तोत्र को फिर तो एक बार पढ़ जाइये । मुनिराज ने पात्रकेसरी कहे अनुसार धीरे-धीरे और पदान्‍त में विश्राम पूर्वक फिर देवागम को पढ़ा , उसे सुनकर लोगों का चित्त बड़ाप्रसन्‍न होता था ।

पात्रकेसरी की धारणा शक्ति बड़ी विलक्षण थी । उन्‍हें एक बार के सुनने से ही सब का सब याद हो जाता था । देवागम को भी सुनते ही उन्‍होंने याद कर लिया । अब वे उसका अर्थ विचारने लगे । उस समय दर्शनमोहनीयकर्म के क्षयोपशम से उन्‍हें यह निश्‍चय हो गया कि जिन भगवान् ने जो जीवा- जीवादिक पदार्थों का स्‍वरूप कहा है, वही सत्‍य है और सत्‍य नहीं है । इसके बाद वे घर पर जाकर वस्‍तु का स्वरूप विचारने लगे । सब दिन उनका उसी तत्‍वविचार में बीता । रात को भी उनका यही हाल रहा । उन्‍होंने विचार किया—जैन धर्म में जीवादिक पदार्थों को प्रमेय-जानने योग्‍य माना है और तत्‍वज्ञान-सम्‍यज्ञान को प्रमाण माना है । पर क्‍या आश्‍चर्य है कि अनुमान प्रमाण का लक्षण कहा ही नहीं गया । यह क्‍यों ? जैन धर्म के पदार्थों में उन्‍हें कुछ सन्‍देह हुआ, उससे उनका चित्त व्‍यग्र हो उठा । इतने ही में पद्मावती देवी का आसन कम्‍पायमान हुआ । वह उसी समय वहाँ आई और पात्रकेसरी से उसने कहा-आपको जैन धर्म के पदार्थों में कुछ सन्‍देह हुआ है, पर इसकी आप चिन्‍ता न करें । आप प्रातःकाल जब जिनभगवान् के दर्शन करने को जायँगे तब आपका सब सन्‍देह मिटकर आपको अनुमान प्रमाण का निश्‍चय हो जायगा । पात्रकेसरी से इस प्रकार कहकर पद्मावती जिन मंदिर गई और वहाँ पार्श्‍वजिन की प्रतिमा के फण पर एक श्‍लोक लिखकर वह अपने स्‍थान पर चली गई । वह श्‍लोक यह था --
((अन्‍यथानुपपन्नत्वं यत्र तत्र त्रयेण किम् ।
नान्‍यथानुपपन्‍नत्‍वं यत्र तत्र त्रयेण किम् ।।)
)

अर्थात्-जहाँपर अन्‍यथानुपपत्ति है, वहाँ हेतु के दूसरे तीन रूप मानने से क्‍या प्रयोजन है ? तथा जहाँपर अन्‍यथानुप‍पत्ति नहीं है, वहाँ हेतु के तीन रूप मानने से भी क्‍या फल है । भावार्थ—साध्‍य के अभाव में न मिलने वाले को ही अन्‍यथानुपपन्‍न कहते हैं । इसलिये अन्‍यथानुपपत्ति हेतु का असाधारण रूप है । किन्‍तु बौद्ध इसको न मानकर हेतु के १- पक्षेसत्‍व, २- सपक्षेसत्‍व, ३- विपक्षाद्वयावृत्ति ये तीन रूप मानता है, सो ठीक नहीं हैं । क्योंकि कहीं-कहीं पर त्रैरूप्‍य के न होने पर भी अन्‍यथानुपपत्ति के बल से हेतु सद्धेतु होता है । और कहीं-कहीं पर त्रैरूप्‍य के होने पर भी अन्‍यथानुपपत्ति के न होने से हेतु सद्धेतु नहीं होता । जैसे एक मुहूर्त के अनन्‍तर शकटका उदय होगा, क्‍योंकि अभी कृतिका का उदय है। और यहाँ पर पक्षेसत्‍व न होने पर भी अन्‍यथानुपपत्ति के बल से हेतु सद्धेतु होता है । और ‘गर्भस्‍थ पुत्र श्‍याम होगा, क्‍योंकि यह मित्र का पुत्र है । यहाँ पर त्रैरूप्‍य के रहने पर भी अन्‍यथानुपपत्ति के न होने से हेतु सद्धेतु नहीं होता ।'

पात्रकेसरी ने जब पद्मावती को देखा तब ही उनकी श्रद्धा जैन धर्म में खूब दृढ़ हो गई थी, जो कि सुख देने वाली और संसार के परिवर्तन का नाश करने वाली है । पश्‍चात् जब वे प्रात: काल जैन मंदिर गये और श्री पार्श्‍वनाथ की प्रतिमा पर उन्‍हें अनुमान प्रमाण का लक्षण लिखा हुआ मिला तब तो उनके आनन्‍द का कुछ पार नहीं रहा । उसे देखकर उनका सब सन्‍देह दूर हो गया । जैसे सूर्योदय होने पर अन्‍धकार नष्‍ट हो जाता है ।

इसके बाद ब्राह्मण-प्रधान, पुण्‍यात्‍मा और जिन धर्म के परम श्रद्धालु पात्रकेसरी ने बड़ी प्रसन्‍नता के साथ अपने हृदय में निश्‍चय कर लिया कि जिनभगवान् ही निर्दोष और संसाररूपी समुद्र से पार करने वाले देव हो सकते है और जिन धर्म ही दोनों लोक में सुख देने वाला धर्म हो सकता है । इस प्रकार दर्शनमोहनी कर्म के क्षयोपशम से उन्‍हें सम्‍यक्‍त्‍वरूपी परम रत्‍न की प्राप्ति हो गई-उससे उनका मन बहुत प्रसन्‍न रहने लगा ।

अब उन्‍हें निरन्‍तर जिनधर्म के तत्‍वों की मीमांसाके सिवा कुछ सूझने ही न लगा-वे उनके विचार में मग्‍न रहने लगे । उनकी यह हालत देखकर उनसे उन ब्राह्मणों ने पूछा—आज कल हम देखते हैं कि आपने मीमांसा, गीतमन्‍याय, वेदान्‍त आदिका पठन-पाठन बिलकुल ही छोड दिया है और उनकी जगह जिनधर्म के तत्‍वों का ही आप विचार किया करते हैं, यह क्‍यों ? सुनकर पात्रकेसरी ने उत्‍तर दिया-आप लोगों को अपने वेदों का अभिमान है, उन पर ही आपका विश्‍वास है, इसलिये आपकी दृष्टि सत्‍य बात की ओर नहीं जाती । पर मेरा विश्‍वास आपसे उल्‍टा है, मुझे वेदों पर विश्‍वास न होकर जैन धर्म पर विश्‍वास है, वही मुझे संसार में सर्वोत्‍तम धर्म दिखता है । मैं आप लोगों से भी आग्रह पूर्वक कहता हूँ, कि आप विद्वान हैं, सच झूठ की परीक्षा कर सकते हैं, इसलिये जो मिथ्‍या हो, झूठा हो, उसे छोडकर सत्‍य को ग्रहण कीजिये और ऐसा सत्‍य धर्म एक जिनधर्म ही है, इसलिये वह ग्रहण करने योग्‍य है ।

पात्रकेसरी के इस उत्‍तर से उन ब्राह्मणों को सन्‍तोष नहीं हुआ । वे इसके विपरीत उनसे शास्‍त्रार्थ करने को तैयार हो गये । राजा के पास जाकर उन्‍होंने पात्रकेसरी के साथ शास्‍त्रार्थ करने की प्रार्थना की । राजाज्ञा के अनुसार पात्रकेसरी राजसभा में बुलवाये गये । उनका शास्‍त्रार्थ हुआ । उन्‍होंने वहाँ सब ब्राह्मणों को पराजित कर संसारपूज्‍य और प्रजा को सुख देने वाले जिनधर्म का खूब प्रभाव प्रगट किया और सम्‍यग्‍दर्शन की महिमा प्रकाशित की ।

उन्‍होंने एक जिनस्‍तोत्र बनाया, उसमें जिनधर्म के तत्‍वों का विवेचन और अन्‍यमतों के तत्‍वों का बड़े पाण्डित्‍य के साथ खण्‍डन किया गया है । उसका पठन-पाठन सबके लिये सुखका कारण है । पात्रकेसरी के श्रेष्‍ठ गुणों और अच्‍छे विद्वानों द्वारा उनका आदर सम्‍मान देखकर अवनिपाल राजा ने तथा उन ब्राह्मणों ने मिथ्‍यामत को छोड़कर शुभ भावों के साथ जैनमत को ग्रहण कर लिया ।

इस प्रकार पात्रकेसरी के उपदेश से संसार समुद्र से पार करने वाले सम्‍यग्दर्शन को और स्‍वर्ग तथा मोक्ष के देने वाले पवित्र जिनधर्म को स्‍वीकार कर अवनिपाल आदि ने पात्रकेसरी की बड़ी श्रद्धा के साथ प्रशंसा की कि द्विजोत्तम, तुमने जैन धर्म को बड़े पाण्डित्‍य के साथ खोज निकाला है, तुम्‍हीं ने जिन भगवान् के उपदेशित तत्‍वों के मर्मको अच्‍छी तरह समझा है, तुम ही जिन भगवान् के चरण कमलों की सेवा करने वाले सच्‍चे भ्रमर हो, तुम्‍हारी जितनी स्‍तुति की जाय थोड़ी है । इस प्रकार पात्रकेसरी के गुणों और पाण्डित्‍य की हृदय से प्रशंसा करके उन सबने उनका बड़ा आदर सम्‍मान किया ।

जिस प्रकार पात्रकेसरी ने सुख के कारण, परम पवित्र सम्‍यग्‍दर्शन का उद्योतकर उसका संसार में प्रकाश कर राजाओं के द्वारा सम्‍मान प्राप्‍त किया उसी प्रकार और भी जो जिनधर्म का श्रद्धानी होकर भक्ति पूर्वक सम्‍यग्‍दर्शन का उद्योत करेगा वह भी यशस्‍वी बनकर अंत में स्‍वर्ग या मोक्ष का पात्र होगा ।

कुन्‍दपुष्‍प, चन्‍द्र आदि के समान निर्मल और कीर्तियुक्‍त श्री कुन्‍दकुन्‍दाचार्य की आम्‍नाय में श्री मल्लिभूषण भट्टारक हुए । श्रुतसागर उनके गुरूभाई हैं । उन्‍हीं की आज्ञा से मैंने यह कथा श्री सिंहनन्‍दी मुनि के पास रहकर बनाई है । यह इसलिये कि इसके द्वारा मुझे सम्‍यक्त्‍वरत्‍न की प्राप्ति हो ।


+ भट्टाकलंकदेव की कथा -
भट्टाकलंकदेव की कथा
मैं जीवों को सुख के देने वाले जिन भगवान् को नमस्‍कार कर, इस अध्‍याय में भट्टाकलंक देव की कथा लिखता हूँ जो कि सम्‍यग्‍ज्ञानका उद्योत करने वाली है ।

भारत वर्ष में एक मान्‍यखेट नाम का नगर था । उसके राजा थे शुभतुंग और उनके मंत्री का नाम पुरूषोत्‍तम था । पुरूषोत्तम की गृहिणी पद्मावती थी । उसके दो पुत्र हुए । उनके नाम थे अकलंक और निकलंक। वे दोनों भाई बड़े बुद्धिमान-गुणी थे ।

एक दिन की बात है कि अष्‍टाह्निका पर्व की अष्‍टमी के दिन पुरूषोत्‍तम और उसकी गृहिणी बड़ी विभूति के साथ चित्रगुप्‍त मुनिराज की वन्‍दना करने को गई । साथ में दोनों भाई भी गये । मुनिराज की वन्‍दना कर इनके माता-पिता ने आठ दिन के लिये ब्रह्मचर्य लिया और साथ ही विनोदवश अपने दोनों पुत्रों को भी उन्‍होंने ब्रह्मचर्य दे दिया ।

कुछ दिनों के बाद पुरूषोत्‍तम ने अपने पुत्रों के ब्याह की आयोजना की । यह देख दोनों भाइयों ने मिलकर पिता से कहा—पिता जी ! इतना भारी आयोजन, इतना परिश्रम आप किस लिये कर रहे हैं ? अपने पुत्रों की भोली बात सुनकर पुरूषोत्‍तम ने कहा-यह सब आयोजन तुम्‍हारे ब्‍याह के लिये है । पिता का उत्‍तर सुनकर दोनों भाईयों ने फिर कहा—पिता जी । अब हमारा ब्याह कैसा ? आपने तो हमें ब्रह्मचर्य दे दिया था न ? पिता ने कहा नहीं, वह तो केवल विनोद से दिया गया था । उन बुद्धिमान् भाइयों ने कहा—पिता जी ! धर्म और व्रत में विनोद कैसा ? यह हमारी समझ में नहीं आया । अच्‍छा आपने विनोद ही से दिया सही, तो अब उसके पालन करने में भी हमें लज्‍जा कैसी ? पुरूषोत्‍तम ने फिर कहा—अस्‍तु ! जैसा तुम कहते हो वही सही, पर तब तो केवल आठ ही दिन के लिये ब्रह्मचर्य दिया था न ? दोनों भाइयों ने कहा-पिता जी, हमें आठ दिन के लिये ब्रह्मचर्य दिया गया था, इसका न तो आपने हमसे खुलासा कहा था और न आचार्य महाराज ने ही । तब हम कैसे समझें कि वह व्रत आठ ही दिन के लिये था । इसलिये हम तो अब उसका आजन्‍म पालन करेंगे, ऐसी हमारी दृढ़ प्रतिज्ञा है । हम अब विवाह नहीं करेंगे । यह कहकर दोनों भाइयों ने घर का सब कारोबार छोड़कर और अपना चित्‍त शास्‍त्राभ्‍यासकी की ओर लगाया । थोड़े ही दिनों में ये अच्‍छे विद्वान् बन गये । इनके समय में बौद्धधर्म का बहुत जोर था । इसलिये इन्‍हें उसके तत्‍व जानने की इच्‍छा हुई । उस समय मान्‍यखेट में ऐसा कोई बौद्ध विद्वान् नहीं था, जिससे ये बौद्धधर्म का अभ्‍यास करते । इसलिये ये एक अज्ञ विद्यार्थी का वेश बनाकर महाबोधि नामक स्‍थान बौद्धधर्माचार्य के पास गये । आचार्य ने इनकी अच्‍छी तरह परीक्षा करके कि कहीं ये छली तो नहीं हैं, और जब उन्‍हें इनकी ओर से विश्‍वास हो गया तब वे और और शिष्‍यों के साथ-साथ इन्‍हें भी पढ़ाने लगे । ये भी अन्‍तरंग में तो पक्‍के जिनधर्मी और बाहिर एक महामूर्ख बनकर स्‍वर व्‍यंजन सीखने लगे । निरन्‍तर बौद्धधर्म सुनते रहने से अकलंक देव की बुद्धि बड़ी विलक्षण हो गयी उन्हें एक ही बार के सुनने से कठिन से कठिन बात भी याद हो जाने लगी और निकलंक को दो बार सुनने से । अर्थात् अकलंक एक संस्‍थ और निकलंक दो संस्‍थ हो गये । इस प्रकार वहाँ रहते दोनों भाइयों को बहुत समय बीत गया ।

एक दिन की बात है बौद्धगुरू अपने शिष्‍यों को पढ़ा रहे थे । उस समय प्रकरण था जैनधर्म के सप्‍तभंगी सिद्धान्‍त का । वहाँ कोई ऐसा अशुद्ध पाठ आ गया जो बौद्धगुरू की समझ में न आया, तब वे अपने व्‍याख्‍यान को वहीं समाप्‍त कर कुछ समय के लिये बाहर चले आये । अकलंक बुद्धिमान् थे, वे बौद्धगुरू के भाव समझ गये, इसलिये उन्‍होंने बड़ी बुद्धिमानी के साथ उस पाठ को शुद्ध कर दिया और उसकी खबर किसी को न होने दी । इतने में पीछे बौद्धगुरू आये । उन्‍होंने अपना व्‍याख्‍यान आरम्‍भ किया । जो पाठ अशुद्ध था, वह अब देखते ही उनकी समझ में आ गया । यह देख उन्‍हें सन्‍देह हुआ कि अवश्‍य इस जगह कोई जिनधर्म रूप समुद्र का बढ़ाने वाला चन्‍द्रमा है और वह हमारे धर्म के नष्‍ट करने की इच्‍छा से बौद्ध वेष धारणकर बौद्धशास्‍त्र का अभ्‍यास कर रहा है । उसका जल्‍दी ही पता लगाकर उसे मरवा डालना चाहिये । इस विचार के साथ ही बौद्धगुरू ने सब विद्यार्थियों को शपथ, प्रतिज्ञा आदि देकर पूछा, पर जैनधर्मी का पता उन्‍हें नहीं लगा । इसके बाद उन्‍होंने जिन प्रतिमा मंगवाकर उसे लाँघ जाने के लिये सबको कहा। सब विद्यार्थी तो लाँघ गये, अब अकलंक की बारी आई, उन्‍होंने अपने कपड़े में से एक सूतका सूक्ष्म धागा निकालकर उसे प्रतिमा पर डाल दिया और उसे परिग्रही समझकर वे झटसे लाँघ गये । यह कार्य इतनी जल्‍दी किया गया कि किसी की समझ में न आया । बौद्ध गुरू इस युक्ति में भी जब कृतकार्य नहीं हुए तब उन्‍होंने एक और नई युक्ति की । उन्‍होंने बहुत से काँसों के बर्तन इकट्ठे करवाये और उन्‍हें एक बड़ी भारी गौन में भरकर वह बहुत गुप्‍त रीति से विद्यार्थियों के सोने की जगह के पास रखवा दी और विद्यार्थियों की देख रेख के लिये अपना एक-एक गुप्‍तचर रख दिया ।

आधी रात का समय था । सब विद्यार्थी निडर होकर निद्रादेवी की गोद में सुख का अनुभव कर रहे थे । किसी को कुछ मालूम न था कि हमारे लिये क्‍या-क्‍या षड्यन्‍त्र रचे जा रहे हैं । एकाएक बड़ा विकराल शब्‍द हुआ । मानों आसमान से बिजली टूटकर पड़ी । सब विद्यार्थी उस भयंकर आवाज से कांप उठे । वे अपना जीवन बहुत थोड़े समय के लिये समझकर अपने उपास्‍य परमात्‍मा का स्‍मरण कर उठे । अकलंक ओर निकलंक भी पंच नमस्‍कार मंत्र का ध्‍यान करने लग गये । पास ही बौद्धगुरू का जासूस खड़ा हुआ था । वह उन्‍हें बुद्ध भगवान् का स्‍मरण करने की जगह जिन भगवान् स्‍मरण करते देखकर बौद्धगुरू के पास ले गया और गुरू से उसने प्रार्थना की । प्रभो ! आज्ञा कीजिये कि इन दोनों धूर्तों का क्‍या किया जाये ? ये ही जैनी हैं । सुनकर वह दुष्‍ट बौद्धगुरू बोला—इस समय रात थोड़ी बीती है, इसलिये इन्‍हें ले जाकर कैदखाने में बन्‍द कर दो, जब आधी’रात हो जाये तब इन्‍हें मार डालना । गुप्‍तचर ने दोनों भाइयों को ले जाकर कैदखाने में बंद कर दिया ।

अपने पर एक महाविपत्ति आर्इ देखकर निकलंक ने बड़े भाई से कहा—भैया ! हम लोगों ने इतना कष्‍ट उठाकर तो विद्या प्राप्‍त की, पर कष्ट है कि उसके द्वारा हम कुछ भी जिनधर्म की सेवा न कर सके और एकाएक हमें मृत्‍यु का सामना करना पड़ा । भाई की दु:ख भरी बात सुनकर महा धीरवीर अकलंक ने कहा—प्रिय ! तुम बुद्धिमान् हो, तुम्‍हें भय करना उचित नहीं । घबराओ मत । अब भी हम अपने जीवन की रक्षा कर सकेंगे । देखो मेरे पास यह छत्री है, इसके द्वारा अपने को छुपा कर हम लोग यहाँ से निकल चलते है और शीघ्र ही अपने स्‍थान पर जा पहुँचते है | यह विचार कर वे दोनों भाई दबे पाँव निकल गये और जल्‍दी-जल्‍दी रास्‍ता तय करने लगे ।

इधर जब आधी रात बीत चुकी और बौद्धगुरू को आज्ञानुसार उन दोनों भाइयों के मारने का समय आया' तब उन्‍हें पकड़ लाने के लिये नौकर लोग दौडे़ गये, पर वे कैदखाने में जाकर देखते हैं तो वहाँ उनका पता नहीं । उन्‍हें उनके एकाएक गायब हो जाने से बड़ा आश्‍चर्य हुआ । पर कर क्‍या सकते थे । उन्‍हें उनके कहीं आस-पास हो छुपे रहने का सन्‍देह हुआ । उन्‍होंने आस-पास के वन, जंगल, खंडहर, बावड़ी कुएँ, पहाड़ गुफायें आदि सब एक-एक करके ढूँढ़ डाले, पर उनका कहीं पता न चला । उन पापियों को तब भी सन्‍तोष न हुआ सो उनके मारने की इच्‍छा से अश्‍व द्वारा उन्‍होंने यात्रा की । उनकी दयारूपी बेल क्रोधरूपी दावाग्नि से खूब ही झुलस गई थी, इसीलिये उन्‍हें ऐसा करने को बाध्‍य होना पड़ा दोनों भाई भागते जाते थे और पीछे फिर-फिर कर देखते जाते थे, कि कहीं किसी ने हमारा पीछा तो नहीं किया है । पर उनका सन्‍देह ठीक निकला । निकलंक ने दूर तक देखा तो उसे आकाश में धूल उठती हुई देख पड़ी । उसने बड़े भाई से कहा—भैया ! हम लोग जितना कुछ करते हैं, वह सब निष्‍फल जाता है । जान पड़ता है दैव ने अपने से पूर्ण शत्रुता बाँधी है । खेद है परम पवित्र जिनशासन की हम लोग कुछ भी सेवा न कर सके और मृत्‍यु ने बीच ही में आकर धर दबाया । भैया ! देखो, तो पापी लोग हमें मारने के लिये पीछा किये चले आ रहे हैं । अब रक्षा होना असंभव है । हां मुझे एक उपाय सूझ पड़ा है उसे आप करेंगे तो जैनधर्म का बड़ा उपकार होगा। आप बुद्धिमान हैं, एक संस्‍थ हैं । आपके द्वारा जैनधर्म का खूब प्रकाश होगा । देखते हैं-वह सरोवर है । उसमें बहुत से कमल हैं । आप जल्‍दी जाइये और तालाब में उतरकर कमलों में अपने को छुपा लीजिये । जाइये, जल्‍दी कीजिये' देरी का काम नहीं है । शत्रु पास पहुँचे आ रहे हैं । आप मेरी चिन्‍ता न कीजिये । मैं भी जहाँ तक बन पड़ेगा, जीवन की रक्षा करूंगा । और यदि मुझे अपना जीवन दे देना भी पड़े तो मुझे उसकी कुछ परवाह नहीं, जब कि मेरे प्‍यारे भाई जीते रहकर पवित्र जिन-शासन की भरपूर सेवा करेंगे । आप जाइये, मैं भी अब यहाँ से भागता हूँ ।

अकलंक की आँखो से आँसुओं की धार बह चली । उनका गला भ्रातृ-प्रेम से भर आया । वे भाई से एक अक्षर भी न कह पाये कि निकलंक वहाँ-से भाग खड़ा हुआ । लाचार होकर अकलंक को अपने जीवन की नहीं, पवित्र जिन शासन की रक्षा के लिये कमलों में छुपना पड़ा उनके लिये कमलों का आश्रय केवल दिखाऊ था । वास्‍तव में तो उन्‍होंने जिसके बराबर संसार में कोई आश्रय नहीं हो सकता, उस जिनशासन का आश्रय लिया था ।

निकलंक भाई से विदा हो जी छोड़कर भागा जा रहा था । रास्‍ते में उसे एक धोबी कपड़े धोते हुये मिला । धोबी ने आकाश में धूल की घटा छाई हुई देखकर निकलंक से पूछा, यह क्‍या हो रहा है ? और तुम ऐसे जी छोडकर क्‍यों भागे जा रहे हो ? निकलंक ने कहा-पीछे शत्रुओं की सेना आ रही है । उन्‍हें जो मिलता है उसे ही वह मार डालती है । इसीलिये मैं भागा जा रहा हूँ । ऐसा सुनते ही धोबी भी कपड़े बगैरह सब वैसे ही छोडकर निकलंक के साथ भाग खड़ा हुआ । वे दोनों बहुत भागे, पर आखिर कहाँ तक भाग सकते थे ? सवारों ने उन्‍हें धर पकडा और उसी समय अपनी चमचमाती हुई तलवार से दोनों का शिर काटकर वे अपने मालिक के पास ले गये । सच हैं पवित्र जिनधर्म अहिंसा धर्म से रहित मिथ्‍यात्‍वको अपनाये हुए पापी लोगों के लिए ऐसा कौन महापाप बाकी रह जाता है, जिसे वे नहीं करते । जिनके हृदय में जीव मात्र को सुख पहुँचाने वाले जिनधर्म का लेश भी नहीं है, उन्‍हें दूसरों पर दया आ भी कैसे सकती है ?

उधर शत्रु अपना कामकर वापिस लौटे और इधर अकलंक अपने को निर्विघ्‍न समझ सरोवर से निकले और निडर होकर आगे बढ़े । वहाँ से चलते-चलते वे कुछ दिनों बाद कलिंग देशान्‍तर्गत रत्‍नसंचयपुर नामक शहर में पहुँचे । इसके बाद का हाल हम नीचे लिखते हैं ।

उस समय रत्‍नसंचयपुर के राजा हिमशीतला थे । उनकी रानी का नाम मदनसुन्‍दरी था । वह जिन भगवान् की बड़ी भक्‍त थी । उसने स्‍वर्ग और मोक्ष सुख के देने वाले पवित्र जिनधर्म की प्रभावना के लिये अपने बनवाये हुये जिन मंदिर में फाल्‍गुन शुक्‍ल अष्‍टमी के दिन से रथयात्रोत्‍सव का आरम्‍भ करवाया था । उसमें उसने बहुत द्रव्‍य व्‍यय किया था ।

वहाँ संधश्री नामक बौद्धों का प्रधान रहता था । उसे महारानी का कार्य सहन नहीं हुआ । उसने महाराज से कहकर रथयात्रोत्‍सव अटका दिया और साथ ही वहाँ जिनधर्म का प्रचार न देखकर शास्‍त्रार्थ के लिये घोषणा भी करवा दी । महाराज शुभतुंगने अपनी महारानी से कहा—प्रिये, जब तक कोई जैन विद्वान् बौद्धगुरू के साथ शास्‍त्रार्थ करके जिनधर्म का प्रभाव न फैलावेगा तब तक तुम्‍हारा उत्‍सव होना कठिन है । महाराज की बातें सुनकर रानी को बड़ाखेद हुआ । पर वह कर ही क्‍या सकती थी । उस समय कौन उसकी आशा पूरीकर सकता था । वह उसी समय जिनमंदिर गई और वहाँ मुनियों को नमस्‍कार कर उनसे बोली—प्रभो, बौद्धगुरू ने मेरा रथयात्रोत्‍सव रूकवा दिया है । वह कहता है कि पहले मुझसे शास्‍त्रार्थ करके विजय प्राप्‍त कर लो, फिर रथोत्‍सव करना । बिना ऐसा किये उत्‍सव न हो सकेगा । इसलिये मैं आपके पास आई हूँ । बतलाइए जैनदर्शन का अच्‍छा विद्वान कौन है, जो बौद्धगुरू को जीतकर मेरी इच्‍छा पूरी करे ? सुनकर मुनि बोले-इधर आसपास तो ऐसा विद्वान अवश्‍य हैं । उनके बुलवाने का आप प्रयत्‍न करें तो सफलता प्राप्‍त हो सकती है । रानी ने कहा-वाह, आपने बहुत ठीक कहा, सर्प तो शिर के पास फुंकार कर रहा है और कहते हैं कि गारूड़ी दूर है । भला, इससे क्‍या सिद्धि हो सकती है ? अस्‍तु । जान पड़ा कि आप लोग इस विपत्तिका सद्य: प्रतिकार नहीं कर सकते । दैवको जिनधर्म पतन कराना ही इष्‍ट मालूम देता है। जब मेरे पवित्र धर्म की दुर्दशा होगी तब मैं ही जीकर क्‍या करूँगी ? यह कहकर महारानी राजमहल से अपना सम्‍बन्‍ध छोड़कर जिनमंदिर गई और उसने यह दृढ़ प्रतिज्ञा की—“जब संघश्रीका मिथ्‍याभिमान चूर्ण होकर मेरा रथोत्‍सव बड़े ठाठबाट के साथ निकलेगा और जिनधर्म का खूब प्रभावना होगी, तब ही मैं भोजन करूँगी, नहीं तो वैसे ही निराहार रहकर मर मिटूँगी; पर अपनी आँखों से पवित्र जैन शासन की दुर्दशा कभी नहीं देखूंगी ।'' ऐसा हृदय में निश्‍चयकर मदनसुन्‍दरी जिन भगवान् सन्‍मुख कायोत्‍सर्ग धारणाकर पंचनमस्‍कार मंत्र की आराधना करने लगी । उस समय उसकी ध्‍यान निश्‍चल अवस्‍था बड़ी ही मनोहर दीख पड़ती थी । मानों सुमेरूगिरि की श्रेष्‍ठ निश्‍चल चूलिका हो ।

''भव्‍यजीवों को जिनभक्ति का फल अवश्‍य मिलता है ।'' इस नीति के अनुसार महारानी भी उससे वंचित नहीं रही । महारानी के निश्‍चय ध्‍यान- के प्रभाव से पद्मावती का आसन कंपित हुआ । वह आधीरात के समय आई और महारानी से बोली-देवी, जबकि तुम्‍हारे हृदय में जिनभगवान् के चरण कमल शोभित हैं, जब तुम्‍हें चिन्‍ता करने की कोई आवश्‍यकता नहीं । उनके प्रसाद से तुम्‍हारा मनोरथ नियम से पूर्ण होगा । सुनो, कल प्रात: काल ही अकलंक देव इधर आवेंगे, वे जैनधर्म के बड़े भारी विद्वान् हैं । वे ही संघश्री का दर्प चूर्णकर जिनधर्म की खूब प्रभावना करेंगे और तुम्‍हारा रथोत्‍सव का कार्य निर्विघ्‍न समाप्‍त करेंगे । उन्‍हें अपने मनोरथों के पूर्ण करने वाले मूर्तिमान शरीर समझो । यह कहकर पद्मावती अपने स्‍थान चली गई ।

देवी की बात सुनकर महारानी अत्‍यन्‍त प्रसन्‍न हुई । उसने बड़ी भक्ति के साथ जिनभगवान् की स्‍तुति की और प्रात: काल होते ही महाभिषेक पूर्वक पूजा की । इसके बाद उसने अपने राजकीय प्रतिष्ठित पुरूषों को अकलंक देव के ढूँढने को चारों ओर दौड़ाये । उनमें जो पूर्व दिशा की ओर गये थे, उन्‍होंने एक बगीचे में अशोक वृक्ष के नीचे बहुत से शिष्‍यों के साथ एक महात्‍मा को बैठे देखा । उनके किसी एक शिष्‍य से महात्‍मा का परिचय और नाम धाम पूछकर वे अपनी मालकिन के पास आये और सब हाल उन्‍होंने उससे कह सुनाया । सुनकर ही वह धर्मवत्‍सला खानपान आदि सब लेकर सामने गई, वहाँ पहुँचकर उसने बड़े प्रेम और भक्ति से उन्‍हें प्रणाम किया । उनके दर्शन से रानी को अत्‍यन्‍त आनन्‍द हुआ । जैसे सूर्य को देखकर कमलिनी को और मुनियों का तत्‍वज्ञान देखकर बुद्धि को आनन्‍द होता है ।

इसके बाद रानी ने धर्म प्रेम के वश होकर अकलंक देव की चन्‍दन, अगुरू, फल, फूल, वस्‍त्रादि से बडे विनय के साथ पूजा की और पुन: प्रणाम कर वह उनके सामने बैठ गई । उसे आशीर्वाद देकर पवित्रात्‍मा अकलंक बोले-देवी, तुम अच्‍छी तरह तो हो, और सब संघ भी अच्‍छी तरह है न ? महात्‍मा के वचनों को सुनकर रानी की आँखों से आँसू बह निकले, उसका गला भर आया । वह बड़ी कठिनता से बोली-प्रभो, संघ है तो कुशल, पर इस समय उसका घोर अपमान हो रहा है; उसका मुझे बड़ा कष्‍ट है । यह कहकर उसने संघश्री का सब हाल अकलंक से कह सुनाया । पवित्र धर्म का अपमान अकलंक न सह सके । उन्‍हें क्रोध हो आया । वे बोले-वह बराक संघश्री मेरे पवित्र धर्म का अपमान करता है, पर वह मेरे सामने है कितना, इसकी उसे खबर नहीं है । अच्‍छा देखूँगा उसके अभिमान को कि वह कितना पाण्डित्‍य रखता है । मेरे साथ खास बुद्ध तक तो शास्‍त्रार्थ करने की हिम्‍मत नहीं रखता, तब वह बेचारा किस गिनती में है ? इस तरह रानी को सन्‍तुष्‍ट करके अकलंक ने संघश्री के शास्‍त्रार्थ के विज्ञापन की स्‍वीकारता उसके पास भेज दी और आप बडे उत्‍सव साथ जिनमंदिर आ पहुँचे ।

पत्र संघश्री के पास पहुँचा । उसे देखकर और उसकी लेखन शैली को पढ़कर उसका चित्‍त क्षुभित हो उठा । आखिर उसे शास्‍त्रार्थ के लिये तैयार होना ही पड़ा ।

अकलंक के आने के समाचार महाराज हिमशीतल के पास पहुँचे । उन्‍होंने उसी समय बडे आदर सम्‍मान के साथ उन्‍हें राजसभा में बुलवाकर संघश्री के साथ उनका शास्‍त्रार्थ करवाया । संघश्री उनके साथ शास्‍त्रार्थ करने को तो तैयार हो गया, पर जब उसने अकलंक के प्रश्‍नोत्तर करने का पाण्डित्‍य देखा और उससे अपनी शक्ति की तुलना की तब उसे ज्ञात हुआ कि मैं अकलंक के साथ शास्‍त्रार्थ करने में अशक्‍त हूँ, पर राजसभा में ऐसा कहना भी उसने उचित न समझा । क्‍योंकि उससे उनका अपमान होता । तब उसने एक नई युक्ति सोचकर राजा से कहा-महाराज, यह धार्मिक विषय है, इसका निकाल होना कठिन है । इसलिये मेरी इच्‍छा है कि यह शास्‍त्रार्थ सिलसिलेवार तब तक चलना चाहिये जब तक कि एक पक्ष पूर्ण निरूत्तर न हो जाय । राजा ने अकलंक की अनुमति लेकर संघश्री के कथन को मान लिया । उस दिन का शास्‍त्रार्थ बन्‍द हुआ । राजसभा भंग हुई ।

अपने स्‍थान पर आकर संघश्री ने जहाँ-जहाँ बौद्धधर्म के विद्वान् रहते थे, उनके बुलवाने को अपने शिष्‍यों को दौड़ाया और आपने रात्रि के समय अपने धर्म की अधिष्‍ठात्री देवी की आराधना की । देवी उपस्थित हुई । संघश्री ने उससे कहा-देखती हो, धर्म पर बड़ा संकट उपस्थित हुआ है । उसे दूरकर धर्म की रक्षा करनी होगी । अकलंक बड़ा पंडित है । उसके साथ शास्‍त्रार्थ कर विजय प्राप्‍त करना असम्‍भव था । इसीलिये मैंने तुम्‍हें कष्‍ट दिया है । यह शास्‍त्रार्थ मेरे द्वारा तुम्‍हें करना होगा और अकलंक को पराजित कर बुद्धधर्म की महिमा प्रगट करनी होगी । बोलो-क्‍या कहती हो ? उत्‍तर में देवी ने कहा—हाँ मैं शास्‍त्रार्थ करूँगी सही, पर खुली सभा में नहीं; किन्‍तु परदे के भीतर घड़े में रहकर । ‘तथास्‍तु’ कहकर संघश्री ने देवी को विसर्जित किया और आप प्रसन्‍ना के साथ दूसरी निद्रा देवी की गोद में जा लेटा ।

प्रात:काल हुआ । शौच, स्‍थान, देवपूजन आदि नित्‍य कर्म से छुट्टी पाकर संघश्री राजसभा में पहुँचा और राजा से बोला-महाराज, हम आज से शास्‍त्रार्थ परदे के भीतर रहकर करेंगे । हम शास्‍त्रार्थ के समय किसी का मुहँ नहीं देखेंगे । आप पूछेंगे क्‍यों ? इसका उत्‍तर अभी न देकर शास्‍त्रार्थ के समय के अन्‍त में दिया जायेगा । राजा संघश्री के कपट जाल को कुछ नहीं समझ सके । उसने जैसा कहा वैसा उन्‍होंने स्‍वीकार कर उसी समय वहाँ एक परदा लगवा दिया। संघश्री ने उसके भीतर जाकर बुद्ध भगवान् की पूजा की और देवी की पूजाकर एक घड़े में आह्वान किया । धूर्त लोग बहुत कुछ छल कपट करते हैं, पर अन्‍त में उसका फल अच्‍छा न होकर बुरा ही होता है ।

इसके बाद घड़े की देवी अपने में जितनी शक्ति थी उसे प्रगट कर अकलंक के साथ शास्‍त्रार्थ करने लगी । इधर अकलंक देव भी देवी के प्रति-पादन किये हुये विषय का अपनी दिव्‍य भारती द्वारा खण्‍डन और अपने पक्ष का समर्थन तथा परपक्ष का खण्‍डन करने वाले परम पवित्र अनेकान्‍त–स्‍याद्वादमत का समर्थन बड़े ही पाण्डित्‍य के साथ निडर होकर करने लगे । इस प्रकार शास्त्रार्थ होते-होते छह महीना बीत गये, पर किसी की विजय न हो पाई । यह देख अकलंक देव को बड़ी चिंता हुई । उन्‍होंने सोचा- संघश्री साधारण पढ़ा-लिखा और जो पहले ही दिन मेरे सम्‍मुख थोड़ी देर भी न ठहर सका था, वह आज बराबर छह महीना से शास्‍त्रर्थ करता चला आता है; इसका क्‍या कारण है, सो नहीं जान पड़ता । उन्‍हें इसकी बड़ी चिन्‍ता हुई । पर वे कर ही क्‍या सकते थे । एक दिन इसी चिन्‍ता में डूबे हुए थे कि इतने में जिनशासन की अधिष्‍ठात्री चक्रेश्‍वरी देवी आई और अकलंक देव से बोली—प्रभो ! आपके साथ शास्‍त्रार्थ करने की मनुष्‍यमात्र में शक्ति नहीं है और बेचारा संघश्री भी तो मुनष्‍य है तब उसकी क्‍या मजाल जो वह आपसे शास्‍त्रार्थ करे ? पर यहाँ तो बात ही कुछ और ही है आपके साथ जो शास्‍त्रार्थ करता है वह संघश्री नहीं है, किन्‍तु बुद्धधर्म-की अधिष्‍ठात्री तारा नाम की देवी हैं । इतने दिनों से वही शास्‍त्रार्थ कर रही है । संघश्री ने उसकी आराधना कर यहाँ उसे बुलाया है । इसलिये कल जब शास्‍त्रार्थ होने लगे और देवी उस समय जो कुछ प्रतिपादन करें तब आप उससे उसी विषय का फिर से प्रतिपादन करने के लिये कहिये । वह उसे फिर न कह सकेगी और तब उसे अवश्‍य नीचा देखना पड़ेगा यह कहकर देवी अपने स्थान पर चली गई । अकलंक देव की चिन्‍ता दूर हुई । वे बड़े प्रसन्‍न हुए ।

प्रात:काल हुआ । अकलंक देव अपने नित्‍यकर्म से मुक्‍त होकर जिन-मन्दिर गये । बड़े भक्तिभाव से उन्‍होंने भगवान् की स्‍तुति की । इसके बाद वे वहाँ से सीधे राजसभा में आये । उन्‍होंने महाराज शुभतुंग को सम्‍बोधन करके कहा—राजन् ! इतने दिनों तक मैंने जो शास्‍त्रार्थ किया, उसका यह मतलब नहीं था कि मैं संघश्री को पराजित नहीं कर सका । परन्‍तु ऐसा करने से मेरा अभिप्राय जिनधर्म का प्रभाव बतलाने का था । वह मैंनेबतलाया । पर अब मैं इस वाद का अन्‍त करना चाहता हूँ । मैंने आज निश्‍चय कर लिया है कि मैं आज इस वाद की समाप्ति करके ही भोजन करूँगा । ऐसा कहकर उन्‍होंने परदे की ओर देखकर कहा—क्‍या जैनधर्म के सम्‍बन्‍ध में कुछ और कहना बाकी है या मैं शास्त्रार्थ समाप्‍त करूँ ? वे कहकर जैसे ही चुप रहे कि परदे की ओर से फिर वक्‍तव्‍य आरम्‍भ हुआ । देवी अपना पक्ष समर्थन करके चुप हुई कि अकलंक देव ने उसी समय कहा—जो विषय अभी कहा गया है, उसे फिर से कहो ? वह मुझे ठीक नहीं सुन पड़ा । आज अकलंक का यह नया ही प्रश्‍न सुनकर देवी का साहस एक साथ ही न जाने कहाँ चला गया । देवता जो कुछ बोलते वे एक ही बार बोलते हैं-उसी बात को वे पुन: नहीं बोल पाते । तारा देवी का भी यही हाल हुआ । वह अकलंक देव के प्रश्‍न का उत्‍तर न दे सकी । आखिर उसे अपमानित होकर भाग जाना पड़ा । जैसे सूर्योदय से रात्रि भाग जाती है ।

इसके बाद ही अकलंक देव उठे और परदे को फाड़कर उसके भीतर घुस गये । वहाँ जिस घड़े में देवी का आह्वान किया गया था, उसे उन्‍होंने पाँव की ठोकर से फोड़ डाला । संघश्री सरीखे जिनशासन के शत्रुओं का, मिथ्‍यात्वियों का अभिमान चूर्ण किया । अकलंक के इस विजय और जिन-धर्म की प्रभावना से मदनसुन्‍दरी और सर्वसाधारण को बड़ा आनन्‍द हुआ । अकलंक ने सब लोगों के सामने जोर देकर कहा-सज्‍जनो ! मैंने इस धर्मशून्‍य संघश्री को पहले ही दिन पराजित कर दिया था, किन्‍तु इतने दिन जो मैंने देवी के साथ शास्‍त्रार्थ किया, वह जिनधर्म का माहात्‍म्‍य प्रगट करने के लिये और सम्‍यग्‍ज्ञान का लोगों के हृदय पर प्रकाश डालने के लिये था । यह कहकर अकलंक देव ने इस श्‍लोक को पढ़ा –
नाहंकारवशीकृतेन मनसा न द्वेषिणा केवलं,
नैरात्‍म्‍यं प्रतिपद्य नश्‍यति जने कारूण्‍यबुध्‍या माया।
राज्ञ: श्री हिमशीतलस्‍य सदसि प्रायो विदग्‍धात्मनो,
बौद्धीधान्‍स कलान्विजित्‍य सुगत: पादेन विस्‍फालित:।।

अर्थात्—महाराज, हिमशीतल की सभा में मैंने सब बौद्ध विद्वानों को पराजित कर सुगत को ठुकराया, यह न तो अभिमान के वश होकर किया गया और न किसी प्रकार के द्वेष भाव से, किन्‍तु नास्तिक बनकर नष्‍ट होते हुए जनों पर मुझे बड़ी दया आई, इसलिये उनकी दया से बाध्‍य होकर मुझे ऐसा करना पड़ा ।

उस दिन से बौद्धों का राजा और प्रजा के द्वारा चारों ओर अपमान होने लगा । किसी की बुद्धधर्म पर श्रद्धा नहीं रही । सब उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगे । यही कारण है बौद्ध लोग यहाँ से भागकर विदेशों में जा बसे ।

महाराज हिमशीतल और प्रजा के लोग जिनशासन की प्रभावना देखकर बड़े खुश हुए । सबने मिथ्‍यात्‍वमत छोड़कर जिनधर्म स्‍वीकार किया और अकलंक देव का सोने, रत्‍न आदि के अलंकारों से खूब आदर सम्‍मान किया, खूब उनकी प्रशंसा की । सच बात है जिन भगवान् के पवित्र सम्‍यग्‍ज्ञान के प्रभाव से कौन सत्‍कार का पात्र नहीं होता ।

अकलंक देव के प्रभा से जिनशासन का उपद्रव टला देखकर महारानी मदनसुन्‍दरी ने पहले से भी कई गुणे उत्‍साह से रथ निकलवाया । रथ बड़ी सुन्‍दरता के साथ सजाया गया था । उसकी शोभा देखते ही बन पड़ती थी । वह वेशकीमती वस्‍त्रों से शोभित था, छोटी-छोटी घंटियाँ उसके चारों ओर लगी हुई थीं, उनकी मधुर आवाज एक बड़े घंटे की आवाज में मिलकर, जो कि उन घंटियों को ठीक बीच में था, बड़ी सुन्‍दर जान पड़ती थी, उस पर रत्‍नों और मोतियों की मालायें अपूर्व शोभा दे रही थीं, उसके ठीक बीच में रत्‍नमयी सिंहासन पर जिन भगवान् की बहुत सुन्‍दर प्रतिमा शोभित थी । वह मौलिक छत्र, चामर, भामण्‍डल आदि से अलंकृत थी । रथ चलता जाता था और उसके आगे-आगे भव्‍यपुरूष बड़ी भक्ति के साथ जिन भगवान् की जय बोलते हुए और भगवान् पर अनेक प्रकार के सु‍गन्धित फूलों की, जिनकी महक से सब दिशायें सुगन्धित होती थीं, वर्षा करते चले जाते थे । चारणलोग भगवान् की स्‍तुति पढ़ते जाते थे । कुल कामिनियाँ सुन्‍दर-सुन्‍दर गीत गाती जाती थीं । नर्तकियाँ नृत्‍य करती जाती थीं । अनके प्रकार के बाजों का सुन्‍दर शब्‍द दर्शकों के मनको अपनी ओर आकर्षित करता था । इन सब शोभाओं से रथ ऐसा जान पड़ता था, मानों पुण्‍यरूपी रत्‍नों के उत्‍पन्‍न करने को चलने वाला वह एक दूसरा रोहण पर्वत उत्‍पन्‍न हुआ है । उस समय जो याचकों को दान दिया जाता था, वस्‍त्राभूषण वितीर्ण किये जाते थे, उससे रथ की शोभा एक चलते हुए कल्‍पवृक्ष की सी जान पड़ती थी । हम रथ की शोभा का कहाँ तक वर्णन करें ? आप इसी से अनुमान कर लीजिये कि जिसकी शोभा को देखकर ही बहुत से अन्‍यधर्मी लोगों ने जब सम्‍यग्‍दर्शन ग्रहण कर लिया तब उसकी सुन्‍दरता का क्‍या ठिकाना है ? इत्‍यादि दर्शनीय वस्‍तुओं से सजाकर रथ निकाला गया, उसे देखकर यही जान पड़ता था, मानों महादेवी मदन-सुन्‍दरी की यशोराशि ही चल रहीं है । वह रथ भव्‍य-पुरूषों के लिए सुख का देने वाला था । सुन्‍दर रथ की प्रतिदिन भावना करते हैं, उसका ध्‍यान करते है । वह हमें सम्‍यग्‍दर्शनरूपी लक्ष्‍मी प्रदान करे ।

जिस प्रकार अकलंक देव ने सम्‍यग्‍ज्ञान की प्रभावना की, उसका महत्‍व सर्व साधारण लोगों के हृदय पर अंकित कर दिया उसी प्रकार और-और भव्‍य पुरूषों को भी उचित है कि वे भी अपने जिस तरह बन पड़े जिनधर्म की प्रभावना करें, जैनधर्म के प्रति उनका जो कर्तव्‍य है उसे वे पूरा करें ।

संसार में जिनभगवान् की सदा जय हो, जिन्‍हें इन्‍द्र, धरणेन्‍द्र नमस्‍कार करते है और जिनका ज्ञानरूपी प्रदीप सारे संसार को सुख देनेवाला है ।

श्री प्रभाचन्‍द्र मुनि मेरा कल्‍याण करें, जो गुण रत्‍नों के उत्‍पन्‍न होने के स्‍थान पर्वत हैं और ज्ञान के समुद्र हैं ।


+ सनत्कुमार चक्रवर्त्ती की कथा -
सनत्कुमार चक्रवर्त्ती की कथा
स्‍वर्ग और मोक्ष सुख के देने वाले श्री अर्हंत्, सिद्ध, आचार्य, उपाध्‍याय और साधुओं को नमस्‍कार करके मैं सम्‍यक्चारित्र का उद्योत करने वाले चौथे सनत्‍कुमार चक्रवर्ती की कथा लिखता हूँ ।

अनन्‍तवीर्य भारत वर्ष के अन्‍तर्गत वीतशोक नामक शहर के राजा थे । उनकी महारानी का नाम सीता था । हमारे चरित्रनायक सनत्‍कुमार इन्‍हीं के पुण्‍य के फल थे । वे चक्रवर्ती थे । सम्‍यग्‍दृष्टियों में प्रधान थे । उन्‍होंने छहों खण्‍ड पृथ्‍वी अपने वश कर ली थी । उनकी विभूति का प्रमाण ऋषियों ने इस प्रकार लिखा है—नवनिधि, चौदहरत्‍न, चौरासी लाख हाथी, इतने ही रथ, अठारह करोड़ घोड़े चौरासी करोड़ शूरवीर, छयानवें करोड़ धान्‍य से भरे हुए ग्राम छयानवें हजार सुन्‍दरियाँ और सदा सेवा में तत्‍पर रहने वाले बत्‍तीस हजार बड़े-बड़े राजा, इत्‍यादि संसार श्रेष्‍ठ सम्‍पत्ति से वे युक्‍त थे । देव विद्याधर उनकी सेवा करते थे । वे बड़े सुन्‍दर थे, बड़े भाग्‍यशाली थे । जिनधर्म पर उनकी पूर्ण श्रद्धा थी । वे अपना नित्‍य–नैमित्तिक कर्म श्रद्धा के साथ करते, कभी उनमें विघ्‍न नहीं आने देते । इसके सिवा अपने विशाल राज्‍य का वे बड़ी नीति के साथ पालन करते और सुखपूर्वक दिन व्‍यतीत करते ।

एक दिन सौधर्मस्‍वर्ग का इन्‍द्र अपनी सभा में पुरूषों के रूपसौन्‍दर्य की प्रशंसा कर रहा था । सभा में बैठे हुये एक विनोदी देव ने उनसे पूछा—प्रभो ! जिस रूप गुण की आप बेहद तारीफ कर रहे हैं, भला, ऐसा रूप भारतवर्ष में किसी का है भी या केवल यह प्रसंशा ही मात्र है ?

उत्तर में इन्‍द्र ने कहा—हाँ, इस समय भी भारतवर्ष में एक ऐसा पुरूष है जिसके रूप की मनुष्‍य तो क्‍या देव भी तुलना नहीं कर सकते उसका नाम है सनतकुमार चक्रवर्ती ।

इन्‍द्र द्वारा देव दुर्लभ सनतकुमार चक्रवर्ती के रूपसौन्‍दर्य की प्रसंशा सुनकर मणिमाल और रत्‍नचूल नाम के दो देव चक्रवर्ती की रूपसुधा के पान की बढ़ी हुई लालसा को किसी तरह नहीं रोक सके । वे उसी समय गुप्‍त वेश में स्‍वर्गधरा को छोड़कर भारतवर्ष में आये और स्‍नान करते हुए चक्रवर्ती का वस्‍त्रालंकार रहित, पर उस हालत में भी त्रिभुवन प्रिय और सर्वसुन्‍दर रूप को देखकर उन्‍हें अपना शिर हिलाना ही पड़ा । उन्‍हें मानना पड़ा कि चक्रवर्ती का रूप वैसा ही सुन्‍दर है, जैसा इन्‍द्र ने कहा था और सचमुच यह रूप देवों के लिये भी दुर्लभ है । इसके बाद उन्‍होंने अपना असली वेष बनाकर पहरेदार से कहा तुम जाकर अपने महाराज से कहो कि आपके रूप को देखने के लिये स्‍वर्ग से दो देव आये हुए हैं । पहरेदार ने जाकर महाराज से देवों के आने का हाल कहा । चक्रवर्ती ने इसी समय अपने श्रृंगार भवन में पहुँचकर अपने को बहुत अच्‍छी तरह वस्‍त्राभूषणों से सिंगारा । इसके बाद वे सिंहासन पर आकर बैठे और देवों को राजसभा में आने की आज्ञा दी ।

देव राजसभा में आये और चक्रवर्ती का रूप उन्‍होंने देखा । देखते ही वे खेद के साथ बोल उठे, महाराज ! क्षमा कीजिये; हमें बड़े दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि स्‍नान करते समय वस्‍त्राभूषणरहित आपके रूप में जो सुन्‍दरता, जो माधुरी हमने छुपकर देख पाई थी, वह अब नहीं रही । इससे जैन धर्म का यह सिद्धान्‍त बहुत ठीक है कि संसार की सब वस्‍तुएँ क्षण-क्षण में परिवर्तित होती हैं सब क्षणभंगुर हैं ।

देवों की विस्‍मय उत्‍पन्‍न करने वाली बात सुनकर राजकर्मचारियों तथा और उपस्थित सभ्‍योंने देवों से कहा—हमें तो महाराज के रूप में पहलेसे कुछ भी कमी नहीं दिखती, न जाने तुमने कैसे पहली सुन्‍दरता से इसमें कमी बतलाई है । सुनकर देवों ने सबको उसका निश्‍चय कराने के लिये एक जल भरा हुआ घड़ा मँगवाया और उसे सबको बतलाकर फिर उसमें- से तृण द्वारा एक जल की बूँद निकाल ली । उसके बाद फिर घड़ा सबको दिखलाकर उन्‍होंने उनसे पूछा—बतलाओ पहले जैसे घड़े में जल भरा था अब भी वैसा ही भरा है, पर तुम्‍हें पहले से इसमें कुछ विशेषता दिखती है क्‍या ? सबने एक मत होकर यही कहा कि नहीं । तब देवों ने राजा से कहा—महाराज, घड़ा पहले जैसा था, उसमें से एक बूँद जल की निकाल ली गई तब भी वह इन्‍हें वैसा ही दिखता है । इसी तरह हमने आपका जो रूप पहले देखा था, वह अब नहीं रहा । वह कमी हमें दिखती है, पर इन्‍हें नहीं दिखती । यह कहकर दोनों देव स्‍वर्ग की ओर चले गये ।

चक्रवर्ती ने इस चमत्‍कार को देखकर विचारा—स्‍त्री, पुत्र, भाई, बन्‍धु, धन, धान्‍य, दासी, दास, सोना, चाँदी आदि जितनी सम्‍पत्ति है, वह सब बिजली की तरह क्षणभर में देखते-देखते नष्‍ट होने वाली है और संसार दु:ख-का समुद्र है । यह शरीर भी, जिसे दिनरात प्‍यार किया जाता है, घिनौना है, संताप को बड़ाने वाला है, दुर्गन्‍धयुक्‍त है और अपवित्र वस्‍तुओं से भरा हुआ है । तब इस क्षणविनाशी शरीर के साथ कौन बुद्धिमान् प्रेम करेगा ? ये पाँच इन्द्रियों के विषय ठगों से भी बढ़कर ठग है । इनके द्वारा ठगाया हुआ प्राणी एक पिशाचिनी की तरह उनके वश होकर अपनी सब सुधि भूल जाता है और फिर जैसा वे नाच नचाते हैं नाचने लगता है मिथ्‍यात्‍व जीव का शत्रु है, उसके वश हुए जीव अपने आत्‍महित के करने वाले, संसार के दु:खों से छुटाकर अविनाशी सुख के देने वाले, पवित्र जिनधर्म से भी प्रेम नहीं करते । सच भी तो है- पित्तज्‍वर वाले पुरूष को दूध भी कड़वा ही लगता है । परन्‍तु मैं तो अब इन विषयों के जाल से अपने आत्‍मा को छुड़ाऊँगा । मैं आज ही मोहमाया का नाशकर अपने हित के लिये तैयार होता हूँ । यह विचार कर वैरागी चक्रवर्ती ने जिनमंदिर में पहुँचकर सब सिद्धि की प्राप्ति कराने वाले भगवान् की पूजा की, वाचकों को दयाबुद्धि से दान दिया और उसी समय पुत्र को राज्‍यभार देकर आप वन की ओर रवाना हो गये; और चारित्रगुप्‍त मुनिराज के पास पहुँचकर उनसे जिन-दीक्षा ग्रहण कर ली, जो कि संसार का हित करने वाली है । इसके बाद वे पंचाचार आदि मुनिव्रतों का निरतिचार पालन करते हुए कठिन से कठिन तपश्‍चर्या करने लगे । उन्‍हें न शीत सताती है और न आताप सन्‍तापित करता है । न उन्‍हें भूख की परवा है और न प्‍यास की । वन के जीव-जन्‍तु उन्हें खूब सताते हैं, पर वे उससे अपने को कुछ भी दुखी ज्ञान नहीं करते । वास्‍तव में जैन साधुओं का मार्ग बड़ा कठिन है, उसे ऐसे ही धीर वीर महात्‍मा पाल सकते हैं । साधारण पुरूषों की उसके पास गम्‍य नहीं । चक्रवर्ती इस प्रकार आत्‍मकल्‍याण के मार्ग में आगे-आगे बढ़ने लगे ।

एक दिन की बात है कि वे आहार के लिये शहर में गये । आहार करते समय कोई प्रकृति-विरूद्ध वस्‍तु उनके खाने में आ गई । उसका फल यह हुआ कि उनका सारा शरीर खराब हो गया, उसमें अनेक भयंकर व्‍याधियाँ उत्‍पन्‍न हो गई और सबसे भारी व्‍याधि तो यह हुई कि उनके सारे शरीर में कोढ़ फूट निकला । उससे रूधिर, पीप बहने लगा, दुर्गन्‍ध आने लगी । यह सब कुछ हुआ पर इन व्‍याधियों का असर चक्रवर्ती के मन पर कुछ भी नहीं हुआ । उन्‍होंने कभी इस बात की चिन्‍ता तक भी नहीं की कि मेरे शरीर की क्‍या दशा है ? किन्‍तु वे जानते थे कि—

बीभत्‍सु तापकं पूति शरीरमशुचेर्गृहम् ।
का प्रीतिर्विदुषामत्र यत्‍क्षणार्धे परिक्षयि ।।

इसलिये वे शरीर से सर्वधा निर्मोही रहे और बड़ी सावधानी से तपश्‍चर्या करते रहे—अपने व्रत पालते रहे ।

एक दिन सौधर्मस्‍वर्ग का इन्‍द्र अपनी सभा में धर्म-प्रेम के वश हो मुनियों के पाँच प्रकार के चारित्र का वर्णन कर रहा था । उस समय एक मदन केतु नामक देव ने उससे पूछा—प्रभो ! जिस चारित्र का आपने अभी वर्णन किया उसका ठीक पालने वाला क्‍या कोई इस समय भारतवर्ष में है ? उत्‍तर में इन्‍द्र ने कहा, सनत्‍कुमार चक्रवर्ती हैं । वे छह खण्‍ड पृथ्‍वी को तृणकी तरह छोड़कर संसार, शरीर, भोग आदि से अत्‍यन्‍त उदास हैं और दृढ़ता के साथ तपश्‍चर्या तथा पंच प्रकार का चारित्र पालन करते हैं ।

मदन केतु सुनते ही स्‍वर्ग से चलकर भारत वर्ष में जहाँ सनत्‍कुमार मुनि तपश्‍चर्या करते थे, वहाँ पहुँचा । उसने देखा कि उनका सारा शरीर रोगों का घर बन रहा है, तब भी चक्रवर्ती सुमेरू के समान निश्‍चल होकर तप कर रहे हैं । उन्‍हें अपने दु:ख की कुछ परवा नहीं है । वे अपने पवित्र चारित्र का धीरता के साथ पालन कर पृथ्‍वी को पावन कर रहे हैं । उन्‍हें देखकर मदनकेतु बहुत प्रसन्‍न हुआ । तब भी वे शरीर से कितने निर्मोही हैं, इस बात की परीक्षा करने के लिये उसने वैद्य का वेष बनाया और लगा वन में घूमने । वह घूम-घूम कर यह चिल्‍लाता था कि ''मैं एक बड़ा प्रसिद्ध वैद्य हूँ, सब वैद्यों का शिरोमणि हूँ । कैसी ही भयंकर से भयंकर व्‍याधि क्‍यों न हो उसे देखते-देखते शरीर को क्षणभर में मैं निरोग कर सकता हूँ ।'' देखकर सनत्‍कुमार मुनिराज ने उसे बुलाया और पूछा तुम कौन हो ? किसलिये इस निर्जन वन में घूमते फिरते हो ? और क्‍या कहते हो ? उत्‍तर में देव ने कहा—मैं एक प्रसिद्ध वैद्य हूँ । मेरे पास अच्‍छी से अच्‍छी दवायें है । आपका शरीर बहुत बिगड़ रहा है, यदि आज्ञा दें तो मैं क्षणमात्र में इसकी सब व्‍याधियाँ खोकर इसे सोने सरीखा बना सकता हूँ । मुनिराज बोले-हाँ तुम वैद्य हो ? यह तो बहुत अच्‍छा हुआ जो तुम इधर अनायास आ निकले । मुझे एक बड़ा भारी और महाभयंकर रोग हो रहा है, मैं उसके नष्‍ट करने का प्रयत्‍न करता हूँ पर सफल प्रयत्‍न नहीं होता । क्‍या तुम उसे दूर कर दोगे ?

देवने कहा—निःसंदेह मैं आपके रोग को जड़ मूल से खो दूँगा । वह रोग शरीर से गलने वाला कोढ़ ही है न ।

मुनिराज बोले—नहीं, यह तो एक तुच्‍छ रोग है । इसकी तो मुझे कुछ भी परवा नहीं । जिस रोग की बाबत मैं तुमसे कह रहा हूँ, वह तो बड़ा ही भयंकर है ।

देव बोला--अच्‍छा, तब बतलाइये वह क्‍या रोग है, जिसे आप इतना भयंकर बतला रहे हैं ?

मुनिराज ने कहा-सुनो, वह रोग है संसारका परिभ्रमण । यदि तुम मुझे उससे छुड़ा दोगे तो बहुत अच्‍छा होगा । बोलो क्‍या कहते हो ? सुनकर देव बड़ा लज्जित हुआ । वह बोला, मुनिनाथ ! इस रोग को तो आप ही नष्‍ट कर सकते हैं । आप ही इसके दूर करनेको शूरवीर और बुद्धिमान हैं । तब मुनिराज ने कहा—भाई, जब इस रोगको तुम नष्‍ट नहीं कर सकते तब मुझे तुम्‍हारी आवश्‍यकता भी नहीं । कारण विनाशीक, अपवित्र निर्गुण और दुर्जन के समान इस शरीरकी व्‍याधिका व्‍याधियोंको तुमने नष्‍ट कर भी दिया तो उसकी मुझे जरूरत नहीं । जिस व्‍याधिका वमनके स्‍पर्शमात्र से ही जब क्षय हो सकता है, तब उसके लिये बड़े-बड़े वैद्य-शिरोमणि की और अच्‍छी-अच्‍छी दवाओं की आवश्‍यकता ही क्‍या है ? यह कहकर मुनिराज ने अपने वमन द्वारा एक हाथके रोगको नष्‍टकर उसे सोने-सा निर्मल बना दिया । मुनिकी इस अतुल शक्ति को देखकर देव भौंचकसा रह गया । वह अपने कृत्रिम वेषको पलटकर मुनिराजसे बोला—भगवन् ! आपके विचित्र और निर्दोष चारित्रकी तथा शरीर में निर्मोहपने-की सौधर्मेन्‍द्रने धर्मप्रेम के वश होकर जैसी प्रशंसा की थी, वैसा ही मैंने आपको पाया । प्रभो ! आप धन्‍य हैं, संसार में आपहीका मनुष्‍य जन्‍म प्राप्‍त करना सफल और सुख देनेवाला है । इस प्रकार मदनकेतु सनत्‍कुमार मुनिराज की प्रशंसा कर और बड़ी भक्तिके साथ उन्‍हें बारम्‍वार नमस्‍कार कर स्‍वर्ग में चला गया ।

इधर सनत्‍कुमार मुनिराज क्षणक्षण में बढ़ते हुए वैराग्‍य के साथ अपने चारित्रको क्रमश: उन्‍नत करनेलगे अंत में शुक्‍लध्‍यान के द्वारा घातिया कर्मों का नाश कर उन्‍होंने लोकालोक का प्रकाशक केवल ज्ञान प्राप्‍त किया और इन्‍द्र धरणेन्‍द्रादि द्वारा पूज्‍य हुए ।

इसके बाद वे संसार दु:खरूपी अग्नि से झुलसते हुए अनेक जीवों को सद्धर्मरूपी अमृत की वर्षा से शान्‍त कर उन्‍हें युक्ति का मार्ग बतलाकर, और अन्‍त में अघातिया कर्मों का भी नाशकर मोक्ष में जा विराजे, जो कभी नाश नहीं होने वाला है ।

उन स्‍वर्ग और मोक्ष-सुख देने वाले श्रीसनत्‍कुमार केवलीको हम भक्ति और पूजन करते हैं, उन्‍हें नमस्‍कार करते हैं । वे हमें भी केवलज्ञानरूपी लक्ष्‍मी प्रदान करें ।

जिस प्रकार सनत्‍कुमार मुनिराजने सम्‍यक्चारित्र का उद्योत किया उसी तरह सब भव्‍य पुरूषों को भी करना उचित है । वह सुख का देने वाला है ।

श्री मूलसंघ सरस्‍वतीगच्‍छ में चारित्रचूड़ामणी श्री मल्लिभूषण भट्टारक हुए । सिंहनन्‍दी मुनि उनके प्रधान शिष्‍यों में थे । वे बड़े गुणी थे और सत्‍पुरूषों का आत्‍मकल्‍याण का मार्ग बतलाते थे । मुझे भी संसार समुद्र से पार करें ।


+ समन्‍त भद्राचार्य की कथा -
समन्‍त भद्राचार्य की कथा
संसार के द्वारा पूज्‍य और सम्‍यग्‍दर्शन तथा सम्‍यग्‍ज्ञान का उद्योत करने वाले श्री जिनभगवान् को नमस्‍कार कर श्री समन्‍त भद्राचार्य की पवित्र कथा लिखता हूँ, जो कि सम्‍यक्‍चारित्र की प्रकाशक है ।

भगवान् समन्‍त भद्र का पवित्र जन्‍म दक्षिण प्रान्‍त के अन्‍तर्गत काँची नाम की नगरी में हुआ था । वे बड़े तत्‍वाज्ञानी और न्‍याय, व्‍याकरण, साहित्‍य आदि विषयों के भी बड़े भारी विद्वान् थे । संसार में उनकी बहुत ख्‍याति थी । वे कठिन से कठिन चारित्र का पालन करते, दुस्‍सह तप तपते और बड़े आनन्‍द से अपना समय आत्‍मानुभव, पठन-पाठन, ग्रन्‍थ-रचना आदि में व्‍यतीत करते ।

कर्मों का प्रभाव दुर्निवार है । उसके लिये राजा हो या रंक हो, धनी हो या निर्धन हो, विद्वान् हो या मूर्ख हो, साधु हो या गृहस्‍थ हो सब समान हैं, सब को अपने-अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है । भगवान् समन्‍तभद्र के लिये भी एक ऐसा ही कष्‍ट का समय आया । वे बड़े भारी तपस्‍वी थे, विद्वान् थे, पर कर्मों ने इन बातों की कुछ परवा न कर उन्‍हें अपने चक्र में फँसाया ।
असाता-वेदनीय के तीव्र उदय से भस्‍म-व्‍याधि नाम का एक भयंकर रोग उन्‍हें हो गया । उससे वे जो कुछ खाते वह उसी समय भस्म हो जाता और भूख वैसी की वैसी बनी रहती । उन्‍हें इस बात का बड़ा कष्‍ट हुआ कि हम विद्वान् हुए और पवित्र जिन-शासन का संसार भर में प्रचार करने के लिये समर्थ भी हुए तब भी उसका कुछ उपकार नहीं कर पाते । इस रोग ने असमय में बड़ा कष्‍ट पहुँचाया । अस्‍तु ! अब कोई ऐसा उपाय करना चाहिये जिससे इसकी शान्ति हो । अच्‍छे-अच्‍छे स्निग्ध, सचिक्‍कण और पौष्टिक पक्‍वान्‍न का आहार करने से इसकी शान्ति हो सकेगी; इसलिये ऐसे भोजन का योग मिलाना चाहिये । पर यहाँ तो इसका कोई साधन नहीं दीख पड़ता ।
इसलिये जिस जगह, जिस तरह ऐसे भोजन की प्राप्ति हो सकेगी मैं वहीं जाऊँगा और वैसा ही उपाय करूँगा । यह विचार कर वे काँची से निकले और उत्‍तर की ओर रवाना हुए । कुछ दिनों तक चलकर वे पुण्‍ढ नगर में आये ।
वहाँ बौद्धों की एक बड़ी भारी दानशाला थी । उसे देखकर आचार्य ने सोचा, यह स्थान अच्‍छा है । यहाँ अपना रोग नष्‍ट हो सकेगा । इस विचार के साथ ही उन्‍होंने बुद्ध-साधु का वेष बनाया और दानशाला में प्रवेश किया । पर वहाँ उन्‍हें उनकी व्‍याधि-शान्ति के योग्‍य भोजन नहीं मिला । इसलिये वे फिर उत्‍तर की ओर आगे बढे़ और अनेक शहरों में घूमते हुए कुछ दिनों के बाद दशपुर-मन्‍दोसोर में आये । वहाँ उन्‍होंने भागवत-वैष्‍णवों का एक बड़ाभारी मठ देखा । उसमें बहुत से भागवत-सम्‍प्रदाय (परिव्राजक) के साधु रहते थे । उनके भक्‍त लोग उन्‍हें खूब अच्‍छा-अच्‍छा भोजन देते थे । यह देखकर उन्‍होंने बौद्ध-वेष को छोड़कर भागवत-साधु का वेष ग्रहण कर लिया ।
वहाँ वे कुछ दिनों तक रहे, पर उनकी व्‍याधि के योग्‍य उन्‍हें वहाँ भी भोजन नहीं मिला । तब वे वहाँ से भी निकलकर और अनेक देशों और पर्वतों में घूमते हुए बनारस आये । उन्‍होंने यद्यपि बाह्य में जैनमुनियों के वेष को छोड़कर कुलिंग धारण कर रक्‍खा था, पर इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि उनके हृदय में सम्‍यग्‍दर्शन की पवित्र ज्योति जगमगा रही थी । इस वेष में वे ठीक ऐसे जान पड़ते थे, मानों कीचड़ से भरा हुआ कान्तिमान् रत्‍न हो । इसके बाद आचार्य योगलिंग धारणकर शहर में घूमने लगे ।

उस समय बनारस के राजा थे शिवकोटी थे । वे शिव के बड़े भक्‍त थे । उन्‍होंने शिव का एक विशाल मंदिर बनवाया था । वह बहुत सुन्‍दर था । उसमें प्रतिदिन अनेक प्रकार के व्‍यंजन शिव को भेंट चढ़ा करते थे । आचार्य ने देखकर सोचा कि यदि किसी तरह अपनी इस मन्दिर में कुछ दिनोंके लिये स्थिति हो जाय, तो निस्‍सन्‍देह अपना रोग शान्‍त हो सकता है । यह विचार वे कर ही रहे थे कि इतने में पुजारी लोग महादेव की पुजा करके बाहर आये और उन्‍होंने एक बड़ी भारी व्‍यंजनों की राशि, जो कि शिव की भेंट चढ़ाई गई थी, लाकर बाहर रख दी । उसे देखकर आचार्य ने कहा, क्‍या आप लोगों में ऐसी किसी की शक्ति नहीं जो महाराज के भेजे हुए इस दिव्‍य-भोजन को शिव की पूजा के बाद शिव को ही खिला सकें ? तब उन ब्राह्माणों ने कहा, तो क्‍या आप अपने में इस भोजन को शिव को खिलाने की शक्ति रखते हैं ? आचार्य ने कहा -- हाँ मुझमें ऐसी शक्ति है । सुनकर उन बेचारों को बड़ा आश्‍चर्य हुआ । उन्‍होंने उसी समय जाकर यह हाल राजा से कहा -- प्रभो ! आज एक योगी आया है । उसकी बातें बड़ी विलक्षण हैं । हमने महादेव की पूजा करके उनके लिये चढ़ाया हुआ नैवेद्य बाहर लाकर रक्‍खा, उसे देखकर वह योगी बोला कि आश्‍चर्य है, आप लोग इस महा-दिव्‍य भोजन को पूजन के बाद महादेव को न खिलाकर पीछे उठा ले आते हो ! भला ऐसी पूजा से क्या लाभ ? उसने साथ ही यह भी कहा कि मुझमें ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा यह सब भोजन मैं महादेव को खिला सकता हूँ । यह कितने खेद की बात है कि जिसके लिये इतना आयोजन किया जाता है, इतना खर्च उठाया जाता है, वह यों ही रह जाय और दूसरे ही उससे लाभ उठावें ? यह ठीक नहीं । इसके लिये कुछ प्रबन्‍ध होना चाहिये, जो जिसके लिये इतना परिश्रम और खर्च उठाया जाता है वही उसका उपयोग भी कर सके ।

महाराज को भी इस अभूतपूर्व बात के सुनने से बड़ा अचंभा हुआ । वे इस विनोद को देखने के लिये उसी समय अनेक प्रकार के सुन्‍दर और सुस्‍वादु पकवान अपने साथ लेकर शिव मन्दिर गये और आचार्य से बोले -- योगिराज ! सुना है कि आपमें कोई ऐसी शक्ति है, जिसके द्वारा शिवमूर्ति को भी आप खिला सकते हैं, तो क्‍या यह बात सत्‍य है तो लीजिये यह भोजन उपस्थित है, इसे महादेव की खिलाइये ।

उत्तर में आचार्य ने 'अच्‍छी बात है' यह कहकर राजा के लाये हुए सब पकवानों की मंदिर के भीतर रखवा दिया और सब पुजारी पंडों को मंदिर बाहर निकालकर भीतर से आपने मंदिर के किवाड़ बन्‍द कर लिये । आप भूखे तो खूब थे ही इसलिये थोड़ी ही देर में सब आहार को हजमकर आपने झट से मंदिर का दरवाजा खोल दिया और निकलते ही नौकरों को आज्ञा की कि सब बरतन बाहर निकाल लो । महाराज इस आश्‍चर्य को देखकर भौंचक से रह गये । वे राजमहल लौट गये । उन्‍होंने बहुत तर्क-वितर्क उठाये पर उनकी समझ में कुछ भी नहीं आया कि वास्‍तव में बात क्‍या है ?

अब प्रतिदिन एक से एक बढ़कर पक्‍वान आने लगे और आचार्य महाराज भी उनके द्वारा अपनी व्‍याधि नाश करने लगे । इस तरह पूरे छह महिना बीत गये । आचार्य का रोग भी नष्‍ट हो गया ।

एक दिन आहारराशि को ज्‍यों की त्‍यों बनी हुई देखकर पुजारी-पण्‍डो ने उनसे पूछा, योगिराज ! क्‍या है ? क्‍यों आज यह सब आहार यों ही पड़ा रहा ? आचार्य ने उत्‍तर दिया -- राजा की परम भक्ति से भगवान् बहुत खुश हुए, वे अब तृप्‍त हो गये हैं । पर इस उत्‍तर से उन्‍हें सन्‍तोष नहीं हुआ । उन्‍होंने जाकर आहार के बाकी बचे रहने का हाल राजा से कहा । सुनकर राजा ने कहा -- अच्‍छा इस बात का पता लगाना चाहिये, कि वह योगी मंदिर के किवाड़ देकर भीतर क्‍या करता है ? जब इस बात का ठीक-ठीक पता लग जाय तब उससे भोजन के बचे रहने का कारण पूछा जा सकता है और फिर उसपर विचार भी किया जा सकता है । बिना ठीक हाल जाने उससे कुछ पूछना ठीक नहीं जान पड़ता ।

एक दिन की बात है कि आचार्य कहीं गये हुए थे और पीछे से उन सबने मिलकर एक चालाक लड़के को महादेव के अभिषेक जल के निकलने की नाली में छुपा दिया और उसे खूब फूल पत्‍तों से ढक दिया । वह वहाँ छिपकर आचार्य की गुप्‍त क्रिया देखने लगा ।

सदा के माफिक आज भी खूब अच्‍छे-अच्‍छे पक्‍वान्‍न आये । योगिराज ने उन्‍हें भीतर रखवाकर भीतर से मंदिर का दरवाजा बन्‍द कर लिया और आप लगे भोजन करने । जब आपका पेट भर गया, तब किवाड़ खोलकर आप नौकरों से उस बचे सामान को उठा लेनेके लिये कहना ही चाहते थे कि उनकी दृष्टि सामने ही खड़े हुए राजा और ब्राह्मणों पर पड़ी । आज एकाएक उन्‍हें वहाँ उपस्थित देखकर उन्‍हें बड़ा आश्‍चर्य हुआ । ये झट से समझ गये कि आज अवश्‍य कुछ न कुछ दाल में काला है । इतने ही में वे ब्राह्मण उनसे पूछ बैठे कि योगिराज ! क्‍या बात है, जो कई दिन से बराबर आहार बचा रहता है ? क्‍या शिवजी अब कुछ नहीं खाते ? जान पड़ता है, वे अब खूब तृप्‍त हो गये हैं । इसपर आचार्य कुछ कहना ही चाहते थे कि वह धूर्त लड़का उन फूल पत्‍तों के नीचे से निकलकर महाराज के सामने आ खड़ा हुआ और बोला -- राज राजेश्‍वर ! वे योगी तो यह कहते थे कि मैं शिवजी को भोजन कराता हूँ, पर इनका यह कहना बिलकुल झूठ है । असल में ये शिवजी को भोजन न कराकर स्‍वयं ही खाते है । इन्‍हें खाते हुए मैंने अपनी आँखों से देखा है, इन सबकी आँखों में आपने तो बड़ी बुद्धिमानी से धूल झोंकी है । इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि आप योगी नहीं, किन्‍तु एक बड़े भारी धूर्त हैं । और महाराज ! इनकी धूर्तता तो देखिये, जो शिवजी को हाथ जोड़ना तो दूर रहा उल्‍टा ये उनका अविनय करते है ।
इतने में वे ब्राह्मण भी बोल उठे, महाराज ! जान पड़ता है यह शिव-भक्‍त भी नहीं हैं । इसलिये इससे शिवजी को हाथ जोड़ने के लिये कहा जाय, तब सब पोल स्‍वयं खुल जायेगी । सब कुछ सुनकर महाराज ने आचार्यसे कहा -- अच्‍छा जो कुछ हुआ उसपर ध्‍यान न देकर हम यह जानना चाहते हैं कि तुम्‍हारा असल धर्म क्‍या है ? इ‍सलिये तुम शिवजी को नमस्‍कार करो । सुनकर भगवान् समन्‍तभद्र बोले -- राजन् ! मैं नमस्‍कार कर सकता हूँ, पर मेरा नमस्‍कार स्‍वीकार कर लेने को शिवजी समर्थ नहीं हैं । कारण वे राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया आदि विकारों से दूषित हैं । जिस प्रकार पृथ्‍वी के पालन का भार एक सामान्‍य मनुष्‍य नहीं उठा सकता, उसी प्रकार मेरी पवित्र ओर निर्दोष नमस्‍कृति को एक राग-द्वेषादि विकारों से अपवित्र देव नहीं सह सकता । किन्‍तु जो क्षुधा, तृषा, राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि अठारह दोषों से रहित हैं, केवलज्ञानरूपी प्रचण्‍ड तेज का धारक है और लोकालोक का प्रकाशक है, वही जिनसूर्य मेरे नमस्‍कार के योग्‍य है और वही उसे सह भी सकता है । इसलिये मैं शिवजी को नमस्‍कार नहीं करूँगा इसके सिवा भी यदि आप आग्रह करेंगे तो आपको समझ लेना चाहिये कि इस शिवमूर्ति को कुशल नहीं है, यह तुरन्‍त ही फट पड़ेगी । आचार्य की इस बात से राजा का विनोद और भी बढ़ गया । उन्‍होंने कहा -- योगिराज ! आप इसकी चिन्‍ता न करें, यह मूर्ति यदि फट पड़ेगी तो इसे फट पड़ने दीजिये, पर आपको तो नमस्‍कार करना ही पड़ेगा । राजा का बहुत ही आग्रह देख आचार्य ने 'तथास्‍तु' कहकर कहा, अच्‍छा तो कल प्रात:काल ही मैं अपनी शक्ति का आपको परिचय कराऊँगा । 'अच्‍छी बात है', यह कहकर राजा ने आचार्य को मंदिर में बन्‍द करवा दिया और मंदिर के चारों ओर नंगी तलवार लिये सिपाहियों का पहरा लगवा दिया । इसके बाद 'आचार्य की सावधानी के साथ देखरेख की जाय, वे कहीं निकल न भागें' इस प्रकार पहरेदारों को खूब सावधानकर आप राजमहल लौट आये ।

आचार्य ने कहते समय तो कह डाला, पर अब उन्‍हें खयाल आया कि मैंने यह ठीक नहीं किया । क्‍यों मैंने बिना कुछ सोचे-विचारे जल्‍दी से ऐसा कह डाला । यदि मेरे कहने के अनुसार शिवजी की मूर्ति न फटी तब मुझे कितना नीचा देखना पड़ेगा और उस समय राजा क्रोध में आकर न जाने क्‍या कर बैठें ! खैर उसकी भी कुछ परवा नहीं, पर इससे धर्म की कितनी हँसी होगी । जिस परमात्‍मा की राजा के सामने मैं इतनी प्रशंसा कर चुका हूँ, उसपर मेरे झूठ को देखकर सर्व साधारण क्‍या विश्‍वास करेंगे, आदि एक पर एक चिन्‍ता उनके हृदय में उठने लगी । पर अब हो भी क्‍या सकता था । आखिर उन्‍होंने य‍ह सोचकर कि जो होना था वह तो हो चुका और कुछ बाकी है वह कल सबेरे हो जायगा, अब व्‍यर्थ चिन्‍ता से लाभ क्‍या । जिनभगवान् की आराधना में अपने ध्‍यान को लगाया और बड़े पवित्र भावों से उनकी स्‍तुति करने लगे ।

आचार्य की पवित्र-भक्ति और श्रद्धा के प्रभाव से शासनदेवी का आसन कम्पित हुआ । वह उसी समय आचार्य के पास आई और उनसे बोली -- 'हे जिनचरण-कमलों के भ्रमर ! हे प्रभो ! आप किसी बात की चिन्‍ता न कीजिये । विश्‍वास रखिये कि जैसा आपने कहा है वह अवश्‍य ही होगा । आप 'स्‍वयंभुवाभूतहितेन-भूतले' इस पद्यांश को लेकर चतुर्विंशति तीर्थकरों का एक स्‍तवन रचियेगा । उसके प्रभाव से आपका कहा हुआ सत्‍य होगा और शिवमूर्ति भी फट पड़ेगी । इतना कहकर अम्बिका-देवी अपने स्‍थान पर चली गई ।

आचार्य को देवी के दर्शन से बड़ी प्रसन्‍नता हुई । उनके हृदय की चिन्‍ता मिटी, आनन्‍द ने अब उसपर अपना अधिकार किया । उन्‍होंने उसी समय देवी के कहे अनुसार एक बहुत सुन्‍दर जिनस्‍तवन बनाया, जो कि इस समय 'स्‍वयंभूस्‍तोत्र' के नाम से प्रसिद्ध है ।

रात सुखपूर्वक बीती । प्रात:काल हुआ । राजा भी इसी समय वहाँ आ उपस्थित हुआ । उसके साथ और भी बहुत से अच्‍छे-अच्‍छे विद्वान् आये । अन्‍य साधारण जन-समूह भी बहुत इकठ्टा हो गया । राजा ने आचार्य को बाहर ले आने की आज्ञा दी । वे बाहर लाये गये । अपने सामने आते हुए आचार्य को खूब प्रसन्‍न और उनके मुहँ को सूर्य के समान तेजस्‍वी देखकर राजा ने सोचा इनके मुहँ पर तो चिन्‍ता के बदले स्‍वर्गीय तेज की छटायें छूट रही हैं, इससे जान पड़ता है ये अपनी प्रतिज्ञा अवश्‍य पूरी करेंगे । अस्‍तु ! तब भी देखना चाहिये कि ये क्‍या करते हैं । इसके साथ ही उसने आचार्य से कहा -- योगिराज ! कीजिये नमस्‍कार, जिससे हम भी आपकी अद्भुत शक्ति का परिचय पा सकें ।

राजा की आज्ञा होते ही आचार्य ने संस्‍कृत भाषा में एक बहुत ही सुन्‍दर और अर्थ-पूर्ण जिन-स्‍तवन आरम्‍भ किया । स्‍तवन रचते-रचते वहाँ चन्‍द्रप्रभ भगवान् की चतुर्मुख प्रतिमा प्रगट हुई । इस आश्‍चर्य के साथ ही जय-ध्‍वनि के मारे आकाश गूंज उठा ।
आचार्य के इस अप्रतिम प्रभाव को देखकर उपस्थित जन-समूह को दाँतों तले अँगुली दबानी पड़ी । सबके-सब आचार्य की ओर देखते के देखते ही रह गये ।

इस‍के बाद राजा ने आचार्य महाराजसे कहा -- योगिराज ! आपकी शक्ति, आपका प्रभाव, आपका तेज देखकर हमारे आश्‍चर्य का कुछ ठिकाना नहीं रहता । बतलाइये तो आप हैं कौन ? और आपने वेष तो शिव-भक्‍त का धारण कर रक्‍खा है, पर आप शिवभक्‍त हैं नहीं । सुनकर आचार्य ने नीचे लिखे दो श्‍लोक पढ़े --
कांच्‍यां नग्‍नाटकोहं मलमलिनतनुलम्बिुशे पाण्‍डुपिण्‍ड:,
पुण्‍ड्रोण्‍डे शाक्‍यभिक्षुर्दशपुरनगरे मृष्‍टभोजी परिव्राट्र ।
बाणारस्‍यामभूवं शशधरधवल: पाण्‍ड्डराङ्गस्तपस्‍वी,
राजन् यस्‍यास्तिशक्ति: स वदतु पुरतो जैननिर्ग्रन्‍थवादी।।

पूर्व पा‍टलिपुत्रमध्‍यनगरे मेरी मया ताडिता,
पश्‍चान्‍मालवसिन्‍धुढक्‍कविषये काँचीपुरे वैदिशे।
प्राप्‍तोहं करहाटकं बहुभटैर्विद्योत्‍कटै: संकटं,
वादार्थी विचराम्‍यहं नरपते शार्दूलविक्रीडितम्।।

भावार्थ -- मैं काँची में नग्‍न दिगम्‍बर साधु होकर रहा । इसके बाद शरीर में रोग हो जाने से पुंढू नगर में बुद्धभिक्षुक, दशपुर (मन्‍दोसोर) में मिष्‍टान्‍न भोजी परिव्राजक और बनारस में शैव-साधु बनकर रहा । राजन् मैं जैन निग्रन्‍थवादी स्‍याद्वादी हूँ । जिसकी शक्ति वाद करने की हो, वह मेरे सामने आकर वाद करें।

पहले मैंने पाटलीपुत्र (पटना) में वादभेरी बजाई । इसके बाद मालवा, सिन्‍धुदेश, ढक्‍क (ढाका-बंगाल) काँचीपुर और विदिश नामक देश में भेरी बजाई । अब वहाँ से चलकर मैं बड़े-बड़े विद्वानों से भरे हुए इस करहाटक (कराड़जिला सतारा) में आया हूँ । राजन् शास्‍त्रार्थ करने की इच्‍छा से मैं सिंह के समान निर्भय होकर इधर-उधर घूमता ही रहता हूँ ।

यह कहकर ही समन्‍तभद्र-स्‍वामी ने शैव-वेष छोड़कर पीछे जिनमुनि वेष ग्रहण किया । जिन्हें पाण्डित्‍य का अभिमान था, अनेकान्‍त-स्‍याद्वाद के बल से पराजित किया और जैन-शासन की खूब प्रभावना की, जो स्‍वर्ग ओर मोक्ष की देनेवाली है । भगवान् समन्‍तभद्र भावी तीर्थंकर हैं । उन्‍होंने कुदेव को नमस्‍कार न कर सम्‍यग्‍दर्शन का खूब प्रकाश किया, सबके हृदय पर उसकी श्रेष्‍ठता अंकित कर दी । उन्‍होंने अनेक ऐकान्‍तवादियों को जीतकर सम्‍यग्‍ज्ञान को भी उद्योत किया ।

आश्‍चर्य में डालनेवाली इस घटना को देखकर राजा की जैनधर्म पर बड़ी श्रद्धा हुई । विवेक-बुद्धि ने उसके मन को खूब ऊँचा बना दिया और चारित्र-मोहनीय कर्म का क्षयोपशम हो जाने से उसके हृदय में वैराग्‍य का प्रवाह बह निकला । उसने उसे सब राज्‍य-भार छोड़ देने के लिये बाध्‍य किया । शिवकोटी ने क्षणभर में सब माया-मोह के जाल को तोड़कर जिन-दीक्षा ग्रहण कर ली । साधु बनकर उन्‍होंने गुरू के पास खूब शास्‍त्रों का अभ्‍यास किया । इसके बाद उन्‍होंने श्रीलोहाचार्य के बनाये हुए चौरासी हजार श्‍लोक प्रमाण आसधना-ग्रन्‍थ को संक्षेप में लिखा । वह इसलिये कि अब दिन-पर-दिन मनुष्‍यों की आयु और बुद्धि घटती जाती है, और वह ग्रन्‍थ बड़ा और गंभीर था, सर्व साधारण उससे लाभ नहीं उठा सकते थे । शिवकोटी-मुनि के बनाये हुए ग्रन्‍थ के चवालीस भाग हैं और उसकी श्‍लोक-संख्‍या साढे़ तीन हजार है । उससे संसार का बहुत उपकार हुआ ।

वह आराधना-ग्रन्‍थ और समन्‍तभद्राचार्य तथा शिवकोटी मुनिराज मुझे सुख के देनेवाले हों । तथा सम्‍यग्‍दर्शन, सम्‍यग्‍ज्ञान और सम्‍यक्‍चारित्ररूप परम रत्‍नों के समुद्र और कामरूपी प्रचंड बलवान् हाथी के नष्‍ट करने को सिंह समान विद्यानन्‍दी गुरू और छहों शास्‍त्रों के अपूर्व विद्वान् तथा श्रुतज्ञान के समुद्र श्रीमल्लिभूषण मुनि मुझे मोक्षश्री प्रदान करें ।


+ संजयन्त मुनि की कथा -
संजयन्त मुनि की कथा
सुख के देनेवाले श्रीजिनभगवान के चरण-कमलों को नमस्‍कार श्री संजयन्‍त मुनिराज की कथा लिखता हूँ, जिन्‍होंने सम्‍यक्-तप का उद्योत किया था ।

सुमेरू के पश्चिम की ओर विदेह के अन्‍तर्गत गन्‍धमालिनी नाम का देश है । उसकी प्रधान राजधानी वीतशोकपुर है । जिस समय की बात हम लिख रहे हैं उस समय उसके राजा वैजयन्‍त थे । उसकी महारानी का नाम भव्‍य था । उनके दो पुत्र थे । उनके नाम थे संजयन्‍त और जयन्‍त ।

एक दिन की बात है कि बिजली के गिरने से महाराज वैजयन्‍त का प्रधान हाथी मर गया । यह देख उन्‍हें संसार से बडा वैराग्‍य हुआ । उन्‍होंने राज्‍य छोड़ने का निश्‍चयकर अपने दोनों पुत्रों को बुलाया और उन्‍हें राज्‍यभार सौंपना चाहा; तब दोनों भाइयों ने उनसे कहा -- पिताजी, राज्‍य तो संसार के बढ़ाने का कारण है, इससे तो उल्‍टा हमें सुख की जगह दु:ख भोगना पड़ेगा । इसलिये हम तो इसे नहीं लेते । आप भी तो इसीलिये छोड़ते हैं न ? कि वह बुरा है, पाप का कारण है । इसीलिये हमारा तो विश्‍वास है कि बुद्धिमानों को, आत्‍मा हित के चाहनेवालों को, राज्‍य सरीखी झंझटों को सिर पर उठाकर अपनी स्‍वाभाविक शान्ति को नष्‍ट नहीं करना चाहिये । यही विचारकर हम राज्‍य लेना उचित नहीं समझते । बल्कि हम तो आपके साथ ही साधु बनकर अपना आत्‍माहित करेंगे ।

वैजयन्त ने पुत्रों पर अधिक दबाव न डालकर उनकी इच्‍छा के अनुसार उन्‍हें साधु बनने की आज्ञा दे दी और राज्‍य का भार संजयन्‍त के पुत्र वैजयन्‍त को देकर स्‍वयं भी तपस्‍वी बन गये । साथ ही वे दोनों भाई भी साधु हो गये ।

तपस्‍वी बनकर वैजयन्‍त मुनिराज खूब तपश्‍चर्या करने लगे, कठिन से कठिन परीषह सहने लगे । अन्‍त में ध्‍यानरूपी अग्नि द्वारा घातिया कर्मों का नाशकर उन्‍होंने लोकाकोक का प्रकाशक केवलज्ञान प्राप्‍त किया । उस समय उनके ज्ञान-कल्‍याणक की पूजा करने को स्‍वर्ग से देव आये । उनके स्‍वर्गीय ऐश्‍वर्य और उनकी दिव्‍य सुन्‍दरता को देखकर संजयन्‍त के छोटे भाई जयन्‍त ने निदान किया – ‘मैंने जो इतना तपश्‍चरण किया है, मैं चाहता हूँ कि उसके प्रभाव से मुझे दूसरे जन्‍म में ऐसी ही सुन्‍दरता और ऐसी ही विभूति प्राप्‍त हो ।‘ वही हुआ । उसका किया निदान उसे फला । वह आयु के अन्‍तमें मरकर धरणेन्‍द्र हुआ ।

इधर संजयन्‍त मुनि पन्‍द्रह-पन्‍द्रह दिन के, एक-एक महीना के उपवास करने लगे, भूख प्‍यास की कुछ परवा न कर बड़ी धीरता के साथ परीषह सहने लगे । शरीर अत्‍यन्‍त क्षीण हो गया, तब भी भयंकर वनों में सुमेरू के समान निश्‍चल रहकर सूर्य की ओर मुँह किये वे तपश्‍चर्या करने लगे । गरमी के दिनों में अत्‍यन्‍त गरमी पड़ती, शीत के दिनों में जाड़ा खूब सताता, वर्षा के समय मूसलाधार पानी वर्षा करता और आप वृक्षों के नीचे बैठकर ध्‍यान करते । वन के जीव-जन्‍तु सताते, पर इन सब कष्‍टों की कुछ परवा न कर आप सदा आत्‍मध्‍यान में लीन रहते ।

एक दिन की बात है, संजयन्‍त मुनिराज तो अपने ध्‍यान में डूबे हुए थे कि उसी समय एक विद्युछष्‍ट् नाम का विद्याधर आकाश-मार्ग से उधर होकर निकला । पर मुनि के प्रभाव से उसका विमान आगे नहीं बढ़ पाया । एकाएक विमान को रुका हुआ देखकर उसे बड़ा आश्‍चर्य हुआ । उसने नीचे की ओर दृष्टि डालकर देखा तो उसे संजयन्‍त मुनि दीख पड़े । उन्‍हें देखते ही उसका आश्‍चर्य क्रोध के रूप में परिणत हो गया । उसने मुनिराज को अपने विमान को रोकनेवाले समझकर उनपर नाना तरह के भयंकर उपद्रव करना शुरू किया उससे जहाँ तक बना उसने उन्‍हें बहुत कष्‍ट पहुँचाया । पर मुनिराज उसके उपद्रवों से रंचमात्र भी विचलित नहीं हुए । वे जैसे निश्‍चल थे वैसे ही खड़े रहे । सच है वायु का कितना ही भयंकर वेग क्‍यों न चले, पर सुमेरू हिलता तक भी नहीं ।

इन सब भयंकर उपद्रवों से भी जब उसने मुनिराज को पर्वत समान अचल देखा तब उसका क्रोध और भी बहुत बढ़ गया । वह अपने विद्या-बल से मुनिराज को वहाँ से उठा ले चला और भारत-वर्ष में पूर्व दिशा की ओर बहनेवाली सिंहवती नाम की एक बड़ी भारी नदी में, जिसमें कि पाँच बड़ी-बड़ी नदियाँ और मिली थीं, डाल दिया । भाग्‍य से उस प्रान्त के लोग भी बड़े पापी थे । सो उन्‍होंने मुनि को एक राक्षस समझकर और सर्व-साधारण में यह प्रचार कर, कि यह हमें खाने के लिये आया है, पत्‍थरों से खूब मारा । उन्होंने पूर्ण आत्‍मबल के प्रभाव से हृदय को लेशमात्र भी अधीर नहीं बनने दिया । क्‍योंकि सच्‍चे साधु वे ही हैं --

तृणं रत्‍नं वा रिपुरिव परममित्रथवा,
स्‍तुतिर्वा निन्‍दा वा मरणमथवा जीवितमथ ।
सुख वा दु:खं वा पितृवनमहोत्‍सौधमथवा,
स्‍फुटं निर्ग्रन्‍थानां द्वयमपि समं शान्‍तमनसाम् । ।

जिनके पास रागद्वेष का बढ़ानेवाला परिग्रह नहीं है, जो निर्ग्रन्‍थ हैं, और सदा शान्‍तचित्‍त रहते हैं, उन साधुओं के लिये तृण हो या रत्‍न, शत्रु हो या मित्र, उनकी कोई प्रशंसा करो या बुराई, वे जीवें अथवा मर जायें, उन्‍हें सुख हो या दु:ख और उनके रहने को श्‍मशान हो या महल, पर उनकी दृष्टि सबपर समान रहेगी । वे किसी से प्रेम या द्वेष न कर सबपर समभाव रक्‍खेंगे । यही कारण था कि संजयन्‍त मुनि ने विद्याधर-कृत सब कष्‍ट समभाव से सहकर अपने अलौकिक धैर्य का परिचय दिया । इस अपूर्व पद को प्राप्‍त किया और इसके बाद अघातिया कर्मों का भी नाश कर वे मोक्ष चले गये । उनके निर्वाण-कल्‍याण की पूजन करने को देव आये । वह धरणेन्‍द्र भी इनके साथ था, जो संजयन्‍त मुनि का छोटा भाई था और निदान करके धरणेन्‍द्र हुआ था । धरणेन्‍द्र को अपने भाई के शरीर की दुर्दशा देखकर बड़ा क्रोध आया । उसने भाई को कष्‍ट पहुँचाने का कारण वहाँ के नगरवासियों को समझकर उन सबको अपने नागपाश से बाँध लिया और लगा उन्‍हें दु:ख देने । नगरवासियों ने हाथ जोड़कर उससे कहा -- प्रभो हम तो इस अपराध से सर्वथा निर्दोष हैं । आप हमें व्‍यर्थ ही कष्‍ट दे रहे हो । यह सब कर्म तो पापी विद्युद्दष्ट्र विद्याधर का है । आप उसे ही पकडिये न ? सुनते ही धरणेन्‍द्र विद्याधर को पकड़ने के लिये दौड़ा और उसके पास पहुँचकर उसे उसने नागपाश से बाँध लिया । इसके बाद उसे खूब मार पीटकर धरणेन्‍द्र ने समुद्र में डालना चाहा ।

धरणेन्‍द्र का इस प्रकार निर्दय व्‍यवहार देखकर एक दिवाकर नाम के दयालु देव ने उससे कहा -- तुम इसे व्‍यर्थ ही क्‍यों कष्‍ट दे रहे हो ? इसकी तो संजयन्‍त मुनि के साथ कोई चार भव से शत्रुता चली आती है । इसी से उसने मुनिपर उपसर्ग किया था ।

धरणेन्‍द्र बोला यदि ऐसा है तो उसका कारण मुझे बतलाइये ? दिवाकर देव ने तब यों कहना आरंभ किया ।

पहले समय में भारतवर्ष में एक सिंहपुर नाम का शहर था । उसके राजा सिंहसेन थे । वे बड़े बुद्धिमान् और राजनीति के अच्‍छे जानकार थे । उनकी रानी का नाम रामदत्‍ता था । वह बुद्धिमान और बड़ी सरल स्‍वभाव की थी । राजमंत्री का नाम श्रीभूति था । वह बड़ा कुटिल था । दूसरों को धोखा देना, उन्‍हें ठगना यह उसका प्रधान कर्म था ।

एक दिन पद्खंडपुर के रहनेवाले सुमित्र सेठ का पुत्र समुद्रदत्‍त श्रीभूति के पास आया और उससे बोला—महाशय, मैं व्‍यापारके लिये विदेश जा रहा हूँ । देवकी विचित्र लीलासे न जाने कौन समय कैसा आवे ? इसलिये मेरे पास ये पाँच रत्‍न हैं, इन्‍हें आप अपनी सुरक्षा में रक्‍खें तो अच्‍छा होगा और मुझपर भी आपको बड़ी दया होगी । मैं पीछा आकर अपने रत्‍न ले लूँगा ।'' यह कहकर और श्रीभूति को रत्‍न सौंपकर समुद्रदत्‍त चल दिया ।

कई वर्ष बाद समुद्रदत्‍त पीछा लौटा । वह बहुत धन कमाकर लाया था । जाते समय जैसा उसने सोचा था, दैवकी प्रतिकूलता से वही घटना उसके भाग्‍य में घटी । किनारे लगते-लगते जहाज फट पड़ा । सब माल असबाब समुद्र के विशाल उदर में समा गया । पुण्‍योदय से समुद्रदत्‍त की कुछ ऐसा सहारा मिल गया, जिससे उसकी जान बच गई । वह कुशलपूर्वक अपना जीवन लेकर घर लौट आया ।

दूसरे दिन वह श्रीभूति के पास गया और अपने पर जैसी विपत्ति आई थी उसे उसने आदि से अन्‍त तक कहकर श्रीभूति से अपने अमानत रखे हुए रत्‍न पीछे माँगे । श्रीभूति ने आँखें चढ़ाकर कहा कैसे रत्‍न तूँ मुझसे माँगता है ? जान पड़ता है जहाज डूब जाने से तेरा मस्‍तक बिगड़ गया है । श्रीभूति ने बेचारे समुद्रदत्‍त की मनमानी फटकार बताकर और अपने पास बैठे हुए लोगों से कहा देखिये न साहब, मैंने आपसे अभी ही कहा था न ? कि कोई निर्धन मनुष्‍य पागल बनकर मेरे पास आवेगा और झूठा ही बखेड़ाकर झगड़ा करेगा । वही सत्‍य निकला । कहिये तो ऐसे दरिद्री के पास रत्‍न आ कहाँ से सकते ? भूला, किसी ने भी इसके पास कभी रत्‍न देखे हैं । यों ही व्‍यर्थ गले पड़ता है । ऐसा कहकर उसने नौकरों द्वारा समुद्रदत्‍त को निकलवा दिया । बेचारा समुद्रदत्‍त एक तो वैसे ही विपत्ति का मारा हुआ था, इसके सिवा उसे जो एक बड़ी भारी आशा थी उसे भी पापी श्रीभूति ने नष्‍ट कर दिया । वह सब ओर से अनाथ हो गया । निराशा के अथाह समुद्र में गोते खाने लगा । पहले उसे अच्छा होने पर भी श्रीभूति ने पागल बना डाला था; पर अब वह सचमुच ही पागल हो गया वह शहरमें घूम-घूमकर चिल्‍लाने लगा कि पापी श्रीभूतिने मेरे पाँच रत्‍न ले लिये और अब वह उन्‍हें देता नहीं है । राजमहल के पास भी उसने बहुत पुकार मचाई, पर उसकी कहीं सुनाई नहीं हुई । सब उसे पागल समझकर दुतकार देते थे । अन्‍त में निरूपाय हो उसने एक वृक्ष पर चढ़कर, जो कि रानी के महल के पीछे ही था, पिछली रात को बड़े जोर से चिल्‍लाना आरंभ किया । रानी ने बहुत दिनों तक तो उसपर बिलकुल ध्‍यान नहीं दिया । उसने भी समझ लिया कि कोई पागल चिल्‍लाता होगा । पर एक दिन उसे ख्‍याल हुआ कि वह पागल होता तो प्रतिदिन इसी समय आकर क्‍यों चिल्‍लाता ? सारे दिन ही इसी तरह आकर क्‍यों न चिल्‍लाता फिरता ? इसमें कुछ रहस्‍य अवश्‍य है । यह विचार कर उसने एक दिन राजा से कहा -- प्राणनाथ ! आप इस चिल्‍लानेवाले को पागल बताते हैं, पर मेरी समझ में यह बात नहीं आती । क्‍योंकि यदि वह पागल होता तो न तो बराबर इसी समय चिल्‍लाता और न सदा एक ही वाक्‍य बोलता । इसलिये इसका ठीक-ठीक पता लगाना चाहिये कि बात क्‍या है ? ऐसा न हो कि अन्‍याय से बेचारा एक गरीब बिना मौत मारा जाय । रानी के कहने के अनुसार राजा ने समुद्रदत्‍त को बुलाकर सब बातें पूछीं । समुद्रदत्‍त ने जैसी अपने पर बीती थी, वह ज्‍यों-की-त्‍यों महाराज से कह सुनाई । तब रत्‍न कैसे प्राप्‍त किये जाँय, इसके लिये राजा को चिन्‍ता हुई । रानी बड़ी बुद्धिमती थी । इसलिये रत्‍नों के मँगा लेने का भार उसने अपने पर लिया ।

रानी ने एक दिन श्रीभूति को बुलाया और उससे कहा मैं आपकी शतरंज खेलने में बड़ी तारीफ सुना करती हूँ । मेरी बहुत दिनों से इच्‍छा थी कि मैं एक दिन आपके साथ खेलूँ । आज बड़ा अच्‍छा सुयोग मिला जो आप यहीं पर उपस्थित हैं । यह कहकर उसने दासी को शतरंज ले आने की आज्ञा दी ।

श्रीभूति रानी की बात सुनते ही घबरा गया । उसके मुँह से एक शब्‍द तक निकलना मुश्किल पड़ गया । उसने बड़ी घबराहट के साथ काँपते-काँपते कहा -- महारानीजी, आज आप यह क्‍या कह रही हैं । मैं एक क्षुद्र कर्मचारी और आपके साथ खेलूँ ? यह मुझसे न होगा । भला, राजा सा‍हब सुन पावें तो मेरा क्‍या हाल हो ?

रानी ने कुछ मुस्‍कराते हुए कहा -- वाह, आप तो बड़े ही डरते हैं । आप घबराइये मत । मैंने खुद राजा साहब से पूछ लिया है । और फिर आप तो हमारे बुजुर्ग हैं । इसमें डर की बात ही क्‍या है । मैं तो केवल विनोदवश होकर खेल रहीं हूँ ।

‘राजा की मैंने स्‍वयं आज्ञा ले ली’ जब रानी के मुहँ से यह वाक्‍य सुना तब तक श्रीभूति के जी में जी आया और वह रानी के साथ खेलने के लिये तैयार हुआ ।

दोनों का खेल आरम्‍भ हुआ । पाठक जानते हैं कि रानी के लिये खेल का तो केवल बहाना था । असल में तो उसे अपना मतलब गाँठना था । इसीलिये उसने यह चाल चली थी । रानी खेलते-खेलते श्रीभूति को अपनी बातों में लुभाकर उसके घर की सब बातें जान ली और इशारे से अपनी दासी को कुछ बातें बतलाकर उसे श्रीभूति के यहाँ भेजा । दासी ने जाकर श्रीभूति की पत्‍नीसे कहा -- तुम्‍हारे पति बड़े कष्‍ट में फँसे हैं, इसलिये तुम्‍हारे पास उन्‍होंने जो पाँच रत्‍न रक्‍खे हैं, उनके लेने को मुझे भेजा हैं । कृपा करके वह रत्‍न जल्‍दी दे दो जिससे उनका छुटकारा हो जाय ।

श्रीभूति की स्‍त्री ने उसे फटकार दिखला कर कहा -- चल, मेरे पास रत्‍न नहीं हैं और न मुझे कुछ मालूम है । जाकर उन्‍हीं से कह दे कि जहाँ रत्‍न रक्‍खे हों, वहाँ से तुम्‍हीं जाकर ले आओ ।
दासी ने पीछी लौट आकर सब हाल अपनी मालकिन से कह दिया । रानी ने अपनी चाल का कुछ उपयोग नहीं हुआ देखकर दूसरी युक्ति सोची, श्रीभूति ने पहले तो कुछ आनाकानी की, पर फिर ‘रानी के पास धन का तो कुछ पार नहीं है और मेरी जीत होगी तो मैं मालामाल हो जाऊँगा’ यह सोचकर वह खेलने को तैयार हो गया ।
रानी बड़ी चतुर थी । उसने पहले ही पासे में श्रीभूति की एक कीमती अंगूठी जीत ली । उस अंगूठी को चुपके से दासी के हाथ देकर और कुछ समझाकर उसने श्रीभूति के घर फिर भेजा और आप उसके साथ खेलने लगी ।

अबकी बार रानी का प्रयत्‍न व्‍यर्थ नहीं गया । दासी ने पहुँचते ही बड़ी घबराहट के साथ कहा -- देखो, पहले तुमने रत्‍न नहीं दिये, उसमें उन्‍हें बहुत कष्‍ट उठाना पड़ा । अब उन्‍होंने यह अँगूठी देकर मुझे भेजा है और यह कहलाया है कि यदि तुम्‍हें मेरी जान प्‍यारी हो, तो इस अँगूठी को देखते ही रत्‍नों को दे देना और रत्‍न प्‍यारे हों तो न देना । इससे अधिक मैं और कुछ नहीं कहता ।

अब तो वह एक साथ घबरा गई । उसने कुछ विशेष पूछताछ न करके केवल अँगूठी के भरोसे पर रत्‍न निकालकर दासी के हाथ सौंप दिये । दासी ने रत्‍नों को लाकर रानी को दे दिये और रानी ने उन्‍हें महाराज के पास पहुँचा दिये ।

राजा को रत्‍न देखकर बड़ी प्रसन्‍नता हुई । उन्‍होंने रानी की बुद्धिमानी को बहुत-बहुत धन्‍यवाद दिया । इसके बाद उन्‍होंने समुद्रदत्‍त को बुलाया और उन रत्‍नों को और बहुत से रत्‍नों में मिलाकर उससे कहा देखो, इन रत्‍नों में तुम्‍हारे रत्‍न हैं क्‍या ? और हों तो उन्‍हें निकाल लो । समुद्रदत्‍त ने अपने रत्‍नों को पहचान कर निकाल लिया । सच है बहुत समय बीत जाने पर भी अपनी वस्‍तु को कोई नहीं भूलता ।

इसके बाद राजा ने श्रीभूति को राजसभा में बुलाया ओर रत्‍नों को उसके सामने रखकर कहा -- कहिये आप तो इस बेचारे के रत्‍नों को हड़पकर भी उल्‍टा इसे ही पागल बनाते थे न ? यदि महारानी मुझसे आग्रह न करतीं और अपनी बुद्धिमानी से इन रत्‍नों को प्राप्‍त नहीं करती, तब यह बेचारा गरीब तो व्‍यर्थ मारा जाता और मेरे सिर पर कलंक का टीका लगता । क्‍या इतने उच्च अधिकारी बनकर मेरी प्रजा का इसी तरह तुमने सर्वस्‍व हरण किया है ?

राजा को बड़ा क्रोध आया । उसने अपने राज्‍य के कर्मचारियों से पूछा -- कहो, इस महा-पापी को इसके पाप का क्‍या प्रायश्चित दिया जाय, जिससे आगे के लिये सब सावधान हो जायँ और इस दुरात्‍मा का जैसा भयंकर कर्म है, उसी के उपयुक्‍त इसे उसका प्रायश्चित भी मिल जाय ?

राज्‍य-कर्मचारियों ने विचार कर और सबकी सम्‍मति मिलाकर कहा -- महाराज, जैसा इस महाशय का नीच कर्म है, उसके योग्‍य हम तीन दण्‍ड उपयुक्‍त समझते हैं और उनमें से जो इन्‍हें पसन्‍द हो, वही ये स्‍वीकार करें ।
१ .एक सेर पक्‍का गोमय खिलाया जाय; २. मल्‍ल के द्वारा बत्‍तीस घूँसे लगवाये जाँय; या ३. सर्वस्‍व हरण पूर्वक देश निकाला दे दिया जाय ।

राजा ने अधिकारियों के कहे माफिक दण्‍ड की योजना कर श्रीभूति से कहा कि तुम्‍हें जो दण्‍ड पसन्‍द हो, उसे बतलाओ । पहले श्रीभूति ने गोमय खाना स्‍वीकार किया, पर उसका उससे एक ग्रास भी नहीं खाया गया । तब उसने मल्‍ल के घूँसे खाना स्‍वीकार किया । मल्‍ल बुलवाया गया । घूँसे लगना आरम्‍भ हुआ । कुछ घूँसों की मार पड़ी होगी कि उसका आत्‍मा शरीर छोड़कर चल बसा । उसकी मृत्‍यु बड़े आर्तध्‍यान से हुई । वह मरकर राजा के खजाने पर ही एक विकराल सर्प हुआ ।

इधर समुद्रदत्‍त को इस घटना से बड़ा वैराग्‍य हुआ । उसने संसार की दशा देखकर उसमें अपने को फँसाना उचित नहीं समझा । वह उसी समय अपना सब धन परोपकार के कर्मों में लगाकर वन की ओर चल दिया और धर्माचार्य नाम के महामुनि से पवित्र धर्म का उपदेश सुनकर साधु बन गया । बहुत दिनों तक उसने तपश्‍चर्या की । इसके बाद आयु के अन्‍तमें मृत्‍यु प्राप्‍त कर वह इन्‍हीं सिंहसेन राजा के सिंहचन्‍द्र नामक पुत्र हुआ ।

एक दिन राजा अपने खजाने को देखने लिये गये थे, उन्‍हें देखकर श्रीभूति के जीव को, जो कि खजाने पर सर्प हुआ था बड़ा क्रोध आया । क्रोध के वश हो उसने महाराज को काट खाया । महाराज आर्त्त-ध्‍यान से मरकर सल्‍लकी नामक वन में हाथी हुए । राजा की सर्प द्वारा मृत्‍यु देखकर सुघोष मंत्री को बड़ा क्रोध आया । उसने अपने मन्‍त्र-बल से बहुत से सर्पो को बुलाकर कहा यदि तुम निर्दोष हो, तो इस अग्नि-कुण्‍ड में प्रवेश करते हुए अपने-अपने स्‍थान पर चले जाओ । तुम्‍हें ऐसा करने से कुछ भी कष्‍ट न होगा । जितने बाहर के सर्प आये थे वे सब तो चले गये । अब श्रीभूति का जीव बाकी रह गया । उससे कहा गया कि या तो तू विष खींचकर महाराज को छोड़ दे, या इस अग्नि-कुण्‍ड में प्रवेश कर । पर वह महा-क्रोधी था उसने अग्नि-कुण्‍ड में प्रवेश करना अच्‍छा समझा, पर विष खींच लेना उचित नहीं समझा । वह क्रोध के वश हों अग्नि में प्रवेश कर गया । प्रवेश करते ही वह देखते-देखते जलकर खाक हो गया । जिस सल्‍लकी वन में महाराज का जीव हाथी हुआ था, वह सर्प भी मरकर उसी वन में मुर्गा हुआ । सच है पापियों का कुयोनियों में उत्‍पन्‍न होना कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है । इधर तो ये सब अपने-अपने कर्मों के अनुसार दूसरे भवों में उत्‍पन्‍न हुए और उधर सिंहसेन की रानी पति-वियोग से बहुत दु:खी हुई । उसे संसार की क्षणभंगुर लीला देखकर वैराग्य हुआ । वह उसी समय संसार का मायाजाल तोड़कर वनश्री आर्यिका के पास साध्‍वी बन गई । सिंहसेन का पुत्र सिंहचन्‍द्र भी वैराग्‍यके वश हो, अपने छोटे भाई पूर्णचन्‍द्र को राज्‍यभार सौंपकर सुव्रत नामक मुनिराज के पास दीक्षित हो गया । साधु होकर सिंहचन्‍द्र मुनि ने खूब तपश्‍चर्या की, शान्ति और धीरता के साथ परीषहों पर विजय प्राप्‍त किया, इन्द्रियों को वश किया और चंचल मन को दूसरी ओर से रोकर ध्‍यान की ओर लगाया, अन्‍त में ध्‍यान के बल से उन्‍हें मन:पर्ययज्ञान प्राप्‍त हुआ । उन्‍हें मन:पर्ययज्ञान से युक्‍त देखकर उनकी माता ने, जो कि इन्हीं के पहले आर्यिका हुई थी, नमस्‍कार कर पूछा -- साधुराज ! मेरी कूँख धन्‍य है, वह आज कृतार्थ हुई, जिसने आपसे पुरूषोत्‍तम को धारण किया । पर अब यह तो कहिये कि आपके छोटे भाई पूर्णचन्‍द्र आत्‍महित के लिये कब उद्यत होंगे ?

उत्‍तर में सिंहचन्‍द्र मुनि बोले -- माता, सुनो तो मैं तुम्‍हें संसार की विचित्र लीला सुनाता हूँ, जिसे सुनकर तुम भी आश्‍चर्य करोगी । तुम जानती हो कि पिताजी को सर्प ने काटा था और उसी से उनकी मृत्‍यु हो गई थी । वे मरकर सल्‍लकी वन में हाथी हुए । वे ही पिता एक दिन मुझे मारने के लिये मेरे पर झपटे, तब मैंने उस हाथी को समझाया और कहा गजेन्‍द्रराज, जानते हो, तुम पूर्व जन्‍म में राजा सिंहसेन थे और मैं प्राणों से भी प्‍यारा सिंहचन्‍द्र नाम का तुम्‍हारा पुत्र था । कैसा आश्‍चर्य है कि आज पिता ही पुत्र को मारना चाहता है । मेरे इन शब्‍दों को सुनते ही गजेन्‍द्र को जाति-स्‍मरण हो आया पूर्व-जन्‍म की उसे स्‍मृति हो गई । वह रोने लगा, उसकी आँसुओं की धारा बह चली । वह मेरे सामने चित्र लिखा सा खड़ा रह गया । उसकी यह अवस्‍था देखकर मैंने उसे जिन-धर्म का उपदेश दिया और पंचाणुव्रत का स्‍परूप समझाकर उस अणुव्रत ग्रहण करने को कहा । उसने अणुव्रत ग्रहण किये और पश्‍चात वह प्रासुक भोजन प्रासुक जल में अपना निर्वाह कर व्रत का दृढ़ता के साथ पालन करने लगा ।

एक दिन वह जल पीने के लिये नदी पर पहुँचा । जलके भीतर प्रवेश करते समय वह कीचड़ में फँस गया । उसने निकलने की बहुत चेष्‍टा की, पर वह प्रयत्‍न सफल नहीं हुआ । अपना निकलना असंभव समझकर उसने समाधिमरण की प्रतिज्ञा ले ली । उस समय वह श्रीभूति का जीव, जो मुर्गा हुआ था, हाथी के सिरपर बैठकर उसका मांस खाने लगा । हाथी पर बड़ा उपसर्ग आया, पर उसने उसकी कुछ परवा न कर बड़ी धीरता के साथ पंच नमस्‍कार मंत्र की आराधना करना शुरू कर दिया, जो कि सब पापों का नाश करने बाला है । आयु के अन्‍त में शान्ति के साथ मृत्‍यु प्राप्‍त कर वह सहस्‍त्रार स्‍वर्ग में देव हुआ । सच है धर्म के सिवा और कल्‍याण का कारण हो ही क्‍या सकता है ?
वह सर्प भी बहुत कष्‍टों को सहन कर मरा और तीव्र पाप कर्म के उदय से चौथे नरक में जाकर उत्‍पन्‍न हुआ, जहाँ अनन्‍त दु:ख हैं और जब तक आयु पूर्ण नहीं होती तब तक पलक गिराने मात्र भी सुख प्राप्‍त नहीं होता ।

सिंहसेन का जीव जो हाथी होकर मरा था, उसके दाँत और कपोलों में से निकले हुए मोती, एक भील के हाथ लगे । भील ने उन्‍हें एक धनमित्र नामक साहूकार के हाथ बेच दिये और धनमित्र ने उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ और कीमती समझकर राजा पूर्णचंद्र को भेंट कर दिये । राजा देखकर बड़े प्रसन्‍न हुए । उन्‍होंने उनके बदले में ध‍नमित्र को खूब धन दिया । इसके बाद राजा ने दाँतों के तो अपने पलंग के पाये बनवाये और मोतियों का रानी के लिये हार बनवा दिया । इस समय वे विषय-सुख में खूब मग्‍न होकर अपना काल बिता रहे हैं । यह संसार की विचित्र दशा है । क्षण-क्षण में क्‍या हेाता है सो सिवा ज्ञानी के कोई नहीं जान पाता और इसी से जीवों को संसार के दु:ख भोगना पड़ते हैं । माता, पूर्णचन्‍द्र के कल्‍याण का एक मार्ग है, यदि तुम जाकर उपदेश दो और यह सब घटना उसे सुनाओ, तो वह अवश्‍य अपने कल्‍याण की ओर दृष्टि देगा ।

सुनते ही वह उठी और पूर्णचन्‍द्र के महल पहुँची । अपनी माता को देखते ही पूर्णचंद्र उठे और बड़े विनय से उसका सत्‍कार कर उन्‍होंने उसके लिये पवित्र आसन दिया और हाथ जोड़कर वे बोले -- माताजी, आपने अपने पवित्र चरणों से इस समय भी इस घर को पवित्र किया, उससे मुझे जो प्रसन्‍नता हुई वह वचनों द्वारा नहीं कही जा सकती । मैं अपने जीवन को सफल समझूँगा यदि मुझे आप अपनी आज्ञा का पात्र बनावेंगी । वह बोली मुझे एक आवश्‍यक बात की ओर तुम्‍हारा ध्‍यान आ‍कर्षित करना है । इसीलिये मैं यहाँ आई हूँ । और वह बड़ी विलक्षण बात है, सुनते हो न ?

इसके बाद आर्यिका ने यों कहना आरंभ किया -- पुत्र जानते हो, तुम्‍हारे पिता को सर्प ने काटा था, उसको वेदना से मरकर वे सल्‍लकी वन में हाथी हुए और वह सर्प मरकर उसी वन में मुर्गा हुआ । एक दिन हाथी जल पीने गया । वह नदी के किनारे पर खूब गहरे कीचड़ में फँस गया । वह उसमें से किसी तरह निकल नहीं सका । अन्‍त में निरूपाय होकर वह मर गया । उसके दाँत और मोती एक भील के हाथ लगे । भील ने उन्‍हें एक सेठ के हाथ बेच दिये । सेठ के द्वारा वे ही दाँत और मोती तुम्‍हारे पास आये । तुमने दाँतों के तो पलंग के पाये बनवाये और मोतियों का अपनों पत्‍नी के लिये हार बनवाया । यह संसार की विचित्र लीला है । इसके बाद तुम्‍हें उचित जान पड़े सो करो ।

आर्यिका इतना कहकर चुप हो रही । पूर्णचन्‍द्र अपने पिता की कथा सुनकर एक साथ रो पड़े । उनका हृदय पिता के शोक से सन्‍तप्‍त हो उठा । जैसे दावाग्निसे पर्वत सन्‍तप्‍त हो उठता है । उनके रोने के साथ ही सारे अन्‍त:पुर में हाहाकार मच गया । उन्‍होंने पितृप्रेम के वश हो उन पलंग के पायों को छाती से लगाया । इसके बाद उन्‍होंने पलंग के पायों और मोतियों की चन्‍दनादि से पूजा कर उन्‍हें जला दिया । ठीक है मोह के वश होकर यह जीव क्‍या-क्‍या नहीं करता ?

इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि मोह का चक्र जब अच्‍छे–अच्‍छे महात्‍माओं पर भी चल जाता है, तब पूर्णचन्‍द्र पर उसका प्रभाव पड़ना कोई आश्‍चर्य का कारण नहीं है । पर पूर्णचन्‍द्र बुद्धिमान् थे, उन्‍होंने झट से अपने को सम्‍हाल लिया और पवित्र श्रावक-धर्म को ग्रहण कर बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ उनका वे पालन करने लगे । फिर आयु के अन्‍त में वे पवित्र भावों से मृत्‍यु लाभकर महाशुक्र नामक स्‍वर्ग में देव हुए । उनकी माता भी अपनी शक्ति के अनुसार तपश्‍चर्या कर उसी स्‍वर्ग में देव हुई । सच है संसार में जन्‍म लेकर कौन-कौन काल के ग्रास नहीं बने ? मन: धारक सिंहचन्‍द्र मुनि भी तपश्‍चर्या और निर्मल चारित्र के प्रभाव से मृत्‍यु प्राप्‍त कर ग्रैवेयक में जाकर देव हुए ।

भारतवर्ष के अन्‍तर्गत सूर्चाभपुर नामक एक शहर है । उसके राजा का नाम सुरावर्त्त है ! वे बड़े बुद्धिमान और तेजस्‍वी हैं । उनकी महारानी का नाम था यशोधरा । वह बड़ी सुन्‍दरी थी, बुद्धिमती थी, सती थी, सरल स्‍वभाव वाली थी और विदुषी थी । वह सदा दान देती, जिन भगवान् की पूजा करती, और बड़ी श्रद्धा के साथ उपवासादि करती ।

सिंहसेन राजा का जीव, जो हाथी की पर्याय से मरकर स्‍वर्ग गया था, यशोधरा रानी का पुत्र हुआ । उसका नाम था रश्मिवेग । कुछ दिनों बाद महाराज सुरावर्त्त तो राज्‍यभार रश्मिवेग के लिये सौंपकर साधु बन गये और राज्‍यकार्य रश्मिवेग चलाने लगा ।

एक दिन की बात है कि धर्मात्‍मा रश्मिवेग सिद्धकूट जिनालय की वन्‍दना के लिये गया । वहाँ उसने एक हरिचन्‍द्र नाम के मुनिराज को देखा; उनसे धर्मोपदेश सुना । धर्मोपदेश का उसके चित्‍त पर बड़ा प्रभाव पड़ा । उसे बहुत वैराग्‍य हुआ । संसार शरीर-भोगादिकों से उसे बड़ी घृणा हुई । उसने उसी समय मुनिराज से दीक्षा ग्रहण कर ली ।

एक दिन रश्मिवेग महामुनि एक पर्वत की गुफा में कायोत्‍सर्ग धारण किये हुए थे कि एक भयानक अजगर ने, जो कि श्रीभूति का जीव सर्प पर्याय से मरकर चौथे नरक गया था और वहाँ से आकर यह अजगर हुआ, उन्‍हें काट खाया । मुनिराज तब भी ध्‍यान में निश्‍चल खड़े रहे, जरा भी विचलित नहीं हुए । अन्‍त में मृत्‍यु प्राप्‍त कर समाधिमरण के प्रभाव से वे कापिष्‍ठ-स्‍वर्ग में जाकर आदित्‍यप्रभ नामक महर्द्धिक देव हुए, जो कि सदा मरकर पाप के उदय से फिर चौथे नरक गया । वहाँ उसे नारकियों ने कभी तलवार से काटा और कभी करौती से, कभी उसे अग्नि में जलाया और कभी धानी में पेला, कभी अतिशय गरम तेल की कढ़ाई में डाला और कभी लो‍हे के गरम खंभों से आर्लिगन कराया । मतलब यह कि नरक में उसे घोर दु:ख भोगना पड़े ।

चक्रपुर नाम का एक सुन्‍दर शहर है । उसके राजा है चक्रायुध और उनकी महारानी का नाम चित्रादेवी है । पूर्वजन्म के पुण्‍य से सिंहसेन राजा का जीव स्‍वर्ग से आकर इनका पुत्र हुआ । उसका नाम था वज्रायुध । जिन धर्म पर उसकी बड़ी श्रद्धा थी । जब वह राज्‍य करने को समर्थ हो गया तब महाराज चक्रायुध ने राज्‍य का भार उसे सौंप कर जिन दीक्षा ग्रहण कर ली । वज्रायुध सुख और नीति के साथ राज्‍य का पालन करने लगे । उन्‍होंने बहुत दिनों तक राज्‍य सुख भोगा । पश्‍चात् एक दिन किसी कारण से उन्‍हें भी वैराग्य हो गया ।वे अपने पिता के पास दीक्षा लेकर साधु बन गये । वज्रायुध मुनि एक दिन पियंगु नामक पर्वत पर कायोत्‍सर्ग ध्‍यान कर रहे थे कि इतने में एक दुष्‍ट भीलने, जो कि सर्प का जीव चौथे नरक गया था और वहाँ से अब यही भील हुआ, उन्हें बाण से मार दिया । मुनिराज तो समभावों से प्राण त्‍याग कर सर्वार्थसिद्धि गये और वह भील रौद्र भाव से मरकर सातवें नरक गया ।

सर्वार्थसिद्धि से आकर वज्रायुध का जीव तो संजयन्‍त हुआ, जो संसार में प्रसिद्ध है और पूर्णचन्‍द्र का जीव उनका छोटा भाई जयन्‍त हुआ । वे दोनों भाई छोटी ही अवस्‍था में कामभोगों से विरक्त होकर पिता के साथ मुनि हो गये । और वह भील का जीव सातवें नरक से निकल कर अनेक कुगतियों में भटका । उनमें उसने बहुत कष्‍ट सहा । अन्‍त में वह मरकर ऐरावत क्षेत्रान्‍तर्गत भूतरमण नामक वन में बहने वाली वेगवती नाम की नदी के किनारे पर गोश्रृंगतापस की शंखिनी नाम की स्‍त्री के हरिणश्रृंग नामक पुत्र हुआ । वही पंचाग्नितप तप कर यह विद्युद्दष्‍ट्र विद्याधर हुआ है, जिसने कि संजयन्‍त मुनि पर पूर्वजन्‍म के बैर से घोर उपसर्ग किया । और उनके छोटे भाई जयन्‍त मुनि निदान करके जो धरणेन्‍द्र हुए, वे तुम हो ।

संजयन्‍त मुनि पर पापी विद्युद्दष्‍ट्र ने घोर उपसर्ग किया, तब भी वे पवित्रात्‍मा रन्च मात्र विचलित नहीं हुए सुमेरू के समान निश्‍चल रहकर उन्‍होंने सब परीषहों को सहा और सम्‍यक्‍तप का उद्योत कर अन्‍त में मोक्ष प्राप्‍त किया । वहाँ उन के अनन्‍तज्ञानादि स्‍वाभाविक गुण प्रगट हुए । वे अनन्‍त काल तक मोक्ष में ही रहेंगे । अब वे संसार में नहीं आवेंगे ।

दिवाकर ने कहा -- नागेन्‍द्रराज ! यह संसार की स्थिति है । इसे देखकर इस बेचारे पर तुम्‍हें क्रोध करना उचित नहीं । इसे दया करके छोड दीजिये । सुनकर धरणेन्‍द्र बोला, मैं आपके कहने से इसे छोड़ देता हूँ; परन्‍तु इसे अपने अभिमान का फल मिले, इसलिये मैं शाप देता हूँ कि 'मनुष्‍य पर्याय में इसे कभी विद्या की सिद्धि न हो ।' इसके बाद धरणेन्‍द्र अपने भाई संजयन्‍त मुनि के मृत शरीर की बड़ी भक्ति के साथ पूजा कर अपने स्‍थान पर चला गया ।

इस प्रकार उत्कृष्‍ट तपश्‍चर्या कर के श्री संजयन्‍त मुनि ने अविनाशी मोक्षश्री को प्राप्‍त किया । वे हमें भी उत्‍तम सुख प्रदान करें ।

श्री मल्लिभूषण गुरू कुन्‍दकुन्‍दाचार्य की परम्‍परा में हुए । वे भगवान् के चरण कमलों के भ्रमर थे, उनकी भक्ति में सदा लीन रहते थे, सम्‍यग्ज्ञान के समुद्र थे, पवित्र चारित्र के धारक थे और संसार समुद्र से भव्‍य जीवों को पार करने वाले थे । वे ही मल्लिभूषण गुरू मुझे भी सुख-सम्‍पत्ति प्रदान करें ।


+ अंजन चोर की कथा -
अंजन चोर की कथा
सुख के देने वाले श्री सर्वज्ञ वीतराग भगवान् के चरण कमलों को नमस्‍कार कर अंजन चोर की कथा लिखता हूँ, जिसने सम्‍यग्‍दर्शन के नि:शंकित अंग का उद्योत किया है |
भारतवर्ष-मगधदेश के अन्‍तर्गत राजगृह नामक शहर में एक जिनदत्‍त सेठ रहता था । वह बड़ा धर्मात्‍मा था । वह निरन्‍तर जिन भगवान् की पूजा करता, दीन दुखियों को दान देता, श्रावकों के व्रतों का पालन करता और सदा शान्‍त और विषय भोगों से विरक्‍त रहता । एक दिन जिन दत्‍त चतुर्दशी के दिन आधी रात के समय श्‍मशान में कायोत्‍सर्ग ध्‍यान कर रहा था । उस समय वहाँ दो देव आये । उनके नाम अमितप्रभ और विद्युत्‍प्रभ थे । अमितप्रभ जैन धर्म का विश्‍वासी था और विद्युत्‍प्रभ दूसरे धर्म का । वे अपने-अपने स्‍थान से परस्पर के धर्म की परीक्षा की । वह अपने ध्‍यान से विचलित हो गया । इसके बाद उन्‍होंने जिनदत्‍त को श्‍मशान में ध्‍यान करते देखा । तब अमितप्रभ ने विद्युत्‍प्रभ से कहा—प्रिय, उत्‍कृष्‍ट चारित्र के पालने वाले जिनधर्म के सच्‍चे साधुओं की परीक्षा की बात को तो जाने दो, परन्‍तु देखते हो, वह गृहस्‍थ जो कायोत्‍सर्ग से खड़ा हुआ है, यदि तुम में कुछ शक्ति हो, तो तुम उसे ही अपने ध्‍यान से विचलित कर दो यदि तुमने उसे ध्‍यान से चला दिया तो हम तुम्‍हारा ही कहना सत्‍य मान लेंगे ।

अमितप्रभ से उत्तेजना पाकर विद्युत्‍प्रभ ने जिनदत्त पर अत्‍यन्‍त दुस्‍सह और भयानक उपद्रव किया, पर जिनदत्त उस से कुछ भी विचलित न हुआ और पर्वत की तरह खड़ा रहा । जब सबेरा हुआ तब दोनों देवों ने अपना असली वेष प्रगट कर बड़ी भक्ति के साथ उसका खूब सत्‍कार किया और बहुत प्रशंसा कर जिनदत्त को एक आकाशगामिनी विद्या दी । इसके बाद वे जिनदत्त से यह कहकर, कि श्रावकोत्तम ! तुम्‍हें आज से आकाशगामिनी विद्या सिद्ध हुई; तुम पंच नमस्‍कार मंत्र की साधन विधि के साथ इसे दूसरों को प्रदान करोगे तो उन्‍हें भी यह सिद्ध होगी—अपने स्‍थान पर चले गये ।

विद्या की प्राप्ति से जिनदत्त बड़ा प्रसन्‍न हुआ । उसकी अकृत्रिम चैत्‍यालयों के दर्शन करने की इच्‍छा पूरी हुई । वह उसी समय विद्या के प्रभाव से अकृत्रिम चैत्‍यालय दर्शन करने को गया और खूब भक्ति भाव से उसने जिनभागवान् की पूजा की, जो कि स्‍वर्ग मोक्ष की देने वाली है ।

इसी प्रकार अब जिनदत्त प्रतिदिन अकृत्रिम जिनमन्दिरों के दर्शन करने के लिये जाने लगा । एक दिन वह जाने के लिये तैयार खड़ा हुआ था कि उससे एक सोमदत्त नाम के माली ने पूछा—आप प्रतिदिन सबेरे ही उठकर कहाँ जाया करते हैं ? उत्तर में जिनदत्त सेठ ने कहा—मुझे दो देवों की कृपा से आकाशगामिनी विद्या की प्राप्ति हुई है । सो उसके बल से सुवर्णमय अकृत्रिम जिनमंदिरों की पूजा करने के लिये जाया करता हूँ, जो कि सुख शान्ति की देने वाली है । तब सोमदत्त ने जिनदत्त से कहा—प्रभो, मुझे भी विद्या प्रदान कीजिये न ? जिससे मैं भी अच्‍छे सुन्‍दर सुगन्धित फूल लेकर प्रतिदिन भगवान् की पूजा करने को जाया करूँ और उसके द्वारा शुभ कर्म उपार्जन करूँ । आपकी बड़ी कृपा होगी यदि आप मुझे विद्या प्रदान करेंगे ।

सोमदत्त की भक्ति और पवित्रता को देखकर जिनदत्त ने उसे विद्या साधन करने की रीति बतला दी । सोमदत्त उससे सब विधि ठीक-ठीक समझ कर विद्या साधने के लिये कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी की अन्‍धेरी रात में श्‍मशान में गया, जो कि बड़ा भयंकर था । वहाँ उसने एक बड़की डाली में एक सौ आठ लड़ीका एक दूवा का सींका बाँधा और उसके नीचे अनेक भयंकर तीखे-तीखे शस्‍त्र सीधे मुँह गाड़कर उनकी पुष्‍पादि से पूजा की । इसके बाद वह सींके पर बैठ कर पंच नमस्‍कार मंत्र जपने लगा । मंत्र पूरा होने पर जब सींका के काटने का समय आया और उसकी दृष्टि चमचमाते हुए शस्‍त्रों पर पड़ी तब उन्‍हें देखते ही वह कांप उठा । उसने विचारा—यदि जिनदत्त ने मुझे झूठ कह दिया हो तब तो मेरे प्राण ही चले जायंगे; य‍ह सोचकर वह नीचे उतर आया । उसके मन में फिर कल्‍पना उठी कि भला जिनदत्त को मुझसे क्‍या लेना है जो वह कहकर मुझे ऐसे मृत्‍यु के मुख में डालेगा ? और फिर वह तो जिनधर्म का परम श्रद्धालु है, उस के रोम रोम में दया भरी हुई है, उसे मेरी जान लेने से क्‍या लाभ ? इत्‍यादि विचारों से अपने मन की संतुष्‍ट कर वह फिर सींके पर चढ़ा पर जैसे ही उसकी दृष्टि फिर शस्‍त्रों पर पड़ी कि वह फिर भय के मारे नीचे उतर आया । इसी तरह वह बार-बार उतरने चढ़ने लगा, पर उसकी हिम्‍मत सींका काट देने की नहीं हुर्इ । सच है जिन्‍हें स्‍वर्गमोक्ष का सुख देने वाले जिनभगवान् के वचनों पर विश्‍वास नहीं, मन् में उन पर निश्‍चय नहीं, उन्‍हें संसार में कोई सिद्धि कभी प्राप्‍त नहीं होती ।

उसी रात को एक और घटना हुई वह उल्‍लेख योग्‍य है और खास कर उसका इसी घटना से सम्‍बन्‍ध है । इसलिये उसे लिखते हैं । वह इस प्रकार है-
इधर तो सोमदत्त सर्शक होकर क्षण भर में वृक्ष पर चढ़ता और क्षण भर में उस पर से उतरता था, और दूसरी ओर इसी समय माणिकांजन सुन्‍दरी नाम की एक वैश्‍या ने अपने पर प्रेम करने वाले एक अंजन नाम केचोर सेकहा—प्राणबल्‍लभ, आज मैंने प्रजापाल महाराज को कनकवती नाम की पट्टरानी के गले में रत्‍न का हार देखा है । वह बहुत ही सुन्‍दर है । मेरा तो यह भी विश्‍वास है कि संसार भर में उसकी तुलना करने वाला कोई और हार होगा ही नहीं । सो आप उसे लाकर मुझे दीजिये, तब ही आप मेरे स्‍वामी हो सकेंगे अन्‍यथा नहीं ।

माणिकांजन सुन्‍दरी की ऐसी कठिन प्रतिज्ञा सुनकर पहले तो वह कुछ हिच का, पर साथ ही उस के प्रेम ने उसे वैसा करने को वाध्‍य किया । वह अपने जीवन की भी कुछ परवा न कर हार चुरा लाने के लिये राजमहल पहुँचा और मौका देखकर महल में घुस गया । रानी के शयनागार में पहुँचकर उसने उसके गले में से बड़ी कुशलता के साथ हार निकाल लिया । हार लेकर व‍ह चलता बना । हजारों पहरेदारों की आँखों मे धूल डालकर साफ निकल जाता, पर अपने दिव्‍य प्रकाश से गाढ़े से गाढ़े अन्‍धकार को भी नष्‍ट करने वाले हार ने उसे सफल प्रयत्‍न नहीं होने दिया । पहरे वालों ने उसे हार ले जाते हुए देख लिया । वे उसे पकड़ने को दौंड़े । अंजन चोर भी खूब जी छोड़कर भागा, पर आखिर कहाँ तक भाग सकता था । पहरेदार उसे पकड़ लेना ही चाहते थे कि उसने एक नई युक्ति की । वह हार को पीछे की ओर जोर से फेंक कर भागा । सिपाही लोग तो हार उठाने में लगे और इधर अंजन चोर बहुत दूर तक निकल आया । सिपाहियों ने तब भी उसका पीछा न छोड़ा । वे उसका पीछा किये चले ही गये । अंजन चोर भागता-भागता श्‍मशान की ओर जा निकला, जहाँ जिनदत्त के उपदेश से सोमदत्त विद्या साधन के लिये व्‍यग्र हो रहा था । उसका यह भयंकर उपक्रम देखकर अंजन ने उससे पूछा कि तुम यह क्या कर रहे हो ? क्‍यों अपनी जान दे रहे हो ? उत्‍तर में सोमदत्त की बातों से अंजन को बड़ी खुशी हुई । उसने सोचा कि सिपाही लोग तो मुझे मारने के लिये पीछे आ ही रहे हैं और वे अवश्‍य मुझे मार भी डालेंगे । क्‍योंकि मेरा अपराध कोई साधारण अपराध नहीं है । फिर यदि मरना ही है तो धर्म के आश्रित रहकर ही मरना अच्‍छा है । यह विचार कर उसने सोमदत्‍त से कहा—बस इसी थोड़ी सी बात के लिये इतने डरते हो ? अच्‍छा लाओ, मुझे तलवार दो, मैं भी तो जरा आजमा लूँ । यह कहकर उसने सोमदत्त से तलवार ले ली ओर वृक्ष पर चढ़कर सींके पर जा बैठा । वह सींके को काटने के लिये तैयार हुआ कि सोमदत्त के बताये मन्‍त्र को भूल गया । पर उसकी वह कुछ परवा न कर और केवल इस बात पर विश्‍वास करके कि ''जैसा सेठ ने कहा उसका कहना मुझे प्रमाण है ।'' उसने नि:शंक होकर एक ही झटके में सारे सीकें को काट दिया । काटने के साथ ही जब तक वह शस्‍त्रों पर गिरता है तब तक आकाशगामिनी विद्या ने आकर उससे कहा-देव, आज्ञा कीजिये, मैं उपस्थित हूँ । विद्या को अपने सामने खड़ी देखकर अंजन चोर को बड़ी खुशी हुई । उसने विद्या से कहा, मेरू पर्वत पर जहाँ जिनदत्त सेठ भगवान् की पूजा कर रहा है, वहीं मुझे पहुँचा दे । उसके कहने के साथ ही विद्या ने उसे जिनदत्त के पास पहुँचा दिया । सच है, जिन धर्म के प्रसाद से क्‍या नहीं होता ?

सेठ पास पहुँचकर अंजन ने बड़ी भक्ति के साथ उन्‍हें प्रणाम किया और वह बोला-हे दया के समुद्र ! मैंने आपकी कृपा से आकाशगामिनी विद्या तो प्राप्‍त की, पर अब आप मुझे कोई ऐसा मंत्र बतलाइये जिससे मैं संसार समुद्र से पार होकर मोक्ष में पहुँच जाऊँ सिद्ध हो जाऊँ ।

अंजन की इस प्रकार वैराग्‍य भरी बातें सुनकर परोपकारी जिनदत्त ने उसे एक चारणऋद्धि के धारक मुनिराज के पास लिवा लेजाकर उनसे जिनदीक्षा दिलवा दी । अंजन चोर साधु बनकर धीरे-धीरे कैलास पर जा पहुँचा। वहाँ खूब तपश्‍चर्या कर ध्‍यान के प्रभाव से उसने घातिया कर्मों का नाश किया और केवल ज्ञान प्राप्‍त कर वह त्रैलोक्‍य द्वारा पूजित हुआ । अन्‍त में अघातिया कर्मों का भी नाश कर अंजन मुनिराज ने अविनाशी, अनन्‍त गुणों के समुद्र मोक्षपद को प्राप्‍त किया ।

सम्‍यग्‍यर्शन के नि:शंकित गुण का पालन कर अंजन चोर भी निरंजन हुआ, कर्मों के नाश करने में समर्थ हुआ । इसलिये भव्‍यपुरूषों को तो नि:शंकित अंग का पालन करना ही चाहिये ।

मूलसघ में श्रीमल्लिभूषण भट्टाकर हुए । वे सम्‍यग्‍दर्शन, सम्‍यग्‍ज्ञान और सम्‍यक्‍चारित्र रूप उत्‍कृष्‍ट रत्‍नों से अलंकृत थे, बुद्धिमान थे, और ज्ञान के समुद्र थे । सिंहनन्‍दी मुनि उनके शिष्‍य थे । वे मिथ्‍यात्‍वमतरूपी पर्वतों को तोड़ने के लिये वज्र के समान थे, बड़े पाण्डित्‍य के साथ वे अन्‍य सिद्धान्‍तों का खण्‍डन करते थे और भव्‍यपुरूषरूपी कमलों को प्रफुल्लित करने के लिये वे सूर्य के समान थे । वे चिरकाल तक जीयें उनका यश शरीर इस नश्‍वर संसार सदा बना रहे ।


+ अनन्‍तमतीकी कथा -
अनन्‍तमतीकी कथा
मोक्ष सुख के देनेवाले श्रीअर्हन्‍त भगवान् के चरणोंको भक्तिपूर्वक नमस्‍कार कर अनन्‍तमतीकी कथा लिखता हूँ, जिसके द्वारा सम्‍यग्‍दर्शनके नि:कांक्षित गुणका प्रकाश हुआ है ।

संसार में अंगदेश बहुत प्रसिद्ध देश है । जिस समयकी हम कथा लिखते है, उस समय उसकी प्रधान राजधानी चम्‍पापुरी थी । उसके राजा थे वसुवर्धन और उनकी रानीका नाम लक्ष्‍मीमती था । वह सती थी, गुणवती थी और बड़ी सरल स्‍वभावकी थी । उनके एक पुत्र था । उसका नाम था प्रियदत्त । प्रियदत्तको जिनधर्मपर पूर्ण श्रद्धा थी । उसकी गृहिणीका नाम अंगवती था । वह बड़ी धर्मात्‍मा थी, उदार थी । अंगवती के एक पुत्री थी । उसका नाम अनन्‍तमती था । वह बहुत सुन्‍दर थी, गुणोंकी समुद्र थी ।

अष्‍टाह्र‍िका पर्व आया । प्रियदत्त ने धर्म कीर्ति मुनिराज के पास आठ दिन के लिये ब्रह्मचर्य व्रत लिया । साथ ही में उसने अपनी प्रिय पुत्री को भी विनोद वश होकर ब्रह्मचर्य व्रत दे दिया । कभी कभी सत्‍पुरूषों का विनोद भी सत्‍य मार्ग का प्रदर्शक बन जाता है । अनन्‍तमती के चित्त पर भी प्रियदत्त के दिलाये व्रत का ऐसा ही प्रभाव पड़ा । जब अनन्‍तमती के ब्‍याह का समय आया और उसके लिये आयोजन होने लगा, तब अनन्‍तमती ने अपने पिता से कहा—पिताजी ! आपने मुझे ब्रह्मचर्य व्रत दिया था न ? फिर यह ब्‍याह का आयोजन आप किसलिये करते हैं ?

उत्तर में प्रियदत्त कहा—पुत्री, मैंने तो तुझे जो व्रत दिलवाया था वह केवल मेरा विनोद था । क्‍या तू उसे सच समझ बैठी है ?

अनन्‍तमती बोली-पिताजी, धर्म और व्रत में हँसी विनोद कैसा, यह मैं नहीं समझी ?

प्रियदत्त ने फिर कहा—मेरे कुल की प्रकाशक प्‍यारी पुत्री, मैंने तो तुझे ब्रह्मचर्य केवल विनोद से दिया था । और तू उसे सच ही समझ बैठी है, तो भी वह आठ ही दिन के लिये था । फिर अब तू ब्‍याह से क्‍यों इंकार करती है ?

अनन्‍तमती ने कहा—मैं मानती हूँ कि आपने अपने भावों से मुझे आठ ही दिन का ब्रह्मचर्य दिया होगा; परन्‍तु न तो आप को उस समय मुझसे ऐसा कहा और न मुनि महाराज ने ही, तब मैं कैसे समझूं कि वह आठ ही दिन के लिये था । इसलिये अब जैसा कुछ हो, मैं तो जीवन पर्यन्‍त ही उसे पालूँगी । मैं अब ब्‍याह नहीं करूँगी ।

अनन्‍तमती की बातों से उसके पिता को बड़ी निराशा हुई; पर वे कर भी क्‍या सकते थे। उन्‍हें अपना सब आयोजन समेट लेना पड़ा । इसे बाद उन्‍होंने अनन्‍तमती के जीवन को धार्मिक-जीवन बनाने के लिये उसके पठन पाठन का अच्‍छा प्रबन्‍ध कर दिया । अनन्‍तमती भी निराकुलता से शास्‍त्रों का अभ्‍यास करने लगी ।

इस समय अनन्‍तमती पूर्ण युवती है । उसकी सुन्‍दरता ने स्‍वर्गीय सुन्‍दरता धारण को है । उसके अंग-अंग से लावण्‍यसुधा का झरना बह रहा है । चन्‍द्रमा उसके अप्रतिम मुख की शोभा को देखकर फीका पड़ रहा है और नखों के प्रतिबिम्‍ब के बहाने से उसके पावों में पड़कर अपनी इज्‍जत बचा लेने के लिये उससे प्रार्थना करता है । उसकी बड़ी-बड़ी और प्रफुल्लित आँखों को देखकर बेचारे कमलों से मुख भी ऊँचा नहीं किया जाता है । यदि सच पूछो तो उसके सौन्‍दर्य की प्रशंसा करना मानों उसकी मर्यादा बाँध देना है, पर वह तो अमर्याद है, स्‍वर्ग की सुन्‍दरियों को भी दुर्लभ है ।

चैत्र का महिना था । एक दिन अनन्‍तमती विनोद वश हो, अपने बगीचे में अकेली झूले पर झूल रही थी । इसी समय एक कुण्‍डलमंडित नाम का विद्याधरों का राजा, जो कि विद्याधरों की दक्षिणश्रेणी के किन्‍नरपुर का स्‍वामी था, इधर ही होकर अपनी प्रिया के साथ वायुयान में बैठा हुआ जा रहा था । एकाएक उसकी दृष्टि झूलती हुई अनन्‍तमती पर पड़ी उसकी स्‍वर्गीय सुन्‍दरता को देखकर कुण्‍डलमंडित काम के बाणों से बुरी तरह बीधा गया । उसने अनन्‍तमती की प्राप्ति के बिना अपने जन्‍म को व्‍यर्थ समझा । वह उस बेचारी बालिका को उड़ा तो उसी वक्‍त ले जाता, पर साथ में प्रिया के होने से ऐसा अनर्थ करने के लिये उसकी हिम्‍मत न पड़ी । पर उसे बिना अनन्‍तमती के कब चैन पड़ सकता था ? इसलिये वह अपने विमान की शीघ्रता से घर लौटा ले गया और वहाँ अपनी प्रिया को रखकर उसी समय अनन्‍तमती के बगीचे में आ उपस्थित हुआ और बड़ी फुर्ती से उस भोली बालिका को उठा ले चला । उधर उसकी प्रिया को भी इसके कर्म का कुछ-कुछ अनुसन्‍धान लग गया था । इसलिये कुण्डलमंडित तो उसे घर पर छोड़ आया था, पर वह घर पर न ठहर कर उसके पीछे-पीछे हो चली । जिस समय कुण्‍डलमंडित अनन्‍तमती को लेकर आकाश की ओर जा रहा था, कि उसकी दृष्टि अपनी प्रिया पर पड़ी । क्रोध के मारे लाल मुखकिये हुई देखकर कुण्‍डलमंडित के प्राण देवता एक साथ शीतल पढ़ गये । उसके शरीर को काटो तो खून नहीं । ऐसे स्थिति में अधिक गोलमाल होने के भय से उसने बड़ी फुर्ती के साथ अनन्‍तमती को एक पर्णलध्‍वी नाम की विद्या के आधीन कर उसे एक भयंकर बनी में छोड़ देने की आज्ञा दे दी और आप पत्‍नी के साथ घर लौट गया और उसके सामने अपनी निर्दोषता का यह प्रमाण पेश कर दिया कि अनन्‍तमती न तो विमान में उसे देखने को मिली और न विद्या के सुपुर्द करते समय कुण्‍डलमंडित ने ही उसे देखने दी ।

उस भयंकर बनी में अनन्‍तमती बड़े जोर-जोर से रोने लगी, पर उसके रोने को सुनता भी कौन ? वह तो कोसों तक मनुष्‍यों के पदचार से रहित थी । कुछ समय बाद एक भीलों का राजा शिकार खेलता हुआ उधर आ निकला । उसने अनन्‍तमती को देखा । देखते ही वह भी काम के बाणों से घायल हो गया और उसी समय उसे उठाकर अपने गाँव में ले गया । अनन्‍तमती तो यह समझी कि देव ने मुझे इसके हाथ सौंपकर मेरी रक्षा की है और अब मैं अपने घर पहुँचा दी जाऊँगी । पर नहीं, उसकी यह समझ ठीक नहीं थी । वह छुटकारे के स्‍थान में एक और नई विपत्ति के मुख में फँस गई ।

राजा उसे अपने महल ले जाकर बोला—बाले, आज तुम्‍हें अपना सौभाग्‍य समझना चाहिये कि एक राजा तुम पर मुग्‍ध है, और वह तुम्‍हें अपनी पट्टरानी बनाना चाहता है । प्रसन्‍न होकर उसकी प्रार्थना स्‍वीकार करो और अपने स्‍वर्गीय समागम सें उसे सुखी करो । वह तुम्‍हारे सामने हाथ जोड़े खड़ा है तुम्‍हें बनदेवी समझकर अपना मन चाहा वर माँगता है । उसे देकर उसकी आशा पूरी करो । बेचारी भोली अनन्‍तमती उस पापी की बातों का क्‍या जवाब देती ? वह फूट-फूटकर रोने लगी और आकाश पाताल एक करने लगी । पर उसकी सुनता कौन ? वह तो राज्‍य ही मनुष्‍य जाति के राक्षसों का था ।

भील राजा के निर्दयी हृदय में तब भी अनन्‍तमती के लिये कुछ भी दया नहीं आई । उसने और भी बहुत-बहुत प्रार्थना की, विनय-अनुनय किया, भय दिखाया, पर अनन्‍तमती ने उस पर कुछ ध्‍यान नहीं दिया । किन्‍तु यह सोचकर, कि इन नारकियों के सामने रोने धोने से कुछ काम नहीं चलेगा, उसने उसे फटकारना शुरू किया । उसकी आँखों से क्रोध की चिनगारियाँ निकलने लगीं, उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया । सब कुछ हुआ, पर उस भील राक्षस पर उसका कुछ प्रभाव न पड़ा । उसने अनन्‍तमती से बलात्‍कार करना चाहा । इतने में उसके पुण्‍यप्रभाव से, नहीं, शील के अखंड बल से वन देवी ने आकर अनन्‍तमती की रक्षा की और उस पापी को उसके पाप का खूब फल दिया और कहानीच, तू नहीं जानता यह कौन है ? याद रख यह संसार की पूज्‍य एक महादेवी है, जो इसे तूने सताया कि समझ तेरे जीवन की कुशल नहीं है । यह कहकर वनदेवी अपने स्‍थान पर चली गई । उसके कहने का भील राज पर बहुत असर पड़ा और पड़ना चाहिये था । क्‍योंकि थी तो वह देवी ही न ? देवी के डर के मारे दिन निकलते ही उसने अननतमती को एक साहूकार के हाथ सौंपकर उससे कह दिया कि इसे इसके घर पहुँचा दीजियेगा पुष्‍पक सेठ ने उस समय तो अनन्‍तमती को उसके घर पहुँचा देने का इकरार कर भील राज से ले ली । पर यह किसने जाना कि उसका हृदय भी भीतर से पापपूर्ण होगा । अनन्‍तमती को पाकर वह समझने लगा कि मेरे हाथ अनायास स्‍वर्ग की सुन्‍दरी लग गई । यह यदि मेरी बात प्रसन्‍नता पूर्वक मान ले तब तो अच्‍छा ही है, नहीं तो मेरे पंजे से छूट कर भी तो यह नहीं जा सकती । यह विचारकर उस पापी ने अनन्‍तमती से कहा-सुन्‍दरी, तुम बड़ी भाग्‍यवती हो, जो एक नर पिशाच के हाथ से छूटकर पुण्‍यपुरूष के सुपुर्द हुई । कहाँ तो यह तुम्‍हारी अनिन्‍द्य स्वर्गीय सुन्‍दरता और कहाँ वह भील राक्षस कि जिसे देखते ही हृदय काँप उठता है ? मैं तो आज अपने को देवों से भी कहीं चढ़कर भाग्‍यशाली समझता हूँ, जो मुझे अनमोल स्‍त्री रत्‍न सुलभता के साथ प्राप्‍त हुआ । भला, बिना महाभाग्‍य के कहीं ऐसा रत्‍न मिल सकता है ? सुन्‍दरी, देखती हो, मेरे पास अटूट धन है, अनन्‍त वैभव है, पर उस सबको तुम पर न्‍यौछावर करने को तैयार हूँ और तुम्हारे चरणों का अत्‍यन्‍त दास बनता हूँ । कहो, मुझपर प्रसन्‍न हो ? मुझे अपने हृदय में जगह दोगी न ? दो, और मेरे जीवन को, मेरे धन-वैभव को सफल करो ।

अनन्‍तमती ने समझा था कि इस भले मानस की कृपा से मैं सुख पूर्वक पिताजी के पास पहुँच जाऊँगी, पर वह बैचारी पापियों के पापी हृदय की बात को क्‍या जाने ? उसे जो मिलता था, उसे वह भला ही समझती थी । यह स्‍वाभाविक बात है कि अच्‍छे को संसार अच्‍छा ही दिखता है । अनन्‍तमती ने पुष्‍पक सेठ की पापपूर्ण बातें सुनकर बड़े कोमल शब्‍दों में कहा--महाशय, आपको देखकर तो मुझे विश्‍वास हुआ था कि अब मेरे लिये कोई डर की बात नहीं रही मैं निर्विघ्न अपने घरपर पहुँच जाऊँगी । क्‍योंकि मेरे एक दूसरे पिता मेरी रक्षा के लिये आ गये हैं । पर मुझे अत्‍यन्‍त दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि आप सरीखे भले मानस के मुँह सेऔर ऐसी नीच बातें ? जिसे मैंने रस्‍सी समझकर हाथ में लिया था, मैं नहीं समझती थी कि वह इतना भयंकर सर्प होगा । क्‍या यह बाहरी चमक-दमक और सीधापन केवल दाम्भिकपना है ? केवल बगुलों की हंसो में गणना कराने के लिये है ? यदि ऐसा है तो मैं तुम्‍हें, तुम्‍हारे कुल को तुम्हारे धन- वैभव को और तुम्हारे जीवन को घिक्‍कार देती हूँ, अत्‍यन्‍त घृणा की दृष्टि से देखती हूँ । जो मनुष्‍य केवल संसार को ठगने के लिये ऐसे मायाचार करता है, बाहर धर्मात्‍मा बनने का ढोंग रचता है, लोगों को धोखा देकर अपने मायाजाल में फँसाया है, वह मनुष्‍य नहीं है; किन्‍तु पशु है, पिशाच है, राक्षस है । वह पापी मुँह देखने योग्‍य नहीं, नाम लेने योग्‍य नहीं । उसे जितना धिक्‍कर दिया जाय थोड़ा है । मैं नहीं जानती थी कि आप भी उन्‍हीं पुरूषों में से एक होंगे । अनन्‍तमती और भी कहती, पर वह ऐसे कुल कलंक नीचों के मुँह लगना उचित नहीं समझ चुप हो रही । अपने क्रोधकी वह दबा गई ।

उस की जली भुनी बातें सुनकर पुष्‍पक सेठ की अक्‍ल ठिकाने आ गई । वह जलकर खाक हो गया, क्रोध से उसका सारा शरीर काँप उठा, पर तब भी अनन्‍तमती के दिव्‍य तेज के सामने उससे कुछ करते नहीं बना । उसने अपने क्रोध का बदला अनन्‍तमती से इस रूप में चुकाया कि वह उसे अपने शहर में ले जाकर एक कामसेना नाम की कुट्टि‍नी के हाथ सौंप दिया । सच बात तो यह है कि यह सब दोष दिया किसे जा सकता है, किन्‍तु कर्मों की ही ऐसी विचित्र स्थिति है, जो जैसा कर्म करता है उसका उसे वैसा फल भोगना ही पड़ता है । इसमें नई बात कुछ नहीं है ।

कामसेना ने भी अनन्‍तमती को कष्‍ट देने में कुछ कसर नहीं रखी । जितना उससे बना उसने भय से, लोभ से उसे पवित्र पथ से गिराना चाहा, उसके सतीत्‍व धर्म को भ्रष्‍ट करना चाहा, पर अनन्‍मती उससे नहीं डिगी । वह सुमेरू के समान नि‍श्‍चल बनी रही । ठीक तो है जो संसार के दु:खों से डरते हैं, वे ऐसे भी सांसारिक कामों के करने से घबरा उठते हैं, जो न्‍यायमार्ग से भी क्‍यों न प्राप्‍त हुए हों, तब भला उन पुरूषों की ऐसे घृणित और पाप कार्यो में कैसे प्रीति हो सकती है ? कभी नहीं होती ।

कामसेना ने उस पर अपना चक्र चलता न देखकर उसे एक सिंहराज नाम के राजा को सौंप दिया । बेचारी अनन्‍तमती का जन्‍म ही न जाने कैसे बुरे समय में हुआ था, जो वह जहाँ पहुँचती वहीं आपत्ति उसके सिर पर सवार रहती । सिंहराज भी एक ऐसा ही पापी राजा था । वहअनन्‍तमती के देवांगना दुर्लभ रूप को देखकर उस पर मोहित हो गया । उसने भी उससे बहुत हाथा जोड़ी की, पर अनन्‍तमती ने उसकी बातों पर कुछ ध्‍यान न देकर उसे भी फटकार डाला । पापी सिंहराज ने अनन्‍तमती का अभिमान नष्ट करने को उससे बलात्कार करना चाहा । पर जो अभिमान मानवी प्रकृति का न होकर अपने पवित्र आत्‍मीय तेज का होता है, भला, किसकी मजाल जो उसे नष्ट कर सके ? जैसे ही पापी सिंहराज ने उस तेजोमय मूर्तिकी ओर पाँव बढ़ाया कि उसी वनदेवी ने, जिसने एक बार पहले भी अनन्‍तमती की रक्षा की थी, उपस्थित होकर कहाखबरदार ! इस सती देवी का स्‍पर्श भूलकर भी मत करना, नहीं तो समझ लेना कि तेरा जीवन जैसे संसार में था ही नहीं । इसके साथ ही देवो उसे उसके पापकर्मों का उचित दण्‍ड देकर अन्‍तर्हित हो गई । देवीको देखते हो सिंहराज का कलेजा काँप उठा । वह चित्रलिखे सा निश्‍चेष्‍ट हो गया । देवीके चले जानेपर बहुत देर बाद उसे होश हुआ । उसने उसी समय नौकर को बुलवाकर अनन्‍तमती को जंगल में छोड़ आनेकी आज्ञा दी । राजाकी आज्ञा का पालन हुआ । अनन्‍तमती एक भयंकर वन में छोड़ दी गई ।

अनन्तमती कहाँ जायगी, किस दिशामें उसका शहर है, और वह कितनी दूर है ? इन सब बातों का यद्यपि से कुछ पता नहीं था, तब भी वह पंचपरमेष्‍ठी का स्‍मरण कर वहाँ से आगे बढ़ी और फल फूलादि से अपना निर्वाह कर वन, जंगल, पर्वतों को लांधती हुई अयोध्‍यामें पहुँच गई । वहाँ उसे एक पद्मश्री नामकी आर्यिका के दर्शन हुए । आर्यिकाने अनन्‍तमती से उसका परिचय पूछा । उसने अपना सब परिचर देकर अपने पर जो-जो विपत्ति आई थी और उससे जिस-जिस प्रकार अपनी रक्षा हुई थी उसका सब हाल आर्यिकाको सुना दिया । आर्यिका उसकी कथा सुनकर बहुत दुखी हुई । उसे उसने एक सती-शिरोमणि रमणी-रत्‍न समझ कर अपने पास रख लिया। सच है सज्‍जनों का व्रत परोपकारार्थ ही होता है।

उधर प्रियदत्त को जब अनन्‍तमती के हरे जाने का समाचार मालूम हुआ तब वह अत्‍यन्‍त दु:खी हुआ । उसके वियोग से वह अस्थिर हो उठा । उसे घर श्‍मशान सरीखा भयंकर दिखने लगा । संसार उसके लिये सूना हो गया । पुत्री के विरह से दु:खी होकर तीर्थयात्रा के बहाने से वह घर से निकल खड़ा हुआ । उसे लोगों ने बहुत समझाया, पर उसने किसी की बात को न मानकर अपने निश्‍चय को नहीं छोड़ा । कुटुम्‍ब के लोग उसे घर पर न रहते देखकर स्‍वयं भी उसके साथ-साथ चले । बहुत से सिद्ध क्षेत्रों और अतिशय क्षेत्रों की यात्रा करते-करते वे अयोध्‍या में आये । वहीं पर प्रियदत्त का साला जिनदत्त रहता था । प्रियदत्त उसी के घर पर ठहरा । जिनदत्त ने बड़े आदर सम्‍मान के साथ अपने बहनोई की पाहुनगति की । इसके बाद स्‍वस्‍थता के समय जिनदत्त ने अपनी बहिन आदि का समाचार पूछा । प्रियदत्त ने जैसी घटना बीती थी, वह सब उससे कह सुनाई । सुनकर जिनदत्त को भी अपनी भानजी के बाबत बहुत दु:ख हुआ । सभी को हुआ पर उसे दूर करने के लिये सब लाचार थे । कर्मों की विचित्रता देखकर सब ही को सन्‍तोष करना पड़ा ।

दूसरे दिन प्रात:काल उठकर और स्‍नानादि करके जिनदत्त तो जिनमंदिर चला गया । इधर उसकी स्‍त्री भोजन की तैयारी करके पद्मश्री आर्यिका के पास जो बालिका थी, उसे भोजन करने को और आंगन में चौक पूरने को बुला लाई । बालिका ने आकर चौक पूरा और बाद भोजन करके वह अपने स्‍थान पर लौट आई ।

जिनदत्त के साथ प्रियदत्त भी भगवान् की पूजा करके घर पर आया । आते ही उसकी दृष्टि चौकपर पड़ी । देखते ही उसे अनंतमती की याद हो उठी । वह रो पड़ा । पुत्री के प्रेम से उसका हृदय व्‍याकुल हो गया । उसने रोते-रोते कहाजिसने यह चौक पूरा है, क्‍या मुझ अभागे को उसके दर्शन होंगे । जिनदत्त अपनी स्‍त्री से उस बालिका का पता पूछ कर जहाँ वह थी, वहीं दौड़ा गया और झट से उसे अपने घर लिवा लाया । बालिका को देखते ही प्रियदत्त के नेत्रों से आँसू वह निकले । उसका गला भर आया । आज वर्षो बाद उसे अपनी पुत्री के दर्शन हुए । बड़े प्रेम के साथ उसने अपनी प्‍यारी पुत्री को छाती से लगाया और उसे गोदी में बैठाकर उससे एक-एक बातें पूछना शुरू की । उसके दु:खों का हाल सुनकर प्रियदत्त बहुत दु:खी हुआ । उसने कर्मों का, इसलिये कि अनन्‍तमती इतने कष्‍टों को सहकर भी अपने धर्मपर दृढ़ रहीं और कुशलपूर्वक अपने पिता से आ मिलीं, बहुत-बहुत उपकार माना । पिता-पुत्रका मिलाप हो जाने से जिनदत्त को बहुत प्रसन्‍नता हुई । उसने इस खुशी में जिनभगवान् का रथ निकलवाया, सबका यथायोग्‍य आदर सम्‍मान किया और खूब दान किया ।

इसके बाद प्रियदत्त अपने घर जाने को तैयार हुआ । उसने अनन्‍तमती से भी चलने को कहा । वह बोली-पिताजी, मैंने संसार की लीलाको खूब देखा है । उसे देखकर तो मेरा जी काँप उठता है । अब मैं घर पर नहीं चलूँगी । मुझे संसार के दु:खों से बहुत डर लगता है । अब तो आप दया करके मुझे दीक्षा दिलवा दीजिये । पुत्री की बात सुनकर प्रियदत्त बहुत दु:खी हुआ, पर अब उसने उससे घर पर चलने की विशेष आग्रह न करके केवल इतना कहा किपुत्री, तेरा यह नवीन शरीर अत्‍यन्‍त कोमल है और दीक्षा का पालन करना बड़ा कठिन है उसमें बड़ी-बड़ी कठिन परीषह सहनी पड़ती है । इस‍लिये अभी कुछ दिनों के लिये मंदिर ही में रहकर अभ्‍यास कर और धर्मध्‍यान पूर्वक अपना समय विता । इसके बाद जैसा तू चाहती है, वह स्‍वयं ही हो जायगा । प्रियदत्त ने इस समय दीक्षा लेने से अनन्‍तमती को रोका, पर उसके तो रोम-रोम में वैराग्‍य प्रवेश कर गया था; फिर वह कैसे रूक सकती थी ? उसने मोहजाल तोड़कर उसी समय पद्मश्री आर्यिका के पास जिनदीक्षा ग्रहण कर ही ली । दीक्षित होकर अनन्‍तमती खूब दृढ़ता के साथ तप तपने लगी । महिना-महिना के उपवास करने लगी, परीषह सहने लगी । उसकी उमर और तपश्‍चर्या देखकर सबको दाँतो तले अंगुली दबानी पड़ती थी । अनन्‍तमती का जब तक जीवन सन्‍यास मरण कर सहस्‍त्रार स्‍वर्ग में जाकर देव हुई । वहाँ वह नित्‍य नये रत्‍नों के स्‍वर्गीय भूषण पहरती है, जिनभगवान् की भक्ति के साथ पूजा करती है, हजारों देव देवांगनायें उसकी सेवा में रहती हैं । उसके ऐश्‍वर्य का पार नहीं और न उसके सुख ही की सीमा है । बात यह है कि पुण्‍य के उदय से क्‍या-क्‍या नहीं होता ?

अनन्‍तमती को उसके पिता ने केवल विनोद से शीलव्रत दे दिया था । पर उसने उसका बड़ी दृढ़ता के साथ पालन किया, कर्मों के पराधीन सांसारिक सुख की उसने स्‍वप्‍न में भी चाह नहीं की । उस के प्रभाव से वह स्‍वर्ग में जाकर देव हुई, जहाँ सुख का पार नहीं । वहाँ वह सदा जिनभगवान् के चरणों में लीन रह कर बड़ी शान्ति के साथ अपना समय बिताती है । सती-शिरोमणि अनन्‍तमती हमारा भी कल्‍याण करें ।


+ उद्दायन राजा की कथा -
उद्दायन राजा की कथा
संसार-श्रेष्‍ठ जिनभगवान् जिनवाणी और जैन ऋषियों को नमस्‍कार कर उद्दायन राजा की कथा लिखता हूँ, जिन्‍होंने सम्‍यक्त्‍व के तीसरे निर्विचिकित्‍सा अंगका पालन किया है ।

उद्दायन रौरवक नामक शहर के राजा थे, जो कि कच्‍छे देश के अन्‍तर्गत था । उद्दायन सम्‍यग्‍दृष्टि थे, दानी थे, विचारशील थे, जिनभगवान् के सच्‍चे भक्‍त थे और न्‍यायी थे । सुतरां प्रजा का उन पर बहुत प्रेम था और वे भी प्रजा के हित में सदा उद्यत रहा करते थे ।

उस को रानी का नाम प्रभावती था । वह भी सती थी, धर्मात्‍मा थी । उसका मन सदा पवित्र रहता था । वह अपने समय को प्राय: दान, पूजा, व्रत, उपवास स्‍वाध्‍यायादि में बिताती थी ।

उद्दायन अपने राज्‍य का शान्ति और सुख से पालन करते और अपनी शक्ति के अनुसार जितना बन पड़ता, उतना धार्मिक काम करते । कहने का मतलब यह कि वे सुखी थे, उन्‍हें किसी प्रकार की चिन्‍ता नहीं थी । उनका राज्‍य भी शत्रु-रहित निष्‍कंटक था ।

ए‍क दिन सौधर्म-सवर्ग का इन्‍द्र अपनी सभा में धर्मोपदेश कर रहा था ''कि संसार में सच्‍चे देव अरहन्‍त भगवान् हैं, जो कि भूख, प्‍यास, रोग, शोक, भय, जन्‍म, जरा, मरण आदि दोषों से रहित और जीवों को संसार के दु:खों से छुटाने वाले है; सच्‍चा धर्म, उत्‍तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, आदि दश लक्षण रूप है; गुरू निग्रन्‍थ है; जिसके पास परिग्रह का नाम निशान नहीं और जो क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, आदि से रहित है और वह सच्‍ची श्रद्धा है, जिससे जीवादिक पदार्थों में रूचि होती है । वहीं रूचि स्‍वर्ग मोक्ष की देने वाली है । यह रूचि अर्थात् श्रद्धा धर्म में प्रेम करने से, तीर्थ यात्रा करने से, रथोत्सव कराने से, जिनमंदिरों का जीर्णोद्वार कराने से, प्रतिष्‍ठा कराने से, प्रतिमा बनवाने से और साधर्मियों से वात्‍सल्‍य अर्थात् प्रेम करने से उत्‍पन्‍न होती है । आप लोग ध्‍यान रखिये कि सम्‍यग्‍दर्शन संसार में एक सर्व श्रेष्‍ठ वस्‍तु है । और कोई वस्‍तु उसकी समानता नहीं कर सकती । यही सम्‍यग्‍दर्शन दुर्गतियों का नाश कर के स्‍वर्ग और मोक्ष का देने वाला है । इसे तुम धारण करो ।'' इस प्रकार सम्‍यग्‍दर्शन का और उसके आठ अंगों का वर्णन करते समय इन्‍द्र ने निर्विचिकित्‍सा अंग का पालन करने वाले उद्दायन राजा की बहुत प्रशंसा की । इन्‍द्र के मुँह से एक मध्‍यलोक के मनुष्‍य की प्रशंसा सुनकर एक बासव नाम का देव उसी समय स्‍वर्ग से भारत में आया और उद्दायन राजा की परीक्षा करने के लिय एक कोढ़ी मुनि का वेश बनाकर भिक्षा के लिये दोपहर ही को उद्दायन के महल गया ।

उस के शरीर से कोढ़ गल रहा था, उस की वेदना से उसके पैर इधर-उधर पड़ रहे थे, सारे शरीर पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं और सब शरीर विकृत हो गया था । उसकी यह हालत होने पर भी जब वह राजद्वार पर पहुँचा और महाराज उद्दायन की उस पर दृष्टि पड़ी तब वे उसी समय सिंहासन से उठकर आये और बड़ी भक्ति से उन्‍होंने उस छली मुनि का आह्वान किया । इसके बाद नवधा भक्ति पूर्वक हर्ष के साथ राजा ने मुनि को प्रासुक आहार कराया । राजा आहार कराकर निवृत हुए कि इतने में उस कपटी-मुनि ने अपनी माया से महा-दुर्गन्धित वमन कर दिया । उसकी असह्य दुर्गन्‍ध के मारे जितने और लोग पास खड़े हुए थे, वे सब भाग खड़े हुए; किन्‍तु केवल राजा और रानी मुनि की सम्‍हाल करने को वहीं रह गये । रानी मुनि का शरीर पोंछने को उसके पास गई । कपटी मुनि ने उस बेचारी पर भी महा दुर्गन्धित उछाट कर दी । राजा और रानी ने इसकी कुछ परवा न कर उलटा इस बात पर बहुत पश्‍चात्ताप किया कि हम से मुनि की प्रकृति-विरूद्ध न जाने क्‍या आहार दे दिया गया, जिससे मुनिराज को इतना कष्‍ट हुआ । हम लोग बड़े पापी हैं । इसीलिये तो ऐसे उत्तम पात्र का हमारे यहाँ निरन्‍तराय आहार नहीं हुआ । सच है, जैसे पापी लोगों को मनोवांछित देने वाला चिन्‍तामणि-रत्‍न और कल्‍पवृक्ष प्राप्‍त नहीं होता, उसी तरह सुपात्र के दान का योग भी पापियों को नहीं मिलता है । इस प्रकार अपनी आत्‍म-निन्‍दा कर और अपने प्रमाद पर बहुत-बहुत खेद प्रकाश कर राजा रानी ने मुनि का सब शरीर जल से धोकर साफ किया । उनकी इस प्रकार अचल भक्ति देखकर देव अपनी माया समेट कर बड़ी प्रसन्‍नता के साथ बोला -- राजराजेश्‍वर, सचमुच ही तुम सम्‍यग्‍दृष्टि हो, महादानी हो । निर्विचिकित्‍सा अंग के पालन करने में इन्‍द्र ने जैसी तुम्‍हारी प्रशंसा की थी, वह अक्षर-अक्षर ठीक निकली, वैसा ही मैंने तुम्‍हें देखा । वास्‍वत में तुमही ने जैनशासन का रहस्‍य समझा है । यदि ऐसा न होता तो तुम्‍हारे बिना और कौन मुनि की दुर्गन्धित उछाट अपने हाथों से उठाता ? राजन् ! तुम धन्‍य हो, शायद ही इस पृथ्‍वी मंडल पर इस समय तुम सरीखा सम्‍यग्‍दृष्टियों में शिरोमणि कोई होगा ? इस प्रकार उद्दायन की प्रशंसा कर देव अपने स्‍थान पर चला गया और राजा फिर अपने राज्‍य का सुख पूर्वक पालन करते हुए दान, पूजा व्रत आदि में अपना समय बिताने लगे ।

इसी तरह राज्‍य करते-करते उद्दायन का कुछ और समय बीत गया । एक दिन वे अपने महल पर बैठे हुए प्रकृतिक शोभा देख रहे थे कि इतने में एक बड़ा भारा बादल का टुकड़ा उनकी आँखों के सामने से निकला । वह थोड़ी ही दूर पहुँचा होगा कि एक प्रबल वायु के वेग ने उसे देखते-देखते नाम-शेष कर दिया । क्षण भर में एक विशाल मेघखण्‍ड की यह दशा देखकर उद्दायन की आँखे खुली । उन्‍हें सारा संसार ही अब क्षणिक जान पड़ने लगा । उन्‍होंने उसी समय महल से उतरकर अपने पुत्र को बुलाया और उसके मस्‍तक पर राज-तिलक करके आप भगवान् वर्द्धमान के समवसरण में पहुँचे और भक्ति के साथ भगवान् की पूजा कर उनके चरणों के पास ही उन्‍होंने जिनदीक्षा ग्रहण कर ली, जिसका इन्‍द्र, नरेन्‍द्र, धरणेन्‍द्र आदि सभी आदर करते हैं ।

साधु होकर उद्दायन राजा ने खूब तपश्‍चर्या की, संसार का सर्वश्रेष्‍ठ पदार्थ रत्‍नत्रय प्राप्‍त किया । इसके बाद ध्‍यान रूपी अग्नि से घातिया कर्मों का नाश कर उन्‍होंने केवलज्ञान प्राप्‍त किया । उसके द्वारा उन्‍होंने संसार के दु:खों से तड़पते हुए अनेक जीवों को उबार कर, अनेकों को धर्म के पथपर लगाया । और अन्‍त में अघातिया कर्मों का भी नाश कर अविनाशी अनन्‍त मोक्षपद प्राप्‍त किया ।

उधर उनकी रानी सती प्रभावती भी जिनदीक्षा ग्रहण कर तपश्‍चर्या करने लगी और अन्‍त में समाधि मृत्‍यु प्राप्‍त कर ब्रह्मस्‍वर्ग में जाकर देव हुई ।

वे जिन-भगवान् मुझे मोक्ष लक्ष्‍मी प्रदान करें, जो सब श्रेष्‍ठ गुणों के समुद्र हैं जिनका केवलज्ञान संसार के जीवों का हृदयस्‍थ अज्ञानरूपी आताप नष्‍ट करने को चन्‍द्रमा समान है, जिनके चरणों को इन्‍द्र, नरेन्‍द्र आदि सभी नमस्‍कार करते हैं, जो ज्ञान के समुद्र और साधुओं के शिरोमणि हैं ।


+ रेवती रानी की कथा -
रेवती रानी की कथा
संसार का हित करने वाले जिनभगवान् को परम भक्तिपूर्वक नमस्‍कार कर अमूढ़दृष्टि अंग का पालन करने वाली रेवती रानी की कथा लिखता हूँ ।

विजयाधपर्वत की दक्षिणश्रेणी में मेघकूट नाम का एक सुन्‍दर शहर है । उसके राजा हैं चन्‍द्रप्रभ । चन्‍द्रप्रभ ने बहुत दिनों तक सुख के साथ अपना राज्‍य किया । एक दिन वे बैठे हुए थे कि एकाएक उन्‍हें तीर्थयात्रा करने की इच्‍छा हुई । राज्‍य का करोबार अपने चन्‍द्रशेखर नाम के पुत्र को सौंपकर वे तीर्थयात्रा के लिये चल दिये । वे यात्रा करते हुए दक्षिण मथुरा में आये । उन्‍हें पुण्‍य से वहाँ गुप्‍ताचार्य के दर्शन हुए । आचार्य से चन्‍द्रप्रभ ने धर्मोपदेश सुना । उनके उपदेश का उन पर बहुत असर पड़ा । वे आचार्य के द्वारा--

प्रोक्‍त: परोपकारो अत्र महापुण्‍याय भूतले ।

--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्परोपकार करना महान् पुण्‍य का कारण है, यह जानकर और तीर्थयात्रा करने के लिये एक विद्या का अपने अधिकार में रखकर क्षुल्‍लक बन गये ।

एक दिन उनकी इच्‍छा उत्‍तरमथुरा की यात्रा करने की हुई । जब वे जाने को तैयार हुए तब उन्‍होंने अपने गुरू महाराज से पूछा--हे दया के समुद्र, मैं यात्रा के लिये जा रहा हूँ, क्‍या आपको कुछ समाचार तो किसी के लिये नहीं कहना है ? गुप्‍ताचार्य बोले—मथुरा में एक सूरत नाम के बड़े ज्ञानी और गुणी मुनिराज हैं, उन्‍हें मेरा नमस्‍कार कहना और सम्‍यग्‍दृष्टिनी धर्मात्‍मा रेवती लिये मेरी धर्मवृद्धि कहना ।

क्षुल्‍लक ने और पूछा कि इसके सिवा और भी आपको कुछ कहना है क्‍या ? आचार्य ने कहा नहीं । तब क्षुल्‍लक ने विचारा कि क्‍या कारण है जो आचार्य ने एकादशांग के ज्ञाता श्रीभव्‍यसेन मुनि तथा और-और मुनियों को रहते उन्‍हें कुछ नहीं कहा और केवल सूरत मुनि और रेवती के लिये ही नमस्‍कार किया तथा धर्म वृद्धि दो ? इसका कोई कारण अवश्‍य होना चाहिये । अस्‍तु । जो कुछ होगा वह आगे स्‍वयं मालूम हो जायेगा । यह सोचकर चन्‍द्रप्रभ क्षुल्‍लंक वहाँ से चल दिये । उत्तर मथुरा पहुँचकर उन्‍होंने सूरत मुनि को गुप्‍ताचार्य की वन्‍दना कह सुनाई । उससे सूरत मुनि बहुत प्रसन्‍न हुए । उन्‍होंने चन्‍द्रप्रभ के साथ खूब वात्‍सल्‍य का परिचर दिया । उससे चन्‍द्रभ को बड़ी खुशी हुई । बहुत ठोस कहा है-

ये कुर्वन्ति सुवात्‍सल्‍यं भव्‍या धर्मानुरागत: ।
साधर्मिकेषु तेषां हि सफलं जन्‍म भूतले ।।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—संसार में उन्‍हीं का जन्‍म लेना सफल है जो धर्मात्‍माओं से वात्‍सल्‍य प्रेम करते हैं ।

इसके बाद क्षुल्‍लक चन्‍द्रप्रभ एकादशांग के ज्ञाता, पर नाम मात्र के भव्‍यसेन मुनि के पास गये । उन्‍होंने भव्‍यसेन को नमस्‍कार किया | पर भव्‍यसेंन मुनि ने अभिमान में आकर चन्‍द्रभप्र को धर्मवृद्धि तक भी न दी । ऐसे अभिमान को धिक्‍कार है ! जिन अविचारों पुरूषों के वचनों में भी दरिद्रता है जो वचनों से भी प्रेम पूर्वक आये हुए अतिथि से नहीं बोलते—वे उनका और क्‍या सत्‍कार करेंगे ? उनसे तो स्‍वप्‍न में भी अतिथिसत्‍कार नहीं बन सकेगा । जैन शास्‍त्रों का ज्ञान सब दोषों से रहित है, निर्दोष है । उसे प्राप्‍त कर हृदय पवित्र होना ही चाहिए । पर खेद है कि उसे पाकर भी मान होता है । पर यह शास्‍त्र का दोष नहीं, किन्‍तु यों कहना चाहिए कि पापियों के लिए अमृत भी विष हो जाता है । जो हो, तब भी देखना चाहिए कि इन में कुछ भी भव्‍यपना है भी, या केवल नाम मात्र के ही भव्‍य हैं ? यह विचार कर दूसरे दिन सबेरे जब भव्‍यसेन कमण्‍डलु लेकर शौच के लिये चले तब उनके पीछे-पीछे चन्‍द्रप्रभ क्षुल्‍लक भी हो लिए । आगे चलकर क्षुल्‍लक महाशय ने अपने विद्या बल से भव्‍यसेन उसकी कुछ परवा न कर और हरे-हरे तृणों से युक्‍त कर दिया । भव्‍यसेन उसकी कुछ परवा न कर और यह विचार कर कि जैनशास्त्रों में तो इन्‍हें एकेन्‍द्री कहा है, इनकी हिंसा का विशेष पाप नहीं होना, उपसर से निकल गए । आगे चलकर जब वे शौच हो लिए और शुद्धि किए कमण्‍डलु की और देखा तो उसमें जल नहीं और वह ओंधा पड़ा हुआ है, तब तो उन्‍हें बड़ी चिन्‍ता हुई । इतने में एकाएक क्षुल्‍लक महाशय भी उधर आ निकले । कमण्‍डलु का जल यद्यपि क्षुल्‍लकजी ने ही अपने विद्या बल से सुखा दिया था, तब भी वे बड़े आश्‍चर्य के साथ भव्‍यसेन से बोले -मुनिराज, पास ही एक निर्मल जल का सरोबर भरा हुआ है, वहीं जाकर शुद्धि कर लीजिए न ? भव्‍यसेन ने अपने पदस्थ पर, अपने कर्त्तव्‍य पर कुछ भी ध्‍यान न देकर जैसा क्षुल्‍लक ने कहा, वैसा ही कर लिया । सच बात तो यह है—

किं करोति न मूढ़ात्‍मा कार्यं मिथ्‍यात्‍वदूषित: ।
न स्‍थान्‍मुक्तिप्रदं ज्ञानं चरित्रं दुर्दशामपि ।
उद्गतो भास्‍करश्‍चापि किं घूकस्‍य सुखायते ।।
मिथ्‍यादृष्‍टे: श्रुतं शास्‍त्रं कुमार्गाय प्रवर्तते ।
यथा मृष्‍टं भवेत्‍कष्‍टं सुदुग्‍धं तुम्बिकागतम् ।।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्--मूर्ख पुरूष मिथ्‍यात्‍व के वश होकर कौन बुरा काम नहीं करते ? मिथ्‍यादृष्टियों का ज्ञान और चारित्र मोक्ष का कारण नहीं होता । जैसे सूर्य के उदय से उल्‍लू को कभी सुख नहीं होता । मिथ्‍यादृष्टियों का शास्‍त्र सुनना, शास्‍त्राभ्‍यास करना केवल कुमार्ग में प्रवृत होने का कारण है । जैसे मीठा दूध भी तूबड़ी के सम्‍बन्‍ध से कड़वा हो जाता है । इन सब बातों को विचार क्षुल्‍लक ने भव्‍यसेन के आचरण से समझ लिया कि ये नाम मात्र के जैनी हैं, पर वास्‍तव में इन्‍हें जैन धर्म पर श्रद्धान नहीं, ये मिथ्‍यात्‍वी हैं । उस दिन से चन्‍द्रप्रभ ने भव्‍यसेन का नाम अभव्‍यसेन रक्‍खा । सच बात है दुराचार से क्‍या नहीं होता ?

क्षुल्‍लक ने भव्‍यसेन की परीक्षा कर अब रेवती रानी की परीक्षा करने का विचार किया । दूसरे दिन उसने अपने विद्या बल से कमल पर बैठे हुए और वेदों का उपदेश करते हुए चतुर्मुख ब्रह्माका वेष बनाया और शहर से पूर्व दिशा को ओर कुछ दूरी पर जंगल में वह ठहरा । यह हाल सुनकर राजा, भव्‍यसेन आदि सभी वहाँ गए और ब्रह्माजी को उन्‍होंने नमस्‍कार किया । उनके पावों पड़ कर वे बड़े खुश हुए । राजा ने चलते समय अपनी प्रिया रेवती से भी ब्रह्माजी की वन्‍दना के लिए चलने को कहा था पर रेवती सम्‍यवत्‍व रत्‍न से भूषित थी, जिनभगवान् की अनन्‍यभक्‍त थी; इसलिये वह नहीं गर्इ । उसने राजा से कहा--महाराज, मोक्ष और सम्‍यग्‍दर्शन, सम्‍यग्‍ज्ञान तथा सम्‍यक्‍चारित्र का प्राप्‍त कराने वाला सच्‍चा ब्रह्मा जिनशासन में आदि जिनेन्‍द्र कहा गया है, उसके सिवा अन्‍य ब्रह्मा हो ही नहीं सकता और जिस ब्रह्मा की वन्‍दना के लिए आप जा रहे हैं, वह ब्रह्मा नहीं हैं; किन्‍तु कोई घूर्त ठगने के लिए ब्रह्मा का वैष लेकर आया है । मैं तो नहीं चलूँगी ।

दूसरे दिन क्षुल्‍लक ने गरूड़ पर बैठे हुए, चतुर्बाहु, शंख, चक्र, गदा आदि से युक्‍त और दैत्‍यों को कँपाने वाले वैष्‍णव भगवान् का वेष बनाकर दक्षिण दिशा में अपना डेरा जमाया ।

तीसरे दिन उस बुद्धिमान् क्षुल्‍लक ने बैल पर बैठे हुए, पार्वती के मुखकमल को देखते हुए, सिर पर जटा रखाये हुए, गणपति युक्‍त और जिन्‍हें हजारों देव आ आकर नमस्‍कार कर रहे हैं, ऐसा शिव का वेष धारण कर पश्चिम दिशा की शोभा बढ़ाई ।

चौथे दिन उसने अपनी माया से सुन्‍दर समवशरण में विराजे हुए, आठ प्रातिहार्यो से विभूषित, मिथ्‍यादृष्टियों के मान को नष्‍ट करने वाले मानस्‍तंभादि से युक्‍त, निग्रन्‍थ और जिन्‍हें हजारों देव, विद्याधर, चक्रवर्ती आ आकर नमस्‍कार करते है, ऐसा संसार श्रेष्‍ठ तीर्थकर का वेष बनाकर पूर्व दिशा को अलंकृत किया । तीर्थकर भगवान् का आगमन सुनकर सबको बहुत आनन्‍द हुआ । सब प्रसन्‍न होते हुए भक्ति पूर्वक उनकी वन्‍दना करने को गये । राजा भव्यसेन आदि भी उन में शामिल थे । तीर्थंकर भगवान के दर्शनों के लिये भी रेवती रानी को न जाती हुई देखकर सब को बड़ा आश्चर्य हुआ । बहुतों ने उससे चलने का आग्रह भी किया, पर वह न गई । कारण वह सम्यक्त्व रूप मौलिक रत्न से भूषित थी, उसे जिनभगवन के वचनों पर पूरा विश्वास था कि तीर्थंकर परम देव चौबीस ही होते हैं, और वासुदेव नौ और रुद्र ग्यारह होते हैं । फिर उनकी संख्या को तोड़ने वाले ये दशवें वासुदेव और बारहवें रुद्र और पच्चीसवें तीर्थंकर आ कहाँ से सकते हैं ? वे तो अपने-अपने कर्मों के अनुसार जहाँ जाना था वहाँ चले गये । फिर यह नई सृष्टि कैसी ? इनमें न तो कोई सच्चा रुद्र है, न वासुदेव, और न तीर्थंकर है, किंतु कोई मायावी ऐन्‍द्रजालिक अपनी धूर्तता से लोगों को ठगने के लिये आया है । यह विचार कर रेवती रानी तीर्थंकर की वन्दना के लिये भी नहीं गई । सच है कहीं वायु से मेरु पर्वत भी चला है ?

इसके बाद चन्द्रप्रभ, क्षुल्लक-वेश ही में, पर अनेक प्रकार की व्याधियों से युक्त तथा अत्यंत मलिन शरीर होकर रेवती के घर भिक्षा के लिये पहुँचे । आँगन में पहुँचते ही वे मूर्च्छा खाकर पृथ्वी पर धड़ाम से गिर पड़े । उन्हें देखते ही धर्म वत्सला रेवती रानी हाय-हाय कहती हुई उन के पास दौड़ी, इसके बाद अपने महल में ले जाकर बड़े कोमल और पवित्र भावों से उसने उन्हें प्रासुक आहार कराया । सच है जो दयावान होते हैं, उनकी बुद्धि दान देने को स्वभावही से तत्पर रहती है ।

क्षुल्लक को अब तक भी रेवती की परीक्षा से संतोष नहीं हुआ । सो उन्होंने भोजन करने के साथ ही वमन कर दिया, जिसमें अत्यंत दुर्गन्ध आ रही थी । क्षुल्लक की यह हालत देखकर रेवती को बहुत दुःख हुआ । उसने बहुत पश्चात्ताप किया कि न जाने क्या अपथ्य मुझ पापिनी के द्वारा दे दिया गया, जिससे इन की यह हालत हो गई । मेरी इस असवधानता को धिक्कार है । इस प्रकार बहुत पश्चात्ताप करके उसने क्षुल्लक का शरीर पोंछा और बाद कुछ-कुछ गरम जल से उसे धोकर साफ किया ।

क्षुल्लक रेवती की भक्ति देखकर बहुत प्रसन्न हुए । वे अपनी माया समेट कर बड़ी खुशी के साथ रेवती से बोले-देवी, संसारश्रेष्ठ मेरे परम गुरु महाराज गुप्ताचार्य की धर्मवृद्धि तेरे मन को पवित्र करे, जो कि सब सिद्धियों की देने वली है और तुम्हारे नाम से मैंने यात्रा में जहाँ-जहाँ जिनभगवान की पूजा की है वह भी तुम्हें कल्याण की देने वाली हो ।

देवी, तुमने जिस संसारश्रेष्ठ और संसार समुद्र से पार करने वाले अमूढ़दृष्टि अंग को ग्रहण किया है, उसकी मैंने नाना तरह से परीक्षा की, पर उसमें तुम्हें अचल पाया । तुम्हारे इस त्रिलोकपूज्य सम्यक्त्व की कौन प्रशंसा करने को समर्थ है ? कोई नहीं । इस प्रकार गुणवती रेवती रानी की प्रशंसा कर और उसे सब हाल कहकर क्षुल्लक अपने स्थान चले गए ।

इसके बाद वरुण नृपति और रेवती रानी का बहुत समय सुख के साथ बीता । एक दिन राजा को किसी कारण से वैराग्य हो गया । वे अपने शिव कीर्ति नाम के पुत्र को राज्य सौंपकर और सब मायाजाल तोड़कर तपस्वी बन गए । साधु बनकर उन्होंने खूब तपश्चर्या की और आयु के अंत में समाधि मरण कर वे माहेन्द्रस्वर्ग में जाकर देव हुए ।

जिनभगवान् की परम भक्त महारानी रेवती भी जिनदीक्षा ग्रहण कर और शक्ति के अनुसार तपश्चर्या कर आयु के अंत में ब्रह्मस्वर्ग में जाकर महर्द्धिक देव हुई ।

भव्य पुरुषों, यदि तुम भी स्वर्ग या मोक्ष सुख को चाहते हो, तो जिस तरह श्रीमती रेवती रानी ने मिथ्यात्व छोड़ा, उसी तरह तुम भी मिथ्यात्व को छोड़कर स्वर्ग-मोक्ष के देने वाले, अत्यंत पवित्र और बड़े-बड़े देव, विद्याधर, राजा-महाराजाओं से भक्ति पूर्वक ग्रहण किए हुए जैनधर्म को आश्रय स्वीकर करो ।


+ जिनेन्द्रभक्त की कथा -
जिनेन्द्रभक्त की कथा
स्वर्ग-मोक्ष के देने वाले श्रीजिनभगवान् को नमस्कार कर मैं जिनेन्द्रभक्त की कथा लिखता हूँ, जिन्होंने कि सम्यग्दर्शन के उपगूहन अंग का पालन किया था ।

नेमिनाथ भगवान् के जन्म से पवित्र और दयालु पुरुषों से परिपूर्ण सौराष्ट्र देश के अंतर्गत एक पाटलिपुत्र नाम का शहर था । जिस समय की कथा है, उस समय उसके राजा यशोध्वज थे । उनकी रानी का नाम सुसीमा था । वह बड़ी सुन्दर थी । उसका एक पुत्र था । उसका नाम था सुवीर । बेचारी सुसीमा के पाप के उदय से वह महाव्यसनी और चोर हुआ । सच तो यह है कि जिन्हें आगे कुयोनिओं के दुःख भोगने होते हैं, उनका न तो अच्छे कुल मे जन्म लेना काम आता है और न ऐसे पुत्रों से बेचारे माता-पिता को कभी सुख होता है ।

गोड़ देश के अंतर्गत ताम्लिप्ता नाम की नगरी है । उसमे एक सेठ रहते थे । उनका नाम था जिनेन्द्रभक्त । जैसा नाम है वैसे ही वे जिन-भगवान् के भक्त हैं भी । जिनेन्द्रभक्त सच्चे सम्यग्दृष्टि थे और अपने श्रावक धर्म का बराबर सदा पालन भी करते थे । उन्होंने विशाल जिनमन्दिर बनवाए, बहुत से जीर्ण मन्दिरों का उद्धार किया, जिन-प्रतिमायें बनवाकर उनकी प्रतिष्ठा करवाई और चारों संघों को खूब दान दिया, उनका खूब सत्कार किया ।

सम्यग्दृष्टि शिरोमणि जिनेन्द्रभक्त का महल सात मंजिला था । उसकी अंतिम मंजिल पर एक बहुत ही सुन्दर जिन चैत्यालय था । चैत्यालय में श्रीपर्श्वनाथ भगवान् की बहुत मनोहर और रत्नमयी प्रतिमा थी । उस पर तीन छत्र जो रत्नों के बने हुए थे, बड़ी शोभा दे रहे थे । उन छत्रों पर एक वैडूर्यमणि नाम का अत्यंत कांतिमान बहुमूल्य रत्न लगा हुआ था । इस रत्न का हाल सुवीर ने सुना । उसने अपने साथियों को बुलाकर कहा-सुनते हो, जिनेन्द्रभक्त सेठ के चैत्यालय में प्रतिमा पर लगे हुए छत्रों में एक रत्न लगा हुआ है, वह अमोल है । क्या तुम लोगों मे से कोई उसे ला सकता है ? सुनकर उनमे से एक सूर्यक नाम का चोर बोला, यह तो एक अत्यंत साधारण बात है । यदि वह रत्न इन्द्र के सिर पर भी होता, मैं उसे क्षणभर में ला सकता था । यह सच भी है कि जो जितने ही दुराचारी होते हैं वे उतना ही पाप कर्म भी कर सकते हैं ।

सूर्यक के लिए रत्न लाने की आज्ञा हुई । वहाँ से आकर उसने मायावी क्षुल्लक का वेष धारण किया । क्षुल्लक बनकर वह व्रत उपवासादि करने लगा । उससे उसका शरीर बहुत दुबला-पतला हो गया । इसके बाद वह अनेक शहरों और ग्रामों में घूमता हुआ और लोगों को अपने कपटी वेश से ठगता हुआ कुछ दिनों में तामलिप्तापुरी में आ पहुँचा । जिनेन्द्रभक्त सच्चे धर्मात्मा थे, इसलिए उन्हें धर्मात्माओं को देखकर बड़ा प्रेम होता था । उन्होंने जब इस धूर्त क्षुल्लक का आगमन सुना तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई । वे उसी समय घर का सब कामकाज छोड़कर क्षुल्लक महाराज की वन्दना करने के लिए गए । उसका तपश्चर्या से क्षीण शरीर देखकर उनकी उसपर और अधिक श्रद्धा हुई । उन्होंने भक्ति के साथ क्षुल्लक को प्रणाम किया और बाद वे उसे अपने महल लिवा लाये । सच बात यह है कि-

अहो धूर्त्तस्य धूर्त्तत्वं लक्ष्यते केन भूतले ।
यस्य प्रपंचतो गाढं विद्वांसश्चापि वंचिता । ।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्--जिनकी धूर्तता से अच्छे-अच्छे विद्वान भी जब ठगा जाते हैं, तब बेचारे साधारण पुरुषों की क्या मजाल जो वे उनकी धूर्त्तता का पता पा सकें ।

क्षुल्लकजी ने चैत्यालय में पहुँचकर जब उस मणि को देखा तो उनका हृदय आनन्द के मारे बाँसों उछलने लगा । वे बहुत संतुष्ट हुए । जैसे सुनार अपने पास कोई रकम बनवाने के लिये लाये हुए पुरुष के पास का सोना देखकर प्रसन्न होता है । क्योंकि उसकी नीयत सदा चोरी की ओर ही लगी रहती है ।

जिनेन्द्रभक्त को उसके मायाचार का कुछ पता नहीं लगा । इसलिये उन्होंने उसे बड़ा धर्मात्मा समझकर और मायाचारी से क्षुल्लक के मना करने पर भी जबरन अपने जिनालय की रक्षा के लिये उसे नियुक्त कर दिया और आप उससे पूछकर समुद्र यात्रा करने के लिये चल पड़े ।

जिनेन्द्रभक्त के घर के बाहर होते ही क्षुल्लकजी की बन पड़ी । आधी रात के समय आप उस तेजस्वी रत्न को कपड़ों में छिपाकर घर के बाहर हो गये । पर पापियों का पाप कभी नहीं छुपता । यही कारण था कि रत्न लेकर भागते हुए उसे सिपाहियों ने देख लिया । वे उसे पकड़ने को दौड़े । क्षुल्लकजी दुबले-पतले तो पहले ही से हो रहे थे, इसलिये वे अपने को भागने में असक्त समझ लाचार होकर जिनेन्द्रभक्त की ही शरण में गये और प्रभो, बचाइये ! बचाइये !! यह कहते हुए उन के पाँवों में गिर पड़े । जिनेन्द्रभक्त ने, ‘चोर भागा जाता है ! इसे पकड़ना’ ऐसा हल्ला सुनकर जान लिया कि यह चोर है और क्षुल्लक वेष में लोगों को ठगता फिरता है । यह जानकर भी दर्शन की निन्दा के भय से जिनेन्द्रभक्त क्षुल्लक को पकड़ने को आये हुए सिपाहियों से कहा -- आप लोग बड़े कम समझ हैं ! आपने बहुत बुरा किया जो एक तपस्वी को चोर बतला दिया । रत्न तो ये मेरे कहने से लाये हैं । आप नहीं जानते कि ये बड़े सच्चरित्र साधु हैं ? अस्तु । आगे से ध्यान रखिये ।
जिनेन्द्रभक्त के वचनों को सुनते ही सब सिपाही लोग ठण्डे पड़ गये और उन्हें नमस्कार कर चलते बने । जब सब सिपाही चले गये तब जिनेन्द्रभक्त ने क्षुल्लकजी से रत्न लेकर एकांत में उनसे कहा -- बड़े दुःख की बात है कि तुम ऐसे पवित्र वेष को धारण कर उसे ऐसे नीच कर्मों से लजा रहे हो ? तुम्हें यही उचित है क्या ? याद रक्खो, ऐसे अनर्थों से तुम्हें कुगतियों में अनंत काल दुःख भोगना पड़ेंगे । शास्त्रकारों ने पापी पुरुषों के लिये लिखा है कि—
ये कृत्वा पातकं पापाः पोषयंति स्वकं भुवि ।
त्यक्वा न्यायक्रमं तेषां महादुःखं भवार्णवे । ।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात् -- जो पापी लोग न्यायमार्ग को छोड़कर और पाप के द्वारा अपना निर्वाह करते हैं, वे संसार समुद्र में अनंत काल दुःख भोगते हैं । ध्यान रक्खो कि अनीति से चलने वाले और अत्यंत तृष्णावान तुम सरीखे पापी लोग बहुत ही जल्दी नाश को प्राप्त होते हैं । तुम्हें उचित है तुम बड़ी कठिनता से प्राप्त हुए इस मनुष्य जन्म को इस तरह बर्बाद न कर कुछ आत्महित करो । इस प्रकार शिक्षा देकर जिनेन्द्रभक्त ने अपने स्थान से उसे अलग कर दिया ।

इसी प्रकार और भी भव्य पुरुषों को, दुर्जनों के मलिन कर्मों से निन्दा को प्राप्त होने वाले सम्यगदर्शन की रक्षा करना उचित है ।

जिन-भगवान का शासन पवित्र है, निर्दोष है, उसे जो सदोष बनाने की कोशिश करते हैं, वे मूर्ख हैं, उन्मत्त हैं । ठीक भी है उन्हें वह निर्दोष धर्म अच्छा भी जान नहीं पड़ता । जैसे पित्तज्वर वाले को अमृत के समान मीठा दूध भी कड़वा ही लगता है ।


+ वारिषेण मुनि की कथा -
वारिषेण मुनि की कथा
मैं संसार पूज्य जिन-भगवान् को नमस्कार कर श्री वारिषेण-मुनि की कथा लिखता हूँ, जिन्होंने सम्यग्दर्शन के स्थितिकरण नामक अंग का पालन किया है ।

अपनी सम्पदा से स्वर्ग को नीचा दिखाने वाले मगघदेश के अंतर्गत राजगृह नाम का एक सुन्दर शहर है । उसके राजा हैं श्रेणिक । वे सम्यग्दृष्टि हैं, उदार हैं और राजनीति के अच्छे विद्वान हैं । उनकी महारानी का नाम चेलनी है । वह भी सम्यक्त्व-रूपी रत्न से सुशोभित है, बड़ी धर्मात्मा है, सती है, और विदुषी है । उसके एक पुत्र है । उसका नाम है वारिषेण । वारिषेण बहुत गुणी है, धर्मात्मा है और श्रावक है ।

एक दिन मगधसुन्दरी नाम की वेश्या राजगृह के उपवन में क्रीड़ा करने को आयी हुई थी । उसने वहाँ श्रीकीर्ति नामक सेठ के गले में बहुत ही सुन्दर रत्नों का हार पड़ा हुआ देखा । उसे देखते ही मगधसुन्दरी उसके लिये लालायित हो उठी । उसे हार के बिना अपना जीवन निरर्थक जान पड़ने लगा । सारा संसार उसे हारमय दिखने लगा । वह उदास मुँह घर पर लौट आई । रात के समय जब उसका प्रेमी विद्युत चोर घर पर आया तब उसने मगधसुन्दरी को उदास मुँह देखकर बड़ॆ प्रेम से पूछा -- प्रिये, आज मैं तुम्हें उदास देखता हूँ, क्या इसका कारण तुम बताओगी ? तुम्हारी यह उदासी मुझे अत्यंत दुखी कर रही है ।

मगधसुन्दरी ने विद्युत पर कटाक्षबाण चलाते हुए कहा -- प्राणवल्लभ, तुम मुझ पर इतना प्रेम करते हो, पर मुझे तो जान पड़ता है कि यह सब तुम्हारा दिखाऊ प्रेम है और सचमुच ही तुम्हारा यदि मुझ पर प्रेम है तो कृपा कर श्रीकीर्ति सेठ के गले का हार, जिसे कि आज मैंने बगीचे में देखा है और जो बहुत ही सुन्दर है, लाकर मुझे दीजिये; जिससे मेरी इच्छा पूरी हो । तब ही मैं समझूँगी कि आप मुझ से सच्चा प्रेम करते हैं और तब ही मेरे प्राणवल्लभ होने के अधिकारी हो सकेंगे ।

मगधसुन्दरी के जाल में फँसकर उसे इस कठिन कार्य के लिये भी तैयार होना पड़ा । वह उसे संतोष देकर उसी समय वहाँ से चल दिया और श्रीकीर्ति सेठ के महल पहुँचा । वहाँ से श्रीकीर्ति के शयनागार में गया और अपनी कार्यकुशलता से उसके गले में से हार निकाल लिया और बड़ी फुर्ती के साथ वहाँ से चल दिया । हार के दिव्य तेज को नहीं छुपा सका । सो भागते हुए उसे सिपाहियों ने देख लिया । वे उसे पकड़ने को दौड़े । वह भागता हुआ श्मशान की ओर निकल आया । वारिषेण इस समय श्मशान में कायोत्सर्ग ध्यान कर रहा था । सो विद्युत चोर मौका देखकर पीछे आने वाले सिपाहियों के पंजे से छूटने के लिये उस हार को वारिषेण के आगे पटक कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ । इतने में सिपाही भी वहाँ आ पहुँचे, जहाँ वारिषेण ध्यान किये खड़ा हुआ था । वे वारिषेण को हार के पास खड़ा देखकर भौंचक से रह गये । वे उसे उस अवस्था में देखकर हँसे और बोले -- वाह चाल तो खूब खेली गई ? मानो मैं कुछ जानता ही नहीं । मुझे धर्मात्मा जानकर सिपाही छोड़ जायेंगे । पर याद रखिये हम अपने मालिक की सच्ची नौकरी खाते हैं । हम तुम्हें कभी नहीं छोड़ेंगे ! यह कहकर वे वारिषेण को बांधकर को श्रेणिक के पास ले गये और राजा से बोले -- महाराज, ये हार चुराकर लिये जाते थे, सो हमने इन्हें पकड़ लिया ।

सुनते ही श्रेणिक का चेहरा क्रोध के मारे लाल सुर्ख हो गया, उनके ओंठ काँपने लगे, आँखों से क्रोध की ज्वालायें निकलने लगीं । उन्होंने गरज कर कहा -- देखो इस पापी का नीच कर्म जो श्मशान में जाकर ध्यान करता है और लोगों को यह बतलाकर कि मैं बड़ा धर्मात्मा हूँ, ठगता है, धोखा देता है । पापी ! कुल कलंक ! देखा मैंने तेरा धर्म का ढोंग ! सच है, दुराचारी, लोगों को धोखा देने के लिये क्या-क्या नहीं करते ? जिसे मैं राज्यसिंहासन पर बिठाकर संसार का अधीश्वर बनाना चाहता था, मैं नहीं जानता था कि वह इतना नीच होगा ? इससे बढ़कर और क्या कष्ट हो सकता है ? अच्छा तो जो इतना दुराचारी है और प्रजा को धोखा देकर ठगता है उसका जीता रहना सिवा हानि के, लाभदायक नहीं हो सकता । इसलिये जाओ इसे ले जाकर मार डालो ।

अपने खास पुत्र के लिये महाराज की ऐसी कठोर आज्ञा सुनकर सब चित्र-लिखे से होकर महाराज की ओर देखने लगे । सबकी आँखों में पानी भर आया । पर किस की मजाल जो उनकी आज्ञा का प्रतिवाद कर सके । जल्लाद लोग उसी समय वारिषेण को वध्यभूमि में ले गये । उनमें से एक ने तलवार खींचकर बड़े जोर से वारिषेण की गर्दन पर मारी, पर यह क्या आश्चर्य ? जो उसकी गर्दन पर कोई घाव नहीं हुआ; किंतु वारिषेण को उल्टा यह जान पड़ा, मानो किसी ने उस पर फूलों की माला फेंकी है । जल्लाद लोग देखकर दाँतों में अंगुली दबा गये । वारिषेण के पुण्य ने उसकी रक्षा की । सच है --
अहो पुण्येन तीव्राग्निर्जलत्वं याति भूतले, समुद्रः स्थलतामेति दुर्विषं च सुधायते ।
शत्रुर्मित्रत्वमाप्नोति विपत्तिः सम्पदायते,
तस्मात्सुखेषिणो भव्याः पुण्यं कुर्वन्तु निर्मलम् ॥
--ब्रह्म नेमिदत्त्

कक अर्थात् -- पुण्य के उदय से अग्नि जल बन जाती है, समुद्र स्थल हो जाता है, विष अमृत हो जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है और विपत्ति सम्पत्ति के रूप में परिणत हो जाती है । इसलिये जो लोग सुख चाहते हैं, उन्हें पवित्र कार्यों द्वारा सदा पुण्य उत्पन्न करना चाहिये ।

जिनभगवान् की पूजा करना, दान देना, व्रत उपवास करना, सदा विचार पवित्र और शुद्ध रखना, परोपकार करना, हिंसा, झूठ, चोरी आदि पाप कर्मों का न करना, ये पुण्य उत्पन्न करने के करण हैं ।

वारिषेण की यह हालत देखकर सब उसकी जय जयकार करने लगे । देवों ने प्रसन्न होकर उस पर सुगन्धित फूलों की वर्षा की । नगरवासियों को इस समाचार से बड़ा आनन्द हुआ । सबने एक स्वर से कहा कि, वारिषेण तुम धन्य हो, तुम वास्तव में साधु पुरुष हो, तुम्हारा चरित्र बहुत निर्मल है, तुम जिनभगवान् के सच्चे सेवक हो, तुम पवित्र पुरुष हो, तुम जैनधर्म के सच्चे पालन करने वाले हो । पुण्य-पुरुष, तुम्हारी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी थोड़ी है । सच है, पुण्य से क्या नहीं होता ?

श्रेणिक ने जब इस अलौकिक घटना का हाल सुना तो उन्हें भी अपने अविचार पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ । वे दुःखी होकर बोले --

ये कुर्वन्ति जड़ात्मानः कार्यं लोकेअविचार्य च ।
ते सीदन्ति महन्तोपि मादृशा दुःख सागरे ॥
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात् -- जो मूर्ख लोग आवेश मे आकर बिना विचारे किसी काम को कर बैठते हैं, वे फिर बड़े भी क्यों न हों, उन्हें मेरी तरह दुःख ही उठाने पड़ते हैं । इसलिये चाहे कैसा ही काम क्यों न हो, उसे बड़े विचार के साथ करना चाहिए ।

श्रेणिक बहुत कुछ पश्चात्ताप कर के पुत्र के पास श्मशान में आये । वारिषेण की पुण्य मूर्ति को देखते ही उनका हृदय पुत्र प्रेम से भर आया । उनकी आँखों से आँसू बह निकले । उन्होंने पुत्र को छाती से लगाकर रोते-रोते कहा -- प्यारे पुत्र, मेरी मूर्खता को क्षमा करो ! मैं क्रोध के मारे अन्धा बन गया था, इसलिए आगे पीछे का कुछ सोच विचार न कर मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया । पुत्र, पश्चाताप से मेरा हृदय जल रहा है; उसे अपने क्षमारूप जल से बुझाओ ! दुःख के समुद्र में गोते खा रहा हूँ, मुझे देकर निकालो !

अपने पूज्य पिता की यह हालत देखकर वारिषेण को बड़ा कष्ट हुआ । वह बोला -- पिताजी, आप यह क्या कहते हैं ? आप अपराधी कैसे ? आपने तो अपने कर्तव्य का पालन किया है और कर्तव्य का पालन करना कोई अपराध नहीं है । मान लीजिये कि यदि आप पुत्र-प्रेम के वश होकर मेरे लिये ऐसे दण्ड की आज्ञा न देते, उस से प्रजा क्या समझती ? चाहे मैं अपराधी नहीं भी था तब भी क्या प्रजा इस बात को देखती ? वह तो यही समझती कि आपने मुझे अपना पुत्र जानकर छोड़ दिया । पिताजी, आपने बहुत ही बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का काम किया है । आपकी नीतिपरायणता देखकर आनन्द के समुद्र में लहरें ले रहा है । आपने पवित्र वंश की आज लाज रख ली । यदि आप ऐसे समय में जरा भी खिसक जाते, तो सदा के लिये अपने कुल में कलंक का टीका लग जाता । इसके लिये तो आपको प्रसन्न होना चाहिये न कि दुःखी । हाँ इतना जरूर हुआ कि मेरे इस समय पाप का उदय था; इसलिये मैं निरपराधी होकर भी अपराधी बना । पर इसका मुझे कुछ खेद नहीं । क्योंकि --

अवश्य ह्यनुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाऽशुभम् ।
--वादीभ सिंह

अर्थात् -- जो जैसा कर्म करता है उसका शुभ या अशुभ फल उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है । फिर मेरे लिए कर्मों का फल भोगना कोई नई बात नहीं है ।

पुत्र के ऐसे उन्नत और उदार विचार सुनकर श्रेणिक बहुत आनन्दित हुए । वे सब दुःख भूल गये । उन्होंने कहा, पुत्र, सत्पुरुषों ने बहुत ठीक लिखा है --

चंदनं घृष्यमाणं च दह्यमानो यथाऽगुरुः ।
न याति विक्रियां साधुः पीडितो पि तथाऽपरैः ॥

अर्थात् -- चन्दन को कितना भी घिसिये, अगुरु को खूब जलाइये, उससे उनका कुछ न बिगड़ कर उलटा उन में से अधिक-अधिक सुगन्ध निकलेगी । उसी तरह सत्पुरुषों को दुष्ट लोग कितना ही सतावें, कितना ही कष्ट दें, पर वे उससे कुछ भी विकार को प्राप्त नहीं होते, सदा शांत रहते हैं और अपनी बुराई करने वाले का भी उपकार करते हैं ।

वारिषेण के पुण्य का प्रभाव देखकर विद्युत चोर को बड़ा भय हुआ । उसने सोचा कि राजा को मेरा हाल मालूम हो जाने से वे मुझे बहुत कड़ी सजा देंगे । इससे अच्छा यही है कि मैं स्वयं ही जाकर उनसे सब सच्चा-सच्चा हाल कह दूँ । ऐसा करने से वे मुझे क्षमा भी कर सकेंगे । यह विचार कर विद्युत चोर महाराज के सामने जा खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर उनसे बोला -- प्रभो, यह सब पाप कर्म मेरा है । पवित्रात्मा वारिषेण सर्वथा निदोष है । पापिनी वेश्या के जाल में फँसकर मैंने यह नीच काम किया था; पर आज से मैं कभी ऐसा काम नहीं करूँगा । मुझे दया करके क्षमा कीजिये ।

विद्युत चोर को अपने कृत कर्म के पश्चात्ताप से दु:खी देख श्रेणिक उसे अभय देकर अपने प्रिय पुत्र वारिषेण से बोले -- पुत्र, अब राजधानी में चलो, तुम्हारी माता तुम्हारे वियोग से बहुत दुखी हो रही होंगी ।

उत्तर में वारिषेण ने कहा -- पिताजी, मुझे क्षमा कीजिये । मैंने संसार की लीला देख ली । मेरा आत्मा उसमें प्रवेश करने से मुझे रोकता है । इसलिये मैं अब घर पर न जाकर जिनभगवान् के चरणों का आश्रय ग्रहण करूँगा । सुनिये, अब से मेरा कर्त्तव्य होगा कि मैं हाथ ही में भोजन करूँगा, सदा वन में रहूँगा और मुनि मार्ग पर चलकर अपना आत्महित करूँगा । मुझे अब संसार में पैठने की इच्छा नहीं, विषय वासना से प्रेम नहीं । मुझे संसार दुःख मय जान पड़ता है, इसलिये मैं जान-बूझकर अपने को दुःखों में फँसाना नहीं चाहता । क्योंकि --

निजे पाणौ दीपे लसति भुवि कूपे निपततां फलं किं तेन स्यादिति-- --जीवंधर चम्पू

अर्थात् -- हाथ में प्रदीप लेकर भी यदि कोई कुएँ में गिरना चाहे, तो बतलाइये उस दीपक से क्या लाभ ? जब मुझे दो अक्षरों का ज्ञान है और संसार की लीला से मैं अपरिचित नहीं हूँ; इतना होकर भी फिर मैं यदि उसमें फँसूं, तो मुझसा मूर्ख और कौन होगा ? इसलिये आप मुझे क्षमा कीजिये कि मैं आपकी पालनीय आज्ञा का भी बाध्य होकर विरोध कर रहा हूँ । यह कहकर वारिषेण फिर एक मिनट के लिए भी न ठहर कर वन की ओर चल दिए और श्री सूरदेव मुनि के पास जाकर उन्होंने दीक्षा ग्रहण कर ली ।

तपस्वी बनकर वारिषेण मुनि बड़ी दृढ़ता के साथ चारित्र का पालन करने लगे । वे अनेक देशों-विदेशों में घूम-घूम कर धर्मोपदेश करते हुए एक बार पलाशकूट नामक शहर में पहुँचे । वहाँ श्रेणिक का मंत्री अग्निभूति रहता था । उसका एक पुष्पडाल नामक पुत्र था । वह बहुत धर्मात्मा था और दान, व्रत, पूजा आदि सत्कर्मों के करने में सदा तत्पर रहा करता था । वह वारिषेण मुनि को भिक्षार्थ आये हुए देखकर बड़ी प्रसन्नता के साथ उनके सामने गया और भक्ति-पूर्वक उनका आह्वान कर उसने नवधा भक्ति सहित उन्हें प्रासुक आहार दिया । आहार करके जब वारिषेण मुनि वन में जाने लगे तब पुष्पडाल भी कुछ तो भक्ति से, कुछ बाल पने की मित्रता के नाते और कुछ राज पुत्र होने के लिहाज से उन्हें थोड़ी दूर पहुँचा आने के लिए अपनी स्त्री से पूछ कर उनके पीछे-पीछे चल दिया । वह दूर तक जाने की इच्छा न रहते हुए भी मुनि के साथ-साथ चलता गया । क्योंकि उसे विश्वास था कि थोड़ी दूर गये बाद ये मुझे लौट जाने के लिये कहेंगे ही । पर मुनि ने उसे कुछ नहीं कहा, तब उसकी चिंता बढ़ गई । उसने मुनि को यह समझाने के लिये, कि मैं शहर से बहुत दूर निकल आया हूँ, मुझे घर पर जल्दी लौट जाना है, कहा -- कुमार, देखते हैं यह वही सरोवर है, जहाँ हम आप खेला करते थे; यह वही छायादार और उन्नत आम का वृक्ष है, जिस के नीचे आप हम बाललीला का सुख लेते थे; और देखो, यह वही विशाल भू भाग है, जहाँ मैंने और आपने बालपन में अनेक खेल खेले थे । इत्यादि अपने पूर्व परिचित चिह्नों को बार-बार दिखलाकर पुष्पडाल ने मुनि का ध्यान अपने दूर निकल आने की ओर आकर्षित करना चाहा, पर मुनि उसके हृदय की बात जानकर भी उसे लौट जाने को न कह सके । कारण वैसा करना उनका मार्ग नहीं था । इसके विपरीत उन्होंने पुष्पडाल के कल्याण की इच्छा से उसे खूब वैराग्य का उपदेश देकर मुनिदीक्षा दे दी । पुष्पदडाल मुनि हो गया, संयम का पालन करने लगा और खूब शास्त्रों का अभ्यास करने लगा; पर तब भी उसकी विषय वासना नहीं मिटी, उसे अपनी स्त्री की बार-बार याद आने लगी । आचार्य कहते हैं कि --
धिक्कामं धिङ् महामोहं धिङ्भोगान्येस्तु वंचितः ।
सन्मार्गेपि स्थितो जंतुर्न जानाति निजं हितम् ॥
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात -- उस काम को, उस मोह को, उन भोगों को धिक्कार है, जिनके वश होकर उत्तम मार्ग में चलने वाले भी अपना हित नहीं कर पाते । यही हाल पुष्पडाल का हुआ, जो मुनि होकर भी वह अपनी स्त्री को हृदय से नहीं भुला सका ।

इसी तरह पुष्पडाल को बारह वर्ष बीत गये । उसकी तपश्चर्या सार्थक होने के लिये गुरु ने उसे तीर्थ यात्रा करने की आज्ञा दी और उसके साथ वे भी चले । यात्रा करते-करते एक दिन वे भगवान् वर्धमान के समवशरण में पहुँच गये । भगवान को उन्होंने भक्ति पूर्वक प्रणाम किया । उस समय वहाँ गन्धर्वदेव भगवान की भक्ति कर रहे थे । उन्होंने काम की निन्दा में एक पद्य पढ़ा । वह पद्य यह था --
मइलकुचेली दुम्मणी णाहे पवसियएण ।
कह जीवेसइ घणियधर उब्भते विरहेण ॥
--कोई कवि
अर्थात् -- स्त्री चाहे मैली हो, कुचैली हो, हृदय की मलिन हो, पर वह भी अपने पति के प्रवासी होने पर, विदेश में रहने पर, नहीं जो कर पति वियोग से
वन-वन, पर्वतों-पर्वतों में मारी-मारी फिरती है । अर्थात् काम के वश होकर नहीं करने के काम भी कर
डालती है ।

उक्त पद्य को सुनते ही पुष्पडाल मुनि भी काम से पीड़ित होकर अपनी स्त्री की प्राप्ति के लिये अधीर हो उठे । वे व्रत से उदासीन होकर अपने शहर की ओर रवाना हुए । उनके हृदय की बात जानकर वारिषेण मुनि भी उन्हें धर्म में दृढ़ करने के लिये उनके साथ-साथ चल दिये ।

गुरु और शिष्य अपने शहर में पहुँचे । उन्हें देखकर सती चेलना ने सोचा कि -- जान पड़ता है, पुत्र चारित्र से चलायमान हुआ है । नहीं तो ऐसे समय इसके यहाँ आने की क्या आवश्यकता थी ? यह विचार कर उसने उसकी परीक्षा के लिये उसके बैठने को दो आसन दिये । उनमें एक काष्ठ का था और दूसरा रत्नजड़ित । वारिषेण मुनि रत्नजड़ित आसन पर न बैठकर काष्ठ के आसन पर बैठे । सच है -- जो सच्चे मुनि होते हैं, वे कभी ऐसा तप नहीं करते जिससे उनके आचरण पर किसी को सन्देह हो । इसके बाद वारिषेण मुनि ने अपनी माता के सन्देह को दूर करके उससे कहा -- माता, कुछ समय के लिये मेरी सब स्त्रियों को यहाँ बुलवा तो लीजिये । महारानी ने वैसा ही किया । वारिषेण की सब स्त्रियाँ खूब वस्त्राभूषणों से सजकर उनके सामने आ उपस्थित हुईं । वे बड़ी सुन्दरी थीं । देवकन्यायें भी उनके रूप को देखकर लज्जित होतीं थीं । मुनि को नमस्कार कर वे सब उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा के लिये खड़ी रहीं ।

वारिषेण तब अपने शिष्य पुष्पडाल से कहा -- क्यों देखते हो न ? ये मेरी स्त्रियाँ हैं, यह सम्पत्ति है, यदि तुम्हें ये अच्छी जान पड़ती हैं, तुम्हारा संसार से प्रेम है, तो इन्हें तुम स्वीकार करो । वारिषेण मुनिराज का यह आश्चर्य में डालने वाला कर्त्तव्य देखकर पुष्पडाल बड़ा लज्जित हुआ । उसे अपनी मूर्खता पर बहुत खेद हुआ । वह मुनि के चरणों को नमस्कार कर बोला -- प्रभो, आप धन्य हैं, आपने लोभरूपी पिशाच को नष्ट कर दिया है, आप ही ने जिनधर्म का सच्चा सार समझा है । संसार में वे ही बड़े पुरुष हैं, महात्मा हैं, जो आपके समान संसार की सब सम्पत्ति को लात मार कर वैरागी बनते हैं । उन महात्माओं के लिये फिर कौन वस्तु संसार में दुर्लभ रह जाती है ? दयासागर, मैं तो सचमुच जन्मान्ध हूँ, इसीलिये तो मौलिक तप रत्न को प्राप्त कर भी अपनी स्त्री को चित्त से अलग नहीं कर सका । प्रभो, जहाँ आपने बारह वर्ष पर्यंत खूब तपश्चर्या की वहाँ मुझ पापी ने इतने दिन व्यर्थ गँवा दिये -- सिवा आत्मा को कष्ट पहुँचाने के कुछ नहीं किया । स्वामी, मैं बहुत अपराधी हूँ, इसलिये दया करके मुझे अपने पाप का प्रायश्चित्त देकर पवित्र कीजिये । पुष्पडाल के भावों का परिवर्तन और कृत कर्म के पश्चात्ताप से उनके परिणामों की कोमलता तथा पवित्रता देखकर वारिषेण मुनिराज बोले -- धीर, इतने दुखी न बनिये । पाप कर्म के उदय से कभी-कभी अच्छे-अच्छे विद्वान् भी हतबुद्धि हो जाते हैं । इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं । यही अच्छा हुआ जो तुम पीछे अपने मार्ग पर आ गये । इसके बाद उन्होंने पुष्पडाल मुनि को उचित प्रायश्चित्त देकर धर्म में स्थिर किया, अज्ञान के कारण सम्यग्दर्शन से विचलित देख कर उन का धर्म में स्थितिकरण किया ।

पुष्पडाल मुनि गुरु महाराज की कृपा से अपने हृदय को शुद्ध बनाकर बड़े वैराग्य भावों से कठिन-कठिन तपश्चर्या करने लगे, भूख प्यास की परवाह न कर परीषह सहने लगे ।

इसी प्रकार अज्ञान व मोह से कोई धर्मात्मा पुरुष धर्म रूपी पर्वत से गिरता हो, उसे सहारा देकर न गिरने देना चाहिये । जो धर्मज्ञ पुरुष इस स्थितिकरण अंग का पालन करते हैं, समझो कि वे स्वर्ग और मोक्ष सुख देने वाले धर्म रूपी वृक्ष को सींचते हैं । शरीर, सम्पत्ति, कुटुम्ब आदि अस्थिर हैं, विनाशीक हैं, इन की रक्षा भी जब कभी-कभी सुख देने वाली हो जाती है तब अनंत सुख देने वाले धर्म की रक्षा का कितना महत्त्व होगा, यह सहज में जाना जा सकता है । इसलिये धर्मात्माओं को उचित है कि वे दुःख देने वाले प्रमाद को छोड़कर संसार-समुद्र से पार करने वाले पवित्र-धर्म का सेवन करें ।

श्री वारिषेण मुनि, जो कि सदा जिन-भगवान् की भक्ति में लीन रहते हैं, तप पर्वत से गिरते हुए पुष्पडाल मुनि को हाथ का सहारा देकर तपश्चर्या और ध्यानाध्ययन करने के लिये वन में चले गये, वे प्रसिद्ध महात्मा आत्म-सुख प्रदान कर मुझे भी संसार-समुद्र से पार करें ।


+ विष्णुकुमार मुनि की कथा -
विष्णुकुमार मुनि की कथा
अनंत सुख प्रदान करने वाले जिनभगवान् जिनवाणी और जैन साधुओं को नमस्कार कर मैं वात्सल्य अंग के पालन करने वाले श्रीविष्णुकुमार मुनिराज की कथा लिखता हूँ ।

अवंतिदेश के अंतर्गत उज्जयिनी बहुत सुन्दर और प्रसिद्ध नगरी है । जिस समय का यह उपाख्यान है, उस समय उसके राजा श्रीवर्मा थे । वे बड़े धर्मात्मा थे, सब शास्त्रों के अच्छे विद्वान थे, विचारशील थे, और अच्छे शूरवीर थे । वे दुराचारियों को उचित दण्ड देते और प्रजा का नीतिके साथ पालन करते । प्रजा उनकी बड़ी भक्त थी ।

उनकी महारानी का नाम था श्रीमती । वह भी विदुषी थी । उस समय की स्त्रियों में वह प्रधान सुन्दरी समझी जाती थी । उसका हृदय बड़ा दयालु था । वह जिसे दुखी देखती, फिर उसका दुःख दूर करने के लिये जी जान से प्रयत्न करती । महारानी को सारी प्रजा देवी समझती थी ।

श्रीवर्मा के राजमंत्री चार थे । उनके नाम थे बलि, बृहस्पति, प्रह्लाद, और नमुचि । ये चारों ही धर्म के कट्टर शत्रु थे । इन पापी मंत्रियों से युक्त राजा ऐसे जान पड़ते थे मानों जहरीले सर्प से युक्त जैसे चन्दन का वृक्ष हो ।

एक दिन ज्ञानी अकम्पनाचार्य देश-विदेशों में पर्यटन कर भव्य पुरुषों को धर्मरूपी अमृत से सुखी करते हुए उज्जयिनी में आये । उनके साथ सात सौ मुनियों का बड़ा भारी संघ था । वे शहर बाहर एक पवित्र स्थान में ठहरे । अकम्पनाचार्य को निमित्तज्ञान से उज्जयिनी की स्थिति अनिष्ट कर जान पड़ी । इसलिये उन्होंने सारे संघ से कह दिया कि देखो, राजा, वगैरह कोई आवे पर आप लोग उन से वाद विवाद न कीजियेगा । नहीं तो सारा संघ बड़े कष्ट में पड़ जायेगा, उस पर घोर उपसर्ग आयेगा ।
गुरु की हितकर आज्ञा स्वीकार कर सब मुनि मौन के साथ ध्यान करने लगे । सच है—

शिष्यास्तेत्र प्रशस्यन्ते ये कुर्वन्ति गुरोर्वचः ।
प्रीतितो विनयोपेता भवन्त्यन्ये कुपुत्रवत् ।।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—शिष्य वे ही प्रशंसा के पात्र हैं, जो विनय और प्रेम के साथ अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हैं । इसके विपरीत चलने वाले कुपुत्र के समान निन्दा के पात्र हैं ।

अकम्पनाचार्य के आने का समाचार शहर के लोगों को मालूम हुए । वे पूजाद्रव्य लेकर बड़े भक्ति के साथ आचार्य की वन्दना को जाने लगे । आज एकाएक अपने शहर में आनन्द की धूमधाम महल पर बैठे हुए श्रीवर्मा ने मंत्रियों से पूछा—ये सब लोग आज ऐसे सजधजकर कहाँ जा रहे हैं ? उत्तर में मंत्रियों ने कहा—महाराज सुना जाता है कि अपने शहर में नंगे जैन साधु आये हुए हैं । ये सब उनकी पूजा के लिये जा रहे हैं । राजा ने प्रसन्नता के साथ कहा—तब तो हमें भी चलकर उनके दर्शन करना चाहिए । वे महापुरुष होंगे ! यह विचार कर राजा भी मंत्रियों के साथ आचार्य के दर्शन करने को गए । उन्हें आत्मध्यान में लीन देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने क्रम से एक-एक मुनिको भक्तिपूर्वक नमस्कार किया । सब मुनि अपने आचार्य की आज्ञानुसार मौन रहे । किसी ने भी उन्हें धर्मवृद्धि नहीं दी । राजा उनकी वन्दना कर वापिस महल लौट चले । लौटते समय मंत्रियों ने उनसे कहा—महाराज, देखें साधुओं को ? वेचारे बोलना तक भी नहीं जानते, सब नितान्त मूर्ख हैं । यही तो कारण है कि सब मौनी बैठे हुए हैं । उन्हें देखकर सर्वसाधारण तो यह समझेंगे कि ये सब आत्मध्यान कर रहे हैं, बड़े तपस्वी हैं । पर यह इनका ढोंग है । अपनी सब पोल न खुल जाय, इसलिये उन्होंने लोगों को धोखा देने को यह कपटजाल रचा है । महाराज, ये दाम्भिक हैं । इस प्रकार त्रैलोक्यपूज्य और परम शांत मुनिराजों की निन्दा करते हुए ये मलिनहृदयी मंत्री राजा के साथ लौटे आ रहे थे कि रास्ते में इन्हें एक मुनि मिल गए, जो कि शहर से आहार करके वन की ओर आ रहे थे । मुनिको देखकर इन पापियों ने उनकी हँसी की, महाराज, देखिए एक बैल और पेट भरकर चला आ रहा है । मुनिने मंत्रियों के निन्दावचनों को सुन लिया । सुनकर भी उनका कर्त्तव्य था कि वे शान्त रह जाते, पर वे निन्दा न सह सके । कारण वे आहार के लिए शहर में चले गये थे, इसलिये उन्हें अपने आचार्य महाराज की आज्ञा मालूम न थी । मुनि ने यह समझकर, कि इन्हें अपनी विद्या का बड़ा अभिमान है, उसे मैं चूर्ण करूँगा, कहा—तुम व्यर्थ क्यों किसी की बुराई करते हो ? यदि तुम में कुछ विद्या हो, आत्म बल हो, तो मुझ से शास्त्रार्थ करो । फिर तुम्हें जान पड़ॆगा कि बैल कौन है ? भला वे भी तो राजमंत्री थे, उस पर भी दुष्टता उन के हृदय में कूट-कूट कर भरी हुई थी; फिर वे कैसे एक अकिंचन्य साधु के वचनों को सह सकते थे ? उन्होंने मुनि के साथ शास्त्रार्थ करना स्वीकार कर लिया । अभिमान में आकर उन्होंने कह तो दिया कि हम शास्त्रार्थ करेंगे, पर जब शास्त्रार्थ हुआ तब उन्हें जान पड़ा कि शास्त्रार्थ करना बच्चों का खेल नहीं है । एक ही मुनि ने अपने स्याद्वाद के बल से बात की, बात में चारों मंत्रियों को पराजित कर दिया । सच है—एक ही सूर्य सारे संसार के अन्धकार को नष्ट करने के लिए समर्थ है ।

विजय लाभकर श्रुतसागर मुनि अपने आचार्य के पास आये । उन्होंने रास्ते की सब घटना आचार्य से ज्यों की त्यों कह सुनाई । सुनकर आचार्य खेद के साथ बोले—हाय ! तुमने बहुत ही बुरा किया । तुमने अपने हाथों से सारे संघ का घात किया, जो उन से शास्त्रार्थ किया । अस्तु, जो हुआ, अब यदि तुम सारे संघ की रक्षा चाहते हो, तो पीछे जाओ और जहाँ मंत्रियों के साथ शास्त्रार्थ हुआ है, वहीं जाकर कायोत्सर्ग ध्यान करो । आचार्य की आज्ञा को सुनकर श्रुतसागर मुनिराज जरा भी विचलित नहीं हुए । वे संघ की रक्षा के लिये उसी समय वहाँ से चल दिये और शास्त्रार्थ की जगह पर आकर मेरु की तरह निश्चल हो बड़े धैर्य के साथ कायोत्सर्ग ध्यान करने लगे ।

शास्त्रार्थ में मुनि से पराजित होकर मंत्री बड़े लज्जित हुए । अपने मान भंग का बदला चुकाने का विचार कर मुनिवध के लिये रात्रि के समय वे चारों शहर से बाहर हुए । रास्ते में श्रुतसागर मुनि ध्यान करते हुए मिले । पहले उन्होंने अपने मान भंग करने वाले ही को परलोक पहुँचा देना चाहा । उन्होंने मुनि की गर्दन काटने को अपनी तलवार को म्यान से खींचा और एक ही साथ उनका काम तमाम करने के विचार से उन पर वार करना चाहा कि, इतने में मुनि के पुण्य प्रभाव से पुरदेवी ने आकर उन्हें तलवार उठाये हुए ही कील दिये ।

प्रातः काल होते ही बिजली की तरह सारे शहर में मंत्रियों की दुष्टता का हाल फैल गया । सब शहर उनके देखने को आया । राजा भी आये । सब ने एक स्वर से उन्हें धिक्कारा । है भी तो ठीक, जो पापी लोग निरपराधों को कष्ट पहुँचाते हैं वे इस लोक में भी घोर दुःख उठाते हैं और परलोक में नरकों के असह्य दुःख सहते हैं । राजा ने उन्हें बहुत धिक्कार कर कहा—जब तुमने मेरे सामने इन निर्दोष और संसार मात्र का उपकार करने वाले मुनियों की निन्दा की थी, तब मैं तुम्हारे विश्वास पर निर्भर रहकर यह समझा था कि सम्भव है मुनि लोग ऐसे ही हों, पर आज मुझे तुम्हारी नीचता का ज्ञान हुआ, तुम्हारे पापी हृदय का पता लगा । तुम इन्हीं निर्दोष साधुओं की हत्या करने को आये थे न ? पापियों, तुम्हारा मुख देखना भी महापाप है । तुम्हें तुम्हारे इस घोर कर्म का उपयुक्त दण्ड यही चाहिये था कि जैसा तुम करना चाहते थे, वही तुम्हारे लिये किया जाता । पर पापियों, तुम ब्रह्मण कुल में उत्पन्न हुए हो और तुम्हारी कितनी ही पीड़ियाँ मेरे यहाँ मंत्री पद पर प्रतिष्ठा पा चुकी हैं, इसलिये उसके लिहाज से तुम्हें अभय देकर अपने नौकरों को आज्ञा करता हूँ कि वे तुम्हें गधों पर बैठाकर मेरे देश की सीमा से बाहर कर दें । राजा की आज्ञा का उसी समय पालन हुआ । चारों मंत्री देश से निकाल दिये गये । सच है—पापियों की ऐसी दशा होना उचित ही है ।

धर्म के ऐसे प्रभाव को देखकर लोगों के आनन्द का ठिकाना न रहा । वे अपने हृदय में बढ़ते हुए हर्ष के वेग को रोकने में समर्थ नहीं हुए । उन्होंने जयध्वनि के मारे आकाश पाताल एक कर दिया। मुनि संघ का उपद्रव टला । सबके चित्त स्थिर हुए । अकम्पनाचार्य भी उज्जयिनी से विहार कर गये ।
हस्तिनापुर नाम का एक शहर है । उसके राजा हैं महापद्म । उनकी रानी का नाम लक्ष्मीमती था । उसके पद्म और विष्णु नाम के दो पुत्र हुए ।

एक दिन राजा संसार की दशा पर विचार कर रहे थे । उसकी अनित्यता और निस्सारता देखकर उन्हें बहुत वैराग्य़ हुआ उन्हें संसार दुःख मय दिखने लगा । वे उसी समय अपने बड़े पुत्र पद्म को राज्य देकर अपने छोटे पुत्र विष्णु कुमार के साथ वन में चले गये और श्रुतसागर मुनि के पास पहुँचकर दोनों पिता-पुत्र ने दीक्षा ग्रहण कर ली । विष्णु कुमार बाल पने से ही संसार से विरक्त थे, इसलिये पिता के रोकने पर भी वे दीक्षित हो गये । विष्णु कुमार मुनि साधु बनकर खूब तपश्चर्या करने लगे । कुछ दिनों बाद तपश्चर्या के प्रभाव से उन्हें विक्रिया ऋद्धि प्राप्त हो गई ।

पिता के दीक्षित हो जाने पर हस्तिनापुर का राज्य पद्मराज करने लगे । उन्हें सब कुछ होने पर भी एक बात का बड़ा दुःख था । वह यह कि, कुम्भपुर का राजा सिंहबल उन्हें बड़ा कष्ट पहुँचाया करता था । उनके देश में अनेक उपद्रव किया करता था । उस के अधिकार में एक बड़ा भारी सुदृढ़ किला था । इसलिये वह पद्मराज की प्रजा पर एकाएक धावा मार कर अपने किले में जाकर छिप जाता है । तब पद्मराज उसका कुछ अनिष्ट नहीं कर पाते थे । इस कष्ट की उन्हें सदा चिंता रहा करती थी ।

इसी समय श्रीवर्मा के चारों मंत्री उज्जयिनी से निकलकर कुछ दिनों बाद हस्तिनापुर की ओर आ निकले । उन्हें किसी तरह राजा के इस दुःख का सूत्र मलूम हो गया । वे राजा से मिले और उन्हें चिंता से निर्मुक्त करने का वचन देकर कुछ सेना के साथ सिंहबल पर जा चढ़े और अपनी बुद्धिमानी से किले को तोड़कर सिंहबल को उन्होंने बाँध लिया और लाकर पद्मराज के सामने उपस्थित कर दिया । पद्मराज उनकी वीरता और बुद्धिमानी से बहुत प्रसन्न हुआ । उसने उन्हें मंत्री बनाकर कहा—तुमने मेरा उपकार किया है । तुम्हारा मैं बहुत कृतज्ञ हूँ । यद्यपि उसका प्रतिफल नहीं दिया जा सकता, तब भी तुम जो कहो वह मैं तुम्हें देने को तैयार हूँ । उत्तर में बलि नाम के मंत्री ने कहा—प्रभो, आपकी हम पर कृपा है, तो हमें सब कुछ मिल चुका । इस पर भी आपका आग्रह है, तो उसे हम अस्वीकार नहीं कर सकते । अभी हमें कुछ आवश्यकता नहीं है । जब समय होगा तब आपसे प्रार्थना करेंगे ही ।

इसी समय श्री अकम्पनाचार्य अनेक देशों में विहार करते हुए और धर्मोपदेश द्वारा संसार के जीवों का हित करते हुए हस्तिनापुर के बगीचे में आकर ठहरे । सब लोग उत्सव के साथ उनकी वन्दना करने को गये । अकम्पनाचार्य के आने का समाचार राजमंत्रियों को मालूम हुआ । मालूम होते ही उन्हें अपने अपमान की बात याद हो आई । उनका हृदय प्रतिहिंसा से उद्विग्न हो उठा । उन्होंने परस्पर में विचार किया कि समय बहुत उपयुक्त है, इसलिये बदला लेना ही चाहिये । देखो न, इन्हीं दुष्टों के द्वारा अपने को कितना कष्ट उठाना पड़ा था ? सबके हम धिक्कार पात्र बने और अपमान के साथ देश से निकाले गये । पर अपने मार्ग में एक बड़ा काँटा है । राजा इनका बड़ा भक्त है । वह अपने रहते हुए इनका अनिष्ट कैसे होने देगा ? इसके लिये कुछ उपाय सोच निकालना आवश्यक है । नहीं तो ऐसा न हो कि ऐसा अच्छा समय हाथ से निकल जाय ? इतने में बलि मंत्री बोल उठा कि, हाँ इसकी आप चिंता न करें । सिंहबल के पकड़ लाने का पुरस्कार राजा से बाकी है, उसके ऐवज में उससे सात दिन का राज्य ले लेना चाहिये । फिर जैसा हम करेंगे वही होगा । राजा को उसमें दखल देने का कोई अधिकार न रहेगा । यह प्रयत्न सबको सर्वोत्तम जान पड़ा । बलि उसी समय राजा के पास पहुँचा और बड़ी विनीतता से बोला—महाराज, आप पर हमारा एक पुरस्कार पाना है । आप कृपाकर अब उसे दीजिये । इस समय उससे हमारा बड़ा उपकार होगा । राजा उसका कूट कपट नहीं समझ और यह विचार कर, कि इन लोगों ने मेरा बड़ा उपकार किया था, अब उसका बदला चुकाना मेरा कर्त्तव्य है, बोला—बहुत अच्छा, जो तुम्हें चाहिए वह मांग लो, मैं अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके तुम्हारे ऋण से उऋण होने का यत्न करूँगा ।

बलि बोला—महाराज, यदि आप वास्तव में ही हमारा हित चाहते हैं, तो कृपा करके सात दिन के लिए अपना राज्य हमें प्रदान कीजिये ।

राजा सुनते ही अवाक् रह गया । उसे किसी बड़े भारी अनर्थ की आशंका हुई । पर अब वश ही क्या था ? उसे वचनबद्ध होकर राज्य दे देना ही पड़ा । राज्य के प्राप्त होते ही उनकी प्रसन्नता का कुछ ठिकाना न रहा । उन्होंने मुनियों के मारने के लिए यज्ञ का बहाना बनाकर षड़्यंत्र रचा, जिससे कि सर्वसाधारण न समझ सकें ।

मुनियों के बीच में रखकर यज्ञ के लिए एक बड़ा भारी मंडप तैयार किया गया । उनके चारों ओर काष्ठ ही काष्ठ रखवा दिया गया । हजारों पशु इकट्ठे किये गये । यज्ञ आरम्भ हुआ । वेदों के जानकर बड़े-बड़े विद्वान य़ज्ञ कराने लगे । वेदध्वनि से यज्ञमण्डप गूँजने लगा । बेचारे निरपराध पशु बड़ी निर्दयता से मारे जाने लगे । उनकी आहुतियाँ दी जाने लगीं । देखते-देखते दुर्गन्धित धुएँ से आकश परिपूर्ण हुआ । मानो इस महापाप को न देख सकने के कारण सूर्य अस्त हुआ । मनुष्यों के हाथ से राज्य राक्षसों के हाथों में गया ।

सारे मुनिसंघ पर भयंकर उपसर्ग हुआ । परंतु उन शांति की मूर्तियों ने इसे अपने किये कर्मों का फल समझकर बड़ी धीरता के साथ सहना आरम्भ किया । वे मेरु समान निश्चल रहकर एक चित्त से परमात्मा का ध्यान करने लगे । सच है—जिन्होंने अपने हृदय को खूब उन्‍नत और दृढ़ बना लिया है, जिनके ह्दय में निरंतर यह भावना बनी रहती है—

अरि मित्र, महल मसान, कंचन काँच, निन्दन थुतिकरन ।
अर्धावतारन असिप्रहारन मैं सदा समता धरन ।।

वे क्या कभी ऐसे उपसर्गों विचलित होते हैं ? नहीं । पाण्डवों को शत्रुओं ने लोहे के गरम-गरम भूषण पहना दिये । अग्नि की भयानक ज्वाला उनके शरीर को भस्म करने लगी । पर वे विचलित नहीं हुए । धैर्य के साथ उन्होंने सब उपसर्ग सहा । जैन साधुओं का यही मार्ग है कि वे आये हुए कष्टों को शांति से सहें और वे ही यथार्थ साधु हैं । जिनका हृदय दुर्बल है, जो रागद्वेषरूपी शत्रुओं को जीतने के लिये ऐसे कष्ट नहीं सह सकते, दुःखों के प्राप्त होने पर समभाव नहीं रख सकते, वे न तो अपने आत्महित के मार्ग में आगे बढ़ पाते हैं और न वे साधुपद स्वीकार करने योग्य हो सकते हैं ।

मिथिला में श्रुतसागर मुनि को निमित्तज्ञान से इस उपसर्ग का हाल मालूम हुआ । उनके मुँह से बड़े कष्ट के साथ वचन निकले—हाय ! हाय !! इस समय मुनियों पर बड़ा उपसर्ग हो रहा है । वहीं एक पुष्पदंत नामक क्षुल्लक भी उपस्थित थे । उन्होंने मुनिराज से पूछा—प्रभो, यह उपसर्ग कहाँ हो रहा है ? उत्तर में श्रुतसागर मुनि बोले—हस्तिनापुर में सातसौ मुनियों का संघ ठहरा हुआ है । उसके संरक्षक अकम्पनाचार्य हैं । उस सारे संघ पर पापी बलि के द्वारा यह उपसर्ग किया जा रहा है ।

क्षुल्लक ने फिर पूछा—प्रभो, कोई ऐसा भी है, जिससे यह उपसर्ग दूर हो ?

मुनिने कहा—हाँ, उसका एक उपाय है । श्री विष्णु कुमार मुनि को विक्रियाऋद्धि प्राप्त हो गई । वे अपनी ऋद्धि के बल से उपसर्ग को रोक सकते हैं ।

पुष्पदंत फिर एक क्षण भर भी वहाँ न ठहरे और जहाँ विष्णु कुमार मुनि तपश्चर्या कर रहे थे, वहाँ पहुँचे । पहुँच कर उन्होंने सब हाल विष्णु कुमार मुनि से कह सुनाया । विष्णु कुमार को ऋद्धि प्राप्त होने की पहले खबर नहीं हुई थी । पर जब पुष्पदंत के द्वारा उन्हें मालूम हुआ, तब उन्होंने परीक्षा के लिये एक हाथ पसारकर देखा । पसारते ही उनका हाथ बहुत दूर तक चला गया । उन्हें विश्वास हुआ । वे उसी समय हस्तिनापुर आये और अपने भाई से बोले—भाई, आप किस नींद मे सोते हुए हो ? जानते हो, शहर में कितना बड़ा भारी अनर्थ हो रहा है ? अपने राज्य में तुमने ऐसा अनर्थ क्यों होने दिया ? क्या पहले किसी ने भी अपने कुल में ऐसाघोर अनर्थ आज तक किया है ? हाय ! धर्म के अवतार, परम शांत और किसी से कुछ लेते देते नहीं, उन मुनियों पर ये अत्याचार ? और वह भी तुम सरीखे धर्मात्माओं के राज्य में ? खेद ! भाई, राजाओं का धर्म तो यह कहा गया है कि वे सज्जनों की धर्मात्माओं की रक्षा करें और दुष्टों को दण्ड दें । पर आप तो बिलकुल इससे उल्टा कर रहे हैं । समझते हो साधुओं का सताना ठीक नहीं । ठण्डा जल भी गरम होकर शरीर को जला डालता है । इसलिये जब तक कोई आपत्ति तुम पर न आवे, उसके पहले ही उपसर्ग की शांति करवा दीजिये ।

अपने भाई का उपदेश सुनकर पद्मराज बोले—मुनिराज, मैं क्या करूँ ? मुझे क्या मालूम था ये पापी लोग मिलकर मुझे ऐसा धोखा देंगे ? अब तो मैं बिलकुल विवश हूँ । मैं कुछ नहीं कर सकता । सात दिन तक जैसा कुछ ये करेंगे वह सब मुझे सहना होगा । क्योंकि मैं वचनबद्ध हो चुका हूँ । अब तो आप ही किसी उपाय द्वारा मुनियों का उपसर्ग दूर कीजिये । आप इसके लिये समर्थ भी हैं और सब जानते हैं । उसमें मेरा दखल देना तो ऐसा है जैसा सूर्य को दीपक दिखलाना । आप अब जाइये और शीघ्रता कीजिये । विलम्ब करना उचित नहीं ।

विष्णु कुमार मुनि ने विक्रियाऋद्धि के प्रभाव से बावन ब्राह्मण का वेश बनाया और बड़ी मधुरता से वेदध्वनि का उच्चारण करते हुए वे यज्ञमंडप पहुँचे । उनका सुन्दर स्वरूप और मनोहर वेदोच्चार सुनकर सब बड़े प्रसन्न हुए । बलि तो उनपर इतना मुग्ध हुआ कि उसके आनन्द का कुछ पार नहीं रहा । उसने बड़ी प्रसन्नता से उनसे कहा—महाराज, आपने पधारकर मेरे यज्ञ की अपूर्व शोभा कर दी । मैं बहुत खुश हुआ । आपको जो इच्छा हो, मांगिये । इस समय मैं सब कुछ देने को समर्थ हूँ ।

विष्णुकुमार बोले—मैं एक गरीब ब्राह्मण हूँ । मुझे अपने जैसी कुछ स्थिति है, उसमे सन्‍तोष है । मुझे धन-दौलत की कुछ आवश्यकता नहीं । पर आपका जब इतना आग्रह है, तो आपको असंतुष्ट करना भी मैं नहीं चाहता । मुझे केवल तीन पैंड पृथ्वी की आवश्यकता है । यदि आप कृपा करके उतनी भूमि मुझे प्रदान कर देंगे तो मैं उससे टूटी फूटी झोपड़ी बनाकर रह सकूँगा । स्थान की निराकुलता से मैं अपना समय वेदाध्ययनादि में बड़ी अच्छी तरह बिता सकूँगा । बस, इसके सिवा मुझे और कुछ आशा नहीं है ।

विष्णुकुमार की यह तुच्छ याचना सुनकर और-और ब्रह्मणों को उनकी बुद्धि पर बड़ा खेद हुआ । उन्होंने कहा भी कृपानाथ, आपको थोड़े में ही संतोष था, तब भी आपका यह कर्त्तव्य तो था कि आप बहुत कुछ माँगकर अपने जाति भाइयों का ही उपकार करते ? उसमें आपका बिगड़ क्या जाता था ?

बलि ने भी उन्हें बहुत समझाया और कहा कि आपने तो कुछ भी नहीं माँगा । मैं तो यह समझा था कि आप अपनी इच्छा से माँगते हैं, इसलिये जो कुछ माँगेंगे वह अच्छा ही माँगेंगे; परन्तु आपने तो मुझे ही हताश किया । यदि आप मेरे वैभव और मेरी शक्ति के अनुसार माँगेंगे तो मुझे बहुत संतोष होता । महाराज, अब भी आप चाहें तो और भी अपनी इच्छानुसार माँग सकते हैं । मैं देने को प्रस्तुत हूँ ।

विष्णुकुमार बोले—नहीं, मैंने जो कुछ मांगा है, मेरे लिए वही बहुत है । अधिक मुझे चाह नहीं । आपको देना ही है तो और बहुत से ब्राह्मण मौजूद हैं; उन्हें दीजिये । बलिने अगत्या कहा कि जैसी आपकी इच्छा । आप अपने पाँवों से भूमि माप लीजिये । यह कहकर उसने हाथ में जल लिया और संकल्प कर उसे विष्णुकुमार के हाथ में छोड दिया । संकल्प छोड़ते ही उन्होंने पृथ्वी मापना शुरु की । पहला पाँव उन्होंने सुमेरु पर्वत पर रक्खा, दूसरा मानुषोत्तर पर्वत पर, अब तीसरा पाँव रखने को जगह नहीं । उसे वे कहाँ रक्खें ? उनके इस प्रभाव से सारी पृथ्वी काँप उठी, सब पर्वत चल गये, समुद्रों ने मर्यादा तोड़ दी, देवों और ग्रहों के विमान एक से एक टकराने लगे और देवगण आश्चर्य के मारे भौंचक से रह गए । वे सब विष्णुकुमार के पास आये और बलि को बाँधकर बोले—प्रभो, क्षमा कीजिये ! क्षमा कीजिये !! यह सब दुष्कर्म इसी पापी का है । यह आपके सामने उपस्थित है । बलि ने मुनिराज के पाँवों में गिरकर उनसे अपना अपराध क्षमा कराया और अपने दुष्कर्म पर बहुत पश्चात्ताप किया ।

विष्णुकुमार मुनि ने संघ का उपद्रव दूर किया । सबको शांति हुई । राजा और चारों मंत्री तथा प्रजा के सब लोग बड़ी भक्ति के साथ अकम्पनाचार्य की वन्दना करने गये । उनके पाँवों में पड़कर राजा और मंत्रियों ने अपना अपराध उनसे क्षमा कराया और उसी दिन से मिथ्यात्वमत छोड़कर सब अहिंसामयी पवित्र जिनशासन के उपाशक बने ।

देवों ने प्रसन्न होकर विष्णुकुमार की पूजन के लिये तीन बहुत ही सुन्दर स्वर्गीय वीणायें प्रदान कीं, जिनके द्वारा उनका गुणानुवाद गा-गाकर लोग बहुत पुण्य उत्पन्न करेंगे । जैसा विष्णुकुमार ने वात्सल्य अंग का पालन कर अपने धर्म बन्धुओं के साथ प्रेम का अपूर्व परिचय दिया, उसी प्रकार और-और भव्य पुरुषों को भी अपने और दूसरों के हित के लिये समय समयपर दूसरों के दुखों में शामिल होकर वात्सल्य, उदार प्रेम का परिचय देना उचित है ।

इस प्रकार जिनभगवान् के परम भक्त विष्णुकुमार ने धर्मप्रेम के वश हो मुनियोंका उपसर्ग दूर कर वात्सल्य अंग का पालन किया और पश्चात ध्यानाग्नि द्वारा कर्मों का नाश कर मोक्ष गये । वे ही विष्णुकुमार मुनिराज मुझे भवसमुद्र से पार कर मोक्ष प्रदान करें ।


+ वज्रकुमार की कथा -
वज्रकुमार की कथा
संसार के परम गुरु श्रीजिनभगवान् को नमस्कार कर मैं प्रभावना-अंग के पालन करने वाले श्रीवज्रकुमार-मुनि की कथा लिखता हूँ ।

जिस समय की यह कथा है, उस समय हस्तिनापुर के राजा थे बल । वे राजनीति के अच्छे विद्वान थे, बड़े तेजस्वी थे और दयालु थे । उनके मंत्री का नाम था गरुड़ । उसका एक पुत्र था उसका नाम सोमदत्त था । वह सब शास्त्रों का विद्वान था और सुन्दर भी बहुत था । उसे देखकर सबको बड़ा आनन्द होता था । एक दिन सोमदत्त अपने मामा के यहाँ गया, जो कि अहिछत्रपुर में रहता था । उसने मामा से विनयपूर्वक कहा -- मामाजी, यहाँ के राजा से मिलने की मेरी बहुत उत्कंठा है । कृपाकर आप उनसे मेरी मुलाकात करवा दीजिये न ? सुभूति ने अभिमान में आकर अपने महाराज से सोमदत्त की मुलाकात नहीं कराई । सोमदत्त को मामा की यह बात बहुत खटकी । आखिर वह स्वयं ही दुर्मुख महाराज के पास गया और मामा का अभिमान नष्ट करने के लिये राजा को अपने पाण्डित्य और प्रतिभाशालिनी बुद्धि का परिचय कराकर स्वयं भी उनका मंत्री बन गया । ठीक भी है सबको अपनी ही शक्ति सुख देने वाली होती है ।

सुभूति को अपने भानजे का पाण्डित्य देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई । उसने उसके साथ अपनी यज्ञदत्ता नाम की पुत्री को ब्याह दिया । दोनों दम्पत्ति सुख से रहने लगे । कुछ दिनों बाद यज्ञदत्ता के गर्भ रहा ।

समय चातुर्मास का था । यज्ञदत्ता को दोहद उत्पन्न हुआ । उसे आम खाने की प्रबल उत्कण्ठा हुई । स्त्रियों को स्वभाव से गर्भावस्था दोहद उत्पन्न हुआ ही करते हैं । सो आम का समय न होने पर भी सोमदत्त वन में आम ढूढने को चला । बुद्धिमान पुरुष असमय में भी अप्राप्त वस्तु के लिये साहस करते ही हैं । सोमदत्त वन में पहुँचा, तो भाग्य से उसे सारे बगीचे में केवल एक आम का वृक्ष फला हुआ मिला । उसके नीचे एक परम महात्मा योगिराज बैठे हुए थे । उन से वह वृक्ष ऐसा जान पड़ता था, मानो मूर्तिमान धर्म है । सारे वन में एक ही वृक्ष को फला हुआ देखकर उसने समझ लिया कि यह मुनिराज का प्रभाव है । नहीं तो असमय आम कहाँ ? वह बड़ा प्रसन्न हुआ । उसने उस पर से बहुत से फल तोड़कर अपनी प्रिया के पास पहुँचा दिये और आप मुनिराज को नमस्कार कर भक्ति से उनके पाँवों के पास बैठ गया । उसने हाथ जोड़कर मुनि से पूछा -- प्रभो, संसार में सार क्या है ? इस बात को आपके श्रीमुख से सुनने की मेरी बहुत उत्कण्ठा है । कृपा कर कहिये ।

मुनिराज बोले -- वत्स, संसार में सार, आत्मा को कुगतियों से बचाकर सुख देने वाला, एक धर्म है । उसके दो भेद हैं, १-मुनिधर्म, २-श्रावकधर्म । मुनियों का धर्म—अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रह का त्याग ऐसे पाँच महाव्रत तथा उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप आदि दशलक्षण धर्म और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र ऐसे तीन रत्नत्रय, पाँच समिति, तीन गुप्ति, खड़े होकर आहार करना, स्नान न करना, सहन शक्ति बढ़ाने के लिये सिर के बालों का हाथों से ही लौंच करना, वस्त्र का न रखना आदि है । और श्रावक धर्म—बारह व्रतों का पालन करना, भगवान् की पूजा करना, पात्रों को दान देना और जितना अपने से बन सके दूसरों का उपकार करना, किसी की निन्दा बुराई न करना, शांति के साथ अपना जीवन बिताना आदि है । मुनिधर्म का पालन सर्वदेश किया जाता है और श्रावक धर्म का एक देश । जैसे अहिंसा धर्म का पालन मुनि तो सर्वदेश करेंगे । अर्थात् स्थावर जीवों की भी हिंसा वे नहीं करेंगे और श्रावक इसी धर्म का पालन एक-देश अर्थात् स्थूल रूप से करेगा । वह त्रस जीवों की संकल्पी हिंसा का त्याग करेगा और स्थावर जीव, वनस्पति आदि को अपने काम लायक उपयोग में लाकर शेष की रक्षा करेगा ।

श्रावकधर्म परम्परा मोक्ष का कारण है और मुनिधर्म द्वारा उसी पर्याय से भी मोक्ष जा सकता है । श्रावक को मुनिधर्म धारण करना ही पड़ता है । क्योंकि उसके बिना मोक्ष होता ही नहीं । जन्म-जरा-मरण का दुःख बिना मुनि धर्म के कभी नहीं छूटता । इसमें भी एक विशेषता है । वह यह कि जितने मुनि होते हैं, वे सब मोक्ष में ही जाते होंगे ऐसा नहीं समझना चाहिये । उसमें परिणामों पर सब बात निर्भर है । जिसके जितने-जितने परिणाम उन्नत हो जायेंगे और राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि आत्म-शत्रु नष्ट होकर अपने स्वभाव की प्राप्ति होती जायगी वह उतना ही अंतिम साध्य मोक्ष के पास पहुँचता जायगा । पर यह पूर्ण रीति से ध्यान में रखना चाहिए कि मोक्ष होगा तो मुनि धर्म ही से ।

इस प्रकार श्रावक और मुनिधर्म तथा उनकी विशेषतायें सुनकर सोमदत्त को मुनिधर्म ही बहुत पसन्द पड़ा । उसने अत्यंत वैराग्य के वश होकर मुनि धर्म की ही दीक्षा ग्रहण की, जो कि सब पापों को नाश करने वाली है । साधु बनकर गुरु के पास उसने खूब शास्त्राभ्यास किया । सब शास्त्रों में उसने बहुत योग्यता प्राप्त कर ली । इसके बाद सोमदत्त मुनिराज नाभिगिरी नामक पर्वत पर जाकर तपश्चर्या करने लगे और परीषह सहन द्वारा अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाने लगे ।

इधर यज्ञदत्ता के समय पाकर पुत्र हुआ । उसकी दिव्य सुन्दरता और तेज को देखकर यज्ञदत्ता बड़ी प्रसन्न हुई । एक दिन उसे किसी के द्वारा अपने स्वामी के समाचार मिले । उसने वह हाल अपने और घर के लोगों से कहा और उनके पास चलने के लिये आग्रह किया । उन्हें साथ लेकर यज्ञदत्ता नाभिगिरी पर पहुँची । मुनि इस समय ताप सयोग से अर्थात् सूर्य के सामने मुँह किये ध्यान कर रहे थे । उन्हें मुनिवेश में देखकर यज्ञदत्ता के क्रोध का कोई ठिकाना नहीं रहा उसने गरज कर कहा—दुष्ट ! पापी !! यदि तुझे ऐसा करना था मेरी जिन्दगी बिगाड़नी थी, तो पहले ही से मुझे न ब्याहता ? बतला तो अब मैं किस के पास जाकर रहूँ ? निर्दय ! तुझे दया भी न आई जो मुझे निराश्रय छोड़कर तप करने को यहाँ चला आया ? अब इस बच्चे का पालन कौन करेगा ? जरा कह तो सही ! मुझसे इसका पालन नहीं होता । तू ही इसे लेकर पाल । यह कहकर निर्दयी यज्ञदत्ता बेचारे निर्दोष बालक को मुनि के पाँवों में पटक कर घर चली गई । उस पापिनी को अपने हृदय के टुकड़े पर इतनी भी दया नहीं आई कि मैं सिंह, व्याघ्र आदि हिंस्र जीवों से भरे हुए ऐसे भयंकर पर्वत पर उसे कैसे छोड़ जाती हूँ ? उसकी रक्षा कौन करेगा ? सच तो यह है—क्रोध के वश हो स्त्रियाँ क्या नहीं करतीं ?

इधर तो यज्ञदत्ता पुत्र को मुनि के पास छोड़कर घर पर गई और इतने ही में दिवाकर देव नाम का एक विद्याधर इधर आ निकला । वह अमरावती का राजा था । पर भाई-भाई में लड़ाई हो जाने से उसके छोटे भाई पुरसुन्दर ने उसे युद्ध में पराजित कर देश से निकाल दिया था । सो वह अपनी स्त्री को साथ लेकर तीर्थयात्रा के लिये चल दिया । यात्रा करते हुए वह नाभिपर्वत की ओर आ निकला । पर्वत पर मुनिराज को देखकर उनकी वन्दना के लिये नीचे उतरा । उसकी दृष्टि उस खेलते हुए तेजस्वी बालक के प्रसन्न मुख कमल पर पड़ी ! बालक को भाग्यशाली समझकर उसने अपनी गोद में उठा लिया और बड़ी प्रसन्नता के साथ उसे अपनी प्रिया से कहा—प्रिये, यह कोई बड़ा पुण्य पुरुष है । आज अपना जीवन कृतार्थ हुआ जो हमें अनायास ऐसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई । उसकी स्त्री भी बच्चे को पाकर बहुत खुश हुई । उसने बड़े प्रेम के साथ उसे अपनी छाती से लगाया और अपने को कृतार्थ माना । बालक होनहार था । उसके हाथों में वज्र का चिह्न था । उसका सारा शरीर शुभ लक्षणों से विभूषित था । वज्र का चिह्न देखकर विद्याधर महिला ने उसका नाम वज्रकुमार रख दिया । इसके बाद वे दम्पत्ति मुनि को प्रणाम कर अपने घर पर लौट आये । यज्ञदत्ता तो अपने और सुपुत्र को भी छोड़कर चली आई, पर जो भाग्यवान होता है उसका कोई न कोई रक्षक बनकर आ ही जाता है । बहुत ठीक लिखा है—

प्रकृष्टपूर्वपुण्यानां न हि कष्टं जगत्त्रये ।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात—पुण्यवानों को कहीं कष्ट प्राप्त नहीं होता । विद्याधर के घर पर पहुँचकर वज्रकुमार द्वितीया के चन्द्रमा की तरह बढ़ने लगा और अपनी बाललीलाओं से सबको आनन्द देने लगा जो उसे देखता वही उसकी स्वर्गीय सुन्दरता पर मुग्ध हो उठता था ।

दिवाकर देव के सम्बन्ध से वज्रकुमार का मामा कनकपुरी का राजा विमल वाहन हुआ । अपने मामा के यहाँ रहकर वज्रकुमार ने खूब शास्त्राभ्यास किया । छोटी ही उमर में वह एक प्रसिद्ध विद्वान बन गया । उसकी बुद्धि को देखकर विद्याधर बड़ा आश्चर्य करने लगे ।

एक दिन वज्रकुमार ह्रीमंत पर्वत पर प्रकृति की शोभा देखने को गया हुआ था । वहीं पर एक गरुड़ वेग विद्याधर की पवन वेगा नाम की पुत्री विद्या साध रही थी । सो विद्या साधते-साधते भाग्य से एक काँटा हवा से उड़कर उसकी आँख में गिर गया । उसके दुःख से उसका चित्त चंचल हो उठा । उससे विद्या सिद्ध होने में उसके लिये बड़ी कठिनाई आ उपस्थित हुई । इसी समय वज्रकुमार इधर आ निकला । उसे ध्यान से विचलित देखकर उसने उसकी आँख में से काँटा निकाल दिया । पवन वेगा स्वस्थ होकर फिर मंत्र साधने में तत्पर हुई । मंत्रयोग पूरा होने पर उसे विद्या सिद्ध हो गई । वह सब उपकार वज्रकुमार का समझकर उस के पास आई और उस से बोली—आपने मेरा बहुत उपकार किया है । ऐसे समय यदि आप उधर नहीं आते तो कभी संभव नहीं था, कि मुझे विद्या सिद्ध होती । इसका बदला मैं एक क्षुद्र बालिका क्या चुका सकती हूँ, पर यह जीवन आपको समर्पण कर आपकी चरणदासी बनना चाहती हूँ । मैंने संकल्प कर लिया है कि इस जीवन में आपके सिवा किसी को मैं अपने हृदय में स्थान नहीं दूँगी । मुझे स्वीकार कर कृतार्थ कीजिये । यह कहकर वह सतृष्ण नैनों से वज्रकुमार की ओर देखने लगी । वज्रकुमार ने मुस्कुरा कर उस के प्रेमोपहार को बड़े आदर के साथ ग्रहण किया । दोनों वहाँ से विदा होकर अपने-अपने घर गये । शुभ दिन में गरुड़ वेग ने पवन वेगा का परिणय संस्कार वज्रकुमार के साथ कर दिया । दोनों दम्पत्ति सुख से रहने लगे ।

एक दिन वज्रकुमार को मलूम हो गया कि मेरे पिता थे तो राजा, पर उन्हें उनके छोटे भाई ने लड़ झगड़ कर अपने राज्य से निकाल दिया है । यह देख उसे अपने काका पर बड़ा क्रोध आया । वह पिता के बहुत कुछ मना करने पर भी कुछ सेना और अपनी पत्नी की विद्या लेकर उसी समय अमरावती पर जा चढ़ा । पुरन्दर देव को इस चढ़ाई का हाल कुछ मालूम नहीं हुआ था, इसलिये वह बात की बात में पराजित कर बाँध लिया गया । राज्य सिंहासन पीछा दिवाकर देव के अधिकार में आया । सच है “सुपुत्रः कुलदीपकः” अर्थात् सुपुत्र से कुल की उन्नति होती है । इस वीर वृत्तांत से वज्रकुमार बहुत प्रसिद्ध हो गया । अच्छे-अच्छे शूरवीर उसका नाम सुनकर काँपने लगे । इसी समय दिवाकर देव की प्रिया जयश्री के भी एक और पुत्र उत्पन्न हो गया । अब उसे वज्रकुमार से डाह होने लगी । उसे एक भ्रम सा हो गया कि इसके सामने मेरे पुत्र को राज्य कैसे मिलेगा ? खैर, यह भी मान लूँ कि मेरे आग्रह से प्राणनाथ अपने ही पुत्र को राज्य दे भी दें तो यह क्यों उसे देने देगा ? ऐसा कौन बुद्धिमान होगा जो—

आश्रयन्तीं श्रियं को वा पादेन भुवि ताडयेत् ।
--वादीभसिंह

आती हुई लक्ष्मी को पाँव से ठुकरा वेगा ? तब अपने पुत्र को राज्य मिलने में यह एक कंटक है । इसे किसी तरह उखाड़ फेंकना चाहिये । यह विचार कर वह मौका देखने लगी । एक दिन वज्रकुमार ने अपनी माता के मुँह से यह सुन लिया कि ”वज्रकुमार बड़ा दुष्ट है ।देखो, तो कहाँ तो उत्पन्न हुआ और किसे कष्ट देता है ?” उसकी माता किसी के सामने उसकी बुराई कर रही थी । सुनते ही वज्रकुमार के हृदय में मानो आग बरस गई । उसका हृदय जलने लगा । उसे फिर एक क्षण भर भी उस घर में रहना नर्क बराबर भयंकर हो उठा । वह उसी समय अपने पिता के पास गया और बोला—पिताजी, जल्दी बतलाइये मैं किसका पुत्र हूँ ? और क्यों कर यहाँ आया ? मैं जानता हूँ कि आपने मेरा अपने बच्चे से कहीं बढ़कर पालन किया है, तब भी मुझे कृपा कर बतला दीजिये कि मेरे सच्चे पिता कौन हैं ? और कहाँ है ? यदि आप मुझे ठीक-ठीक हाल नहीं कहेंगे तो मैं आज से भोजन नहीं करूँगा !

दिवाकर देव ने आज एकाएक वज्रकुमार के मुँह से अचम्भे में डालने वाली बातें सुनकर वज्रकुमार से कहा—पुत्र, क्या आज तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया है, जो बहकी-बहकी बातें करते हो ? तुम समझदर हो, तुम्हें ऐसी बातें करना उचित नहीं, जिससे मुझे कष्ट हो ।

वज्रकुमार बोला—पिताजी मैं यह नहीं कहता कि मैं आपका पुत्र नहीं, क्योंकि मेरे सच्चे पिता तो आप ही हैं, आप ही ने मुझे पालापोषा है । पर जो सच्चा वृत्तांत है, उसके जानने की मेरी बड़ी उत्कण्ठा है; इसलिए उसे आप न छिपाइये । उसे कहकर आप मेरे अशांत हृदय को शांत कीजिए । बहुत सच है बड़े पुरुषों के हृदय में जो बात एक बार समा जाती है, फिर वे उसे तब तक नहीं छोड़ते जब तक उसका उन्हें आदि अंत न मालूम हो जाय । वज्रकुमार के आग्रह से दिवाकर देव को उसका पूर्व हाल सब ज्यों का त्यों कह देना ही पड़ा । क्योंकि आग्रह से कोई बात छुपाई नहीं जा सकती । वज्रकुमार बड़ा विरक्त हुआ । उसे संसार का माया जाल बहुत भयंकर जान पड़ा । वह उसी समय विमान में चढ़कर अपने पिता की वन्दना करने को गया । उसके साथ ही उसका पिता और-और बन्धु लोग भी गये सोमदत्त मुनिराज मथुरा के पास एक गुफा में ध्यान कर रहे थे । उन्हें देखकर सब ही बहुत आनन्दित हुए । सब बड़ी भक्ति के साथ मुनि को प्रणाम कर जब बैठे, तब वज्रकुमार ने मुनिराज से कहा—पूज्यपाद, आज्ञा दीजिए, जिससे मैं साधु बनकर तपश्चर्या द्वारा अपना आत्म कल्याण करूँ वज्रकुमार को एक साथ संसार से विरक्त देखकर दिवाकर देव को बहुत आश्चर्य हुआ । उसने इस अभिप्राय से, कि सोमदत्त मुनिराज वज्रकुमार को कहीं मुनि हो जाने की आज्ञा न दे दें, उन से वज्रकुमार उन्हीं का पुत्र है, और उसी पर मेरा राज्यभार भी निर्भर है आदि सब हाल कह दिया । इसके बाद वह वज्रकुमार से भी बोला—पुत्र, तुम यह क्या करते हो ? तप करने का मेरा समय है या तुम्हारा ? तुम अब सब तरह योग्य हो गये, राजधानी में जाओ और अपना कारोबार सम्हालो । अब मैं सब तरह निश्चिंत हुआ । मैं आज ही दीक्षा ग्रहण करूँगा । दिवाकर देव ने उसे बहुत समझाया और दीक्षा लेने से रोका, पर उसने किसी की एक न सुनी और सब वस्त्राभूषण फेंक कर मुनिराज के पास दीक्षा ले ली । कन्दर्पकेसरी वज्रकुमार मुनि साधु बनकर खूब तपश्चर्या करने लगे कठिन से कठिन परीषह सहने लगे । वे जिनशासनरूप समुद्र को बढ़ाने वाले चन्द्रमा के समान शोभने लगे । वज्रकुमार के साधु बन जाने के बाद की कथा अब लिखी जाती है । इस समय मथुरा के राजा थे पूतगन्ध । उनकी रानी का नाम था उर्विला । वह बड़ी धर्मात्मा थी, सती थी, विदुषी थी और सम्यग्दर्शन से भूषित थी । उसे जिन भगवान की पूजा से बहुत प्रेम था । वह प्रत्येक नन्दीश्वर पर्व में आठ दिन तक खूब पूजा महोत्सव करवाती, खूब दान करती । उससे जिनधर्म की बहुत प्रभावना होती । सर्व साधारण पर जैनधर्म का अच्छा प्रभाव पड़ता । मथुरा ही में एक सागरदत्त नाम का सेठ था । उसकी गृहणी का नाम था समुद्रदत्ता । पूर्व पाप के उदय से उसके दरिद्रा नाम की पुत्री हुई । उसके जन्म से माता-पिता को सुख न होकर दुःख हुआ । धन सम्पत्ति सब जाती रही । माता-पिता मर गये । बेचारी दरिद्रा के लिए अब अपना पेट भरना भी मुश्किल पड़ गया । अब वह दूसरों का झूठा खा-खाकर दिन काटने लगी । सच है पाप के उदय से जीवों को दुःख भोगना ही पड़ता है ।

एक दिन दो मुनि भिक्षा के लिये मथुरा में आये । उनके नाम थे नन्दन और अभिनन्दन । उनमें नन्दन बड़े थे और अभिनन्दन छोटे । दरिद्रा को एक-एक अन्न का झूठा कण खाती हुई देखकर अभिनन्दन ने नन्दन से कहा—मुनिराज देखिये हाय ! यह बेचारी बालिका कितनी दुःखी है ? कैसे कष्ट से अपना जीवन बिता रही है ! तब नन्दन मुनि ने अवधिज्ञान से विचार कर कहा—हाँ यद्यपि इस समय इसकी दशा अच्छी नहीं है,तथापि इसका पुण्य कर्म बहुत प्रबल है उससे यह पूतगन्ध राजा की पट्टरानी बनेगी । मुनि ने दरिद्रा का जो भविष्य सुनाया, उसे भिक्षा के लिए आये हुए एक बौद्ध भिक्षु ने भी सुन लिया । उसे जैन ऋषिओं के विषय में बहुत विश्वास था, इसलिए वह दरिद्र को अपने स्थान पर लिवा लाया और उसका पालन करने लगा ।

दरिद्रा जैसी-जैसी बड़ी होती गई वैसे ही वैसे यौवन ने उसकी श्री को सम्मान देना आरम्भ किया । वह अब युवती हो चली । उसके सारे शरीर से सुन्दरता की सुधा धारा बहने लगी । आँखों ने चंचल मीन को लजाना शुरु किया । मुँह ने चन्द्रमा को अपना दास बनाया । नितम्बों को अपने से जल्दी बढ़ते देखकर शर्म के मारे स्तनों का मुँह काला पड़ गया । एक दिन युवती दरिद्रा शहर के बगीचे में जाकर झूले पर झूल रही थी कि कर्म योग से उसी दिन राजा भी वहीं आ गये । उनकी नजर एकाएक दरिद्रा पर पड़ी । उसे देखकर वे अचम्भे में आ गये कि यह स्वर्ग सुन्दरी कौन है ? उन्होंने दरिद्रा से उसका परिचय पूछा । उसने निस्संकोच होकर अपना स्थान वगैरह सब उन्हें बता दिया ।यह बेचारी भोली थी । उसे क्या मालूम कि मुझसे खास मथुरा के राजा पूछताछ कर रहे हैं । राजा तो उसे देखकर कामान्ध हो गये । वे बड़ी मुश्किल से अपने महल पर आये । आते ही उन्होंने अपने मंत्री को श्रीवन्दक के पास भेजा मंत्री ने पहुँचकर श्रीवन्दक से कहा—आज तुम्हारा और तुम्हारी कन्या का बड़ा ही भाग्य है, जो मथुराधीश्वर उसे अपनी महारानी बनाना चाहते हैं । कहो, तुम्हें भी यह बात सम्मत है न ? श्रीवन्दक बोला—हाँ मुझे महाराज की बात स्वीकार है, पर एक शर्त के साथ । वह शर्त यह है कि महाराज बौद्ध धर्म स्वीकार करें तो मैं इसका ब्याह महाराज के साथ कर सकता हूँ । मंत्री ने महाराज से श्रीवन्दक की शर्त कह सुनाई । महाराज ने उसे स्वीकार किया । सच है लोग काम के वश होकर धर्म परिवर्तन तो क्या बड़े-बड़े अनर्थ भी कर बैठते हैं ।

आखिर महाराज का दरिद्रा के साथ ब्याह हो गया । दरिद्रा मुनिराज के भविष्य कथनानुसार पट्टरानी हुई । दरिद्रा इस समय बुद्धदासी के नाम से प्रसिद्ध है । इसलिये आगे हम भी इसी नाम से उसका उल्लेख करेंगे । बुद्धदासी पट्टरानी बनकर बुद्ध धर्म का प्रचार बढ़ाने में सदा तत्पर रहने लगी । सच है, जिनधर्म संसार में सुख का देने वाला और पुण्य प्राप्ति का खजाना है, पर उसे प्राप्त कर पाते हैं भाग्यशाली ही । बेचारी अभागिनी बुद्धदासी के भाग्य में उसकी प्राप्ति कहाँ ?

अष्टाह्नि का पर्व आया । उर्विला महारानी ने सदा के नियमानुसार अब की बार भी उत्सव करना आरम्भ किया । जब रथ निकालने का दिन आया और रथ, छ्त्र, चँवर, वस्त्र, भूषण, पुष्पमाला आदि से खूब सजाया गया, उस में भगवान् की प्रतिमा विराजमान की जाकर वह निकाला जाने लगा, तब बुद्धदासी ने राजा से यह कह कर, कि पहले मेरा रथ निकलेगा, उर्विला रानी का रथ रुकवा दिया । राजा ने भी उस पर कुछ बाधा न देकर उस के कहने को मान लिया । सच है—

मोहान्धा नैव जानंति गोक्षोरार्कपयोंतरम ।
--ब्रह्म नेमिदत्त
अर्थात् मोह से अन्धे हुए मनुष्य गाय के दूध में और आकड़े के दूध में कुछ भी भेद नहीं समझते । बुद्धदासी के प्रेम ने यही हालत पूतगंध राजा की कर दी । उर्विला को इससे बहुत कष्ट पहुँचा ।

उसने दुखी होकर प्रतिज्ञा कर ली कि अब पहले मेरा रथ निकलेगा तब ही मैं भोजन करूँगी । यह प्रतिज्ञा कर वह क्षत्रिया नाम की गुहा में पहुँची । वहाँ योगिराज सोमदत्त और वज्रकुमार महामुनि रहा करते हैं । वह उन्हें भक्ति पूर्वक नमस्कार कर बोली—हे जिन शासन रूप समुद्र के बढ़ाने वाले चन्द्रमाओं और हे मिथ्यात्व रूप अन्धकार के नष्ट करने वाले सूर्य ! इस समय आप ही मेरे लिये शरण हैं । आप ही मेरा दुख दूर कर सकते हैं । जैन धर्म पर इस समय बड़ा संकट उपस्थित है, उसे नष्ट कर उसकी रक्षा कीजिये । मेरा रथ निकलने वाला था, पर उसे बुद्धदासी ने महाराज से कहकर रुकवा दिया है । आज कल वह महाराज की बड़ी कृपा पात्र है, इसलिये जैसा वह कहती है महाराज भी बिना विचारे वही कहते हैं । मैनें प्रतिज्ञा कर ली है कि सदा की भाँति मेरा रथ पहले यदि निकलेगा तब ही मैं भोजन करूँगी । अब जैसा आप उचित समझें वह कीजिये । उर्विला अपनी बात कर रही थी कि इतने में वज्रकुमार तथा सोमदत्त मुनि की वन्दना करने को दिवाकर देव आदि बहुत से विद्याधर आये । वज्रकुमार मुनि ने उन से कहा—आप लोग समर्थ हैं और इस समय जैन धर्म पर कष्ट उपस्थित है । बुद्धदासी ने महारानी उर्विला का रथ रुकवा दिया है । सो आप जाकर जिस तरह बन सके इसका रथ निकलवाइये । वज्रकुमार मुनि की आज्ञानुसार सब विद्याधर लोग अपने-अपने विमान पर चढ़कर मथुरा आये । सच है जो धर्मात्मा होते हैं वे धर्म प्रभावना के लिए स्वयं प्रयत्न करते हैं, तब उन्हें तो मुनिराज ने स्‍वयं प्रेरणा की है, इसलिये रानी उर्विला को सहायता देना तो उन्हें आवश्यक ही था । विद्याधरों ने पहुँचकर बुद्धदासी को बहुत समझाया और कहा, जो पुरानी रीति है उसे ही पहले होने देना अच्छा है । पर बुद्धदासी को तो अभिमान आ रहा था, इसलिये वह क्यों मानने चली ? विद्याधरों ने सीधेपन से अपना कार्य न होते हुए देखकर बुद्धदासी के नियुक्त किये हुए सिपाहियों से लड़ना शुरु किया और बात की बात में उन्हें भगाकर बड़े उत्सव और आनन्द के साथ उर्विला रानी का रथ निकलवा दिया । रथ के निर्विघ्न निकलने से सबको बहुत आनन्द हुआ । जैनधर्म की भी खूब प्रभावना हुई । बहुतों ने मिथ्यात्व छोड़कर सम्यग्दर्शन ग्रहण किया । बुद्धदासी और राजा पर भी इस प्रभावना का खूब प्रभाव पड़ा । उन्होंने भी शुद्धांतःकरण से जैन धर्म स्वीकार किया ।

जिस प्रकार श्रीवज्रकुमार मुनिराज ने धर्म प्रेम के वश होकर जैन धर्म की प्रभावना करवाई उसी तरह और धर्मात्मा पुरुषों को भी संसार का उपकार करने वाली और स्वर्ग सुख की देने वाली धर्म प्रभावना करना चाहिये । जो भव्य पुरुष, प्रतिष्ठा, जीर्णोद्धार, रथयात्रा, विद्यादान, आहारदान, अभयदान आदि द्वारा जिनधर्म की प्रभावना करते हैं, वे सम्यग्दृष्टि होकर त्रिलोक पूज्य होते हैं और अंत में मोक्षसुख प्राप्त करते हैं ।

धर्म प्रेमी श्रीवज्रकुमार मुनि मेरी बुद्धि को सदा जैन धर्म में दृढ़ रक्खें, जिसके द्वारा मैं भी कल्याण पथ पर चलकर अपना अंतिम साध्य मोक्ष प्राप्त कर सकूँ ।

श्री मल्लि भूषण गुरु मुझे मंगल प्रदान करें, वे मूलसंघ के प्रधान शारदागच्छ में हुए हैं । वे ज्ञान के समुद्र हैं और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र रूपी रत्नों से अलंकृत हैं । मैं उनकी भक्ति पूर्वक आराधना करता हूँ ।


+ नागदत्त मुनि की कथा -
नागदत्त मुनि की कथा
मोक्ष राज्य के अधीश्वर श्रीपंचपरम गुरु को नमस्कार कर श्रीनागदत्त मुनि का चरित मैं लिखता हूँ ।
मगध देश की प्रसिद्ध राजधानी राजगृह में प्रजापाल नाम के राजा हैं । वे विद्वान हैं, उदार हैं, धर्मात्मा हैं, जिनभगवान के भक्त हैं और नीति पूर्वक प्रजा का पालन करते हैं उनकी रानी का नाम है प्रियधर्मा । वह भी बड़ी सरल स्वभाव की और सुशीला है । उसके दो पुत्र हुए । उन के नाम थे प्रियधर्म और प्रियमित्र । दोनों भाई बड़े बुद्धिमान और सुचरित थे ।

किसी कारण से दोनों भाई संसार से विरक्त होकर साधु बन गये । और अंतसमय समाधि मरण कर अच्युत स्वर्ग में जाकर देव हुए । उन्होंने वहाँ परस्पर में प्रतिज्ञा की कि, ‘जो दोनों में से पहले मनुष्य पर्याय प्राप्त करे उसके लिये स्वर्गस्थ देव का कर्त्तव्य होगा कि वह उसे जाकर सम्बोधे और संसार से विरक्त कर मोक्ष सुख की देने वाली जिन दीक्षा ग्रहण करने के लिये उसे उत्साहित करे ।‘ इस प्रकार प्रतिज्ञा कर वे वहाँ सुख से रहने लगे । उन दोनों में से प्रियदत्त की आयु पहले पूर्ण हो गयी । वह वहाँ से उज्जयिनी के राजा नागधर्म की प्रिया नागदत्ता के, जो बहुत ही सुन्दरी थी, नागदत्त नामक पुत्र हुआ । नागदत्त सर्पों के साथ क्रीड़ा करने में बहुत चतुर था, सर्प के साथ उसे विनोद करते देखकर सब लोग बड़ा आश्चर्य प्रगट करते थे ।
एक दिन प्रियधर्म, जो कि स्वर्ग में नागदत्त का मित्र था, गारुड़ि का वेष लेकर नागदत्त को सम्बोधने को उज्जयिनी में आया । उसके पास दो भयंकर सर्प थे । वह शहर में घूम-घूमकर लोगों को तमाशा बताता और सर्व साधारण में यह प्रगट करता कि मैं सर्प-क्रीड़ा का अच्छा जानकार हूँ । कोई और भी इस शहर में सर्प क्रीड़ा का अच्छा जानकार हो, तो फिर उसे मैं अपना खेल दिखलाऊँ । यह हाल धीरे-धीरे नागदत्त के पास पहुँचा । वह तो सर्प क्रीड़ा का पहले ही से बहुत शौकीन था,फिर अब तो एक और उसका साथी मिल गया । उसने उसी समय नौकरों को भेजकर उसे अपने पास बुला मँगाया । गारुड़ि तो इस कोशिश में था ही कि नागदत्त को किसी तरह मेरी खबर लग जाय और वह मुझे बुलावे । प्रियधर्म उसके पास गया । उसे पहुँचते ही नागदत्त ने अभिमान में आकर कहा -- मंत्रवित्त तुम अपने सर्पों को बाहर निकालो न ? मैं उनके साथ कुछ खेल तो देखूँ कि वे कैसे जहरीले हैं ।

प्रियधर्म बोला -- मैं राजपुत्रों के साथ ऐसी हँसी, दिल्लगी या खेल करना नहीं चाहता कि जिसमें जान की जोखिम तक हो । बतलाओ मैं तुम्हारे सामने सर्प निकाल कर रख दूँ और तुम उनके साथ खेलो, इस बीच में कुछ तुम्हें जोखम पहुँच जाय तब राजा मेरी क्या बुरी दशा करेंगे ? क्या उस समय वे मुझे छोड़ देंगे ? कभी नहीं । इसलिये न तो मैं ही ऐसा कर सकता हूँ और न तुम्हें ही इस विषय में कुछ आग्रह करना उचित है । हाँ तुम कहो तो मैं कुछ खेल दिखा सकता हूँ ।

नागदत्त बोला -- तुम्हें पिताजी की ओर से कुछ भय नहीं करना चाहिये । वे स्वयं अच्छी तरह जानते हैं कि मैं इस विषय में कितना विज्ञ हूँ और इसपर भी संतोष न हो तो आओ मैं पिताजी से तुम्हें क्षमा करवाये देता हूँ । यह कहकर नागदत्त प्रियदत्त को पिता के पास ले गया और मारे अभिमान में आकर बड़े आग्रह के साथ महाराज से उसे अभय दिलवा दिया । नागधर्म कुछ तो नागदत्त का सर्पों के साथ खेलना देख चुके थे और इस समय पुत्र का बहुत आग्रह था, इसलिये उन्होंने विशेष विचार न कर प्रियदत्त को अभय प्रदान कर दिया । नागदत्त बहुत प्रसन्न हुआ । उसने प्रियदत्त से सर्पों को बाहर निकालने के लिये कहा । प्रियदत्त ने पहले एक साधारण सर्प निकाला । नागदत्त उसके साथ क्रीड़ा करने लगा और थोड़ी देर में उसे उसने पराजित कर दिया; निर्विष कर दिया । अब तो नागदत्त का साहस खूब बढ़ गया । उसने दूने अभिमान के साथ कहा कि तुम क्या ऐसे मुर्दे सर्प को निकालकर और मुझे शर्मिन्दा करते हो ? कोई अच्छा विषधर सर्प निकालो न ? जिससे मेरी शक्ति का तुम भी परिचय पा सको ।
प्रियधर्म बोला -- आपका कहा पूरा हुआ । आपने एक सर्प को हरा भी दिया है । अब आप अधिक आग्रह न करें तो अच्छा है । मेरे पास एक सर्प और है, पर वह बहुत जहरीला है; दैवयोग से उसने काट खाया तो समझिये फिर उसका कुछ उपाय ही नहीं है । उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है । इसलिये उसके लिये मुझे क्षमा कीजिये । उसने नागदत्त से बहुत-बहुत प्रार्थना की पर नागदत्त ने उसकी एक नहीं मानी । उलटा उस पर क्रोधित होकर बोला -- तुम अभी नहीं जानते कि इस विषय में मेरा कितना प्रवेश है ? इसीलिये ऐसी डरपोकपने की बातें करते हो । पर मैनें ऐसे-ऐसे हजारों सर्पों को जीतकर पराजित किया है । मेरे सामने यह बेचारा तुच्छ जीव कर ही क्या सकता है ? और फिर इसका डर तुम्हें हो या मुझे ? वह काटेगा तो मुझे ही न ? तुम मत घबराओ, उसके लिये मेरे पास बहुत से ऐसे साधन हैं, जिससे भयंकर सर्प का जहर भी क्षण-मात्र में उतर सकता है ।
प्रियधर्म ने कहा -- अच्छा यदि तुम्हारा अत्यंत ही आग्रह है तो उससे मुझे कुछ हानि नहीं । इसके बाद उसने राजा आदि की साक्षी से अपने दूसरे सर्प को पिटारे में से निकाल बाहर कर दिया । सर्प निकलते ही फुंकार मारना शुरु किया । वह इतना जहरीला था कि उसके साँस की हवा ही से लोगों के सिर घूमने लगते थे । जैसे ही नागदत्त उसे हाथ में पकड़ने को उसकी ओर बढ़ा कि सर्प ने उसे बड़े जोर से काट खाया । सर्प का काटना था कि नागदत्त उसी समय चक्कर खाकर धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़ा और अचेत हो गया । उसकी यह दशा देखकर हाहाकार मच गया । सबकी आँखों से आँसू की धारा बह चली । राजा ने उसी समय नौकरों को दौड़ाकर सर्प का विष उतारने वालों बुलवाया । बहुत से तांत्रिक-मांत्रिक इकट्ठे हुए । सबने अपनी-अपनी करनी में कोई बात उठा नहीं रक्खी । पर किसी का किया कुछ नहीं हुआ । सबने राजा को यही कहा कि महाराज, युवराज को तो काल-सर्प काटा है, अब ये नहीं जी सकेंगे । राजा बड़े निराश हुए । उन्होंने सर्पवाले से यह कहकर, कि यदि तू इसे जिला देगा तो मैं तुझे अपना आधा राज्य दे दूँगा, नागदत्त को उसी के सुपुर्द कर दिया । प्रियधर्म तब बोला -- महाराज, इसे काटा तो है काल-सर्प ने, और इसका जी जाना भी असंभव है, पर मेरा कहा मानकर यदि यह जी जाय तो आप इसे मुनि हो जाने की आज्ञा दें तो, मैं भी एक बार इसके जिलाने का प्रयत्न कर देखूँ ।
राजा ने कहा -- मैं इसे भी स्वीकार करता हूँ । तुम इसे किसी तरह जिला दो, यही मुझे इष्ट है ।
इसके बाद प्रियधर्म ने कुछ मंत्र पढ़-पढ़ाकर उसे जिन्दा कर दिया । जैसे मिथ्यात्वरूपी विष से अचेत हुए मनुष्यों को परोपकारी मुनिराज अपना स्वरूप प्राप्त करा देते हैं । जैसे ही नागदत्त सचेत होकर उठा और उसे राजा ने अपनी प्रतिज्ञा कह सुनाई । वह उससे बहुत प्रसन्न हुआ । पश्चात एक क्षण भी वह वहाँ न ठहर कर वन की ओर रवाना हो गया और यमधर मुनिराज के पास पहुँचकर उसने जिनदीक्षा ग्रहण कर ली । उसे दीक्षित हो जाने पर प्रियधर्म, जो गारुड़ि का वेष लेकर स्वर्ग से नागदत्त के सम्बोधने को आया था, उसे सब हाल कहकर और अंत में नमस्कार कर पीछा स्वर्ग चला गया ।

मुनि बनकर नागदत्त खूब तपश्चर्या करने लगे और अपने चारित्र को दिन पर दिन निर्मल करके अंत में जिनकल्पी मुनि हो गये । अर्थात् जिन-भगवान् की तरह अब वे अकेले ही विहार करने लगे । एक दिन वे तीर्थयात्रा करते हुए एक भयानक वन में निकल आये । वहाँ चोरों का अड्डा था, सो चोरों ने मुनिराज को देख लिया । उन्होंने यह समझकर कि ये हमारा पता लोगों को बता देंगे और फिर हम पकड़ लिए जायेंगे, उन्हें पकड़ लिया और अपने मुखिया के पास लिवा ले गये । मुखिया का नाम था सूरदत्त । वह मुनि को देखकर बोला -- तुमने इन्हें क्यों पकड़ा ? ये तो बड़े सीधे और सरल स्वभावी हैं । इन्हें किसी से कुछ लेना देना नहीं, किसी पर इनका राग-द्वेष नहीं । ऐसे साधु को तुमने कष्ट देकर अच्छा नहीं किया । इन्हें जल्दी छोड़ दो । जिस भय की तुम इनके द्वारा आशंका करते हो, वह तुम्हारी भूल है । ये कोई बात ऐसी नहीं करते जिससे दूसरों को कष्ट पहुँचे । अपने मुखिया की आज्ञा के अनुसार चोरों ने उसी समय मुनिराज को छोड़ दिया ।
इसी समय नागदत्त की माता अपनी पुत्री को साथ लिये हुए वत्स देश की ओर जा रही थी । उसे उसका ब्याह कौशाम्बी के रहने वाले जिनदत्त सेठ के पुत्र धनपाल से करना था । अपने जमाई को दहेज देने के लिये उसने अपने पास उपयुक्त धन-सम्पत्ति भी रख ली थी । उसके साथ और भी पुरजन परिवार के लोग थे । सो उसे रास्ते में अपने पुत्र नागदत्त मुनि के दर्शन हो गये । उसने उन्हें प्रणाम कर पूछा -- प्रभो, आगे रास्ता तो अच्छा है न ? मुनिराज इसका कुछ उत्तर न देकर मौन सहित चले गये । क्योंकि उनके लिये तो शत्रु और मित्र दोनों ही समान हैं ।

आगे चलकर नागदत्ता को चोरों ने पकड़कर उसका सब माल असबाब छीन लिया और उसकी कन्या भी पापियों ने छुड़ा ली । तब सूरदत्त उनका मुखिया उनसे बोला -- क्यों आपने देखी न उन मुनि की उदासीनता और निस्पृहता ? जो इस स्त्री ने मुनि को प्रणाम किया और उनकी भक्ति भी की, तब भी उन्होंने इससे कुछ नहीं कहा और हम लोगों ने उन्हें बाँधकर कष्ट पहुँचाया तब उन्होंने हमसे कुछ द्वेष नहीं किया । सच बात तो यह है कि उनकी वह प्रवृत्ति ही इतने ऊँचे दरजे की है, जो उसमें भक्ति करने वाले पर तो प्रेम नहीं और शत्रुता करने वाले से द्वेष नहीं । दिगम्बर मुनि बड़े ही शान्त, धीर, गम्भीर और तत्त्व-दर्शी हुआ करते हैं ।

नागदत्ता यह सुनकर, कि यह सब कारस्तानी मेरे ही पुत्र की है, यदि वह मुझे इस रास्ते का सब हाल कह देता, तो क्यों आज मेरी यह दुर्दशा होती ? क्रोध के तीव्र आवेग से थरथर काँपने लगी । उसने अपने पुत्र की निर्दयता से दुःखी होकर चोरों के मुखिया सूरदत्त से कहा -- भाई, जरा अपनी छुरी तो मुझे दे, जिससे मैं अपनी कूँख को चीरकर शान्ति लाभ करूँ । जिस पापी का जिकर तुम कर रहे हो, वह मेरा ही पुत्र है । जिसे मैंने नौ महीने कूँख में रक्खा और बड़े-बड़े कष्ट सहे उसी ने मेरे साथ इतनी निर्दयता की कि मेरे पूछने पर भी उसने मुझे रास्ते का हाल नहीं बतलाया । तब ऐसे कुपुत्र को पैदाकर मुझे जीते रहने से ही क्या लाभ ? नागदत्ता का हाल जानकर सूरदत्त को बड़ा वैराग्य हुआ । वह उससे बोला -- जो उस मुनि की माता है, वह मेरी भी माता है । माता क्षमा करो ! यह कहकर उसने उसका सब धन असबाब उसी समय पीछा लौटा दिया और आप मुनि के पास पहुँचा । उसने बड़ी भक्ति के साथ परम गुणवान नागदत्त मुनि की स्तुति की और पश्चात् उन्हीं के द्वारा दीक्षा लेकर वह तपस्वी बन गया ।

साधु बनकर सूरदत्त ने तपश्चर्या और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र द्वारा घातिया कर्मों का नाश कर लोकालोक का प्रकाशक केवल ज्ञान प्राप्त किया और संसार द्वारा पूज्य होकर अनेक भव्य जीवों को कल्याण का रास्ता बतलाया और अंत में अघातिया कर्मों का भी नाश कर अविनाशी, अनंत, मोक्ष पद प्राप्त किया ।
श्री नागदत्त और सूरदत्त मुनि संसार के दुःखों को नष्ट कर मेरे लिये शांति प्रदान करें, जो कि गुणों के समुद्र हैं, जो देवों द्वारा सदा नमस्कार किये जाते हैं और जो संसारी जीवों के नेत्ररूपी कुमुद पुष्पों को प्रफुल्लित करने के लिये चन्द्रमा के समान हैं जिन्हें देखकर नेत्रों को बड़ा आनन्द मिलता है, शांति मिलती है ।


+ शिवभूति पुरोहित की कथा -
शिवभूति पुरोहित की कथा
मैं संसार के हित करने वाले जिनभगवान् को नमस्कार कर दुर्जनों की संगति से जो दोष उत्पन्न होते हैं, उससे सम्बन्ध रखने वाली एक कथा लिखता हूँ, जिससे कि लोग दुर्जनों की संगति छोड़ने का प्रयत्न करें ।
यह कथा उस समय की है, जब कि कोशाम्बी का राजा धनपाल था । धनपाल अच्छा बुद्धिमान और प्रजाहितैषी था । शत्रु तो उसका नाम सुनकर काँपते थे । राजा के यहाँ एक पुरोहित था । उसका नाम था शिवभूति । वह पौराणिक अच्छा था |
वहीं दो शूद्र रहते थे । उनके नाम कल्पपाल और पूर्णचन्द्र थे । उनके पास कुछ धन भी था । उनमें पूर्णचन्द्र की स्त्री का नाम था मणिप्रभा । उसके एक सुमित्रा नाम की लड़की थी । पूर्णचन्द्र ने उसके विवाह में उसके जातीय भाइयों को जिमाया और उसका राज पुरोहित से कुछ परिचय होने से उसने उसे भी निमंत्रित किया । पर पुरोहित महाराज ने उसमें यह बाधा दी कि भाई, तुम्हारा भोजन तो मैं नहीं कर सकता । तब कल्पपाल ने बीच में ही कहा—अस्तु ! आप हमारे यहाँ भोजन न करें । हम ब्राह्मणों के द्वारा आपके लिये भोजन तैयार करवा देंगे तब तो आपको कुछ उजर न होगा । पुरोहित जी आखिर थे तो ब्राह्मण ही न ? जिनके विषय में यह नीति प्रसिद्ध है कि “असंतुष्टा द्विजा नष्टाः” अर्थात् लोभ में फँसकर ब्राह्मण नष्ट हुए । सो वे अपने एक बार के भोजन का लोभ नहीं रोक सके । उन्होंने यह विचार कर, कि जब ब्राह्मण भोजन बनाने वाले हैं, तब तो कुछ नुकसान नहीं, उसका भोजन करना स्वीकार कर लिया । पर इस बात पर उन्होंने तनिक भी विचार नहीं किया कि ब्राह्मणों ने ही भोजन बना दिया तो हुआ क्या ? आखिर पैसा तो उसका है और न जाने उसने कैसे-कैसे पापों द्वारा उसे कमाया है ।

जो हो, नियमित समय पर भोजन तैयार हुआ । एक ओर पुरोहित देवता भोजन के लिये बैठे और दूसरी ओर पूर्णचन्द्र का परिवार वर्ग । इस जगह इतना और ध्यान में रखना चाहिये कि दोनों का चौका अलग-अलग था । भोजन होने लगा । पुरोहित जी ने मनभर माल उड़ाया । मानो उन्हें कभी ऐसे भोजन का मौका ही नसीब नहीं हुआ था । पुरोहित जी को वहाँ भोजन करते हुए कुछ लोगों ने देख लिया । उन्होंने पुरोहित जी की शिकायत महाराज से कर दी । महाराज ने एक शूद्र के साथ भोजन करने वाले, वर्ण व्यवस्था को धूल में मिलाने वाले ब्राह्मण को अपने राज्य में रखना उचित न समझ देश से निकलवा दिया । सच है—“कुसंगो कष्टदो ध्रुवम्” अर्थात् बुरी संगति दुःख देने वाली ही होती है । इसलिये अच्छे पुरुषों को उचित है कि वे बुरों की संगति न कर सज्जनों की संगति करें, जिससे वे अपने धर्म, कुल, मान, मर्यादा की रक्षा कर सकें |


+ पवित्र हृदय वाले एक बालक की कथा -
पवित्र हृदय वाले एक बालक की कथा
बालक जैसा देखता है, वैसा ही कह भी देता है । क्योंकि उसका हृदय पवित्र रहता है । यहाँ मैं जिनभगवान् को नमस्कार कर एक ऐसी ही कथा लिखता हूँ, जिसे पढ़कर सर्वसाधारण का ध्यान पाप कर्मों के छोड़ने की ओर जाय ।

कौशाम्बी में जयपाल नाम के राजा हो गये हैं । उनके समय में वहीं एक सेठ हुआ है । उसका नाम समुद्रदत्त और उसकी स्त्री का नाम समुद्रदत्ता । उसके एक पुत्र हुआ । उसका नाम सागरदत्त था । वह बहुत ही सुन्दर था । उसे देखकर सबका चित्त उसे खिलाने के लिये व्यग्र हो उठता था । समुद्रदत्त का एक गोपायन नाम का पड़ोसी था । पूर्वजन्म के पापकर्म के उदय से वह दरिद्री हुआ । इसलिये धन की लालसा ने उसे व्यसनी बना दिया । उसकी स्त्री का नाम सीमा था । उसके भी एक सोमक नाम का पुत्र था । वह धीरे-धीरे कुछ बड़ा हुआ और अपनी मीठी और तोतली बोली से माता पिता को आनन्दित करने लगा ।

एक दिन गोपायन के घर पर सागरदत्त और सोमक अपना बाल सुलभ खेल खेल रहे थे । सागरदत्त इस समय गहना पहरे हुए था । उसी समय पापी गोपायन आ गया । सागरदत्त को देखकर उसके हृदय में पाप वासना हुई । दरवाजा बन्द कर वह कुछ लोभ के बहाने सागरदत्त को घर के भीतर लिवा ले गया । उसी के साथ सोमक भी दौड़ा गया । भीतर लेजाकर पापी गोपायन ने उस अबोध बालक का बड़ी निर्दयता से छुरी द्वारा गला घोंट दिया और उसका सब गहना उतारकर उसे गड्ढे में गाड़ दिया ।

कई दिनों तक बराबर कोशिश करते रहने पर भी जब सागरदत्त के माता पिता को अपने बच्चे का कुछ हाल नहीं मिला, तब उन्होंने जान लिया कि किसी पापी ने उसे धन के लोभ से मार डाला है । उन्हें अपने प्रिय बच्चे की मृत्यु से जो दुःख हुआ उसे वे ही पाठक अनुभव कर सकते हैं जिन पर कभी ऐसा दैवी प्रसंग आय हो । आखिर बेचारे अपना मन मसोस कर रह गये । इसके सिवा वे और करते भी तो क्या ?

कुछ दिन बीतने पर एक दिन सोमक समुद्रदत्त के घर के आँगन में खेल रहा था । तब समुद्रदत्ता के मन में न जाने क्या बुद्धि उत्पन्न हुई सो उसने सोमक को बड़े प्यार से अपने पास बुलाकर उससे पूछा—भैया, बतला तो तेरा साथी समुद्रदत्त कहाँ गया है ? तूने उसे देखा है ?

सोमक बालक था और साथ ही बालस्वभाव के अनुसार पवित्र हृदयी था । इसलिये उसने झट से कह दिया कि वह तो मेरे घर में एक खाड़े में गड़ा हुआ है । बेचारी सागरदत्ता अपने बच्चे की दुर्दशा सुनते ही धड़ाम से पृथ्वी पर गिर पड़ी । इतने में सागरदत्त भी वहीं आ पहुँचा । उसने उसे होश में लाकर उसके मूर्च्छित हो जाने का कारण पूछा । सागरदत्ता ने सोमक का कहा हाल उसे सुना दिया । सागरदत्त ने उसी समय दौड़े जाकर यह खबर पुलिस को दी । पुलिस ने आकर मृत बच्चे की लाश सहित गोपायन को गिरफ्तार किया, मुकदमा राजा के पास पहुँचा । उन्होंने गोपायन के कर्म के अनुसार उसे फाँसी की सजा दी । बहुत ठीक कहा है—

पापी पापं करोत्यत्र प्रच्छन्नमपि पापतः ।
तत्प्रसिद्धं भवत्येव भवभ्रमण दायकः ।।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात् पापी लोग बहुत छुपकर भी पाप करते हैं, पर वह नहीं छुपता और प्रगट हो ही जाता है । और परिणाम में अनंत काल तक संसार के दुःख भोगना पड़ता है । इसलिये सुख चाहने वाले पुरुषों को हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील आदि पाप, जो कि दुःख देने वाले हैं, छोड़कर सुख देने वाला दयाधर्म, जिनधर्म ग्रहण करना उचित है ।

बालपने में विशेष ज्ञान नहीं होता, इसलिये बालक अपना हिताहित नहीं जान पाता, युवावस्था में कुछ ज्ञान का विकास होता है, पर काम उसे अपने हित की ओर नहीं फटकने देता और वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ जर्जर हो जाती हैं, किसी काम के करने में उत्साह नहीं रहता और न शक्ति ही रह जाती है । इसके सिवा और जो अवस्थायें हैं, उनमें कुटुम्ब परिवार के पालन पोषण का भार सिर पर रहने के कारण सदा अनेक प्रकार की चिंतायें घेरे रहतीं हैं कभी स्वस्थचित्त होने ही नहीं पाता, इसलिये तब भी आत्महित का कुछ साधन प्राप्त नहीं होता । आखिर होता यह है कि जैसे पैदा हुए, वैसे ही चल बसते हैं । अत्यंत कठिनता से प्राप्त हुई मनुष्य पर्याय को समुद्र में रत्न फेंक देने की तरह गँवा बैठते हैं । और प्राप्त करते हैं वही एक संसार भ्रमण । जिसमें अनंत काल ठोकरें खाते-खाते बीत गये । पर ऐसा करना उचित नहीं; किंतु प्रत्येक जीवमात्र को अपने आत्महित की ओर ध्यान देना परम आवश्यक है । उन्हें सुख प्रदान करने वाला जिनधर्म ग्रहण कर शांतिलाभ करना चाहिये ।


+ धनदत्त राजा की कथा -
धनदत्त राजा की कथा
देवादि के द्वारा पूज्य और अनन्त ज्ञान, दर्शनादि आत्मीयश्री से विभूषित जिनभगवान् को नमस्कार कर मैं धनदत्त राजा की पवित्र कथा लिखता हूँ ।

अन्ध्रदेशान्तर्गत कनकपुर नामक एक प्रसिद्ध और मनोहर शहर था । उसके राजा थे धनदत्त । वे सम्यग्दृष्टि थे, गुणवान् थे, और धर्मप्रेमी थे । राजमंत्री का नाम श्रीवन्दक था । वह बौद्धधर्मानुयायी था । परंतु तब भी राजा अपने मंत्री की सहायता से राजकार्य अच्छा चलाते थे । उन्हें किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचती थी ।

एक दिन राजा और मंत्री राजमहल के ऊपर बैठे हुए कुछ राज्य सम्बन्धी विचार कर रहे थे कि राजा को आकाश मार्ग से दो चारण ऋद्धिधारी मुनियों के दर्शन हुए । राजा ने हर्ष के साथ उठकर मुनिराज को बड़े विनय से नमस्कार किया और अपने महल में उनका आह्वान किया । ठीक भी है—“साधुसंगः सतां प्रियः” अर्थात्—साधुओंकी संगति सज्जनों को बहुत प्रीतिकर जान पड़ती है ।

इसके बाद राजा के प्रार्थना करने पर मुनिराज ने उसे धर्मोपदेश दिया और चलते समय वे श्रीवन्दक मंत्री को अपने साथ लिवा ले गये । लेजाकर उन्होंने उसे समझाया और आत्महित की इच्छा से उसके प्रार्थना करने पर उसे श्रावक के व्रत दे दिये । श्रीवन्दक अपने स्थान लौट आया । इसके पहले श्रीवन्दक अपने बुद्धगुरु की वन्दनाभक्ति करने को प्रतिदिन उनके पास जाया करता था । सो जब उसने श्रावक व्रत ग्रहण कर लिये तब से वह नहीं जाने लगा । यह देख बौद्धगुरु ने उसे बुलाया, पर जब श्रीवन्दक ने आकर भी उसे नमस्कार नहीं किया तब संघश्री ने उससे पूछा—क्यों आज तुमने मुझे नमस्कार नहीं किया ? उत्तर में मंत्री ने मुनि के आने, उपदेश करने और अपने व्रत ग्रहण करने का सब हाल संघश्री से कह सुनाया । सुनकर संघश्री बड़े दुःख के साथ बोला—हाय ! तू ठगा गया, पापियों ने तुझे बड़ा धोखा दिया । क्या कभी यह संभव है निराश्रय आकाश में भी कोई चल सकता है ? जान पड़ता है तुम्हारा राजा बड़ा कपटी और ऐन्द्रजालिक है । इसीलिये उसने तुम्हें ऐसा आश्चर्य दिखला कर अपने धर्म में शामिल कर लिया । तुम तो भगवान् के इतने विश्वासी थे, फिर भी तुम उस पापी राजा की बहकावट में आ गये ? इस तरह उसे बहुत कुछ ऊँचा नीचासमझाकर संघश्री ने कहा—अब तुम कभी राजसभा मे नहीं जाना और जाना भी पड़े तो यह आज का हाल राजा से नहीं कहना । कारण वह जैनी है । सो बुद्धधर्म पर स्वभाव से ही उसे प्रेम नहीं होगा । इसलिये क्या मालूम कब वह बुद्धधर्म का अनिष्ट करने को तैयार हो जाये ? बेचारा श्रीवन्दक फिर संघश्री की चिकनी चुपड़ी बातों में आ गया । उसने श्रावक धर्म को भी उसी समय तिलाञ्जलि दे दी । बहुत ठीक कहा गया है—

स्वयं ये पापिनी लोके परं कुर्वन्ति पापिनम् ।
यथा संतप्तमानोसौ दहत्यग्निर्न संशयः ।।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात—जो स्वयं पापी होते हैं वे औरों को भी पापी बना डालते हैं । यह उनका स्वभाव ही होता है । जैसे अग्नि स्वयं भी गरम होती है और दूसरों को भी जला देती है ।

दूसरे दिन धनदत्त ने राज्यसभा में बड़े आनन्द और धर्म प्रेम के साथ चारण मुनि का हाल सुनाया । उनमें प्रायः लोगों को, जो कि जैन नहीं थे, बहुत आश्चर्य हुआ । उनका विश्वास राजा के कथन पर नहीं जमा । सब आश्चर्य भरी दृष्टि से राजा के मुँह की ओर देखने लगे । राजा को जान पड़ा कि मेरे कहने पर लोगों को विश्वास नहीं हुआ । तब उन्होंने अपनी गंभीरता को हँसी के रूप में परिवर्तित कर झट से कहा, हाँ मैं यह कहना तो भूल ही गया कि उस समय हमारे मंत्री महाशय भी मेरे पास ही थे । यह कहकर ही मंत्री पर नजर दौड़ाई पर वे उन्हें नहीं दीख पड़े । तब राजा ने उसी समय सैनिकों को भेजकर श्रीवन्दक को बुलवाया । उसके आते ही राजा ने अपने कथन की सत्यता प्रमाणित करने के लिये उससे कहा—मंत्रीजी, कल दोपहर का हाल तो इन सबको सुनाइये कि वे चारण मुनि कैसे थे ? तब बौद्धगुरु का बहकाया हुआ पापी श्रीवन्दक बोल उठा कि महाराज मैंने तो उन्हें नहीं देखा और न यह सम्भव ही है कि आकाश में कोई चल सके ? पापी श्रीवन्दक के मुँह से उक्त वाक्यों का निकलना था कि उसी समय उसकी दोनों आँखें मुनि निन्दा के तीव्र पाप के उदय से फूट गईं । सच है—

प्रभावी जिनधर्मस्य सूर्यस्येव जगत्त्रये ।
नैव संछाद्यते केन धूकप्रायेण पापिना ।।
--ब्रह्म नेमिदत्त

जैसे संसार में फैले हुए सूर्य के प्रभाव को उल्लू नहीं रोक सकता, ठीकउसी प्रकार पापी लोग पवित्र जैन धर्म के प्रभाव को कभी नहीं रोक सकते । उक्त घटना को देखकर राजा वगैरह ने जिनधर्म की खूब प्रशंसा की और श्रावक धर्म स्वीकार कर वे उपासक बन गये । इस प्रकार निर्मल और देवादि के द्वारा पूज्य जिनशासन का प्रभाव देखकर भव्य पुरुषों को उचित है कि वे निर्भ्रांत होकर सुख के खजाने और स्वर्ग-मोक्ष के देने वाले पवित्र जिनधर्म की और अपनी निर्मल और मनोवाँछित की देने वाली बुद्धि को लगावें ।


+ ब्रह्मदत्त की कथा -
ब्रह्मदत्त की कथा
परम भक्ति से संसार पूज्य जिनभगवान् को नमस्कार कर मैं ब्रह्मदत्त की कथा लिखता हूँ । वह इसलिये कि सत्पुरुषों को इसके द्वारा कुछ शिक्षा मिले ।

कापिल्य नामक नगर में एक ब्रह्मरथ नाम का राजा रहता था । उसकी रानी का नाम था रामिली । वह सुन्दरी थी, विदुषी थी और राजा को प्राणों से भी प्यारी थी, बारहवें चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त इसी के पुत्र थे । वे छह खण्ड पृथ्वी को अपने वश में करके सुख पूर्वक अपना राज्य शासन का काम करते थे ।

एक दिन राजा भोजन करने को बैठे उस समय उनके विजयसेन नाम के रसोइये ने उन्हें खीर परोसी । पर वह बहुत गरम थी, इसलिये राजा खा न सके । उसे इतनी गरम देखकर राजा रसोइये पर बहुत गुस्सा हुए । गुस्से में आकर उन्होंने खीर के उसी बर्तन को रसोइये के सिर पर दे मारा । उसका सिर सब जल गया । साथ ही वह मर गया । हाय ! ऐसे क्रोध को धिक्कार है, जिससे मनुष्य अपना हिताहित न देखकर बड़े-बड़े अनर्थ कर बैठता है और फिर अनंत काल तक कुगतियों में भोगता रहता है ।
रसोइया बड़े दुःख से मरा सही, पर उसके परिणाम उस समय भी शांत रहे । वह मर कर लवण समुद्रान्तर्गत विशालरत्न नामक द्वीप में व्यन्तर देव हुआ । विभंगावधिज्ञान से वह अपने पूर्वभव की कष्ट कथाजानकर क्रोध के मारे काँपने लगा । वह एक संन्यासी के वेष में राजा के पास आया और राजा को उसने केला, आम, सेब, संतरा आदि बहुत से फल भेंट किये । राजा जीभ की लोलुपता से उन्हें खाकर संन्यासी से बोला—साधुजी, कहिये आप ये फल कहाँ से लाये ? और कहाँ मिलेंगे ? ये तो बड़े ही मीठे हैं । मैंने तो आज तक ऐसे फल कभी नहीं खाये । मैं आपकी इस भेंट से बहुत खुश हुआ ।
संन्यासी ने कहा, महाराज, मेरा घर एक टापू में है । वहीं एक बहुत सुन्दर बगीचा है । उसी के ये फल हैं । और अनंत फल उसमें लगे हुए हैं । संन्यासी की रसभरी बात सुनकर राजा के मुँह में पानी भर आया । उसने संन्यासी के साथ जाने की तैयारी की । सच है—

शुभाअशुभं न जानाति हा कष्टं लंपटः पुमान ।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—जिह्वालोलुपी पुरुष भला बुरा नहीं जान पाते, यह बड़े दुःख की बात है । यही हाल राजा का हुआ । जब वह लोलुपता के वश हो उस संन्यासी के साथ समुद्र के बीच में पहुँचा, तब उसने राजा को मारने के लिये बड़ा कष्ट देना शुरु किया । चक्रवर्ती अपने को कष्ट में घिरा देखकर पंच नमस्कार मंत्र की आराधना करने लगा । उसके प्रभाव से कपटी संन्यासी की सब शक्ति रुद्ध हो गयी । वह राजा को कुछ कष्ट न दे सका । आखिर प्रगट होकर उसने राजा से कहा—दुष्ट, याद है ? मैं जब तेरा रसोइया था, तब तूने मुझे जान से मार डाला था ? वही आग आज मेरे हृदय को जला रही है, और उसी को बुझाने के लिये, अपने पूर्व भव का वैर निकालने के लिये मैं तुझे यहाँ छलकर लाया हूँ और बहुत कष्ट के साथ तुझे जान से मारूँगा, जिससे फिर कभी तू ऐसा अनर्थ न करे । पर यदि तू एक काम करे तो बच सकता है । वह यह कि तू अपने मुँह से पहले तो यह कह दे कि संसार में जिनधर्म ही नहीं है और जो कुछ है वह अन्य धर्म है । इसके सिवा पंच नमस्कार मंत्र को जल में लिखकर उसे अपने पाँव से मिटा दे, तब मैं तुझे छोड़ सकता हूँ । मिथ्या दृष्टि ब्रह्मदत्त ने उसके बहकाने में आकर वही किया जैसा उसे देव ने कहा था । उसका व्यंतर के कहे अनुसार करना था कि उसने चक्रवर्ती को उसी समय मार कर समुद्र में फेंक दिया । अपना वैर उससे निकाल लिया । चक्रवर्ती मरकर मिथ्यात्व के उदय से सातवें नरक गया । सच है मिथ्यात्व अनंत दुःखों का देने वाला है । जिसका जिनधर्म पर विश्वास नहीं, क्या उसे इस अनंत दुःख मय संसार में कभी सुख हुआ है ? नहीं । मिथ्यात्व के समान संसार में और कोई इतना निन्द्य नहीं है । उसी से तो चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त सातवें नरक गया । इसलिये आत्महित के चाहने वाले पुरुषों को दूर से ही मिथ्यात्व छोड़कर स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति का कारण सम्यक्त्व ग्रहण करना उचित है ।

संसार में सच्चे देव अरहंत भगवान् हैं, जो क्षुधा, तृषा, जन्म, मरण, रोग, शोक, चिंता, भय, आदि दोषों से और धन-धान्य, दासी-दास, सोना-चाँदी आदि दस प्रकार के परिग्रह से रहित हैं, जो इन्द्र, चक्रवर्ती, देव, विद्याधरों द्वारा वन्द्य हैं, जिनके वचन जीव मात्र को सुख देने वाले और भव समुद्र से तिरने के लिये जहाज समान हैं, उन अरहंत भगवान् का आप पवित्र भावों से सदा ध्यान किया कीजिये कि जिससे वे आपके लिये कल्याण पथ के प्रदर्शक हों ।


+ श्रेणिक राजा की कथा -
श्रेणिक राजा की कथा
केवल ज्ञान रूपी नेत्रों के द्वारा समस्त संसार के पदार्थों के देखने जानने वाले और जगत् पूज्य जिनेन्द्र भगवान् को नमस्कार कर मैं राजा श्रेणिक की कथा लिखता हूँ, जिसके पढ़ने से सर्वसाधारण का हित हो ।

श्रेणिक मगध देश के अधीश्वर थे । मगध की प्रधान राजधानी राजगृह थी । श्रेणिक कई विषयों के सिवा राजनीति के बहुत अच्छे विद्वान् थे । उनकी महारानी चेलनी बड़ी धर्मात्मा, जिनभगवान् की भक्त और सम्यग्दर्शन से विभूषित थी ।

एक दिन श्रेणिक ने उनसे कहा—देखो, संसार में वैष्णव धर्म की बहुत प्रतिष्ठा है और वह जैसा सुख देने वाला है, वैसा और धर्म नहीं । इसलिये तुम्हें भी उसी धर्म का आश्रय स्वीकार करना उचित है ।

सुनकर चेलनी देवी, जिसे कि जिनधर्म पर अगाध विश्वास था, बड़े विनय से बोली—नाथ, अच्छी बात है, समय पाकर मैं इस विषय की परीक्षा करूँगी ।

इस के कुछ दिनों बाद चेलनी ने कुछ भागवत साधुओं का अपने यहाँ निमंत्रण किया और बड़े गौरव के साथ उन्हें अपने यहाँ बुलाया । वहाँ आकर अपना ढोंग दिखलाने के लिये वे कपट मायाचार से ईश्वराराधन करने को बैठे । उस समय चेलनी ने उनसे पूछा, आप लोग क्या करते हैं ? उत्तर में उन्होंने कहा—देवी, हम लोग मलमूत्रादि अपवित्र वस्तुओं से भरे हुए शरीर को छोड़कर अपने आत्मा को विष्णु अवस्था में प्राप्त कर स्वानुभवजन्य सुख भोगते हैं ।

सुन कर देवी चेलनी ने उस मण्डप में, जिसमें सब साधु ध्यान करने को बैठे थे, आग लगवा दी । आग लगते ही वे सब कव्वे की तरह भाग खड़े हुए । यह देखकर श्रेणिक ने बड़े क्रोध के साथ चेलनी से कहा—आज तुमने साधुओं के साथ बड़ा अनर्थ किया । यदि तुम्हारी उन पर भक्ति नहीं थी, तो क्या उसका यह अर्थ है कि उन्हें जान से ही मार डालना ? बतलाओ तो उन्होंने तुम्हारा क्या अपराध किया जिससे कि तुम उनके जीवन की ही प्यासी हो उठी ?

रानी बोली—नाथ, मैंने तो कोई बुरा काम नहीं किया और जो किया वह उन्हीं के कहे अनुसार उनके सुख का कारण था । मैंने तो केवल परोपकार बुद्धि से ऐसा किया था । जब वे लोग ध्यान करने को बैठे तब मैंने उन लोगों से पूछा कि आप लोग क्या करते हैं ? तब उन्होंने मुझे कहा था कि हम अपवित्र शरीर छोड़कर उत्तम सुखमय विष्णुपद प्राप्त करते हैं । तब मैंने सोचा कि ओहो, ये जब शरीर छोड़कर विष्णुपद प्राप्त करते हैं तब तो बहुत ही अच्छा है और इससे उत्तम यह होगा कि यदि ये निरंतर विष्णु बने रहें । संसार में बार-बार आना और जाना यह इनके पीछे पचड़ा क्यों ? यह विचारकर वे निरंतर विष्णुपद में रहकर सुखभोग करें, इस परोपकार बुद्धि से मैंने मंडप में आग लगवा दी थी । आप ही अब विचार कर बतलाइये कि इसमें मैंने सिवा परोपकार के कौन बुरा काम किया ? और सुनिये मेरे वचनों पर आपको विश्वास हो, इसलिये एक कथा भी आपको सुना देती हूँ ।

“जिस समय की यह कथा है, उस समय वत्सदेश की राजधानी कौशाम्बी के राजा प्रजापाल थे । वे अपना राज्य शासन नीति के साथ करते हुए सुख से समय बिताते थे । कौशाम्बी में दो सेठ रहते थे । उनके नाम थे समुद्रदत्त और सागरदत्त । दोनों सेठों में परस्पर बहुत प्रेम था । उनका प्रेम उन्होंने सदा दृढ़ बना रहे, इसलिये परस्पर में एक शर्त की । वह यह कि, “मेरे यदि पुत्री हुई तो मैं उसका ब्याह तुम्हारे लड़के के साथ कर दूँगा और इसी तरह मेरे पुत्र हुआ तो तुम्हें अपनी लड़की का ब्याह उसके साथ कर देना पड़ेगा ।“

दोनों ने उक्त शर्त स्वीकार की । इसके कुछ बाद सागरदत्त के घर पुत्रजन्म हुआ । उसका नाम वसुमित्र था । उसमें एक बड़े भारी आश्चर्य की बात थी । वह यह कि वसुमित्र न जाने किस कर्म उदय से रात के समय तो एक दिन दिव्य मनुष्य होकर रहता और दिन में एक भयानक सर्प ।

उधर समुद्रदत्त के घर कन्या हुई । उसका नाम रक्खा गया नागदत्ता । वह बड़ी खूबसूरत सुन्दरी थी । उसके पिता ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उसका ब्याह वसुमित्र के साथ कर दिया । सच है—
नैव वाचा चलत्वं स्यात्सतां कष्टशतैरपि ।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—सत्पुरुष सैकड़ों कष्ट सह लेते हैं, पर अपनी प्रतिज्ञा से कभी विचलित नहीं होते । वसुमित्र का ब्याह हो गया । वह अब प्रतिदिन दिन में तो सर्प बनकर एक पिटारे में रहता और रात में एक दिव्य पुरुष होकर अपनी प्रिया के साथ सुखोभोग करता । सचमुच संसार की विचित्र ही स्थिति होती है । इसी तरह उसे कई दिन बीत गये । एक दिन नागदत्ता की माता अपनी पुत्री को एक ओर तो यौवन अवस्था में पदार्पण करती हुई और दूसरी ओर उसके विपरीत भाग्य को देखकर दुखी होकर बोली—हाय ! देव की कैसी विडम्बना है; जो कहाँ तो देवबाला सरीखी सुन्दरी मेरी पुत्री और कैसा उसका अभाग्य जो उसे पति मिला एक भयंकर सर्प ? उसकी दुःख आह को नागदत्ता ने सुन लिया । वह दौड़ी आकर अपनी माता से बोली—माता, इसके लिये आप क्यों दुःख करती हैं ? मेरा जब भाग्य ही ऐसा था, तब उसके लिये दुःख करना व्यर्थ है । और अभी मुझे विश्वास है मेरे स्वामी का इस दशा से उद्धार हो सकता है । इसके बाद नागदत्ता ने अपनी माता को स्वामी के उद्धार सम्बन्ध की बात समझा दी ।

सदा के नियमानुसार आज भी रात के समय वसुमित्र अपना सर्प का शरीर छोड़कर मनुष्य रूप में आया और अपने शय्या भवन में पहुँचा । इधर समुद्रदत्ता छुपी हुई आकर वसुदत्त के पिटारे को वहाँ से उठा ले आयी और उसे उसी समय उसने जला डाला । तब से वसुमित्र मनुष्य रूप ही अपनीप्रिया के साथ सुख भोगता हुआ अपना समय आनन्द से बिताने लगा ।“ नाथ ! उसी तरह ये साधु भी निरंतर विष्णुलोक में रहकर सुख भोगें यह मेरी इच्छा थी; इसलिये मैंने वैसे किया था । महारानी चेलनी की कथा सुनकर श्रेणिक उत्तर तो कुछ नहीं दे सकें, पर वे उस पर बहुत गुस्सा हुए और उपयुक्त समय न देखकर वे अपने क्रोध को उस समय दबा भी गये ।

एक दिन श्रेणिक शिकार के लिये गये हुए थे । उन्होंने वन में यशोधर मुनिराज को देखा । वे उस समय आतप योग धारण किये हुए थे । श्रेणिक ने उन्हें शिकार के लिये विघ्नरूप समझकर मारने का विचार किया और बड़े गुस्से में आकर अपने क्रूर शिकारी कुत्तों को उन पर छोड़ दिया । कुत्ते बड़ी निर्दयता से मुनि को मारने को झपटे । पर मुनिराज की तपश्चर्या के प्रभाव से उन्हें कुछ कष्ट न पहुँचा सके । बल्कि उनकी प्रदिक्षणा देकर उनके पाँवों के पास खड़े रह गये । यह देखकर श्रेणिक को और भी क्रोध आया । उन्होंने क्रोधान्ध होकर मुनि पर शर चलाना आरम्भ किया । पर यह कैसा आश्चर्य जो शरीर के द्वारा उन्हें कुछ क्षति न पहुँचकर वे ऐसे जान पड़े मानो किसी ने उन पर फूलों की वर्षा की है । सच बात यह है कि तपस्वियों का प्रभाव कह कौन सकता है ? श्रेणिक ने मुनि हिंसारूप तीव्र परिणामों द्वारा उस समय सातवें नरक की आयु का बन्ध किया, जिसकी स्थिति तैतीस सागर की है ।

इन सभी अलौकिक घटनाओं को देखकर श्रेणिक का पत्थर के समान कठोर हृदय फूल सा कोमल हो गया । उनके हृदय की सब दुष्टता निकलकर उसमें मुनि के प्रति पूज्य भाव पैदा हो गया वे मुनिराज के पास गये और भक्ति से उन्होंने मुनि के चरणों को नमस्कार किया । यशोधर मुनिराज ने श्रेणिक के हित के लिये उपयुक्त समझकर उन्हें अहिंसामयी पवित्र जिनशासन का उपदेश दिया । उसका श्रेणिक के हृदय पर बहुत ही असर पड़ा । उसके परिणामों में विलक्षण परिवर्तन हुआ । उन्हें अपने कृतकर्म पर अत्यंत पश्चात्ताप हुआ । मुनिराज के उपदेशानुसार उन्होंने सम्यक्त्व ग्रहण किया । उसके प्रभाव से, उन्होंने जो सातवें नरक की आयु का बन्ध किया था, वह उसी समय घटकर पहले नरक का रह गया, जहाँ की स्थिति चौरासी हज़ार वर्षों की है । ठीक है सम्यग्दर्शन के प्रभाव से भव्य पुरुषों को क्या प्राप्त नहीं होता ?

इसके बाद श्रेणिक ने श्रीचित्रगुप्त मुनिराज के पास क्षयोपशम सम्यक्त्व प्राप्त किया और अंत में भगवान वर्धमान स्वामी के द्वारा शुद्ध क्षायिक सम्यक्त्व, जो कि मोक्ष का कारण है, प्राप्त कर पूज्य तीर्थंकर नाम प्रकृति का बन्ध किया । श्रेणिक महाराज अब तीर्थंकर होकर निर्वाण लाभ करेंगे ।

वे केवल ज्ञान रूपी प्रदीप श्रीजिनभगवान् संसार में सदा काल विद्यमान रहें, जो इन्द्र, देव, विद्याधर, चक्रवर्ती, द्वारा पूज्य हैं और जिनके पवित्र उपदेश के हृदय में मनन और ग्रहण द्वारा मनुष्य निर्मल लक्ष्मी को प्राप्त करने का पात्र होता है, मोक्षलाभ करता है ।


+ पद्मरथ राजा की कथा -
पद्मरथ राजा की कथा
इन्द्र, धरणेन्द्र, विद्याधर, राजा, महाराजाओं द्वारा पूज्य जिनभगवान् के चरणों को नमस्कार कर मैं पद्मरथ राजा की कथा लिखना हूँ, जो प्रसिद्ध जिनभक्त हुआ है ।

मगध देश के अंतर्गत एक मिथिला नाम की सुन्दर नगरी थी । उसके राजा थे पद्मरथ । वे बड़े बुद्धिमान और राजनीति के अच्छे जानने वाले थे, उदार और परोपकारी थे । सुतरा वे खूब प्रसिद्ध थे ।
एक दिन पद्मरथ शिकार के लिये वन में गये हुए थे । उन्हें एक खरगोश दीख पड़ा । उन्होंने उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ाया । खरगोश उनकी नजर से बाहर होकर न जाने कहाँ अदृश्य हो गया । पद्मरथ भाग्य से कालगुफा नाम की एक गुहा में जा पहुँचे । वहाँ एक मुनिराज रहा करते थे । वे बड़े तपस्वी थे । उनका दिव्य देह तप के प्रभाव से अपूर्व तेज धारण कर रहा था । उनका नाम था सुधर्म । पद्मरथ रत्नत्रय विभूषित और परम शांत मुनिराज के पवित्र दर्शन से बहुत शांत हुए । जैसे तपा हुआ लौहपिण्ड जल से शांत हो जाता है । वे उसी समय घोड़े पर से उतर पड़े और मुनिराज को भक्ति पूर्वक नमस्कार कर उन्होंने उनके द्वारा धर्म का पवित्र उपदेश सुना । उपदेश उन्हें बहुत रुचा । उन्होंने सम्यक्त्व पूर्वक अणुव्रत ग्रहण किये । इसके बाद उन्होंने मुनिराज से पूछा—हे प्रभो ! हे संसार के आधार ! कहिये तो जिनधर्म रूपी समुद्र को बढ़ाने वाले आप सरीखे गुणज्ञ चन्द्रमा और भी कोई है या नहीं ? और है तो कहाँ हैं ? हे करुणा सागर ! मेरे इस सन्देह को मिटाइये ।

उत्तर में मुनिराज ने कहा—राजन् ! चम्पानगरी में इस समय बारहवें तीर्थंकर भगवान वासु पूज्य विराजमान हैं । उनके भौतिक शरीर के तेज की समानता तो अनेक सूर्य मिलकर भी नहीं कर सकते और उनके अनंत ज्ञानादि गुणों को देखते हुए मुझमें और उनमें राई और सुमेरु का अंतर है । भगवान् वासु पूज्य का समाचार सुनकर पद्मरथ को उनके दर्शन की अत्यंत उत्कण्ठा हुई । वे उसी समय फिर वहाँ से बड़े वैभव के साथ भगवान् के दर्शनों के लिये चले । यह हाल धन्वन्तरी और विश्वानुलोम नाम के दो देवों को जान पड़ा । सो वे पद्मरथ की परीक्षा के लिये मध्यलोक में आये । उन्होंने पद्मरथ की भक्ति की दृढ़ता देखने के लिये रास्ते में उन पर उपद्रव करना शुरु किया । पहले उन्होंने उन्हें एक भयंकर काल सर्प दिखलाया, इसके बाद राज्यछत्र का भंग, अग्नि का लगना, प्रचण्ड वायु द्वारा पर्वत और पत्थरों का गिरना, असमय में भयंकर जल वर्षा और खूब कीचड़ मय मार्ग और उसमें फँसा हाथी आदि दिखलाया । यह उपद्रव देखकर साथ के सब लोग भय के मारे अधमरे हो गये । मंत्रियों ने यात्रा अमंगलमय बतलाकर पद्मरथ से पीछे लौट चलने के लिये आग्रह किया । परंतु पद्मरथ ने किसी की बात नहीं सुनी और बड़ी प्रसन्नता के साथ “नमः श्रीवासुपूज्याय” कहकर अपना हाथी आगे बढ़ाया । पद्मरथ की इस प्रकार अचल भक्ति देखकर दोनों देवों ने उनकी बहुत-बहुत प्रशंसा की । इसके बाद पद्मरथ को सब रोगों को नष्ट करने वाला एक दिव्य हार और बहुत सुन्दर वीणा, जिस की आवाज एक योजन पर्यंत सुनाई पड़ती है, देकर अपने स्थान चले गये । ठीक है—जिनके हृदय में जिनभगवान् की भक्ति सदा विद्यमान रहती है, उनके सब काम सिद्ध हों, इसमें कोई सन्देह नहीं ।

पद्मरथ ने चम्पानगरी में पहुँचकर समवशरण में विराजे हुए, आठ प्रतिहार्यों से विभूषित, देव, विद्याधर, राजा, महाराजाओं द्वारा पूज्य, केवल ज्ञान द्वारा संसार के सब पदार्थों को जानकर धर्म का उपदेश करते हुए और अनंत जन्मों में बाँधे हुए मिथ्यात्व को नष्ट करने वाले भगवान् वासु पूज्य के पवित्र दर्शन किये, उनकी पूजा की, स्तुति की और उपदेश सुना । भगवान के उपदेश का उन के हृदय पर बहुत प्रभाव पड़ा । वे उसी समय जिनदीक्षा लेकर तपस्वी बन गये । प्रव्रजित होते ही उनके परिणाम इतने विशुद्ध हुए कि उन्हें अवधि और मनःपर्यय ज्ञन हो गया । भगवान वासु पूज्य के वे गणधर हुए । इसलिये भव्य पुरुषों को उचित है कि वे मिथ्यात्व को छोड़कर स्वर्ग-मोक्ष को देने वाली जिनभगवान् की भक्ति निरंतर पवित्र भावों के साथ करें और जिस प्रकार पद्मरथ सच्चा जिनभक्त हुआ उसी प्रकार वे भी हों ।

जिनभक्ति सब प्रकार का सुख देती है और परम्परा मोक्ष की प्राप्ति का कारण है, जो केवलज्ञान द्वारा संसार के प्रकाशक हैं और सत्पुरुषों द्वारा पूज्य हैं, वे भगवान वासु पूज्य सारे संसार को मोक्ष सुख प्रदान करें कर्मों के उदय से घोर दुःख सहते हुए जीवों का उद्धार करें ।


+ पंच नमस्कारमंत्र-माहात्म्य कथा -
पंच नमस्कारमंत्र-माहात्म्य कथा
मोक्षसुख प्रदान करने वाले श्रीअर्हंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधुओं को नमस्कार कर पंच नमस्कारमंत्र की आराधना द्वारा फल प्राप्त करने वाले सुदर्शन की कथा लिखी जाती है ।

अंगदेश की राजधानी चम्पा नगरी में गजवाहन नाम के एक राजा हो चुके हैं । वे बहुत खूबसूरत और साथ ही बड़े भारी शूरवीर थे । अपने तेज से शत्रुओं पर विजय प्राप्तकर सारे राज्य को उन्होंने निष्कण्टक बना लिया था । वहीं एक वृषभदत्त नाम के सेठ रहा करते थे । उनकी गृहिणी का नाम था अर्हद्दासी । अपनी प्रिया पर सेठ का बहुत प्रेम था । वह भी सच्ची पति भक्तिपरयणा थी, सुशीला थी, सती थी, वह सदा जिनभक्ति में तत्पर रहा करती थी ।

वृषभदत्त के यहाँ एक गुवाल नौकर था । एक दिन वह वन से अपने घर पर आ रहा था । समय शीतकाल का था । जाड़ा खूब पड़ रहा था । उस समय रास्ते में उसे एक ऋद्धिधारी मुनिराज के दर्शन हुए, जो कि एक शिला पर ध्यान लगाये बैठे हुए थे । उन्हें देखकर गुवाले को बड़ी दया आयी । वह यह विचार कर, कि अहा ! इनके पास कुछ वस्त्र नहीं हैं और जाड़ा बड़ी जोर का पड़ रहा है, तब भी ये इसी शिला पर बैठे हुए ही रात बिता डालेंगे, अपने घर गया और आधी रात के समय अपनी स्त्री को साथ लिये पीछा मुनिराज के पास आया । मुनिराज को जिस अवस्था में बैठे हुए वह देख गया था, वे अब भी उसी तरह ध्यानस्थ बैठे हुए थे । उनका सारा शरीर ओस से भीग रहा था । उनकी यह हालत देखकर दयाबुद्धि से उसने मुनिराज के शरीर से ओस को साफ किया और सारी रात वह उनके पाँव दबाता रहा, सब तरह उनका वैयावृत्य करता रहा । सवेरा होते ही मुनिराज का ध्यान पूरा हुआ । उन्होंने आँख उठाकर देखा तो गुवाले को पास ही बैठा पाया । मुनिराज ने गुवाले को निकटभव्य समझ कर पंचनमस्कार मंत्र का उपदेश किया, जो कि स्वर्ग-मोक्ष की प्राप्ति का कारण है । इसके बाद मुनिराज भी पंचनमस्कारमंत्र का उच्चारण कर आकश में विहार कर गये ।

गुवाले की धीरे-धीरे मंत्र पर बहुत श्रद्धा हो गयी । वह किसी भी काम को जब करने लगता तो पहले ही पंचनमस्कार मंत्र का स्मरण कर लिया करता था । एक दिन जब गुवाला मंत्र पढ़ रहा था, तब उसे उसके सेठ ने सुन लिया । वे मुस्कुराकर बोले—क्यों रे, तूने यह मंत्र कहाँ से उड़ाया ? गुवाले ने पहले की सब बात अपने स्वामी से कह दी । सेठ ने प्रसन्न होकर गुवाले से कहा—भाई, क्या हुआ यदि कि तू छोटे भी कुल में उत्पन्न हुआ ? पर आज तू कृतार्थ हुआ, जो तुझे त्रिलोकपूज्य मुनिराज के दर्शन हुए । सच बात है सत्पुरुष धर्म के बड़े प्रेमी हुआ करते हैं ।

एक दिन गुवाला भैंसें चराने के लिये जंगल में गया । समय वर्षा का था । नदी नाले सब पूरे थे । उसकी भैंसें चरने के लिये नदी पार जाने लगीं । सो इन्हें लौटा लाने की इच्छा से गुवाला भी उनके पीछे ही नदी में कूद पड़ा । जहाँ वह कूदा वहाँ एक नुकीला लकड़ा गड़ा हुआ था । सो उसके कूदते ही लकड़े की नोंक उसके पेट में जा घुसी । उससे उसका पेट फट गया । वह उसी समय मर गया । वह जिस समय नदी में कूदा था, उस समय सदा के नियमानुसार पंचनमस्कारमंत्र का उच्चारण कर कूदा था । वह मरकर मंत्र के प्रभाव से वृषभदत्त के यहाँ पुत्र हुआ । वह जाता तो कहीं स्वर्ग में, पर उसने वृषभदत्त के यहाँ ही उत्पन्न होने का निदान कर लिया था, इसलिये निदान उसकी ऊँची गति का बाधक बन गया । उसका नाम रक्खा गया सुदर्शन । सुदर्शन बड़ा सुन्दर था । उसका जन्म माता-पिता के लिये खूब उत्कर्ष का कारण हुआ । पहले से कई गुणी सम्पत्ति उनके पास बढ़ गयी । सच है पुण्यवानों के लिये कहीं भी कुछ कमी नहीं रहती ।

वहीं एक सागरदत्त सेठ रहता था । उसकी स्त्री का नाम था सागरसेना । उसके एक पुत्री थी । उसका नाम मनोरमा था । वह बहुत सुन्दरी थी । देवकन्यायें भी उसकी रूपमाधुरी को देखकर शर्मा जाती थी । उसका ब्याह सुदर्शन के साथ हुआ । दोनों दम्पत्ति सुख से रहने लगे ।

एक दिन वृषभदत्त समाधिगुप्त मुनिराज के दर्शन करने के लिये गये । वहाँ उन्होंने मुनिराज के द्वारा धर्मोपदेश सुना । उपदेश उन्हें बहुत रुचा और उसका प्रभाव भी उनपर बहुत पड़ा । संसार की दशा देखकर उन्हें बहुत वैराग्य हुआ । वे घर का कारोबार सुदर्शन के सुपुर्द कर समाधिगुप्त मुनिराज के पास दीक्षा लेकर तपस्वी बन गये ।

पिता के प्रव्रजित हो जाने पर सुदर्शन ने भी खूब प्रतिष्ठा सम्पादित की । राजदरबार में भी उसकी पिता के जैसी पूछताछ होने लगी । वह सर्वसाधारण में खूब प्रसिद्ध हो गया । सुदर्शन न केवल लौकिक कामों से ही प्रेम करता था; किंतु वह उस समय एक बहुत धार्मिक पुरुष गिना जाता था । वह सदा जिनभगवान् की भक्ति में तत्पर रहता, श्रावक को व्रतों का श्रद्धा के साथ पालन करता, दान देता, पूजन-स्वाध्याय करता । यह सब होने पर भी ब्रह्मचर्य में वह बहुत दृढ़ था ।

एक दिन मगधाधीश्वर गजवाहन के साथ सुदर्शन वनविहार के लिये गया । राजा के साथ राजमहिषी भी थी । सुदर्शन सुन्दर तो था ही, सो उसे देखकर राजरानी काम के पाश में बुरी तरह फँसी । उसने अपनी एक परिचारि का को बुलाकर पूछा—क्यों तू जानती है कि महाराज के साथ आगंतुक कौन है ? और ये कहाँ रहते हैं ?

परिचारिका ने कहा—देवी, आप नहीं जानतीं, ये तो अपने प्रसिद्ध राजश्रेष्ठी सुदर्शन हैं ।
राजमहिषी ने कहा—हाँ ! तब तो ये अपनी राजधानी के भूषण हैं । अरी ! देख तो इनका रूप कितना सुन्दर, कितना मन को अपनी ओर खींचने वाला है ? मैनें तो आज तक ऐसा सुन्दर नररत्न नहीं देखा । मैं तो कहती हूँ, इनका रूप स्वर्ग के देवों से भी कहीं बढ़कर है । तूने भी कभी ऐसा सुन्दर पुरुष देखा है ।

वह बोली—महारानी जी, इसमें कोई सन्देह नहीं कि इनके समान सुन्दर पुरुष तीन लोक में भी नहीं मिलेगा । राजमहिषी ने उसे अपने अनुकूल देखकर कहा—हाँ तो तुझ से मुझे एक बात कहना है ।

वह बोली—वह क्या महारानीजी ?
महारानी बोली—पर तू उसे कर दे तो मैं कहूँ ।
वह बोली—देवी, भला मैं तो आपकी दासी हूँ, फिर मुझे आपकी आज्ञा पालन करने में क्यों इंकार होगा । आप निःसंकोच होकर कहिये । जहाँ तक मेरा वश चलेगा, मैं उसे पूरा करूँगी ।

महारानी ने कहा—देख, मेरा तेरे पर पूर्ण विश्वास है, इसलिये मैं अपने मन की बात तुझ से कहती हूँ । देखना कहीं मुझे धोखा न देना ? तो सुन, मैं जिस सुदर्शन की बाबत ऊपर तुझ से कह आयी हूँ, वह मेरे हृदय में स्थान पा गया है । उसके बिनामुझे संसार निःसार और सूना जान पड़ता है । तू यदि किसी प्रयत्न से मुझे उससे मिला दे तब ही मेरा जीवन बच सकता है । अन्यथा संसार में मेरा जीवन कुछ ही दिनों के लिये है ।

वह महारानी की बात सुनकर पहले तो कुछ विस्मित सी हुई, पर थी तो आखिर पैसे की गुलाम ही न ? उसने महारानी की आशा पूरी कर देने के बदले में अपने को आशातीत धन की प्राप्ति होगी, इस विचार से कहा—महारानी जी बस यही बात है ? इसी के लिये आप इतनी निराश हुई जाती हैं ? जब तक मेरे दम में दम है तब तक आपको निराश होने का कोई कारण नहीं दिखाई पड़ता । मैं आपकी आशा अवश्य पूरी करूँगी । आप घबरायें नहीं । बहुत ठीक लिखा है—

असभ्य दुष्टनारीभिर्निन्दितं क्रियते न किम् ।
--ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—असभ्य और दुष्ट स्त्रियाँ कौन बुरा काम नहीं करतीं ? अभया की धाय भी ऐसी ही स्त्रियों में थी । फिर वह क्यों वह इस काम में अपना हाथ नहीं डालती ? वह अब सुदर्शन को राजमहल में ले आने के प्रयत्न मे लगी ।

सुदर्शन एक धर्मात्मा श्रावक था । वह वैरागी था । संसार में रहता तब भी सदा उससे छुटकारा पाने के उपाय में लगा रहता था । इसलिये वह ध्यान का भी अभ्यास करता रहता था । अष्टमी और चतुर्दशी की रात्रि में वह भयंकर श्मशान में जाकर ध्यान करता । धाय को सुदर्शन के ध्यान की बात मालूम थी ।उसने सुदर्शन को राजमहल में लिवा जाने को एक षड्यंत्र रचा । एक दिन वह एक कुम्हार के पास गई और उससे मनुष्य के आकार का एक मिट्टी का पुतला बनवाया और उसे वस्त्र पहराकर वह राजमहल लिवा ले चली । महल में प्रवेश करते समय पहरेदारों ने उसे रोका और पूछा कि यह क्या है ? वह उसका उत्तर न देकर आगे बढ़ी । पहरेदारों ने उसे नहीं जाने दिया । उसने गुस्से का ढौंग बनाकर पुतले को जमीन पर दे मारा । वह चूर-चूर हो गया । इसके साथ ही उसने कड़क कर कहा—पापियो, दुष्टो, तुमने आज बड़ा अनर्थ किया है । तुम नहीं जानते कि महारानी के नरव्रत था, सो वे इस पुतले की पूजा करके भोजन करतीं । सो तुमने इसे तोड़ डाला है । अब वे कभी भोजन नहीं करेंगी । देखो अब मैं महारानी से जाकर तुम्हारी दुष्टता का हाल कहती हूँ । फिर वे सवेरे ही तुम्हारी क्या गति करती हैं ? तुम्हारी दुष्टता सुनकर ही वे तुम्हें जान से मरवा डालेंगी । धायकी धूर्त्तता से बेचारे पहरेदारों के प्राण सूख गये । उन्हें काटो तो खून नहीं । मारे डर के थर-थर काँपने लगे । वे उसके पाँव में पड़कर अपने प्राण बचाने की उससे भीख माँगने लगे । बड़ी आरजू-मिन्नत करने पर उसने उनसे कहा—तुम्हारी यह दशा देखकर मुझे दया आती है । खैर, मैं तुम्हारे बचाने का उपाय करूँगी । पर याद रखना तुम मुझे कोई काम करते समय मत छेड़ना । तुमने इस पुतले को तो फोड़ डाला, बतलाओ आज अपना व्रत कैसे पूरा करेंगी ? और न इसी समय और दूसरा पुतला ही बन सकता है । अस्तु ! फिर भी मैं कुछ उपाय करती हूँ । जहाँ तक बन पड़ा वहाँ तक तो दूसरा पुतला ही बनवा कर लाती हूँ और यदि नहीं बन सका तो किसी जिन्दा पुरुष को ही थोड़ी देर के लिये लाना पड़ेगा । तुम्हें सचेत करती हूँ कि उस समय मैं किसी से नहीं बोलूँगी, इसलिये मुझ से कुछ कहना सुनना नहीं । बेचारे पहरेदारों को तो अपनी जान की पड़ी हुई थी, इसलिये उन्होंने हाथ जोड़कर कह दिया कि—अच्छा, हम लोग अब आप से कुछ नहीं कहेंगे । आप अपना काम निडर होकर कीजिये ।

इस प्रकार वह धूर्त्ता सब पहरेदारों को अपने वश कर उसी समय श्मशान पहुँची । श्मशान जलती चिताओं से बड़ा भयंकर बन रहा था, उसी भयंकर श्मशान में सुदर्शन कायोत्सर्ग ध्यान कर रहा था । महारानी अभया की परिचारिका ने उसे उठा लाकर महारानी के सुपुर्द कर दिया । अभया अपनी परिचारिका पर बहुत प्रसन्न हुई । सुदर्शन को प्राप्त कर उसके आनन्द का कुछ ठिकाना न रहा, मानो उसे अपनी मनमानी निधि मिल गयी हो । वह काम से तो अत्यंत पीड़ित थी ही, उसने सुदर्शन से बहुत अनुनय-विनय किया, इसलिये कि वह उसकी इच्छा पूरी करके उसे सुखी करे, कामाग्नि से जलते हुए शरीर को आलिंगनसुधा प्रदान कर शीतल करे । पर सुदर्शन ने उसकी एक भी बात का उत्तर नहीं दिया । यह देख रानी ने उसके साथ अनेक प्रकार की कुचेष्टायें करनी आरम्भ कीं, जिससे वह विचलित हो जाय । पर तब भी रानी की इच्छा पूरी नहीं हुई । सुदर्शन मेरु सा निश्चल और समुद्र सा गम्भीर बना रहकर जिनभगवान् के चरणों का ध्यान करने लगा । उसने प्रतिज्ञा की कि इस उपसर्ग से बच गया तो अब संसार में न रहकर साधु हो जाऊँगा । प्रतिज्ञा कर वह काष्ठ की तरह निश्चल होकर ध्यान करने लगा । बहुत ठीक लिखा है—

संतः कष्टशतैश्चापि चारित्रान्न चलत्य हो । --ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—सत्पुरुष सैकड़ों कष्ट सह लेते हैं, पर अपने व्रत से कभी नहीं चलते । अनेक तरह का यत्न, अनेक कुचेष्टायें करने पर भी जब रानी सुदर्शन को शीलशैल से न गिरा सकी, उसे तिल भर भी विचलित नहीं कर सकी, तब शर्मिन्दा होकर उसने सुदर्शन को कष्ट देने के लिये एक नया ही ढोंग रचा । उसने अपने शरीर को नखों से खूब खुजा डाला, अपने कपड़े फाड़ डाले, भूषण तोड़-फोड़ डाले और यह कहती हुई वह जोर-जोर से हिचकियाँ ले लेकर रोने लगी कि हाय ! इस पापी दुराचारी ने मेरी यह हालत कर दी । मैंने तो इसे भाई समझकर अपने महल में बुलाया था । मुझे क्या मालूम था कि यह इतना दुष्ट होगा ? हाय ! दौड़ो ! मुझे बचाओ ! मेरी रक्षा करो ! यह पापी मेरा सर्वनाश करना चाहता है । रानी के चिल्लाते ही बहुत से नौकर-चाकर दौड़े आये और सुदर्शन को बाँधकर वे महाराज के पास लिवा ले गये । सच है—

किं न कुर्वन्ति पापिन्यो निन्द्यं दुष्टस्त्रियी भुवि । --ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—पापिनी और दुष्ट स्त्रियाँ संसार में कौन बुरा काम नहीं करतीं ? अभया भी ऐसी ही स्त्रियों में एक थी । इसलिये उसने अपना चरित कर बतलाया । महाराज को जब यह हाल मालूम हुआ, तो उन्होंने क्रोध में आकर सुदर्शन को मार डालने का हुकुम दे दिया । महाराज की आज्ञा होते ही जल्लाद लोग उसे श्मशान में लिवा ले गये । उनमें से एक ने अपनी तेज तलवार गले पर दे मारी । पर यह क्या हुआ ? जो सुदर्शन को उससे कुछ कष्ट नहीं पहुँचा और उल्टा, उसे वह तलवार का मारना ऐसा जान पड़ा, मानो किसी ने उसपर फूल माला फेंकी हो । जान पड़ा यह सब उसके अखण्ड शीलव्रत का प्रभाव था । ऐसे कष्ट के समय देवों ने आकर उसकी रक्षा की और स्तुति की कि सुदर्शन तुम धन्य हो,तुम सच्‍चे जिनभक्‍त हो, सच्‍चे श्रावक हो, तुम्हारा ब्रह्मचर्य अखण्ड है, तुम्हारा हृदय सुमेरु से भी कहीं अधिक निश्चल है । इस प्रकार प्रशंसा कर देवों ने उस पर सुगन्धित फूलों की वर्षा की और धर्मप्रेम के वश होकर उसकी पूजा की । सच है—

अहो पुण्यवतां पुंसां कष्टं चापि सुखायते ।
तस्माद्भव्यैः प्रयत्नेन कार्यं पुण्यं जिनोदितम् । --ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्—पुण्यवानों के लिये दुःख भी सुख के रूप में परिणत हो जाता है । इसलिये भव्य पुरुषों को जिनभगवान के कहे मार्ग से पुण्यकर्म करना चाहिये । भक्तिपूर्वक जिनभगवान की पूजा करना, पात्रों को दान देना, ब्रह्मचर्य का पालना, अणुव्रतों का पालन करना, अनाथ, अपाहिज दुखियों को सहायता देना, विद्यालय, पाठशाला खुलवाना, उनमें सहायता देना, विद्यार्थियों को छात्र-वृत्तियाँ देना आदि पुण्यकर्म हैं । सुदर्शन के व्रतमाहात्‍म्‍य का हाल महाराज को मालूम हुआ । वे उसी समय सुदर्शन के पास आये और उन्होंने उससे अपने अविचार के लिये क्षमा माँगी ।

सुदर्शन को संसार की इस लीला से बड़ा वैराग्य हुआ । वह अपना कारोबार सब सुकान्त पुत्र को सौंपकर वन में गया और त्रिलोकपूज्य विमलवाहन मुनिराज को नमस्कार कर उनके पास प्रव्रजित हो गया । मुनि होकर सुदर्शन ने दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तपश्चर्या द्वारा घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया और अनेक भव्य पुरुषों को कल्याण का मार्ग दिखला कर तथा देवादि द्वारा पूज्य होकर अंत में निराबाध, अनंत सुखमय मोक्षधाम में पहुँच गया ।

इस प्रकार नमस्कार मंत्र का माहात्म्य जानकर भव्यों को उचित है कि वे प्रसन्नता के साथ उस पर विश्वास करें और प्रतिदिन उसकी आराधना करें ।

धर्मात्माओं के नेत्ररूपी कुमुद-पुष्पों के प्रफुल्लित करने वाले, आनन्द देने वाले और श्रुतज्ञान के समुद्र तथा मुनि, देव, विद्याधर, चक्रवर्ती आदि द्वारा पूज्य, केवलज्ञान रूपी कांति से शोभायमान भगवान् जिनचन्द्र संसार में सदा काल रहें ।


+ यम मुनि की कथा -
यम मुनि की कथा
मैं देव, गुरु, और जिनवाणी को नमस्कार कर यम मुनि की कथा लिखता हूँ, जिन्होंने बहुत ही थोड़ा ज्ञान होने पर भी अपने को मुक्ति का पात्र बना लिया और अंत में वे मोक्ष गये । यह कथा सब सुख की देने वाली है ।

उड्रदेश के अंतर्गत एक धर्म नाम का प्रसिद्ध और सुन्दर शहर है । उसके राजा थे यम । वे बुद्धिमान और शास्त्रज्ञ थे । उनकी रानी का नाम धनवती था । धनवती के एक पुत्र और एक पुत्री थी । उनके नाम थे गर्दभ और कोणिका । कोणिका बहुत सुन्दरी थी । धनवती के अतिरिक्त राजा की और भी कई रानियाँ थीं । उनके पुत्रों की संख्या पाँचसौ थी । ये पाँचसौ ही भाई धर्मात्मा थे और संसार से उदासीन रहा करते थे । राजमंत्री का नाम था दीर्घ । वह बहुत बुद्धिमान और राजनीति का अच्छा जानकार था । राजा इन सब साधनों से बहुत सुखी थे और अपना राज्य भी बड़ी शांति से करते थे ।

एक दिन एक राजज्योतिषी ने कोणिका के लक्षण वगैरह देखकर राजा से कहा—महाराज, राजकुमारी बड़ी भाग्यवती है । जो उसका पति होगा वह सारी पृथ्वी का स्वामी होगा । यह सुनकर राजा बहुत खुश हुए और उस दिन से वे उसकी बड़ी सावधानी से रक्षा करने लगे, उन्होंने उसके लिये एक बहुत सुन्दर और भव्य तलग्रह बनवा दिया । वह इसलिये कि उसे और छोटा-मोटा बलवान राजा न देख पाये । एक दिन उसकी राजधानी में पाँचसौ मुनियों का संघ आया । संघ के आचार्य थे महामुनि सुधर्माचार्य । संसार का हित करना उनका एक मात्र व्रत था । बड़े आनन्द उत्साह के साथ शहर के सब लोग अनेक प्रकार के पूजन द्रव्य हाथों में लिये हुए आचार्य की पूजा के लिये गये । उन्हें जाते हुए देख राजा भी पाण्डित्य के अभिमान में आकर मुनियों की निन्दा करते हुए उनके पास गये । मुनिनिन्दा और ज्ञान का अभिमान करने से उसी समय उनके कोई ऐसा कर्मों का तीव्र उदय आया कि उनकी सब बुद्धि नष्ट हो गई । वे महामूर्ख बन गये । इसलिये जो उत्तम पुरुष हैं और जो ज्ञानी बनना चाहते हैं, उन्हें उचित है कि वे कभी ज्ञान का गर्व न करें और ज्ञान का ही क्यों ? किंतु कुल, जाति, बल, ऋद्धि, ऐश्वर्य, शरीर, तप, पूजा, प्रतिष्ठा आदि किसी का भी गर्व, अभिमान न करें । इनका अभिमान करना बड़ा दुःख दायी है ।

अपनी यह हालत देखकर राजा का होश ठिकाने आया । वे एक साथ ही दाँतरहित हाथी की तरह गर्व रहित हो गये । उन्होंने अपने कृत कर्मों का बहुत पश्चात्ताप किया और मुनिराज को भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उनसे धर्मोपदेश सुना, जो कि जीवमात्र को सुख देने वाला है । धर्मोपदेश से उन्हें बहुत शांति मिली । उसका असर भी उन पर बहुत पड़ा । वे संसार से विरक्त हो गये । वे उसी समय अपने गर्दभ नाम के पुत्र को राज्य सौंपकर अपने अन्य पाँचसौ पुत्रों के साथ, जो कि बालपन ही से वैरागी रहा करते थे, मुनि हो गये । मुनि हुए बाद उन सबने खूब शास्त्रों का अभ्यास किया । आश्चर्य है कि वे पाँचसौ भाई तो खूब विद्वान हो गये, पर राजा को (यम मुनि‍को) पंच नमस्कार मंत्र का उच्चारण करना तक भी नहीं आया । अपनी यह दशा देखकर यम मुनि बड़े शर्मिन्दा और दुःखी हुए । उन्होंने वहाँ रहना उचित न समझ अपने गुरु से तीर्थयात्रा करने की आज्ञा ली और अकेले ही वहाँ से वे निकल पड़े । यम मुनि अकेले ही यात्रा करते हुए एक दिन स्वच्छन्द होकर रास्ते में जा रहे थे । जाते हुए उन्होंने एक रथ देखा । रथ में गधे जुते हुए थे और उसपर एक आदमी बैठा हुआ था । गधे उसे एक हरे धान के खेत की ओर लिये जारहे थे । रास्ते में मुनि कोजाते हुए देखकर रथ पर बैठे हुए मनुष्य ने उन्हें पकड़ लिया और लगा वह उन्हें कष्ट पहुँचाने । मुनि ने कुछ ज्ञान का क्षयोपशम हो जाने से एक खण्ड गाथा बनाकर पढ़ी । वह गाथा यह थी—

कट्टसि पुण णिक्खेवसि रे गद्दहा जवं पेच्छसि ।
--खादिदुमिति
अर्थात्—रे गधो, कष्ट उठाओगे तो तुम जब भी खा सकोगे ।

इसी तरह एक दिन कुछ बालक खेल रहे थे । वहीं कोणिका भी न जाने किसी तरह पहुँच गयी । उसे देखकर सब बालक डरे । उस समय कोणिका को देखकर यम मुनि ने एक और खण्ड गाथा बनाकर आत्मा के प्रति कहा । वह गाथा यह थी—

अण्णत्थ किं पलोवह तुम्हे पत्थणिबुर्द्धि,
या छिद्दे अच्छई कोणिआ इति ।

अर्थात्—दूसरी ओर क्या देखते हो ? तुम्हारी पत्थर सरीखी बुद्धि को तोड़ने वाली कोणिका तो है।
एक दिन यम मुनि ने एक मेंढक को कमल पत्र की आड़ में चुपे हुए सर्प की ओर आते हुए देखा । देखकर वे मेंढक से बोले—

अम्हादो णत्थि भयं दीहादो दीसदे भयं तुम्हे ति ।

अर्थात्—मुझे—मेरे आत्मा को तो किसी से भय नहीं है । भय है, तो तुम्हें ।
बस, यम मुनि ने जो ज्ञान सम्पादन कर पाया वह इतना था । वे इन्हीं तीन खण्ड गाथाओं का
स्वाध्याय करते, पाठ करते और कुछ उन्हें आता नहीं था । इसी तरह पवित्रात्मा और धर्मानुयायी यम मुनि ने अनेक तीर्थों की । यात्रा करते हुए धर्मपुर की ओर आ निकले । वे शहर बाहर एक बगीचे कायोत्सर्ग ध्यान करने लगे । उनके पीछे लौट आने का हाल उनके पुत्र गर्दभ और राजमंत्री दीर्घ को ज्ञात हुआ । उन्होंने समझा कि ये हम से पीछा राज्य लेने को आये हैं । सो वे दोनो मुनि के मारने का विचार कर आधी रात के समय वन में गये । और तलवार खींचकर उनके पीछे खड़े हो गये । आचार्य कहते हैं कि—
धिक् राज्यं धिङ्मूर्खत्वंकातरत्वं च धिक्तराम् ।
निस्पृहाच्च मुनेर्येन शंका राज्येSभक्त्तयोः ।।

अर्थात्—ऐसे राज्य को, ऐसी मूर्खता और ऐसे डरपोकप ने को धिक्कार है, जिससे एक निस्पृह और संसारत्यागी मुनि के द्वारा राज्य के छिन जाने का भय उन्हें हुआ । गर्दभ और दीर्घ, मुनि की हत्या करने को तो आये पर उनकी हिम्मत उन्हें मारने की नहीं पड़ी । वे बार-बार अपनी तलवारों को म्यान में रखने लगे और बाहर निकालने लगे । उसी समय यम मुनि ने अपनी स्वाध्याय की पहली गाथा पढ़ी, जो कि ऊपर लिखी जा चुकी है । उसे सुनकर गर्दभ ने अपने मंत्री से कहा—जान पड़ता है मुनि ने हम दोनो को देख लिया । पर साथ ही जब मुनि ने आधी गाथा फिर पढ़ी तब उसने कहा—नहीं जी, मुनिराज राज्य लेने को नहीं आये हैं । मैंने जो वैसा समझा था वह मेरा भ्रम था । मेरी बहिन कोणिका को प्रेम के वश कुछ कहने ये आये हुए जान पड़ते हैं । उसके बाद जब मुनिराज ने तीसरी आधी गाथा भी पढ़ी तब उसे सुनकर गर्दभ ने अपने मन में उसका अर्थ यह अर्थ समझा कि “मंत्री दीर्घ बड़ा कूट है, और मुझे मारना चाहता है,” यही बात पिताजी प्रेम के वश हो तुझे कहकर सावधान करने को आये हैं । परंतु थोड़ी देर बाद ही उसका यह सन्देह भी दूर हो गया । उन्होंने अपने हृदय की सब दुष्टता छोड़कर बड़ी भक्ति के साथ पवित्र चारित्र के धारक मुनिराज को प्रणाम किया और उनसे धर्म का उपदेश सुना, जोकि स्वर्ग-मोक्ष का देने वाला है । उपदेश सुनकर वे दोंनो बहुत प्रसन्न हुए । इसके बाद वे श्रावकधर्म ग्रहण कर अपने स्थान लौट गये ।

इधर यमधर मुनि भी अपने चारित्र दिन दूना निर्मल करने लगे । परिणामों को वैराग्य की ओर खूब लगाने लगे । उसके प्रभाव से थोड़े ही दिनों में उन्हें सातों ऋद्धियाँ प्राप्त हो गयीं ।

अहा ! नाम मात्र ज्ञान द्वारा भी यम मुनिराज बड़े ज्ञानी हुए, उन्होंने अपनी उन्नति को अंतिम सीढ़ी तक पहुँचा दिया । इसलिये भव्य पुरुषों को संसार का हित करने वाले जिन भगवान के द्वारा उपदिष्ट सम्यग्ज्ञान की सदा आराधना करना चाहिये ।

देखो, यम मुनिराज को बहुत थोड़ा ज्ञान था, पर उसकी उन्होंने बड़ी भक्ति और श्रद्धा के साथ आराधना की । उसके प्रभाव से वे संसार में प्रसिद्ध हुए और सातों ऋद्धियाँ उन्हें प्राप्त हुईं । इसलिये सज्जन धर्मात्मा पुरुषों को उचित है कि वे त्रिलोकपूज्य जिन भगवान द्वारा उपदिष्ट, सब सुखों का देने वाला और मोक्ष-प्राप्ति का कारण अत्यंत पवित्र सम्यग्ज्ञान प्राप्त करने का यत्न करें ।


+ दृढ़सूर्य की कथा -
दृढ़सूर्य की कथा
लोका लोक के प्रकाश करने वाले, केवल ज्ञान द्वारा संसार के सब पदार्थों को जानकर उनका स्वरूप कहने वाले और देवेन्द्रादि द्वारा पूज्य श्रीजिनभगवान को नमस्कार कर मैं दृढ़सूर्य की कथा लिखता हूँ, जो कि जीवों को विशवास की देने वाली है ।

उज्जयिनी के राजा जिस समय धनपाल थे, उस समय की यह कथा है । धनपाल उस समय के राजाओं में एक प्रसिद्ध राजा थे । उनकी महारानी का नाम धनवती था । एक दिन धनवती अपनी सखियों के साथ वसन्त श्री देखने को उपवन में गयी । उसके गले में एक बहुत कीमती रत्नों का हार पड़ा हुआ था । उसे वहीं आयी हुई एक वसंत सेना नाम की वेश्या ने देखा । उसे देखकर उसका मन उसकी प्राप्ति के लिये आकुलित हो उठा । उसके बिना उसे अपना जीवन निष्फल जान पड़ा । वह दुःखी होकर अपने घर लौटी । सारे दिन वह उदास रही । जब रात के समय उसका प्रेमी दृढ़सूर्य आया तब उसने उसे उदास देखकर पूछा—प्रिये, कहो ! कहो ! जल्दी कहो !! तुम आज अप्रसन्न कैसी ? वसंतसेना ने उसे अपने लिये इस प्रकार खेदित देखकर कहा—आज मैं उपवन गयी हुई थी । वहाँ मैंने राजरानी के गले में एक हार देखा है । वह बहुत ही सुन्दर है । उसे आप लाकर दें तब ही मेरा जीवन रह सकता है और तब ही आप मेरे सच्चे प्रेमी हो सकते हैं ।

दृढ़सूर्य हार के लिये चला । वह सीधा राजमहल पहुँचा व भाग्य से हार उसके हाथ पड़ गया । वह उसे लिये हुए राजमहल से निकला । सच है लोभी; लंपटी कौन काम नहीं करते ? उसे निकलते ही पहरेदारों ने पकड़ लिया । सबेरा होने पर वह राजसभा में पहुँचाया गया । राजा ने उसे शूली की आज्ञा दी । वह शूली पर चढ़ाया गया । इसी समय धनदत्त नाम के एक सेठ दर्शन करने को जिनमन्दिर जा रहे थे दृढ़सूर्य ने उनके चेहरे और चाल-ढाल से उन्हें दयालु समझ कर उनसे कहा—सेठजी, आप बड़े जिनभक्त और दयावान हैं, इसलिये आपसे प्रार्थना है कि मैं इस समय बड़ा प्यासा हूँ, सो आप कहीं से थोड़ा सा जल लाकर मुझे पिला दें, तो आपका बड़ा उपकार हो । धनदत्त ने उसकी भलाई की इच्छा से कहा—भाई, मैं जल तो लाता हूँ, पर इस बीच तुम्हें एक बात करनी होगी । वह यह कि—मैंने कोई बारह वर्ष के कठिन परिश्रम द्वारा अपने गुरुमहाराज की कृपा से एक विद्या सीख पाई है, सो मैं तुम्हारे लिये जल लेने को जाते समय कदाचित उसे भूल जाऊँ तो उससे मेरा सब श्रम व्यर्थ जायगा और मुझे बहुत हानि भी उठानी पड़ेगी, इसलिये उसे मैं तुम्हें सौंप जाता हूँ । मैं जब जल लेकर आऊँ तब तुम मुझे पीछी लौटा देना । यह कहकर परोपकारी धनदत्त स्वर्ग-मोक्ष का सुख देनेवाला पंचनमस्कार मंत्र उसे सिखाकर आप जल लेने को चला गया । वह जल लेकर वापिस लौटा, इतने में दृढ़सूर्य की जान निकल गई, वह मर गया । पर वह मरा नमस्कार मंत्र का जाप करता हुआ । उसे सेठ के इस कहने पर पूर्ण विश्वास हो गया था कि वह विद्या महाफल के देने वाली है । नमस्कार मंत्र के प्रभाव से वह सौधर्मस्वर्ग में जाकर देव हुआ । सच है—पंच नमस्कारमंत्र के प्रभाव से मनुष्य को क्या प्राप्त नहीं होता ?

इसी समय किसी एक दुष्ट ने राजा से धनदत्त की शिकायत कर दी कि, महाराज धनदत्त ने चोर के साथ कुछ गुप्त मंत्रणा की है, इसलिये उसके घर में चोरी का धन होना चाहिये । नहीं तो एक चोर से बात-चीत करने का उसे क्या मतलब ? ऐसे दुष्टों को और उनके दुराचारों को धिक्कार है जो व्यर्थ ही दूसरों के प्राण लेने के यत्‍न में रहते हैं और परोपकार करने वाले सज्‍जनों को भी जो दुर्वचन कहते रहते हैं । राजा सुनते ही क्रोध के मारे आग बबूला हो गए । उन्‍होंने बिना कुछ सोचे विचारे धनदत को बाँध ले आने के लिये अपने नौकरों को भेजा । इसी समय अवधिज्ञान द्वारा यह हाल सौधर्मेन्‍द्र को, जो कि दृढ़सूर्य का जीव था, मालूम हो गया । अपने उपकारी को, कष्‍ट में फँसा देखकर यह उसी समय उज्‍जनियों में आया और स्‍वयं ही द्वार पाल बनकर उससे घर के दरवाजे पर पहरा देने लगा । जब राजनौकर धनदत्त को पकड़ने के लिये घर में घुस ने लगे तब देव ने उन्‍हें रोका । पर जब वे हठ करने लगे और जबरन घर में घुसने ही लगे तब देवने भी अपनी माया से उन सब को एक क्षणभर में धराशायी बना दिया। राजा ने यह हाल सुनकर और भी बहुत से अपने अच्‍छे–अच्‍छे शूरवीरों को भेजा, देव ने उन्‍हें भी देखते-देखते पृथ्‍वीपर लोटा दिया । इससे राजा का क्रोध अत्‍यन्‍त बढ़ गया । तब वे स्‍वयं अपनी सेना को लेकर धनदत्त पर आ चढ़े । पर उस एक ही देवने उनकी सारी सेना को तीन तेरह कर दिया । यह देखकर राजा भय के मारे भागने लगे । उन्‍हें भागते हुए देख कर देवने उनका पीछा किया और वह उन से बोला-आप कहीं नहीं भाग सकते । आपके जीने का एक मात्र उपाय है, वह यह कि आप धनदत्त के आश्रय जाँय और उससे अपने प्राणों की भीख माँगे । बिना ऐसा किये आपकी कुशल नहीं । सुनकर ही राजा धनदत्‍त के पास जिनमंदिर गये और उन्‍होंने सेठ से प्रार्थना की कि-धनदत्त, मेरी रक्षा करो । मुझे बचाओ । मैं तुम्‍हारे शरण में प्राप्‍त हूँ । सेठ ने देव को पीछे ही आया हुआ देखकर कहा-तुम कौन हो ? और क्‍यों हमारे महराज को कष्‍ट दे रहे हो ? देवने अपनी माया समेटी और सेठ को प्रमाण करके कहा-हे जिनभक्‍त सेठ, मैं वही पापी चोर का जीव हूँ, जिसे तुम ने नमस्‍कारमंत्र का उपदेश दिया था । उसी के प्रभाव से मैं सौधर्मस्‍वर्ग में महर्द्धि के देव हुआ हूँ । मैंने अवधिज्ञान द्वारा जब अपना पूर्वभवका हाल जाना तब मुझे ज्ञात हुआ कि इस समय मेरे उपकारीपर बड़ी आपत्ति आ रही है, इसलिये ऐसे समय में अपना कर्त्तव्‍य पूरा करने के लिये और आपकी रक्षा के लिये में आया हूँ । यह सब माया मुझ सेवक की ही हुई है । इस प्रकार सब हाल सेठ से कहकर और रत्‍नमय भूषणादि से उसका यथोचित सत्‍कार कर देव स्‍वर्ग में चला गया । जिनभक्‍त धनदत्त को परोपकार बुद्धि और दूसरों के दु:ख दूर करने का कर्त्तव्‍य परता देखकर राजा बगैरह ने उसका खूब आदर सम्‍मान किया । सच है-‘‘धार्मिक: कैर्न पूज्‍यते’’ अर्थात् धर्मात्‍मा का कौन सत्‍कार नहीं करता ?

राजा और प्रजा के लोग इस प्रकार नमस्‍कारमंत्र का प्रभाव देखकर बहुत खुश हुए और पवित्र जिनशासन में श्रद्धानी हुए । इसी तरह धर्मात्‍माओं को भी उचित है कि वे अपने आत्‍महित के लिये भक्तिपूर्वक जिनभगवान् द्वारा उपदिष्‍ट धर्म में अपनी बुद्धि को स्थिर करें ।


+ यमपाल चांडाल की कथा -
यमपाल चांडाल की कथा
मोक्ष सुख के देने वाले श्रीजिनभगवान् को धर्मप्राप्ति के लिये नमस्‍कार कर मैं एक ऐसे चाण्‍डाल की कथा लिखता हूँ, जिसकी कि देवों त‍क ने पूजा की है ।

काशी के राजा पाकशासन ने एक समय अपनी प्रजा को महामारी से पीड़ित देखकर ढिंढोरा पिटवा दिया कि ‘’नन्‍दीश्‍वरपर्व में आठ दिन पर्यन्‍त किसी जीव का वध न हो । इस राजाज्ञा का उल्‍लंघन करने वाला प्राणदंड का भागी होगा ।'' वहीं एक सेठ पुत्र रहता था । उसका नाम तो था धर्म, पर असल में वह महा अधर्मी था । वह सात व्‍यसनों का सेवन करने वाला था । उसे माँस खाने की बुरी आदत पड़ी हुई थी । एक दिन भी बिना माँस खाये उससे नहीं रहा जाता था । एक दिन वह गुप्‍तरीति से राजा के बगीचे में गया । वहाँ एक राजा का खास मेंढा बँधा करता था । उसने उसे मार डाला और उसके कच्‍चे ही मांस को खाकर वह उसकी हड्डियों को एक गड्डे में गाड़ गया । सच है-

व्‍यसनेन युती जीव: सत्‍सं पापपरो भवेत् । -ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्-व्‍यसनी मनुष्‍य नियम से पाप में सदा तत्‍पर रहा करते हैं । दूसरे दिन जब राजा ने बगीचे में मेंढा नहीं देखा और उसके लिये बहुत खोज करने पर भी जब उसका पता नहीं चला, तब उन्‍होंने उसका शोध लगाने को अपने बहुत से गुप्‍तचर नियुक्‍त किये । एक गुप्‍तचर राजा के बाग में भी चला गया । वहाँ का बागमाली रात को सोते समय सेठ पुत्र के द्वारा मेढे के मारे जाने का हाल अपनी स्‍त्री से कह रहा था, उसे गुप्‍तचर ने सुन लिया । सुनकर उसने महाराज से जाकर सब हाल कह दिया । राजा को इससे सेठ पुत्रपर बड़ागुस्‍सा आया । उन्‍होंने कोतवाल को बुलाकर आज्ञा की कि, पापी धर्म ने एक तो जीवहिंसा की मैं दूसरे राजाज्ञा का उल्‍लंघन किया है, इसलिये उसे ले जाकर शूली चढ़ा दो । कोतवाल राजाज्ञा के अनुसार धर्म को शूली के स्थान पर लिवा ले गया और नौकरों को भेजकर उसने यमपाल चाण्‍डाल को इसलिये बुलाया कि वह धर्म को शूली पर चढ़ा दे । क्‍योंकि यह कार्य उसके सुपुर्द था । पर यमपालने एक दिन सर्वोषधिऋद्धिधारी मुनिराज के द्वारा जिनधर्म का पवित्र उपदेश सुनकर, जो कि दोनों भवों में सुख को देने वाला है, प्रतिज्ञा कि थी कि ''मैं चतुर्दशी के दिन कभी जीवहिंसा नहीं करूंगा ।'' इसलिये उसने राज नौकरों को आते हुए देखकर अपने व्रतकी रक्षा के लिये अपनी स्‍त्री कहा-प्रिये, किसी को मारने के लिये मुझे बूलाने को राज-नौकर आ रहे है, सो तुम उनसे कह देना कि घर में वे नहीं हैं, दूसरे ग्राम गये हुए हैं। इस प्रकार वह चांडाल अपनी प्रिया को समझा कर घर के एक कोने में छुप रहा । जब राज-नौकर उसके घर पर आये और उनसे चांडालप्रिया ने अपने स्‍वामी के बाहर चले जाने का समाचार कहा, तब नौकरों ने बड़े खेदके साथ कहा-हाय ! वह बड़ाअभागा है। देवने उसे धोका दिया । आज ही तो एक सेठ पुत्र के मारने का मौका आया था और आज ही वह चल दिया ! यदि वह आज सेठ पुत्र को मारता तो उसे उसके सब वस्‍त्राभूषण प्राप्‍त होते । वस्‍त्राभूषणका नाम सुनते ही चाण्‍डालिनी के मुँह में पानी भर आया । वह अपने लोभ के सामने अपने स्‍वामी का हानि-लाभ कुछ नहीं सोच सकी । उसने रोने का ढोंग बनाकर और यह कहते हुए, कि हाय वे आज ही गाँव को चले गये, आती हुई लक्ष्‍मी को उन्‍होंने पाँव्से ठुकरा दी, हाथ के इशारे से घर के भीतर छुपे हुए अपने स्‍वामी को बता दिया । सच है-

स्‍त्रीणां स्‍वभावतो माया किं पुनर्लोभकारणे ।
प्रज्वलन्‍नपि दुर्वह्नि: किं वाते वाति दारूणे ।।
-ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्-स्त्रियाँ एक तो वैसे ही मायाविनी होती हैं, और फिर लोभादि का कारण मिल जाय तब तो उनकी माया का कहना ही क्‍या ? जलती हुई अग्नि वैसे ही भयानक होती है और यदि ऊपर से खूब हवा चल रही हो तब फिर उसकी भयानकता का क्‍या पूछना ?

यह देख राज-नौकरों ने उसे घर से बाहर निकाला । निकलते ही निर्भय होकर उसने कहा-आज चतुर्दशी है और मुझे आज अहिंसाव्रत है, इसलिये मैं किसी तरह, चाहे मेरे प्राण ही क्‍यों न जायें कभी हिंसा नहीं करूँगा । यह सुन नौकर लोग उसे राजा के पास लिवा ले गये । वहाँ भी उसने वैसा ही कहा । ठीक है-

यस्‍य धर्मे सुविश्‍वास: क्‍वापि भोतिं न याति स ।

अर्थात्-जिसका धर्म पर दृढ़ विश्‍वास है, उसे कहीं भी भय नहीं होता । राजा सेठ पुत्र के अपराध के कारण उसपर अत्‍यन्‍त गुस्‍सा हो ही रहे थे कि एक चाण्‍डाल की निर्भयपने की बातों ने उन्‍हें और भी अधिक क्रोधी बना दिया । एक चाण्‍डालको राजाज्ञा का उल्‍लंघन करने वाला और इतना अभिमानी देखकर उनके क्रोध का कुछ ठिकाना न रहा । उन्‍होंने उसी समय कोतवाल को आज्ञाकी कि जाओ, इन दोनों को ले जाकर अपने मगरमच्‍छादि क्रूर जीवों से भरे हुए तालाब में डाल आओ । वही हुआ । दोनों को कोतवाल ने तालाब में डलवा दिया । तालाबमें डालते ही पापी धर्म को तो जलजीवों ने खा लिया । रहा यमपाल, सो वह अपने जीवनकी कुछ परवा न कर अपने व्रतपालन में निश्‍चल बना रहा । उसके उच्‍च भावों और व्रत के प्रभाव से देवों ने आकर उसकी रक्षा की । उन्‍होंने धर्मानुराग से तालाब ही में एक सिंहासनपर यमपाल चाण्‍डाल को बैठाया, उसका अभिषेक किया और उसे खूब स्‍वर्गीय वस्‍त्राभूषण प्रदान किये, खूब उसका आदर सम्‍मान किया । जब राजा प्रजा को यह हाल सुन पड़ा, तो उन्‍होंने भी उस चाण्‍डाल का बड़े आनन्‍द और हर्ष के साथ सम्‍मान किया । उसे खूब धन दौलत दी । जिनधर्म का ऐसा अचिन्‍त्‍य प्रभाव देखकर और-और भव्‍य पुरूषों को उचित है कि वे स्‍वर्ग-मोक्ष का सुख देनेवाले जिनधर्म में अपनी बुद्धि को लगावें । स्‍वर्ग के देवों ने भी एक अत्‍यन्‍त नीच चाण्‍डाल का आदर किया, यह देखकर ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्‍यों को अपनी-अपनी जातिका कभी अभिमान नहीं करना चाहिये । क्‍योंकि पूजा जातिकी नहीं होती, किन्‍तु गुणोंकी होती है ।

यमपाल जाति का चाण्‍डाल था, पर उसके हृदय में जिनधर्म की पवित्र वासना थी, इसलिये देवोंने उसका सम्‍मान किया, उसे रत्‍नादिकों के अलंकार प्रदान किये; अच्‍छे-अच्‍छे वस्‍त्र दिये, उसपर फूलों की वर्षा की । यह जिनभगवान के उपदिष्‍ट धर्मका प्रभाव है, वे ही जिनेन्‍द्रदेव, जिन्‍हें कि स्‍वर्ग के देव भी पूजते हैं, मुझे मोक्ष श्री प्रदान करें । यह मेरी उनसे प्रार्थना है ।


+ मृगसेन धीवर की कथा -
मृगसेन धीवर की कथा
केवलज्ञान रूपी नेत्र के धारक श्री जिनेन्‍द्र भगवान् को भक्तिपूर्वक प्रणाम कर मैं अहिंसाव्रत का फल पाने वाले एक धीवर की कथा लिखता हूँ ।

सब सन्‍देहों को मिटाने वाली, प्रीति पूर्वक आराधना करने वाले प्राणियों के लिये सब प्रकार के सुखों को प्रदान करने वाली, जिनेन्‍द्र भगवान् की वाणी संसार में सदैव बनी रहे ।

संसार रूपी अथाह समुद्र से भव्‍य पुरूषों को पार कराने के लिये पुल के समान ज्ञान के सिन्‍धु मुनिराज निरन्‍तर मेरे हृदय में विराजमान रहें ।

इस प्रकार पंचपरमेष्‍ठी का स्‍मरण और मंगल करके कर्मरूपी शत्रुओं को नष्‍ट करने के लिये मैं अहिंसा व्रत की पवित्र कथा लिखता हूँ । जिस अहिंसा का नाम ही जीवों को अभय प्रदान करने वाला है, उसका पालन करना तो निस्‍सन्‍देह सुख का कारण है । अत: दयालु पुरूषों को मन, वचन और काय से संकल्‍पी हिंसा का परित्‍याग करना उचित है । बहुत से लोग अपने पितरों आदि की शान्ति के लिये श्राद्ध वगैरह में हिंसा करते हैं, बहुत से देवताओं को सन्‍तुष्‍ट करने के लिये उन्‍हें जीवों की बलि देते हैं और कितने ही महामारी, रोग आदि के मिट जाने के उद्देश्‍य से जीवों की हिंसा करते है; परन्‍तु यह हिंसा सुख के लिए न होकर दु:ख के लिये ही होती है । हिंसा द्वारा जो सुख की कल्‍पना करते हैं, यह उनका अज्ञान ही है । पाप कर्म कभी सुख का कारण हो ही नहीं सकता । सुख है अहिंसाव्रत के पालन करने में । भव्‍य जन ! मैं आपको भव भ्रमण का नाश करने वाला तथा अहिंसाव्रत का माहात्‍म्य प्रकट करने वाली एक कथा सुनाता हूँ; आप ध्यान से सुनें ।

अपनी उत्तम सम्‍पत्ति से स्‍वर्ग को नीचा दिखाने वाले सुरम्‍य अवन्ति देश के अन्‍तर्गत शिरीष नाम के एक छोटे से सुन्‍दर गाँव में मृगसेन नाम का एक धीवर रहा करता था । अपने कंधों पर एक बड़ाभारी जाल लटकाए हुए एक दिन वह मछलियाँ पकड़ने के लिये शिप्रा नदी की ओर जा रहा था । रास्‍ते में उसे यशोधर नामक मुनिराज के दर्शन हुए । उस समय अनेक राजा महाराजा आदि उनके पवित्र चरणों की पर्युपासना कर रहे थे, मुनिराज जैन सिद्धान्त के मूल रहस्‍य स्‍याद्वाद के बहुत अच्‍छे विद्वान् थे, जीवमात्र का उद्धार करने हेतु वे सदा कमर कसे तैयार रहते थे, जीवमात्र का उपकार करना ही एक मात्र उनका व्रत था, धर्मोपदेश रूपी अमृत से सारे संसार को उन्‍होंने सन्‍तुष्‍ट कर दिया था, अपने वचन रूपी प्रखर किरणों के तेज से उन्‍होंने मिथ्‍यात्‍व रूपी गाढ़ान्‍धकार को नष्‍ट कर दिया था, उनके पास वस्‍त्र वगैरह कुछ नहीं थें, किन्‍तु सम्‍यग्‍दर्शन, सम्‍यग्‍ज्ञान और सम्‍यक्‍चारित्र रूपी इन तीन मौलिक रत्‍नों से वे अवश्‍य अलंकृत थे । मुनिराज को देखते ही उसके कोई ऐसा पुण्‍य का उदय आया, जिससे उसके हृदय में कोमलता ने अधिकार कर लिया । अपने कंधे पर से जाल हटा कर वह मुनिराज के समीप पहुँचा, बहुत भक्तिपूर्वक उनके चरणों में प्रणाम कर उसने उनसे प्रार्थना की कि हे स्‍वामी ! कामरूपी हाथी को नष्‍ट करने वाले हे केसरी !! मुझे भी कोई ऐसा व्रत दीजिए, जिससे मेरा जीवन सफल हो । ऐसी प्रार्थना कर विनय-विनीत मस्‍तक से वह मुनिराज के चरणों में बैठ गया । मुनिराज ने उसकी ओर देखकर विचार किया कि देखो ! कैसे आज इस महाहिंसक के परिणाम कोमल हो गये हैं और इसकी मनोवृत्ति व्रत लेने की हुई है । सत्‍य है-

युक्तं स्‍यात्‍प्राणिनां भावि शुभाशुभनिभं मन: ।
--ब्रह्म नेमिदत्त
अर्थात्-आगे जैसा अच्‍छा या बुरा होना होता है, जीवों का मन भी उसी अनुसार पवित्र या अपवित्र बन जाता है, अर्थात् जिसका भविष्‍यत् अच्‍छा होता है, उसका मन पवित्र हो जाता है और जिसका बुरा होनहार होता है उसका मन भी बुरा हो जाता है । इसके बाद मुनिराज ने अवधिज्ञान द्वारा मृगसेन के भावी जीवन पर जब विचार किया तो उन्‍हें ज्ञान हुआ कि इसकी आयु अब बहुत कम रह गई है । यह देख उन्‍होंने करूणाबुद्धि से उसे समझाया कि हे भव्‍य ! मैं तुझे एक बात कहता हूँ, तू जब तक जीए तब तक उसका पालन करना । वह यह कि तेरे जाल में पहली बार जो मछली आये उसे तू छोड़ देना और इस तरह जब तक तेरे हाथ से मरे हुए जीव का मांस तुझे प्राप्‍त न हो, तब तक तू पाप से मुक्‍त ही रहेगा । इसके अतिरिक्‍त मैं तुझे पंचनमस्कार मंत्र सिखाता हूँ जो प्राणी मात्र का हित करनेवाला है, उसका तू सुख में, दु:ख में, सरोग या नीरोग अवस्‍था में सदैव ध्‍यान करते रहना । मूनिराज के स्‍वर्ग-मोक्ष के देने वाले इस प्रकार के वचनों को सुनकर मृगसेन बहुत प्रसन्‍न हुआ और उसने यह व्रत स्‍वीकार कर लिया । जो भक्तिपूर्वक अपने गुरूओं के वचनों को मानते हैं, उनपर विश्‍वास लाते हैं, उन्‍हें सब सुख मिलता है और वे परम्‍परा से मोक्ष भी प्राप्‍त करते है ।

व्रत लेकर मृगसेन नदी पर गया । उसने नदी में जाल डाला । भाग्‍य से एक बड़ाभारी मत्‍स्‍य उसके जालमें फँस गया । उसे देखकर धीवर ने विचारा-हाय ! मैं निरन्‍तर ही तो महापाप करता हूँ और आज गुरू महाराज ने मुझे व्रत दिया है, भाग्‍य से आज ही इतना बड़ामच्‍छ जाल में आ फँसा । पर जो कुछ ही, मैं तो इसे कभी नहीं मारूँगा । यह सोचकर व्रती मृगसेन ने अपने कपड़े की एक चिन्‍दी फाड़कर उस मत्‍स्‍य के कान में इसलिये बाँध दी कि यदि वही मच्‍छ दूसरी बार जाल में आजाय तो मालूम हो जाये । इसके बाद वह उसे बहुत दूर जाकर नदी में छोड़ आया । सच है, मृत्‍युपर्यन्‍त निर्विघ्न पालन किया हुआ व्रत सब प्रकार की उत्तम सम्‍पत्ति को देने वाला होता है ।

वह फिर दूसरी ओर जाकर मछलियाँ पकड़ने लगा । पर भाग्‍य से इस बार भी वही मच्‍छ उसके जाल में आया । उसने उसे फिर छोड़ दिया । इस तरह उसने जितनी बार जाल डाला, उसमें वही-वही मत्‍स्‍य आया पर उससे वह क्षुब्‍ध नहीं हुआ अपितु अपने व्रत की रक्षा के लिए खूब दृढ़ हो गया । उसे वहाँ इतना समय हो गया कि सूर्य भी अस्‍त हो चला, पर उसके जाल में उस मत्‍स्‍य को छोड़कर और कोई मत्‍स्‍य नहीं आया । अन्‍त में मृगसेन निरूपाय होकर घर की ओर लौट पड़ा । उसे अपने व्रत पर खूब श्रद्धा हो गई । वह रास्‍ते भर गुरू महाराज द्वारा सिखाए पंचनमस्‍कार मंत्र का स्‍मरण करता हुआ चला आया । जब वह अपने घर के दरवाजे पर पहुँचा तो उसकी स्‍त्री उसे खाली हाथ देखकर आग बबूला हो उठी उसने गुस्‍से से पूछा-रे मूर्ख घर पर खाली हाथ तो चला आया, पर बतला तो सही कि खायगा क्‍या पत्‍थर ? इतना कहकर वह घर के भीतर चली गई और गुस्‍से में उसने भीतर से किवाड़ बन्‍द कर लिए । सच है-छोटे कुल शील को स्त्रियों का अपने पति पर प्रेम, लाभ होते रहने पर ही अधिक होता है । अपनी स्‍त्रीका इस प्रकार दुर्व्‍यवहार देखकर बेचारा मृगसेन किंकर्त्तव्‍यविमूढ़ हो गया । उसकी कुछ नहीं चली । उसे घर के बाहर ही रह जाना पड़ा । बाहर एक पुराना बड़ाभारी लकड़ा पड़ा हुआ था । मगृसेन निरूपाय होकर पंचनमस्‍कार मंत्र का ध्‍यान करता हुआ उसी पर सो गया । दिन भर के श्रम के कारण रात में वह तो भर नींद में सोया हुआ था कि उस लकड़े में से एक भयंकर और जहरीले साँप ने निकल कर उसे काट खाया । वह तत्‍काल मृत्‍यु को प्राप्‍त हुआ ।

प्रात:काल होने पर जब उसकी पत्नी ने मृगसेन की यह दुर्दशा देखी तो उसके दु:ख का कोई ठिकाना नहीं रहा । वह रोने लगी, छाती कूटने लगी और अपने नीच कर्म का बार-बार पश्‍चात्ताप करने लगी । उसका दु:ख बढ़ता ही गया । उसने भी यह प्रतिज्ञा ली कि जो व्रत मेरे स्‍वामी ने ग्रहण किया था वही मैं भी ग्रहण करती हूँ और निदान किया कि ‘‘ ये ही मेरे अन्‍य जन्‍म में भी स्‍वामी हों ।” अनन्‍तर साहस करके वह भी अपने स्‍वामी के साथ अग्नि प्रवेश कर गई । इस प्रकार अपघात से उसने अपनी जान गँवा दी ।

विशाला नाम की नगरी में विश्‍वम्‍भर राजा राज्‍य करते थे । उनकी प्रिया का नाम विश्‍वगुणा था । वहीं एक सेठ रहते थे । गुणपाल उनका नाम था । उनकी स्‍त्री का नाम धनश्री था । धनश्री के सुबन्‍धु नाम की एक अतिशय सुन्‍दरी और गुणवती कन्‍या थी । पुण्‍योदय से मृगसेन धीवर का जीव धनश्री के गर्भ में आया ।

अपने नर्मधर्म नामक मंत्री के अत्‍यन्‍त आग्रह और प्रार्थना से राजा ने सेठ गुणपाल से आग्रह किया कि वह मंत्रीपुत्र नर्मधर्म के साथ अपनी पुत्री सुबन्‍धु का ब्‍याह कर दे । यह जानकर गुणपाल को बहुत दु:ख हुआ । उसके सामने एक अत्‍यन्‍त कठिन समस्‍या उत्‍पन्‍न हुई । उसने विचारा कि पापी राजा, मेरी प्‍यारी सुन्‍दरी सुबन्‍धु का, जो कि मेरे कुलरूपी बगीचे पर प्रकाश डालने वाली है, नीच कर्म करने वाले नर्मधर्म के साथ ब्‍याह कर देने को कहता है । उसने इस समय मुझे बड़ा संकट में डाल दिया । यदि सुबन्‍धु का नर्मधर्म के साथ ब्‍याह कर देता हूँ, तो मेरे कुल का क्षय होता है और साथ ही अपयश होता है और यदि नहीं करता हूँ, तो सर्वनाश होता है । राजा न जाने क्‍या करेगा ? आखिर उसने निश्‍चय किया जो कुछ हो, पर मैं ऐसे नीचों के हाथ तो कभी अपनी प्‍यारी पुत्री का जीवन नहीं सौपूंगा-उसकी जिन्‍दगी बरबाद नहीं करूँगा । इसके बाद वह अपने श्रीदत्त मित्र के पास गया और उससे सब हाल कह कर तथा उसकी सम्‍मति से अपनी गर्भिणी स्‍त्री को उसी के घर पर छोड़ कर आप रात के समय अपना कुछ धन और पुत्री को साथ लिये वहाँ गुपचुप से निकल खड़ा हुआ । वह धीरे-धीरे कौशाम्‍बी आ पहुँचा । सच है, दुर्जनों के सम्‍बन्‍ध से देश भी छोड़ देना पड़ता है ।

श्रीदत्त के घर के पास ही एक श्रावक रहता था । एक दिन उस के यहाँ पवित्र चारित्र के धारक शिवगुप्‍त और मुनिगुप्‍त नाम के दो मुनिराज आहार के लिये आये । उन्‍हें श्रावक महाशय ने अपने कल्‍याण की इच्‍छा से विधिपूर्वक आहार दिया, जो कि सर्वोत्तम सम्‍पत्ति की प्राप्ति का कारण है । मुनिराज को आहार देकर उसने बहुत पुण्‍य उत्‍पन्‍न किया, जो कि दु:ख दरिद्रता आदि का नाश करने वाला है । मुनिराज आहार के बाद जब वन में जाने लगे तब उनमें से मुनिगुप्‍तकी नजर धनश्री पर पड़ी, जो कि श्रीदत्त के आँगन में खड़ी हुई थी । उस समय उसकी दशा अच्‍छी नहीं थी । बेचारी पति और पुत्रों के वियोग से दु:खी थी, पराये घर पर रह कर अनेक दु:खों को सहती थी, आभूषण वगैरह सब उसने उतार डालकर शरीर को शोभाहीन बना डाला था, कुकवि की रचना के समान उसका सारा शरीर रूक्ष और श्रीहीन हो रहा था और इन सब दु:खों के होने पर भी वह गर्भिणी थी, इससे और अधिक दुर्व्‍यवस्‍था में वह फँसी थी । उसे इस हालत में देखकर मुनिगुप्‍त ने शिवगुप्‍त मुनिराज से कहा-प्रभो, देखिये तो इस बेचारी की कैसी दुर्दशा हो रही है, कैसे भयंकर कष्‍ट का इसे सामना करना पड़ा है ? जान पड़ता है इससे गर्भ में किसी अभागे जीव ने जन्‍म लिया है, इसी से इसकी यह दीन-हीन दशा हो रही है । सुनकर जैनसिद्धान्‍त के विद्वान् और अ‍वधिज्ञानी श्रीशिवगुप्‍त मुनि बोले-मुनिगुप्‍त, तुम यह न समझो कि इसके गर्भ में कोई अभागा आया है; किन्‍तु इतना अवश्‍य है कि इस समय उसकी अवस्‍था ठीक नहीं है और यह दु:खी है; परन्‍तु थोड़े ही दिनों के बाद इसके दिन फिरेंगे और पुण्‍य का उदय आवेगा । इसके यहाँ जिसका जन्‍म होगा, वह बड़ामहात्‍मा, जिनधर्म का पूर्ण भ‍क्‍त और राज सम्‍मान का पात्र होगा । होगा तो वह वैश्‍यवंश में पर उसका ब्‍याह इन्‍हीं विश्‍वंभर राजा की पुत्री के साथ होगा, राजवंश भी उसकी सेवा करेगा ।

मुनिराज की भविष्‍य वाणी पापी श्रीदत्त ने भी सुनी । वह था तो धनश्री के पति गुणपाल का मित्र, पर अपने एक जातीय बन्‍धु का उत्‍कर्ष होना उसे सहा नहीं हुआ । उसका पापी हृदय मत्‍सरता के द्वेष से अधीर हो उठा । उसने बालक को जन्‍मते ही मार डालने का निश्‍चय किया । अब से वह बाहर कहीं न जाकर बगुले की तरह सीधा साधा घर ही में रहने लगा । सच है-

कारणेन बिना वैरी दुर्जन: सुजनो भवेत्।
-ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्-दुर्जन-शत्रु बिना कारण के भी सुजन-मित्र बन जाया करते हैं । सो पहले तो श्रीदत्त बेचारी धनश्री को कष्‍ट दिया करता था और अब उसके साथ बड़ी सज्‍जनता का बर्ताव करने लगा । धनश्री सेठानी ने समय पाकर पुत्र को प्रसव किया । वास्‍तव में बालक बड़ा भाग्‍यशाली हुआ । वह उत्‍पन्‍न होते ही ऐसा तेजस्‍वी जान पड़ता था, मानो पुण्‍य समूह हो । धनश्री पुत्र की प्रसव वेदना से मूछित हो गई । उसे अचेत देखकर पापी श्रीदत्त ने अपने मन में सोचा-बालक प्रज्वलित अग्नि की तरह तेजस्‍वी है, अपने को आश्रय देने वाले का ही क्षय करने वाला होगा, इसलिये इसका जीता रहना ठीक नहीं । यह विचार कर उसने अपने घर की बड़ी बूढी़ स्त्रियों द्वारा यह प्रगट करवा कर, कि बालक मरा हुआ पैदा हुआ था, बालक को एक भंगी के हाथ सौंप दिया और उससे कह दिया कि इसे ले जाकर ही मार डालना । उचित तो यह था कि-
शत्रुजोपि न हन्‍तव्‍यो बालक किं पुनर्वृथा ।
हा कष्‍टं किं न कुर्वन्ति दुर्जना: फणिनो यथा।।
-ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्-शत्रु का भी यदि बच्‍चा हो, तो उसे नहीं मारना चाहिये, तब दूसरों के बच्‍चों के सम्‍बन्‍ध में तो क्‍या कहें ? परन्‍तु खेद है कि सर्प के समान दुष्‍ट पुरूष कोई भी बुरा काम करते नहीं हिचकते । चाण्‍डाल बच्‍चे को एकान्‍त में मारने को ले गया, पर जब उसने उजेले में उसे देखा तो उसकी सुन्‍दरता को देखकर उसे भी दया आ गई, करूणा से उसका हृदय भर आया । सो वह उसे न मारकर वहीं एक अच्छे स्‍थान पर रखरकर अपने घर चला गया ।

श्रीदत्त की एक बहिन थी । उसका ब्‍याह इन्‍द्रदत्त सेठ के साथ हुआ था । भाग्‍य से उसके सन्‍तान नहीं हुई थी । बालक के पूर्व पुण्‍य के उदय से इन्‍द्रदत्त माल बेचता हुआ इसी ओर आ निकला । जब वह गुवाल लोगों के मोहल्‍ले में आया तो उसने गुवालों को परस्‍पर बातें करते हुए सुना कि ‘’एक बहुत सुन्‍दर बालक को न जाने कोई अमुक स्‍थान की सिलापर लेटा गया है, वह बहुत तेजस्‍वी है, उसके चारों और अपनी गायों के बच्‍चे खेल रहे हैं और यह उनके बीच में बड़े सुख से खेल रहा है ।'' उनकी बातें सुनकर ही इन्‍द्रदत्त बालक के पास आया । वह एक दूसरे बाल सूर्य को देखकर बहुत ही प्रसन्‍न हुआ । उसके कोई सन्‍तान तो थी ही नहीं, इसलिये बच्‍चे को उठाकर वह अपने घर ले आया और अपनी प्रिया से बोला-प्‍यारी राधा ? तुम्‍हें इसकी खबर भी नहीं कि तुम्‍हारे गूढगर्भ से अपने कुल का प्रकाशक पुत्र हुआ है ? और देखो वह यह है । इसे ले लो और पा लो । आज अपना जीवन कृतार्थ हुआ । यह कह कर उसने बालक को अपनी प्रिया की गोद में रख दिया । बालक की खुशी के उपलक्ष में इन्‍द्रदत्त ने खूब उत्‍सव किया । खूब दान दिया । सच है-

प्राणिनां पूर्वपुण्‍यानामापदा सम्‍पदायते।–ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्-पुण्‍यवानों के लिये विपत्ति भी सम्‍पत्ति के रूप में परिणत हो जाती है । पापी श्रीदत्त को यह हाल मालूम हो गया । सो वह इन्‍द्रदत्त के घर आया और मायाचार से उसने अपने बहनोई से कहा-देखोजी, हमारा भानजा बड़ातेजस्‍वी है, बड़ाभाग्‍यवान् है, इसलिये उसे हम अपने घरपर ही रक्‍खेंगे । आप हमारी बहिन को भेज दीजिये । बेचारा इन्‍द्रदत्त उसके पपी हृदय की बात नहीं जान पाया । इसलिये उसने अपने सीधे स्‍वभाव से अपनी प्रिया को पुत्र सहित उसके साथ कर दिया । बहुत ठीक लिखा है-

अहो दुष्‍टाशय: प्राणी चित्तेडन्‍यद्वचनेडन्‍यथा ।
कायेनान्‍यत्‍करोत्‍येव परेषां वचन महत् ।।

अर्थात्-जिन लोगों का हृदय दुष्‍ट होता है, उनके चित्त में कुछ और रहता है, वचनों से वे कुछ और ही कहते और शरीर से कुछ और ही करते हैं । दूसरों को ठगना, उन्‍हें धोखा देना ही एक मात्र ऐसे पुरूषों का उद्देश्‍य रहता है । पापी श्रीदत्त भी एक ऐसा ही दुष्‍ट मनुष्‍य था । इसीलिए तो वह निरपराध बालक के खून का प्‍यासा हो उठा । उसने पहले की तरह फिर भी उसे मार डालने की इच्‍छा से चाण्‍डाल को बहुत कुछ लोभ देकर उसके हा‍थ सौंप दिया । चाण्‍डालने भी बालक को ले तो लिया पर जब उसने उसकी स्‍वर्गीय सुन्‍दरता देखी तो उसके हृदय में भी दया देवी आ विराजी । उसने मन ही मन निश्‍चय कर लिया कि कुछ हो, मैं कभी इस बच्‍चे को न मारूँगा और इसे बचाऊँगा । वह अपना विचार श्रीदत्त से नहीं कहकर बच्‍चे को लिवा ले गया । कारण श्रीदत्त की पाप वासना उसे कभी जिन्‍दा रहने न देगी, यह उसे उसकी बातचीत से मालूम हो गया था । चाण्‍डाल बच्‍चे को एक नदी के किनारे पर लिवा ले गया । वही एक सुन्‍दर गुहा थी, जिसके चारों ओर वृक्ष थे । वह बालक को उस गुहा में रखकर अपने घरपर लौट आया ।

संध्या का समय था । गुवाल लोग अपनी-अपनी गायों का घर पर लौटाये ला रहे थे । उनमें से कुछ गायें इस गुहा की ओर आ गई थीं, जहाँ गुणपाल का पुत्र अपने पूर्वपुण्‍य के उदय से रक्षा पा रहा था । धाय के समान उन गायों ने आकर उस बच्‍चे को घेर लिया । मानों बच्‍चा प्रेम से अपनी माँ की ही गोद में बैठा हो । बच्‍चे को देखकर गायों के थनों में से दूध झरने लग गया । गुवाल लोग प्रसन्‍नमुख बच्‍चे को गायों से घिरा हुआ और निर्भय खेलता हुआ देखकर बहुत आश्‍चर्य करने लगे । उन्‍होंने जाकर अपनी जाति के मुखिया गोविन्‍द से यह सब हाल कह सुनाया । गोविन्‍द के कोई संतान नहीं थी, इसलिये वह दौड़ा गया और बालक को उठा लाकर उसने अपनी सुनन्‍दा नाम को प्रियाको सौंप दिया । उसका नाम उसने धनकीर्ति रखा । वहीं पर बड़े यत्‍न और प्रेम से उसका पालन व संरक्षण होने लगा । धनकीर्ति भी दिनों दिन बढ़ने लगा । वह ग्‍वालमहिलाओं के नेत्ररूपी कुमुद पुष्‍पों को प्रफुल्लित करने वाला चन्‍द्रमा था । उसे देखकर उनके नेत्रों को बड़ी शान्ति मिलती थी । वह सब सामुद्रिक लक्षणों से युक्‍त था । उसे देखकर सबको बड़ाप्रेम होता था । वह अपनी रूप मधुरिमा से कामदेव जान पड़ता था, कान्ति से चन्‍द्रमा और तेज से एक दूसरा सूर्य । जैसे-जैसे उसकी सुन्‍दरता बढ़ती जाती थी, वैसे-वैसे ही उसमें अनेक उत्तम-उत्तम गुण भी स्‍थान पाते चले जाते थे ।

ए‍क दिन पापी श्रीदत्त घी को खरीद करता हुआ इधर आ गया । उसने धनकीर्ति को देखकर पहिचान लिया । अपना सन्‍देह मिटाने को और भी दूसरे लोगों से उसने उसका हाल दर्याफ्त किया । उसे निश्‍चय हो गया कि यह गुण्‍पाल ही का पुत्र है । तब उसने फिर उसके मारने का षड्यंत्र रचा । उसने गोविन्‍द से कहा-भाई, मेरा एक बहुत जरूरी काम है, यदि तुम अपने पुत्र द्वारा उसे करा दो तो बड़ी कृपा हो । मैं अपने घरपर भेजने के लिये एक पत्र लिखे देता हूँ, उसे यह पहुँचा आवे । बेचारे गोविन्‍द ने कह दिया कि मुझे आपके काम से कोई इंकार नहीं है । आप लिख दीजिये, यह उसे दे आयगा । सच बात है-
अहो दुष्‍टस्‍य दुष्‍टत्‍वं लक्ष्‍यते केन वेगत: ।
-ब्रह्म नेमिदत्त

अर्थात्-दुष्‍टों की दुष्‍टता का पता जल्‍दी से कोई नहीं पा सकता। पापी श्रीदत्त ने पत्र में लिखा-
‘‘पुत्र महाबल,
जो तुम्‍हारे पास पत्र लेकर आ रहा है, वह अपने कुल का नाश करने के लिये भयंकरता से जलता हुआ मानो प्रलय काल की अग्नि है, समर्थ होते ही यह अपना सर्वनाश कर देगा । इसलिये तुम्‍हें उचित है कि इसे गुप्‍तरीति से तलवार द्वारा वा मूसले से मार डालकर अपना कांटा साफ कर दो । काम बड़ी सावधानी से हो, जिसे कोई जान न पावे ।''

पत्र को अच्‍छी तरह बन्‍द कर के उसने कुमार धनकीर्ति को सौंप दिया । धनकीर्ति ने उसे अपने गले में पड़े हुए हार से बाँध लिया और सेठ की आज्ञा लेकर उसी समय वह वहाँ से निडर होकर चल दिया । वह धीरे-धीरे उज्‍जयिनी के उपवन में आ पहुँचा । रास्‍ते में चलते-चलते वह थक गया था । इसलिये थकावट मिटाने के लिये वह वहीं एक वृक्ष की ठंडी छाया में सो गया । उसे वहाँ नींद आ गई ।

इतने ही में वहाँ एक अनंगसेना नाम की वैश्‍या फूल तोड़ने के लिये आई । वह बहुत सुन्‍दरी थी । अनेक तरह के मौलिक भूषण और वस्‍त्र वह पहरे थी । उससे उसकी सुन्‍दरता भी बेहद बढ़ गई थी । वह अनेक विद्या, कलाओं को जानने वाली और बड़ी विनोदिनी थी । उसने धनकीर्ति को एक वृक्ष के नीचे सोता देख पूर्वजन्‍म में अपना उपकार करने के कारण से उस पर उसका बहुत प्रेम हुआ । उसके वश होकर ही उसे न जाने क्‍या बुद्धि उत्‍पन्‍न हुई जो उसने उसके गले में बँधे हुए श्रीदत्त के कागज को खोल लिया । पर जब उसने उसे बाँचा तो उसके आश्‍चर्य का कुछ ठिकाना न रहा । एक निर्दोष कुमार के लिये श्रीदत्त का ऐसा घोर पैशाचिक अत्‍याचार का हाल पढ़कर उसका हृदय काँप उठा । वह उसकी रक्षा के लिये घबरा उठी । वह भी थी बड़ी बुद्धिमती सो उसे झट एक युक्ति सूझ गई । उसने उस लिखावट को बड़ी सावधानी से मिटाकर उसकी जगह अपनी आँखों में अंजे हुए काजल को पत्तों के रस से गीली की हुई सलाई से निकाल-निकाल कर उसके द्वारा लिख दिया कि --

''प्रिये! यदि तुम मुझे सच्‍चा अपना स्‍वामी समझती हो, और पुत्र महाबल ! तुम यदि वास्तव में मुझे अपना पिता समझते हो तो इस पत्र लाने वाले के साथ श्रीमती का ब्याह शीघ्र कर देना । अपने को बड़े भाग्य से ऐसे वर की प्राप्ति हुर्इ है । मैंने इसकी साखें वगैरह सब अच्छे तरह देख ली है । कहीं कोर्इ बाधा नहीं आती है । इस काम के लिए तुम मेरी भी अपेक्षा नहीं करना । कारण, सम्भव है मुझे आने में कुछ विलम्ब हो जाय । फिर ऐसा योग मिलना कठिन है । वर के मान सम्मान में तुम लोग किसी प्रकार की कमी मत रखना ।

इस प्रकार पत्र लिखकर अनंगसेना ने पहले की तरह उसे धनकीर्ति के गले में बाँध दिया अथवा यों कह लीजिए कि उसने धनकीर्ति को मानो जीवन प्रदान किया । इस के बाद वह अपने घर पर लौट आर्इ ।

अनंगसेना के चले जाने के बाद धनकीर्ति की भी नींद खुली वह उठा और श्रीदत्त के घर पहुँचा । उसने पत्र निकाल कर श्रीदत्त की स्त्री के हाथ में सौंपा । पत्र को उसके पुत्र महाबल ने भी पढ़ा । पत्र पड़कर उन्हें बहुत खुशी हुर्इ । धनकीर्ति का उन्होने बहुत आदर-सम्मान किया तथा शुभ मुहुर्त में श्रीमती का व्याह उसके साथ कर दिया । सच कहा है --
सम्भवेत्कृतपुण्यानांमहापायेपिसत्सुखम् ।
--ब्रह्मनेमिदत्त

अर्थात---पुण्यवान जीवों को महासंकट के समय भी जीवन के नष्ट होने के कारणों के मिलने पर भी सुख प्राप्त होता है । यह हाल जब श्रीदत्त को ज्ञात हुआ तो वह घबराकर उसी समय दौड़ा हुआ आया । उसने रास्ते में ही धनकीर्ति को मार डालने की युक्ति सोचकर अपनी नगरी के बाहर पार्वती के मन्दिर में एक मनुष्य को इसलिए नियुक्त कर दिया कि मैं किसी बहाने से धनकीर्ति को रात के समय यहाँ भेजूँगा सो उसे तुम मार डालना । इसके बाद वह अपने घर पर आया और एकान्त में अपने जमार्इ को बुलाकर उसने कहा -- देखोजी, मेरी कुल परम्परा में एक रीति चली आ रही है, उसका पालन तुम्हें भी करना होगा । वह यह है कि नवविवाहित वर रात्रि के आरम्भ में उड़द के आटे के बनाए हुए तोता काक मुर्गा आदि जानवरों को लाल वस्त्र से ढककर और कंकण पहने हुए हाथ में रखकर बड़े आदर के साथ शहर के बाहर पार्वती के मन्दिर में ले जाय और शान्ति के लिए उनकी बली दे ।

यह सुनकर धनकीर्ति बोला – जैसे आपकी आज्ञा ! मुझे शिरोधार्य है । इसके बाद वह बलि लेकर घर से निकला । शहर के बाहर पहुँचते ही उसे उसका साला महाबल मिला । महाबल ने उससे पूछा क्यों जी ! ऐसे अन्धकार में अकेले कहाँ जा रहे हो उत्तर में धनकीर्ति ने कहा आपके पिताजी की आज्ञा से मैं पार्वती जी के मन्दिर में बलि देने के लिए जा रहा हूँ । यह सुनकर महाबल बोला -- आप बलि मुझे दे दीजिए मैं चला जाता हूँ । आपके वहाँ जाने की कोर्इ आवश्यकता नहीं है । आप घर पधारिए । धनकीर्ति ने कहा -- देखिए, इससे आपके पिताजी बुरा मानेंगे इसलिए आप मुझे ही जाने दीजिए । महाबल ने कहा -- नहीं, मुझे बलि देने की सब विधि वगैरह मालूम है, इसलिए मैं ही जाता हूँ यह कहकर उसने धनकीर्ति को तो घर लौटा दिया और आप दुर्गा के मन्दिर आकर काल के घर का पाहुना बना । सचहै --
पुण्यवानों के लिए काल रूपी अग्नि जल हो जाती है, समुद्र स्थल हो जाता है, शत्रु मित्र बन जाता है, विष अमृत के रूप में परिणत हो जाता है, विपत्ति सम्पत्ति हो जाती है और विघ्न डर के मारे नष्ट हो जाते हैं । इसलिए बुद्धिमानों को सदा पुण्य कर्म करते रहना चाहिए । पुण्य उत्पन्न करने के कारण ये हैं – भक्ति से भगवान की पूजा करना, पात्रों को दान देना, व्रत पालना, उपवासादि के द्वारा इंद्रियो को जीतना, ब्रह्मचर्य रखना, दुखियों की सहायता करना, विद्या पढ़ाना, पाठशाला खोलना अर्थात अपने से जहाँ तक बन पड़े तन से, मन से और धन से दूसरों की भलार्इ करना ।

अपने पुत्र के मारे जाने की जब श्रीदत्त को खबर हुर्इ तब वह बहुत दुखी हुआ । पर फिर भी उसे सन्तोष नहीं हुआ । उसका ह्रदय अब प्रतिहिंसा से और अधिक जल उठा । उसने अपनी स्त्री को एकान्त में बुलाकर कहा -- प्रिये, बतलाओ तो हमारे कुल रूपी वृक्ष को जड़ मूल से उखाड़ फेंकने वाले इस दुष्ट की हत्या कैसे हो ? कैसे यह मारा जा सके ? मैंने इस के मारने को जितने उपाय किये, भाग्य से वे सब व्यर्थ गये और उलटा उनसे मुझे ही अत्यन्त हानि उठानी पड़ी । सो मेरी बुद्धि तो बड़े असमंजस में फँस गर्इ है । देखो कैसे अचंभे की बात है जो इसके मारने के लिए जितने उपाय किये, उन सब से रक्षा पाकर और अपना ही बैरी बना हुआ यह अपने घर में बैठा है ।

श्रीदत्त की स्त्री ने कहा – बात यह है कि अब आप बूढे हो गये । आपकी बुद्धि अब काम नहीं देती । अब जरा चुप होकर बैठे रहें मैं आपकी इच्छा बहुत जल्दी पूरी करूँगी । यह कहकर उस पापिनी ने दूसरे दिन विष मिले हुए कुछ लडडू बनाये और अपनी पुत्री से कहा –बेटी श्रीमती, देख मैं तो अब स्नान करने को जाती हूँ और तू इतना ध्यान रखना कि ये जो उजले लड्डू हैं; उन्हें तो अपने स्वामी को परोसना और जो मैले हैं, उन्हें अपने पिता को परोसना । यह कहकर श्रीमती की माँ नहाने को चली गर्इ । श्रीमती अपने पिता और पति को भोजन कराने को बैठी । बेचारी श्रीमती भोलीभाली लड़की थी और न उसे अपनी माता का कूट-कपट ही मालूम था । इसलिए उसने अच्छे लड्डू अपने पिता के लिए ही परोसना उचित समझा, जिससे कि उसके पिता को अपने सामने श्रीमती का बरताव बुरा न जान पड़े और यही एक कुलीन कन्या के लिए उचित भी था । क्योंकि अपने माता पिता या बड़ों के सामने ऐसा बेहयापन का काम अच्छी स्त्रियाँ नही करतीं । इसलिये जो लड्डू उसके पति के लिए उसकी माँ ने बनाये थे, उन्हें उसने पिता की थाली मे परोस दिया । सच है --‘‘विचित्राकर्मणांगति:’’ अर्थात् कर्मों की गति विचित्र ही हुआ करती है ।

विष मिले हुए लड्डुओं के खाते ही श्रीदत्त ने अपने किए कर्म का उपयुक्त प्रायश्चित पा लिया, वह तत्काल मृत्यु को प्राप्त हुआ । ठीक ही कहा है कि पाप कर्म करने वालों का कभी कल्याण नहीं होता ।
श्रीमती की माँ जब नहाकर लौटी और उसने स्वामी को इस प्रकार मरा पाया तो उसके दु:ख का कोर्इ पार नहीं रहा । वह बहुत विलाप करने लगी – परन्तु अब क्या हो सकता था ! जो दुसरों के लिए कुआँ खेादते हैं, उसमें पहले वे स्वयं ही गिरते हैं, यह संसार का नियम है । श्रीमती की माँ और पिता इसके उदाहरण हैं । इसलिए जो अपना बुरा नहीं चाहते उन्हें दूसरों का बुरा करने का कभी स्वप्न में भी विचार नहीं करना चाहिए । अन्त में श्रीमती की माता ने अपनी पुत्री से कहा – हे पुत्री ! तेरे पिता ने और मैनें निर्दय होकर अपने हाथों ही अपने कुल का सर्वनाश किया । हमने दूसरे का अनिष्ट करने के जितने प्रयत्न किए वे सब व्यर्थ गए और अपने नीच कर्मों का फल भी हमें हाथोंहाथ मिल गया । अब जो तेरे पिताजी की गति हुर्इ, वही मेरे लिए भी इष्ट है । अन्त में मैं तुझे आशीर्वाद देती हूँ कि तू और तेरे पति इस घर में सुख शान्ति से रहें जैसे इन्द्र अपनी प्रिया के साथ रहता है । इतना कहकर उसने भी जहर के लड्डुओं को खा लिया । देखते-देखते उसकी आत्मा भी शरीर को छोड़कर चली गर्इ । ठीक है- दुर्बुद्धियों की ऐसी ही गति हुआ करती है । जो लोग दुष्ट हृदय बनकर दुसरों का बुरा सोचते हैं, उनका बुरा करते हैं, वे स्वयं अपना बुरा कर अन्त में कुगतियों में जाकर अनन्त दुःख उठाते हैं । इस प्रकार धनकीर्ति पुण्य के प्रभाव से अनेक बड़ी-बड़ी आपत्तियों से भी सुरक्षित रहकर सुख पूर्वक जीवनयापन करने लगा ।

जब महाराज विश्वम्भर को धनकीर्ति के पुण्य, उसकी प्रतिष्ठा तथा गुणशालीनता का परिचय मिला तो वे उससे बहुत खुश हुए और उन्होंने अपनी राजकुमारी का विवाह भी शुभ दिन देखकर बड़े ठाटबाट सहित उसके साथ कर दिया । धनकीर्ति को उन्होंने दहेज में बहुत धन सम्पन्ति दी, उसका खूब सम्मान किया तथा ‘राज्य’ सेठ के पद भी उसे प्रतिष्ठित किया । इस पर किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि संसार में ऐसी कोर्इ शुभ वस्तु नहीं जो जिनधर्म के प्रभाव से प्राप्त न होती हो ।

गुणपाल को जब अपने पुत्र का हाल ज्ञात हुआ तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुर्इ । वह उसी समय कौशाम्बी से उज्जयिनी के लिए चला और बहुत शीघ्र अपने पुत्र से आ मिला । सबका फिर पुण्य मिलाप हुआ । धनकीर्ति पुण्योदय से प्राप्त हुए भोगों को भोगता हुआ अपना समय सुख से बिताने लगा । इस से कोर्इ यह न समझ ले कि वह अब दिनरात विषयभोगों में ही फँसा रहता है, नहीं उसका अपने आत्म कल्याण की ओर भी पूरा ध्यान है । वह बड़ी सावधानी के साथ सुख देने वाले जिनधर्म की सेवा करता है, भगवान की प्रतिदिन पूजा करता है, पात्रों को दान देता है, दुखी अनाथों की सहायता करता है, और सदा स्वाध्यायाध्ययन करता है । मतलब यह कि धर्म-सेवा और परोपकार करना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य हो गया है । पुण्य के उदय से जो प्राप्त होना चाहिए वह सब धनकीर्ति को इस समय प्राप्त है । इस प्रकार धनकीर्ति ने बहुत दिनों तक खूब सुख भोगा और सब को प्रसन्न रखने की वह सदा चेष्टा करता रहा ।

एक दिन धनकीर्ति का पिता गुणपाल सेठ अपनी स्त्री पुत्र मित्र बन्धु बान्धव को साथ लिए यशोध्वज मुनिराज को वन्दना करने को गया । भाग्य से अनंगसेना भी इस समय पहुँच गर्इ । संसार का उपकार करने वाले उन मुनिराज की सभी ने बड़ी भक्ति के साथ वन्दना की । इसके बाद गुणपाल ने मुनिराज से पूछा – प्रभो, कृपाकर बतलाइए कि मेरे इस धनकीर्ति पुत्र ने ऐसा कौन महापुण्य पूर्वजन्म में किया है, जिससे इसने इस बाल्पन में ही भयंकर से भयंकर कष्टों पर विजय प्राप्त कर बहुत कीर्ति कमार्इ, खूब धन कमाया और अच्छे-अच्छे पवित्र काम किये, सुख भोगा और यह बड़ा ज्ञानी हुआ, दानी हुआ तथा दयालु हुआ । भगवन, इन सब बातों को मैं सुनना चाहता हूँ ।
करूणा के समुद्र और चार ज्ञान के धारी यशोध्वज मुनिराज ने मृगसेन धीवर के अहिंसाव्रत ग्रहण करने, जाल में एक ही एक मच्छ के बारबार आने, घर पर सूने हाथ लौट आने, स्त्री के नाराज हो कर घर में न आने देने आदि की सब कथा गुणपाल से कहकर कहा – वह मृगसेन जो अहिंसा व्रत के प्रभाव से यह धनकीर्ति हुआ, जो कि सर्वश्रेष्ठ सम्पत्ति का मालिक और महाभव्य है; और मृगसेन की जो घण्टा नाम की स्त्री थी, वह निदान करके इस जन्म में भी धनकीर्ति की श्रीमती नाम की गुणवती स्त्री हुई है और जो मच्छ पाँच बार पकड़ कर छोड दिया गया था, वह यह अनंगसेना हुर्इ, जिसने कि धनकीर्ति को जीवनदान देकर अत्यन्त उपकार किया है, सेठ महाशय यह सब एक अहिंसाव्रत के धारण करने का फल है । और परम अहिंसामयी जिनधर्म के प्रसाद से सज्जनों को क्या प्राप्त नहीं होता ! मुनिराज के द्वारा इस सुखदायी कथा को सुनकर सब ही बहुत प्रसन्न हुए । जिनधर्म पर उनकी गाढ़ श्रद्धा हो गर्इ । अपने पूर्वभव का हाल सुनकर धनकीर्ति श्रीमती और अनंगसेना को जातिस्मरण हो गया । उससे उन्हें संसार की क्षणस्थायी दशा पर बड़ा वैराग्य हुआ । धर्मा-धर्म का फल भी उन्हें जान पड़ा । उनमें धनकीर्ति ने तो, जिसका कि सुयश सारे संसार में विस्तृत है, यशोध्वज मुनिराज के पास ही एक दूसरे मोहपाश की तरह जान पड़नेवाले अपने केश कलाप को हाथों से उखाड़कर जिनदीक्षा ग्रहण कर ली जो कि संसार के जीवों का उद्धार करने वाली है । साधु हो जाने के बाद धनकीर्ति ने खूब निर्दोष तपस्या की, अनेक जीवों को कल्याण के मार्ग पर लगाया, जिनधर्म की प्रभावना की, पवित्र रत्नत्रय प्राप्त किया और अन्त में समाधि सहित मरकर सवार्थसिद्धि का श्रेष्ठ सुखलाभ किया । धनकीर्ति आगे केवली होकर मुक्ति प्राप्त करेगा । और ऋषियों ने भी अहिंसाव्रत का फल लिखते समय धनकीर्ति की प्रशंसा में लिखा है – धनकीर्ति ने पूर्वभव में एक मच्छ को पाँच बार छोड़ा था उसके फल से वह स्वर्गीय श्री का स्वामी हुआ । इसलिए आत्महित की इच्छा करनेवालों को यह व्रत मन, वचन, काय की पवित्रता पूर्वक निरन्तर पालते रहना चाहिए ।

धनकीर्ति को दीक्षित हुआ देखकर श्रीमती और अनंगसेना ने भी ह्रदय से विषय वासना को दूरकर अपने योग्य जिनदीक्षा ग्रहण कर ली जो कि सब दु:खों का नाश करनेवाली है । इसके बाद अपनी शक्ति के अनुसार तपस्या कर उन दोनों ने भी मृत्यु के अन्त में स्वर्ग प्राप्त किया । सच है -- जिनशासन की आराधना कर किसकिस ने सुख प्राप्त न किया ! अर्थात जिसने जिनधर्म ग्रहण किया उसे नियम से सुख मिला है ।

इसप्रकार मुझ अल्पबुद्धि ने धर्मप्रेम के वश हो यह अहिंसाव्रत की पवित्रकथा जैनशास्त्र के अनुसार लिखी है । यह सब सुखों की देने वाली माता है और विघ्नों को नाश करने वाली है । इसे आप लोग ह्रदय में धारण करें । वह इसलिए कि इसके द्वारा आपको शान्ति प्राप्त होगी ।

मूलसंघ के प्रधान प्रवर्तक श्रीकुन्दकुन्दाचार्य की परम्परा में मल्लिभूषण गुरू हुए । वे ज्ञान के समुद्र थे । उनके शिष्य श्रीसिंहनन्दीमुनि हुए । वे बड़े आध्यात्मिक विद्वान् थे । उन्हें अच्छे-अच्छे परमार्थवित्-अध्यात्म शास्त्र के जानकार विद्वान नमस्कार करते थे । वे सिंहनन्दी मुनि आप के लिए संसार-समुद्र से पार करने वाले होकर संसार में चिरकाल तक बढ़ें । उनका यश शरीर बहुत समय तक प्रकाशित रहे ।


+ वसुराजाकीकथा -
वसुराजाकीकथा
संसार के बन्धु और देवों द्वारा पूज्य श्रीजिनेन्द्र को नमस्कार कर झूठ बोलने से नष्ट होने वाले वसुराजा का चरित्र मैं लिखाता हूँ ।

स्वस्तिकावती नाम की एक सुन्दर नगरी थी । उसके राजा का नाम विश्वावसु था । विश्वावसु की रानी श्रीमती थी । उसके एक वसु नाम का पुत्र था । वही एक क्षीरकदम्ब उपाध्याय रहता था । वह बड़ा सुचरित्र और सरल स्वभावी था । जिनभगवान का वह भक्त था और होम, शान्ति-विधान आदि जैन क्रियाओं द्वारा गृहस्थों के लिए शान्ति-सुखार्थ अनुष्ठान करना उसका काम था । उसकी स्त्री का नाम स्वस्तिमती था । उसके पर्वत नाम का एक पुत्र था । भाग्य से वह पापी और दुर्व्यसनी हुआ । कर्मों की कैसी विचित्र स्थिति है जो पिता तो कितना धर्मात्मा और सरल, और उसका पुत्र दुराचारी । इसी समय एक विदेशी ब्राह्मण नारद, जो कि निरभिमानी और सच्चा जिनभक्त था, क्षीरकदम्ब के पास पढने के लिए आया । राजकुमार वसु, पर्वत और नारद ये तीनों साथ पड़ने लगे ।

वसु और नारद की बुद्धि अच्छी थी, सो वे तो थोड़े ही समय में अच्छे विद्वान हो गये । रहा पर्वत सो एक तो उसकी बुद्धि ही खराब, उस पर पाप के उदय से उसे कुछ नहीं आता जाता था । अपने पुत्र की यह हालत देखकर उसको माता ने एक दिन अपने पति से गुस्सा होकर कहा – जान पड़ता है, आप बाहर के लड़कों को तो अच्छी तरह पढ़ाते हैं और खास अपने पुत्र पर आपका ध्यान नहीं है, उसे आप अच्छी तरह नहीं पढ़ाते । इसीलिए उसे इतने दिन तक पढते रहने पर भी कुछ नहीं आया । क्षीरकदम्ब ने कहा -- इस में मेरा कुछ दोष नहीं है, मैं तो सब के साथ एक ही सा श्रम करता हूँ । तुम्हारा पुत्र ही मूर्ख है, पापी है, वह कुछ समझता ही नहीं । बोलो, अब इस के लिए मैं क्या करूँ ? स्वस्तिमती को इस बात पर विश्वास हो, इसलिए उसने तीनों शिष्यों को बुलाकर कहा -- पुत्रो, देखो तुम्हें यह एक-एक पार्इ दी जाती है, इसे लेकर तुम बाजार जाओ; और अपने बुद्धिबल से इसके द्वारा चने लेकर खा आओ और पार्इ पीछी वापिस भी लौटा लाओ । तीनों गये । उनमें पर्वत एक जगह से चने मोल लेकर और वहीं खा पीकर सूने हाथ घर लौट आया । अब रहे वसु और नारद, सो इन्होंने पहले तो चने मोल लिये और फिर उन्हें इधर-उधर घूमकर बेचा, जब उनकी पार्इ वसूल हो गर्इ तब बाकी बचे चनों को खाकर वे आये । आकर उन्होंने गुरूजी की अमानत उन्हें वापिस सौंप दी । इसके बाद क्षीरकदम्ब ने एक दिन तीनों को आटे के बने हुए तीन बकरे देकर उनसे कहा -- देखो, इन्हें ले जाकर और जहाँ कोर्इ न देख पाये ऐसे एकान्त स्थान में इनके कानों को छेद लाओ । गुरू की आज्ञानुसार तीनों फिर इस नये काम के लिए गये । पर्वत ने तो एक जंगल में जाकर बकरे का कान छेद डाला । वसु और नारद बहुत जगह गये सर्वत्र उन्होंने एकान्त स्थान ढूँढ डाला, पर उन्हें कहीं उनके मन लायक स्थान नहीं मिला । अथवा यों कहिए कि उनके विचारानुसार एकान्त स्थान कोर्इ था ही नहीं वे जहाँ पहुँचते और मन में विचार करते वहीं उन्हें चन्द्र, सूर्य, तारा, देव, व्यन्तर, पशु, पक्षी और अवधिज्ञानी मुनि आदि जान पड़ते । वे उस समय यह विचार कर कि ऐसा कोर्इ स्थान ही नहीं है, जहाँ कोर्इ न देखता हो, वापिस घर लौट आये । उन्होंने उन बकरों के कानों को नहीं छेदा आकर उन्होनें गुरूजी को नमस्कार किया और अपना सब हाल उन से कह सुनाया सच है बुद्धि कर्म के अनुसार ही हुआ करती है । उनकी बुद्धि की इस प्रकार चतुरता देखकर उपाध्याय जी ने अपनी प्रिया से कहा -- क्यों ! देखी सबकी बुद्धि और चतुरता ? अब कहो, दोष मेरा या पर्वत के भाग्य का ?

एक दिन की बात है कि वसु से कोर्इ ऐसा अपराध बन गया, जिससे उपाध्याय ने उसे बहुत मारा । उस समय स्वस्तिमती ने बीच में पड़कर वसु को बचा लिया । वसु ने अपनी बचाने वाली गुरूमाता से कहा -- माता, तुमने मुझे बचाया इससे मैं बड़ा उपकृत हुआ । कहो तुम्हें क्या चाहिए ? वही लाकर मैं तुम्हें प्रदान करूँगा स्वस्तिमती ने उत्तर में राजकुमार से कहा -- पुत्र, इस समय तो मुझे कुछ आवश्यकता नहीं है, पर जब होगी तब मागूँगी तू मेरे इस वर को अभी अपने ही पास रख ।

एक दिन क्षीरकदम्ब के मन में प्रकृति की शोभा देखने के लिए उत्कंठा हुर्इ । वह अपने साथ तीनों शिष्यों को भी इसलिए ले गये कि उन्हें वहीं पाठ भी पढ़ा दूँगा । वह एक सुन्दर बगीचे में पहुँचा । वहाँ कोर्इ अच्छा पवित्र स्थान देखकर वह अपने शिष्यों को बृहदारण्य का पाठ पढ़ाने लगा । वहीं और दो ऋद्धिधारी महामुनि स्वाध्याय कर रहे थे । उनमें से छोटे मुनि ने क्षीरकदम्ब को पाठ पढ़ाते देखकर बड़े मुनिराज से कहा -- प्रभो, देखिए कैसे पवित्र स्थान में उपाध्याय अपने शिष्यों को पढ़ा रहा है । गुरू ने कहा -- अच्छा है, पर देखो इनमें से दो तो पुण्यात्मा हैं और वे स्वर्ग में जायेंगे और दो पाप के उदय से नर्कों के दु:ख सहेंगे । सच है --

कर्मों के उदय से जीवों को सुख या दु:ख भोगना ही पड़ता है । मुनि के वचन क्षीरकदम्ब ने सुन लिए वह अपने विद्यार्थियों को घर भेजकर मुनिराज के पास गया । उन्हें नमस्कार कर उसने पूछा -- भगवान, हे जैन सिद्धान्त के उत्तम विद्वान, कृपाकर मुझे कहिए कि हममें से कौन दो तो स्वर्ग जाकर सुखी होंगे और कौन दो नर्क जायेंगें । काम के शत्रु मुनिराज ने क्षीरकदम्ब से कहा -- भव्य, स्वर्ग जाने वालो में एक तो तू जिनभक्त और दूसरा धर्मात्मा नारद है और वसु तथा पर्वत पाप के उदय से नर्क जायेंगें । क्षीरकदम्ब मुनिराज को नमस्कार कर अपने घर आया । उसे इस बात का बड़ा दु:ख हुआ कि उसका पुत्र नरक में जायगा । क्योंकि मुनियों का कहा अनन्त काल में भी झूठा नहीं होता ।

एक दिन कोर्इ ऐसा कारण दिख पड़ा, जिससे वसु के पिता विश्वावसु अपना राजकाज वसु को सौंपकर आप साधु हो गये । राज्य अब वसु करने लगा । एक दिन वसु वन विहार के लिए उपवन में गया हुआ था । वहाँ उसने आकाश से लुढ़ककर गिरते हुए एक पक्षी को देखा । देखकर उसे आश्चर्य हुआ । उसने सोचा पक्षी के लुढ़कते हुए गिरने का कोर्इ कारण यहाँ अवश्य होना चाहिए । उसको शोध लगाने को जिधर से पक्षी गिरा था उधर ही लक्ष्य बाँधकर उसने बाण छोड़ा । उसका लक्ष्य व्यर्थ न गया । यद्यपि उसे ये नहीं जान पड़ा कि क्या गिरा, पर इतना विश्वास हो गया कि उसके बाण के साथ ही कोर्इ भारी वस्तु गिरी जरूर है । जिधर से किसी वस्तु के गिरने की आवाज उसे सुन पड़ी थी वह उधर ही गया पर तब भी उसे कुछ नहीं दिखाई पड़ा । यह देख उसने उस भाग को हाथों से टटोलना शुरू किया । हस्तस्पर्श से उसे एक बहुत निर्मल खम्भा, जो कि स्फटिकमणि का बना था जान पड़ा । बसु राजा उसे गुप्त रीति से अपने महल पर ले आया । वसु ने उस खम्भे के चार पाये बनवाये और उन्‍हें अपने न्याय-सिंहासन के लगवा दिये । उन पायों के लगने से सिंहासन ऐसा जान पड़ने लगा मानों वह आकाश में ठहरा हुआ हो । धूर्त वसु अब उसी पर बैठकर राज्यशासन करने लगा उसने सब जगह यह प्रगट कर दिया कि ‘राजा वसु बड़ा ही सत्यवादी है, उसकी सत्यता के प्रभाव से उसका न्याय-सिंहासन आकाश में ठहरा हुआ है’ । इस प्रकार कपट की आड़ में वह सर्वसाधारण के बहुत ही आदर का पात्र हो गया । सच है --

मायावी पुरूष संसार में क्या ठगार्इ नहीं करते! इधर सम्यग्दृष्टि जिनभक्त क्षीरकदम्ब संसार से विरक्त होकर तपस्वी हो गया और अपनी शक्ति के अनुसार तपस्या कर अन्त में समाधिमरण द्वारा उसने स्वर्ग लाभ किया । पिता का उपाध्याय पद अब पर्वत को मिला । पर्वत को जितनी बुद्धि थी, जितना ज्ञान था, उसके अनुकूल वह पिता के विद्यार्थियों को पढ़ाने लगा । उसी वृत्ति के द्वारा उसका निर्वाह होता था । क्षीरकदम्ब के साधु हुए बाद ही नारद भी वहाँ से कही अन्यत्र चल दिया । वर्षों तक नारद विदेशों में घूमा । घूमते फिरते वह फिर भी एक बार स्वस्तिपुरी की ओर आ निकला । वह अपने सहाध्यायी और गुरू-पुत्र पर्वत से मिलने को गया । पर्वत उस समय अपने शिष्यों को पढ़ा रहा था । साधारण कुशल प्रश्न के बाद नारद वहीं बैठ गया और पर्वत का अध्यापन कार्य देखने लगा । प्रकरण कर्मकाण्ड का था । वहाँ एक श्रुति थी – ‘अज्जैर्यष्टव्यमिति ।‘ दुराग्रही पापी पर्वत ने उसका अर्थ किया कि ‘अजैश्छागै:प्रयष्टव्यमिति’ अर्थात् बकरों की बलि देकर होम करना चाहिए । उसमें बाधा देकर नारद ने कहा -- नहीं इस श्रुति का यह अर्थ नहीं है । गुरूजी ने तो हमें इसका अर्थ बतलाया था कि ‘अजैस्त्रिवार्षिकैर्धान्यै:प्रयष्टव्यम्’ अर्थात् तीन वर्ष के पुराने धान से जिसमें उत्पन्न होने की शक्ति न हो, होम करना चाहिए । पापी, तू यह क्या अनर्थ करता है जो उल्टा ही अर्थ कर दिया ? उस पर पापी पर्वत ने दुराग्रह के वश हो यही कहा कि नहीं तुम्हारा कहना सर्वथा मिथ्या है । असल में अज शब्द का अर्थ बकरा ही होता है और उसी से होम करना चाहिए । ठीक कहा है -- जिसे दुर्गति में जाना होता है वही पुरूष जानकर भी ऐसा झूठ बोलता है ।

तब दोनों में सच्चा कौन है, इसके निर्णय के लिए उन्होंने राजा वसु को मध्यस्थ चुना । उन्होंने परस्पर में प्रतिज्ञा की कि जिसका कहना झूठ हो उसकी जबान काट दी जाय । पर्वत की माँ को जब इस विवाद का और परस्पर की प्रतिज्ञा का हाल मालूम हुआ तब उसने पर्वत को बुलाकर बहुत डाँटा और गुस्से में आकर कहा -- पापी, तूने यह क्या अनर्थ किया ? क्यों उस श्रुति का उलटा अर्थ किया तुझे नहीं मालूम कि तेरा पिता जैन धर्म का पूर्ण श्रद्धानी था और वह ‘अजैर्यष्टव्यम्’ इसका अर्थ तीन वर्ष के पुराने धान से होम करने को कहता था । और स्वयं भी वह पुराने धान ही से सदा होमादिक किया करता था । स्वस्तिमती ने उसे और भी बहुत फटकारा पर उसका फल कुछ नहीं निकला पर्वत अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ बना रहा । पुत्र का इस प्रकार दुराग्रह देखकर वह अधीर हो उठी । एक ओर पुत्र के अन्याय पक्ष का समर्थन होकर सत्य की हत्या होती है और दूसरी ओर पुत्र-प्रेम ने विजय प्राप्त कर उसे अपने कर्तव्य से विचलित करता है । अब वह क्या करे ? पुत्र-प्रेम में फँसकर सत्य की हत्या करे या उसकी रक्षा कर अपना कर्तव्य पालन करे ? वह बड़े संकट में पड़ी । आखिर दोनो शक्तियों-का युद्ध होकर पुत्र-प्रेम ने विजय प्राप्त कर उसे अपने कर्तव्य पथ से गिरा दिया, सत्य की हत्या करने को उसे सन्नद्ध किया । वह उसी समय वसु के पास पहुँची और उससे बोली -- पुत्र, तुम्हें ! याद होगा कि मेरा एक वर तुमसे पाना बाकी है । आज उसकी मुझे जरूरत पड़ी है । इसलिए अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह कर मुझे कृतार्थ करो । बात यह है पर्वत और नारद का किसी विषय पर झगडा हो गया है । उसके निर्णय के लिए उन्होने तुम्हें मध्यस्थ चुना है । इसलिये मैं तुम्हें कहने को आर्इ हूँ कि तुम पर्वत के पक्ष का समर्थन करना । सच है --

जो स्वयं पापी होते हैं वे दूसरो को भी बना डालते हैं । जैसे सर्प स्वंय जहरीला होता है और जिसे काटता है उसे भी विषयुक्त कर देता है । पापियों का यह स्वभाव ही होता है ।

राजसभा लगी हुर्इ थी । बड़े-बड़े कर्मचारी यथास्थान बैठे हुए थे । राजा वसु भी एक बहुत सुन्दर रत्न-जड़े सिंहासन पर बैठा हुआ था । इतने में पर्वत और नारद अपना न्याय कराने के लिए राजसभा में आये । दोनों ने अपना-अपना कथना सुनाकर अन्त में किसका कहना सत्य है और गुरूजी ने अपने को ‘अजैर्यष्टिव्यम्’ इसका क्या अर्थ समझाया था, इसका खुलासा करने का भार वसु पर छोड़ दिया । वसु उक्त वाक्य का ठीक अर्थ जानता था और यदि वह चाहता तो सत्य की रक्षा कर सकता था, पर उसे अपनी गुराणो जी के माँगे हुए वर ने सत्यमार्ग से ढकेलकर आग्रही और पक्षपाती बना दिया । मिथ्या आग्रह के वश हो उसने अपनी मान मर्यादा और प्रतिष्ठा की कुछ परवा न कर नारद के विरूद्ध फैसला दिया । उसने कहा कि जो पर्वत कहता है वही सत्य है और गुरुजी ने हमें ऐसा ही समझाया था कि ‘अजैर्यष्ट्व्यम्’ इसका अर्थ बकरों को मारकर उनसे होम करना चाहिये । प्रकृति को उसका यह महा अन्याय सहन नहीं हुआ । उसका परिणाम यह हुआ कि राजा वसु जिस स्फटिक के सिंहासन पर बैठकर प्रति-दिन राजकार्य करता था और लोगों को यह कहा करता था कि मेरे सत्य के प्रभाव से मेरा सिंहासन आकाश में ठहरा हुआ है, वही सिंहासन वसु की असत्यता से टूट पड़ा और पृथ्वी में घुस गया । उसके साथ ही वसु भी पृथ्वी में जा धँसा । यह देख नारद ने उसे समझाया -- महाराज, अब भी सत्य-सत्य कह दीजिए, गुरूजी ने जैसा अर्थ कहा था वह प्रकट कर दीजिए । अभी कुछ नहीं गया । सत्यव्रत आपकी इस संकट से अवश्य रक्षा करेगा । कुगति में व्यर्थ अपने आत्मा को न ले जाइए । अपनी इस दुर्दशा पर भी वसु को दया नहीं आर्इ । वह और जोश में आकार बोला -- नहीं , जो पर्वत कहता है वही सत्य है । उसका इतना कहना था कि उसके पाप के उदय ने उसे पृथ्वीतल में पहुँचा दिया । वसु काल के सुपुर्द हुआ । मरकर वह सातवे नरक गया । सच है जिनका हृदय दुष्ट और पापी होता है । उनकी बुद्धि नष्ट हो जाती है । और पाप से बचना चाहते हैं उन्हें प्राणों पर कश्ट आने पर भी कभी झूठ न बोलना चाहिए । पर्वत की यह दुष्टता देखकर प्रजा के लोगों ने उसे गधे पर बैठाकर शहर से निकाल बाहर किया और नारद का बहुत आदर-सत्कार किया ।

नारद अब वहीं रहने लगा । वह बड़ा बुद्धिमान और धर्मात्मा था । सब शास्त्रों में उसकी गति थी । वह वहाँ रहकर लोगों को धर्म का उपदेश दिया करता, भगवान की पूजा करता, पात्रों को दान देता । उसकी यह धर्म परायणता देखकर वसु के बाद राज्य-सिंहासन पर बैठने वाला राजा उस पर बहुत खुश हुआ । उस खुशी में उसने नारद को गिरितट नामक नगरी का राज्य भेट में दे दिया । नारद ने बहुत समय तक उस राज्य का सुख भोगा । अन्त में संसार से उदासीन होकर उसने जिनदीक्षा ग्रहण कर ली । मुनि होकर उसने जीवों को कल्याण के मार्ग में लगाया और तपस्या द्वारा पवित्र रत्नत्रय की आराधना कर आयु के अन्त में वह सर्वार्थसिद्धि गया, जो कि सर्वोत्तम सुख का स्थान है । सच है, जैनधर्म की कृपा से भव्य पुरूषों को क्या प्राप्त नहीं होता ?

निरभिमानी नारद अपने धर्म पर बड़ा दृढ़ था । उसने समय-समय पर और-और धर्मवालों के साथ शास्त्रार्थ में विजय प्राप्त कर जैनधर्म की खूब प्रभावना की । वह जिनशासन रूप महान् समुद्र के बढ़ानेवाला चन्द्रमा था । ब्राह्मण वंश का एक चमकता हुआ रत्न था । अपनी सत्यता के प्रभाव से उसने बहुत प्रसिद्धि प्राप्त कर ली थी । अन्त में वह तपस्या कर सर्वाथ सिद्धि गया । वह महात्मा नारद सबका कल्याण करे ।


+ श्रीभूति - पुरोहित की कथा -
श्रीभूति - पुरोहित की कथा
जिन्हें स्वर्ग के देवता बड़ी भक्ति के साथ पूजते हैं, उन सुख के देने वाले जिन भगवान् को नमस्कार कर मैं श्रीभूति-पूरोहित का उपाख्यान कहता हूँ, जो चोरी करके दुर्गति में गया है ।
सिंहपुर नामक एक सुन्दर नगर था उसका राजा सिंहसेन था । सिंहसेन की रानी का नाम रामदत्ता था । राजा बुद्धिमान् और धर्म परायण था । रानी भी बड़ी चतुर थी । सब कामों को वह उत्तमता के साथ करती थी । राज का पुरोहित श्रीभूति था । उसने मायाचारी से अपने सम्बन्ध में यह बात प्रसिद्ध कर रक्खी थी कि मैं बड़ा सत्य बोलने वाला हूँ । बेचारे भोले लोग उस कपटी के विश्वास में आकर अनेक बार ठगे जाते थे । पर उसके कपट का पता किसी को नहीं पड़ पाता था । ऐसे ही एक दिन एक विदेशी उसके चंगुल में आ फँसा । इसका नाम समुद्रद्रत्‍त था । यह पद्मखण्‍डपुर का रहने वाला था । इसके पिता सुमित्र और माता सु‍मित्रा थी । समुद्रद्रत्‍त की इच्‍छा एक दिन व्यापारार्थ विदेश जाने की हुर्इ । इसके पास पाँच बहुत कीमती रत्न थे । पद्मखण्डपुर में कोर्इ ऐसा विशवास पुरूष इसके ध्यान में नहीं आया, जिसके पास यह अपने रत्नों को रखकर निश्चिंत हो सकता था । इसने श्रीभूति की प्रसिद्धि सुन रक्खी थी । इसलिए उसके पास रत्नर खने का विचार कर यह सिहंपुर आया । यहाँ श्रीभूति से मिलकर इसने अपना विचार उसे कह सुनाया । श्रीभूति ने इसके रत्नों का रखना स्वीकार कर लिया । समुद्रदत्त को इससे बड़ी खुशी हुर्इ और साथ ही वह उन रत्नों को श्रीभूति को सौंपकर आप रत्नद्वीप के लिए रवाना हो गया । वहाँ कर्इ दिनों तक ठहरकर इसने बहुत धन कमाया । जब यह वापिस लौटकर जहाज द्वारा अपने देश की ओर आ रहा था । तब पाप कर्म के उदय से इसका जहाज टकराकर फट गया । बहुत से आदमी डूब मरे । बहुत ठीक लिखा है, कि बिना पुण्य के कभी कोर्इ कार्य सिद्ध नहीं होता । समुद्रदत्त इस समय भाग्य से मरते-मरते बच गया । इसके हाथ जहाज का एक छोटा सा टुकड़ा लग गया । यह उसपर बैठकर बड़ी कठिनता के साथ किसी तरह राम-राम करता किनारे आ लगा । यहां से यह सीधा श्रीभूति पुरोहित के पास पहुंचा । श्रीभूति इसे दूर से देखकर ही पहचान गया । वह धूर्त तो था ही, सो उसने अपने आस-पास के बैठे हुए लोगों से कहा -- देखिये, वह कोर्इ दरिद्र, भिखमंगा आ रहा है । अब यहां आकर व्यर्थ सिर खाने लगेगा । जिनके पास थोड़ा बहुत पैसा होता है या जिनके मान मर्यादा लोगों में अधिक होती है तो उन्हें इन भिखारियों के मारे चैन नहीं । एक न एक हर समय सिर पर खड़ा ही रहता है । हम लोगों ने जो सुना था कि कल एक जहाज फटकर डूब गया है, मालूम होता है कि यह उसी पर का कोर्इ यात्री है और इसका सब धन नष्ट हो जाने से यह पागल हो गया जान पड़ता है । इसकी दुर्दशा से ज्ञात होता है कि यह इस समय बड़ा दुखी है और इसी से संभव है कि यह मुझ से कोर्इ बड़ी भारी याचना करे । श्रीभूति तो इस तरह लोगों को कह ही रहा था कि समुद्रदत्त उसके सामने जा खड़ा हुआ । वह श्रीभूति को नमस्कार कर अपनी हालत सुनाना आरम्भ करता है कि इतने में श्रीभूति बोल उठा कि मुझे इतना समय नहीं कि मैं तुम्हारी सारी दुख: कथा सुनूँ । हाँ तुम्हारी इस हालत से जान पड़ता है कि तुम पर कोर्इ बड़ी भारी आफत आर्इ है । अस्तु, मुझे तुम्हारे दु:ख में सम्वेदना है । अच्छा जाइये, मैं नौकरों से कहे देता हूँ, कि वे तुम्हें कुछ दिनों के लिए खाने का सामान दिलवा दें । यह कहकर ही उसने नौकरों की ओर मुँह फेरा और आठ दिन तक का खाने का सामान समुद्रदत्त को दिलवा देने के लिए उनसे कह दिया । बेचारा समुद्रदत्त तो श्रीभूति की बातें सुनकर हत-बुद्धि हो गया । उसे काटो तो खून नहीं । उसने घबराते-घबराते कहा -- महाराज, आप यह क्या करते हैं ? मेरे जो आपके पास पाँच रत्न रखे हैं, मुझे तो वे ही दीजिए । मैं आपका सामान-वामान नहीं लेता । श्रीभूति ने रत्न का नाम सुनते ही अपने चेहरे पर का भाव बदला और त्यौरी चढ़ाकर जोर के साथ कहा -- रत्न ! अरे दरिद्र ! तेरे रत्न और मेरे पास ? यह तू क्या बक रहा है ? कह तो सही वास्तव में तेरी मंशा क्या है ? क्या मुझे तू बदनाम करना चाहता है ? तू कौन, और कहाँ का रहने वाला है ? मैं तूझे जानता तक नहीं फिर तेरे रत्न मेरे पास आये कहाँ से ? जा-जा, पागल तो नहीं हो गया है ? ठीक ध्यान से विचारकर । किसी और के यहाँ रखकर उसके भ्रम से मेरे पास आ गया जान पड़ता है । इसके बाद ही उसने लोगों की ओर नजर फेरकर कहा -- देखिये साहब, मैंने कहा था न कि यह मेरे से कोर्इ बड़ी भारी याचना न करे तो अच्छा । ठीक वही हुआ । बतलाइए इस दरिद्र के पास रत्न आ कहाँ से सकते हैं ? धन नष्ट हो जाने से जान पड़ता है यह बहक गया है । यह कहकर श्रीभूति ने नौकरों द्वारा समुद्रदत्त को घर से बाहर निकलवा दिया । नीतिकार ने ठीक लिखा है – जो लोग पापी होते हैं और जिन्हें दूसरों के धन की चाह होती है, वे दुष्ट पुरूष ऐसा कौन बुरा काम है, जिसे लोभ के वश हो न करते हों ? श्रीभूति ऐसे ही पापियों से एक था, तब वह कैसे ऐसे निंद्य कर्म से बचा रह सकता था ? पापी श्रीभूति से ठगा जाकर बेचारा समुद्रदत्त सचमुच पागल हो गया । वह श्रीभूति के मकान से निकलते ही यह चिल्लाता हुआ, कि पापी श्रीभूति मेरे रत्न नहीं देता है, सारे शहर में घूमने लगा । पर उसे एक भिखारी के वेश में देखकर किसी ने उसकी बात पर विश्वास नहीं किया । उलटा उसे ही सब पागल बताने लगे । समुद्रदत्त दिनभर तो इस तरह चिल्लाता हुआ सारे शहर में घूमता फिरता और जब रात होती तब राजमहल के पीछे एक वृक्ष पर चढ़ जाता और सारी रात उसी तरह चिल्लाया करता । ऐसा करते-करते उसे कोर्इ छह महिने बीत गये । समुद्रदत्त का इस तरह रोज-रोज चिल्लाना सुनकर एक दिन महारानी रामदत्ता ने सोचा कि बात वास्तव में क्या है, इसका पता जरूर लगाना चाहिये । तब एक दिन उसने अपने स्वामी से कहा -- प्राणनाथ, मैं रोज एक गरीब की पुकार सुनती हूँ मैं आज तक तो यह समझती रही कि वह पागल हो गया है और इसी से दिनरात चिल्लाया करता है कि श्रीभूति मेरे रत्न नहीं देता पर प्रतिदिन उसके मुँह से एक ही वाक्य सुनकर मेरे मन में कुछ खटका पैदा होता है । इसलिए आप उसे बुलाकर पूछिये तो कि वास्तव में रहस्य क्या है ? रानी के कहे अनुसार राजा ने समुद्रदत्त को बुलाकर सब बातें पूछीं । समुद्रदत्त ने जो यथार्थ घटना थी वह राजा से कह सुनार्इ । सुनकर राजा ने रानी से कहा कि इसके चेहरे पर से तो इसकी बात ठीक जँचती है । पर इसका भेद खुलने के लिए क्या उपाय है ? रानी ने थोड़ी देरतक विचारकर कहा -- हाँ, इसकी आप चिन्ता न करें । मैं सब बातें जान लूँगी ।

दूसरे दिन रानी ने पुरोहित को अपने अन्त:पुर में बुलाया । आदर सत्कार होने के बाद रानी ने उन से कहा – मेरी इच्छा बहुत दिनों से आप से मिलने की थी, पर कोर्इ ठीक समय ही नहीं मिल पाया था । आज बड़ी खुशी हुर्इ कि आपने यहाँ आने की कृपा की । इसके बाद रानी ने पुरोहित से कुछ इधर-उधर की बातें कर के उन से भोजन का हाल पूछा । उनके भोजन का सब हाल जानकर उसने अपनी एक विश्वस्त दासी को बुलाया और उसे कुछ बातें समझा बुझाकर पीछे चली जाने को कह दिया । दासी के जाने के बाद रानी ने पुरोहित जी से एक नर्इ ही बात का जिकर उठाया । वह बोली -- पुरोहित जी, सुनती हूँ कि आप पासे खेलने में बड़े चतुर और बुद्धिमान हैं । मेरी बहुत दिनों से इच्छा होती थी कि आपके साथ खेलकर मैं भी एक बार देखूँ कि आप किस चतुराई से खेलते हैं । यह कहकर रानी ने एक दासी को बुलाकर चौपड़ के ले आने की आज्ञा की ।

पुरोहित जी रानी की बात सुनकर दंग रह गये । वे घबराकर बोले हैं ! हैं ! महारानी जी यह आप क्या करती हैं ? मैं एक भिक्षुक ब्राह्मण और आपके साथ मेरी यह धृष्टता । यदि महाराज सुन पावें तो वे मेरी क्या गत बनावेगें ?

रानी ने कहा -- पुरोहितजी, आप इतना घबराइए मत मेरे साथ खेलने में आपको किसी प्रकार के गहरे विचार में पड़ने की कोर्इ आवश्यकता नहीं । महाराज इस विषय में आपसे कुछ नही कहेंगे आप डरिये मत ।

बेचारे पुरोहितजी बड़े पशोपेश में पड़े । रानी की आज्ञा भी वे नहीं टाल सकते और इधर महाराज का उन्हें भय, वे तो इस उधेड़-बुन में लगे हुए थे कि दासी ने चौपड़ लाकर रानी के सामने रख दी । आखिर उन्हें खेलना ही पड़ा । रानी ने पहली बाजी में पुरोहितजी की अँगूठी जिस पर कि उसका नाम खुदा हुआ था, जीतली । दोनों फिर खेलने लगे । इतने में पहली दासी ने आकर रानी से कुछ कहा । रानी ने अब की बार पुरोहित जी की जीती हुर्इ अँगूठी चुपके से उसे देकर चली जाने को कह दिया । दासी घण्टेभर बाद फिर आर्इ । उसे कुछ निराश सी देखकर रानी ने इशारे से अपने कमरे के बाहर ही रहने को कह दिया और आप अपने खेल में लग गर्इ । अबकी बार उसने पुरोहितजी का जनेऊ जीत लिया और किसी बहाने से उस दासी को बुलाकर चुपके से जनेऊ देकर भेज दिया । दासी के वापिस आने तक रानी और भी पुरोहितजी को खेल में लगाये रही । इतने में दासी भी आ गर्इ । उसने उसी समय खेल बन्द किया और पुरोहितजी की अँगूठी और जनेऊ उन्हें वापिस देकर वह बोली – आप सचमुच खेलने में बड़े चतुर हैं आपकी चतुरता देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुर्इ । आज मैंने सिर्फ इस चतुरता को देखने के लिए ही आपको यह कष्ट दिया था । आप इसके लिए मुझे क्षमा करें । अब आप खुशी के साथ जा सकते हैं ।

बेचारे पुरोहितजी रानी के महल से विदा हुए । उन्हें इसका कुछ भी पता नहीं पड़ा कि रानी ने मेरी आँखों में दिनदहाड़े धूल झोंककर मुझे कैसा उल्लू बनाया है । बात असल में यह थी कि रानी ने पहले पुरोहितजी की जीती हुर्इ अँगूठी देकर दासी को उनकी स्त्री के पास समुद्रदत्त के रत्न लेने को भेजा, पर जब पुरोहितजी की स्त्री ने अँगूठी देखकर भी उसे रत्न नहीं दिये तब यज्ञोपवीत जीता और उसे दासी के हाथ देकर फिर भेजा । अबकी बार रानी का मनोरथ सिद्ध हुआ । पुरोहितजी की स्त्री ने दासी की बातों से डरकर झटपट रत्नों को निकाल दासी के हवाले कर दिया । दासी ने लाकर रत्नों को रानी को दे दिये । रानी प्रसन्न हुर्इ पुरोहितजी तो खेलते रहे और उधर उनका भाग्य फूट गया, इसकी उन्हें रत्तीभर भी खबर नहीं पड़ी ।

रानी ने रत्नों को ले जाकर महाराज के सामने रख दिये और साथ ही पुरोहितजी के महल से रवाना होने की खबर दी । महाराज ने उसी समय उनके गिरफ्तार करने की सिपाहियों को आज्ञा दी । बेचारे पुरोहित जी अभी महल के बाहर भी नहीं हुए थे कि सिपाहियों ने जाकर उनके हाथों में हथकड़ी डाल दी और उन्हें दरबार में लाकर उपस्थित कर दिया ।

पुरोहितजी यह देखकर भौंचक से रह गये । उनकी समझ में नहीं आया कि यह एकाएक क्या हो गया और कौन मैंने ऐसा भारी अपराध किया जिससे मुझे एक शब्द तक न बोलने देकर मेरी यह दशा की गर्इ । वे हतबुद्धि हो गये । उन्हें इस बात का और अधिक दु:ख हुआ कि मैं एक राजपुरोहित ऐसा-वैसा गैर आदमी नहीं और मेरी यह दशा ? और वह बि ना किसी अपराध के ? क्रोध, लज्जा और आत्मग्लानि से उनकी एक विलक्षण ही दशा हो गर्इ ।

रानी ने जैसे ही रत्नों को महाराज के सामने रखा महाराज ने उसी समय उन्हें अपने और बहुत से रत्नों में मिलाकर समुद्रदत्त को बुलाया और उससे कहा -- अच्छा, देखो तो इन रत्नों में रत्न हैं क्या ? और हों तो उन्हें निकाल लो । महाराज की आज्ञा पाकर समुद्रदत्त ने उन सब रत्नों में से अपने रत्नों को पहिचान कर निकाल लिया । सच है, सज्जन पुरुष अपनी ही वस्तु को लेते हैं । दूसरों की वस्तु उन्हें विष समान जान पड़ती है । समुद्रदत्त ने अपने रत्न पहिचान लिए, यह देख महाराज उसपर इतने प्रसन्न हुए कि उसे उन्होंने अपना राजसेठ बना लिया ।
महाराज त्वरित ही दरबार में आये । जैसे ही उनकी दृष्टि पुरोहितजी पर पड़ी, उन्होंने बड़ी ग्लानि की दृष्टि से उनकी ओर देखकर गुस्से के साथ कहा -- पापी, ठगी ! मैं नहीं जानता था कि तू हृदय का इतना काला होगा और ऊपर से ऐसा ढोंगी का वेष लेकर मेरी गरीब और भोली प्रजा को इस तरह धोखे में फँसायेगा ? न मालूम तेरी इस कपट वृत्ति ने मेरे कितने बन्धुओं को घर-घर का भिखारी बनाया होगा ? ऐ पाप के पुतले, लोभ के जहरीले सर्प, तुझे देखकर हृदय चाहता तो यह है कि तुझे इस की कोर्इ ऐसी भयंकर सजा दी जाए, जिससे तुझे भी इस का ठीक प्रायश्चित मिल जाय और सर्वसाधारण को दुराचारियों के साथ मेरे कठिन शासन का ज्ञान हो जाय; उससे फिर कोर्इ ऐसा अपराध करने का साहस न करे । परन्तु तू ब्राह्मण है, इसलिए तेरे कुल के लिहाज से तेरी सजा के विचार का भार मैं अपने मंत्री-मण्डल पर छोड़ता हूँ । यह कहकर ही राजा ने अपने धर्माधिकारियों की ओर देखकर कहा – ‘इस पापी ने एक विदेशी यात्री के, जिसका कि नाम समुद्रदत्त है और वह यहीं बैठा हुआ भी है, कीमती पाँच रत्नों को हड़प कर लिया है, जिनको कि यात्री ने समुद्र यात्रा करने के पहले श्रीभूति को एक विश्वस्त और राजप्रतिष्ठित समझकर धरोहर के रूप में रक्खे थे । दैव की विचित्र गति से लौटते समय यात्री का जहाज एकाएक फट गया और साथ ही उसका सब माल असबाब भी डूब गया । यात्री किसी तरह बच गया । उसने जाकर पुरोहित श्रीभूति से अपनी धरोहर वापिस लौटा देने के लिए प्रार्थना की । पुरोहित के मन में पाप का भूत सवार हुआ । बेचारे गरीब यात्री को उसने धक्के देकर घर से बाहर निकलवा दिया । यात्री अपनी इस हालत से पागल-सा होकर सारे शहर में यह पुकार मचाता हुआ महिनों फिरा किया कि श्रीभूति ने मेरे रत्न चुरा लिये, पर उस पर किसी का ध्यान न जाकर उलटा सबने उसे ही पागल करार दिया । उसकी यह दशा देखकर महारानी को बड़ी दया आर्इ । यात्री बुलाकर जाकर उससे सब बातें दर्याफ्त की गयीं । बाद में महारानी ने उपाय द्वारा वे रत्न हस्तगत कर लिये । वे रत्न समुद्रदत्त के हैं या नहीं, इसकी परीक्षा करने के आशय से उन पाँचों रत्नों को पहिचानकर बहुत से और रत्नों में मिला दिया । पर आश्चर्य है कि यात्री ने अपने रत्नों को पहिचान कर निकाल लिया । श्रीभूति के जिम्में धरोहर हड़प कर जाने का गुरूतर अपराध है । इसके सिवा धोखेबाजी, ठगार्इ आदि और भी बहुत से अपराध हैं । इसकी इसे क्या सजा दी जाए, इसका आप विचार करें ।‘

धर्माधिकारियों ने आपस में सलाह कर कहा – महाराज, श्रीभूति पुरोहित का अपराध बड़ा भारी है । इसके लिए हम तीन प्रकार की सजायें नियत करते हैं । उनमें से फिर जिसे यह पसंद करे, स्वीकार करे । या तो इसका सर्वस्व हरण कर लिया जाकर इसे देश बाहर कर दिया जाय, या पहलवानों की बत्तीस मुक्कियाँ इस पर पड़ें, या तीन थाली में भरे हुए गोबर को यह खा जाय । श्रीभुति से सजा पसन्द करने को कहा गया । पहले उसने गोबर खाना चाहा, पर खाया नहीं गया, तब मुक्कियाँ खाने को कहा । मुक्कियाँ पड़ना शुरु हुईं । कोई दस-पन्द्रह मुक्कियाँ पड़ी होंगी कि पुरोहितजी की अकल ठिकाने आ गर्इ । आप एकदम चक्कर खाकर जमीन पर ऐसे गिरे कि पीछे उठे ही नहीं । महा आर्त्तध्यान से उनकी मृत्यु हुर्इ । वे दुर्गति में गये । धन में अत्यन्त लम्पटता का उन्हें उपयुक्त प्रायश्चित मिला । इसलिये जो भव्य पुरूष हैं, उन्हें उचित है कि वे चोरी को अत्यन्त दु:ख का कारण समझकर उसका परित्याग करें और अपनी बुद्धि को पवित्र जैनधर्म की ओर लगावें, जो ऐसे महापापों से बचाने वाला है ।

वे जिनभगवान्, जो सब सन्देहों के नाश करने वाले और स्वर्ग के देवों और विद्याधरों द्वारा पूज्य हैं, वह जिनवाणी, जो सब सुखों की खान है, और मेरे गुरू श्रीप्रभाचन्द्र, ये सब मुझे मंगल प्रदान करें, मुझे कल्याण का मार्ग बतलावें ।


+ नीली की कथा -
नीली की कथा
जिनभगवान् के चरणों को, जो कि कल्याण के करनेवाले हैं, नमस्कार कर श्रीमती नीली सुन्दरी की मैं कथा कहता हूँ । नीली ने चौथे अणुव्रत ब्रह्मचर्य की रक्षाकर प्रसिद्धि प्राप्त की है ।

पवित्र भारत वर्ष में लाट देश एक सुन्दर और प्रसिद्ध देश था । जिनधर्म का वहाँ खूब प्रचार था । वहाँ की प्रजा अपने धर्म कर्म पर बड़ी दृढ़ थी । इससे इस देश की शोभा को उस समय कोर्इ देश नहीं पा सकता था । जिस समय की यह कथा है तब उसकी प्रधान राजधानी भृगुकच्छ नगर था । यह नगर बहुत सुन्दर और सब प्रकार की योग्य और कीमती वस्तुओं से पूर्ण था । इसका राजा तब वसुपाल था । और वह जिससे अपनी प्रजा सुखी हो, धनी हो, सदाचारी हो, दयालु हो, इसके लिए कोर्इ बात न रखकर सदा प्रयत्नशील रहता था ।

यहीं एक सेठ रहता था । उसका नाम था जिनदत्त । जिनदत्त की शहर के सेठ साहूकारों में बड़ी इज्जत थी । वह धर्मशील और जिनभगवान का भक्त था । दान पूजा स्वाध्याय आदि पुण्यकर्मों को वह सदा नियमानुसार किया करता था । उसकी धर्मप्रिया का नाम जिनदत्ता था । जैसा जिनदत्त धर्मात्मा और सदाचारी था, उसकी गुणवती साध्वी स्त्री भी उसी के अनुरूप थी और इसी से इनके दिन बड़े ही सुख के साथ बीतते थे । अपने गार्हस्थ्य सुख को स्वर्गसुख से भी कहीं बढ़कर इन्होंने बना लिया था । जिनदत्ता बड़ी उदार प्रकृति की स्त्री थी । वह जिसे दुखी देखती उसकी सब तरह सहायता करती और उनके साथ प्रेम करती । इसके सन्तान में केवल एक पुत्री थी । उसका नाम नीली था । अपने माता पिता के अनुरूप ही इसमें गुण और सदाचार की सृष्टि हुर्इ थी । जैसे सन्तों का स्वभाव पवित्र होता है । नीली भी उसी प्रकार बड़े पवित्र स्वभाव की थी ।

इस नगर में एक और वैश्य रहता था । उसका नाम समुद्रदत्त था । यह जैनी नहीं था । इसकी बुद्धि बुरे उपदेशों को सुनसुनकर बड़ी मठ्ठी हो गर्इ थी । अपने हित की ओर कभी इसकी दृष्टि नहीं जाती थी । इसकी स्त्री का नाम सागरदत्ता था । इसके एक पुत्र था उसका नाम था सागरदत्त । सागरदत्त एक दिन अचानक जिनमन्दिर में पहुँच गया । इस समय नीली भगवान की पूजा कर रही थी । वह एक तो स्वभाव से ही बड़ी सुन्दरी थी । इस पर उसने अच्छे-अच्छे रत्नजड़े गहने और बहुमूल्य वस्त्र पहन रखे थे । इससे उसकी सुन्दरता और भी बढ गर्इ थी । वह देखने वालों को ऐसी जान पड़ती थी, मानों कोर्इ स्वर्ग की देवबाला भगवान की खड़ी-खड़ी पूजा कर रही है । सागरदत्त उसकी भुवनमोहिनी सुन्दरता को देखकर मुग्ध हो गया । काम ने उसके मन को बेचैन कर दिया । उसने पास ही खड़े हुए अपने मित्र से कहा -- यह है कौन मुझे तो नहीं जान पड़ता कि यह मध्यलोक की बालिका हो । या तो यह कोर्इ स्वर्ग-बाला है या नागकुमारी अथवा विद्याधर कन्या क्योंकि मनुष्यों में इतना सुन्दर रूप होना असम्भव है ।

सागरदत्त के मित्र प्रियदत्त ने नीली का परिचय देते हुए कहा कि वह तुम्हारा भ्रम है, जो तुम ऐसा कहते हो कि ऐसी सुन्दरता मनुष्यों में नहीं हो सकती । तुम जिसे स्वर्ग-बाला समझ रहे हो वह न स्वर्ग-बाला है, न नागकुमारी और न किसी विद्याधर वगैरह की ही पुत्री है, किन्तु मनुष्यनी है और अपने इसी शहर में रहने वाले जिनदत्त सेठ के एकमात्र प्रकाश करनेवाली उसकी नीली नाम की कन्या है ।

अपने मित्र द्वारा नीली का हाल जानकर सागरदत्त आश्चर्य के मारे दंग रह गया । साथ ही काम ने उसके हृदय पर अपना पूरा अधिकार किया । वह घर पर आया सही पर अपने मन को वह नीली के पास ही छोड़ आया । अब वह दिनरात नीली की चिंता में घुल-घुलकर दुबला होने लगा । खानापीना उसके लिए कोर्इ आवश्यक काम नहीं रहा । सच है, जिस काम के वश होकर श्रीकृष्ण लक्ष्मी द्वारा, महादेव गंगा द्वारा और ब्रह्मा उर्वशी द्वारा अपना प्रभुत्व, र्इश्वरपना खो चुके तब बेचारे साधारण लोगों की कथा ही क्या कही जाय ।

सागरदत्त की हालत उसके पिता को जान पड़ी उसने एक दिन सागरदत्त से कहा -- देखो, जिनदत्त जैनी है । वह कभी अपनी कन्या को अजैनों के साथ नहीं ब्याहेगा । इसलिए तुम्हें यह उचित नहीं कि तुम अप्राप्य वस्तु के लिए इस प्रकार तड़फ-तड़फकर अपनी जान को जोखिम में डालो, तुम्हें यह अनुचित विचार छोड देना चाहिए । यह कहकर समुद्रदत्त ने उत्तर पाने की आशा से उसकी ओर देखा । पर जब सागरदत्त उसकी बात का कुछ भी जवाब न देकर नीची नजर किये ही बैठा रहा, तब समुद्रदत्त को निराश हो जाना पड़ा । उसने समझ लिया कि इसके दो ही उपाय हैं । या तो पुत्र के जीवन की आशा से हाथ धो बैठना या किसी तरह सेठ की लड़की के साथ इसको ब्याह देना । पुत्र के जीने की आशा को छोड़ बैठने की अपेक्षा उसने किसी तरह नीली के साथ उसका ब्याह कर देना ही अच्छा समझा । सच है, सन्तान का मोह मनुष्य से सब कुछ करा सकता है । इस सम्बन्ध के लिए समुद्रदत्त के ध्यान में एक युक्ति आर्इ । वह यह कि इस दशा में उसने अपना और पुत्र का जैनी बन जाना बहुत ही अच्छा समझा और वे बन भी गये । अब से वे मन्दिर जाने लगे, भगवान् की पूजा करने लगे, स्वाध्याय, व्रत, उपवास भी करने लगे । मतलब यह कि थोड़े ही दिनों में पिता-पुत्र ने अपने जैनी हो जाने का लोगों को विश्वास करा दिया और धीरे-धीरे जिनदत्त से भी इन्होंने अधिक परिचय बढ़ा लिया । बेचारा जिनदत्त सरल स्वभाव का था और इसलिये वह सब ही को अपना-सा ही सरल-स्वभावी समझता था । यही कारण हुआ कि समुद्रदत्त का चक्र उस पर चल गया । उसने सागरदत्त को, अच्छा पढ़ालिखा, खूबसूरत और अपनी पुत्री के योग्य वर समझकर नीली को उसके साथ ब्याह दिया । सागरदत्त का मनोरथ सिद्ध हुआ । उसे नया जीवन मिला । इसके बाद थोड़े दिनों तक तो पिता-पुत्र ने और अपने को ढोंगी वेष में रक्खा, पर फिर कोर्इ प्रसंग लाकर वे पीछे बुद्ध धर्म के मानने वाले हो गये । सच है, मायाचारियों-पापियों की बुद्धि अच्छे धर्म पर स्थिर नहीं रहती । यह बात प्रसिद्ध है कि कुत्ते के पेट में घी नहीं ठहरता ।

जब इन पिता-पुत्र ने जैनधर्म छोड़ा तब इन दुष्टों ने यहाँ तक अन्याय किया कि बेचारी नीली का उसके पिता के घर पर जाना-आना भी बन्द कर दिया । सच है, पापी लोग क्या नहीं करते ! जब जिनदत्त को इनके मायाचार का यह हाल जान पड़ा तब उसे बहुत पश्चाताप हुआ, बेहद दु:ख हुआ । वह सोचने लगा – क्यों मैंने अपनी प्यारी पुत्री को अपने हाथों से कुँए में ढकेल दिया ? क्यों मैंने उसे काल के हाथ सौंप दिया ? सच है दुर्जनों की संगति से दु:ख के सिवा कुछ हाथ नहीं पड़ता । नीचे जलती हुर्इ अग्नि भी ऊपर की छत को काली कर देती है ।

जिनदत्त ने जैसा कुछ किया उसका पश्चात्ताप उसे हुआ । पर इससे क्या नीली दु:खी हो ? उसका यह धर्म था क्या ? नहीं ! उसे अपने भाग्य के अनुसार जो पति मिला, उसे ही वह अपना देवता समझती थी और उसकी सेवा में कभी रत्तीभर भी कमी नहीं होने देती थी । उसका प्रेम पवित्र और आदर्श था । यही कारण था कि वह अपने प्राणनाथ की अत्यन्त प्रेम-पात्र थी । विषेश इतना था कि नीली ने बुद्धधर्म के मानने वाले के यहाँ आकर भी जिनधर्म को न छोड़ा था । वह बराबर भगवान की पूजा, शास्त्र-स्वाध्याय, व्रत, उपवास आदि पुण्य कर्म करती थी, धर्मात्माओं से निष्कपट प्रेम करती थी ओैर पात्रों को दान देती थी । मतलब यह कि अपने धर्म-कर्म में उसे खूब श्रद्धा थी और भक्ति पूर्वक वह उसे पालती थी । पर खेद है कि समुद्रदत्त की आँखो में नीली का यह कार्य भी खटका करता था । उसकी इच्छा थी कि नीली भी हमारा ही धर्म पालने लगे और इसके लिये उसने यह सोचकर, कि बुद्ध साधुओं की संगति से या दर्शन से या उनके उपदेशों से यह अवश्य बुद्ध-धर्म को मानने लगेगी । एक दिन नीली से कहा -- पुत्री, तू पात्रों का तो सदा दान दिया ही करती है, तब एक दिन अपने धर्म के ही अनुसार बुद्ध साधुओं को भी तो दान दे ।

नीली ने श्‍वसुर की बात मान ली । पर उसे जिनधर्म के साथ उनकी यह र्इर्षा ठीक नहीं लगी और इसीलिये उसने कोर्इ ऐसा उपाय भी अपने मन में सोच लिया, जिससे फिर कभी उससे ऐसा मिथ्या आग्रह किया जाकर उसके धर्म-पालन में किसी प्रकार की बाधा न दी जाय । फिर कुछ दिनों बाद उसने मौका देखकर कुछ बुद्ध-साधुओं को भोजन के लिए बुलाया । वे आये । उनका आदर-सत्कार भी हुआ । वे एक अच्छे सुन्दर कमरे में बैठाये गये । इधर नीली ने उनके जूतों को एक दासी द्वारा मँगवा लिया और उनका खूब बारीक बूरा बनवाकर उसके द्वारा एक किस्म की बहुत ही बढ़ि‍या मिठार्इ तैयार करवार्इ । इसके बाद जब वे साधु भोजन करने को बैठे तब और-और व्यंजन-मिठार्इयों के साथ वह मिठार्इ भी उन्हें परोसी गर्इ । सबने उसे बहुत पसन्द किया । भोजन समाप्त हुए बाद जब जाने की तैयारी हुर्इ, तब वे देखते है तो जोड़े नहीं हैं । उन्होने पूछा – जोड़े कहाँ गये ? भीतर से नीली ने आकर कहा -- महाराज, सु नती हूँ, साधु लोग बड़े ज्ञानी होते हैं ? तब क्या आप अपने ही जूतों का हाल नहीं जानते हैं ? और यदि आपको इतना ज्ञान नहीं तो मैं बतला देती हूँ कि जूते आपके पेट में हैं विश्वास के लिए आप उल्टी कर देखें । नीली की बात सुनकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ । उन्होंने उल्टी करके देखा तो उन्हें जूतों के छोटे-छोटे बहुत से टुकडे देख पड़े । इससे उन्हें बहुत लज्जित होकर अपने स्थान पर आना पड़ा ।

नीली की इस कार्रवार्इ से, अपने गुरूओं के अपमान से समुद्रदत्त, नीली की सासु, ननद आदि को बहुत ही गुस्सा आया । पर भूल उनकी जो नीली द्वारा उसके धर्म-विरूद्ध कार्य उन्होंने करवाना चाहा । इसलिये वे अपना मन मसोसकर रह गये, नीली से वे कुछ नहीं कह सके । पर नीली की ननद को इससे संतोष नहीं हुआ । उसने कोर्इ ऐसा ही छल-कपट कर नीली के माथे व्यभिचार का दोष मढ़ दिया । सच है, सत्पुरूषों पर किसी प्रकार का ऐव लगा देने में पापियों को तनिक भी भय नहीं रहता । बेचारी नीली अपने पर झूठ-मूठ महान कलंक लगा सुनकर बड़ी दु:खी हुर्इ । उसे कलंकित होकर जीते रहने से मर जाना ही उत्तम जान पड़ा । वह उसी समय जिन-मन्दिर में गर्इ और भगवान के सामने खड़ी होकर उसने प्रतिज्ञा की, कि मैं इस कलंक से मुक्त होकर ही भोजन करूँगी, इसके अतिरिक्त मुझे इस जीवन में अन्न पानी का त्याग है । इस प्रकार वह, संन्यास लेकर भगवान् के सामने खड़ी हुर्इ उनका ध्यान करने लगी । इस समय उसकी ध्यानमुद्रा देखने के योग्य थी । वह ऐसी जान पड़ती थी मानो सुमेरू पर्वत की स्थिर और सुन्दर जैसी चूलिका हो । सच है, उत्तम पुरूषों को सुख या दु:ख में जिनेन्द्र-भगवान ही शरण होते हैं, जो अनेक प्रकार की आपत्तियों के नष्ट करनेवाले और इन्द्रादि देवों द्वारा पूज्य हैं ।

नीली की इसप्रकार दृढ़-प्रतिज्ञा और उसके निर्दोश शील के प्रभाव से पुर-देवता का आसन हिल गया । वह रात के समय नीली के पास आई और बोली – सतियों की शिरोमणि, तुझे इसप्रकार निराहार रहकर प्राणों को कष्ट में डालना उचित नहीं । सुन, मैं आज शहर के बड़े-बड़े प्रतिष्ठित पुरूषों को तथा राजा को एक स्वप्न देकर शहर के सब दरवाजे बन्द कर दूँगा । वे तब खुलेंगे जब कि उन्हें कोर्इ शहर की महासती अपने पाँवों से छुएगी । सो जब तुझे राज-कर्मचारी यहाँ से उठाकर ले जाये तब तू उनका स्पर्श करना । तेरे पाँव के लगते ही दरवाजे खुल जाएँगे और तू कलंक मुक्त होगी । यह कहकर पुर-देवता चली गर्इ और सब दरवाजों को बन्द कर उसने राजा वगैरह को स्वप्न दिया ।

सबेरा हुआ । कोर्इ घूमने के लिए, कोर्इ स्नान के लिए और कोर्इ किसी और काम के लिए शहर बाहर जाने लगे । जाकर देखते हैं तो शहर बाहर होने के सब दरवाजे बन्द हैं । सबको बड़ा आश्‍चर्य हुआ । बहुत कुछ कोशिशें की गर्इं, पर एक भी दरवाजा नहीं खुला सारे शहर में शोर मँच गया । बात की बात में राजा के पास खबर पहुँची । इस खबर के पहुँचते ही राजा को रात में आये हुए स्वप्न की याद हो उठी । उसी समय एकबड़ीभारीसभाबुलार्इगई । राजा ने सबको अपने स्‍वप्‍न का हाल कह सुनाया । शहर के कुछ प्रतिष्ठित पुरूषों ने भी अपने को ऐसा ही स्वप्न आया बतलाया । आखिर सब की सम्मति से स्वप्न के अनुसार दरवाजों का खोलना निश्चित किया गया । शहर की स्त्रियाँ दरवाजों का स्पर्श करने को भेजी गर्इं । सब ने उन्हें पाँवों से छुआ, पर दरवाजों को कोर्इ नहीं खोल सकी । तब किसी ने, जो कि नीली के संन्यास का हाल जानता था, नीली को उठा ले जाकर उसके पावों का स्पर्श करवाया । दरवाजे खुल गये । जैसे वैद्य सलार्इ के द्वारा आँखों को खोल देता है । उसी तरह नीली ने अपने चरण स्पर्श से दरवाजों को खोल दिया । नीली के शील की बहुत प्रशंसा हुर्इ । नीली कलंक-मुक्त हुर्इ । उसके अखण्ड शील प्रभाव को देखकर लोगों को बड़ी प्रसन्नता हुर्इ । राजा तथा शहर के और-और प्रतिष्ठित पुरूषों ने बहुमूल्य वस्त्राभूषणों द्वारा नीली का खूब सत्कार किया और इन शब्दों में उसकी प्रशंसा की 'हे जिनभगवान् के चरण-कमलों की भौंरी, तुम खूब फूलो फलो । माता, तुम्हारे शील का माहात्म्य कौन कह सकता है' । सती नीली अपने धर्म पर दृढ़ रही, उससे उसकी बड़े-बड़े प्रतिष्ठित पुरूषों ने प्रशंसा की । इसलिए सर्व-साधारण को भी सती नीली का पथ ग्रहण करना चहिए ।

जिनके वचन सारे संसार का उपकार करने वाले हैं जो स्वर्ग के देवों और बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं से पूज्य हैं और जिनका उपदेश किया हुआ पवित्र शील-ब्रह्मचर्य स्वर्ग तथा परम्परा मोक्ष का देने वाला है, वे जिनभगवान् संसार में सदाकाल रहें और उनके द्वारा कर्म-परवश जीवों को कर्म पर विजय प्राप्त करने का पवित्र उपदेश सदा मिलता रहे ।


+ कडारपिंग की कथा -
कडारपिंग की कथा
अर्हन्त, जिनवाणी और गुरूओं को नमस्कार कर, कडारपिंग की, जो कि स्वदार सन्तोष व्रत-ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट हुआ है, कथा लिखी जाती है ।

कापिल्य नामक एक प्रसिद्ध शहर था । उसके राजा का नाम नरसिंह था । नरसिंह बुद्धिमान् और धर्मात्मा थे । अपने राज्य का पालन वे नीति के साथ करते थे । इसलिये प्रजा उन्हें बहुत चाहती थी ।

राजमंत्री का नाम सुमति था । इनके धनश्री स्त्री और कडारपिंग नामक एक पुत्र था । कडारपिंग का चाल-चलन अच्छा नहीं था । वह बड़ा कामी था । इसी नगर में एक कुबेरदत्त सेठ रहता था । यह बड़ा धर्मात्मा और पूजा, प्रभावना करनेवाला था । इसकी स्त्री प्रियंगसुन्दरी सरल स्वभाव की, पुण्यवती और बहुत सुन्दरी थी ।

एक दिन कडारपिंग ने प्रियंगसुन्दरी को कहीं जाते देख लिया । उसकी रूप-मधुरिमा को देखकर इसका मन बैचेन हो उठा । यह जिधर देखता उधर ही इसे प्रियंगसुन्दरी दिखने लगी । प्रियंगसुन्दरी सिवा इसे और कोर्इ वस्तु अच्छी न लगने लगी । काम ने इसे आपे से भुला दिया । बड़ी कठिनता से उस दिन यह घर पर पहुँच पाया । इसे इस तरह बेचैन और भ्रम-बुद्धि देखकर इसकी माँ को बड़ी चिन्ता हुर्इ । उसने इससे पूछा -- कडार, क्यों आज एकाएक तेरी यह दशा हो गर्इ ? अभी तो तू घर से अच्छी तरह गया था और थोड़ी ही देर में तेरी यह हालत कैसे हुर्इ ? बतलातो, हुआ क्या ? क्यों तेरा मन आज इतना खेदित हो रहा है ? कडारपिंग ने कुछ न सोचा-विचारा, अथवा यों कह लीजिए कि सोच विचार करने को बुद्धि ही उसमें न थी । यही कारण था कि उसने, कौन पूछनेवाली है, इसका भी कुछ खयाल न कर कह दिया कि कुवेरदत्त सेठ की स्त्री को मैं यदि किसी तरह प्राप्त कर सकूँ, तो मेरा जीना हो सकता है । सिवा इसके मेरी मृत्यु अवश्यंभावी है । नीतिकार कहते हैं कि काम से अन्धे हुए लोगों को धिक्कार है जो लज्जा और भय-रहित होकर फिर अच्छे और बुरे कार्य को भी नहीं सोचते । बेचारी धनश्री पुत्र की यह निर्लज्जता देख कर दंग रह गर्इ । वह इसका कुछ उत्तर न देकर सीधे अपने स्वामी के पास गर्इ और पुत्र की सब हालत उसने कह सुनार्इ । सुमति एक राज-मंत्री था और बुद्धिमान् था । उसे उचित था कि वह अपने पुत्र को पाप की ओर से हटाने का यत्न करता, पर उसने इस डर से, कि कहीं पुत्र मर न जाये, उलटा पाप कार्य का सहायक बनने में अपना हाथ बटाया । सच है, विनाश काल जब आता है तब बुद्धि भी विपरीत हो जाया करती है । ठीक यही हाल सुमति का हुआ । वह पुत्र की आशा पूरी करने के लिए एक कपट-जाल रचकर राजा के पास गया और बोला -- महाराज, रत्नद्वीप में एक किंजल्क जाति के पक्षी होते हैं, वे जिस शहर में रहते हैं वहाँ महामारी, दुर्भिक्ष, रोग, अपमृत्यु, आदि नहीं होते तथा उस शहर पर शत्रुओं का चक्र नहीं चल पाता, और न चोर वगैरह उसे किसी प्रकार की हानि पहुँचा सकते हैं । और महाराज, उनकी प्राप्ति का भी उपाय सहज है । अपने शहर में जो कुबेरदत्त सेठ हैं; उनका जाना आना प्रायः वहाँ हुआ करता है और वे हैं भी कार्यचतुर, इसलिए उन पक्षियों के लाने को आप उन्हें आज्ञा कीजिए । अपने राज-मंत्री की एक अभूतपूर्व बात सुनकर राजा तो पक्षियों को मॅंगाने को अकुला उठे । भला, ऐसी आश्चर्य उपजाने वाली बात सुनकर किसे ऐसी अपूर्व वस्तु की चाह न होगी ? और इसीलिए महाराज ने मंत्री की बातों पर कुछ विचार न किया । उन्होंने उसी समय कुबेरदत्त को बुलवाया और सब बात समझाकर उसे रत्नद्वीप जाने को कहा । बेचारा कुबेरदत्त इस कपट-जाल को कुछ न समझ सका । वह राजाज्ञा पाकर घर पर आया और रत्नद्वीप जाने का हाल उसने अपनी विदुषी प्रिया से कहा । सुनते ही प्रियंगुसुन्दरी के मन में कुछ खटका पैदा हुआ । उसने कहा -- नाथ, जरूर कुछ दाल में काला है । आप ठगे गये हो किंजल्क पक्षी की बात बिल्कुल असंभव है । भला, कहीं पक्षियों का भी ऐसा प्रभाव हुआ है ? तब क्या रत्नद्वीप कोई मरता ही न होगा ? बिल्कुल झूठ ! अपने राजा सरल-स्वाभव के हैं सो जान पड़ता है वे भी किसी के चक्र में आ गये हैं । मुझे जान पड़ता है, यह कारस्तानी राज-मंत्री की हुर्इ है । उसका पुत्र कडारपिंग महाव्यभिचारी है । उसने मुझे एक दिन मन्दिर जाते समय देख लिया था । मैं उसकी पापभरी दृष्टि को उसी समय पहचान गयी थी । मैं जितना ही ध्यान से इस बात पर विचार करती हूँ तो अधिक-अधिक विश्वास होता जाता है कि इस षडयंत्र के रचने से मंत्री महाशय की मंशा बहुत बुरी है | उन्होंने अपने पुत्र की आशा पूरी करने का और कोर्इ उपाय न खोज पाकर आपको विदेश भेजना चाहा है । इसलिए अब आप यह करें कि यहाँ से तो आप रवाना हो जायें, जिससे कि किसी को सन्देह न हो और रात होते ही जहाज को आगे जाने देकर आप वापिस लौट आइये । फिर देखिये कि क्या गुल खिलता है । यदि मेरा अनुमान ठीक निकले तब तो फिर आपके जाने की कोर्इ आवश्यकता नहीं और नहीं तो दस-पन्द्रह दिन बाद चले जाइयेगा ।

प्रियंगसुन्दरी की बुद्धिमानी देखकर कुबेरदत्त बहुत खुश हुआ । उसने उसके कहे अनुसार ही किया । जहाज रवाना हो गया । जब रात हुर्इ तब कुबेरदत्त चुपचाप घर पर आकर छुप रहा । सच है, कभी-कभी दुर्जनों की संगति से सत्पुरूष को भी वैसा ही हो जाना पड़ता है ।

जब यह खबर कडारपिंग के कानो में पहुँची कि कुबेरदत्त रत्नद्वीप के लिए रवाना हो गया । तो उसकी प्रसन्नता का कुछ ठिकाना न रहा । वह जिस दिन के लिए तरस रहा था, बैचेन हो रहा था वही दिन उसके लिए जब उपस्थित हो गया तब वह क्यों न प्रसन्न होगा ? प्रियंगसुन्दरी के रूप का भूखा और काम से उन्मत्त वह पापी कडारपिंग बड़ी आशा और उत्सुकता से कुबेरदत्त के घर पर आया । प्रियंगसुन्दरी ने इसके पहले ही उसके स्वागत की तैयारी के लिए पाखाना जाने के कमरे को साफ-सुथरा करवाकर और उसमें बिना निवारको एक पलंग बिछवाकर उसपर एक चादर डलवा दी थी । जैसे ही मन्द-मन्द मुसकाते हुए कुँवर कडारपिंग आये, उन्हे प्रियंगसुन्दरी उस कमरे में लिवा ले गई और पलंग पर बैठने का उनसे उसने इशारा किया । कडारपिंग प्रियंगसुन्दरी को अपना इस प्रकार स्वागत करते देखकर, जिसका कि उसे स्वप्न में भी खयाल नहीं था, फूल-कर कुप्पा हो गया । वह समझने लगा, स्वर्ग अब थोडा ही ऊँचा रह गया है; पर उसे यह विचार भी न हुआ कि पाप का फल बहुत बुरा होता है । खुशी में आकर प्रियंगसुन्दरी के इशारे के साथ ही जैसे ही वह पलंग पर बैठा कि धड़ाम से नीचे जा गिरा । जब वहाँ की भीषण दुर्गन्ध ने उसकी नाक में प्रवेश किया तब उसे भान हुआ कि मैं कैसे अच्छे स्थान पर आया हूँ । वह अपनी करनी पर बहुत पछताया, उसने बहुत आर्जू-मिन्नत अपने छुटकारा पाने के लिए की, पर उसकी इस आजिजी पर ध्यान देना प्रियंगसुन्दरी को नहीं भाया । उसने उसे पाप कर्म का उपयुक्त प्रायश्चित दिये बिना छोड़ना उचित नहीं समझा । नारकी जैसे नरकों में पड़कर दुख: उठाते है, ठीक वैसे ही एक राज-मंत्री का पुत्र अपनी सब मान-मर्यादा पर पानी फेर कर अपने किसी कर्मों का फल आज पाखाने में पड़ा-पड़ा भोग रहा है । इस तरह कष्ट उठाते-उठाते पूरे छह महीने बीत गये । इतने में कुबेरदत्त का जहाज भी रत्नद्वीप से लौट आया । जहाज का आना सुनकर सारे शहर में इस बात का शोर मच गया कि सेठ कुबेरदत्त की किंजल्क पक्षी ले आये । इधर कुबेरदत्त ने कडारपिंग को बाहर निकालकर उसे अनेक प्रकार के पक्षियो के पाँखो से खूब सजाया और काला मुँह करके उसे एक विचित्र ही जीव बना दिया । इसके बाद उसने कडारपिंग के हाथ-पाँव बाँधकर और उसे एक लोहे के पिजरे में बन्द कर राजा के सामने लाउपस्थित किया । पश्चात् कुबेरदत्त ने मुसकुराते हुए यह कह कर, कि देव यह आपका मँगाया किंजल्क पक्षी उपस्थित है, यथार्थ हाल राजा से कह दिया । सच्चा हाल जानके राजा को मंत्री-पुत्र पर बड़ा गुस्सा आया । उन्होंने उसी समय उसे गधे पर बैठाकर और सारे शहर में घुमा-फिराकर उसके मार डालने की आज्ञा दे दी । वही किया भी गया । कडारपिंग को अपनी करनी का फल मिल गया । वह बड़े खोटे परिणामों से मरकर नरक गया । सच है, परस्त्री-आसक्त पुरूष की नियम से दुर्गति होती है । इसके विपरीत जो भव्य-पुरूष जिनभगवान् के उपदेश किये गए और सुखों के देने वाले शीलव्रत के पालने का यत्न करते हैं, वे पद-पद पर आदर-सत्कार के पात्र होते हैं । इसलिए उत्तम पुरूषों को सदा पर स्त्री-त्याग व्रत ग्रहण किये रहना चाहिये ।

भगवान् के उपदेश किये हुए, देवों द्वारा प्रशंसित और स्वर्ग-मोक्ष का सुख देने वाले पवित्र शीलव्रत जो मन, वचन, काय की पवित्रता के साथ पालन करते हैं, वे स्वर्गों का सुख भोगकर अन्त में मोक्ष के अनुपम सुख को प्राप्त करते हैं ।


+ देवरति राजा की कथा -
देवरति राजा की कथा
केवलज्ञान जिनका नेत्र है, उन जगपवित्र जिनभगवान् को नमस्कार कर देवरति नामक राजा का उपाख्यान लिखा जाता है, जो अयोध्या के स्वामी थे ।

अयोध्या नगरी के राजा देवरति थे । उनकी रानी का नाम रक्ता था । वह बहुत सुन्दरी थी । राजा सदा उसी के नाद में लगे रहते थे । वे बड़े विषयी थे । शत्रु बाहर से आकर राज्य पर आक्रमण करते, उसकी भी उन्हें कुछ परवा नहीं थी । राज्य की क्या दशा है, इसकी उन्होंने कभी चिन्ता नहीं की, जो धर्म और अर्थ पुरूषार्थ को छोड़कर अनीति से केवल काम का सेवन करते हैं, सदा विषयवासना के ही पास बने रहते हैं, वे नियम से कष्टों को उठाते हैं । देवरति की भी यही दशा हुर्इ । राज्य की ओर से उनकी ये उदासीनता मंत्रियों को बहुत बुरी लगी । उन्होंने राजकाज के सम्हालने की राजा से प्रार्थना की, पर उसका फल कुछ नहीं हुआ । यह देख मंत्रियों ने विचारकर, देवरति के पुत्र जयसेन को तो अपना राजा नियुक्त किया और देवरति को उनकी रानी के साथ देशबाहर कर दिया । ऐसे काम को धिक्कार है, जिससे मान-मर्यादा धूल में मिल जाये और अपने को कष्ट सहना पड़े ।

देवरति अयोध्या से निकलकर एक भयानक वनो में आये । रानी को भूख ने सताया, पास खाने को एक अन्न का कण तक नहीं । अब वे क्या करें ? इधर जैसे-जैसे समय बीतने लगा, रानी भूख से बैचेन होने लगी । रानी की दशा देवरति से नहीं देखी गर्इ । और देख भी वे कैसे सकते थे ? उसी के लिए तो अपना राज-पाट तकउन्होंनेछोड़दियाथा । आखिर उन्हें एक उपाय सूझा । उन्होंने उसी समय अपनी जाँघ काटकर उसका माँस पकाया और रानी को खिलाकर उसकी भूख शान्त की । और प्यास मिटाने के लिए उन्होंने अपनी भुजाओं का खून निकालकर और उसे एक औषधि बताकर पिलाया । इसके बाद वे धीरे-धीरे यमुना के किनारे पर आ पहुँचे । देवरति ने रानी को तो एक झाड़ के नीचे बैठाया और आप भोजन सामग्री लेने को पास के एक गाँव में गये ।

यहाँ पर एक छोटा-सा पर बहुत ही सुन्दर बगीचा था । उसमें एक कोर्इ अपंग मनुष्य चड़स खींचता हुआ और गा रहा था । उसकी आवाज बड़ी मधुर थी । इसलिए उसका गाना बहुत मनोहारी और सुननेवालों को प्रिय लगता था । उसके गाने की मधुर आवाज रक्तारानी के भी कानों से टकरार्इ । न जाने उसमें ऐसी कौन-सी मोहक शक्ति थी, जो रानी को उसने उसी समय मोह लिया और ऐसा मोहा कि उसे अपने निजत्व से भी भुला दिया । रानी सब लाज-शरम छोड़कर उस अपंग के पास गर्इ और उससे अपनी पाप-वासना उसने प्रगट की । वह अंपग कोर्इ ऐसा सुन्दर न था, पर रानी तो उसपर जीजान से न्यौछावर हो गर्इ । सच है, ‘काम न देखे जात कुजात’ । राजरानी की पाप-वासना सुनकर वह घबराकर रानी से बोला – मैं एक भिखारी और आप राजरानी, तब मेरी आपकी जोडी़ कहाँ ? और मुझे आपके साथ देखकर क्या राजा साहब जीता छोड़ देंगे ? मुझे आपके शूरवीर और तेजस्वी प्रियतम की सूरत देखकर कँपनी छूटती है । आप मुझे क्षमा कीजिये । उत्तर में रानी महाशया ने कहा -- इसकी तुम चिन्ता न करो । मैं उन्हे तो अभी ही परलोक पहुँचाये देती हूँ । सच है, दुराचारिणी स्त्रियाँ क्या-क्या अनर्थ नहीं कर डालतीं । ये तो इधर बातें कर रहे थे कि राजा भी इतने में भोजन लेकर आ गये । उन्हें दूर से देखते ही कुलटारानी ने मायाचार से रोना आरम्भ किया । राजा उसकी यह दशा देखकर आश्चर्य में आ गये । हाथ के भोजन के एक ओर पटककर वे रानी के पास दौडे़ आकर बोले -- प्रिये, प्रिये, कहो ! जल्दी कहो ! क्या हुआ ? क्या किसी ने तुम्हें कुछ कष्ट पहुँचाया ? तुम क्यों रो रही हो ? तुम्हारा आज अकस्मात् रोना देखकर मेरा सब धैर्य छूटा जाता है । बतलाओ, अपने रोने का कारण, जल्दी बतलाओ ? रानी एक लम्बी आह भरकर बोली -- प्राणनाथ, आपके रहते मुझे कौन कष्ट पहुँचा सकता है ? परन्तु मुझे किसी के कष्ट पहुँचाने से भी जितना दु:ख नहीं होता उससे कहीं बढ़कर आज अपनी इस दशा का दुःख है । नाथ, आप जानते हैं, आज आपकी जन्मगाँठ का दिन है । पर अत्यंत दुःख है कि पापी देव ने आज मुझे इस भिखारिणी की दशा में पहुँचा दिया । पर मेरे पास एक फूटी-कौड़ी भी नहीं । बतलाइए, मैं आज ऐसे उत्सव के दिन आपकी जन्मगाँठ का क्या उत्सव मनाऊँ ? सच है नाथ, बिना पुण्य के जीवों को अथाह शोक-सागर में डूब जाना पड़ता है । रानी की प्रेम-भरी बातें सुनकर राजा का गला भर आया, आँखों से आँसू टपक पड़े । उन्होंने बड़े प्रेम से रानी के मुँह को चूमकर कहा -- प्रिये, इसके लिये कोर्इ चिन्ता की बात नहीं । कभी वह दिन भी आयेगा जिस दिन तुम अपनी कामनाओं को पूरी कर सकोगी । और न भी आये तो क्या ? जबकि तुम जैसी भाग्यशालिनी जिसकी प्रिया है उसे इस बात की कुछ परवा भी नहीं है । जिसने अपनी प्रिया की सेवा के लिये अपना राजपाट तक तुच्छ समझा, उसे ऐसी-ऐसी छोटी बातों का दुःख नहीं होता । उसे यदि दु:ख होता है, तो अपनी प्यारी को दुःखी देखकर ! प्रिये, इस शोक को छोड़ो । मेरे लिए तो तुम ही सब-कुछ हो । हाय ! ऐसे निश्टकपट प्रेम का बदला जान लेकर दिया जायगा, इस बात की खबर या सम्भावना बेचारे रतिदेव को स्वप्न में भी नहीं थी । दैव की विचित्र-गति है ।

राजा के इस हार्दिक और सच्चे प्रेम का पापिनी रानी के पत्थर के हृदय पर जरा भी असर न हुआ । वह ऊपर से प्रेम बताकर बोली -- अस्तु, नाथ, जो बात हो नहीं सकती उसके लिए पछताना तो व्यर्थ ही है । पर तब भी मैं अपने चित्त को सन्तोषित करने को इस पवित्र फूल की माला द्वारा नाम-मात्र के ही लिए कुछ करती हूँ । यह कहकर रानी ने अपने हाथ में जो फूल गूँथने की रस्सी थी, उससे राजा को बाँध दिया । बेचारा वह तब भी यही समझा कि रानी कोर्इ जन्म-गाँठ की विधि करती होगी और यही समझ उसने खूब मजबूत बाँध जाने पर भी चूँ तक नहीं किया । जब राजा बाँध दिया गया और उसके निकलने का कोर्इ भय नहीं रहा तब रानी ने इशारे से उस अपंग का बुलाया और उसकी सहायता से पास ही बहनेवाली यमुना नदी के किनारे ले जाकर बडे ऊँचे से राजा को नदी में ढकेल दिया । और आप अब अपने दूसरे प्रियतम के पास रहकर अपनी नीच मनोवृत्तियों को सन्तुष्ट करने लगी । नीचता और कुलटापन की हद हो गर्इ ।

पुण्य का जब उदय होता है तब कोर्इ कितना ही कष्ट क्यों न दे या कैसा ही भंयकर आपत्ति का क्यों न सामना करना पड़े । पर तब भी वह रक्षा पा जाता है । देवरति के भी कोर्इ ऐसा पुण्य-योग था, जिससे रानी के नदी में डाल देने पर भी वह बच गया । कोर्इ गहरी चोट उसके नहीं आर्इ । वह नदी से निकल कर आगे बढ़ा । धीरे-धीरे वह मंगलपुर नामक शहर के निकट आ पहुँचा । देवरति कर्इ दिनों तक बराबर चलते रहने से बहुत थक गया था । उसे बीच में कोर्इ अच्छी जगह विश्राम करने को नहीं मिली थी, इसलिए अपनी थकावट मिटाने के लिए वह एक छायादार वृक्ष के नीचे सो गया । मानो जैसे वह सुख देने वाले जैन-धर्म की छत्र-छाया में ही सोया हो ।

मंगलपुर का राजा श्रीवर्धन था । उसके कोर्इ सन्तान न थी । इसी समय उसकी मृत्यु हो गर्इ । मंत्रियों ने यह विचारकर, कि पट्ट-हाथी को एक जल भरा घड़ा दिया जाकर वह छोड़ा जाये और वह जिसका अभिषेक करे वही अपना राजा हो, एक हाथी को छोड़ा । दैव की विचित्र लीला है, जो राजा है, उसे वह रंक बना देता है । और जो रंक है, उसे संसार का चक्रवर्ती सम्राट बना देता है । देवरति का दैव जब उसके विपरीत हुआ तब तो उसे पथ-पथ का भिखारी बनाया, और अनुकूल होने पर पीछा सब राज-योग मिला दिया । देवरति भर नींद में झाड़ के नीचे सो रहा था । हाथी उधर ही पहुंचा और देवरति का उसने अभिषेक कर दिया । देवरति बड़े आनन्द-उत्साह के साथ शहर में लाया जाकर राज्य-सिंहासन पर बैठाया गया । सच है, पुण्य जब पल्ले में होता है तब आप स्त्रियाँ भी सुख के रूप में परिणत हो जातीं हैं । इसलिए सुख की चाह करनेवालों को भगवान् के उपदेश किये हुऐ मार्ग द्वारा पुण्य-कर्म करना चाहिए । भगवान् की पूजा, पात्रों को दान, व्रत, उपवास ये सब पुण्य-कर्म हैं । इन्हें सदा करते रहना चाहिए ।

देवरति फिर राजा हो गये । पर पहले और अबके राजापन में बहुत फर्क है । अब वे स्वयं सब राज-काज देखा करते हैं । पहले से अब उनकी परिणति में भी बहुत भेद पड़ गया है । जो बातें पहले उन्हें बहुत प्यारी थीं और जिनके लिए उन्होंने राज्य-भ्रष्ट होना तक स्वीकार कर लिया था, अब वे ही बातें उन्हें अत्यन्त अप्रिय हो उठीं । अब वे स्त्री नाम से घृणा करते हैं । वे एक कुल-कलंकनी का बदला सारे संसार कीस्त्रियों को कुल-कलंकिनी कहकर लेते हैं । सच है, जो एक बार दुर्जनों द्वारा ठगा जाता है, वह फिर अच्छे पुरूषों के साथ भी वैसा ही व्यवहार करने लगता है । गरम दूध का जला हुआ छांछ को भी फूँक-फूँककर पीता है । देवरति की भी अब विपरीत गति है । अब वे स्त्रियों को नहीं चाहते । वे सबको दान करते हैं, पर जो अपंग, लूला, लँगड़ा, होता है, उसे वे एक अन्न का कण तक देना पाप समझते है ।

इधर रक्ता रानी ने बहुत दिनो तक तो वहीं रहकर मजा-मौज मारी और बाद वह उस अपंग को एक टोकरे में रखकर देश-विदेश घूमने लगी । उस टोकरे को सिर पर रखे हुए वह जहाँ पहुँचती अपने को महासती जाहिर करती और कहती कि माता-पिता ने जिसके हाथ मुझे सौंपा वही मेरा प्राण-नाथ है, देवता है । उसकी इस ठगार्इ से बेचारे लोग ठगे जाकर उसे खूब रूपया पैसा देते । इसी तरह भिक्षा-वृत्ति करती-करती रक्ता रानी मंगलपुर में आ निकली । वहाँ भी लोगों की उसके सतीत्व पर बड़ी श्रद्धा हो गई । हाँ सच है, जिन स्त्रियों ने ब्रह्मा, विष्णु, महादेव सरीखे देवताओं को भी ठग लिया, तब साधारण लोग उनके जाल में फँस जायें इसका आश्चर्य
क्‍या ?

एक दिन ये दोनों गाते हुए राजमहल के सामने आये । इनके सुन्दर गाने को सुनकर ड्योढ़ीवान ने राजा से प्रार्थना की -- महाराज, सिंह-द्वार पर एक सती अपने अपंग पति को टोकरे में रखकर और उसे सिर पर उठाये खड़ी है । वे दोनों बड़ा ही सुन्दर गाना जानते हैं । महाराज का वे दर्शन करना चाहते हैं । आज्ञा हो तो मैं उन्हें भीतर आने दूँ । इसके साथ ही सभा मे बैठे हुए और-और प्रतिष्ठित कर्मचारियों ने भी उनके देखने की इच्छा जाहिर की । राजा ने एक पर्दा डलवाकर उन्हें बुलवाने की आज्ञा की ।

सती सिर पर टोकरा लिए भीतर आर्इ । उसने कुछ गाया । उसके गाने को सुनकर सब मुग्ध हो गये और उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे । राजा ने उसकी आवाज सुनकर उसे पहिचान लिया । उसने पर्दा हटवाकर कहा -- अहा, सचमुच में यह महासती है ! इस का सतीत्व मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ । इसके बाद ही उन्होंने अपनी सारी कथा सभा में प्रगट कर दी । लोग सुनकर दाँतों तले अँगुली दबा गये । उसी समय महासती रक्ता को शहर-बाहर करने का हुक्म हुआ । देवरति को स्त्रियों का चरित्र देखकर बड़ा वैराग्य हुआ । उन्होंने अपने पहले पुत्र जयसेन को अयोध्या से बुलवाया और उसे ही इस राज्य का भी मालिक बनाकर आप श्री यमधराचार्य के पास जिन-दीक्षा ले गये, जो कि अनेक सुखों को देनेवाली है । साधु होकर देवरति ने खूब तपश्‍चर्या की, बहुतों को कल्याण का मार्ग बतलाया और अन्त में समाधि से शरीर त्यागकर वे स्वर्ग में अनेक ऋद्धियों के धारक हुए ।

रक्ता रानी सरीखी कुलटा स्त्रियों का घृणित चरित देखकर और संसार, शरीर, भोगादिकों के इन्द्र-धनुष की तरह क्षणिक समझकर जिन देवरति राजा ने जिन-दीक्षा ग्रहणकर मुनिपद स्वीकार किया, वे गुणों के खजाने, मुनिराज मुझे मोक्ष-लक्ष्मी का स्वामी बनावें ।


+ गोपवती की कथा -
गोपवती की कथा
संसार द्वारा वन्दना, स्तुति किये गये और सब सुखों को देने वाले जिनभगवान् को नमस्कार कर गोपवती कथा लिखी जाती है, जिसे सुनकर हृदय में वैराग्य भावना जगती है ।

पलास गाँव में सिंहबल नामक साधारण गृहस्थ रहता था । उसकी स्त्री का नाम गोपवती था । गोपवती बड़े दुष्ट स्वाभ की स्त्री थी । उसकी दिन-रात की खटपट से बेचारा सिंहबल तबाह हो गया । उसे एक दिन पलभर के लिए भी गोपवती के द्वारा कभी सुख नहीं मिला ।

गोपवती से तंग आकर एक दिन सिंहबल पास ही के एक पद्मिनीखेट नाम के गाँव में गया । वहाँ उसने अपनी पहली स्त्री को बिना कुछ पूछे-ताछे गुप्तरीति से सिंहसेन चौधरी की सुभद्रा नाम की लड़की से, जो कि बहुत ही खूबसूरत थी, ब्याह कर लिया । किसी तरह यह बात गोपवती को मालूम हो गर्इ । सुनते ही क्रोध के मारे वह आग-बबूला हो गर्इ । उससे सिंहबल का यह अपराध नहीं सहा गया । वह उसे उसके अपराध की योग्य सजा देने की फिराक में लगी ।

एक दिन शाम के कोर्इ सात बजे होंगे कि गोपवती अपने घर से निकल कर पद्मिनीखेट गर्इ । उस समय कोर्इ ग्यारह बज गये होंगे । गोपवती सीधी सिंहसेन के घर पहुँची । घर के लोगों ने समझा कि कोर्इ आवश्यक काम के लिए यह आर्इ होगी, सबेरा होने पर विशेष पूछ-ताछ करेंगे । यह विचारकर वे सब सो गये । गोपवती भी तब लोगों को दिखाने के लिए सो गर्इ । पर जब सब को नींद आ गर्इ, तब आप चुपके से उठी और जहाँ अपनी माँ के पास बेचारी सुभद्रा सोर्इ हुर्इ थी, वहाँ पहुँचकर उस पापिनी ने सुभद्रा का मस्तक काट लिया और उसे लेकर आप रात ही में अपने घर पर आ गर्इ । सबेरा होते ही यह हाल सिंहबल को मालूम हुआ । सुभद्रा के मुर्दे को देखकर उसे बेहद दु:ख हुआ । वह खिन्न मन होकर अपने घर आ गया । उसे आया देखकर गोपवती अब उसका बड़ा आदर-सत्कार करने लगी । बड़ी स्नेह प्रगट कर उसे भोजन कराने लगी । पर सिंहबल के हृदय पर तो सुभद्रा के मरण की बड़ी गहरी चोट लगी थी, इसलिए उसे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, और वह सदा उदास रहा करता था । और सच भी है, एक महादु:खी को भोजन वगैरह में क्या प्रीति होती होगी ? सिंहबल की सुभद्रा के लिए यह दशा देख गोपवती का क्रोध और भी बढ़ा गया । एक दिन बेचारा सिंहबल उदास मन से भोजन कर रहा था । यह देख गोपवती ने क्रोध से सुभद्रा का मस्तक लाकर उसकी थाली में डाल दिया और बोली -- हाँ, बिना इसके देखे तुझे भोजन अच्छा नहीं लगता था; अब तो अच्छा लगेगा न ? सुभद्रा के सिर को देखकर सिंहबल काँप गया । वह 'हाय ! यह तो महाराक्षसी है' इस प्रकार जोर से चिल्लाकर डर के मारे भागने लगा । इतने में राक्षसी गोपवती ने पास ही पड़े हुए भाले को उठाकर सिंहबल की पीठ में इस जोर से मारा कि वह उसी समय तड़फड़ाकर वहीं पर ढेर हो गया । गोपवती के ऐसे घृणित चरित को देखकर बुद्धिमानों को उचित है कि वे दुष्ट स्त्रियों पर कभी विश्वास न लावें ।

वे कर्मों के जीतने वाले जिनेन्द्र भगवान् संसार में सर्व श्रेष्ठ कहलावें, जो कामरूपी हाथी के मार ने को सिंह हैं, संसार का भय मिटानेवाले हैं, शांति, स्वर्ग और मोक्ष के देने वाले हैं और मोक्षरूपी रमणी-रत्न के स्वामी हैं । वे मुझे भी शांति प्रदान करें ।


+ वीरवती की कथा -
वीरवती की कथा
संसार के बन्धु, पवित्रता की मूर्ति और मुक्ति का स्वतंत्रता का सुख देने वाले जिनेन्द्र भगवान् को नमस्कार कर वीरवती का उपाख्यान लिखा जाता है, जो सत्पुरूषों के लिए वैराग्य का बढ़ाने वाला है ।

राजगृह में धनमित्र नाम का एक सेठ रहता था । उसकी स्त्री का नाम धारिणी और पुत्र का दत्त था । भूमिगृह नामक एक और नगर था । उसमें आनन्द नाम का एक साधारण ग्रहस्थ रहता था । इसकी स्त्री मित्रवती थी । इसके एक वीरवती नाम की कन्या हुर्इ । वीरवती का ब्याह दत्त के साथ हुआ । सो ठीक ही है, जो सम्बन्ध दैव को मंजूर होता है उसे कौन रोक सकता है ।

यहीं पर एक चोर रहता था । इसका नाम था गारक । किसी समय वीरवती ने इसे देखा । वह इसकी सुन्दरता पर मुग्ध हो गर्इ । एक बार दत्त रत्नद्वीप से धन कमाकर घर की ओर रवाना हुआ । रास्ते में इसकी सुसराल पड़ी । इसे अपनी प्रियतमा से मिले बहुत दिन हो गये थे, और यह उससे बहुत प्रेम भी करता था, इसलिये ससुराल होकर घर जाना उचित समझा । यह रास्तें में एक जंगल में ठहरा । यहीं एक सहस्त्रभट नाम के चोर ने इसे देखा । यहाँ से चलते समय दत्त के पीछे यह चोर भी विनोद से हो लिया और साथ-साथ भूमिगृह आ पहुँचा ।

ससुराल में दत्त का बहुत कुछ आदर-सत्कार हुआ । वीरवती भी बड़े प्रेम के साथ इससे मिली । पर उसका चित्त स्वभाव प्रसन्न न होकर कुछ बनावट को लिए था । उसका मन किसी गहरी चोट से जर्जरित है, इस बात को चतुर पुरूष उसके चेहरे के रंग-ढंग से बहुत जल्दी ताड़ सकता था । पर सरल-स्वभावी दत्त इसका रत्तीभर भी पता नहीं पा सका । कारण अपनी स्त्री के सम्बन्ध में उसे स्वप्न में किसी तरह का सन्देह न था । बात यह थी कि जिस चोर के साथ वीरवती की आशनार्इ थी, वह आज किसी बड़े भारी अपराध के कारण सूली पर चढ़ाया जाने वाला था । वीरवती को इसी का बड़ा रंज था और इसी से उसका चित्त चल-विचल हो रहा था । रात के समय जब सब घर के लोग सो गये तब वीरवती अकेली उठी और हाथ में एक तलवार लिये वहीं पहुँची जहाँ अपराधी सूली पर चढ़ाये जाते थे । इसे घर से निकलते समय सहस्त्रभट चोर ने देख लिया । वह यह देखने के लिए कि इतनी रात में यह अकेली कहाँ जाती है, उसके पीछे-पीछे हो लिया । वीरवती को उसके पाँवों की आवाज से जान पड़ा कि उसके पीछे-पीछे कोर्इ आ रहा है, पर रात अन्धेरी होने से वह उसे देख न सकी । तब उस दुष्टा ने अपने हाथ की तलवार का एक वार पीछे की ओर किया । उससे बेचारे सहस्त्रभट की अँगुलियाँ कट गर्इं । तलवार को झटका लगने से उसे और दृढ़ विश्वास हो गया कि पीछे कोर्इ अवश्य आ रहा है । वह देखने के लिए खड़ी हो गर्इ, पर उसे कुछ सफलता प्राप्त न हुर्इ । सहस्त्रभट कुछ और पीछे हट गया । वह फिर आगे बढ़ी । पास ही सूली का स्थान उसे देख पड़ा । वह पीछे आने वाले की बात भूलकर दौड़ी हुर्इ अपने जार के पास पहुँची । उसे सूली पर चढ़ाये बहुत समय नहीं हुआ, इसलिए उसकी अभी कुछ साँस बाकी थी । वीरवती को देखते ही उसने कहा -- प्रिये, यही मेरी और तुम्हारी अन्तिम भेंट है । मैं तुम्हारी ही आशा लगाये अब तक जी रहा हूँ, नहीं तो कभी का मर मिटा होता । अब देर न कर मुझ दुःखी को अन्तिम प्रेमालिंगन दे, सुखी करो और आओ, अपने मुख का पान मेरे मुख में देओ; जिससे मेरा जीवन जिसके लिए अबतक टिका है उस तुमसी सुन्दरी का आलिंगन कर शान्ति से परमधाम सिधारे । हाय ! इस काम को धिक्कार है, जो मृत्यु के मुख में पड़ा हुआ भी उसे चाहता है ।`

वीरवती ने अपने जार को सूली पर से उतारने का कोर्इ उपाय तत्काल न देखकर पास में पड़े हुए कुछ मुर्दों को इक्ट्ठा किया और उन्हें ऊपर तले रखकर वह उन पर चढ़ी और अपना मुँह उसके मुँह के पास ले जाकर बोली -- प्रियतम, लो अपनी इच्छा पूरी करो । गारक ने वीरवती के मुँह का पान लेने के लिए उसके ओठों को अपने मुँह में लिया था । कि कोर्इ ऐसा धक्का लगा जिससे वीरवती के पाँव नीचे का मुर्दों का ढेर खिसक जाने से वीरवती नीचे आ गिरी और उसके ओंठ कटकर गारक के मुँह में रह गये । वीरवती वस्त्र से अपना मुँह छिपाकर दौड़ी-दौड़ी घर पर आर्इ और अपने पति के सिरहाने पहुँचकर उसने एकदम चिल्लाया कि दौड़ो ! दौड़ो !! इस पापी ने मेरा ओठ काट लिया और साथ ही बड़े जोर से वह रोने लगी । उसी समय अड़ोस-पड़ोस और घर के लोगों ने आकर दत्त को बाँध लिया । सच है, पापिनी, कुलटा और अपने वंश का नाश करने वाली स्त्रियाँ क्या नीच-कर्म नहीं कर सकती ?

सबेरा हुआ । दत्त राजा के सामने उपस्थित किया गया । उसका क्या अपराध है और वह सच है या झूठ, इसकी कुछ विषेश तलाश न की जाकर एकदम उसके मारने का हुक्म दिया गया । पर यह सबको ध्यान में रखना चाहिए कि जब पुण्य का उदय होता है तब मृत्यु के समय भी रक्षा हो जाती है । पाठकों को विनोदी सहस्त्रभट की याद होगी । वह वीरवती के अन्तिम कुकर्म तक उसके आगे-पीछे उपस्थित ही रहा है । उसने सच्‍ची घटना अपनी आँखों से देखी है । वह इस समय यहीं उपस्थित था । राजा का दत्त के लिए मारने का हुक्म सुनकर उससे न रहा गया । उसने अपनी कुछ परवा न कर सब सच्ची घटना राजा से कह सुनार्इ । राजा सुनकर दंग रह गया । उसने उसी समय अपने पहले हुक्म को रद्द कर निरपराध दत्त की रिहार्इ दी और वीरवती को उसके अपराध की उपयुक्त सजा दी । सच है, पुण्यवानों की सभी रक्षा करते हैं ।

दुष्ट स्त्रियों का ऐसा घृणित और कलंकित चरित्र देखकर सबको उचित है कि वे दु:ख देनेवाले विषयों से अपनी सदा रक्षा करें ।
वे महात्मा धन्य हैं, जो भगवान् के उपदेश किये हुए पवित्र शीलव्रत से विभूषित हैं, कामरूपी क्रूर हाथी को मारने के लिए सिंह हैं, विषयों को जिन्होंने जीत लिया है, ज्ञान, ध्यान, आत्मानुभव में जो सदा मग्न हैं, विषय भोगों से निरन्तर उदास हैं, भव्य रूपी कमलों की प्रफुल्लित करनें में जो सूर्य हैं और संसार-समुद्र से पार करने में जो बड़े कर्मवीर खेवटिया हैं, वे सबका कल्याण करें ।


+ सुरतराजा की कथा -
सुरतराजा की कथा
देवों द्वारा पूजा किये गये जिनभगवान् के चरणों को भक्ति सहित नमस्कार कर सुरत नाम के राजा का हाल लिखा जाता है ।

सुरत अयोध्या के राजा थे । इनके पाँच सौ स्त्रियाँ थीं । उनमें पट्टरानी का पद महादेवी सती को प्राप्त था । राजा का सती पर बहुत प्रेम था । वे रात-दिन भोंगों में ही आसक्त रहा करते थे उन्हें राज-काज की कुछ चिन्ता न थी । अन्त:पुर के पहरे पर रहने वाले सिपाही से उन्होंने कह रक्खा था कि जब कोर्इ खास मेरा कार्य हो या कभी कोर्इ साधु-महात्मा यहाँ आवें तो मुझे उनकी सूचना देना । वैसे कभी कुछ कहने को न आना ।

एक दिन पुण्योदय से एक महिना के उपवासे दमदत्त और धर्मरूचि मुनि आहार के लिए राजमहल में आये । उन्हें देखकर द्वारपाल राजा के पास गया और नमस्कार कर उसने मुनियों के आने का हाल उनसे कहा । राजा इस समय अपनी प्राणप्रिया सती के मुख-कमल पर तिलक-रचना कर रहे थे । वे सती से बोले -- प्रिये, जब तक कि तुम्हारा तिलक न सूखे मैं अभी मुनिराजों को आहार देकर बहुत जल्दी आया जाता हूँ । यह कहकर राजा चले आये । उन्होंने मुनिराजों को भक्ति-पूर्वक ऊँचे आसन पर बैठाकर नवधा-भक्ति सहित पवित्र आहार कराया, जो कि उत्तम सुखों का देने वाला है । सच है, दान, पूजा, व्रत उपवासादि से ही श्रावकों की शोभा है और जो इनसे रहित हैं वे फल-रहित वृक्ष की तरह निरर्थक समझे जाते हैं । इसलिए बुद्धिमानों को उचित है कि वे पात्रदान, जिनपूजा, व्रतउपवासादिक सदा अपनी शक्ति के अनुसार करते रहें ।

इधर तो राजा ने मुनियों को दान देकर उत्पन्न किया और उधर उनकी प्राण-प्रिया अपने विषय सुख के अन्तराय करनेवाले मुनियों का आना सुनकर बड़ी दुखी हुर्इ । उसने अपना भला-बुरा कुछ न सोचकर मुनियों की निन्दा करना शुरू किया और खूब ही मनमानी उन्हें गलियाँ दीं । सन्तों का यह कहना व्यर्थ नहीं है कि – ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ । सती के लिए यह नीति चरितार्थ हुर्इ । अपने बाँधे तीव्र पाप-कर्मों का फल उसे उसी समय मिल गया । रानी के कोढ़ निकल आया । सारा शरीर काला पड़ गया । उससे दुर्गन्ध निकलने लगी । आचार्य कहते हैं – हलाहल विष खा लेना अच्छा है, जो एक ही जन्म में कष्ट देता है, पर जन्म-जन्म में दु:ख देने वाली मुनि-निन्दा करना कभी अच्छा नहीं । क्योंकि सन्त महात्मा तो व्रत, उपवास, शील आदि से भूषित होते हैं । और सच्चे आत्महित का मार्ग बताने वाले हैं, वे निन्दा करने योग्य कैसे हों ? और ये ही गुरू अज्ञानान्धकार को नष्ट करते हैं इसलिए दीपक हैं, सबका हित करते हैं इसलिए बन्धु हैं और संसार रूपी समुद्र से पार करते हैं इसलिए कर्मशील खेवटिया हैं । अत: हर प्रयत्न द्वारा इनकी आराधना सेवा-शुश्रुषा करते रहना चाहिये ।

जब राजा मुनिराजों को आहार देकर निवृत्त हुए तब पीछे वे अपनी प्रिया के पास आ गये । आते ही जैसे उन्होंने रानी का काला और दुर्गन्धमय शरीर देखा वे बड़े अचंभे में पड़ गये । पूछने पर उन्हें उसका कारण मालूम हुआ । सुनकर वे बहुत खिन्न हुए । संसार शरीर भोग उन्हें अब अप्रिय जान पड़ने लगे । उन्हें अपनी रानी का मुनि-निन्दा रूप घृणित कर्म देखकर बड़ा वैराग्य हुआ । वे उसी समय सब राज-पाट छोड़कर योगी बन गये और अपना तथा संसार का हित करने में उद्यमी बने ।
समय पाकर सती की मृत्यु हुर्इ । अपने पाप के फल से वह संसार रूपी वन में घूमने लगी । सो ठीक ही है, अपने किये पुण्य या पाप का फल जीवों को भोगना ही पडता है । इस प्रकार संसार की विचित्र स्थिति जानकर आत्महित के चाहने वाले सत्पुरुषों को भगवान के उपदेश किये पवित्र धर्म पर सदा विश्वास रखना चाहिए जो कि स्वर्ग और मोक्ष के सुख का प्रधान कारण है ।


+ विषयों में फँसे हुए संसारी जीव की कथा -
विषयों में फँसे हुए संसारी जीव की कथा
संसार समुद्र से पार करने वाले सर्वज्ञ-भगवान् को नमस्कार कर संक्षेप से संसारी जीव की दशा दिखालार्इ जाती है, जो बहुत ही भयावनी है ।

कभी कोर्इ मनुष्य एक भयंकर वन में जा पहुँचा । वहाँ वह एक विकराल सिंह को देखकर डर के मारे भागा । भागते-भागते अचानक वह एक गहरे कुएँ में गिरा । गिरते हुए उसके हाथों में एक वृक्ष की जड़ें पड़ गर्इ । उन्हें पकड़कर वह लटक गया । वृक्ष पर शहद का एक छत्ता जमा था । सो इस मनुष्य के पीछे भागे आते हुए सिंह के धक्के से वृक्ष हिल गया । वृक्ष के हिल जाने से मधुमक्खियाँ उड़ गर्इं और छत्ते से शहद की बूँदें टप-टपटपक कर उस मनुष्य के मुँह में गिरने लगीं । इधर कुएँ में चार भयानक सर्प थे, सो वे उसे डसने के लिए मुँह बाये हुए फुँकार करने लगे और जिन जड़ों को यह अभागा मनुष्य पकड़े हुए था । उन्हें एक काला और एक धोला ऐसे दो चूहे काट रहे थे । इस प्रकार के भयानक कष्ट में वह फँसा था, फिर भी उससे छुटकारा पाने का कुछ यत्न न कर वह मूर्ख स्वाद की लोलुपता से उन शहद की बूँदों के लोभ नहीं रोक सका, और उलटा अधिक-अधिक उनकी इच्छा करने लगा । इसी समय जाता हुआ कोर्इ विद्याधर उस ओर आ निकला । उस मनुष्य की ऐसी कष्टमय दशा देखकर उसे बड़ी दया आर्इ । विद्याधर ने उससे कहा -- भाई, आओ और इस वायुयान में बैठो । मैं तुम्‍हें निकाले लेता हूँ । इसके उत्‍तर में उस अभागे ने कहा -- हाँ, जरा आप ठहरें , यह शहद की बूंद गिर रही है, इसे लेकर ही निकलता हूँ । वह बूंद गिर गई । विद्याधर ने फिर उससे आने को कहा । तब भी इसने वही उत्तर दिया कि हाँ यह बूँद आई जाती है, मैं अभी आया । गर्ज यह कि विद्याधर ने उसे बहुत समझाया, पर वह ‘हाँ इस गिरती हुई बूंद को लेकर आता हूँ,’ इसी आशा में फँसा रहा । लाचार होकर बेचारे विद्याधर को लौट जाना पड़ा । सच है, सच विषयों द्वारा ठगे गये जीवों की अपने हित की ओर कभी प्रीति नहीं होती ।

जैसे उस मनुष्य को उपकारी विद्याधर ने कुएँ से निकालना चाहा, पर वह शहद की लोलुपता से अपने हित को नहीं जान सका, ठीक इसी तरह विषयों में फँसा हुआ जीव संसार-रूपी कुएँ में काल रूपी सिंह द्वारा अनेक प्रकार के कष्ट पा रहा हैं, उसकी आयुरूपी डाली को दिन-रात रूपी दो धोले और काले चूहे काट रहे हैं, कुएँ के चार सर्प रूपी चार गतियाँ इसे डसने के लिए मुँह बाये खड़ी हैं और गुरू इसे हित का उपदेश दे रहे हैं; तब भी यह अपना हित न करे, शहद की बूँद रूपी विषयों में लुब्ध हो रहा है और उनकी ही अधिक-अधिक इच्छा करता जाता है । सच तो यह है कि अभी इसे दुर्गतियों का दुःख बहुत भोगना है । इसीलिए सच्चे मार्ग की ओर इसकी दृष्टि नहीं जाती ।

इस प्रकार यह संसार रूपी भंयकर समुद्र अत्यन्त दु:खों का देनेवाला है और विषय-भोग विष मिले भोजन या दुर्जनों के समान कष्ट देने वाला है । इस प्रकार संसार स्थिति देखकर बुद्धिमानों को जिनेन्द्र-भगवान् के उपदेश किये हुए पवित्र-धर्म को, जो कि अविनाषी, अनन्त-सुख का देनेवाला है, स्थिर भावों के साथ हृदय में धारण करना उचित है ।


+ चारूदत्त सेठ की कथा -
चारूदत्त सेठ की कथा
देवों द्वारा पूजा किये गये जिनेन्द्र भगवान् के चरण कमलों को नमस्कार कर चारूदत्त सेठ की कथा लिखी जाती है ।

जिस समय की यह कथा है, तब चम्पापुरी का राजा शूरसेन था । राजा बड़ा बुद्धिवान् और प्रजाहितैषी था । उसके नीतिमय शासन को सारी प्रजा एकस्वर से प्रशंसा करती थी । यहीं एक इज्जतदार भानुदत्त सेठ रहता था । इसकी स्‍त्री का नाम सुभद्रा था । सुभद्रा के कोई सन्‍तान नहीं हुई, इसलिए वह सन्तान प्राप्ति की इच्छा से नाना प्रकार के देवी-देवताओं की पूजा किया करती थी, अनेक प्रकार की मान्यताएँ लिया करती थी; परन्‍तु तब भी उसका मनोरथ नहीं फला । सच तो है, कहीं कुदेवों की पूजा-स्तुति से कभी कार्य सिद्ध हुआ है क्‍या ? एक दिन जब वह भगवान् के दर्शन करने को मंदिर गई तब वहाँ उसने एक चारण मुनि देखे । उन्‍हें नमस्‍कार कर उसने पूछा-प्रभो, क्‍या मेरा मनोरथ भी कभी पूर्ण होगा ? मुनिराज उसके हृदय के भावों को जानकर बोले-पुत्री, इस समय तू जिस इच्‍छा से दिनरात कुदेवों की पूजा-मानता किया करती है, वह ठीक नहीं है । उससे लाभ की जगह उलटी हानि हो रही है । तू विश्‍वास कर कि संसार में अपने पुण्‍य-पाप के सिवा और कोई देवी-देवता किसी को कुछ देने-लेने में समर्थ नहीं । अब तक तेरे पाप का उदय था, इसलिये तेरी इच्‍छा पूरी न हो सकी । पर अब तेरे महान् पुण्‍य कर्म का उदय आवेगा, जिससे तुझे एक पुत्र रत्‍न की प्राप्ति होगी । तू इसके लिए पुण्‍य के कारण पवित्र धर्म पर विश्‍वास कर ।

मुनिराज द्वारा अपना भविष्‍य सुनकर सुभद्रा को बहुत खुशी हुई । वह उन्‍हें नमस्‍कार कर घर चली गई । अब से उसने सब कुदेवों की पूजा-मानता करना छोड़ दिया । वह अब जिनभगवान् के पवित्र धर्मपर विश्‍वास कर दान, पूजा, व्रत वगैरह करने लगी । इस दशा में दिन बड़े सुख के साथ कटने लगे । इसी तरह कुछ दिन बीत ने पर मुनिराज के कहे अनुसार उसके पुत्र हुआ । उसका नाम चारूदत्त रक्‍खा गया । वह जैसा-जैसा बड़ा होता गया, साथ में उत्तम-उत्तम गुण भी उसे अपना स्‍थान बनाते गये । सच है, पुण्‍यवानों को अच्‍छी-अच्‍छी सब बातें अपने आप प्राप्‍त होती चली आती हैं ।

चारूदत्त बचपन ही से पढ़ने-लिखने में अधिक योग दिया करता था । यही कारण था कि उसे चौबीस-पच्‍चीस वर्ष का होने पर भी किसी प्रकार की विषय-वासना छू तक न गई थी । उसे तो दिन-रात अपनी पुस्‍तकों से प्रेम था । उन्‍हीं के अभ्‍यास, विचार, मनन, चिन्‍तन में वह सदा मग्‍न रहा करता था और इसी से बालपन से ही वह बहुधा करके विरक्‍त रहता था । उसकी इच्‍छा नहीं थी कि वह ब्‍याह कर संसार के माया-जाल में अपने को फँसावे, पर उसके माता-पिता ने उससे ब्‍याह करने का बहुत आग्रह किया । उनकी आज्ञा के अनुरोध से उसे अपने मामा की गुणवती पुत्री मित्रवती के साथ ब्‍याह करना पड़ा ।
ब्‍याह हो गया सही, पर तब भी चारूदत्त उसका रहस्‍य नहीं समझ पाया । और इसीलिए उसने कभी अपनी प्रिया का मुँह तक नहीं देखा । पुत्र की युवावस्‍था में यह दशा देखकर उसकी माँ को बड़ी चिन्‍ता हुई । चारूदत्त की विषयों की ओर प्रवृत्ति हो, इसके लिए उसने चारूदत्त को ऐसे लोगों की संगति में डाल दिया, जो व्‍यमिचारी थे। इससे उसकी माँ का अभिप्राय सफल अवश्‍य हुआ । चारूदत्त विषयों में फँस गया और खूब फँस गया । पर अब वह वेश्‍या का ही प्रेमी बन गया । उसने तब से घर का मुँह तक नहीं देखा । उसे कोई लगभग बारह वर्ष वेश्‍या के यहाँ रहते हुए बीत गये । इस अरसे में उसने अपने घर का सब धन भी गँवा दिया । चम्‍पा में चारूदत्त का घर अच्‍छे धनिकों की गिनती में था, पर अब वह एक साधारण स्थिति का आदमी रह गया । अ‍भी तक चारूदत्त के खर्च के लिए उस के घर से नगद रूपया आया करता था । पर अब रूपया खुट जाने से उसकी स्‍त्री का गहना आने लगा । जिस वेश्‍या के साथ चारूदत्त का प्रेम था उसकी कुट्टिनी माँ ने चारूदत्त को अब दरिद्र हुआ समझ कर एक दिन अपनी लड़की से कहा-बेटी, अब इसके पास धन नहीं रहा, यह भिखारी हो चुका, इसलिये अब तुझे इसका साथ जल्‍दी छोड़ देना चाहिए । अपने लिए दरिद्र मनुष्‍य किस काम का । वहीं हुआ भी । वसन्‍त सेना ने उसे अपने घर से निकाल बाहर किया । सच है, वेश्‍याओं की प्रीति धन के साथ ही रहती है । जिसके पास जब तक पैसा रहता है उससे तभी तक प्रेम करती है । जहाँ धन नहीं वहाँ वेश्‍या का प्रेम भी नहीं । यह देख चारूदत्त को बहुत दु:ख हुआ । अब उसे जान पड़ा कि विषय-भोगों में अत्‍यन्‍त आसक्ति का कैसा भयंकर परिणाम होता है । वह अब एक पलभर के लिए भी वहाँ पर न ठहरा और अपनी प्रिया के भूषण ले-लिवाकर विदेश चलता बना । उसे इस हालत में माता को अपना कलंकित मुँह दिखलाना उचित नहीं जान पड़ा ।

यहाँ से चलकर चारूदत्त धीरे-धीरे उलूख देश के उशिरावर्त नाम के शहरमें पहुँचा । चम्‍पा से जब यह रवाना हुआ तब साथ में इसका मामा भी हो गया था । उशिरावर्त में इन्‍होंने कपास की खरीद की । यहाँ से कपास लेकर ये दोनों तामलिप्‍ता नामक पुरी की ओर रवाना हुए । रास्‍ते में ये एक भयंकर वनों में जा पहुँचे । कुछ विश्राम के लिए इन्‍होंने यहीं डेरा डाल दिया । इतने में एक महा आँधी आई । उससे परस्‍पर की रगड़ से बाँसों में आग लग उठी । हवा चल ही रही थी, सो आग की चिनगारियाँ उड़कर इनके कपास पर जा पड़ी । देखते-देखते वह सब कपास भस्‍मीभूत हो गया । सच है, बिना पुण्‍य के कोई काम सिद्ध नहीं हो पाता है । इसलिए पुण्‍य कमा ने के लिए भगवान् के उपदेश किये मार्ग पर सब को चलना कर्त्तव्‍य है । इस हानि से चारूदत्त बहुत ही दु:खी हो गया । वह यहाँ से किसी दूसरे देश की ओर जाने के लिए अपने मामा से सलाह कर समुद्रदत्त सेठ के जहाज द्वारा पवनद्वीप में पहुँचा । यहाँ इसके भाग्‍य का सितारा चमका । कुछ वर्ष यहाँ रहकर इसने बहुत धन कमाया । इसकी इच्‍छा अब देश लौट आने की हुई । अपनी माता के दर्शनों के लिए इसका मन बड़ा अधीर हो उठा । इसने चलने की तैयारी कर जहाज में अपना सब धन-असबाब लाद दिया ।

जहाज अनुकूल समय देख रवाना हुआ । जैसे-जैसे वह अपनी 'स्‍वर्गादपि गरीयसी' जन्‍मभूमि की ओर शीघ्र गति से बढ़ा हुआ जा रहा था, चारूदत्त को उतनी ही उतनी अधिक प्रसन्‍नता होती जाती थी । पर यह कोई नहीं जानता कि मनुष्‍य का चाहा कुछ नहीं होता । होता वही है, जो देव को मंजूर होता है । यही कारण हुआ कि चारूदत्त की इच्‍छा पूरी न हो पाई और अचानक जहाज किसी से टकरा कर फट पड़ा । चारूदत्त का सब माल-असबाब समुद्र के विशाल उदर की भेंट चढ़ा । वह पीछा पहलेसा ही दरिद्र हो गया । पर चारूदत्त को दु:ख उठाते-उठाते बड़ी सहन-शक्ति प्राप्‍त हो गई थी । एक पर एक आने वाले दु:खों ने उसे निराशा के गहरे गढ़े से निकाल कर पूर्ण आशावादी और कर्त्‍तव्‍यशील बना दिया था । इसलिए अब की बार उसे अपनी हानि का कुछ विशेष दु:ख नहीं हुआ । वह फिर धन कमाने के लिए विदेश चल पड़ा । उसने अब की बार भी बहुत धन कमाया । घर लौटते समय फिर भी उसकी पहलेसी दशा हुई । इतने में ही उसके बुरे कर्मों का अन्‍त न हो गया; किन्‍तु ऐसी-ऐसी भयंकर घटनाओं का कोई सात बार उसे सामना करना पड़ा । इसने कष्‍ट पर कष्‍ट सहा, पर अपने कर्त्तव्‍य से यह कभी विमुख नहीं हुआ । अब की बार जहाज के फट जाने से यह समुद्र में गिर पड़ा । इसे अपने जीवन का भी सन्‍देह हो गया था । इतने में भाग्‍य से बहकर आता हुआ एक लड़के का तख्‍ता इसके हाथ पड़ गया । उसे पाकर इसके जोमें जी आया । किसी तरह यह उसकी सहायकता से समुद्र के किनारे आ लगा । यहाँ से चलकर यह राजगृह में पहुँचा । यहाँ इसे एक विष्‍णुमित्र नाम का संन्‍यासी मिला । संन्‍यासी ने इसके द्वारा कोई अपना काम निकलता देखकर पहले बड़ी सज्‍जनता का इसके साथ बरताव किया । चारूदत्त ने यह समझ कर कि यह कोई भला आदमी है, अपनी सब हालत उससे कह दी । चारूदत्त को धनार्थी समझकर विष्‍णुमित्र उससे बोला-मैं समझा, तुम धन कमा ने को घर बाहर हुए हो । अच्‍छा हुआ तुम ने मुझ से अपना हाल सुना दिया । पर सिर्फ धन के लिए अब तुम्‍हें इतना कष्‍ट न उठाना पड़ेगा । आओ, मेरे साथ आ‍ओ, यहाँ से कुछ दूर पर जंगल एक पर्वत है । उसकी तलहटी में एक कुँआ है । वह रसायन से भरा हुआ है । उससे सोना बनाया जाता है । सो तुम उसमें से कुछ थोड़ा-सा रस ले आओ । उससे तुम्‍हारी सब दरिद्रता नष्‍ट हो जायगी । चारूदत्त संन्‍यासी के पीछे-पीछे हो लिया । सच है, दुर्जनों द्वारा धन के लोभी कौन-कौन नहीं ठगे गये ।

संन्‍यासी और उसके पीछे-पीछे चारूदत्त ये दोनों पर्वत के पास पहुँचा । संन्‍यासी ने रस लाने की सब बातें समझा कर चारूदत्त के हाथ में एक तूँबी दी और एक सींके पर उसे बैठाकर कुएँ में उतार दिया । चारूदत्त तूँबी में रस भरने लगा । इतने में वहाँ बैठे हुए एक मनुष्‍य ने उसे रस भरने से रोका । चारूदत्त पहले तो डरा, पर जब उस मनुष्‍य ने कहा तुम डरो मत, तब कुछ सम्‍हल कर व‍ह बोला-तुम कौन हो, और इस कुएँ में कैसे आये ? कुएँ में बैठा हुआ मनुष्‍य बोला, सुनिए, मैं उज्‍जयिनी में रहता हूँ । मेरा नाम धनदत्त है । मैं किसी कारण से सिंहलद्वीप गया था । वहाँ से लौटते समय तूफान में पकड़कर मेरा जहाज फट गया । धन-जनकी बहुत हानि हुई । मेरे हाथ एक लक्‍कड़ का पटिया लग जाने से अथवा यों कहिए कि दैवकी दया से मैं बच गया । समुद्र से निकलकर मैं अपने शहर की ओर जा रहा था कि रास्‍ते में मुझे यही संन्‍यासी मिला । यह दुष्‍ट मुझे धोखा देकर यहाँ लाया । मैंने कुएँ में से इसे रस भरकर ला दिया । इस पापी ने पहले तूँबी मेरे हाथ से ले ली और फिर आप रस्‍सी काटकर भाग गया । मैं आकर कुएँ में गिरा । भाग्‍य से चोट तो अधिक न आई, पर दो-तीन दिन इसमें पड़े रहने से मेरी तबियत बहुत बिगड़ गई और अब मेरे प्राण घुट रहे हैं । उसकी हालत सुनकर चारूदत्त को बड़ी दया आई । पर वह ऐसी जगह में फँस चुका था, जिससे उसके जिलाने का कुछ यत्‍न नहीं कर सकता था । चारूदत्त ने उससे पूछा-तो मैं इस संन्‍यासी को रस भरकर न दूँ ? धनदत्त ने कहा-नहीं, ऐसा मत करो; रस तो भरकर दे ही दो, अन्‍यथा यह ऊपर से पत्‍थर वगैरह मारकर बड़ा कष्‍ट पहुँचायेगा । तब चारूदत्त ने एक बार तो तूँबी को रस से भरकर सींके में रख दिया । संन्‍यासी ने उसे निकाल लिया । अब चारूदत्त को निकालने के लिए उसने फिर सींका कुएँ में डाला । अब की बार चारूदत्त ने स्‍वयं सींके पर न बैठकर बड़े-बड़े वजनदार पत्‍थरों को उसमें रख दिया । संन्‍यासी उस पत्‍थर भरे सींके पर चारूदत्त को बैठा समझकर, जब सींका आधी दूर आया तब उसे काटकर आप चलता बना । चारूदत्त की जान बच गई । उसने धनदत्त का बड़ा उपकार मानकर कहा-मित्र, इसमें कोई सन्‍देह नहीं कि आज तुमने मुझे जीवनदान दिया और इसके लिए मैं तुम्‍हारा जन्‍मजन्‍म में ऋणी रहूँगा । हाँ और यह तो कहिए कि इससे निकलने का भी कोई उपाय है क्‍या ? धनदत्त बोला-यहाँ रस पीने को प्रीतिदिन एक गो आया करती है । तब आज तो वह चली गई । कल सबेरे वह फिर आवेगी सो तुम उसकी पूँछ पकड़ कर निकल जाना । इतना क‍हकर व‍ह बोला-अब मुझ से बोला नहीं जाता । मेरे प्राण बड़े संकट में हैं । चारूदत्त को यह देख बड़ा दु:ख हुआ कि वह अपने उपकारी की कुछ सेवा नहीं कर पाया । उससे और तो कुछ नहीं बना, पर इतना तो उसने तब भी किया कि धनदत्त को पवित्र जिनधर्म का उपदेश देकर, जो कि उत्तम गति का साधन है, पंच नमस्‍कार मंत्र सुनाया और साथ ही संन्‍यास भी लिवा दिया ।

सबेरा हुआ । सदा की भाँति आज भी गो रस पीने के लिए आई । रस पीकर जैसे ही वह जाने लगी, चारूदत्त ने उसकी पूँछ पकड़ ली । उसके सहारे वह बाहर निकल आया । यहाँ से इस जंगल को लाँघ कर यह एक ओर जाने लगा । रास्‍ते में इसकी अपने मामा रूद्रदत्त से भेंट हो गई । रूद्रदत्त ने चारूदत्त का सब हाल जान कर कहा-तोचलिए अब हम रत्‍नद्वीप में चलें । वहाँ अपना मनोरथ अवश्‍य पूरा होगा । धन की आशा से ये दोनों अब रत्‍नद्वीप जाने को तैयार हुए । रत्‍नद्वीप जाने के लिए पहले एक पर्वत पर जाना पड़ता था और पर्वत पर जाने का जो रास्‍ता था, वह बहुत सँकरा था । इसलिए पर्वत पर जाने के लिए इन्‍हों ने दो बकरे खरीद लिये और उनपर सवार होकर ये रवाना हो गये । जब ये पर्वत पर कुशल पूर्वक पहुँच गये तब पापी रूद्रदत्त ने चारूदत्त से कहा-देखो, अब अपने को यहाँ पर इन दोनों बकरों को मार कर दो चमड़े की थैलियाँ बनानी चाहिए और उन्‍हें उलटकर उनके भीतर घुस दोनों का मुँह सी लेना चाहिए । मांस के लोभ से यहाँ सदा ही भेरूण्‍ड-पक्षी आया करते हैं । सो वे अपने को उठा ले जाकर उस पार रत्‍नद्वीप में ले जायेंगे । वहाँ जब वे हमें खानें लगें तब इन थैलियों को चीरकर हम बाहर हो जायेंगे । मनुष्‍य को देखकर पक्षी उड़ जायेंगे और ऐसा करने से बहुत सीधी तरह अपना काम बन जायगा ।

चारूदत्त ने रूद्रदत्त की पापमयी बात सुनकर उसे बहुत फटकारा और वह साफ इंकार कर गया कि मुझे ऐसे पाप द्वारा प्राप्‍त किये धन की जरूरत नहीं । सच है, दयावान् कभी ऐसा अनर्थ नहीं करते । रात को ये दोनों सो गये । चारूदत्त को स्‍पप्‍न में भी ख्‍याल न था कि रूद्रदत्त सचमुच इतना नीच होगा और इसीलिए वह नि:शंक होकर सो गया था जब चारूदत्त को खूब गाढ़ी नींद आ गई तब पापी रूद्रदत्त चुपके से उठा और जहाँ बकरे बँधे थे वहाँ गया । उसने पहले अपने बकरे को मार डाला और चारूदत्ते बकरे का भी उसने आधा गला काट दिया होगा कि अचानक चारूदत्त की नींद खुल गई । रूद्रदत्त को अपने पास सोया न पाकर उसका सिर ठनका । वह उठकर दौड़ा और बकरों के पास पहुँचा । जाकर देखता है तो पापी रूद्रदत्त बकरे का गला काट रहा हैं । चारूदत्त को काटो तो खून नहीं । वह क्रोध के मारे भर्रा गया । उसने रूद्रदत्त के हाथ से छुरी तो छुड़ाकर फेंकी और उसे खूब ही सुनाई । सच है, कौन ऐसा पाप है, जिसे निर्दयी पुरूष नहीं करते ?

उस अधमरे बकरे का टगर-टगर देखते देखकर दया से चारूदत्त का हृदय भर आया । उसको आँखों से आँसुओं की बूँदें टपकने लगीं । पर वह उसके बचाने का प्रयत्‍न करने के लिए लाचार था । इसलिए कि वह प्राय: काटा जा चुका था । उसकी शान्ति के साथ मृत्‍यु होकर वह सुगति लाभ करे, इसे लिए चारूदत्त ने इतना अवश्‍य किया कि उसे पंच नमस्‍कारमंत्र सुनाकर संन्‍यास दे दिया । जो धर्मात्‍मा जिनेन्‍द्र भगवान् के उपदेश का रहस्‍य समझने वाले हैं, उनका जीवन सच पूछो तो केवल परोपकार के लिए ही होता है ।

चारूदत्त ने बहुतेरा चाहा कि मैं पीछा लौट जाऊँ, पर वापिस लौटने का उसके पास कोई उपाय न था । इसलिए अत्‍यन्‍त लाचारी की दशा में उसे भी रूद्रदत्त की तरह उस थैली की शरण लेनी पड़ी । उड़ते हुए भेरूण्‍डपक्षी पर्वत पर दो मांस-पिण्‍ड पड़े देखकर आये और उन दोनों को चोंचों से उठा चलते बने । रास्‍ते में उनमें परस्‍पर लड़ाई होने लगी । परिणाम यह निकला कि जिस थैली में रूद्रदत्त था, वह पक्षी की चोंच से छूट पड़ी । रूद्रदत्त समुद्र में गिरकर मर गया । मर कर वह पाप के फल से कुगति में गया । ठीक भी है, पापियों की कभी अच्‍छी गति नहीं होती । चारूदत्त की थैली को जो पक्षी‍लिए था, उसने उसे रत्‍नद्वीप के एक सुन्‍दर पर्वत पर ले जाकर रख दिया । इसके बाद पक्षी ने उसे चोंच से चीरना शुरू किया । उसका कुछ भाग चीरते ही उसे चारूदत्त देख पड़ा । पक्षी उसी समय डरकर उड़ भागा । सच है, पुण्‍यवानों का कभी-कभी तो दुष्‍ट भी हित करने वाले हो जाते हैं । जैसे ही चारूदत्त थैली के बाहर निकला कि धूप में ध्‍यान लगायें एक महात्‍मा उसे देख पड़े । उन्‍हें ऐसी कड़ी धूप मेरू की तरह निश्‍चल खड़े देखकर चारूदत्त की उनपर बहुत श्रद्धा हो गई । चारूदत्त उनके पास गया और बड़ी भक्ति से उसने उनके चरणों में अपना सिर नवाया । मुनिराज का ध्‍यान पूरा होते ही उन्‍होंने चारूदत्त से कहा-चारूदत्त, क्‍यों तुम अच्‍छी तरह तो हो न ? मुनि द्वारा अपना नाम सुनकर चारूदत्त को कुछ सन्‍तोष तो इसलिए अवश्‍य हुआ कि एक अत्‍यन्‍त अपरिचित देश में उसे कोई पहचानता भी है, पर इसके साथ ही उसके आश्‍चर्य का भी कुछ ठिकाना न रहा । वह बड़े विचार में पड़ गया कि मैंने तो कभी इन्‍हें कहीं देखा नहीं, फिर इन्‍होंने ही मुझे कहाँ देखा था ! अस्‍तु, जो हो, इन्‍हीं से पूछता हूँ कि ये मुझे कहाँ से जानते हैं । वह मुनिराज से बोला-प्रभो, मालूम होता है आपने मुझे कहीं देखा है, बतलाइए तो आपको मैं कहाँ मिला था ? मुनि बोले-‘‘सुनो, में एक विद्याधर हूँ ! मेरा नाम अमितगति है । एक दिन में चम्‍पापुरी के बगीचे में अपनी प्रिया के साथ सैर करने को गया हुआ था । इसी समय एक धूमसिंह नाम का विद्याधर वहाँ आ गया । मेरी सुन्‍दर स्‍त्री को देखकर उस पापी की नियत डगमगी । काम से अंधे हुए उस पापी ने अपनी विद्या के बल से मुझे एक वृक्ष में कील दिया और मेरी प्‍यारी को विमान में बैठाकर मेरे देखते-देखते आकाश मार्ग से चल दिया । उस समय मेरे कोई ऐसा पुण्‍यकर्म का उदय आया सो तुम उधर आ निकले । तुम्‍हें दयावान समझकर मैंने तुम से इशारा करके कहा-वे औषधियाँ रक्‍खी हैं, उन्‍हें पीसकर मेरे शरीर पर लेप दीजिए । आपने मेरी प्रार्थना स्‍वीकार कर वैसा ही किया । उससे दुष्‍ट विद्याओं का प्रभाव नष्‍ट हुआ और मैं उन विद्याओं के पंजे से छूट गया । जैसे गुरू के उपदेश से जीव, माया, मिथ्‍या की कील से छूट जाता है । मैं उसी समय दौड़ा हुआ कैलाश पर्वत पर पहुँचा और धूमसिंह को उसके कर्म का उचित प्रायश्चित्त देकर उससे अपनी प्रिया को छुड़ा लाया । फिर मैंने आप से कुछ प्रार्थना की कि आप जो इच्‍छा हो वह मुझ से माँगे, पर आप मुझ से कुछ भी लेने के लिए तैयार नहीं हुए । सच तो यह है कि महात्‍मा लोग दूसरों का भला किसी प्रकार की आशा से करते ही नहीं । इसके बाद मैं आपसे विदा होकर अपने नगर में आ गया । मैंने इसके पश्‍चात् कुछ वर्षों तक और राज्‍य किया, राज्‍यश्री का खूब आनंद लूटा । बाद आत्‍म कल्‍याणी को इच्‍छा से पुत्रों को राज्‍य सौंपकर मैं दीक्षा ले गया, जो कि संसार का भ्रमण मिटाने वाली है । चारणऋद्धि के प्रभाव से मैं यहाँ आकर तपस्‍या कर रहा हूँ । मेरा तुम्‍हारे साथ पुराना परिचय है, इसीलिए मैं तुम्‍हें पहचानता हूँ ।'' सुनकर चारूदत्त बहुत खुश हुआ । वह जब तक वहाँ बैठा रहा, इसी बीच में इन मुनिराज के दो पुत्र इन‍की पूजा करने को वहाँ आये । मुनिराज ने चारूदत्त का कुछ हाल उन्‍हें सुनाकर उसका उनसे परिचय कराया । परस्‍पर में मिलकर इन सबको बड़ी प्रसन्‍नता हुई । थोड़े ही समय के परिचय से इन में अत्‍यन्‍त प्रेम बढ़ गया ।

इसी समय एक बहुत खूबसूरत युवा वहाँ आया । सबकी दृष्टि उसके दिव्‍य तेजकी ओर जा-लगी। उस युवाने सबसे पहले चारूदत्तको प्रणाम किया । यह देख चारूदत्त उसे ऐसा करने से रोक कर कहा-तुम्‍हें पहले गुरू महाराज को नमस्‍कार करना उचित है । आगत युवा ने अपना परिचय देते हुए कहा-मैं बकरा था । पापी रूद्रदत्त जब मेरा आधा गला काट चुका होगा कि उसी समय मेरे भाग्‍य से आपकी नींद खुल गई । आपने आकर मुझे नमस्‍कार मंत्र सुनाया और साथ ही संन्‍यास दे दिया । मैं शान्‍त भावों से मरकर मंत्र के प्रभाव से सौधर्म स्‍वर्ग में देव हुआ । इसलिए मेरे गुरू तो आप ही हैं-आप ही ने मुझे सन्‍मार्ग बतलाया है । इसके बाद सौधर्म-देव धर्म-प्रेम से बहुत सुन्‍दर-सुन्‍दर और मूल्‍यवान् दिव्‍य वस्‍त्राभरण चारूदत्त को भेंटकर और उसे नमस्‍कार कर स्‍वर्ग चला गया । सच है, जो परोपकारी हैं उनका सब ही बड़ी भक्ति के साथ आदर-सत्‍कार करते हैं ।

इधर वे विद्याधर सिंहयश और वराहग्रीव मुनिराज को नमस्‍कार कर चारूदत्त से बोले-चलिए हम आपको आप की जन्‍मभूमि चम्‍पापुरी में पहुँचा आवें । इससे चारूदत्त को बड़ी प्रसन्‍नता हुई और वह जाने को सहमत हो गया । चारूदत्त इसके लिए उनसे बड़ी कृतज्ञता प्रगट की । उन्‍होंने चारूदत्त को उसके सब माल-असबाब सहित बहुत जल्‍दी विमान द्वारा चम्‍पापुरी में ला राखा । इसके बाद वे उसे नमस्‍कार कर और आज्ञा लेकर अपने स्‍थान लौट गये । सच है, पुण्‍य से संसार में क्‍या नहीं होता ! और पुण्‍यप्राप्ति के लिए जिनभगवान् के द्वारा उपदेश किये दान, पूजा, व्रत, शीलरूप चार प्रकार पवित्र धर्म का सदा पालन करते रहना चाहिये ।

अचानक अपने प्रिय पुत्र के आजा ने से चारूदत्त के माता-पिता को बड़ी खुशी हुई । उन्‍होंने बार-बार उसे छाती से लगाकर वर्षों से वियोगाग्नि से जलते हुए अपने हृदय को ठंडा किया । चारूदत्त की प्रिया मित्रवती के नेत्रों से दिन-रात बहती हुई वियोग दु:खाश्रुओं की धारा और आज प्रिय को देखकर बहने वाली आनन्दाश्रुओं की धारा का अपूर्व समागम हुआ । उसे जो सुख आज मिला, उसकी समानता में स्‍वर्ग का दिव्‍य सुख तुच्‍छ है । बात की बात में चारूदत्त के आने के समाचार सारी पुरी में पहुँच गये । और उससे सभी को आनन्‍द हुआ ।

चारूदत्त एक समय बड़ाधनी था । अपने कुकर्मों से वह पथ-पथ का भिखारी बना । पर जब से उसे अपनी दशा का ज्ञान हुआ तब से उसने केवल कर्त्तव्‍य को ही अपना लक्ष्‍य बनाया और फिर कर्मशील बनकर उसने कठिन से कठिन काम किया । उसमें कोई बार उसे असफलता भी प्राप्‍त हुई, पर वह निराश नहीं हुआ और काम करता ही चला गया । अपने उद्योग से उसके भाग्‍य का सितारा फिर चमक उठा और वह आज पूर्ण तेज प्रकाश कर रहा है । इसके बाद चारूदत्त ने बहुत वर्षो तक खूब सुख भोगा और जिनधर्म की भी भक्ति के साथ उपासना की । अन्‍त में उदासीन होकर वह अपनी जगह पर अपने सुन्‍दर नाम के पुत्र को नियुक्‍त कर आप दीक्षा ले गया । मुनि होकर उसने खूब तप किया और आयु के अन्‍त में संन्‍यास सहित मृत्‍यु प्राप्‍त कर स्‍वर्ग लाभ किया । सवर्ग में वह सुख के साथ रहता है, अनेक प्रकार के उत्तम से उत्तम भोगों को भोगता है, सुमेरू और कैलाश पर्वत आदि स्‍थानों के जिनमंदिरों की यात्रा करता है, विदेहक्षेत्र में जाकर साक्षात् तीर्थ कर केवली भगवान् की स्‍तुति-पूजा करता है और उनका सुख देने वाला पवित्र धर्मोपदेश सुनता है । मतलब यह कि उसका प्राय: समय धर्म साधना ही में बीतता है । और इसी जिनभगवान् के उपदेश किये निर्मल धर्म की इन्‍द्र, नागेन्‍द्र, विद्याधर, चक्रवर्ती आदि सभी सदा भक्ति पूर्वक उपासना करते हैं, यही धर्म स्‍वर्ग और मोक्ष का देने वाला है । इसलिए यदि तुम्‍हें श्रेष्‍ठ सुख की चाह है तो तुम भी इसी धर्म का आश्रय लो ।


+ पाराशर मुनि की कथा -
पाराशर मुनि की कथा
जिनेन्द्र भगवान् को नमस्‍कार कर अन्‍यमतों की असत्‍कल्‍पनाओं का सत्‍पुरूषों को ज्ञान हो, इसलिए उन्‍हीं के शास्‍त्र में लिखी हुई पाराशर नामक एक तपस्‍वी की कथा यहाँ लिखी जाती है ।

हस्तिनागपुर में गंगभट नाम का एक धीवर रहा करता था । एक दिन वह पाप-बुद्धि एक बड़ी भारी मछली को नदी से पकड़ कर लाया । घर लाकर उस मछली को जब उसने चीरा तो उसमें से एक सुन्‍दर कन्‍या निकली । उसके शरीर से बड़ी दुर्गन्‍ध निकल रही थी । उस धीरवर ने उसका नाम सत्‍यवती रक्‍खा । वहीं उसका पालन पोषण भी करने लगा । पर सच पूछा तो यह बात सर्वथा असंभव है । कहीं मछली से भी कन्‍या पैदा हुई है ? खेद है कि लोग आँख बन्‍द किये ऐसी-ऐसी बातों पर भी अन्‍धश्रद्धा किये चले आते हैं ।

जब सत्‍यवती बड़ी हो गई तो एक दिन की बात है कि गंगभट सत्‍यतवी को नदी किनारे नाव पर बैठाकर आप किसी काम के लिए घर पर आ गया । इतने में रास्‍ते का थका हुआ एक पाराशर नाम का मुनि, जहाँ सत्‍यवती नाव लिए बैठी हुई थी, वहाँ आया । वह सत्‍यवती से बोला-लड़की, मुझे नदी पार जाना है, तू अपनी नाव पर बैठाकर पार उतार दे तो बहुत अच्‍छा हो । भोली सत्‍यवती ने उसका कहा मान लिया और नाव में उसे अच्‍छी तरह बैठा कर वह नाव खेने लगी । सत्‍यवती खूबसूरत तो थी ही और इस पर वह अब तेरह-चौदह वर्ष की हो चुकी थी; इसलिए उसकी खिलती हुई नई जवानी थी । उसकी मनोमधुर सुन्‍दरता ने तपस्‍वी के तप को डगमगा दिया । वह काम वासना का गुलाम हुआ । उसने अपनी पापमयी मनोवृत्ति को सत्‍यवती पर प्रगट किया । सत्‍यवती सुनकर लजा गई, और डरी भी । वह बोली-महाराज, आप साधु-सन्‍त, सदा गंगास्‍नान करने वाले और शाप देने तथा दया करने में समर्थ और मैं नीच जाति की लड़की, इस पर भी मेरा शरीर दुर्गन्‍धमय, फिर मैं आप सरीखों के योग्‍य कैसे हो सकती हूँ ? पाराशर को इस भोली लड़की के निष्‍कपट हृदय की बात पर भी कुछ शर्म नहीं आई और कामियों को शर्म होती भी कहाँ ? उसने सत्‍यवती से कहा-तूँ इसकी कुछ चिन्‍ता न कर । मैं तेरा शरीर अभी सुगन्‍धमय बनाये देता हूँ । यह कहकर पाराशर ने अपने विद्याबल से उसके शरीर को देखते-देखते सुगन्‍धमय कर दिया । उसके प्रभाव को देखकर सत्‍यवती को राजी हो जाना पड़ा । कामी पाराशर ने अपनी वासना नाव में ही मिटाना चाही, तब सत्‍यवती बोली-आप को इसका ख्‍याल नहीं कि सब लोग देखकर क्‍या कहेंगे ? तब पाराशर ने आकाश को धुँधला कर, जिससे कोई देख न सके, और अपनी इच्‍छा......................इसके बाद उसने नदी के बीच में ही एक छोटा-सा गाँव् बसाया और सत्‍यवती के साथ ब्‍याह कर आप वहीं रहने लगा ।

एक दिन पाराशर अपनी वासनाओं की तृप्ति कर रहा था कि उस समय सत्‍यवती के एक व्‍यास नाम का पुत्र हुआ । उसके सिरपर जटाएँ थीं, वह यज्ञोपवती पहरें हुआ था और उसने उत्‍पन्‍न होते ही अपने पिता को नमस्‍कार किया । पर लोगों का यह कहना उन्‍नत पुरूष के सरीखा है और न किसी ज्ञान-नेत्र वाले की समझ में ये बातें आवेंगी ही । क्‍योंकि वे समझते हैं कि समझदार कभी ऐसी असंभव बातें नहीं कहते; किन्‍तु भक्ति के आवेश में आकर असतत्‍व पर विश्‍वास लाने वालों ने ऐसा लिख दिया है । इसलिए बुद्धिवानों को उचित है कि वे उन विद्वानों की संगति करें जो जैनधर्म का रहस्‍य समझने वाले हैं, और जैनधर्म से ही प्रेम करें और उसी के शास्‍त्रों का भक्ति और श्रद्धा के साथ अध्‍ययन करें, उनमें अपनी पवित्र बुद्धि को लगावें, इसी से उन्‍हें सच्‍चा सुख प्राप्‍त होगा ।


+ सात्‍यकि और रूद्र की कथा -
सात्‍यकि और रूद्र की कथा
केवल ज्ञान ही जिनका नेत्र है, ऐसे जिनभगवान् को नमस्‍कार कर शास्‍त्रों के अनुसार सात्‍य कि और रूद्र की कथा लिखी जाती है।

गन्‍धार देश में महेश्‍वरपुर एक सुन्‍दर शहर था। उसके राजा सत्‍यन्‍धर थे। सत्‍यन्‍धर की प्रिया का नाम सत्यवती था । इसके एक पुत्र हुआ उसका नाम सात्‍यकि था । सात्‍यकि ने राजविद्या में अच्‍छी कुशलता प्राप्‍त की थी और ठीक भी है, राजा बिना राजविद्या के शोभा भी नहीं पाता ।

इस समय सिन्‍धु देश की विशाला नगरी का राजा चेटक था । चेटक जैन धर्म का पालक और जिनेन्द्र भगवान का सच्चा भक्त था । इसकी रानी का नाम सुभद्रा था । सुभद्रा बड़ी पतिव्रता और धर्मात्मा थी । इसके सात कन्यायें थीं । उनके नाम थे—पवित्रा, मृगावती, सुप्रभा, प्रभावती, चेलि‍नी, ज्येष्ठा और चन्दना ।

सम्राट् श्रेणिक ने चेटक से चेलि‍नी के लिये मँगनी की थी, पर चेटक ने उनकी आयु अधिक देखकर लड़की देने से इन्‍कार कर दिया । इससे श्रेणिक को बहुत बुरा लगा । अपने पिता के दु:ख का कारण जानकर अभय कुमार उनका एक बहुत ही बढ़िया चित्र बनवा कर विशाला में पहुँचा । उसने वह चित्र चेलिनी को बतलाकर उसे श्रेणिक पर मुग्‍ध कर लिया । पर चेलिनी के पिता को उसका ब्‍याह श्रेणिक से करना सम्‍मत नहीं था । इसलिए अभय कुमार ने गुप्‍त मार्ग से चेनिली को ले जाने का विचार किया । जब चेलिनी उसके साथ जाने को तैयार हुई तब ज्‍येष्‍ठा ने उससे अपने को भी ले चलने के लिए कहा । चेलिनी सहमत तो हो गई, उसका ले चलना इष्‍ट नहीं था; इसलिए जब ये दोनों बहिनें थोड़ी दूर गई होंगी कि धूर्ता चेलिनी ने ज्‍येष्‍ठा से कहा-बहिन, मैं अपने आभूषण तो सब महल ही में भूल आई हूँ । तू जाकर उन्‍हें ले आ न ? मैं तब तक यहीं खड़ी हूँ । बेचारी भोली ज्‍येष्‍ठा उसके झाँसे में आकर चली गई । यह थोड़ी दूर ही पहुँची होगी कि इसने इधर आगे का रास्‍ता पकड़ा और जब तक ज्‍येष्‍ठा संकेत स्‍थान पर आती है तब तक यह बहुत दूर आगे बढ़ आई । अपनी बहिन की इस कुटिलता या धोखे बाजी से ज्‍येष्‍ठा को बेहद दु:ख हुआ । और इसी दु:ख के मारे वह यशस्‍वती आर्यिका के पास दीक्षा ले गर्इ । ज्‍येष्‍ठा की सगाई सत्‍यन्‍धर के पुत्र सात्‍यकि से हो चुकी थी । पर जब सात्‍यकि ने उसका दीक्षा ले लेना सुना तो वह भी विरक्‍त होकर समाधि गुप्‍त मुनि द्वारा दीक्षा लेकर मुनि बन गया ।

ए‍क दिन यशस्‍वती, ज्‍येष्‍ठा आदि आर्यिकाएँ श्रीवर्द्धमान भगवान् की वन्‍दना करने को चलीं । वे सब एक बनी में पहुँची होंगी कि पानी बरस ने लगा, और खूब बरसा । इससे इस आर्यिका संघ को बड़ा कष्‍ट हुआ । कोई किधर और कोई किधर, इस तरह उनका सब संघ तितिर-बितर हो गया । ज्‍येष्‍ठा एक कालगुहा नाम की गुहा में पहुँची । वह उसे एकान्‍त समझकर शरीर से भीगे वस्‍त्रों को उतार कर उन्‍हें निचोड़ने लगी । भाग्‍य से सात्‍यकि मुनि भी इसी गुहा में ध्‍यान कर रहे थे । सो उन्‍होंने ज्‍येष्‍ठा आर्यिका का खुला शरीर देख लिया । देखते ही विकारभावों से उनका मन भ्रष्‍ट हुआ और उन्‍होंने अपने शीलरूपी मौलिक रत्‍न को आर्यिका के शरीररूपी अग्नि में झोंक दिया । सच है, काम से अन्‍धा बना मनुष्‍य क्‍या नहीं कर डालता ।

गुराणी यशस्‍वती ज्‍येष्‍ठा की चेष्‍टा वगैरह से उसकी दशा जान गई है । और इस भय से कि धर्म का अपवाद न हो, वह ज्‍येष्‍ठा को चेलिनी के पास रख आई । चेलिनी ने उसे अपने यहाँ गुप्‍त रीति से रख लिया । सो ठीक ही है, सम्‍यग्‍दृष्टि निन्‍दा आदि से शासन की सदा रक्षा करते हैं ।

नौ महिने होने पर ज्‍येष्‍ठा के पुत्र हुआ । पर श्रेणिक ने इस रूप में प्रकट किया कि चेलिनी के पुत्र हुआ । ज्‍येष्‍ठा उसे वहीं रखकर आप पीछी आर्यिका के संघ में चली आई और प्रायश्चित लेकर तपस्विनी हो गई । इसका लड़का श्रेणिक के यहीं पलने लगा । बड़ा होने पर वह और और लड़कों के साथ खेलने को जाने लगा । पर संगति इसकी अच्‍छे लड़को के साथ नहीं थी, इससे इसके स्‍वभाव में कठोरता अधिक आ गई । यह अपने साथ के खेलने वाले लड़कों को रूद्रता के साथ मारने-पीटने लगा । इसकी शिकायत महारानी के पास आने लगी । महारानी को इस पर बड़ा गुस्‍सा आया । उसने इसका ऐसा रौद्र स्‍वभाव देखकर नाम भी इसका रूद्र रख दिया । सो ठीक ही है जो वृक्ष जड़ से ही खराब होता है तब उसके फलों में मीठा पन आ भी कहाँ से सकता है । इसी तरह रूद्र से एक दिन और कोई अपराध बन पड़ा । सो चेलिनी ने अधिक गुस्‍से में आकर यह कह डाला कि किसने तो इस दुष्‍ट को जना और किसे यह कष्‍ट देता है । चेलिनी के मुँह से, जिसे कि यह अपनी माता समझता था, ऐसी अचम्‍भा पैदा करने वाली बात सुनकर बड़े गहरे विचार में पड़ गया । इसने सोचा कि इसमें कोई कारण जरूर होना चाहिये । यह सोचकर यह श्रेणिक के पास पहुँचा और उनसे इसने आग्रह के साथ पूछा-पिताजी, सच बतलाइए, मेरे वास्‍तव में पिता कौन हैं और कहाँ हैं ? श्रेणिक ने इस बात के बताने को बहुत आनाकानी की । पर जब रूद्र ने बहुत ही उनका पीछा किया और किसी तरह वह नहीं मानने लगा तब लाचार हो उन्‍हें सब सच्‍ची बात बता देनी पड़ी । रूद्र को इससे बड़ा वैराग्‍य हुआ और वह अपने पिता के पास जाकर मुनि हो गया ।

एक दिन रूद्र ग्‍यारह अंग और दश पूर्व का बड़े ऊँचे से पाठ कर रहा था । उस समय श्रुतज्ञान के माहात्‍म्‍य से पाँच सौ तो कोई बड़ी-बड़ी विद्याएँ सिद्ध होकर आई । उन्‍होंने अपने को स्‍वीकार करने की रूद्र से प्रार्थना की । रूद्र ने लोभ के वश ही उन्हें स्‍वीकार तो कर लिया, पर लोभ आगे होने वाले सुख और कल्‍याण के नाश का कारण होता है, इसका उसने कुछ विचार न किया ।

इस समय सात्‍यकि मुनि गोकर्ण नाम के पर्वत की ऊँची चोटी पर प्राय: ध्‍यान किया करते थे । समय गर्मी का था । उनकी वन्‍दना को अनेक धर्मात्‍मा भव्‍य-पुरूष आया जाया करते थे । पर जब से रूद्र को विद्याएँ सिद्ध हुईं, तब से वह मुनि-वन्‍दना के लिए आने वाले धर्मात्‍मा भव्‍य-पुरूषों को अपने विद्याबल से सिंह, व्‍याघ्र, गेंडा, चीता आदि हिस्‍त्र और भयंकर पशुओं द्वारा डराकर पर्वत पर न जाने देता था । सात्‍यकि मुनि को जब यह हाल ज्ञात हुआ तब उन्‍होंने इसे समझाया और ऐसे दुष्‍ट कार्य करने से रोका । पर इसने उनका कहा नहीं माना और अधिक-अधिक यह लोगों को कष्‍ट देने लगा । सात्‍यकि ने तब कहा-तेरे इस पाप का फल बहुत बुरा होगा । तेरो तपस्‍या नष्‍ट होगी । तू स्त्रियों द्वारा तपभ्रष्‍ट होकर आखिर मृत्‍यु का ग्रास बनेगा । इ‍एलिए अभी तुझे सम्‍हल जाना चाहिए । जिससे कुगतियों के दु:ख न भोगना पड़े । रूद्र पर उनके इस कहने का भी कुछ असर न हुआ । वह और अपनी दुष्‍टता करता ही चला गया । सच है, पापियों के हृदय में गुरूओं का अच्‍छा उपदेश कभी नहीं ठहरता ।

एक दिन रूद्रमुनि प्रकृति के दृश्‍यों से अपूर्व मनोहरता धारण किये हुए कैलास पर्वत पर गया और वहाँ तापन योग द्वारा तप करने लगा । इसके बीच में एक और कथा है, जिसका हसी से सम्‍बन्‍ध है। विजयार्द्ध पर्वत की दक्षिण श्रेणी में मेघनिबद्ध, मेघनिचय और मेघनिदान ऐेसे तीन सुन्‍दर शहर है । उनका राजा था कनक रथ । कनकरथ की रानी का नाम मनोहरा था । इसके दो पुत्र हुए । एक देवदारू और दूसरा विद्युज्जिह्न । ये दोनों भाई खूबसूरत भी थे और विद्वान् भी थे । इन्‍हें योग्‍य देखकर इनका पिता कनक रथ राज्‍य शासन का भार बड़े पुत्र देवदारू को सौंप आप गणधर मुनिराज के पास दीक्षा लेकर योगी बन गया । सबको कल्‍याण के मार्ग पर लगाना ही एक मात्र अब इसका कर्त्तव्‍य हो गया ।

दोनों भाइयों की कुछ दिनों तक तो पटी, पर बाद में किसी कारण को लेकर बिगड़ पड़ी । उसका फल यह निकला कि छोटे भाई ने राज्‍य के लोभ में फँसकर और अपने बड़े भाई के विरूद्ध षड्यंत्र रच उसे राज्‍य से निकाल दिया । देवदारू को अपने मान भंग का बड़ा दु:ख हुआ । वह वहाँ से चलकर कैलाश पर आया यहीं पर रहने भी लगा । सच है, घरेलू झगडो़ं से कौन नष्‍ट नहीं हो जाता । देवदारू के आठ कन्‍याएँ थीं और सब ही बड़ी सुन्‍दर थीं । सो एक दिन ये सब बहिनें मिलकर तालाब पर स्‍नान करने को आई । अपने सब कपड़े उतारकर ये नहाने को जल में घुसी । रूद्र मुनि ने इन्‍हें खुले शरीर देखा । देखते ही वह काम से पीड़ा जाकर इन पर मोहित हो गया । उसने विद्या द्वारा उनके सब कपड़े चुरा मँगाये । कन्‍याएँ जब नहाकर जल बाहर हुई तब उन्होंने देखा कपड़े वहाँ नहीं; उन्‍हें बड़ा ही आश्‍चर्य हुआ । वे खड़ी-खड़ी बेचारी लज्‍जा के मारे सिकुड़ने लगीं और व्‍याकुल भी वे अत्‍यन्‍त हुई । इतन में उनकी नजर रूद्रमुनि पर पड़ी । उन्‍होंने मुनि के पास जाकर बड़े संकोच के साथ पूछा-प्रभो, हमारे वस्‍त्रों को यहाँ से कौन ले गया ? कृपाकर हमें बतलाइए । सच है, पाप के उदय से आपत्ति आ पड़ने पर लज्‍जा संकोच सब जाता रहता है । पापी रूद्र मुनि ने निर्लज्‍ज होकर उन कन्‍याओं से कहा-हाँ मैं तुम्‍हारे वस्‍त्र वगैरह सब बता सकता हूँ, पर इस शर्त पर कि यदि तुम मुझे चाहने लगो । कन्‍याओं ने तब कहा-हम अभी अबोध ठहरीं, इसलिये हमें इस बात पर विचार करने का कोई अधिकार नहीं । हमारे पिताजी यदि इस बात को स्‍वीकार कर लें तो फिर हमें कोई उजर नहीं रहेगा । कुल बालिकाओं का यह उत्तर देना उचित ही था । उनका उत्तर सुनकर मुनि ने उन्‍हें उनके वस्‍त्र वगैरह दे दिये । उन बालिकाओं ने घर पर आकर यह सब घटना अपने पिता से कह सुनाई । देवदारू ने तब अपने एक विश्‍वस्‍त कर्मचारी को मुनि के पास कुछ बातें समझाकर भेजा । उसने जाकर देवदारू की ओर से कहा-आपकी इच्‍छा देवदारू महाराज को जान पड़ी । उसके उत्तर में उन्‍होंने यह कहा कि हाँ मैं अपनी लड़कियों को आपकी अर्पण कर सकता हूँ, पर इस शर्त पर कि ''आप विद्युज्जिह्व को मारकर मेरा राज्‍य पीछा मुझे दिलवा दें ।'' रूद्र ने यह स्‍वीकार किया सच है, कामी पुरूष कौन पाप नहीं करता । रूद्र को अपनी इच्‍छा के अनुकूल देख देवदारू उसे अपने घर पर लिवा लाया । और बहुत ठीक है, राज्‍य-भ्रष्‍ट राजा राज्‍यप्राप्ति के लिये क्‍या काम नहीं करता ।

इसके बाद रूद्र विजयार्द्ध पर्वत गया और विद्याओं की सहायता से उसने विद्युज्जिह्व को मारकर उसी समय देवदारू को राज्‍य सिंहासन पर बैठा दिया । राज्‍य प्राप्ति के बाद ही देवरारू भी अपनी प्रतिज्ञा पूरी की । अपनी सब लड़कियों का ब्‍याह आनन्‍द-उत्‍सव के साथ उसने रूद्र से कर दिया । इसके सिवा उसने और भी बहुत सी कन्‍याओं को उसके साथ ब्‍याह दिया । रूद्र तब बहुत ही कामी हो गया । उसके इस प्रकार तीव्र कामसेवन का नतीजा यह हुआ कि सैकड़ों बेचारी राजबालिकाएँ अकाल ही में मर गई । पर पापी तब भी सन्‍तुष्‍ट नहीं हुआ । इसने अब की बार पार्वती के साथ ब्‍याह किया । उसके द्वारा इसकी कुछ तृप्ति जरूर हुई ।

कामी होने के सिवा इसे अपनी विद्याओं का भी बड़ा घमंड हो गया था । इसने सब राजाओं को विद्या बल से बड़ा कष्‍ट दे रक्‍खा था, बिना ही कारण यह सब को तंग किया करता था । और सच भी है दुष्‍ट से किसे शान्ति मिल सकती है । इसके द्वारा बहुत तंग आकर पार्वती के पिता तथा और भी बहुत से राजाओं ने मिलकर इसे मार डालने का विचार किया । पर इसके पास था विद्याओं का बल, सो उसके सामने होने को किसी की हिम्‍मत न पड़ती भी तो वे कुछ कर नहीं सकते थे । तब उन्‍होंने इस बात का शोध लगाया कि विद्याएँ इससे किस समय अलग रहती है । इस उपाय से उन्‍हें सफलता प्राप्‍त हुई । उन्‍हें यह ज्ञात हो गया कि काम सेवन के समय सब विद्याएँ रूद्र से पृथक् हो जाती हैं । सो मौका देखकर पार्वती के पिता वगैरह ने खड्ग द्वारा रूद्र को सस्‍त्रीक मार डाला । सच है, पापियों के मित्र भी शत्रु हो जाया करते हैं ।

विद्याएँ अपने स्‍वामी की मृत्‍यु देखकर बड़ी दुखी हुईं और साथ ही उन्‍हें क्रोध भी अत्‍यन्‍त आया । उन्‍होंने तब प्रजा को दु:ख देना शुरू किया और अनेक प्रकार की बीमारियाँ प्रजा में फैला दी । उससे बेचारी गरीब प्रजा त्राह-त्राह कर उठी । इसी समय एक ज्ञानी मुनि इस ओर आ निकले । प्रजा के कुछ लोगों ने जाकर मुनि से इस उपद्रव का कारण और उपाय पूछा । मुनि ने सब कथा कहकर कहा-जिस अवस्‍था में रूद्र मारा गया है, उसकी एक बार स्‍थापना करके उससे क्षमा कराओ । वैसा ही किया गया । प्रजा का उपद्रव शान्‍त हुआ, पर तब भी लोगों की मूर्खता देखो जो एक बार कोई काम किसी कारण को लेकर किया गया सो उसे अब तक भी गडरिया प्रवाह की तरह करते चले आते है और देवता के रूप में उसकी सेवा-पूजा करते हैं । पर यह ठीक नहीं । सच्‍चा देव वही हो सकता है जिसमें राग, द्वेष नहीं, जो सबका जानने और देखने वाला है और जिसे स्‍वर्ग के देव, चक्रवर्ती, विद्याधर, राजा, महाराजा आदि सभी बड़े-बड़े लोग मस्‍तक झुकाते है और ऐसे देव एक अर्हन्‍त भगवान् ही हैं ।

वे जिन भगवान् मुझे शान्ति दें, जो अनन्‍त उत्तम-उत्तम गुणों के धारक हैं, सब सुखों के देने वाले हैं, दु:ख शोक, सन्‍ताप के नाश करने वाले हैं, केवलज्ञान के रूप में जो संसार का आताप हर कर उसे शीतलता देने वाले चन्‍द्रमा हैं और तीनों लोकों के स्‍वामियों द्वारा जो भक्तिपूर्वक पूजे जाते है ।


+ लौकिक ब्रह्मा की कथा -
लौकिक ब्रह्मा की कथा
संसार के द्वारा पूजे गये भगवान् आदि ब्रह्मा (आदिनाथ स्‍वामी) को नमस्‍कार कर, देवपुत्र ब्रह्मा की कथा लिखी जाती है ।

कुछ असमझ लोग ऐसा कहते है कि एक दिन ब्रह्माजी के मन में आया कि मैं इन्‍द्रादिकों का पद छीनकर सर्वश्रेष्‍ठ हो जाऊँ, और इसलिये उन्‍होंने एक भयंकर बनी में हाथ ऊँचा किये बड़ी घोर तपस्‍या की । वे कोई साढ़े चार हजार वर्ष पर्यन्‍त (यह वर्ष संख्‍या देवों के वर्ष के हिसाब से है, जो कि मनुष्‍यों के वर्षो से कई गुणी होती है । ) एक ही पाँव से खड़े रहकर तप करते रहे और केवल वायु का आहार करते रहे । ब्रह्माजी की यह कठिन तपस्‍या निष्‍फल न गई । इन्‍द्रादिकों का आसन हिल गया । उन्‍हें अपने राज्‍य नष्‍ट होने का बड़ा भंय हुआ । तब उन्‍होंने ब्रह्माजी को तप भ्रष्‍ट करने के लिये स्‍वर्ग की एक तिलोत्तमा नाम की वेश्‍या को, जो कि गन्‍धर्व देवों के समान गाने और बड़ी सुन्‍दर नाचने वाली थी, भेजा । तिलोत्तमा उनके पास आई और अनेक प्रकार के हाव-भाव-विलास बतला-बतलाकर नाचने लगी । तिलोत्तमा का नृत्‍य, तिलोत्तमा की भुवन मनोहारिणी रूपराशि और उसका हाव-भाव-विलास देखकर ब्रह्माजी तप से डगमगे । उन्‍होंने हजारों वर्षो को तपस्‍या को एक क्षणभर में नष्‍ट कर अपने को काम के हाथ सौंप दिया । वे आँखे फाड़-फाड़कर तिलोत्तमा की रूपराशि को बड़े चाव से देखने लगे । तिलोत्तमा ने जब देखा कि हाँ योगिराज अब अपने आप में नहीं हैं और आँखे फाड़-फाड़कर मेरी ही ओर देख रहे हैं, तब उनकी इच्‍छा को और जागृत करने के लिये वह उनकी बायीं ओर आकर नाच ने लगी । ब्रह्माजी ने तब अपनी हजारों वर्षो की तपस्‍या के प्रभाव से अपना दूसरा मुँह बाँयी ओर बना लिया । तिलोत्तमा जब उनकी पीठ पीछे आकर नाच ने लगी । ब्रह्माजी ने तब तीसरा मुँह पीछे की ओर बना लिया । तिलोत्‍तमा फिर उनकी दाहिनी ओर जाकर नाचने लगी,ब्रह्माजी ने उस ओर भी मुँह बना लिया । अन्‍त में तिलोत्तमा आकाश में जाकर नाचने लगी । तब ब्रह्माजी ने अपना पाँच वा मुँह गधे के मुख के आकार का बनाया । कारण अब उनकी तपस्‍या का, फल बहुत थोड़ा बच रहा था । मतलब यह कि तिलोत्तमा ने जिस प्रकार ब्रह्माजी को नचाया वे उसी प्रकार नाचे । इस प्रकार उन्‍हें तप से भ्रष्‍ट कर और उनके हृदय में काम की आग धधकाकर चालाक तिलोत्तमा अछूती की अछूती स्‍वर्ग को चली गई और बेचारे ब्रह्माजी काम के तीव्र वेग से मूर्च्‍छा खाकर पृथ्‍वी पर आ गिरे । तिलोत्तमा ने सब हाल इन्‍द्र से कहकर कहा-प्रभो, अब आप अनन्‍त काल तक सुख से रहें । मैं ब्रह्माजी की खूब ही गति बना आई हूँ । तब इन्‍द्र ने बहुत खुश होकर उससे पूछा-हाँ तिलोत्तमा, तू ब्रह्माजी के पास ठहरी नहीं ? तिलोत्तमा बोली-वाह ! प्रभो, भली उस बूढ़े की और मेरी आपने जोड़ी मिलाई ! मैं तो कभी उसके पास खड़ी तक नहीं रह सकती । यह सुन इन्‍द्र को ब्रह्माजी की हालत पर बड़ी दया आई । उसने फिर दया के वश होकर ब्रह्माजी की शान्ति के लिये उर्वशी नाम की एक दूसरी सुन्‍दर वेश्‍या को उनके पास भेजा । इन्‍द्र की आज्ञा सिर पर चढ़ाकर उर्वशी ब्रह्माजी के पास आई । उनके पाँवों को छूकर उन्‍हें उसने सचेत किया । ब्रह्माजी पाँव तले एक स्‍वर्गीय सुन्‍दर को बैठी देखकर बहुत प्रसन्‍न हुए । उन्‍हें मानों आज उनकी कड़ी तपस्‍या का फल मिल गया । ब्रह्माजी अब घर बनाकर उर्वशी के साथ रहने लगे और मनमाने भोग भोगने लगे; तब से वे लौकिक ब्रह्मा कहलाने लगे ।

बड़े दु:ख की बात है कि असमझ लोग देव या देव के सच्‍चे स्‍वरूप को जानते नहीं और जैसा अपनी इच्‍छा में आता है उन्‍मत्त की तरह झूठा ही कह दिया करते हैं । क्‍या कोई हठ करके इन्‍द्रादिकों का पद छीन सकता है ? और जो ब्रह्मा तीन लोक का स्‍वामी देव कहा जाता है वह क्‍या ऐसा नीच कर्म करेगा ? समझदारों को ये बातें झूठी समझना चाहिए । और जिसमें ऐसी बातें हैं वह कभी ब्रह्मा नहीं हो सकता । जैन शास्‍त्रों में ब्रह्मा उसे कहा है, जो मोक्षमार्ग का बताने वाला, सच्‍चे ज्ञान और सच्‍चे चारित्र की प्राप्ति कराने वाला और आत्‍मा को निजस्‍वरूप में स्थिर करने वाला है । वह अर्हन्‍त, सिद्ध आचार्य, उपाध्‍याय और साधु इन अवस्‍थाओं से पाँच प्रकार का है । इनके सिवा संसार में और कोई ब्रह्मा नहीं है । क्‍योंकि राग, द्वाष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि दोषों से युक्‍त कभी ब्रह्मा-देव हो ही नहीं सकता । किन्‍तु जो इन रागादि दोषों से रहित हैं, लोक और अलोक के जानने वाले हैं और केवल ज्ञान रूपी नेत्र से युक्‍त हैं वे ही ऋषभ भगवान् मेरे सच्‍चे ब्रह्मा हैं ।

वे परम पवित्र आदिनाथ जिनेन्‍द्र मुझे संसार के दु:खों से छुटाकर शांति प्रदान करें, जो भव्‍यजन रूपी कमलों को प्रफुल्लित करने के लिए सूरज के समान हैं, संसार-समुद्र से पार करने वाले हैं, गुणों के समुद्र हैं, स्‍वर्ग और मोक्ष का पवित्र सुख देने वाले हैं, इन्‍द्रादि देवों द्वारा पूज्‍य हैं और केवल ज्ञान द्वारा सारे संसार के जानने और देखने वाले हैं ।


+ परिग्रह से डरे हुए दो भाइयों की कथा -
परिग्रह से डरे हुए दो भाइयों की कथा
धन, धान्‍य, दास, दासी, सोना, चाँदी आदि जो संसार के जीवों को तृष्‍णा के जाल में फँसाकर कष्‍ट पर कष्‍ट देने वाले हैं, ऐसे परिग्रह से माया, ममता छोड़ ने वाले जो साधु-सन्‍त उनसे भी जो ऊँचे हैं, जिनके त्‍याग से आगे त्‍याग की कोई सीमा नहीं, ऐसे सर्वश्रेष्‍ठ जिनेन्‍द्र भगवान् को नमस्‍कार कर परिग्रह से डरे हुए दो भाइयों की कथा लिखी जाती है ।

दशार्ण देश में बहुत सुन्‍दर एक रथ नाम का एक शहर था । उस में धनदत्त नाम का सेठ रहता था । इसकी स्‍त्री का नाम धनदत्ता था । इसके धनदेव और धनमित्र ऐसे दो पुत्र और धनमित्रा नाम की एक सुन्‍दर लड़की थी ।

धनदत्त की मृत्‍यु के बाद इन दोनों भाइयों के कोई ऐसा पाप कर्म का उदय आया, जिससे इनका सब धन, वन नष्‍ट हो गया, ये महा दरिद्र बन गये । ‘कुछ सहायता मिलेगी’ इस आशा से ये दोनों भाई अपने मामा के यहाँ कोशाम्‍बी गये और इन्‍होंने बड़े दु:ख के साथ पिता की मृत्‍यु का हाल मामा को सुनाया । मामा भी इनकी हालत देखकर बड़ा दु:खी हुआ । उसने अनेक प्रकार समझा-बुझाकर इन्‍हें धीरज दिया और सा‍थ ही आठ कीमती रत्‍न दिये, जिससे कि ये अपना संसार चला सकें । सच है, यही बन्‍धुपना है, यही दयालुपना है और यही गम्‍भीरता है जो अपने धन द्वसरा याचकों की आशा पूरी की जाय ।

दोनों भाई उन रत्‍नों को लेकर पीछे अपने घर की ओर रवाना हुए । रास्‍ते में आते-आते इन दोनों की नियत उन रत्‍नों के लोभ से बिगड़ी । दोनों ही के मन में परस्‍पर के मार डालने की इच्‍छा हुई । इतने में गाँव पास आ जाने से इन्‍हें सुबुद्धि सूझ गई । दोनों ने अपने-अपने नीच विचारों पर बड़ा ही पश्‍चात्ताप किया और परस्‍पर में अपना विचार प्रगट कर मन का मैल निकाल डाला । ऐसे पाप विचारों के मूल कारण इन्‍हें वे रत्‍न ही जान पड़े । इसीलिए उन रत्‍नों को वेत्रवती नदी में फैंककर ये अपने घर पर चले आये । उन रत्‍नों को मांस समझकर एक मछली निगल गई । यही मछली एक धीवर के जाल में आ फँसी । धीवर ने मछली को मारा । उसमें से वे रत्‍न निकले । धीवर ने उन्‍हें बाजार में बेच दिया । धीरे-धीरे कर्मयोग से वे ही रत्‍न इन दोनों भाईयों की माँ के हाथ पड़े । माता ने उनके लोभ से अपने लड़के-लड़की को ही मार डालना चाहा । परन्‍तु तत्‍काल सुबुद्धि उपज जाने से उसने बहुत पश्‍चात्ताप किया और रत्‍नों को अपनी लड़की को दे दिये । धनमित्रा की भी यही दशा हुई । उसकी भी लोभ के मारे नियत बिगड़ गई । उसने माता, भाई आदि की जान लेनी चाही । सच है, संसार में सबसे बड़ा भारी पाप का मूल लोभ है । अन्‍त में धनमित्रा को भी अपने विचार पर बड़ी घृणा हुई और उसने फिर उन रत्‍नों को अपने भाइयों के हाथ दे दिया । वे उन्‍हें पहिचान गये । उन्‍हें रत्‍नों के प्राप्‍त होने का हाल जान कर बड़ा ही वैराग्‍य हुआ । उसी समय वे संसार की सब माया-ममता छोडकर, जो कि महा दु:ख का कारण है, दमधर मुनि के पास दीक्षा ले गये । इन्‍हें साधु हुए देखकर इनकी माता और बहिन भी आर्यिका हो गई । आगे चलकर वे दोनों भाई बड़े तपस्वी महात्‍मा हुए । अपना और दूसरों का संसार के दु:खों से उद्धार करना ही एक मात्र इनका कर्त्तव्‍य हो गया । स्‍वर्ग के देवता और प्राय: सब ही बड़े-बड़े राजा-महाराजा इनकी सेवा पूजा करने को आने लगे ।

यह लोभ संसार के दु:खों का मूल कारण और अनेक कष्‍टों को देनेवाला है, माता, पिता, भाई बहिन, बन्‍धु, बान्‍धव आदि के परस्‍पर में ठगने और बुरे विचारों के उत्‍पन्‍न करने का घर है । समझदारों को, जो कि अपना हित करने की इच्‍छा करते हैं, चाहिए कि वे इस पाप के बाप लोभ को मनसा, बाचा, कर्मणा छोड़कर संसार का हित करने वाले और स्‍वर्ग तथा मोक्ष का सुख देने वाले जिनेन्‍द्र भगवान् के उपदेश किये परम पवित्र धर्म में अपने मन को दृढ़ करने का यत्‍न करें ।


+ धन से डरे हुए सागरदत्त की कथा -
धन से डरे हुए सागरदत्त की कथा
केवल ज्ञान रूपी उज्‍ज्‍वल नेत्र द्वारा तीनों को देखने और जानने वाले ऐसे जिनेन्‍द्र भगवान् को नमस्‍कार कर धन के लोभ से डरकर मुनि हो जाने वाले सागरदत्त की कथा लिखी जाती है ।

किसी समय धनमित्र, धनदत्त आदि बहुत से सेठों के पुत्र व्‍यापार के लिए कौशाम्‍बी से चलकर राजगृह की ओर रवाना हुए । रास्‍ते में एक गहन वनी में चोरों ने इन्‍हें लूट-लिया । इनका सब माल-असबाब छीन-छानकर वे चलते हुए । सच है, जिनके पल्‍ल में कुछ पुण्‍य नहीं होता वे कोई भी काम करें, उन्‍हें नुकसान ही उठाना पड़ता है ।

उधर धन पाकर चोरों की नियत बिगड़ी । सब परस्‍पर में यह चाहने लगे कि धन मेरे ही हाथ पड़े और किसी को कुछ न मिले । और इसी लालसा से एक-एक के विरूद्ध जान लेने की कोशिश करने लगे । रात को जब वे सब खाने को बैठे तो किसी ने भोजन में विष मिला दिया और उसे खाकर सबके सब परलोक सिधार गये । यहाँ तक कि जिसने विष मिलाया था, वह भी भ्रमसे उसे खाकर मर गया । उनमें एक सागरदत्त नामक वैश्‍यपुत्र बच गया । वह इसलिये कि उसे रात्रिमें न खाने-पीनेकी प्रतिज्ञा थी । धनके लोभमें फँसनेसे एक साथ सबको मरा देखकर सागरदत्तको बड़ाबैराग्‍य हुआ । वह उससब धनको वही छोड़-छाड़कर चल दिया और एक साधुके पास जाकर आप मुनि बन गया ।

रात्रिभुक्‍तत्‍यागव्रती सागरदत्त ने संसार की सब लीलाओं को दु:ख का कारण और जीवन को बिजली की तरह पलभर में नाश होनेवाला समझ सब धन वहीं पर पड़ा छोड़कर आप एक ऊँचे आचरण का धारक साधु हो गया । वह सागरदत्त मुनि आप सज्‍जनों का कल्‍याण करें ।


+ धन के लोभ से भ्रम में पड़े कुबेरदत्त की कथा -
धन के लोभ से भ्रम में पड़े कुबेरदत्त की कथा
जिनेन्‍द्र भगवान् को, जो सारे संसार द्वारा पूज्‍य हैं, और सबसे उत्तम गिनी जानेवाली जिनवाणीको तथा गुरूओंको भक्तिपूर्वक नमस्‍कार कर परग्रिहके सम्‍बन्‍धकी कथा लिखी जाती है ।

मणिवत देशमें मणिवत ही नामका एक शहर था । उसके राजाका नाम भी मणिवत था । मणिवतकी रानी पृथिवीमति थी । इसके मणिचन्‍द्र नामका एक पुत्र था । मणिवत विद्वान्, बुद्धिमान् और अच्‍छा शूरवीर था । राजकाजमें उसकी बहुत अच्‍छी गति थी ।

राजा पुण्‍योदयसे राजकाज योग्‍यताके साथ चलाते हुए सुखसे अपना समय बिताते थे । धर्म पर उनकी पूरी श्रद्धा थी । वे सुपात्रोंको प्रतिदिन दान देते, भगवानकी पूजा करते और दूसरोंकी भलाई करनेमें भरसक यत्‍न करते । एक दिन रानी पृथिवीमति महाराजके बालोंको सँवार रही थीं कि उनकी नजर एक सफेद बाल पर पड़ी । रानीने उसे निकालकर राजाके हाथमें रख दिया । राजा उस सफेद बालको कालका भेजा दूतसमझ कर संसार और विषयभोगोंसे बड़े विरक्‍त हो गये । उन्‍होंने अपने मणिचन्‍द्र पुत्रको राज्‍यका सब कारवार सौंप दिया और आप भगवान् की पूजा, अभिषेक कर तथा याचकों को दान दे जंगल की और रवाना हो गये और दीक्षा लेकर तपस्‍या करने लगे । वे अब दिनों दिन आत्‍मा को पवित्र बनाते हुए परमात्‍मा–स्‍मरण में लीन रहने लगे ।

मणिवत मुनि नाना देशों में धर्मोपदेश करते हुए एक दिन उज्‍जैन के बाहर मसान में आये । रात के समय वे मृतक शय्या द्वारा ध्‍यान करते हुए शान्ति के लिए परमात्‍मा का स्‍मरण-चिन्‍तन कर रहे थे । इतने में वहाँ एक कापालिक बैताली विद्या साधन के लिए आया । उसे चूला बनाने के लिए तीन मुर्दों की जरूरत पड़ी । सो एक तो उसने मुनि को समझ लिया और दो मुर्दों को वह और घींस लाया । उन तीनों के सिर का चूल्‍हा बनाकर उस पर उसने एक नर-कपाल रक्‍खा और आग सुलगाकर कुछ नैवेद्य पकाने लगा । तब एकदम मुनि का हाथ ऊपर की ओर उठ जाने से सिर पर का कपाल गिर पड़ा । कापलिक उस से डरकर भाग खड़ा हुआ । मुनिराज मेरू समान वैसे के वैसे ही अचल बने रहे । सबेरा होने पर किसी आते-जाते मनुष्‍य ने मुनि की यह दशा देख जिनदत्त को यह सब हाल कह सुनाया । जिनदत्त उसी समय दौड़ा-दौड़ा मसान में गया । मुनि की दशा देखकर उसे बे‍हद दु:ख हुआ । मुनि को अपने घर पर लाकर उसने एक प्रसिद्ध वैद्य से उनके इलाज के लिए पूछा । वैद्य महाशय ने कहा-सोमशर्मा भट्ट के यहाँ लक्षपाक नाम का बहुत ही उम्‍दा तैल है उसे लाकर लगाओ । उससे बहुत जल्‍दी आराम होगा, आग का जला उससे फौरन आराम होता है । सेठ सोमशर्मा के घर दौड़ा हुआ गया । घर पर भट्ट महाशय नहीं थे, इसलिए उसने उनकी तुकारी नाम की स्‍त्री से तैल के लिए प्रार्थना की । तैल के कई घड़े उसके यहाँ भरे रक्‍खे थे । तुकारी ने उनमें से एक घड़ा ले जाने को जिनदत्त से कहा । भाग्य से सीढ़ियाँ उतरते समय पाँव फिसल जाने से घड़ा उसके हाथों से छूट पड़ा । घड़ा फूट गया और तेल सब रेलम-ठेल हो गया । जिनदत्त को इसमें बहुत भय हुआ । उसने डरते-डरते घड़े के फूट जाने का हाल तुकारी से कहा । तब तुकारी ने दूसरा घड़ा ले आने को कहा । उसे पहले घड़े के फूट जाने का कुछ भी ख्‍याल नहीं हुआ । सच है, सज्‍जनों का हृदय समुद्र से भी कहीं अधिक गम्‍भीर हुआ करता है । जिनदत्त दूसरा घड़ा लेकर आ रहा था । अबकी बार तैल से जगह पर पाँव पड़जानेसे फिर भी वह फिसल गया और घड़ा फूटकर उसका सब तैल वह गया । इसी तरह तीसरा घड़ा भी फूट गया । अब तो जिनदत्त के देवता कूँच कर गये । भय के मारे वह थर-थर काँपने लगा । उसकी यह दशा देखकर तुकारी ने उससे कहा कि घबराने और डरने की कोई बात नहीं । तुमने कोई जानकर थोड़े ही फोड़े हैं । तुम किसी तरह की चिन्‍ता-फिकर मत करो । जब तक तुम्‍हें जरूरत पड़े तुम प्रसन्‍नता के साथ तैल ले जाया करो । देने से मुझे कोई उजर न होगा । कोई कैसा ही सहनशील क्‍यों न हो, पर ऐसे मौके पर उसे भी गुस्‍सा आये बिना नहीं रहता । फिर इस स्‍त्री में इतनी क्षमा कहाँ से आई ? इसका जिनदत्त को बड़ा आश्‍चर्य हुआ । जिनदत्त ने तुकारी से पूछा भी, कि माँ, मैंने तुम्‍हारा इतना भारी अपराध किया उस पर भी तुमको रत्ती भर क्रोध नहीं आया, इसका कारण क्‍या है ? तुकारी ने कहा-भाई, क्रोध के नाम से ही मेरा जी काँप उठता है । यह सुनकर जिनदत्त का कौतुक और बढ़ा , तब उसने पूछा यह कैसा ? तुकारी कहने लगी -

“चन्‍दनपुर में शिवशर्मा ब्राह्मण रहता है । वह धनवान् और राजा का आदर पात्र है । उसकी स्‍त्री का नाम कमलश्री है । उसके कोई आठ तो पुत्र और एक लड़की है । लड़की का नाम भट्टा है और वह मैं ही हूँ । मैं थी बड़ी सुन्‍दरी, पर मुझमें एक बड़ा दुर्गुण था । वह यह कि मैं अत्‍यन्‍त मानिनी थी । मैं बोलने में बड़ी ही तेज थी और इसीलिए मेरे भय का सिक्‍का लोगों के मन पर ऐसा जमा हुआ था कि किसी की हिम्‍मत मुझे ''तू'' कहकर पुकारने की नहीं होती थी । मुझे ऐसी अभिमानी देखकर मेरे पिता ने एक बार शहर में डोंड़ी पिटवा दी कि मेरी बेटी को कोई ‘ तू ’ कहकर न पुरारे । क्‍योंकि जहाँ मुझसे किसी ने ‘तू’ कहा कि मैं उससे लड़ने-झगड़ने को तैयार ही रहा करती थी और फिर जहाँ तक मुझमें शक्ति जोर होता में उसकी हजारों पीढ़ियों को एक पलभर में अपने सामने ला खड़ा करती और पिताजी इस लड़ाई-झगड़े से सौ हाथ दूर भागने की कोशिश करते । जो हो, खोटे भाग्‍य से उनका डौंडी़ पिटवाना मेरे लिए बहुत ही बुरा हआ । उस दिन से मेरा नाम ही ‘तुकारी’ पड़ गया और सब ही मुझे इस नाम से पुकार-पुकार कर चिढ़ा ने लगे । सच है, अधिक मान भी कभी अच्‍छा नहीं होता । और इसी चिड़के मारे मुझसे कोई ब्‍याह करने तक के लिए तैयार न होता था । मेरे भाग्‍य से इन सोमशर्मा जी ने इस बात की प्रतिज्ञा की किमैं कभी इसे ‘तू’ कहकर न पुकारूँगा । तब इनके साथ मेरा ब्‍याह हो गया । मैं बड़े उत्‍साह के साथ उज्‍जैन में लाई गई । सच कहूँगी कि इस घर में आकर मैं बड़े सुख से रही । भगवान् की कृपा से घर सब तरह हरा भरा है । धन सम्‍पत्ति भी मनमानी है ।

पर ‘पड़ा स्‍वभाव जाय जीव से’ इस कहावत के अनुसार मेरा स्‍वभाव भी सहज में थोड़े ही मिट जाने वाला था । सो एक दिन की बात है कि मेरे स्‍वामी नाटक देखने गये । नाटक देखकर आते हुए उन्‍हें बहुत देर लग गई । उनकी इस देरी पर मुझे अत्‍यन्‍त गुस्‍सा आया । मैनें निश्‍चय कर लिया कि आज जो कुछ हो, मैं कभी दरवाजा नहीं खोलूँगी और मैं सो गई । थोड़ी देर बाद वे आये और दरवाजे पर खड़े रहकर वे बार-बार मुझे पुकारने लगे । मैं चुप्‍पी साधे पड़ी रही, पर मैंने किवाड़ न खोले । बाहर से चिल्‍लाते-चिल्‍लाते वे थक गये, पर उसका मुझ पर कुछ असर न हुआ । आखिर उन्‍हें भी बड़ा क्रोध हो आया । क्रोध में आकर वे अपनी प्रतिज्ञा तक भूल बैठे । सो उन्‍होंने मुझे ‘तू’ कहकर पुकार लिया । बस, उनका ‘तू’ कहना था कि मैं सिर से पाँव तक जल उठी और क्रोध से अन्‍धी बनकर किवाड़ खोलती हुई घर से निकल भागी । मुझे उस समय कुछ न सूझा कि मैं कहाँ जा रहीं हूँ । मैं शहर बाहर होकर जंगल की ओर चल धरी । रास्‍ते में चोरों ने मुझे देख लिया । उन्‍होंने मेरे सब गहने-दागीने और वस्‍त्र छीन-छीनकर विजयसेन नाम के एक भील को सौंप दिया । मुझे खूबसूरत देखकर इस पापी ने मेरा धर्म बिगाड़ना चाहा, पर उस समय मेरे भाग्‍य से किसी दिव्‍य स्त्री ने आकर, मुझे बचाया, मेरे धर्म की रक्षा की । भील ने उस दिव्य स्‍त्री से डरकर मुझे एक सेठ के हाथ सौंप दिया । उसकी नियत भी मुझ पर बिगड़ी । मैंने उसे खूब ही आड़े हाथों लिया । इससे वह मेरा कर तो कुछ न सका, पर गुस्‍से में आकर उस नीचने मुझे एक ऐसे मनुष्‍य के हाथ सौंप दिया जो जीवों के खून से रँगकर कम्‍बल बनाया करता था । वह मेरे शरीर पर जौंके लगा-लगाकर मेरा रोज-रोज बहुत सा खून निकाल लेता था और उसमें फिर कम्‍बल को रंगा करता था । सच है, एक तो वैसे ही पाप कर्म का उदय और उस पर ऐसा क्रोध, तब उससे मुझ सरीखी हत-भागिनियों को यदि पद-पद पर कष्‍ट उठाना पड़े तो उसमें आश्‍चर्य ही क्‍या ?

इसी समय उज्‍जैन के राजा ने मेरे भाई को यहाँ के राजा पारस के पास किसी कार्य के लिये भेजा । मेरा भाई अपना काम पूरा कर पीछा उज्‍जैन की ओर जा रहा था कि अचानक मेरी उसकी भेंट हो गई । मैंने अपने कर्मों पर बड़ा पश्‍चात्ताप किया । जब मैंने अपना सब हाल उससे कहा तो उसे भी बहुत दु:ख हुआ । उसने मुझे धीरज दिया । इसके बाद वह उसी समय राजा के पास गया और सब हाल उससे कहकर उस कम्‍बल बनाने वाले पापी से उसने मेरा पंजा छुड़ाया । वहाँ से लाकर बड़ी आर्जू-मिन्नत के साथ उसने फिर मुझे अपने स्‍वामी के घर ला रक्‍खा । सच है, सच्‍चे बन्‍धु वे ही है जो कष्‍ट के समय काम आवें । यह तो तुम्‍हें मालूम ही है कि मेरे शरीर का प्राय: खून निकल चुका था । इसी कारण घर पर आते ही मुझे लकवा मार गया । तब वैद्य ने यह लक्षपाक तैल बनाकर मुझे जिलाया । इसके बाद मैंने एक वीतरागी साधु द्वारा धर्मोपदेश सुनकर सर्वश्रेष्‍ठ और सुख देने वाला सम्‍यक्‍त्‍व व्रत ग्रहण किया और साथ ही यह प्रतिज्ञा की कि आज से मैं किसी पर क्रोध नहीं करूँगी । यही कारण है कि मैं अब किसी पर क्रोध नहीं करती ।'' अब आप जाइए और इस तैल द्वारा मुनिराज की सेवा कीजिए । अधिक देरी करना उचित नहीं है ।

जिनदत्त भट्टाको नमस्‍कार कर घर गया और तैल की मालिस वगैरहसे बड़ी सावधानीके साथ मुनिकी सेवा करने लगा । कुछ दिन तक बराबर मालिस करते रहनेसे मुनि को आराम हो गया । सेठ ने भी अपनी इस सेवा-भक्ति द्वारा बहुत पुण्‍य बन्‍ध किया । चौमासा आ गया था इसलिए मुनिराज ने कहीं अन्‍यत्र जाना ठीक न समझ यहीं जिनदत्त सेठ के जिन मंदिर में वर्षायोग ले लिया और यहीं वे रहने लगे।

जिनदत्त का एक लड़का था, नाम इसका कुबेरदत्त था । इसका चाल-चलन अच्‍छा न देखकर जिनदत्त ने इसके डर से कीमती रत्‍नों का भरा अपना एक घड़ा जहाँ मुनि सोया करते थे वहाँ खोद कर गाड़ दिया । जिनदत्त ने यह कार्य किया तो था बड़ी दुपका-चोरी से, पर कुबेरदत्त को इसका पता पड़ गया । उसने अपने पिता का सब कर्म देख लिया और मौका पाकर वहाँसे घड़ेको निकाल मंदिर के आंगन में दूसरी जगह गाड़ दिया । कुबेरदत्त को ऐसा करते मुनि ने देख लिया था, परन्‍तु तब भी वे चुपचाप रहे और उन्‍होंने किसी से कुछ नहीं कहा । और कहते भी कहाँ से जब कि उनका यह मार्ग ही नहीं है ।

जब योग पूरा हुआ तब मुनिराज जिनदत्त को सुख-साता पूछकर वहाँ से बिहार कर गये । शहर बाहर जाकर वे ध्‍यान करने बैठे । इधर मुनिराज के चले जाने के बाद सेठ ने वह रत्‍नों का घड़ा घर ले जाने के लिएजमीन खोद कर देखा तो वहाँ घड़ा नहीं । घड़े को एकाएक गायब हो जाने का उसे बड़ा अचंभा हुआ और साथ ही उसका मन व्‍याकुल भी हुआ । उसने सोचा कि घड़े का हाल केवल मु‍नि ही जानते थे, फिर बड़े अचंभे की बात है कि उनके रहते यहाँ से घड़ा गायब हो जाय ? उसे घड़ा गायब करेन का मुनि पर कुछ सन्‍देह हुआ । तब वह मुनि के पास गया और उनसे उसने प्रार्थना की कि प्रभो, आप पर मेरा बड़ा ही प्रेम है, आप जबसे चले गये है तबसे मुझे सुहाता ही नहीं, इसलिए चलकर आप कुछ दिनों तक और वहीं ठहरें तो बड़ी कृपा हो । इस प्रकार मायाचारी से जिनदत्त मुनिराजा के पीछा अपने मंदिर पर लौटा लाया । इसके बाद उसने कहा, स्‍वामी, कोई ऐसी धर्म-कथा सुनाइए, जिसमें मनोरंजन हो । तब मुनि बोले-हम तो रोज ही सुनाया करते है, आज तुम ही कोई ऐसी कथा कहो । तुम्‍हें इतने दिन शास्‍त्र पढ़ते हो गये, देंखे तुम्‍हें उनका सार कैसा याद रहता हैं ? तब जिनदत्त अपने भीतर कपट-भावों को प्रकट करने के लिये एक ऐसी ही कथा सुनाने लगा । वह बोला-

''एक दिन पद्मरथपुर के राजा वसुपाल ने अयोध्‍या के महाराज जितशत्रु के पास किसी काम के लिए अपना एक दूत भेजा । एक तो गर्मी का समय और ऊपर से चलने की थकावट सो इसे बड़े जोर की प्‍यास लग आई । पानी इसे कहीं नहीं मिला । आते-आते यह एक घनी बनी में आकर वृक्ष के नीचे गिर पड़ा । इसके प्राण कण्‍ठगत हो गये । इसको यह दशा देखकर एक बन्‍दर दौड़ा-दौड़ा तालाब पर गया और उसमें डूबकर यह उस वृक्ष के नीचे पड़े पथिक के पास आया । आते ही इसने अपने शरीर को उस पर झिड़का दिया । जब जल उस पर गिरा और उसकी आँखे खुली तब बन्‍दर आगे होकर उसे इशारे से तालाब के पास ले गया । जब पीकर इसे बहुत शान्ति मिली । अब इसे आगे के लिए जल की चिन्‍ता हुई । पर इसके पास कोई बरतन बगैरह न होने से यह जल ले जा नहीं सकता था । तब इसे एक युक्ति सूझी । इसने उस बेचारे जीवदान देने वाले बन्‍दर को बन्‍दूक से मारकर उसके चमड़े की थैली बनाई और उसमें पानी भरकर चल दिया ।'' अच्‍छा प्रभो, अब आप बतलाइए कि उस नीच, निर्दयी, अधर्मी को अपने उपकारी बन्‍दर को मार डालना क्‍या उचित था ? मुनि बोले तुम ठीक कहते हो । उस दूत का यह अत्‍यन्‍त कृतघ्नता भरा नीच काम था । इसके बाद अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए मुनिराज ने भी एक कथा कहना आरम्‍भ की । वे कहने लगे-

‘’कौशाम्‍बी में किसी समय एक शिवशर्मा ब्राह्मण रहता था । उसकी स्‍त्री का नाम कपिला था । इसके कोई लड़का बाला नहीं था । एक दिन शिवशर्मा किसी दूसरे गाँव से अपने शहर की ओर लौट रहा था । रास्‍ते में एक जंगल में उसने एक नेवला के बच्‍चे को देखा । शिवशर्मा ने उसे घर उठा लाकर अपनी प्रिया से कहा-ब्राह्मणीजी आज मैं तुम्‍हारे लिए एक लड़का लाया हूँ । यह कहकर उसने नेवले को कपिला की गोद में रख दिया । सच है, मोह में अन्‍धे हुए मनुष्‍य क्‍या नहीं करते ? ब्राह्माणी ने उसे ले लिया और पाल-पोस कर उसे कुछ सिखा-विखा भी दिया । नेवले में जितना ज्ञान और जितनी शक्ति थी वह उसके अनुसार ब्राह्माणी का बताया कुछ काम भी कर दिया करता था ।


भाग्‍य से अब ब्राह्मणी के भी एक पुत्र हो गया । जो एक दिन ब्राह्मणी बच्‍चे को पालने में सुलाकर आप धान को खाँड़ने चली गई और जाते समय पुत्र रक्षा का भार यह नेवले को सौंपती गई । इतने में एक सर्प ने आकर उस बच्‍चे को काट लिया । बच्‍चा मर गया । क्रोध में आकर नेवले ने सर्प के टुकड़े-टुकड़े कर डाले । उसके बाद वह खून भरे मुँह से ही कपिला के पास गया । कपिला उसे खून से लथ-पथ भरा देखकर काँप गई । उसने समझा कि इसने मेरे बच्‍चे को खा लिया । उसे अत्‍यन्‍त क्रोध आया । क्रोध के वेग में उसने न कुछ सोचा-विचारा और न जाकर देखा ही कि असल में बात क्‍या है, किन्‍तु एक साथ ही पास में पड़े हुए मूसले को उठा कर नेवले पर दे मारा । नेवला तड़फड़ा कर मर गया । अब वह दौड़ी हुई बच्‍चे के पास गई । देखती है तो वहाँ एक काला भुजंग सर्प मरा हुआ पड़ा है । फिर उसे बहुत पछतावा हुआ । ऐसे मूर्खों को धिक्‍कार है जो बिना विचारे जल्‍दी में आकर हर एक काम कर बैठते हैं ।'' अच्‍छा सेठ महाशय, कहिए तो सर्प के अपराध पर बेचारे नेवले को इस प्रकार निर्दयता से मार देना ब्राह्मणी को योग्‍य था क्‍या ? जिनदत्त कहा-नहीं ! यह उसकी बड़ी गलती हुई । यह कहकर उसने फिर एक कथा कहना आरम्‍भ की-

''बनारस के राजा जितशत्रु के यहाँ धनदत्त राज्‍यवैद्य था । इसकी स्‍त्री का नाम धनदत्ता था । वैद्य महाशय के धनमित्र और धनचन्‍द्र नाम के दो लड़के थे । लाड़-प्‍यार में रहकर इन्‍होंने अपनी कुलविद्या भी न पढ़ पाई । कुछ दिनों बाद वैद्यराज काल कर गये । राजा ने इन दोनों भाइयों को मूर्ख देख इनके पिता की जीविका पर किसी दूसरे को नियुक्‍त कर दिया । तब इनकी बुद्धि ठिकाने आई । ये दोनों भाई अब वैद्यशास्‍त्र पढ़ने की इच्‍छा से चम्‍पापुरी में शिवभूति वैद्य के पास गये । इन्‍होनें वैद्य से अपनी सबहालत कहकर उनसे वैद्यक पढ़ने की इच्‍छा जाहिर की । शिवभूति बड़ा दयावन् और परोपकारी था, इसलिए उसने इन दोनों भाइयों को अपने ही पास रखकर पढ़ाया । और कुछ ही वर्षों में इन्‍हें अच्‍छा होशियार कर दिया । दोनों भाई गुरू महाशय के अत्‍यन्‍त कृतज्ञ होकर पीछे बनारस को ओर रवाना हुए । रास्‍ते में आते हुए इन्‍होंने जंगल में आँख की पीड़ा से दुखी एक सिंह को देखा । धनचन्‍द्र को उस पर दया आई । अपने बड़े भाई के बहुत कुछ मना करने पर भी धनचन्‍द्र ने सिंह की आँखों का इलाज किया । उससे सिंह को आराम हो गया । आँख खोलते ही उसने धनचन्‍द्र को अपने पास खड़ा पाया । वह अपने जन्‍म स्‍वभाव को न छोड़कर क्रूरता के साथ उसे खा गया ।'' मुनिराज उस दुष्‍ट सिंह का बेचारे वैद्य को खा जाना क्‍या अच्‍छा काम हुआ ? मुनि ने ‘नहीं’ कहकर एक और कथा कहना शुरू की ।

‘’चम्‍पापुरी में सोमशर्मा ब्राह्मण की दो स्त्रियाँ थीं । एक का नाम सोमिल्‍या और दूसरी का सोमशर्मा था । सोमिल्‍या बाँझ थी और सोमशर्मा के एक लड़का था । यहीं एक बैल रहता था । लोग उसे ‘भद्र’ नाम से बुलाया करते थे । बेचारा बड़ा सीधा था । कभी किसी को मारता नहीं था । वह सबके घर पर घूमा-फिरा करता था । उसे इस तरह जहाँ थोड़ी बहुत घास खाने को मिलती वह उसे ही खाकर रह जाता था । एक दिन उस बाँझ पापिनी ने डाह के मारे अपनी सौत के बच्‍चे को निर्दयता से मार कर उसका अपराध बेचारे बैल पर लगा दिया । उसे ब्राह्मण बालक का मारने वाला समझ कर सब लोगों ने घास खिलाना छोड़ दिया और शहर से निकाल बाहर कर दिया । बेचारा भूख-प्‍यास के मारे बड़ा दु:ख पाने लगा । बहुत ही दुबला पतला हो गया । पर तब भी किसी ने उसे शहर भीतर नहीं घुसने दिया । एक दिन जिनदत्त सेठ की स्‍त्री पर व्‍यभिचार का अपराध लगा । वह अपनी निर्दोषता बतलाने के लिए चौराहे पर जाकर खड़ी हुई, जहाँ बहुत से मनुष्‍य इकट्ठे हो रहे थे । उसने कोई भयंकर दिव्‍य लेने के इरादे से एक लोहे के टुकड़े को अग्नि में खूब तपाकर लाल सुर्ख किया । इस मौके को अपने लिए बहुत अच्‍छा समझ उस बैल ने झट वहाँ पहुँच कर जलते हुए उस लोहे के टुकड़े को मुँह से उठा लिया । उसकी यह भंयकर दिव्‍य देखकर सब लोगों ने उसे निर्दोष समझ लिया ।'' अच्‍छा सेठ महाशय, बतलाइये तो क्‍या उन मूर्ख लोगों को बिना समझे-बूझे एक निरपराध पशु पर दोष लगाना ठीक था क्‍या ? जिनदत्त ने ‘नहीं’ कहकर फिर एक कथा छोड़ी। वह बोला-


''गंगाके किनारे कीचड़ में एक बार एक हाथी का बच्‍चा फँस गया । विश्‍वभूति तापस ने उसे तड़फते हुए देखा । वह कीचड़ से उस हाथी के बच्‍चे को निकालकर अपने आश्रम में लिवा ले आया । उसने उसे बड़ी सावधानी के साथ पाला-पोसा भी । धीरे-धीरे वह बड़ा होकर एक महान हाथी के रूप में आ गया । श्रेणिक ने इसकी प्रशंसा सुनकर इसे अपने यहाँ रख लिया । हाथी जब तक तापस के यहाँ रहा तब तक बड़ी स्‍वतंत्रता से रहा । वहाँ इसे कभी अंकुश बगैरह का कष्‍ट नहीं सहना पड़ा । पर जब यह श्रेणिक के यहाँ पहुँचा तबसे इसे बन्‍धन, अंकुश आदि का बहुत कष्‍ट सहना पड़ता था । इस दु:ख के मारे एक दिन यह सांकल तोड़-तोड़ कर तापस के आश्रम में भाग आया । इसके पीछे-पीछे राजा के नौकर भी इसे पकड़ने को आये । तापसी मीठे-मीठे शब्‍दों से हाथी को समझा कर उसे नौकरों के सुपुर्द करने लगा । हाथी को इससे अत्‍यन्‍त गुस्‍सा आया । सो इसने उस बेचारे तापस की ही जान ले ली” । तो क्‍या मुनिराज, हाथी को यह उचित था, कि वह अपने को बचाने वाले को ही मार डाले ? इसके उत्तर में मुनि ‘ना’ कहकर और एक कथा कहने लगे । उन्‍होंने कहा-

“हस्तिनागपुर की पूरब दिशा में विश्‍वसेन राजा का बनाया आमों का एक बगीचा था । उसमें आम खूब लग रहे थे । एक दिन एक चील मरे साँप को चोंच में लिए आम के झाड़ पर बैठ गई । उस समय साँप के जहर से एक आम पक गया, पीला-सा पड़ गया । माली ने उस पके फल को ले जाकर राजा को भेंट किया । राजा ने उसे ''प्रेमोपहार के रूप में अपनी प्रिय रानी धर्मसेना को दिया । रानी उसे खाते ही मर गई । राजा को बड़ा गुस्‍सा आया और उसने एक फल के बदले सारे बगीचे को ही कटवा डाला । मुनिराज ने कहा, तो क्‍या सेठ महाशय, राजा का यह काम ठीक हुआ ? सेठ ने भी ‘ना’ कहकर और एक कथा कहना शुरू की । वह बोला -


''एक मनुष्‍य जंगल से चला जा रहा था । रास्‍ते में वह सिंह को देखकर डर के मारे एक वृक्ष पर चढ़ गया । जब सिंह चला गया, तब यह नीचे उतरा और जाने लगा । रास्‍ते में इसे राजा के बहुत से आदमी मिले, जो कि भेरी के लिए अच्‍छे और बड़े झाड़ की तालाश में आये थे । सो इस दुष्‍ट मनुष्‍य ने वह वृक्ष इन लोगों को बता दिया, जिस पर चढ़कर कि इसने अपनी जान बचाई थी । राजा के आदमी उस घनी छाया वाले सुन्‍दर वृक्ष को काटकर ले गये । ''मुनिराज, जिसने बन्‍धु की तरह अपनी रक्षा की, मरने से बचाया, उस वृक्ष के लिए इस दुष्‍ट को ऐसा करना योग्‍य था क्या ? मुनिराज ने ‘नहीं’ कहकर और एक कथा कही । वे बोले-


''गन्‍धर्वसेन राजा की कौशाम्‍बी नगरी में एक अंगार देव सुनार रहता था । जाति का यह ऊँच था । यह रत्‍नों की जड़ाई का काम बहुत ही बढ़िया करता था । एक दिन अंगारदेव राजमुकुट के एक बहुमूल्‍य मणि को उजाल रहा था । इसी समय उसके घर पर मेदज नाम के एक मुनि आहार के लिए आये । वह मुनि को एक ऊँची जगह बैठाकर और उनके सामने उस मणि को रखकर आप भीतर स्‍त्री के पास चला गया । इधर मणि को मांस के भ्रम से कूंज पक्षी निगल गया । जब सुनार सब विधि ठीक-ठाककर पीछा आया तो देखता है वहाँ मणि नहीं । मणि न देखकर उसके तो होश उड़ गये । उसने मुनिराज से पूछा-मुनिराज, मणि को मैं आपके पास अभी रख कर गया हूँ, इतने में वह कहाँ चला गया ? कृपा करके बतलाइये । मुनि चुप रहे । उन्‍हें चुप्‍पी साधे देखकर अंगारदेव का उन्‍हीं पर कुछ शककर गया । उसने फिर पूछा-स्‍वामी, मणि का क्‍या हुआ ? जल्‍द कहिए । राजा को मालूम हो जाने से वह मेरा और मेरे बाल-बच्‍चों तक का बुरा हाल कर डालेगा । मुनि तब भी चुप ही रहे । अब तो अंगारदेव से न रहा गया। क्रोध से उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया । उसने जान लिया कि मणि को इसी ने चुराया है । सो मुनि को बांधकर उसने उन पर लकड़े की मार मारना शुरू की । उन्‍हें खूब मारा-पीटा सही, पर तब भी मुनि उसी तरह स्थिर बने रहे । ऐसे धन को, ऐसी मूर्खता को धिक्‍कार है जिससे मनुष्‍य कुछ भी सोच-समझ नहीं पाता और हर एक काम को जोश में आकर कर डालता है । अंगारदेव मुनि को लकड़े से पीट रहा था तब एक चोट उस कूंज पक्षी के गले पर भी जाकर लगी । उससे वह मणि बाहर आ गिरा । मणि को देखते ही अंगारदेव आत्‍मग्‍लानि, लज्‍जा और पश्‍चात्ताप के मारे अधमरा-सा हो गया । उसे काटो तो खून नहीं । वह मुनि के पाँवों में गिर पड़ा और रो-रो कर उनसे क्षमा कराने लगा ।'' इतना कह कर मुनिराज बोले-क्‍यों सेठ महाशय, अब समझे ? मेदज मुनिको उस मणिका हाल मालूम था, पर तब भी दया के वश हो उन्‍होंने पक्षी का मणि निगल जाना न बतलाया । इसलिए कि पक्षी की जान न जाय और न मुनियों का ऐसा मार्ग ही है । इसी तरह मैं भी यद्यपि तुम्‍हारे घड़े का हाल जानता हूँ, तथापि कह नहीं सकता । इसलिये कि संयमी का यह मार्ग नहीं है कि वे किसी को कष्‍ट पहुँचावे । अब जैसा तुम जानते हो और जो तुम्‍हारे मन में हो उसे करो । मुझे उसकी परवा नहीं ।


घड़े का छुपाने वाला कुबेरदत्त अपने पिता और मुनि का यह परस्‍पर का कथोपकथन छुपा हुआ सुन रहा था । मुनि का अन्तिम निश्‍चय सुन उसको उन पर बड़ी भक्ति हो गई । वह दौड़ा जाकर झटसे घड़े को निकाल लाया और अपने पिता के सामने उसे रखकर जरा गुस्‍से से बोला-हाँ देखता हूँ आप मुनिराज पर अब कितना उपसर्ग करते है ? यह देखकर जिनदत्त बड़ा शर्मिन्‍दा हुआ । उसने अपने भ्रम भरे विचारों पर बड़ाही पछतावा किया । अन्‍त में दोनों पिता-पुत्रों ने उन मेरू के समान स्थिर और तपके खजाने मुनिराज के पाँवों में पड़कर अपने अपराध की क्षमा कराई ओर संसार से उदासीन होकर उन्‍हीं के पास उन्‍होंने दीक्षा भी ले ली, जो कि मोक्ष-सुख की देने वाली है । दोनों पिता-पुत्र मुनि होकर अपना कल्‍याण करने लगे ओर दूसरों के भी आत्‍मकल्‍याण का मार्ग बतलाने लगे ।


वे साधुरत्‍न मुझे सुख-शान्ति दें, जो भगवान के उपदेश किये सम्‍यज्ञान के उमड़े हुए समुद्र हैं, सम्‍यक्‍त्‍वरूपी रत्‍नों को धारण किये हैं, और पवित्र शील जिसकी लहरें हैं । ऐसे मुनिराजों को मैं भक्ति पूर्वक नमस्‍कार करता हूँ ।


मूलसंघ के मुख्‍य चलाने वाले श्रीकुन्‍दकुन्‍दाचार्य की परम्‍परा में भट्टारक मल्लिभूषण हुये हैं । वे मेरे गुरू हैं, रत्‍नत्रय-सम्‍यग्‍दर्शन, सम्‍यग्‍ज्ञान और सम्‍यक्‍चारित्र को धारण किये हैं और गुणों की खान हैं । वे आप लोगों का कल्‍याण करें ।


+ पिण्‍याकगन्‍ध की कथा -
पिण्‍याकगन्‍ध की कथा
सुख देनेवाले और सारे संसारके प्रभु श्रीजिनेन्‍द्र भगवान् को नमस्‍कार कर धनलोभी पिण्‍याकगन्‍धकी कथा लिखी जाती है ।

रत्‍नप्रभ कांपिल्‍य नगरके राजा थे । उनकी रानी विद्युत्‍प्रभा थी । वह सुन्‍दर और गुणवती थी । यहीं एक जिनदत्त सेठ रहता था । जिनधर्म पर इसकी गाढ़ श्रद्धा थी । अपने योग्‍य आचार-विचार इसके बहुत अच्‍छे थे । राजदरबार में भी इसकी अच्‍छी पूछ थी, मान-मर्यादा थी । यहीं एक और सेठ था । इसका नाम पिण्‍याकगन्‍ध था । इसके पास कई करोड़ का धन था, पर तब भी यह मूर्ख बड़ा ही लोभी था, कृपण था । यह न किसी को कभी एक कौड़ी देता और न स्‍वयं आप ही अपने धन को खाने-पीने पहरने में खर्च करता; और खाया करता था खल । इसके पास सब सुख की सामग्री थी, पर अपने पाप के उदय से या यों कहो कि अपनी ही कंजूसी से यह सदा ही दु:ख भोगा करता था । इसकी स्‍त्री का नाम सुन्‍दरी था । इसके एक विष्‍णुदत्त नाम का लड़का था ।

एक दिन राजा के तालाब को खोदते वक्‍त उडु नाम के एक मजूर को सोने के सलाइयों की भरी हुई लोहे की सन्‍दूक मिल गई । यह सन्‍दूक यहाँ कोई हजारों वर्षो से गड़ी हुई होगी । यही कारण था कि उसे खूब ही कीट खा गया था । उसके भीतर की सलाइयों की भी यही दशा थी । उन पर भी बहुत मैल जमा हो गया था । मैल से यह नहीं जान पड़ता था कि वे सोने की हैं । उडु ने उसमें से एक सलाई लाकर जिनदत्त सेठ को लोहे के भाव बेचा । सेठ ने उस समय तो उसे ले लिया, पर जब वह ध्‍यान से धो-धाकर देखीं गई तो जान पड़ा कि वह एक सोने की सलाई है सेठ ने उसे चोरी का माल समझ अपने घर में उसका रखना उचित नहीं समझा । उसने उसकी एक जिनप्रतिमा बनवा ली और प्रतिष्‍ठा कराकर उसे मंदिर में विराजमान कर दिया । सच है, धर्मात्‍मा पुरूष पाप से बड़े डरते हैं । कुछ दिनों बाद उडु फिर एक सलाई लिए जिनदत्त के पास आया । पर अब की बार सेठ ने उसे नहीं खरीदा । इसलिए कि वह धन दूसरे का है । तब उडु ने उसे पिण्‍याकगन्‍ध को बेच दिया । पिण्‍याकगन्‍ध को भी मालूम हो गया कि वह सलाई सोने की है, पर तब भी लोभ में आकर उसने उडु से कहा कि यदि तेरे पास ऐसी सलाइयाँ और हों तो उन्‍हें यहाँ दे जाया करना । मुझे इन दिनों लोहे की कुछ अधिक जरूरत है । मतलब यह कि पिण्‍याकगन्‍ध ने उडु से कोई अट्ठानवे सलाइयाँ खरीद कर लीं । बेचारे उडु को उसकी सच्‍ची कीमत ही मालूम न थी, इसलिए उसने सबकी सब सलाइयाँ लोहे के भाव बेच दीं ।

एक दिन पिण्‍याकगन्‍ध अपनी बहिन के विशेष कहने-सुनने से अपने भानजे के ब्‍याह में दूसरे गाँव जाने लगा । जाते समय धन के लोभ से पुत्र को वह सलाई बताकर कह गया कि इसी आकार-प्रकार का लोहा कोई बेचने अपने यहाँ आवे तो तू उसे मोल ले लिया करना । पिण्‍याकगन्‍ध के पाप का घड़ा अब बहुत भर चुका था । अब उसके फूटने की तैयारी थी । इसीलिए तो वह पाप कर्म की जबर दस्‍ती दूसरे गाँव भेजा गया ।

उडु के पास अब केवल एक ही सलाई बची थी । वह उसे भी बेचने को पिण्‍याकगन्‍ध के पास आया । पर पिण्‍याकगन्‍ध तो वहाँ था नहीं, तब वह उसके लड़के विष्‍णुदत्त के हाथ सलाई लेकर बोला-आप के पिताजी ने ऐसी बहुतेरी सलाइयाँ मुझ से मोल ली हैं । अब यह केवल एक ही बची है । इसे आप लेकर मुझे इसकी कीमत दे दीजिये । विष्‍णुदत्त ने उसे यह कहकर टाल दिया, कि मैं इसे लेकर क्‍या करूँगा ? मुझे जरूरत नहीं । तुम पीछी इसे ले जाओ । इस समय एक सिपाही ने उडु को देख लिया । उसने खोद ने के लिए वह सलाई उससे छुड़ा ली । एक दिन वह सिपाही जमीन खोद रहा था । उससे सलाई पर जमा हुआ कीट साफ हो जाने से कुछ लिखा हुआ उसे देख पड़ा । लिखा यह था कि ‘’सोने की सौ सलाइयाँ सन्‍दूक में हैं । यह लिखा देखकर सिपाही ने उडु को पकड़ लाकर उससे सन्‍दूक की बाबत पूछा । उडु ने सब बातें ठीक-ठीक बतला दीं । सिपाही उडु को राजा के पास ले गया । राजा के पूछने पर उसने कहा कि मैंने ऐसी अठ्टानवे सलाइयाँ तो पिण्‍याकगन्‍ध सेठ को बेची हैं और एक जिनदत्त सेठ को । राजा ने पहले जिनदत्त को बुलाकर सलाई मोल लेने की बाबत पूछा । जिनदत्त कहा-महाराज, मैंने एक सलाई खरीदी तो जरूर है, पर जब मुझे यह मालूम पड़ा कि वह सोने की है तो मैंने उसकी जिनप्रतिमा बनवा ली । प्रतिमा मंदिर में मौजूद है । राजा प्रतिमा को देखकर बहुत खुश हुआ । उसने जिनदत्त को इस सच्‍चाई पर उसका बहुत मान किया, उसे बहुमूल्‍य वस्‍त्राभूषण दिये। सच है, गुणों की पूजा सब जगह हुआ करती है।

इसके बाद राजा ने पिण्‍याकगन्‍ध को बुलवाया । पर वह घर पर न होकर गाँव गया हुआ था । राजा को उसके न मिलने से और निश्‍चय हो गया कि उसने अवश्‍य राजधन धोका देकर ठग लिया है । राजा ने उसी समय उसका घर जब्‍त करवा कर उसके कुटुम्‍ब को कैदखाने में डाल दिया । इसलिए कि उसने पूछ-ताछ करने पर भी सलाइयों का हाल नहीं बताया था । सच है, जो आशा के चक्‍कर में पकड़कर दूसरों का धन मारते हैं, वे अपने हाथों ही अपना सर्वनाश करते हैं ।

उधर ब्‍याह हो जाने के बाद पिण्‍याकगंध घर की ओर वापिस आ रहा था । रास्‍ते में ही उसे अपने कुटुम्‍ब की दुर्दशा का समाचार सुन पड़ा । उसे उसका बड़ा दु:ख हुआ । उसने अपने इस धन-जन की दुर्दशा का मूल कारण अपने पाँवों को ठहराया । इसलिए कि वह उन्‍हींके द्वारा दूसरे गाँव गया था । पाँवों पर उसे बड़ा गुस्‍सा आया और इसीलिए उसने एक बड़ा भारी पत्‍थर लेकर उससे अपने दोनों पाँवों को तोड़ लिया । मृत्‍यु उसके सिर पर खड़ी ही थी । वह लोभी आर्त्तध्‍यान; बुरे भावों से मर कर नरक गया । यह कथा शिक्षा देती है जो समझदार हैं उन्‍हें चाहिये कि वे अनीति के कारण और पाप को बढ़ा ने वाले इस लोभ का दूर ही से छोड़ने का यत्‍न करें ।

वे कर्मों को जीतने वाले जिन भगवान् संसार में सदा काल रहें जो संसार के पदार्थों को दिखलाने के लिये दीपक के समान है, सब दोषों से रहित हैं, भव्‍य–जनों को स्‍वर्गमोक्ष का सुख देने वाले हैं, जिनके वचन अत्‍यन्‍त ही निर्मल या निर्दोष हैं, जो गुणों के समुद्र हैं, देवों द्वारा पूज्‍य हैं और सत्‍पुरूषों के लिए ज्ञान के समुद्र हैं ।


+ लुब्‍धक सेठ की कथा -
लुब्‍धक सेठ की कथा
केवल ज्ञान की शोभा को प्राप्‍त हुए और तीनों जगत् के गुरू ऐसे जिन भगवान् को नमस्‍कार कर लुब्‍धक कथा लिखी जाती है ।

राजा अभयवाहन चम्‍पापुरी के राजा हैं । इनकी रानी पुण्‍डरी का हैं । नेत्र इसके ठीक पुण्‍डरीक कमल जैसे हैं । चम्‍पापुरी में लुब्‍धक नाम का एक सेठ रहता है । इसकी स्‍त्री का नाम नामवसु है । लुब्‍धक के दो पुत्र हैं । इनके नाम गरूड़दत्त और नगदत्त हैं । दोनों भाई सदा हँस-मुख रहते हैं ।
लुब्‍धक के पास बहुत धन था । उसने बहुत कुछ खर्च करके यक्ष, पक्षी , हाथी, ऊँट, घोड़ा, सिंह, हरिण आदि पशुओं की एक-एक जोड़ी सोने की बनवाई थी । इनके सींग, पूँछ, खुर आदि में अच्‍छे-अच्‍छे बहुमूल्‍य हीरा, मोती, माणि का आदि रत्‍नों को जड़ाकर लुब्‍धक ने देखने वालों के लिए एक नया ही आविष्‍कार कर दिया था । जो इन जोडियों को देखता यह बहुत खुश होता और लुब्‍धक की तारीफ किये बिना नहीं रहता । स्‍वयं लुब्‍धक भी अपनी इस जग मगाती प्रदर्शनी को देखकर अपने को बड़ा धन्य मानता था । इसके सिवा लुब्‍धक को थोड़ा-सा दु:ख इस बात का था कि उसने एक बैल की जोड़ी बनवाना शुरू की थी और एक बैल बन भी चुका था, पर फिर सोना न रहने के कारण वह दूसरा बैल नहीं बनवा सका । बस, इसी की उसे एक चिन्‍ता थी । पर यह प्रसन्‍नता की बात है कि वह सदा चिन्‍ता से घिरा न रहकर इसी कमी को पूरी करने के यत्‍न में लगा रहता था ।

एक बार सात दिन बराबर पानी की झड़ी लगी रही । नदी-नाले सब पूर आ गये । पर कर्मवीर लुब्‍धक ऐसे समय भी अपने दूसरे बैल के लिए लकड़ी लेने को स्‍वयं नदी पर गया और बहती नदी में से बहुत-सी लकड़ी निकाल कर उसने उसकी गठरी बांधी और आप ही अपने सिर पर लादे लाने लगा । सच है, ऐसे लोभियों की तृष्‍णा कहीं कभी किसी से मिटी है ? नहीं ।

इस समय रानी पुण्‍डरी का अपने महल पर बैठी हुई प्रकृति की शोभा को देख रही थी । महाराज अभयवाहन भी इस समय यहीं पर थे । लुब्‍धक को सिर पर एक बड़ा भारी काठ का भारा लादकर लाते देख रानी ने अभयवाहन से कहा-प्राणनाथ, जान पड़ता है आप के राज में यह कोई बड़ा ही दरिद्री है । देखिए, बेचारा सिर पर लकडियों का कितना भारी गट्ठा लादे हुए आ रहा है । दया करके इसे कुछ आप सहायता दीजिए, जिससे इसका कष्‍ट दूर हो जाय । यह उचित ही है कि दयावानों की बुद्धि दूसरों पर दया करने की होती है । राजा ने उसी समय नौकरों को भेजकर लुब्‍धक को अपने पास बुलवा मँगाया । लुब्‍धक के आने पर राजा ने उससे कहा-जान पड़ता है तुम्‍हारे घर की हालत अच्‍छी नहीं है । इसका मुझे खेद है कि इतने दिनों से मेरा तुम्‍हारी ओर ध्‍यान न गया । अस्‍तु, तुम्‍हें जितने रूपये पैसे की जरूरत हो, तुम खजाने से ले जाओ । मैं तुम्‍हें अपनी सहीका एक पत्र लिख देता हूँ । यह कहकर राजा पत्र लिखने को तैयार हुए कि लुब्‍धक ने उनसे कहा-महाराज मुझे और कुछ नहीं चाहिये; किंतु एक बैल की जरूरत है । कारण मेरे पास एक बैल तो है, पर उसकी जोड़ी मुझे मिलाना है । राजा ने कहा-अच्‍छी बात है तो; जाओ हमारे बहुत से बैल हैं, उनमें तुम्‍हें जो बैल पसन्‍द आवे उसे अपने घर ले जाओ । राजा के जितने बैल थे उन सबको देख आकर लुब्‍धक ने राजा से कहा-महाराज, उन बैलों में मेरे बैल सरीखा तो एक भी बैल मुझे नहीं देख पड़ा । सुनकर राजा को बड़ा अचम्भा हुआ । उन्होंने लुब्धक से कहा-भाई, तुम्‍हारा बैल कैसा है, यह मैं नहीं समझा । क्‍या तुम मुझे अपना बैल दिखाओगे ? लुब्‍धक बड़ी खुशी के साथ अपना बैल दिखाना स्‍वीकार कर महाराज को अपने घर पर लिवा ले गया । राजा का उस सोने के बने बैल को देखकर बड़ा अचम्‍भा हुआ । जिसे उन्‍होंने एक महा‍दरिद्री समझा था, वही इतना बड़ाधनी है, यह देखकर किसे अचम्‍भा न होगा ।

लुब्‍धक की स्‍त्री नागवसु अपने घर पर महाराज को आये देखकर बहुत ही प्रसन्‍न हुई । उसने महाराज की भेंट के लिए सोने का थाल बहुमूल्‍य सुन्‍दर-सुन्‍दर रत्‍नों से सजाया और उसे अपने स्‍वामी के हाथ में देकर कहा-इस थाल को महाराज को भेंट कीजिए । रत्‍नों के थाल को देखकर लुब्‍धक की तो छाती बैठ गई , पर पास ही महाराज के होने से उसे वह थाल हाथों में लेना पड़ा । जैसे ही थाल को उसने हाथों में लिया उसके दोनों हाथ थर-थर धूजने लगे और ज्‍यों ही उसने थाल देने को महाराज के पास हाथ बढ़ा या तो लोभ के मारे इसकी अंगुलियाँ महाराज को साँप के फण की तरह देख पड़ी । सच है, जिस पापी ने कभी किसी को एक कौड़ी तक नहीं दी, उसका मन क्‍य