उत्तर-स्वत: अर्थात् स्वसंवेदन से सिद्ध नहीं होता है ? क्योंकि वह स्वसंवेदन निर्विकल्प होने से विकल्प को विषय नहीं करता है। ‘‘सर्वचित्तचैत्तानामात्मसंवेदनं स्वसंवेदनम्’’ अर्थात् सभी ज्ञान क्षणों का स्वरूप संवेदन ही स्वसंवेदन है ऐसा आप बौद्धों का वचन है। केवल स्वत: ही नहीं किंतु पर से भी कैसे सिद्ध होगा ? अर्थात् पर-विकल्पांतर से भी सिद्ध नहीं होता है।
प्रश्न-पर से क्यों नहीं सिद्ध होता है ?
उत्तर-अनवस्था आ जाने से सिद्ध नहीं होता है अर्थात् विकल्पात्मक अनुमान को सिद्ध करने के लिए एक दूसरा विकल्प ज्ञान लाये, पुन: उसकी सिद्धि के लिए तीसरा विकल्पज्ञान लाना पड़ेगा क्योंकि वह भी विकल्प को विषय न करने से स्वत: सिद्ध नहीं है और उस तीसरे को सिद्ध करने के लिए पुन: एक विकल्पांतर की कल्पना करनी पड़ेगी। इस प्रकार से बहुत दूर जाकर कहीं पर भी उपरति न होने से अनवस्था आ जाती है इसलिए अनुमान की सिद्धि न होने से बौद्ध के द्वारा कल्पित प्रमाण की संख्या (दो) का नियम भी कैसे घटित हो सकेगा, अर्थात् नहीं हो सकेगा यह भाव हुआ।
भावार्थ-बौद्धों का कहना है कि अनुमान ज्ञान निश्चयात्मक है और वह बाह्य पदार्थों का निश्चय करता है किन्तु अपने स्वरूप में निर्विकल्प है। यहाँ आचार्य कहते हैं कि ऐसा अनुमान ज्ञान स्वत: तो सिद्ध नहीं हो सकता है क्योंकि स्वसंवेदन में तो वह निर्विकल्प ही रहा तथा पर से सिद्धि मानने से तो उस पर की सिद्धि पर से पुन: पर की सिद्धि पर से मानते चलिए, कहीं भी विराम न होने से अनवस्था आ जाती है अत: आप बौद्धों के यहाँ अनुमान ज्ञान के सिद्ध न होने से आपके द्वारा मान्य प्रमाण की दो संख्या का नियम समाप्त हो जाता है।
🏠
उपमानं प्रसिद्धार्थसाधम्र्यात्साध्यसाधनं॥
तद्वैधम्र्यात्प्रमाणं विंâ स्यात्संज्ञिप्रतिपादनं॥10॥
अन्वयार्थ : [प्रसिद्धार्थ साधम्र्यात् साध्यसाधनं] प्रसिद्ध अर्थ की सदृशता से साध्य को सिद्ध करने वाला [उपमानं] उपमान है। पुन: [वैधम्र्यात्] विसदृशता से [तत् किं प्रमाणं स्यात्] वह क्या प्रमाण होगा ? [संज्ञिप्रतिपादनं] तथा संज्ञी-वाच्य का प्रतिपादन करने वाला ज्ञान संज्ञा-संज्ञी का संबंध ज्ञान [तत् किं प्रमाणं स्यात्] वह क्या प्रमाण होगा ?॥१०॥
अभयचन्द्रसूरि :
यहाँ पर ‘यत्’ इस पद का अध्याहार करना चाहिए। प्रसिद्ध प्रमाण से निश्चित गोरूप अर्थ के सादृश्य धर्म से उत्पन्न हुआ साध्य-ज्ञेयरूप उस सादृश्य धर्म से विशिष्ट गवयलक्षण को सिद्ध करता है अर्थात् ‘गाय के सदृश गवय है’ इस प्रकार का जो ज्ञान है वह उपमान नाम का भिन्न प्रमाण है। यदि आप नैयायिक इस तरह उपमान को भिन्न प्रमाण स्वीकार करते हैं तब तो आपको उस गाय के रूप से वैधम्र्य से प्रसिद्ध हुई अर्थ की विसदृशता से उत्पन्न हुआ और साध्य को सिद्ध करने वाला जो ज्ञान है वह ‘गाय से विलक्षण महिष है’ इस प्रकार का ज्ञान कौन सा प्रमाण है ? अर्थात् उसका क्या नाम है ? इसको भी आप उपमान ही नहीं कह सकते क्योंकि उसके लक्षण का अभाव है। इसे आप प्रत्यक्ष आदि प्रमाण भी नहीं कह सकते, क्योंकि यह भिन्न विषय वाला है और भिन्न सामग्री से उत्पन्न हुआ है।
उसी प्रकार से संज्ञी-वाच्य प्रतिपादन करना, विवक्षित संज्ञा के विषय रूप से संकलन करना; जैसे-‘यह वृक्ष है’। ऐसा ज्ञान, वह भी किस नाम वाला प्रमाण होगा ? अर्थात् उपमान प्रमाण को पृथक् मानने से तो आपको अनेकों प्रमाण मानने पड़ेंगे। संज्ञा और संज्ञी (नाम-नाम वाले) के संबंध का ज्ञान अप्रमाण भी नहीं है अन्यथा आगम प्रमाण का लोप हो जावेगा और उपमान भी अप्रमाण हो जावेगा।
भावार्थ-नैयायिक उपमान को एक पृथक् प्रमाण मानता है किन्तु आचार्यों का कहना है कि इस तरह तो विसदृश धर्म आदि के निमित्त से हुए ज्ञानों को आप भिन्न -भिन्न प्रमाण मानते चलिए, यह दूषण दिया है। वास्तव में हम जैनों के यहाँ तो इस उपमान आदि प्रमाणों को प्रत्यभिज्ञान प्रमाण में गर्भित किया है और सादृश्य प्रत्यभिज्ञान आदि नाम दिये हैं इसलिए हमारे यहाँ कोई दूषण नहीं आता है।
🏠
प्रत्यक्षार्थांतरापेक्षा संबंधप्रतिपद्यत:॥
तत्प्रमाणं न चेत्सर्वमुपमानं कुतस्तथा॥11॥
अन्वयार्थ : [यत:] जिस ज्ञान से [प्रत्यक्षार्थान्तरापेक्षा] प्रत्यक्ष से भिन्न अर्थ की अपेक्षा रखने वाला [संबंध प्रतिपत्] वाच्य-वाचक भावरूप संबंध का ज्ञान होता है [चेत् तत् प्रमाणं न] यदि वह ज्ञान प्रमाण नहीं है, तो [तथा सर्वं उपमानं कुत:] उसी प्रकार से सभी उपमान प्रमाण कैसे होंगे ?॥११॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-जिस ज्ञान से प्रत्यक्ष अर्थांतर-उससे भिन्न अर्थ की अपेक्षा करने वाला वाच्य- वाचक भावरूप संबंध का ज्ञान होता है अर्थात् प्रकृत शब्द लक्षण से भिन्न अर्थ अर्थांतर है, ‘वृक्षादि’ प्रत्यक्ष अर्थांतर हैं, उनकी अपेक्षा जिस ज्ञान को है, वह प्रत्यक्ष अर्थांतर की अपेक्षा वाला ज्ञान कहलाता है। वह ज्ञान यदि प्रमाण न होवे, तब तो सभी नैयायिक, मीमांसक आदि के द्वारा कल्पित सभी उपमान कैसे प्रमाण हो सकते हैं ? क्योंकि दोनों जगह कोई अंतर नहीं है। सादृश्य संबंधी ज्ञान प्रमाण है किन्तु वाच्य वाचक संबंधी ज्ञान प्रमाण नहीं है, इस प्रकार का अंतर तो है नहीं। इसलिए संज्ञा और संज्ञी का संकलन-जोड़ रूप ज्ञान भी एक भिन्न प्रमाण हो ही जायेगा इसलिए आप लोगों के द्वारा मान्य प्रमाण की संख्या का नियम कैसे बनेगा ?
🏠
इदमल्पं महद् दूरमासन्नं प्रांशु नेति वा॥
व्यपेक्षात: समक्षेऽर्थे विकल्प: साधनांतरं॥12॥
अन्वयार्थ : [इदं अल्पं महत्] यह अल्प है, बहुत है, [दूरं आसन्नं] दूर है, निकट है, [प्रांशुं वा न ति] यह दीर्घ है अथवा दीर्घ नहीं है-ह्रस्व है, इस प्रकार [व्यपेक्षात:] अपेक्षा से [समक्षे अर्थे] प्रत्यक्ष अर्थ में [विकल्प:] जो विकल्प हैं [साधनांतरं] वे प्रमाणांतर हैं॥१२॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-यह इससे अल्प है, यह इससे महान् है, यह इससे दूर है, यह इससे आसन्न है, यह इससे दीर्घ है, यह इससे दीर्घ नहीं है। यहाँ कारिका में ‘वा’ शब्द परस्पर समुच्चय अर्थ में है। किस विषय में ? प्रत्यक्ष पदार्थ में व्यपेक्षा से-विरुद्ध-प्रतिपक्ष की अपेक्षा से कथंचित अजहद्वृत्ति-कथंचित् अपने स्वभाव को न छोड़ते हुए जो विकल्प-निश्चय होता है, वह भिन्न प्रमाण है।
इस प्रकार अल्प महत्व आदि का जोड़रूप ज्ञान पर के द्वारा मान्य प्रमाण की संख्या के नियम को विघटित कर देता है।
[शंका-आप स्याद्वादियों के यहाँ भी इस प्रकार प्रमाण की संख्या का विधान वैâसे नहीं होता है ?
समाधान-हमारे यहाँ तो परोक्ष के भेदरूप प्रत्यभिज्ञान में सादृश्य संकलन आदि सभी का अंतर्भाव हो जाता है।
शंका-अर्थापत्ति को प्रमाणांतर मानना ही चाहिए , क्योंकि उसका कहीं पर भी अंतर्भाव नहीं हो सकता है ?
समाधान-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि अनुमान में उसका अंतर्भाव हो जाता है। नदीपूर आदि से अनंतर वृष्टि आदि के अविनाभावी रूप से लिंगत्व है और लिंग से उत्पन्न हुआ ज्ञान अनुमान है।
शंका-पक्षधर्मत्व का अभाव होने से उसको लिंगपना नहीं है ?
समाधान-नहीं, पक्ष में जिसका धर्म नहीं है ऐसा अपक्ष धर्म वाला भी हेतु समर्पित है। गम्य गमक भाव निमित्तक ही अविनाभाव है, अन्य नहीं है और वह अविनाभाव यहाँ भी है इसलिए अर्थापत्ति अनुमान ही है। इस कथन से अभाव भी एक भिन्न प्रमाण है’ ऐसा मानने वालों का भी खंडन कर दिया गया है क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाण में ही भावाभावात्मक वस्तु को विषय करने से वैसा व्यवहार होता है। ऐसा तो है नहीं कि भाव को ग्रहण करने वाला प्रमाण अथवा अभाव को विषय करने वाला प्रमाण कोई हो क्योंकि उससे अर्थक्रिया नहीं हो सकती है।
यदि अभाव स्वतंत्र होता तब तो उसको ग्रहण करने वाला एक भिन्न प्रमाण कल्पित करना ही चाहिए। उसमें ‘घट नहीं है’ इस प्रकार भाव के आश्रित की उपलब्धि होती है। भाव को ग्रहण करने वाले के द्वारा ही उसका ग्रहण होता है।
दूसरी बात यह है कि भावग्राहक ज्ञान से अभावग्राहक ज्ञान अन्य ही है। ऐसा मानने पर तो सामान्य ग्राहक ज्ञान से विशेष ग्राहक ज्ञान और नित्यत्वग्राहक ज्ञान से अनित्यत्वग्राहक ज्ञान भी भिन्न-भिन्न प्रमाण ही हो जावेंगे और इस प्रकार से तो कहीं पर भी अवयवी की सिद्धि नहीं हो सकेगी इसलिए ‘अभाव’ नाम का कोई भिन्न प्रमाण नहीं है क्योंकि उसके विषय का अभाव है, केशों में मच्छर ज्ञान के समान। इसलिए यहाँ यह सुस्थित हो गया कि ‘स्मृति आदि ज्ञान परोक्ष हैं क्योंकि वे अविशद ज्ञान हैं और इसी परोक्ष में ही सकल अस्पष्ट ज्ञानों का अंतर्भाव हो जाता है।
भावार्थ-यह छोटा है, यह बड़ा है। इन दोनों ज्ञानों में एक-दूसरे की अपेक्षा है। जैसे-आंवले की अपेक्षा बेल बड़ा है और बेल की अपेक्षा आंवला छोटा है, यहाँ अपेक्षा से होने वाला ज्ञान भी संकलनजोड़ रूप है इसे भी एक अलग प्रमाण कहना चाहिए। वैसे ही दूर-निकट के जोड़रूप, ह्रस्व-दीर्घ के जोड़रूप, आदि अनेकों भिन्न-भिन्न प्रमाण मानने चाहिए और उनके नाम बताने चाहिए। तब आप नैयायिक, मीमांसक आदि की मान्य संख्या खत्म हो जाती है तब उन लोगों ने कहा कि यह दोष तो आप जैनों को भी संभव है, किन्तु आचार्य ने कहा कि हमारे यहाँ परोक्ष के अंतर्गत एक प्रत्यभिज्ञान प्रमाण है जिसमें ये सभी भेद सम्मिलित हो जाते हैं।
मीमांसक ने कहा कि ‘अर्थापत्ति’ को तो अलग प्रमाण मानना ही पड़ेगा। अर्थापत्ति-इसके होने पर होना, नहीं होने पर नहीं होना, जैसे-देवदत्त मोटा है किन्तु दिवस में नहीं खाता है, मतलब रात्रि में खाता है, इसे अर्थापत्ति कहते हैं। यह अनुमान में अंतर्भूत है क्योंकि इस अर्थापत्ति के बिना अनुमान होता ही नहीं है।
पुन: मीमांसक ने अभाव को एक स्वतंत्र प्रमाण मानना चाहा तब आचार्य ने कहा कि यदि भाव के विपक्षी अभाव का ग्राहक एक अभाव प्रमाण है तो नित्य के विपक्षी अनित्य आदि को ग्राहक प्रमाण भी मानना पड़ेगा। किन्तु ऐसा तो है नहीं अत: प्रत्यक्ष आदि प्रमाण ही भाव और अभावरूप सभी वस्तुओें को ग्रहण करने वाले हैं इसलिए जितने भी अस्पष्ट ज्ञान हैं वे सभी परोक्ष प्रमाण में शामिल हैं।
श्लोकार्थ-श्री भट्टाकलंकदेवरूपी चंद्रमा से प्रगट हुई किरणों के द्वारा विशदेतर-परोक्ष प्रमाण का स्पर्श किया गया है-स्पष्ट हुआ है। इस प्रमाण के भेद में श्री अभयचंद्रसूरि की वाणी प्रतिभासित करने वाली क्यों नहीं होगी ? अर्थात् श्री अकलंकदेव ने परोक्ष प्रमाण का स्पष्टरूप से वर्णन किया है, मेरे द्वारा बनाई गई तात्पर्यवृत्ति से आप सभी लोगों को उस प्रमाण का प्रतिभास-ज्ञान हो जावेगा।।१।।
इस प्रकार श्री अभयचंद्रसूरि कृत लघीयध्Eाय की स्याद्वादभूषण नामक तात्पर्यवृत्ति में परोक्ष प्रमाण का वर्णन करने वाला तृतीय परिच्छेद पूर्ण हुआ।
🏠
चतुर्थ परिच्छेद
प्रत्यक्षाभं कथंचित्स्यात्प्रमाणं तैमिरादिकं॥
यद्यथैवाविसंवादि प्रमाणं तत्तथा मतं॥1॥
अन्वयार्थ : [प्रत्यक्षाभं] प्रत्यक्षाभास [तैमिरादिकं] तैमिर आदि ज्ञान [कथंचित्] कथंचित् [प्रमाणं स्यात्] प्रमाण हैं, [यत्] जो ज्ञान [यथा एव] जिस प्रकार से ही [अविसंवादि] अविसंवादी है [तत्] वह [तथा] उसी प्रकार से [प्रमाणं मतं] प्रमाण माना गया है॥१॥
अभयचन्द्रसूरि :
(संशय आदि कथंचित् प्रमाण हैं)
तात्पर्यवृत्ति-अक्ष-इंद्रिय और अनिंद्रिय के प्रति जो नियत है वह प्रत्यक्ष ज्ञानमात्र है उसके समान जो आभासित होता है वह प्रत्यक्षाभ-प्रत्यक्षाभास कहलाता है। वह कैसा है ? तिमिर से उत्पन्न हुआ ज्ञान तैमिरिक है, ऐसे ही और भी शीघ्र भ्रमण आदि ज्ञान होते हैं, वे प्रमाण हैं। वे कैसे प्रमाण हैं ? कथंचित् भाव प्रमेय की अपेक्षा से अथवा द्रव्य की अपेक्षा से वे सर्वथा प्रमाणाभास ही नहीं हैं किन्तु प्रमाण भी हैं। बाह्य पदार्थ के आकार को विषय करने में ही ज्ञान में विसंवाद आता है किन्तु स्वरूप की अपेक्षा उन ज्ञानों में विसंवाद नहीं है। इस विषय में अविनाभाव दिखलाते हैं -
जो ज्ञान जिस प्रकार ही-जितने विषय को जानने प्रकार से अविसंवादी है अर्थात् गृहीत अर्थ के विषय में व्यभिचार होना विसंवाद है उससे रहित अविसंवादी वह ज्ञान उसी प्रकार-उतने विषय को जानने के प्रकार से परीक्षकों ने प्रमाण इष्ट किया है-माना है। उसी को कहते हैं -
‘सभी प्रमाणाभास संशय आदि ज्ञान स्वरूप की अपेक्षा से अथवा द्रव्य की अपेक्षा से प्रमाण होते हैं क्योंकि उस विषय में अविसंवादी हैं। जो जिस विषय में अविसंवादी है वह उस विषय में प्रमाण है जैसे रस में रसज्ञान और संशय आदिक ज्ञान स्वरूप के विषय में अथवा द्रव्य रूपादि को विषय करने में अविसंवादी हैं इसलिए उन विषयों में वे कथंचित् प्रमाण हैं।
विसंवाद ही निश्चित रूप से अप्रमाणता का कारण है और अविसंवाद ही प्रमाणता का कारण है। इस प्रकार न्याय सभी वादीजनों सम्मत है। सर्वथा प्रमाणाभासता न्याय से शून्य है। ‘‘बहि:१ प्रमेयापेक्षायां प्रमाणं तन्निभं च ते’’ बाह्य प्रमेय की अपेक्षा में प्रमाण और प्रमाणाभास दोनों होते हैं, ऐसा वचन है। ज्ञान अपने स्वरूप से विसंवादी नहीं है। क्योंकि वे ‘अहं प्रत्ययं’ से (मैं इस ज्ञान से) सिद्ध हैं और प्रसिद्ध विषय में प्रवर्तमान होते हुए अप्रमाण कैसे हो ?
भावार्थ-आचार्यश्री का ऐसा कहना है कि यदि संशय ज्ञान अपने स्वरूप में भी अप्रमाण हो जावे तब तो संशय न रहकर असंशय-सच्चा हो जावेगा अत: सभी ज्ञान अपने-अपने स्वरूप को बताने में सच्चे ही हैं आरै द्रव्यदृष्टि से ज्ञान सामान्य की अपेक्षा भी सच्चे ही हैं। हाँ, बाह्य पदार्थों को जानने के विषय में जहाँ पर विसंवादी होता है वहीं पर झूठा कहलाता है और जहाँ पर विसंवाद रहित होता है वहीं पर सच्चा कहा जाता है ऐसा समझना।
🏠
स्वसंवेद्यं विकल्पानां विशदार्थावभासनं॥
संहृताशेषचिंतायां सविकल्पावभासनात्॥2॥
अन्वयार्थ : [विकल्पानां] विकल्पों में [विशदार्थावभासनं] विशद अर्थ को प्रतिभासित करने वाला ज्ञान [स्वसंवेद्यं] स्वसंवेद्य है, [संहृताशेषचिंतायां] वह अशेष विकल्पों के नष्ट हो जाने पर [सविकल्पावभासनात्] सविकल्प रूप के प्रतिभास से होता है॥२॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-स्व-तत्त्वज्ञानरूप से संवेद्य-ग्राह्य अर्थात् ज्ञान का स्वरूप स्वसंवेद्य कहलाता है क्योंकि इसमें वेद्य और वेदक इन दोनों आकार का विरोध नहीं है अन्यथा ज्ञान अवस्तु हो जावेगा। वह ज्ञान कैसा है ? विशद अर्थ का अवभासी है विशद-स्पष्ट और परमार्थ सत्-वास्तविक पदार्थ का अवभासित करने वाला ज्ञान विशद अर्थावभासी है। किनमें विशद अर्थ प्रतिभासन होता है ? यह घट है, यह गौ है, यह शुक्ल है, यह गायक है इत्यादि विकल्पों का-निश्चय ज्ञानों में विशद अर्थ प्रतिभासन होता है। कैसे प्रतिभासित होता है ? विकल्प-जाति आदि आकार वाले ज्ञान सहित जो सविकल्पक ज्ञान है, उसके प्रतिभासन-अनुभव से प्रतिभासित होता है। कब प्रतिभासित होता है ? अशेष स्मृति आदि चिंताविकल्पों के नष्ट हो जाने पर होता है अर्थात् चक्षु आदि के ज्ञान में जाति आदि आकार विशेष का जानना अप्रतिहत-निर्विघ्न रूप से होता है इसलिए विकल्प ज्ञान को प्रत्यक्षाभास कहना गलत है, यह अर्थ हुआ।
भावार्थ-‘यह गौ है, यह घट है’ इत्यादि विषयों में जो स्पष्ट रूप से पदार्थों का प्रतिभासन होता है वह स्वसंवेद्य है अर्थात् ज्ञानस्वरूप है। वह ज्ञान संपूर्ण स्मृति आदि विकल्पों की समाप्त दशा में जाति आदि आकार के विकल्प सहित होने वाले अनुभव से होता है इसलिए यह विकल्पों से अर्थ को स्पष्ट जानने वाला ज्ञान सविकल्पक है वह सच्चा है, प्रमाणाभास-असत्य नहीं है।
🏠
प्रतिसंविदितोत्पत्तिव्यया: सत्योऽपि कल्पना:॥
प्रत्यक्षेषु न लक्षेरंस्तत्स्वलक्षणभेदवत्॥3॥
अन्वयार्थ : [ प्रतिसंविदितोत्पत्तिव्यया:] प्रत्येक में अनुभव में आते हुए उत्पत्ति और व्ययरूप [कल्पना:] विकल्प [सत्य: अपि] विद्यमान होते हुए भी [प्रत्यक्षेषु] प्रत्यक्ष ज्ञानों में [तत् न लक्षेरन्] वे लक्षित नहीं होते हैं [स्वलक्षण भेदवत्] जैसे स्वलक्षण में भेद नहीं जाना जाता है॥३॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-स्वसंवेदन आदि प्रत्यक्ष ज्ञानों में विद्यमान रहते हुए भी वे विकल्प लक्षितविवेचित नहीं किये जाते हैं अर्थात् उन्हें कह नहीं सकते हैं। वे कैसे हैं ? उत्पत्ति-आत्मलाभ और व्यय-अभाव प्रतिसंविदित-प्रत्येक प्राणियों में उपलब्ध होने वाले ऐसे ये उत्पत्ति और व्ययरूप विकल्प हैं।
क्योंकि सत्त्व के बिना उत्पादव्ययवत्त्व अनुभव में नहीं आता है अन्यथा अतिप्रसंग हो जावेगा और विकल्पों में उत्पाद, व्ययपना असिद्ध भी नहीं है क्योंकि वह कार्य कारण के संबंध में प्रवर्तमान है। निर्विकल्प से विकल्प का होना भी शक्य नहीं है। वह निर्विकल्प अकिन्चित्कर है, विकल्प को उत्पन्न करने की शक्ति से रहित है।
शंका-विकल्पों के मौजूद होने पर भी प्रत्यक्षज्ञान में नहीं दिखते हैं। इसका क्या कारण है ?
समाधान-जानने वाले का शक्ति का अप्रणिधान-उधर न लगना ही है ऐसा हम कहते हैं। इस विषय में दृष्टांत-उन विकल्पों के स्वलक्षण-स्वरूप का सजातीय विजातीय से व्यावृत्त होना भेद कहलाता है उसके स्वलक्षण के भेद के समान। यहाँ यह अर्थ हुआ कि जिस प्रकार प्रतीति के विषयभूत उत्पाद, व्यय विद्यमान होते हुए भी स्वलक्षण से व्यावृत्तिरूप कल्पनाओं में लक्षित नहीं होते हैं, वे अनुमान से ही सिद्ध हैं उसी प्रकार से निर्विकल्प प्रत्यक्ष ज्ञानों में कल्पना में भी लक्षित नहीं होती हैं।
शंका-तब तो नहीं दिखती हुई उन कल्पनाओं का उस ज्ञान में वैâसे अस्तित्व सिद्ध होगा ?
समाधान-ऐसा नहीं कहना, पुन: उस विषय के स्मरण की अन्यथानुपपत्ति से वे कल्पनाएं सिद्ध हैं अर्थात् ज्ञान में यदि कल्पनाएं न हों तब तो पुन: उनके विषय का स्मरण कैसे हो सकेगा ? इसलिए उनका अस्तित्व सिद्ध है।
संहृतसकल विकल्पावस्था अर्थात् अश्व का विकल्प करते हुए गौ को देखने की अवस्था है, उसमें भी गोदर्शन निश्चयात्मक ही है क्योंकि पुन: उसके विषय के स्मरण की अन्यथानुपपत्ति है। जहाँ निश्चय का अभाव है वहाँ स्मरण नहीं उत्पन्न होता है, जैसे-चलते हुए तृण का स्पर्श हो जाने पर स्मरण नहीं उत्पन्न होता है और पुन: उनका स्मरण होता है, इसलिए अनुमान में विकल्पों का अस्तित्व सिद्ध है। जैसे-उस विकल्प के स्वरूप की व्यावृत्ति सिद्ध है। उसकी व्यावृत्ति भी प्रत्यक्ष से सिद्ध नहीं है क्योंकि वैसा अनुभव नहीं आता है। इसलिए यह बात सिद्ध हो गई कि निश्चय-विकल्पज्ञान प्रमाण है क्योंकि वह अविसंवादी है।
🏠
अक्षधीस्मृतिसंज्ञाभिश्चिंतयाऽऽभिनिबोधिकै:॥
व्यवहाराविसंवादस्तदाभासस्ततोऽन्यथा॥4॥
अन्वयार्थ : [अक्षधी:] इंद्रियज्ञान-मतिज्ञान [स्मृतिसंज्ञाभि:] स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, [चिंतया] तर्क और [आभिनिबोधकै:] अनुमान ज्ञानों के द्वारा [व्यवहाराविसंवाद:] व्यवहार में अविसंवादी है [तत:] इनसे [अन्यथा] अन्य प्रकार से-व्यवहार में विसंवादी होने से [तदाभास:] प्रमाणाभास हैं॥४॥
अभयचन्द्रसूरि :
(प्रमाण और प्रमाणाभास)
तात्पर्यवृत्ति-‘प्रमाण’ यह अनुवृत्ति में चला आ रहा है। उससे अभिसंबंध करने से अक्षधी आदि में प्रथमान्त विभक्ति करके अर्थ करना चाहिए। यहाँ ‘अर्थवशाद्विभक्तिविपरिणाम:’ इस न्याय से अर्थ के निमित्त से विभक्ति में परिवर्तन हो गया है। इससे इस प्रकार व्याख्यान किया जाता है-अक्षधी, स्मृति, संज्ञा से, चिंता से और आभिनिबोधिक से हानोपादान रूप व्यवहार में अविसंवाद-अव्यभिचार सकल व्यवहारीजनों में प्रतीति से सिद्ध है इसलिए वे ज्ञान प्रमाण होते हैं, यह अर्थ हुआ।
अक्ष-इंद्रियों से उत्पन्न हुआ धी-ज्ञान अक्षधी है अर्थात् सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष को अक्षज्ञान कहते हैं। अतीत अर्थ का अवमर्श करने वाला ज्ञान स्मृति है। संज्ञा-प्रत्यभिज्ञान, चिंता-तर्वâ और आभिनिबोधिक- अनुमान। आभिनिबोध अर्थात् हेतु के अन्यथानुपपत्ति नियम का निश्चय, उसमें होने वाला आभिनिबोधिक है ऐसा व्याख्यान किया गया है। इन ज्ञानों के द्वारा प्रमेय-जानने योग्य विषय प्रवर्तन करता हुआ छोड़ने- ग्रहण करने आदि फल में विसंवाद को प्राप्त नहीं होता है इसलिए उन ज्ञानों को प्रमाणता क्यों नहीं होगी ?
शंका-इस प्रकार से उन ज्ञानों में प्रमाणता कैसे होगी ?
समाधान-ऐसे आशंका को हम दूर करते हैं उसी व्यव्हार में विसंवाद नहीं होने से वे प्रमाण हैं अन्यथा उस व्यवहार मिएँ विसंवाद होने से वे अक्षधी - साम्व्यव्हारिक प्रत्यक्ष, स्मृति आदि ज्ञान तदाभास-प्रमाणाभास हो जाते हैं। निश्चित ही अर्थक्रिया से व्यभिचरित होने वाले को प्रमाणता नहीं है अन्यथा अति प्रसंग आ जावेगा।
(प्रमाणाभास के लक्षण)
संशय, विपर्यय, अनध्यवसाय और अदर्शन आदि प्रत्यक्षाभास कहलाते हैं। जो वह नहीं है उसमें ‘वह’ इस प्रकार का परामर्शी ज्ञान स्मृत्याभास है। जो उस सदृश नहीं है उसमें ‘यह उसके सदृश हैं’ और जो वह नहीं है उसमें ‘यह वहीं है’ इत्यादि ज्ञान प्रत्यभिज्ञानाभास हैं। जिसका आपस में संबंध नहीं है ऐसे असंबद्ध में व्याप्ति को ग्रहण करना तर्काभास है। असिद्ध, विरुद्ध, अनैकांतिक और अकिन्चित्कर ये हेत्वाभास हैं। प्रत्यक्ष आदि से बाधित साध्याभास है। साध्य विकल, साधन विकल और उभयविकल ये दृष्टांताभास हैं। विस्तार से इनका लक्षण परीक्षामुखालंकार आदि ग्रन्थों में देखना चाहिए।
🏠
प्रमाणं श्रुतमर्थेषु सिद्धं द्वीपांतरादिषु॥
अनाश्वासं न कुर्वीरन् क्कचित्तद्व्यभिचारत:॥5॥
अन्वयार्थ : [द्वीपांतरादिषु] द्वीपान्तर आदि [अर्थेषु] पदार्थों में [श्रुतं] श्रुतज्ञान [प्रमाणं सिद्धं] प्रमाण सिद्ध है [क्वचित् तद् व्यभिचारत:] कहीं पर उसमें व्यभिचार होने से [अनाश्वासं] अविश्वास [न कुर्वीरन्] नहीं करना चाहिए॥५॥
अभयचन्द्रसूरि :
(श्रुत की प्रमाणता-अप्रमाणता)
तात्पर्यवृत्ति-व्यवहार में अविसंवाद यह अनुवृत्ति में चला आ रहा है। आप्त के वचन आदि के निमित्त से होने वाला मतिपूर्वक अर्थज्ञान श्रुत कहलाता है और वह प्रमाण सिद्ध ही है।
प्रश्न-किस प्रकार से सिद्ध है ?
उत्तर-व्यवहार-त्याग-ग्रहण आदि में अविसंवादी होने से प्रत्यक्षादि ज्ञानों के समान प्रमेय अर्थों को जानने में वह प्रमाण सिद्ध है।
प्रश्न-वे प्रमेय क्या हैं ?
उत्तर-द्वीपान्तर आदि प्रमेय हैं। उन्हीं का स्पष्टीकरण करते हैं। प्रकृत जंबूद्वीप है, उससे अन्य धातकीखंड आदि द्वीपांतर कहलाते हैं। आदि शब्द से काल से और स्वभाव से व्यवहित-अत्यंत परोक्ष पदार्थों को ग्रहण करना अर्थात् देशकाल और आकार से विप्रकृष्ट-अत्यंत दूरवर्ती-पदार्थों में श्रुतज्ञान प्रमाण है।
श्रुत से अर्थ को जानकर प्रवृत्ति करता हुआ कोई भी पुरुष रसायन आदि क्रिया में अथवा ग्रहण आदि करने में या मलय-चंदन आदि की प्राप्ति में विसंवाद को प्राप्त नहीं होता है इसलिए परीक्षकजनों को अनाश्वास-अविश्वास नहीं करना चाहिए।
प्रश्न-कहीं-कहीं व्यभिचार देखा जाता है। जैसे-किसी नदी के किनारे लड्डू रखे हुए हैं इत्यादि रूप से प्रतिपादन करने पर उस श्रुत में व्यभिचार-विसंवाद देखा जाता है ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि कहीं पर विसंवाद होने से ज्ञान को अप्रमाण मानने पर सभी जगह अप्रमाण की आशंका नहीं करना चाहिए अन्यथा प्रत्यक्ष आदि ज्ञानों में भी वैसे ही अप्रमाणता का प्रसंग हो जाने से सकल व्यवहार का ही लोप हो जावेगा।
प्रश्न-श्रुत के विषय में वादियों को विसंवाद देखा जाता है, इसलिए वह अप्रमाण है ?
उत्तर-प्रत्यक्षादि ज्ञानों में भी उसी हेतु से अप्रमाणता आ जावे, कोई अंतर नहीं है। जिस प्रकार से पर लोक, पुण्य, पाप, सर्वज्ञादि जो श्रुतज्ञान के विषय हैं इनमें वादियों को विसंवाद है उसी प्रकार से प्रत्यक्ष आदि ज्ञान के विषयभूत जीवादि पदार्थों में भी सत्-असत्, नित्य-अनित्य आदि रूप से विसंवाद होते हैं। इसलिए अविसंवाद (और विसंवाद) से की गई प्रमाणता और अप्रमाणता की व्यवस्था श्रुतज्ञान में अथवा अन्य ज्ञान में स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि यही न्याय रूप है।
भावार्थ-कुछ लोग आगम को प्रमाण नहीं मानते हैं इसलिए यहाँ आचार्य ने स्पष्ट किया है कि जैसे प्रत्यक्ष, अनुमान आदि ज्ञान जहाँ-जहाँ जिस-जिस विषय में अव्यभिचारी हैं वहाँ-वहाँ उस-उस विषय में प्रमाण हैं अन्यत्र व्यभिचारित होने से अप्रमाण हैं। वैसे ही श्रुतज्ञान भी सूक्ष्म-परमाणु आदि अंतरित राम, रावणादि और दूरवर्ती-हिमवान्, सुमेरु आदि विषयों में अविसंवादी होने से प्रमाण है और जहाँ व्यभिचारी हो जाता है वहाँ अप्रमाण है।
🏠
प्राय: श्रुतेर्विसंवादात्प्रतिबंधमपश्यतां।
सर्वत्र चेदनाश्वास: सोऽक्षलिंगधियां सम:॥6॥
अन्वयार्थ : [प्राय: श्रुते: विसंवादात्] कदाचित् आगम में विसंवाद होने से [प्रतिबंधं अपश्यतां] शब्द और अर्थ के संबंध को नहीं जानने वालों को [चेत् सर्वत्र अनाश्वास:] यदि सभी आगम में अविश्वास है तो [स:] वह अविश्वास [अक्षलिंगधियां सम:] इंद्रिय ज्ञान और अनुमान ज्ञान में समान है॥६॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-प्रतिबंध को नहीं देखने वालों को अर्थात् शब्द और अर्थ के सहज योग्यता लक्षण संबंध को नहीं समझने वाले सौगतों को प्राय: क्वचित्-कदाचित् श्रुत-आगम के विसंवाद से यदि सर्वत्र-अविसंवादी श्रुत की प्रमाणता में विसंवाद हो जावे, तब तो वह अविश्वास समान है।
प्रश्न-किसके समान है ?
उत्तर-अक्ष-इन्द्रियाँ और लिंग-हेतु इनसे उत्पन्न होने वाले सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष और अनुमान ज्ञानों के समान है अर्थात् इन प्रत्यक्ष और अनुमान ज्ञानों में भी क्वचित्-कदाचित् व्यभिचारी दिखने से अविश्वास हो जावेगा, यह अर्थ हुआ है।
प्रश्न-अदुष्ट-निर्दोष कारण से जन्य प्रत्यक्ष अथवा अनुमान ज्ञान पदार्थों में विसंवाद को प्राप्त नहीं होते हैं ?
उत्तर-यदि ऐसी बात है तो अदुष्ट-निर्दोष आप्त वचन से उत्पन्न हुआ श्रुत भी विसंवाद को क्यों प्राप्त होगा ? इस प्रकार दोनों जगह समान ही है।
भावार्थ-सौगत आगम को प्रमाण नहीं मानता है। आचार्यों ने समझाया है कि शब्द और अर्थ में एक सहज योग्यता लक्षण संबंध पाया जाता है। इस निमित्त से वह श्रुतज्ञान सर्वत्र अप्रमाणीक नहीं है अन्यथा प्रत्यक्ष और अनुमान ज्ञान भी सर्वत्र अप्रमाणीक हो जावेंगे। यदि कोई कहे कि निर्दोष कारण से उत्पन्न होने से प्रत्यक्ष और अनुमान ज्ञान नहीं है, तब तो हमारे यहाँ भी निर्दोष कारणरूप आप्त के वचन से उत्पन्न हुआ आगम रूप श्रुतज्ञान प्रमाणीक है, यह अर्थ हुआ।
🏠
आप्त्तोक्तेर्हेतुवादाच्च बहिरर्थाविनिश्चये॥
सत्येतरव्यवस्था का साधनेतरता कुत:॥7॥
अन्वयार्थ : [ आप्त्तोक्ते:] आप्त के वचन से [हेतुवादात् च] और हेतुवाद से [बहि: अर्थाविनिश्चये] बाह्य अर्थ का निश्चय न मानने पर तो [सत्येतर व्यवस्था का] सत्य-असत्य की व्यवस्था क्या होगी ? और [साधनेतरता कुत:] साधन-असाधन की व्यवस्था कैसे होगी ?॥७॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-सत्य-सुगत के वचन और इतर-असत्य कपिल आदि के वचन इन दोनों की व्यवस्था-विभाग क्या होगा ? अर्थात् कुछ भी नहीं होगा। उसी प्रकार साधन-अपने इष्ट की सिद्धि निमित्तक सत्त्वादि हेतु और इतर-हेत्वाभास इन दोनों का भाव साधनेतरता भी कैसे व्यवस्थित होगी ?
प्रश्न-कब ये दोष आएंगे ?
उत्तर-जो जहाँ पर अवंचक है वह वहाँ पर आप्त है, उसके वचन से, केवल आप्त के वचन से ही नहीं किन्तु हेतुवाद-साधन के प्रयोग से इन दोनों से बाह्य अर्थ विप्रकृष्ट-अत्यंत परोक्ष प्रमेय का निश्चय नहीं होने पर उपर्युक्त सत्य-असत्य व्यवस्था और साधन-साधनाभास की व्यवस्था नहीं हो सकेगी। अर्थ यह हुआ कि आप्त के कथन से यदि अर्थ की प्रतीति नहीं मानोगे तब तो आपके सुगत के वचन सत्य हैं और कपिलादि के वचन असत्य हैं यह व्यवस्था वैâसे बनेगी ? क्योंकि अर्थ को विषय नहीं करना दोनों जगह समान है और हेतुवाद से भी बाह्य अर्थ का निश्चय नहीं मानने पर साधन-साधनाभास की व्यवस्था भी कैसे बनेगी, क्योंकि बाह्य अर्थ की शून्यता दोनों जगह समान है।
भावार्थ-यहाँ पर आचार्य ने सौगत को लक्ष्य करके ही श्रुत को प्रमाण मानने की पुष्टि की है कि यदि आप बुद्ध के वचन को प्रमाण नहीं मानोगे तो आपके बुद्ध सत्य हैं और उनके वचन सत्य हैं। अन्य संप्रदाय वालों के ईश्वर और उनके वचन असत्य हैं यह विभाग भी कैसे बनेगा ? अत: श्रुत को प्रमाण मान लेना उचित है।
🏠
पुंसश्चित्राभिसंधेश्चेद्वागर्थव्यभिचारिणी॥
कार्यं दृष्टं विजातीयाच्छक्यं कारणभेदि किं॥8॥
अन्वयार्थ : [चेत् चित्राभिसंधे:] यदि नाना अभिप्राय से [पुंस: वाक् अर्थ व्यभिचारिणी] पुरुष के वचन अर्थ को व्यभिचारित करते हैं, तब तो [विजातीयात् कार्यं दृष्टं] विजातीय कारण से कार्य विरोध रहित हो जावेगा [कारण भेदि किम् शक्यं] पुन: कारण में भेद करना क्या शक्य होगा ?॥८॥
अभयचन्द्रसूरि :
भावार्थ-यदि पुरुष के अभिप्राय भिन्न-भिन्न हैं अत: उनके वचन अर्थ में विसंवाद करते हैं इसलिए किसी को आप्त नहीं माना जा सकता, न उनके वचन ही अर्थ को सही कहने वाले माने जा सकते हैं तब तो गेहूँ के बीज से शालिधान्य उत्पन्न हो जावेंगे, पुन: कारण में भेद कुछ भी नहीं रह सकेगा।
तात्पर्यवृत्ति-पुरुष-वक्ता के चित्र-सत्य-असत्य आदि नानारूप अभिसंधि-अभिप्रायविवक्षा से यदि वाक्-आप्त के वचन अर्थ में व्यभिचारी हैं-बाह्य पदार्थ में विसंवादी हैं अर्थात् ‘‘सरागा अपि वीतरागवच्चेष्टंते’’ सराग भी वीतराग के समान चेष्टा करते हैं ऐसा वचन है। तब तो विजातीय कारण से भी कार्य दृष्ट-अविरुद्ध हो जावें पुन: उस कारण में भेद करना अर्थात् कारण के प्रतिनियत-स्वात्मलाभ के निमित्त को अलग करना-विजातीय से भेद करना क्या शक्य होगा ? अर्थात् नहीं होगा।
तब उस कार्य के जिस किसी से उत्पन्न होने में विरोध नहीं होगा, निश्चित ही अनियत कारण से उत्पन्न होने वाला कार्य कारण के भेद को नहीं बतलाता है क्योंकि उसमें वैसी शक्ति नहीं है। पुन: कार्य में कारण का व्यभिचार होने से वह अहेतु हो जावेगा, इस तरह अनुमान का उच्छेद हो जावेगा, यह भाव हुआ।
सौगत-विवेकपूर्वक होने वाले कार्य कारण का उल्लंघन नहीं करते हैं।
जैन-यदि ऐसा कहो, तो सम्यक् प्रकार से प्रयुक्त हुए वचन भी यथार्थ विवक्षा का उल्लंघन नहीं करते हैं। इस प्रकार से अर्थ में व्यभिचार कैसे होगा ?
प्रश्न-विवक्षा में अधिरूढ़ ही वचन का अर्थ है, बाह्य अर्थ नहीं है अर्थात् कहने की इच्छा तक ही वचन का अर्थ सीमित है, बाह्य पदार्थ को नहीं कहता है।
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि विवक्षा का उससे व्यभिचार नहीं है। बोलने की इच्छा विवक्षा है। उस बोलने की इच्छा का नियम बाह्य अर्थ के नियम से युक्त नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग आ जावेगा।
हाथ की अंगुली के अग्रभाग के आधार पर तो हाथी के अस्तित्व आदि के प्रतिपादक वचन प्रतारण करने वाले-ठगने वाले होने से अप्रमाण सिद्ध हैं क्योंकि राग, द्वेष, मोह से आक्रांत पुरुष के वचन आगमाभास हैं इसलिए द्वीपांतर आदि अर्थों में विसंवाद का अभाव होने से श्रुतज्ञान प्रमाणरूप सिद्ध है, यह बात ठीक ही कही है।
भावार्थ-पुरुषों के मनोगत भावों में और वचनों में अंतर देखकर सर्वत्र वचन को अर्थ का व्यभिचारी कहना ठीक नहीं है अन्यथा विजातीय गेहूँ के बीज से शालिधान्य का अंकुर उत्पन्न हो जावेगा, पुन: कोई भी कारण अपने कार्य का नियामक नहीं हो सकेगा। इसलिए सर्वथा अर्थशून्य अथवा विरोधी वचनों को देखकर सर्वत्र सत्य आगम में भी अविश्वास करना, उसे प्रमाण नहीं मानना अयुक्त है। हमारे यहाँ तो आगम प्रमाण सबसे बलवान है, वही तो प्रत्यक्ष अनुमान आदि की प्रमाणता को सिद्ध करता है। पिता को प्रमाण न मानकर बेटे को प्रमाण मानना कहाँ तक उचित है।
श्लोकार्थ-श्री भट्टाकलंकदेव और प्रभाचंद्राचार्य से अंजित-स्पष्ट किये कथंचित् प्रमाणाभास को ‘स्यात्’-स्याद्वाद मत का आश्रय लेकर श्री अभयचंद्रसूरि के वचन विशेष रूप से वर्णन कर देते हैं अर्थात् कारिका में श्री भट्टाकलंकदेव ने कथंचित् प्रमाणाभास का वर्णन किया है। पुन: श्री प्रभाचंद्राचार्य ने न्यायकुमुदचंद्र टीका और उसका विशद विवेचन किया है।।१।।
यहाँ पर उन दोनों के आधार से और स्याद्वादमत का आश्रय लेकर श्री अभयचंद्रसूरि ने तात्पर्यवृत्ति में उसका ही स्पष्ट और संक्षेप विवेचन कर दिया है।
इस प्रकार से अभयचंद्रसूरि कृत लघीयस्त्रय की स्याद्वादभूषण नामक तात्पर्यवृत्ति में प्रमाणाभास नाम का चतुर्थ परिच्छेद पूर्ण हुआ।
इस प्रकार भट्टाकलंक शशांक से स्मृत लघीयस्त्रय में प्रमाण प्रवेश नाम का प्रथम प्रकरण समाप्त हुआ।
🏠
पंचम परिच्छेद
नमो नमन्मरुन्मौलिमिलत्पदनखांशवे॥
स्वांतध्वांतप्रतिध्वंस प्रशंसाय जिनांशवे॥1॥
अथेदानीं प्रमाणं तदाभासं परीक्ष्य नयतदाभासलक्षणपरीक्षार्थमाह—
भेदाभेदात्मके ज्ञेये भेदाभेदाभिसंधय:॥
एतेऽपेक्षानपेक्षाभ्यां लक्ष्यंते नयदुर्नया:॥1॥
अन्वयार्थ : अर्थ-नमस्कार करते हुए देवों के मुकुट से स्पर्शित है चरण नख किरणें जिनकी, ऐसे हृदय के अंधकार को ध्वंस करने में प्रशंसित जिन चंद्रमा को मेरा नमस्कार होवे॥१॥
अन्वयार्थ-[भेदाभेदात्मके ज्ञेये] भेदाभेदात्मक ज्ञेय पदार्थ में [भेदाभेदाभिसंधय:] जो भेद और अभेदरूप अभिप्राय हैं [एते] ये [अपेक्षानपेक्षाभ्यां] अपेक्षा और अनपेक्षा के द्वारा [नयदुर्नया:] नय और दुर्नयरूप [लक्ष्यंते] निश्चित किये जाते हैं॥१॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-प्रतिपक्ष धर्म की आकांक्षारूप अपेक्षा से और इससे विपरीत सर्वथा एकांतरूप अनपेक्षा से ये नय और नयाभास लक्षित-निश्चित किये जाते हैं।
प्रश्न-ये किन विशेषताओं से सहित हैं ?
उत्तर-ये भेद और अभेद के अभिप्राय रूप हैं। विशेष, पर्याय और व्यतिरेक को भेद कहते हैं। सामान्य, एकत्व और सादृश्य को अभेद कहते हैं। इन भेद और अभेद के अभिप्राय रूप हैं अर्थात् ये नय श्रुतज्ञानी के विकल्प रूप हैं। भेदाभेदात्मक जीवादि ज्ञेय-प्रमेय के जानने में ये भेदाभेद विकल्प होते हैं।
निश्चित ही एकांतरूप से भेदात्मक अथवा अभेदात्मकरूप प्रमेय उपलब्ध नहीं है। अनुवृत-व्यावृत्त प्रत्यय के बल से उभयात्मक ही उपलब्ध हो रहा है क्योंकि प्रमाण अनेकांत को विषय करने वाला है। ‘अनेकांत: प्रमाणात्१’ अनेकांत प्रमाण से जाना जाता है।
(सुनय और दुर्नय का लक्षण)
उभयात्मक रूप से अर्पित-अपेक्षित वस्तु व्यवहार के योग्य नहीं है इसलिए व्यवहार के उपयोगी एकांत नय के आधीन होने से नय कहे जाते हैं। ‘२तदेकांतोऽर्पितान्नयात्’ अर्पित नय से व्यवहार के लिए उपयोगी एकांत होता है। इस प्रकार सिद्धांत में कहा है। वे नय परस्पर की अपेक्षा करने वाले ही व्यवहार के लिए समर्थ होते हैं अन्यथा परस्पर की अपेक्षा न रखने से उस व्यवहार के लोप करने में हेतु होने से दुर्नय हो जाते हैं। ३निरपेक्षा नया मिथ्या सापेक्षा वस्तु तेऽर्थकृत्’’ निरपेक्ष नय मिथ्या हैं और सापेक्ष होते हुए वे नय हे भगवन्! आपके यहाँ वस्तुभूत अर्थक्रियाकारी हैं, ऐसा श्री स्वामी समंतभद्राचार्य ने कहा है।
(नय के विषय)
वे नय दो प्रकार के हैं-द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक। द्रव्य, सामान्य, अभेद, अव्यय और उत्सर्ग ये पर्यायवाची नाम हैं। यह द्रव्य जिसका अर्थ-विषय है, वे द्रव्यार्थिक नय हैं। पर्याय विशेष, भेद, व्यतिरेक, अपवाद ये पर्यायवाची नाम हैं। ये पर्याय अर्थ-विषय है जिसका वे पर्यायार्थिक नय हैं, ऐसा निरुक्ति अर्थ है।
द्रव्य के दो भेद हैं-शुद्ध द्रव्य और अशुद्ध द्रव्य। उसमें सत्सामान्य को शुद्ध द्रव्य कहते हैं और जीव तत्त्वादि पुन: अशुद्ध द्रव्य कहलाते हैं।
भावार्थ-प्रत्येक वस्तु में अनेक अंत अर्थात् धर्म पाये जाते हैं इसलिए वस्तु अनेकांतात्मक है। प्रमाण अनेकांत को विषय करता है। अनेकांतात्मक वस्तु के एक धर्म अर्थात् एक अंश को एकांत कहते हैं। नय एकांत को विषय करता है। यह नय अपने से विपरीत अंश के ग्राहक नय की अपेक्षा रखता है तभी तक सुनय है। जब दूसरे की अपेक्षा न करके आग्रहपूर्वक एक अंश को ही ग्रहण करता है तब वह दुर्नय या नयाभास कहलाता है।
द्रव्य मात्र को जानने वाला द्रव्यार्थिक नय है और पर्याय मात्र को जानने वाला पर्यायार्थिक नय है। द्रव्य में भी सत्सामान्य को शुद्ध द्रव्य कहते हैं और जीवादि तत्त्व को अशुद्ध द्रव्य कहते हैं।
🏠
जीवाजीवप्रभेदा यदंतर्लीनास्तदस्ति सत्।
एकं यथा स्वनिर्भासि ज्ञानं जीव: स्वपर्ययैः॥2॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[जीवाजीवप्रभेदा:] जीव और अजीव के प्रभेद [यत् अंतर्लीना:] जिसके अंतर्लीन हैं [तत् सत् अस्ति] वह सत् है। [यथा] जैसे [स्वनिर्भासि] स्वनिर्भासी [एकं ज्ञानं] एक ज्ञान और [स्वपर्ययै:] अपनी पर्यायों से [जीव:] जीव एक है॥२॥
अभयचन्द्रसूरि :
(सत् का लक्षण)
तात्पर्यवृत्ति-जीव का लक्षण चेतना है। अजीव पुन: उससे विपरीत पुद्गल आदि हैं। त्रस-स्थावर आदि अवांतर विशेष जीव के प्रभेद हैं। ये भेद-प्रभेद सहित सभी जीव-अजीव जिसमें अंतर्गर्भित हैं वह सत्-सत्तासामान्य है-मौजूद है-प्रतीति में आ रहा है।
निश्चित ही सत्त्व-अस्तित्व से व्यतिरिक्त द्रव्य अथवा पर्याय ‘अस्ति-है’ इस प्रकार कुछ भी व्यवहार करना शक्य नहीं है क्योंकि स्ववचन में विरोध आता है और अतिप्रसंग दोष आता है अर्थात् ‘अस्ति’ को ही ‘है’ इस शब्द से कहते हैं। जब द्रव्य या पर्याय का अस्तित्व ही नहीं है तब यह द्रव्य है या पर्याय है ऐसा कहना तो ‘मैं मौनव्रती हूँ’ ऐसा बोलने वाले के समान स्ववचन बाधित ही है और अतिप्रसंग से आकाश के फूल, बंध्या के पुत्र आदि भी दिखने लगेंगे।
प्रश्न-एक ही अनेक जीवादि भेदों में व्यापक कैसे हो सकता है ?
उत्तर-जैसे आपके द्वारा मान्य एक ही ज्ञान चित्रपटाति को विषय करने वाला है स्वनिर्भासी है। स्व-अपने ज्ञानस्वरूप निर्भास-नीलादि आकार जिसमें हैं, वह स्वनिर्भासी कहलाता है और जिस प्रकार से एक जीव-आत्मा अपनी पर्यायों से सहित है। स्व-चिद्रूप पर्याय-रागादि परिणामों से आक्रांत-व्याप्त प्रतीति के पद पर आरूढ़ हुआ विरुद्ध नहीं है अर्थात् चैतन्य स्वरूप राग, द्वेषादि भावों से व्याप्त और प्रतीति में आता हुआ एक जीव द्रव्य सिद्ध है। उसी प्रकार से जीवादि अनेक भेदों से आक्रांत सत्त्व भी विरुद्ध नहीं है।
🏠
शुद्धं द्रव्यमभिप्रैति संग्र्रहस्तदभेदत:।
भेदानां नासदात्मैकोऽप्यस्ति भेदो विरोधत:॥3॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[संग्रह: तदभेदत:] संग्रहनय उस सामान्य के अभेद से [शुद्धं द्रव्यं] शुद्ध द्रव्य को [अभिप्रैति] स्वीकार करता है। [भेदानां] भेदों में [असदात्मा] असत्स्वरूप [एक: अपि भेद:] एक भी भेद [न अस्ति] नहीं है॥३॥
अभयचन्द्रसूरि :
(संग्रहनय का विषय)
तात्पर्यवृत्ति-संग्रहनय सत्सामान्य शुद्ध द्रव्य को विषय करता है क्योंकि उसमें अन्य उपाधि से रहित होने से ही शुद्धि संभव है। ‘सामान्य को विषय करने वाला ही नय संग्रह है वह स्वजाति के अविरोध से भेदों से सहित ऐसी पर्यायों में एकत्व को प्राप्त करके समस्त को ग्रहण करने वाला ‘संग्रह’ कहलाता है। ऐसा निरुक्ति सिद्ध अर्थ है।
क्योंकि वह तदभेदत:-उस सत्सामान्य लक्षण शुद्ध द्रव्य में अभेद रूप है। सभी जीव और अजीवों में अव्यतिरिक्त-अभिन्न है।
प्रश्न-प्रागभाव आदि सत्त्व से भिन्न हैं तो यह उनसे अभिन्न कैसे होगा ?
समाधान-जीवादि सत् विशेषों के मध्य में एक भी भेद जीव, उसकी पर्याय अथवा अन्य कोई असदात्मा-असत्वरूप नहीं है क्योंकि विरोध आता है। यदि असत् रूप है पुन: ‘है कैसे’ ? यदि ‘है’तो असत्स्वरूप कैसे है ? इस प्रकार स्ववचन में विरोध होता है अत: वह सत् सिद्ध है इसलिए प्रागभाव आदि हो अथवा अन्य कोई हो उसे कथंचित् प्रतीति के बल से सदात्मक-सत् रूप ही स्वीकार करना चाहिए।
भावार्थ-संग्रहनय सत् सामान्य को विषय करता है अर्थात् इसी नय की अपेक्षा से संपूर्ण चराचर जगत् एकरूप है। इस संग्रहनय के उदर में सारा लोकालोक समा गया है। इसी नय के एकांत दुराग्रह से ब्रह्माद्वैतवादी आदि अद्वैतवादियों ने सारे विश्व को एक सत्रूप-ब्रह्मरूप या ज्ञानरूप इत्यादि प्रकार से स्वीकार कर लिया है। यहाँ एक प्रश्न हुआ कि प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि अभावों को संग्रहनय कैसे जानेगा ? तब आचार्य ने कहा है कि नैयायिक द्वारा मान्य अभाव तो तुच्छाभावरूप है किन्तु जैनों ने अभाव को भावांतर रूप से स्वीकार किया है जैसे ‘दीपस्तम:१ पुद्गलभावतोऽस्ति’ दीपक के बुझने से अंधकार हो गया तो भी जैसे प्रकाश पुद्गल की पर्याय थी वैसे ही अंधकार भी पुद्गल की पर्याय है। अथवा ‘खे नास्ति२ पुष्पं तरुषु प्रसिद्धं’ आकाश में पुष्प नहीं है यह कथन सर्वथा अभाव रूप नहीं है क्योंकि पुष्प वृक्षों में तो प्रसिद्ध ही है।
अथवा जीव या उसकी कोई भी पर्याय ‘नहीं है’ ऐसा कहने पर तो यदि असत् स्वरूप है तो ‘है’ कैसे कहा ? और यदि ‘है’ तो असत्स्वरूप उसका कैसे रहा ? इसलिए सभी अभाव कथंचित् भावात्मक ही हैं। ‘न जैन: अजैन:’ जैन नहीं है वह अजैन है यहाँ पर भी नञ् समास में नहीं का अर्थ है कि वह जैन नहीं है किन्तु ब्राह्मण या क्षत्रिय आदि कुछ है।
🏠
प्रत्यक्षं बहिरंतश्च भेदाज्ञानं सदात्मना॥
द्रव्यं स्वलक्षणं शंसेद्भेदात्सामान्यलक्षणात्॥4॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[भेदाज्ञानं प्रत्यक्षं] भेद को नहीं ग्रहण करने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान [सदात्मना] सत्रूप से [बहि: अंत: च] बहिरंग और अंतरंग पदार्थ में [सामान्य लक्षणात्] सामान्य लक्षण वाले [भेदात्] भेद से [द्रव्यं स्वलक्षणं] द्रव्य को वस्तुभूत [शंसेत्] कहता है॥४॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-इंद्रिय और मन से होने वाला विशद ज्ञान प्रत्यक्ष कहलाता है। वह भेदाज्ञान अर्थात् बौद्धों के द्वारा परिकल्पित भेदों को-निरंश क्षणों को नहीं जानता है-नहीं ग्रहण करता है, ऐसा वह भेद को नहीं ग्रहण करने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान सद्रूप से बाह्य-अचेतन घटादि और अंतरंग चेतन में शुद्ध अथवा अशुद्ध द्रव्य को स्वलक्षण-वास्तविक कहता है, कल्पित नहीं कहता है क्योंकि पदार्थों में सत्रूप से भेद प्रत्यक्ष से नहीं जाना जाता है कि जिससे प्रत्यक्षज्ञान द्रव्य को (एकरूप) न कहे।
कैसे ? सामान्य-अन्वय, लक्षण-लिंग है जिसका उस सामान्य लक्षण भेद का आश्रय लेकर कहता है अर्थात् प्रत्यक्ष अथवा अन्य अनुमानादि प्रमाण भेदनिरपेक्ष अभेद को सिद्ध नहीं करते हैं क्योंकि वैसी उपलब्धि नहीं होती है। इस हेतु से प्रत्यक्ष भी द्रव्य सिद्धि का कारण ही है इसलिए संग्रहनय मिथ्या कैसे हो सकेगा ? अर्थात् नहीं हो सकेगा।
भावार्थ-प्रत्यक्ष प्रमाण भी सत्रूप से किन्हीं भी चेतन-अचेतन पदार्थों में भेद को नहीं करते हुए सत् लक्षण वाले द्रव्य को सिद्ध कर देता है इसलिए सत्सामान्य-सबको एक सत् रूप ग्रहण करने वाला संग्रहनय मिथ्या नहीं है प्रत्युत् समीचीन ही है क्योंकि यहाँ अभेद भी भेद निरपेक्ष विवक्षित नहीं है।
🏠
सदसत्स्वार्थनिर्भासै: सहक्रमविवर्तिभि:॥
दृश्यादृश्यैर्विभात्येकं भेदै: स्वयमभेदकैः॥5॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-जैसे [सदसत् स्वार्थ निर्भासै:] सत्-असत् रूप और अर्थ के आकार से [एकं] ज्ञान एक है, वैसे ही [स्वयं अभेदवैâ:] स्वरूप से भेद नहीं करने वाले ऐसे [सहक्रम विवर्तिभि:] सहभावी और क्रमभावी से तथा [दृश्यादृश्यै:] व्यंजन पर्याय और अर्थ पर्यायों से [एकं विभाति] एक द्रव्य प्रतिभासित होता है॥५॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-एक द्रव्य रूप से अभिन्न जीवादि वस्तु युगपत् होने वाली सहभावी और क्रम से काल के भेद से होने वाली, परिणमन करने वाली क्रमभावी भेद-गुण पर्यायों से विशेषरूप से प्रत्यक्षादि ज्ञान में प्रतिभासित होती है। ‘१गुणपर्ययवद्द्रव्यं-गुण पर्याय वाला द्रव्य है’ ऐसा सूत्रकार का कथन है। रागादि पर्याय में सहवर्ती हैं। स्वयं-स्वरूप से गुणपर्याय रूप से जिसमें गुण अथवा पर्याय का भेद नहीं है तथा ‘२द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणा:’-जो द्रव्य के आश्रित हैं, निर्गुण हैं, वे गुण कहलाते हैं’’ ऐसा वचन है। गुण और पर्यायों को भी गुणपर्यायवत्त्व से द्रव्यत्व का प्रसंग आ जाता है क्योंकि द्रव्य उस लक्षण वाला ही है।
प्रश्न-वे पर्यायें कैसी हैं ?
उत्तर-स्थूल व्यंजन पर्यायों को दृश्य कहते हैं और सूक्ष्म, केवल आगम से जानने योग्य अर्थ पर्यायों को अदृश्य कहते हैं। इन उभयात्मक पर्यायों से द्रव्य अभिन्न है अत: एक है।
इसी अर्थ को पुष्ट करने में परप्रसिद्ध दृष्टांत देते हैं। यहाँ कारिका के अर्थ में ‘यथा ज्ञान’ इतना पद अध्याहार करना चाहिए। जैसे-एक ज्ञान में स्व और अर्थ के निर्भास-जीवादि आकार सत्-असत् रूप हैं अर्थात् ज्ञानगत आकार सत्रूप हैं और नीलादि अर्थाकार असत् रूप हैं, इन सत्रूप-असत्रूप आकारों से सहित होकर भी चित्रज्ञान एक है यह बात विरुद्ध नहीं है। उसी प्रकार अर्थ व्यंजन पर्यायों से और सहक्रमवर्ती गुण, पर्यायों से सहित एक द्रव्य भी प्रतिभासित हो रहा है, यह बात विरुद्ध नहीं है क्योंकि विरोध तो अनुपलब्धि से सिद्ध होता है तथा द्रव्य और भेद तो उपलब्ध हो रहे हैं।
इसलिए जीवादि वस्तु भेदाभेदात्मक सिद्ध हैं क्योंकि उसी प्रकार से वे ज्ञान का विषय हैं और अर्थ क्रियाकारी हैं। निश्चित ही सर्वथा नित्य अथवा वस्तु अर्थक्रिया को करते हुए प्रतीति में नहीं आती है कि जिससे उसे परमार्थसत् माना जा सके अर्थात् उन नित्य अथवा क्षणिक को वास्तविक नहीं माना जा सकता है।
भावार्थ-सभी वस्तुएँ अपने-अपने अनंत गुण पर्यायों से सहित होकर भी कथंचित् सत् रूप से एक रूप हैं और कथंचित् अपने अस्तित्व से पृथक्-पृथक् होने से अनेक रूप भी हैं इसलिए सभी वस्तुएँ भेदाभेदात्मक ही हैं। सत्ता के दो भेद हैं-महासत्ता और अवांतरसत्ता। महासत्ता सत्सामान्य मात्र से सभी चेतन-अचेतन वस्तु को एकरूप ग्रहण करती है और अवांतर सत्ता अर्थात् प्रत्येक वस्तु का अलग-अलग अस्तित्व यह सभी वस्तुओं को भेदरूप ग्रहण करता है अतएव वस्तु भेदाभेदात्मक है।
🏠
कार्योत्पत्तिर्विरुद्धा चेत्स्वयंकारणसत्तया॥
युज्येत क्षणिकेऽर्थेऽर्थक्रियासंभवसाधनम्॥6॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[चेत् स्वयं कारणसत्तया] यदि स्वयं कारण की सत्ता से [कार्योत्पत्ति: विरुद्धा:] कार्य की उत्पत्ति विरुद्ध होवे, तब [क्षणिके अर्थे] क्षणिक अर्थ में [अर्थक्रिया संभव साधनं] अर्थक्रिया का होना सिद्ध [युज्येत] किया जा सके॥६॥
अभयचन्द्रसूरि :
(सर्वथा क्षणिक में अर्थक्रिया संभव नहीं है)
तात्पर्यवृत्ति-कार्यरूप उत्तर परिणाम का स्वरूप लाभ होना कार्य की उत्पत्ति है। स्वयं कारणकार्य उत्पन्न करने वाला द्रव्य का स्वरूप उपादान है। उसे स्वयं कारण कहते हैं और उसका अस्तित्व स्वयं कारण सत्ता है। यदि स्वयं द्रव्य स्वरूप उपादान की सत्ता से कार्य की उत्पत्ति विरुद्ध होवे तब क्षणिक अर्थ में अर्थक्रिया के संभव का अनुमान हो सके।
अर्थ-अभिमत प्रयोजन की क्रिया-निष्पत्ति अर्थक्रिया है, उसका संभवसाधन-‘नित्यक्रम यौगपद्य विरहात्’ नित्य में क्रम और युगपत् का अभाव है’ इत्यादि अनुमान है। निरन्तर विनश्वर को क्षणिक कहते हैं अर्थात् क्षणिक-विनश्वर पदार्थ में वह अर्थक्रिया संभव नहीं है।
तथा वह कार्य की उत्पत्ति विरुद्ध नहीं है क्योंकि कार्य के समय सत् रूप ही कारण होता है अन्यथा कार्य को आकस्मिकपने का प्रसंग आ जाएगा और क्षणिवैâकांत में कार्य-कारणभाव का विरोध है। जिसके अभाव में जो उत्पन्न होता है और जिसके सद्भाव में जो उत्पन्न नहीं होता है, उनमें कार्य-कारण भाव नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग दोष आ जायेगा। इस हेतु से कथंचित् सत् को ही कारण अथवा कार्य स्वीकार कर लेना चाहिए। इस प्रकार वस्तु द्रव्य पर्यायात्मक ही है, क्योंकि उसी में अर्थक्रिया संभव है।
भावार्थ-बौद्ध का कहना है कि कारण रूप मृत्पिंड का सर्वथा निमूल चूल नाश होकर घटरूप कार्य बनता है। इस पर आचार्यों का कहना है कि स्वयं उपादान कारणरूप मृत्पिंड ही घट कार्य रूप से परिणत होता है, ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है अतएव सर्वथा क्षणिक सिद्धांत में कार्य-कारण भाव सिद्ध नहीं होता है और न उस क्षणिक वस्तु में इष्ट प्रयोजन के होने रूप अर्थक्रिया ही संभव है अत: वस्तु कथंचित् नित्यानित्यात्मक स्वीकार करना चाहिए।
🏠
यथैकं भिन्नदेशार्थान्कुर्याद् व्याप्नोति वा सकृत्॥
तथैकं भिन्नकालार्थान्कुर्याद् व्याप्नोति वा क्रमात्॥7॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[यथा एकं] जैसे एक-क्षणिक स्वलक्षण [सकृत्] एक क्षण में [भिन्नदेशार्थान्] भिन्न देश वाले कार्यों को [कुर्यात्] करता है [वा] अथवा [व्याप्नोति] व्याप्त करता है [तथा] वैसे ही [एकं] एक द्रव्य [क्रमात्] क्रम से [भिन्न कालार्थान्] भिन्न कालवर्ती कार्यों को [कुर्यात्] करता है [वा व्याप्नोति] अथवा उनको व्याप्त करता है॥७॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-जिस अविरोध प्रकार से एक सौगत के द्वारा स्वीकृत क्षणिक स्वलक्षण एक क्षण में भिन्न-विप्रकृष्ट देश वाले कार्यों को ‘स्वसंतानवर्ती को उपादानरूप से और भिन्न संतानवर्ती को निमित्त रूप से उत्पन्न करता है। अथवा जैसे एक ही ज्ञान भिन्न देशार्थ अर्थात् विप्रकृष्ट नीलादि आकारों को व्याप्त करता है इसमें विरोध नहीं है। वैसे ही एक अभिन्न द्रव्य क्रम से काल भेद से पूर्व और अपर काल में होने वाले कार्यों को करता है, पूर्वाकार का परिहार, उत्तर आकार की प्राप्ति और स्थितिरूप से परिणमन करता है अथवा उन्हीं को व्याप्त करता है-उनके साथ तादात्म्य का अनुभव करता है, यह बात विरुद्ध नहीं है।
एक के ही नाना देश के कार्यों को करना अविरुद्ध है किन्तु नाना काल के कार्य को करना विरुद्ध है। यह कथन भी अपने दर्शन का अनुराग मात्र ही है क्योंकि न्याय तो सर्वत्र समान होता है इसलिए जीवादि वस्तु एकानेकादि रूप से अनेकांतात्मक सिद्ध हैं अन्यथा अर्थक्रिया का विरोध हो जावेगा।
भावार्थ-बौद्ध का कहना है कि एक क्षणिक स्वलक्षण भिन्न देशवर्ती कार्यों को उत्पन्न करता है और एक निरंश ज्ञान भिन्न देशवर्ती नीलादि आकारों में व्याप्त होता है किन्तु आचार्य कहते हैं कि वैसे ही सत् रूप से अभिन्न एक द्रव्य पूर्वोत्तर कालवर्ती कार्यों को करता है और उन्हीं को व्याप्त करके उन्हीं में तादात्म्य का अनुभव भी करता है अत: एक अनेक कार्य को नहीं कर सकता या अनेक धर्मों में व्याप्त नहीं रह सकता है ऐसा दोष कहाँ रहा ? भाई, न्याय तो दोनों जगह समान ही रहेगा।
🏠
संग्रह: सर्वभेदैक्यमभिप्रैति सदात्मना॥
ब्रह्मावादस्तदाभास: स्वार्थभेदनिराकृते:॥8॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[संग्रह:] संग्रह नय [सदात्मना] सत्रूप से [सर्वभेदैक्यं] सभी भेदों में ऐक्य को [अभिप्रैति] स्वीकार करता है किन्तु [ब्रह्मवाद:] ब्रह्माद्वैतवाद [तदाभास:] संग्रहाभास है [स्वार्थ भेदनिराकृते:] क्योंकि वह अपने और अर्थ के भेदों का निराकरण करता है॥८॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-संग्रहनय सभी भेदरूप द्रव्यादि के ऐक्य-अभेद को ‘सर्वं सत्-सभी सत्रूप हैं’ इस सत्रूप से विषय करता है। ‘सत्सामान्यात्तु सर्वैक्यं१’ सत्सामान्य से सभी में ऐक्य-अभेद है’ ऐसा श्री समंतभद्रस्वामी का वचन है। सर्वथा सभी वस्तु एक रूप नहीं है क्योंकि वैसी प्रतीति नहीं होती है।
शंका-इस प्रकार से तो आपने ब्रह्मवाद का ही समर्थन कर दिया है ?
समाधान-नहीं। वह सत्ता द्वैतरूप भावैकांत ही ब्रह्मवाद है अत: वह संग्रहाभास है।
शंका-क्यों ?
समाधान-क्योंकि वह अपने ब्रह्मवाद विषय के भेदों का निराकरण करने वाला है। स्व-अपने ब्रह्मवाद का अर्थ-विषय, सन्मात्र, उसके भेद-जीवादि विशेषों का निराकरण-निषेध करने वाला है। निश्चित ही सर्वथा सत्रूप में भेदों को अवकाश नहीं है और भेद रहित वह सामान्य कैसे रह सकता है क्योंकि निराश्रय रूप है और अर्थक्रिया से रहित है। नैवंâ२ स्वस्मात् प्रजायते-’ एक ही ब्रह्म अपने आप से उत्पन्न नहीं हो सकता है’ ऐसा न्याय है। उस ब्रह्माद्वैत में क्रिया कारक का भेद भी नहीं है कि जिससे अर्थक्रिया संभव हो सके अर्थात् नहीं हो सकती है।
भावार्थ-ब्रह्माद्वैतवादी का कहना है कि सभी चेतन-अचेतन रूप जगत् सत्रूप है वह सन्मात्र शरीरधारी परम ब्रह्म ही है।
🏠
अन्योन्यगुण भूतैकभेदाभेदप्ररूपणात्॥
नैगमोऽर्थांतरत्वोक्तौ नैगमाभास इष्यते॥9॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[अन्योन्यगुणभूतैकभेदाभेद प्ररूपणात्] परस्पर में गौणभूत और प्रधानभूत भेद तथा अभेद का प्ररूपण करने से [नैगम:] नैगमनय है। [अर्थांतरोक्तौ] और द्रव्य से गुणादि को भिन्न कहने पर [नैगमाभास:] नैगमाभास [इष्यते] माना जाता है॥९॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-निगम-मुख्य गौण कल्पना, उसमें होने वाला नय ‘‘नैगम’’ कहलाता है, ऐसा स्याद्वादियों ने स्वीकार किया है। अन्योन्य-परस्पर में गुणभूत-अप्रधानभूत और एक-प्रधानभूत भेद- अभेद का प्ररूपण करता है अर्थात् गुण-गुणी में, अवयव-अवयवी में, क्रिया-कारकों में और सामान्यसामान्यवान् में कथंचित् भेद को गौण करके अभेद का प्ररूपण करता है अथवा अभेद को गौण करके भेद को प्ररूपित करता है, यह नैगमनय इस प्रकार का है। प्रमाण में भेद और अभेद का अनेकांत ग्रहण होता है।
शंका-गुण-गुणी आदि में अत्यंत भेद ही है ?
[समाधान-गुण और गुणी में अर्थांतर-अत्यंत भेद प्ररूपित करने पर तो वह नैगमाभास माना जावेगा क्योंकि वह अत्यंत भेद प्रमाण से बाधित है। निश्चित ही द्रव्य से अत्यन्त भिन्न गुण आदि प्रतीति में नहीं आते हैं क्योंकि द्रव्य से गुणादि का अशक्य विवेचन होने से उनमें तादात्म्य प्रतीत हो रहा है और उन्हें अत्यन्त भिन्न मानने पर उनमें संबंध का अभाव है।
भावार्थ-वैशेषिक का कहना है कि अग्नि द्रव्य से उष्ण गुण सर्वथा भिन्न है, वस्त्र के सूतरूप अवयवों से वस्त्र अवयवी भी भिन्न है, सत् सामान्य से सत्सामान्य वाली वस्तु भी भिन्न है किन्तु आचार्यों का कहना है कि इस प्रकार से द्रव्यादि से गुणादि का अलग अस्तित्व प्रतीत नहीं हो रहा है इसलिए द्रव्य से गुणादि को भिन्न कहने में वह नैगमनय नहीं रहकर नैगमाभास हो जाता है।
🏠
स्वतोऽर्था: संतु सत्तावत्सत्तया किं सदात्मनां॥
असदात्मसु नैषा स्यात्सर्वथाऽतिप्रसंगत:॥10॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[ सत्तावत् अर्था: स्वत: संतु] सत्ता के समान पदार्थ स्वत: विद्यमान होवें, पुन: [सदात्मनां सत्तया किं] सत्रूप पदार्थों में सत्ता से क्या प्रयोजन है ? [असदात्मसु एषा न स्यात्] असत् रूप पदार्थों में भी वह सत्ता नहीं हो सकती है [सर्वथा अतिप्रसंगत:] सब प्रकार से अतिप्रसंग दोष आता है॥१०॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-यौगमत में स्वत: सत् स्वरूप पदार्थों में सत्ता समवाय होता है या असत् स्वरूप पदार्थों में सत्ता समवाय है ? इस प्रकार के दो विकल्प को मन में रखकर प्रथम पक्ष में दूषण देते हैं-
स्वत: स्वरूप से सत्तावत् पदार्थ होवें अर्थात् जैसे सत्तांतर के बिना भी सत्ता-परसामान्य स्वत: ही है, उसी प्रकार द्रव्यादि भी स्वत: ही होवें और उस प्रकार से स्वत: सत् स्वरूप के सत्ता से क्या प्रयोजन है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं है यह अर्थ हुआ क्योंकि उस सत्ता के बिना भी उन पदार्थों का सत्त्व है।
अब द्वितीय विकल्प को दूषित करते हुए कहते हैं -
सर्व था असत् स्वरूप द्रव्यादिकों में अन्य कोई सत्ता है नहीं अन्यथा अतिप्रसंग आ जावेगा। सर्वथा असत् रूप खर, विषाण आदि में भी सत्ता समवाय हो जाना चाहिए।
एवं द्रव्यत्वादि समवाय का भी इसी प्रक्रिया से विचार करना चाहिए अर्थात् प्रश्न यह उठता है कि द्रव्य में स्वत: द्रव्यत्व है या नहीं ? यदि द्रव्य में स्वत: द्रव्यत्व है तो द्रव्यत्व का समवाय अनर्थक है और यदि नहीं है अर्थात् वह द्रव्य अद्रव्य है तब तो उसमें अद्रव्य में द्रव्यत्व का समवाय मानने पर अतिप्रसंग दोष आ जाता है।
दूसरी बात यह है कि अवयवी अवयवों में एकदेश से रहता है या सर्वात्मदेश से रहता है ? यदि प्रथम पक्ष लो कि वह अवयवी अवयवों में एकदेश से रहता है तब तो उस अवयवी को जितने कि अवयव हैं उतने ही अंशों से होना चाहिए अन्यथा सभी अवयवों को एकत्व का प्रसंग आ जावेगा। यहाँ पर भी रहना मानने पर तो फिर उस अवयवी के उतने ही अंश कल्पित करने पर अनवस्था हो जावेगी।
यदि आप कहें कि अवयवी अवयवों में संपूर्ण रूप से रहता है तब तो अवयवी को बहुत मानना पड़ेगा अन्यथा रहने का विरोध हो जावेगा इसलिए उन गुण-गुणी आदि में कथंचित् तादात्म्य लक्षण समवाय स्वीकार करना चाहिए अन्य प्रकार से नहीं, यह बात व्यवस्थित हो गई।
विशेषार्थ-प्रत्येक वस्तु में कथंचित् तद्भाव लक्षण अभिन्न रूप एक संबंध दिख रहा है जैसे कि जीव का ज्ञान गुण जीव से अभिन्न है, तद्भावरूप है और अग्नि का उष्ण गुण भी अभिन्न है। इसे ही जैनों ने तादात्म्य लक्षण संबंध कहा है कि जिसको कभी भी वस्तु से अलग नहीं कर सकते हैं। यौग ने अकारण ही इस अभिन्न रूप अयुत लक्षण संबंध को समवाय नाम देकर पृथक् से सिद्ध करना चाहा था किन्तु जैनाचार्यों का कहना है कि कथंचित् तादात्म्य लक्षण संबंध को ही आप समवाय नाम दे दीजिए, कोई बाधा नहीं है।
🏠
प्रामाण्यं व्यवहाराद्धि स न स्यात्तत्त्वतस्तयो:।
मिथ्यैकांते विशेषो वा क: स्वपक्षविपक्षयो:॥11॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[व्यवहारात् हि प्रामाण्यं] निश्चित रूप से व्यवहार से प्रमाणता होती है। [तयो:] इन ब्रह्मवाद और भेद में [स: तत्त्वत: न स्यात्] वह व्यवहार वास्तविक नहीं है। [वा] अथवा [मिथ्यैकांते] इस व्यवहार को एकांत से मिथ्या मानने पर [स्वपक्ष विपक्षयो:] स्वपक्ष और विपक्ष में [का विशेष:] क्या अंतर रहेगा ?॥११॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-अपने इष्ट के साधन और अनिष्ट के दूषण में निमित्तक प्रत्यक्ष अथवा अन्य- अनुमान आदि प्रमाण हैं, इस बात को सभी को स्वीकार करना चाहिए, अन्यथा अतिप्रसंग आ जावेगा और वह प्रमाण व्यवहार से उन दोनों में वास्तविक नहीं है अर्थात् विधिपूर्वक अवहरण-विभाग करना-भेद कल्पना करना व्यवहार कहलाता है। इस व्यवहार का आश्रय लेकर संग्रहाभास और नैगमाभास में प्रमाणता परमार्थ से नहीं है।
निश्चित ही निरपेक्ष भावैकांत में प्रमाण आदि भेद व्यवहार नहीं है, इसका पहले निराकरण कर दिया है। भेदैकांत में भी प्रमाण और प्रमाण के फल का व्यवहार नहीं है क्योंकि उसमें संबंध का अभाव है।
प्रश्न-उनमें औपचारिक प्रमाण और फल का व्यवहार है ?
उत्तर-भेद एकांत के पक्ष में यदि आप प्रमाण और फल के व्यवहार को एकांत से अवास्तविक स्वीकार करते हैं तब तो स्वपक्ष और परपक्ष में क्या अंतर होगा ? अर्थात् कुछ भी अंतर नहीं होगा।
ब्रह्मवादी के पक्ष में ब्रह्मवाद स्वपक्ष है और क्षणिकवाद विपक्ष है। यौग के पक्ष में भेदवाद स्वपक्ष है और अद्वैतवाद विपक्ष है।
भेदैकांत में प्रमाण, फल आदि व्यवहार को मिथ्या मानने पर तो स्वपक्ष और परपक्ष में संकर का प्रसंग आ जावेगा इसलिए कथंचित् प्रमाणादि व्यवहार भी वास्तविक स्वीकार करना चाहिए।
विशेषार्थ-ब्रह्मवादी का कहना था कि हमारे यहाँ प्रमाणादि व्यवहार संभव हैं पुन: हमारे ब्रह्मवाद को विषय करने वाला नय संग्रहाभास कैसे होगा ? ऐसे ही यौग ने कहा कि हमारे भेद पक्ष में भी प्रमाणादि व्यवहार होते हैं पुन: हमारे मत के पदार्थों को जानने वाला नय नैगमाभास कैसे कहलाएगा ? आचार्यों ने कहा कि यह प्रमाण आदि का कथन व्यवहार मात्र से ही है अर्थात् कल्पित ही है किन्तु वास्तविक नहीं है, पुन: उस कल्पित मात्र प्रमाण आदि की व्यवस्था से स्वपक्ष और परपक्ष में अंतर सिद्ध करना असंभव हो जावेगा इसलिए प्रमाण आदि व्यवहार को आप कल्पित मत कहिए और वास्तविक प्रमाण आदि व्यवस्थाएँ जहाँ हैं वहाँ एकांत मान्यता को गुंजाइश नहीं है।
🏠
व्यवहारोऽविसंवादी नय: स्याद्दुर्नयोऽन्यथा।
बहिरर्थोऽस्ति विज्ञप्तिमात्रशून्यमितीदृश:॥12॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[बहि: अर्थ: अस्ति] ‘बाह्य पदार्थ है’ ऐसा [अविसंवादी व्यवहार:] अविसंवादी व्यवहार [नय:] स्यात् नय है। [अन्यथा] अन्य प्रकार से [विज्ञप्तिमात्र शून्यं] तत्त्व विज्ञानमात्र या शून्यमात्र है [इति ईदृश:] इस प्रकार ऐसा व्यवहार [दुर्नय:] दुर्नय है॥१२॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-‘बाह्य अर्थ है’ इस प्रकार ग्रहण करने वाले होने से संग्रह आदि नय साध्य-साधन भावस्वरूप प्रमाणीक हैं क्योंकि ये व्यवहार में अविसंवादी हैं। कारण-कार्यभाव आदि व्यवस्था को व्यवहार कहते हैं, इस व्यवहार में ये विसंवादरहित, अव्यभिचारी हैं। व्यवहार के सुनयरूप होने पर उस व्यवहार के आधीन कारण-कार्यभाव आदि की सिद्धि होती है, अन्यथा-व्यवहार में विसंवादी होने से वे दुर्नय हो जाते हैं।
प्रश्न-कैसे दुर्नय होते हैं ?
उत्तर-विज्ञानमात्र ही तत्त्व है, अन्य कुछ नहीं है। सब कुछ शून्य ही है-समस्त ज्ञान और ज्ञेय का अभाव ही शून्य तत्त्व है। इस प्रकार कहने वाले नय दुर्नय हैं। यहाँ कारिका में ‘इति’ शब्द प्रकारवाची है, ‘सन्मात्र-परमब्रह्म ही तत्त्व है’। ‘विभ्रम ही तत्त्व है’ इत्यादि प्रकारों को सूचित करता है।
प्रश्न-सुनय कैसे है ?
उत्तर-संग्रहनय संग्रह रूप से ‘सब कुछ सत्रूप है क्योंकि सभी वस्तु में सत् से अभेद है’ इस प्रकार सभी में एकत्व स्वीकार करता है किन्तु व्यवहारनय उन्हीं में विधिपूर्वक भेद करता है, जैसे जो सत् है वह द्रव्य है अथवा पर्याय है। पुन: अपरसंग्रह ‘जीवादि द्रव्य हैं’ इस प्रकार संग्रह करता है तथा ‘ज्ञान और रागादिभाव पर्याये हैं’ इस प्रकार संग्रह करता है। पुन: अपर व्यवहारनय जो द्रव्य है वह जीव अथवा अजीव है और जो पर्याय हैं वे सहभावी तथा क्रमभावी होती हैं। इस प्रकार परसंग्रह-अपर संग्रह, पर व्यवहार-अपर व्यवहार की परम्परा चलती रहती है, जब तक कि ऋजुसूत्र का विषय नहीं आ जाता है।
विशेषार्थ-संग्रहनय वस्तु को संग्रहरूप से विषय करता है और व्यवहारनय उसमें भेद करता है। संग्रहनय के दो भेद हैं-परसंग्रह और अपरसंग्रह। इन्हीं को सामान्य संग्रह और विशेष संग्रह भी कहते हैं। सामान्य संग्रह सामान्य से चेतन-अचेतन सभी वस्तु को सत् रूप से एकरूप ग्रहण करता है और विशेष संग्रह जीव को द्रव्यरूप से कहता है अथवा अजीव को द्रव्यरूप से कहता है। व्यवहार नय के भी मुख्य दो भेद हैं-पर व्यवहार, अपर व्यवहार। पर संग्रह से ग्रहण किये गये में भेद करने वाला पर व्यवहार है और अपर संग्रह से ग्रहण किये गये में भेद करने वाला अपर व्यवहार है। इन दोनों नयों की परम्परा तब तक चलती रहती है कि जब तक वर्तमान एक समय मात्र की एक पर्याय को विषय करने वाला ऋजुसूत्र नहीं आ जाता है।
इस प्रकार से एक ब्रह्ममात्र अथवा ज्ञानमात्र तत्त्व आदि को ग्रहण करने वाले दुर्नय कहलाते हैं और वस्तु के एक अंश-धर्म को ग्रहण कर अन्य धर्म का विरोध नहीं करने वाले सुनय कहे जाते हैं।
यहाँ पर वृत्तिकार ने द्रव्य और पर्यायों को ही ग्रहण करके पर्यायों में सहभावी-क्रमभावी ऐसे दो भेद दिखलाये हैं। उनमें सहभावी पर्यायें ही गुण कहलाती हैं और क्रमभावी पर्यायें पर्याय शब्द से जानी जाती हैं।
🏠
ऋजुसूत्रस्य पर्याय: प्रधानं चित्रसंविद:॥
चेतनाणुसमूहत्वात्स्याद्भेदानुपलक्षणं॥13॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[ऋजुसूत्रस्य प्रधानं पर्याय:] ऋजुसूत्र का विषय पर्याय है और [चित्रसंविद:] चित्रज्ञान में [चेतनाणुसमूहत्वात्] ज्ञान के अंशों का समूह होने से उसमें [भेदानुपलक्षणं स्यात्] भेद उपलक्षित नहीं होता है॥१३॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-ऋजु अर्थात् प्रगुण-सरल वर्तमान पर्याय के लक्षण को जो सूचित करता है निरूपित करता है वह ऋजुसूत्रनय है अर्थात् ऋजुसूत्रनय का प्रधान-विषय वर्तमान पर्याय मात्र है क्योंकि अतीत पर्यायें विनष्ट हो चुकी हैं और भविष्यत् पर्यायें अभी-अभी उत्पन्न नहीं होने से असिद्ध हैं अत: ये अतीतानागत पर्यायें व्यवहार में उपयोगी नहीं हैं। ‘नय व्यवहार में अविसंवादी होते हैं’ ऐसा वचन है।
प्रश्न-एक चित्रज्ञान अनेकाकार है फिर भी व्यवहार में उपयोगी है।
उत्तर-नील, पीतादि नानारूप चित्र वाला संवेदन-ज्ञान चित्रज्ञान है, वह चेतना के अणुओं का समूह है अर्थात् चेतना-ज्ञान, उसके जो अणु-अंश-अविभागी प्रतिच्छेद हैं, उन ज्ञान के अविभागी प्रतिच्छेदों का समुदाय है इसलिए यह चित्रज्ञान वास्तव में ऋजुसूत्र नय का विषय नहीं है क्योंकि समुदाय प्रतिनियत व्यवहार में उपयोगी नहीं होता है।
प्रश्न-यदि ऐसी बात है तो उस चित्रज्ञान में भेद उपलक्षित क्यों नहीं होता है ?
उत्तर-उस चित्रज्ञान का भेद उपलक्षित नहीं होता है क्योंकि सदृश पर-अपर की उत्पत्ति होने से भ्रम हो जाता है अर्थात् भेदों में अनेक प्रकार उपलक्षित नहीं हैं-दिखते नहीं हैं, उसमें कारण यही है कि सदृश अपर-अपर की उत्पत्ति होने से उन भेदों को ग्रहण करने में बुद्धि वंचित हो जाती है, ऐसा अर्थ है। जिस प्रकार लोहे के गोले आदि मेें पर्याय का भेद विद्यमान होते हुए भी भ्रमबुद्धि से निश्चित नहीं होता है उसी प्रकार से चित्रज्ञान में भी उसके अंश भेद रहते हुए भी दिखते नहीं हैं।
अथवा कथंचित् द्रव्य के साथ अविनाभावी पर्याय ही ऋजुसूत्र नय का विषय है क्योंकि द्रव्य से निरपेक्ष पर्याय अवस्तुरूप है। निरन्वय वस्तु को मानने वाले क्षणिवैâकांत मत में यह नय ऋजुसूत्राभास है अर्थात् द्रव्यनिरपेक्ष पर्याय को विषय करने वाला नय ऋजुसूत्राभास कहलाता है, ऐसा व्याख्यान करना चाहिए।
विशेषार्थ-बौद्धों ने निरन्वय एक क्षणवर्ती पर्याय को स्वलक्षण कहा है और परमार्थसत् कहते हैं तथा उसे निर्विकल्प प्रत्यक्ष का विषय मानते हैं किन्तु वास्तव में विचार करके देखा जाये तो जैनों द्वारा मान्य ऋजुसूत्रनय एक क्षणवर्ती पर्याय को विषय करता है इसी नय के विषय को एकांत से ग्रहण करने से ये बौद्ध एकांतवादी बन गये हैं इसलिए यह ऋजुसूत्रनय इनके मत से नयाभास हो जाता है।
🏠
कालकारकलिंगानां भेदाच्छब्दार्थभेदकृत्॥
अभिरूढस्तु पर्यायैरित्थंभूत: क्रियाश्रय:॥14॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[कालकारकलिंगानां] काल, कारक और लिंगों के [भेदात्] भेद से [शब्दार्थ भेद कृत्] अर्थ में भेद को करने वाला शब्दनय है [पर्यायै: तु अभिरूढ़:] और पर्यायवाची शब्दों से भेद करने वाला समभिरूढ़नय है तथा [क्रियाश्रय: इत्थंभूत:] क्रिया के आश्रय से भेद करने वाला एवंभूतनय है॥१४॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-जो अर्थ-प्रमेय में भेद-नानात्व को करने वाला है वह शब्द नय है। कैसे भेद करता है ? काल, कारक और लिंगों के भेद से भेद करता है। यह कथन उपलक्षणमात्र है अत: संख्या, साधन और उपग्रह से भी यह नय अर्थ में भेद करता है, ऐसा समझना। उसमें काल भेद को दिखाते हैं -
जीव था, है और होगा यह काल भेद है क्योंकि सत्ता भेद के बिना अभूत-था आदि प्रयोग युक्त नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग हो जावेगा। कारक भेद से-देवदत्त देखता है, देवदत्त के द्वारा देखा जाता है, देवदत्त रक्षा करता है, देवदत्त के द्वारा दिया जाता है, देवदत्त से प्राप्त होता है, देवदत्त में पुरुषार्थ है। स्वातन्त्र आदि धर्म के भेद से अभेद में कर्ता आदि कारकों का प्रयोग युक्त नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग हो जावेगा।
लिंग भेद से-दारा पुल्लिंग है, कलत्र नपुंसकलिंग है और भार्या ध्Eाीलिंग है, इनमें पुल्लिंग आदि धर्म से भेद होने पर भी इनका प्रयोग करने पर सर्वत्र उसके नियम के अभाव का प्रसंग हो जावेगा।
संख्या के भेद से-जलं एक वचन है, आप: बहुवचन है, आम्रवनं एकवचन है, चैत्रमैत्रौ द्विवचन है, कुलं एक वचन है। यहाँ एकत्व आदि धर्म के भेद से ही उन वचनों में भेद पाया जाता है अन्यथा अतिप्रसंग ही होगा।
साधन के भेद से-देवदत्त पकाता है, तुम पकाते हो, मैं पकाता हूँ। इस प्रकार निश्चित ही अन्य अर्थ आदि के अभाव में प्रथम पुरुषादि का प्रयोग नहीं देखा जाता है अन्यथा अतिप्रसंग ही है। उपग्रह के भेद से भी अर्थ में भेद देखा जाता है। जैसे तिष्ठति-ठहरता है, वितिष्ठते-जाता है, अवतिष्ठते-बैठता है। इस प्रकार से ‘वि अव’ आदि उपसर्गों का परस्पर में भेद होने से अर्थ में भेद हो जाता है अन्यथा प्रतिष्ठते-प्रस्थान करता है, इत्यादि में भी वही ठहरता है, ऐसे अर्थ का प्रसंग आ जावेगा।
अब कारिका के उत्तरार्ध का व्याख्यान करते हैं -
पर्यायवाची शब्दों से अर्थ में भेद को करने वाला समभिरूढ़ नाम का नय है। जैसे-चमकने से इंद्र,समर्थ होने से शक्र, पुरों में विभाग करने से पुरंदर इस प्रकार अर्थ होते हैं। यहाँ इंद्रन आदि धर्म में भेद का अभाव होने पर इंद्र आदि का प्रयोग करना शक्य नहीं है अन्यथा अतिप्रसंग हो जाता है। अभि-अपने अर्थ की तरफ अभिमुख होकर जो रूढ़ है-प्रसिद्ध है वह अभिरूढ़ नय है ऐसा निरुक्ति अर्थ है।
पुन: इत्थंभूत नय को कहते हैं-यह नय क्रिया के आश्रित है, विवक्षित क्रिया को प्रधान करता हुआ अर्थ में भेद को करने वाला है। जैसे-जिस समय ही इंद्रन क्रिया से युक्त है उसी काल में इंद्र है। वह न अभिषेक करने वाला है, न पुजारी है। यदि अन्य प्रकार से भी उसका सद्भाव मानेंगे तो क्रिया के शब्द के प्रयोग का नियम नहीं रह सकेगा इसलिए अर्थ में भेद का अभाव होने पर भी कालादि का भेद अविरुद्ध है, इस प्रकार का वैयाकरण का जो एकांत है। वह शब्दनयाभास आदि रूप है।
प्रश्न-इस प्रकार से तो लोक समय-व्याकरणशास्त्र में विरोध आ जाता है ?
उत्तर-लोक समय में विरोध होता है तो होवे, यहाँ तो तत्त्व के विचार में लोक समय की इच्छा के अनुसरण का अभाव है। औषधि रोगी की इच्छा के अनुरूप नहीं होती है।
प्रश्न-पुन: उस विरोध का अभाव कैसे होगा ?
उत्तर-स्यात्कार के बल से उस विरोध की समाप्ति हो जाती है ऐसा हम कहते हैं क्योंकि सर्वत्र प्रतिपक्ष की आकांक्षारूप उस स्यात्कार का अर्थ संभव है।
नैगम, संग्रह और व्यवहार ये तीन नय द्रव्य को विषय करने वाले होने से द्रव्यार्थिक हैं और ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत ये चार नय पर्याय को विषय करने वाले होने से पर्यायार्थिक हैं। ये सभी नय परस्पर में एक-दूसरे की अपेक्षा रखते हुए ही व्यवहार के लिए प्रवृत्त होते हैं परस्पर में निरपेक्ष होकर नहीं, इसलिए व्यवहार की उपलब्धि में किस प्रकार से विरोध हो सकता है ? अर्थात् नहीं हो सकता है।
नैगम, संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र ये चार अर्थ नय कहलाते हैं तथा शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये तीन नय शब्द नय कहलाते हैं क्योंकि इनकी प्रवृत्ति शब्द के आश्रय से होती है।
विशेषार्थ-इस कारिका में शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत इन तीन नयों का स्वरूप बताया है। यहाँ तक नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत इन सात नयों का स्वरूप हो चुका है। पूर्व के तीन नय द्रव्य को जानने वाले हैं इसीलिए वे द्रव्यार्थिक कहलाते हैं तथा शेष ऋजुसूत्र आदि चार नय पर्याय को जानने वाले हैं इसलिए पर्यायार्थिक कहलाते हैं।
उसी प्रकार नैगम, संग्रह, व्यवहार और ऋजुसूत्र ये चारों पदार्थों को करने करने से अर्थ नय हैं और शब्द, समभिरूढ़ तथा एवंभूत ये नय शब्द के निमित्त से पदार्थ को विषय करते हैं अत: ये शब्दनय कहे जाते हैं।
🏠
अक्षबुद्धिरतीतार्थं वेत्ति चेन्न कुत: स्मृति:॥
प्रतिभासभिदैकार्थे दूरासन्नाक्षबुद्धिवत्॥15॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[चेत् अक्षधी:] यदि इंद्रियज्ञान [अतीतार्थं] अतीत अर्थ को [वेत्ति] जानता है तब तो [दूरासन्नार्थबुद्धिवत्] दूर और निकटवर्ती पदार्थ के ज्ञान के समान [एकार्थे] एक विषय में [प्रतिभासमिदा] प्रतिभास के भेद से [स्मृति: कुत: न] स्मृति ज्ञान प्रमाण कैसे नहीं होगा ?॥१५॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-सौगत के मत में विषय को ज्ञान का कारण माना है और कार्य के क्षण से पूर्व क्षणवर्ती को कारण कहते हैं। इस प्रकार से यदि ज्ञान अतीत अर्थ अर्थात् स्वकारणभूत शब्द और वाच्य को जानता है तब किस कारण से स्मृति भी अतीत अर्थ को नहीं जानती है ? अपितु जानती ही है।
शंका-इस प्रकार से तो स्मृति को प्रमाणता कैसे है क्योंकि वह तो गृहीत को ग्रहण करने वाली है ?
समाधान-एक-अभिन्न अतीतपने रूप विशेषता से रहित होने से साधारण जो शब्दार्थ लक्षण वाला विषय है वह अर्थ कहलाता है उस एक अर्थ में भी अतीताकार को परामर्श करने वाले प्रतिभास के भेद से वह स्मृति प्रमाण है।
प्रत्यक्ष से ही जो ‘यह’ इस प्रकार से अनुभव में आता है वही कालांतर में पुन: ‘तत्-वह’ इस आकार से स्मृतिज्ञान के द्वारा विषय किया जाता है। जैसे-दूर और निकटवर्ती पदार्थ का ज्ञान अर्थात् जिस प्रकार से दूरवर्ती वृक्ष में प्रत्यक्ष ज्ञान अस्पष्ट होता है और निकटवर्ती वृक्ष में स्पष्ट होता है। जैसे-दूर और निकटवर्ती वृक्षादि में प्रत्यक्ष ज्ञान अस्पष्ट और स्पष्ट प्रतिभास के भेद से प्रमाण है उसी प्रकार से स्मृति भी प्रमाण है यह अर्थ हुआ है।
🏠
अक्षशब्दार्थविज्ञानमविसंवादत: समं।
अस्पष्टं शब्दविज्ञानं प्रमाणमनुमानवत्॥16॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[अक्षशब्दार्थविज्ञानं] इंद्रिय से होने वाला अर्थ का ज्ञान और शब्द से होने वाला अर्थ का ज्ञान [अविसंवादत:] ये दोनों अविसंवाद की अपेक्षा से [समं] समान हैं, [शब्दज्ञानं] शब्दज्ञान [अनुमानवत्] अनुमान के समान [अस्पष्टं] अस्पष्ट [प्रमाणं] प्रमाण है॥१६॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-अक्षार्थ विज्ञान और शब्दार्थ विज्ञान समान प्रमाण है। अक्ष अर्थात् इंद्रिय, शब्द अर्थात् वर्ण पदवाक्यात्मक ध्वनि। अर्थ अर्थात् सामान्य विशेषात्मक वस्तु अर्थात् इंद्रिय से होने वाला वस्तु का ज्ञान और शब्द से होने वाला वस्तु का ज्ञान दोनों ही समान प्रमाण हैं। ये दोनों ही वि-विशिष्ट हैं अर्थात् संशयादि से रहित हैं और ये अविसंवादी हैं अर्थात् अर्थक्रिया में व्यभिचरित नहीं होते हैं। जैसे-इंद्रिय से उत्पन्न हुआ अर्थज्ञान अविसंवादी होने से प्रमाण है वैसे ही शब्द से उत्पन्न होने वाला अर्थज्ञान भी अविसंवादी होने से प्रमाण है, ऐसा अर्थ हुआ।
अनाप्त के वचन से उत्पन्न हुआ ज्ञान अर्थक्रिया में विसंवादी होने से अप्रमाण है, इसी प्रकार आप्त के वचन से उत्पन्न हुए ज्ञान को अप्रमाण कहना शक्य नहीं है क्योंकि इन्द्रियज्ञान में भी कहीं पर विसंवाद देखा जाता है और एक जगह विसंवाद देखकर सभी जगह अप्रमाणीक कहने पर तो सर्वत्र ही अप्रमाणता की आशंका बनी रहेगी।
शंका-इंद्रियज्ञान प्रमाण है क्योंकि वह स्पष्ट है, शब्द ज्ञान-आगमज्ञान प्रमाण नहीं है क्योंकि वह अस्पष्ट है ?
समाधान-अस्पष्ट-अविशद भी शब्दज्ञान को प्रमाण मानना चाहिए क्योंकि वह अविसंवादी है। कारण कि अविसंवाद हेतु ही प्रमाणता को घोषित करता है। स्पष्टता अथवा अस्पष्टता प्रमाणता और अप्रमाणता में निमित्त नहीं है क्योंकि इन प्रमाणता और अप्रमाणता में अविसंवाद और विसंवाद ही निमित्त है। जैसे-अनुमानज्ञान अस्पष्ट होते हुए भी विसंवाद का अभाव होने से प्रमाण माना जाता है। उसी प्रकार शब्द से होने वाला आगम ज्ञान भी भले ही अस्पष्ट हो किन्तु उसे प्रमाण मानना चाहिए क्योंकि वह भी अविसंवादी है। यह अविसंवादी हेतु दोनों जगह समान ही है।
🏠
कालादिलक्षणं न्यक्षेणान्यत्रेक्ष्यं परीक्षितं।
द्रव्यपर्यायसामान्यविशेषात्मार्थनिष्ठितम्॥17॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[कालादिलक्षणं] काल आदि के लक्षण को [न्यक्षेण] विस्तार से [अन्यत्र परीक्षितं] अन्य ग्रंथों में परीक्षित को [ईक्ष्यं] देख लेना चाहिए [द्रव्यपर्याय सामान्य विशेषात्मार्थ निष्ठितं] जो कि द्रव्य-पर्याय और सामान्य विशेषरूप पदार्थ में विद्यमान है॥१७॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-काल, कारक, लिंग, संख्या, साधन और उपग्रह आदि का असाधारण स्वरूप जो कि स्वामी समंतभद्र आदि आचार्यों के द्वारा परीक्षित है उसे न्यक्ष अर्थात् विस्तार से देखना चाहिए। कहाँ देखना चाहिए ? अन्य तत्त्वार्थमहाभाष्य आदि ग्रंथों में देखना चाहिए। वह कैसा है ?
पूर्वापर परिणाम में व्यापक ऊध्र्वतासामान्य को द्रव्य कहते हैं और एक द्रव्य में क्रम से होने वाले जो परिणाम हैं वे पर्यायें कहलाती हैं। वे द्रव्य और पर्यायें तथा सामान्य और विशेष ये हैं स्वरूप जिसके उसे द्रव्यपर्याय सामान्य विशेषात्मक कहते हैं और वही अर्थ-पदार्थ है उसमें जो लक्षण निष्ठित अर्थात् स्थित है वह द्रव्य पर्याय सामान्य विशेषात्मक पदार्थ में रहने वाला असाधारण लक्षण है उसे जानना चाहिए।
इस प्रकार के पदार्थ में ही अर्थक्रिया संभव हैं क्योंकि निरपेक्ष एकांत में उस अर्थक्रिया का विरोध है। पर्यायरहित केवल द्रव्य नहीं है अथवा द्रव्य से व्यतिरिक्त पर्याय भी नहीं है। विशेष से शून्य सामान्य नहीं है अथवा सामान्य से शून्य विशेष नहीं है अर्थात् ये एक-दूसरे से रहित होते हुए प्रमाण की पदवी पर आरोहण नहीं कर सकते हैं क्योंकि वैसी प्रतीति नहीं होती है जिससे कि वे काल, कारक आदि एकांतरूप से हो सकें अर्थात् नहीं हो सकते हैं।
उनमें भूत, भविष्यत् और वर्तमान के भेद से काल के तीन भेद हैं जो क्रिया का निर्वर्तक-करने वाला है वह कारक है उसके कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान और अधिकरण के भेद से छह भेद हैं। शब्द की प्रवृत्ति में निमित्तभूत जो अर्थ का धर्म है वह लिंग कहलाता है, उसके भी स्त्री, पुरुष और नपुंसक के भेद से तीन भेद हैं। संख्या के भी एकत्व, द्वित्व और बहुत्व के भेद से तीन भेद हैं। साधन क्रिया के आश्रित है उसके भी अन्य पुरुष, मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष के अर्थ के भेद से तीन भेद हैं। प्र, पर आदि उपसर्ग को उपग्रह कहते हैं वह अनेक प्रकार का है।
विशेषार्थ-यहाँ पर आचार्यश्री भट्टाकलंक देव का यह कहना है कि जो काल, कारक आदि का लक्षण है, जो कि द्रव्य पर्यायरूप सामान्य विशेषात्मक पदार्थ में रहता है उसको विस्तार से यदि आप जानना चाहते हैं तो श्री स्वामी समंतभद्राचार्य के द्वारा प्रणीत तत्त्वार्थ महाभाष्य नामक ग्रंथ में देखना चाहिए। यहाँ पर इनका लक्षण संक्षिप्त में कहा गया है।
🏠
एकस्यानेकसामग्रीसन्निपातात्प्रतिक्षणं॥
षट्कारकी प्रकल्प्येत तथा कालादिभेदत:॥18॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[एकस्य] एक में [अनेक सामग्री सन्निपातात्] अनेक सामग्री के सन्निधान से [प्रतिक्षणं]प्रतिक्षण [षट्कारकी] षट् कारकों की [प्रकल्प्येत] कल्पना होती है, [तथा कालादिभेदत:] वैसे ही काल आदि के भेद से भी षट्कारक की व्यवस्था होती है॥१८॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-एक जीवादि वस्तु में भी छहों कारकों के समुदायरूप षट्कारक व्यवस्था प्रत्येक समय में घटित हो जाती है। कैसे ? अनेक सामग्री के सन्निपात होने से अर्थात् अनेक अंतरंग और बहिरंग, सामग्री कारण कलापों की सन्निधि होने से षट्कारकी घटित होती है। उसी को कहते हैं-जिस काल में चाक, चीवर आदि की सन्निधि होने से देवदत्त घट को करता है उसी काल में अपने प्रेक्षकजन के सन्निधान से वही देखा जाता है इसलिए वह कर्म है। प्रयोजन की अपेक्षा से देवदत्त के द्वारा कराता है इसलिए करण है। देने योग्य द्रव्य की अपेक्षा से देवदत्त को देता है इसलिए संप्रदान है। अपाय की अपेक्षा से देवदत्त से दूर होता है यह अपादान है। वहाँ पर स्थित द्रव्य की अपेक्षा से देवदत्त में कुण्डल है इस प्रकार अधिकरण है, इस प्रकार अविरोध से वैसी प्रतीति हो रही है क्योंकि प्रतीति में आते हुए विषय में विरोध नाम की कोई चीज नहीं है।
उसी प्रकार से युगपत् के समान ही काल, देश और आकार के भेद से, क्रम से भी षट्कारक रूप व्यवस्था होती है। उसी को स्पष्ट करते हैं-देवदत्त ने किया, करता है अथवा करेगा, इस प्रकार से प्रतीति के बल से सिद्ध है अथवा उस प्रकार एक में षट्कारक को घटित करने के समान काल आदि को भी घटित करना चाहिए।
कैसे ? कथंचित् अर्थ के भेद से कालादि की कल्पना करना चाहिए क्योंकि सर्वथा अभिन्न में संपूर्ण काल, कारक आदि भेद नहीं हो सकते हैं इसलिए स्याद्वाद में ही श्रुतज्ञान के विकल्प से वे सब घटित होते हैं। सभी नैगमादि सुनय हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष और अनुमान से अविरोधी हैं, अन्यत्र वे दुर्नय हैं क्योंकि प्रत्यक्षादि से विरोधी हैं। इस प्रकार भी भट्टाकलंक देव ने ‘‘भेदाभेदात्मके ज्ञेये१......’’ आदि रूप बहुत ही ठीक कहा है।
प्रश्न-नैगमादि सिद्धांत में नय कहे गये हैं यहाँ तो संग्रह आदि कहे गये हैं पुन: आपका कथन सिद्धांत से विरुद्ध क्यों नहीं होगा ?
उत्तर-ऐसी बात नहीं है, अभिप्राय का भेद है। सबसे कम विषय वाला इत्थंभूतनय है वह क्रिया के भेद से ही अर्थ में भेद करता है। उससे अधिक विषय वाला समभिरूढ़नय है क्योंकि वह पर्यायवाची शब्दों के भेद से अर्थ में भेद करता है। उससे अधिकतर विषय वाला शब्दनय है क्योंकि वह काल आदि के भेद से भेद करता है। उससे पुन: ऋजुसूत्रनय अधिकतम विषय वाला है क्योंकि वह शब्द के गोचर-अगोचर विवक्षित पर्याय को विषय करता है। उससे भी अधिक विषय वाला व्यवहारनय है क्योंकि वह पर्याय से विशिष्ट द्रव्य को ग्रहण करता है। उससे प्रचुर विषय वाला संग्रहनय है क्योंकि वह सकलद्रव्य और पर्याय में व्यापी है, सभी को ग्रहण करता है। पुन: उससे भी अधिक विषय वाला नैगमनय है क्योंकि वह सत्त्व और असत्त्व को गौण तथा मुख्यरूप से ग्रहण करता है इसलिए विषय की अपेक्षा से नैगम आदि नयों का पूर्व निपात सिद्धांत ग्रंथों में युक्त है किन्तु यहाँ पुन: न्यायशास्त्र में समस्त नास्तिकजनों के विसंवाद को दूर करने के लिए सकल पदार्थों के अस्तित्व को सूचित करने वाले संग्रहनय को पूर्व में रखने में विरोध का अभाव है।
विशेषार्थ-यहाँ पर आचार्य ने कारण सामग्री के मिलने से एक में ही षट्कारक व्यवस्था घटाई है। जैसे ‘वीर भगवान२’ सभी सुर-असुरों से पूजित हैं, वीर का बुद्धिमान लोग आश्रय लेते हैं, वीर ने अपने कर्मों के समूह को नष्ट कर दिया है,वीर के लिए भक्ति से मेरा नमस्कार होवे, वीर से यह धर्मतीर्थ प्रवृत्त हुआ है, वीर का तपश्चरण घोर-कठोर है, वीर में श्री, द्युति, कीर्ति, कांति और धृति रहती हैं, हे वीर! आपमें भद्र-कल्याण है। यहाँ पर संबोधन समेत आठ कारक हो गये हैं। षट्कारक में संबंध कारक और संशोधन कारक अपेक्षित नहीं रहते हैं।
यह षट्कारक व्यवस्था एक वस्तु में युगपत् भी घट जाती है और काल, देश, आकार आदि के क्रम से भी घटित होती है।
पुन: आचार्य ने कहा है कि नैगम आदि नय स्याद्वाद में, सुनय में और एकांत पक्ष में दुर्नय हैं। आगे प्रश्न यह हुआ है कि सिद्धांत ग्रंथों में इन नयों में नैगमनय सबसे प्रथम है। यहाँ आपने संग्रह को सबसे प्रथम लिया है इसलिए आपका कथन सिद्धांत से विरोधी है, इस पर आचार्यश्री ने उत्तर देते हुए कहा है कि नैगमनय का विषय सबसे अधिक है, उससे कुछ कम विषय संग्रहनय का है। आगे-आगे ये नय अल्प-अल्प विषय वाले होते हैं, इस अपेक्षा से सिद्धांत ग्रंथ में इनका क्रम नैगम से है किन्तु यहाँ न्यायशास्त्र में अन्य एकांतवादी जनों को समझाने की प्रधानता से कथन होता है। यहाँ पर नास्तिकवादी जनों की मान्यता का खंडन करने के लिए संपूर्ण अस्तित्व का ग्राहक संग्रहनय पहले कहा गया है इसलिए कोई दोष नहीं आता है। ऐसे ही अनेकों उदाहरण हैं-सिद्धांत ग्रंथ में मति, श्रुत दोनों ज्ञानों को परोक्ष कहा है और न्याय में मतिज्ञान को सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहा है। सिद्धांत में दर्शन२ को स्वरूप को ग्रहण करने वाला माना है और न्याय में उसे सत्तामात्र को अवलोकन करने वाला माना है। सिद्धांत में इंद्रियों का क्रम स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र रूप से कहा है और मूलाचार में चक्षु, श्रोत, घ्राण आदि के अक्रम से कहा है। सिद्धांत में जीव, अजीव, आदााव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये तत्त्वों का क्रम है किन्तु समयसार में जीव, अजीव, आदााव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष ऐसा क्रम कर दिया है।
कहने का मतलब यह है कि सिद्धांत ग्रंथों का कथन हीरे के कांटे के समान है और अन्य ग्रंथों का कथन अपेक्षाकृत अक्रम से भी हो जाता है किन्तु इस बात से पूर्वापर विरोध दोष नहीं समझना चाहिए।
🏠
व्याप्तिं साध्येन हेतो: स्फुटयति न विना चिंतयैकत्रदृष्टि:।
साकल्येनैष तर्कोऽनधिगतविषयस्तत्कृतार्थैकदेशे॥
प्रामाण्ये चानुमाया: स्मरणमधिगतार्थादि1संवादि सर्वं।
संज्ञानं च प्रमाणं समधिगतिरत: सप्तधाख्यैर्नयौघै:॥19॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[दृष्टि:] प्रत्यक्षज्ञान [एकत्र] एक जगह [चिंतया बिना] तर्क के बिना [साध्येन हेतो:व्याप्तिं] साध्य के साथ हेतु की व्याप्ति को [न स्फुटयति] स्फुट नहीं कर सकता है, [एष: तर्को] यह तर्क [साकल्येन] सकलरूप से [अनधिगत विषय:] नहीं जाने हुए को विषय करने वाला है। [तत्कृतार्थैकदेशे] उसके द्वारा निश्चित विषय के एकदेश में [अनुमाया: च प्रामाण्येन] अनुमान की प्रमाणता होने पर [स्मरणमधिगतार्था दिसंवादि] स्मृति भी अधिगत अर्थादि के विषय में संवादी हैं [सर्वं संज्ञानं च प्रमाणं] और सभी प्रत्यभिज्ञान प्रमाण हैं [अत: सप्तधाख्यै तथौघै:] इसलिए सात प्रकार के नय समूहों से [समाधिगति:] सम्यक् प्रकार से ज्ञान होता है॥१९॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-एकत्र-एक महानस-रसोई आदि स्थान में दृष्टि-साध्य और साधन का जो दर्शन-प्रत्यक्ष है, वह साध्य-अग्नि आदि के साथ साधन-धूमादि हेतु की व्याप्ति को प्रकाशित नहीं करता है। किस रूप से प्रकाशित नहीं करता है ? साकल्य से अर्थात् सकल-देश, काल से अंतरित साध्य और साधन के विशेषों का भाव साकल्य कहलाता है। चिंता-तर्क प्रमाण के बिना वह प्रत्यक्ष संपूर्ण रूप से साध्य-साधन के अविनाभाव को नहीं बता सकता है।
साध्य और साधन के संबंध का दर्शन-प्रत्यक्ष दृष्टांत धर्मी में सकलरूप से व्याप्ति को जानने में समर्थ नहीं है अन्यथा अनुमान व्यर्थ हो जावेगा और उस देखने वाले अभिज्ञत्व की आपत्ति आ जावेगी।
प्रश्न-तब कौन सा प्रमाण उस व्याप्ति को स्पष्ट करता है ?
उत्तर-यह तर्क प्रमाण है जो कि ज्ञान सकलरूप से साध्य-साधन की व्याप्ति को स्फुट करता है और वही ज्ञान सकल अनुमानिक जनों में प्रसिद्ध ‘तर्क’ इस नाम से कहा जाता है।
प्रश्न-यह तर्क तो गृहीत को ग्रहण करने वाला होने से अप्रमाण है ?
उत्तर-नहीं, यह नहीं जानते हुए को विषय करने वाला है। अनधिगत अर्थात् प्रमाणांतर से अनिश्चित जो अविनाभाव है वह इसका विषय है।
प्रश्न-कैसा संज्ञान-सम्यग्ज्ञान अर्थ के विषय प्रमाण होता है ?
उत्तर-स्मृति ज्ञान प्रमाण होता है क्योंकि वह अधिगत अर्थ के विषय में अविसंवादी है अर्थात् अधिगत-प्रत्यक्ष से अनुभूत जो अर्थ-विषय है उसमें यह विसंवादरहित है और यह अनुमान की प्रमाणता होने पर सम्यग्ज्ञान है। कहाँ पर है ? तत्कृत अर्थ के एकदेश में है अर्थात् तत्-उस तर्क से कृत-निश्चित जो अर्थ-अविनाभाव है उसका एकदेश-जो साध्य है उसमें वह अनुमान प्रमाण है क्योंकि वह स्मृति और तर्क प्रमाण के साथ अविनाभावी है, यह अर्थ हुआ।
अथवा संज्ञान-प्रत्यभिज्ञान भी प्रमाण है क्योंकि वह भी अविसंवादी है। केवल ये परोक्ष ही विकल्पात्मक हैं ऐसी बात नहीं है किन्तु सभी प्रत्यक्ष भी विकल्पात्मक प्रमाण हैं क्योंकि वे ही व्यवहार में उपयोगी होते हैं। निर्विकल्पक दर्शन तो किसी विषय में भी उपयोगी नहीं है। इस कारण से तर्क आदि के समान विकल्पात्मक ही नय समुदायों से जीवादि तत्त्वों का सम्यक् प्रकार से निर्णय होता है। वे नय कितने हैं ? नैगम आदि से सात प्रकार के हैं क्योंकि ‘प्रमाणनयैरधिगम:१’ ऐसा सूत्रकार का वचन है अर्थात् प्रमाण और नयों से तत्त्वों का ज्ञान होता है ऐसा कहा है।
प्रश्न-प्रमाण के द्वारा परिगृहीत अर्थ को विषय करने वाले होने से ये भी नय निर्विषय वाले हैं ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि द्रव्य पर्यात्मक वस्तु प्रमाण के द्वारा परिगृहीत है-जानी जाती है और नय उसके एक देशरूप द्रव्य अथवा प्रतिपक्ष की अविनाभावी पर्याय में प्रवृत्त होते हैं। ‘सकलादेश प्रमाणाधीन है और विकलादेश नयाधीन है’ ऐसा प्रवचन-आगम में कहा हुआ है।
🏠
सर्वज्ञाय निरस्तबाधकधिये स्याद्वादिने ते नम-।
स्तात्प्रत्यक्षमलक्षयन् स्वमतमभ्यस्याप्यनेकांतभाक्॥
तत्त्वं शक्यपरीक्षणं सकलविन्नैकांतवादी तत:।
प्रेक्षावानकलंक याति शरणं त्वामेव वीरं जिनम्॥20॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[स्याद्वादिने] स्याद्वादी [निरस्तबाधक धिये] ज्ञानावरणादि बाधक कारणों से रहित ऐसे ज्ञान वाले [ते सर्वज्ञाय नमस्तात्] आप सर्वज्ञ को नमस्कार होवे। [एकांतवादी] एकांतवादी बुद्ध आदि [स्वमतं अभ्यस्त अपि] अपने मत का अभ्यास करके भी [शक्य परीक्षणं] जिसका परीक्षण करना शक्य है ऐसे [अनेकांतभाव] अनेकांतात्मक [प्रत्यक्षं] प्रत्यक्षरूप [तत्त्वं] तत्त्व को [अलक्षयन्] नहीं जानते हुए [सकलवित् न] सर्वज्ञ नहीं हैं। [तत:] इसलिए [अकलंक] हे कर्मकलंकरहित अकलंक देव! [प्रेक्षावान्] बुद्धिमानजन [त्वां जिनं वीरं एवं] आप जिनेन्द्र भगवान वीरप्रभु की ही [शरणं याति] शरण में आते हैं॥२०॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-एकांतवादी अर्थात् एकांतरूप केवल द्रव्य ही तत्त्व है अथवा पर्याय ही तत्व है, ऐसा कहने का जिन का स्वभाव है वे एकांतवादी बुद्ध, कपिल आदि जन त्रिकालगोचर अशेष द्रव्य पर्यायों को जानने वाले सर्वज्ञ नहीं हो सकते हैं क्योंकि वे अनेकांत स्वरूप को आत्मसात् करने वाले ऐसे जीवादि पदार्थों के स्वरूप को नहीं जानते हैं। उन जीवादि पदार्थों के स्वरूप का परीक्षण करना संशय आदि का व्यवच्छेद करके उनका विवेचन करना यद्यपि शक्य है, लौकिकजनों के गोचर है, प्रत्यक्ष-स्पष्ट है फिर भी वे लोग नहीं जानते हैं। निरन्वय विनाश आदि भावना से सहित चित्र वाले वे लोग सर्वथैकांतरूप अपने मत का अभ्यास करके अनेकांत तत्त्व को जानने में समर्थ नहीं होते हैं पुन: उनको सर्वज्ञता कैसे हो सकती है ?
इस कारण से ज्ञानावरण आदि कलंक से रहित भो अकलंकदेव! आपको मैं नमस्कार करता हूँ। कैसे हैं वे अकलंक भगवान् ? सर्वज्ञ हैं-लोग-अलोक के सभी वस्तु समुदाय को जानने वाले हैं ‘सर्वं जानातीति सर्वज्ञ:’ इस व्युत्पत्ति के अनुसार सब कुछ जानने वाले हैं। पुन: वे कैसे हैं ?
बाधकरूप जो दोष और आवरण हैं, उनको अनेकांत तत्त्व की भावना के बल से नष्ट कर देने से बाधा रहित ज्ञान को जो धारण करने वाले हैं। पुन: कैसे हैं ? स्यात्-कथंचित् सत्-असत् आदि अनेकांतात्मक तत्त्व को कहने वाले स्याद्वादी हैं। ऐसे आपको मेरा नमस्कार होवे।
केवल मैं ही आपको नमस्कार नहीं करता हूँ किन्तु सभी प्रेक्षावान्-परीक्षकजन आपकी शरण में आते हैं। नित्य प्रवृत्त होने वाले वर्तमान की अपेक्षा से इस प्रकार का वचन है।
क्या नाम वाले भगवान् की शरण में परीक्षक लोग आते हैं ? जिनका ‘वीर’ नाम है ऐसे जो अंतिम तीर्थंकर वर्धमान भगवान हैं पुन: वे कैसे हैं ? जिन हैं-नानाविध विषम भव वन में भ्रमण के कारणभूत दुष्कृत को जो जीतते हैं, वे जिन कहलाते हैं। सभी लोग उनकी शरण को प्राप्त करते हैं क्योंकि वे तीर्थंकर शास्त्रकारों का उपकार करने वाले हैं।
विशेषार्थ-यहाँ पर श्री भट्टाकलंक देव ने तीन विशेषणों से विशिष्ट देव को नमस्कार किया है। सर्वज्ञ, निरस्तबाधक धी और स्याद्वादी। ये तीनों विशेषण भगवान उमास्वामी के द्वारा तत्त्वार्थसूत्र महाशास्त्र की आदि में किये गये मंगलाचरण के समान ही हैं। स्याद्वादी विशेषण मोक्षमार्ग के नेतृत्व को सूचित करता है, निरस्तबाधक धी विशेषण कर्म पर्वत के नेतृत्व को स्पष्ट कर रहा है और सर्वज्ञ विशेषण तत्त्वों के ज्ञातृत्व को बतला रहा है। ऐसे ही श्री समंतभद्रस्वामी ने आप्त के सर्वज्ञ, वीतराग और हितोपदेशी ये तीन विशेष गुण बतलाये हैं सो यहाँ भी सर्वज्ञ से सर्वज्ञ, निरस्त बाधक बुद्धि से वीतरागता और स्याद्वादी से हितोपदेशिता सिद्ध हो जाता है। ऐसे तीन विशेषणों से विशिष्ट को नमस्कार करके श्री अकलंक देव ने अपने नाम को धारण करने वाले ऐसे कर्म कलंक रहित अकलंक भगवान को संबोधन करके कहा है कि हे अकलंक भगवन्! आप जिन वीर की शरण में सभी परीक्षक लोग आ जाते हैं।
(अब वृत्तिकार श्री अभयचंद्रसूरि श्री भट्टाकलंक देव और प्रभाचंद्राचार्य का स्मरण करते हुए इस परिच्छेद को पूर्ण करते हुए श्लोक कहते हैं)-
श्लोकार्थ-श्रीमान् भट्टाकलंकरूप चंद्रमा की प्रभा-किरणों से यह नय और दुर्नय के निरूपण रूप धान्य समूह पुष्टि को प्राप्त हुआ है। उसमें नय से निष्ठुर-कुशल यह श्री अभयचंद्रसूरि के द्वारा रचित तात्पर्यवृत्ति अखिल जनों के हित के लिए अर्थ के पाक की पटुता को प्राप्त होती है।।१।।
भावार्थ-धान्य आदि के खेत चंद्रमा की किरणों से पुष्टि को प्राप्त होते हैं, बढ़ते हैं, पुन: पक जाते हैं तब लोगों को फल देने लगते हैं। ऐसे ही यहाँ पर वृत्तिकार ने कहा है कि सुनय और दुर्नय का निरूपण करने वाला जो यह प्रकरण है वह धान्य का खेत है उसे श्री अकलंकदेव रूपी चंद्रमा के द्वारा प्रगट हुई किरणों ने अथवा प्रभाचंद्र सूरि की वाणी ने पुष्ट किया है, बढ़ाया है, पुन: मैंने जो तात्पर्यवृत्ति टीका की है उसने इस धान्य को पकाकर फल देने वाली कर दिया है अर्थात् सभी भव्य जीव इस टीका के आधार से सुनय-दुर्नय के मर्म को समझकर उसके फलस्वरूप सम्यग्ज्ञान को प्राप्त कर लेंगे।
इस प्रकार श्री अभयचंद्रसूरि कृत लघीयस्त्रय की स्याद्वादभूषण संज्ञक तात्पर्यवृत्ति टीका में पाँचवां परिच्छेद पूर्ण हुआ।
नय प्रवेश नाम से द्वितीय प्रकरण वाला द्वितीय महाधिकार समाप्त हुआ।
🏠
प्रणिपत्य महावीरं स्याद्वादेक्षणसप्तकं।
प्रमाणनयनिक्षेपानभिधास्ये यथागमं॥1॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[ स्याद्वादेक्षणसप्तकं] स्यात् अस्ति आदि सप्तभंग रूप स्याद्वाद के अवलोकन करने वाले [महावीरं] अंतिम तीर्थंकर महावीर भगवान को [प्रणिपत्य] नमस्कार करके [प्रमाण नयनिक्षेपात्] मैं प्रमाण नय और निक्षेपों को [यथागमं] आगम के अनुसार [अभिधास्ये] कहूँगा॥१॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-आगम में अर्थात् प्रवचन का उल्लंघन न करके अनादि परम्परा से प्रसिद्ध आर्ष- ऋषि प्रणीत ग्रंथों में जिस प्रकार से उन प्रमाण आदि का प्रतिपादन किया गया है, उसी प्रकार से उस आगम के अनुसार ही मैं प्रमाण, नय और निक्षेपों को प्रतिपादन करूँगा किन्तु स्वरुचि से रचित को नहीं कहूँगा, यह अर्थ हुआ। क्या करके कहूँगा ? अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर को प्रणाम करके कहूँगा। कैसे हैं वे भगवान्? स्याद्वाद-‘स्यात् अस्ति’ इत्यादि सप्तभंगमय वाद-कथन स्याद्वाद कहलाता है, ईक्षण के- अवलोकन के सात प्रकार ‘ईक्षण सप्तक’ कहलाते हैं, इन स्याद्वादरूपी सप्त भंगों का ईक्षण-अवलोकन जिनसे शिष्यों को इन स्याद्वादरूप सप्त भंगों का अवलोकन होता है वे महावीर भगवान ऐसे हैं अर्थात् शिष्यों को स्याद्वादरूप सप्तभंग का ज्ञान कराने वाले हैं क्योंकि निश्चितरूप से जो निरुपकार-उपकाररहित हैं वे प्रेक्षावान्-बुद्धिमानों को प्रमाण के योग्य नहीं हैं, अन्यथा अतिप्रसंग हो जावेगा।
भावार्थ-यहाँ पर स्याद्वाद के नायक श्री भगवान महावीर स्वामी को नमस्कार करके आचार्यश्री ने आगम के अनुसार प्रमाण, नय और निक्षेपों को कहने की प्रतिज्ञा की है क्योंकि इन प्रमाणादि के बिना वस्तु तत्त्व का यथार्थ निर्णय नहीं होता है।
🏠
ज्ञानं प्रमाणमात्मादेरुपायो न्यास इष्यते॥
नयो ज्ञातुरभिप्रायो युक्तितोऽर्थपरिग्रह:॥2॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[आत्मादे: ज्ञानं प्रमाणं] आत्मा आदि का ज्ञान प्रमाण है [उपाय: न्यास: इष्यते] उनके जानने का उपाय न्यास-निक्षेप माना जाता है और [ज्ञातु: अभिप्राय: नय:] ज्ञाता का अभिप्राय नय है [युक्तित: अर्थपरिग्रह:] इस प्रकार युक्ति से अर्थ का ज्ञान होता है॥२॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-‘जानाति ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञप्तिमात्रं वा ज्ञानं’ जो जानता है या जिसके द्वारा जाना जाता है अथवा जानना मात्र ही ‘ज्ञान’ कहलाता है। यहाँ द्रव्य और पर्याय में भेद-अभेद की विवक्षा के होने पर कर्ता आदि होते हैं अर्थात् द्रव्य और पर्याय में अभेद विवक्षा होने से ‘जो जानता है, वह ज्ञान है’ यह कर्तृत्व साधन होता है। द्रव्य पर्याय में भेद विवक्षा होने पर ‘जिसके द्वारा जाना जाय वह ज्ञान है’ ऐसा करण साधन होता है तथा भाव साधन में जानना मात्र ही ज्ञान है ऐसा कहा जाता है।
आत्मादि अर्थात् आत्मा-स्वरूप है आदि में जिसके ऐसे बाह्य पदार्थ आत्मादि हैं इस कथन से स्व और अर्थ को ग्रहण किया है अर्थात् उपर्युक्त निरुक्ति से सिद्ध स्व और पर को ग्रहण करने वाला जो ज्ञान है। अथवा आत्मा-चैतन्य द्रव्य है, आदि शब्द से आवरणों का क्षयोपशम या क्षय अंतरंग है पुन: इंद्रियां और मन बहिरंग कहलाते हैं इन अंतरंग और बहिरंग हेतुओं से उत्पन्न होने वाला जो ज्ञान है वह ज्ञान प्रमाण माना गया है क्योंकि सकल विसंवादों का पहले ही निराकरण कर दिया है।
उसी प्रकार से ज्ञाता-श्रुतज्ञानी के अभिप्राय को-विवक्षा को नय कहते हैं और उपाय- अधिगम-ज्ञान के हेतुभूत, नाम आदि रूप न्यास-निक्षेप कहलाता है।
शंका-अर्थ स्वत: सिद्ध है पुन: इन प्रमाण आदिकों से क्या प्रयोजन है ?
समाधान-नहीं! युक्ति से-प्रमाण, नय और निक्षेपों से ही जीवादि पदार्थों का परिग्रह-जानना होता है, स्वत: नहीं होता है।
विशेषार्थ-यहाँ आचार्य ने यह स्पष्ट किया है कि प्रमाण, नय और निक्षेप के बिना जीवादि पदार्थों का समीचीन ज्ञान नहीं हो सकता है अत: पहले इन प्रमाण, नय, निक्षेपों के लक्षण को समझ लेना चाहिए, अनंतर इनके द्वारा जीवादि पदार्थों का निर्णय करना चाहिए।
🏠
अयमर्थ इति ज्ञानं विद्यान्नोत्पत्तिमर्थत:।
अन्यथा न विवाद: स्यात्कुलालादिघटादिवत्॥3॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[ अयं अर्थ: इति ज्ञानं] यह अर्थ है इस प्रकार का ज्ञान [अर्थत: उत्पत्तिं] अर्थ से अपनी उत्पत्ति को [न विद्यात्] नहीं जानता है [अन्यथा] अन्यथा [कुलालादिघटादिवत्] कुंभकार आदि से घटादि उत्पत्ति के ज्ञान के समान [विवाद: न स्यात्] विवाद नहीं होना चाहिए॥३॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-‘यह अर्थ है’ इस प्रकार ज्ञान नहीं जानता है अर्थात् मैं इस घटादि अर्थ से उत्पन्न हुआ हूँ इस प्रकार ज्ञान अपने जन्म को नहीं जानता है। ये घटादि पदार्थ प्रमेय हैं यह बात प्रतीति सिद्ध ही है अन्यथा यदि ज्ञान अर्थ से अपनी उत्पत्ति को जानता है तब वादी और प्रतिवादी को विवाद नहीं होना चाहिए अर्थात् ज्ञान अर्थ से उत्पन्न नहीं हुआ है ऐसा विसंवाद नहीं होना चाहिए। जैसे-वुंâभकार आदि से घट आदि की उत्पत्ति होना प्रतीति से सिद्ध है तो उसमें किसी को विवाद नहीं है, उसी प्रकार से अर्थ से ज्ञान के उत्पन्न होने में विवाद नहीं होना चाहिए किन्तु विवाद देखा जाता है। स्याद्वादी लोग अर्थ से ज्ञान की उत्पत्ति नहीं मानते हैं।
विशेषार्थ-अर्थ१ और आलोक ज्ञान की उत्पत्ति में कारण नहीं हैं वे तो ज्ञान के विषय हैं अंधकार के समान। ज्ञान की उत्पत्ति तो आत्मा के ज्ञानावरण आदि के क्षयोपशम या क्षय से ही होती है, ऐसा समझना।
🏠
अन्वयव्यतिरेकाभ्यामर्थश्चेत्कारणं विद:।
संशयादिविदुत्पाद: कौतस्कुत इतीक्ष्यतां॥4॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[चेत्] यदि [अन्वयव्यतिरेकाभ्यां] अन्वय-व्यतिरेक के द्वारा [अर्थ: विद: कारणं] अर्थ ज्ञान का कारण है, तब तो [संशयादिवित् उत्पाद:] संशय आदि ज्ञान का उत्पाद [कौतुस्कुत:] किससे होगा ? [इति ईश्यतां] इस पर विचार कीजिए॥४॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-यदि अन्वय और व्यतिरेक से अर्थ-विषयभूत पदार्थ ज्ञान के कारण हैं। कारण के होने पर कार्य का होना अन्वय है और नहीं होने पर नहीं होना व्यतिरेक है। उसी को स्पष्ट करते हैं-ज्ञान अर्थनिमित्तक है क्योंकि अर्थ का ज्ञान के साथ अन्वय व्यतिरेक पाया जाता है। यदि ऐसी बात है तो संशय और विपर्यय ज्ञानों की उत्पत्ति कहाँ से हो गई है। इस पर आपको अपने मन में विचार करना चाहिए क्योंकि अर्थ के अभाव में भी संशय आदि ज्ञान उत्पन्न होते हैं। स्थाणु पुरुष रूप अथवा केश मच्छर स्वभाव वाले कोई भी पदार्थ नहीं हैं, जो कि उस संशय आदि के ज्ञान में व्यापार करते हों इसलिए यह ज्ञान का अन्वय व्यतिरेक के अनुसरण रूप हेतु भागासिद्ध है, ऐसा समझना।
विशेषार्थ-जहाँ-जहाँ पदार्थ हों, वहीं-वहीं ज्ञान उत्पन्न होवे और जहाँ-जहाँ पदार्थ न हों वहाँ-वहाँ ज्ञान उत्पन्न न होवे। यह हुआ अर्थ के साथ ज्ञान का अन्वय-व्यतिरेक और यदि ऐसा अन्वय व्यतिरेक है तब स्थाणु में दूर से देखने पर यह पुरुष है या स्थाणु ? ऐसा संशय ज्ञान कैसे होगा ? क्योंकि वहाँ स्थाणु में स्थाणु और पुरुषरूप उभयात्मक वस्तु तो हैं नहीं। ऐसे ही केशों में अकस्मात् दूर से मच्छर का ज्ञान हो गया, यह विपरीत ज्ञान भी यदि केश मच्छर रूप नहीं है तो कैसे हुआ ?
जो आप बौद्धों ने कहा था कि ज्ञान पदार्थ से उत्पन्न होता है इस बात को अनुमान प्रमाण बताता है। उस अनुमान में आपका हेतु एकदेश असिद्ध होने से असिद्ध हेत्वाभास हो गया है इसलिए ज्ञान को पदार्थ से उत्पन्न होना मानना नितांत गलत है, बिना पदार्थ के भी ज्ञान स्वयं उत्पन्न होता रहता है चूँकि वह आत्मा का स्वभाव है।
🏠
सन्निधेरिंद्रियार्थानामन्वयव्यतिरेकयो:॥
कार्यकारणयोश्चापि बुद्धिरध्यवसायिनी॥5॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[इंद्रियार्थानां] इंद्रिय और पदार्थों के [सन्निधे:] सन्निकर्ष का [अन्वय व्यतिरेकयो:] अन्वय-व्यतिरेक का [च] और [कार्यकारणयो: अपि] कार्य कारण का भी [अध्यवसायिनी] निश्चय कराने वाला [बुद्धि:] ज्ञान है॥५॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-ज्ञान ही केवल अर्थ का ही नहीं, सन्निकर्ष का भी निश्चय कराने वाला है। चक्षु आदि इंद्रियाँ हैं और रूपादि अर्थ हैं इनका सन्निधि-सन्निकर्ष और अन्वय-व्यतिरेक अर्थात् भाव और अभाव का सन्निकर्ष तथा कारण कार्य का भी सन्निकर्ष होता है। कार्य - सन्निकर्ष कारण-इन्द्रिय आदि हैं । इनका भी ज्ञान ही निश्चय कराने वाला है इसलिए वह ज्ञान ही प्रमाण है सन्निकर्षादि प्रमाण नहीं हैं क्योंकि वे प्रमेयरूप हैं।
🏠
तमो निरोधि वीक्षंते तमसा नावृतं परं॥
कुड्यादिकं न कुड्यादितिरोहितमिवेक्षका:॥6॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[ईक्षका:] देखने वाले [निरोधि तम:] घटादि के निरोधक ऐसे अंधकार को [वीक्षंते] देखते हैं किन्तु [तमसा आवृतं परं न] अंधकार से आच्छादित पर घटादि को नहीं [इव] जैसे [कुड्यादिकं] दीवाल आदि को देखते हैं, वैसे [कुड्यादितिरोहितं न] दीवाल आदि से तिरोहित को नहीं देखते हैं॥६॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-ईक्षक-चक्षुष्मानजन, निरोधि-प्रमेयांतर को ढकने वाले तम-अंधकाररूप पुद्गलपर्याय को विशेष-नीलादिरूप से देखते हैं किन्तु वृत्त-आच्छादित हुए पर घटादिक तमसा- अंधकार से नहीं देखते हैं। तब आलोक ज्ञान का कारण कैसे हो सकता है क्योंकि प्रकाश के अभाव में भी ज्ञान की उत्पत्ति हो रही है। इसी अर्थ को सिद्ध करने के लिए दृष्टांत देते हैं-जैसे दर्शक लोग दीवाल आदि को देखते हैं किन्तु दीवाल आदि से तिरोहित घटादिकों को नहीं देख सकते हैं, उसी प्रकार से अंधकार को तो देख लेते हैं किन्तु उनसे ढके हुए घटादि वस्तुओं को नहीं देख पाते हैं।
शंका-अंधकार के समान प्रकाश से ढके हुए भी घटादि को नहीं देख सकते हैं ?
समाधान-यदि ऐसी बात है तो होवे, यदि प्रकाश को अविशदपना है। जिस द्रव्य में विशदता है अर्थात् जो द्रव्य स्पष्ट है वह ढका हुआ भी नहीं ढके हुए के समान ही है, स्फटिक और अभ्रक आदि से ढके हुए के समान इसलिए आलोक के समान उससे ढके हुए को भी देख लेते हैं क्योंकि वह वैशद्य है-स्पष्ट है। पुन: अंधकार को तो देख लेते हैं किन्तु उससे ढके हुए को नहीं देख पाते हैं क्योंकि वह अस्पष्ट रूप है। इसलिए आलोक ज्ञान का कारण नहीं है क्योंकि वह प्रमेयरूप है, पदार्थों के समान।
इस प्रकार से ज्ञान का अंतरंग कारण ज्ञानावरण और वीर्यांतराय कर्मों का क्षयोपशम है पुन: बहिरंग कारण इंद्रियां और मनरूप हैं यह बात सिद्ध हो गई है।
विशेषार्थ-बौद्ध अर्थ के समान प्रकाश को भी ज्ञान का कारण मानते हैं किन्तु जैनाचार्य कहते हैं कि प्रकाश भी ज्ञान का कारण नहीं है वह भी ज्ञान का विषय है। जैसे कि अंधकार ज्ञान का कारण नहीं है बल्कि ज्ञान का विषय अवश्य है, प्रत्येक प्राणी अंधकार को काले-काले रूप में देख रहा है किन्तु उससे ढके हुए पदार्थों को तो नहीं देख पाता है उसी प्रकार प्रकाश भी ज्ञान का विषय ही है। ज्ञान का कारण नहीं हो सकता है। ज्ञान तो आत्मा का गुण है जो कि संसार अवस्था में कर्मों से ढका हुआ है इसलिए ज्ञानावरण और वीर्यांतराय के क्षयोपशमरूप अंतरंग कारण से तथा इंद्रिय और मन के निमित्तरूप बहिरंग कारण से उत्पन्न होता है।
🏠
मलविद्धमणिव्यक्तिर्यथाऽनेकप्रकारत:॥
कर्मविद्धात्मविज्ञप्तिस्तथानेकप्रकारत:॥7॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[यथा] जैसे [मलविद्धमणिव्यक्ति:] मल से आच्छादित मणि की व्यक्ति [अनेकप्रकारत:] अनेक प्रकार से होती है [तथा] वैसे ही [कर्मविद्धात्मविज्ञप्ति:] कर्म से आच्छादित आत्मा का ज्ञान भी [अनेकप्रकारत:] अनेक प्रकार से होता है॥७॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-जिस प्रकार से कालिमा रेखा आदि से विद्ध हुए ऐसे जो पद्मराग आदि मणि विशेष हैं उनके तेज का प्रादुर्भाव अनेक प्रकार से होता है अर्थात् विशद्-अविशद्, दूर-निकट, प्रकाश्य-प्रकाशन आदि विशेष भेदों के आश्रित होता है उसी प्रकार से ज्ञानावरण आदि कर्मों से विद्ध-संबद्ध-संयुक्त जो आत्मा है उसकी विज्ञप्ति-आत्म पदार्थ की उपलब्धि अनेक प्रकार से होती है अर्थात् जो नाना रूप प्रत्यक्ष-परोक्ष, दूर-आसन्न पदार्थों के प्रतिभासन विशेष हैं, इंद्रिय, अनिंद्रिय और अतीन्द्रिय शक्ति विशेष रूप क्षयोपशम विशेष हैं उनके आश्रय से जीवों का अनेक प्रकार से अनुभव आ रहा है और ज्ञानावरण कर्म के संपूर्ण तथा निरस्त हो जाने पर तो संपूर्ण पदार्थों का ज्ञान आत्मा में उत्पन्न होता ही है क्योंकि वह आत्मा ज्ञान स्वभाव वाला है।
भावार्थ-जैसे मल से आच्छादित मणि की अभिव्यक्ति अनेक प्रकार से देखी जाती है उसी प्रकार से कर्मों से आच्छादित आत्मा के ज्ञान का विकास भी हीनाधिकरूप से अनेक प्रकार का देखा जाता है।
🏠
न तज्जन्म न ताद्रूप्यं न तद्व्यवसिति: सह॥
प्रत्येकं वा भजंतीह प्रामाण्यं प्रति हेतुतां॥8॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[इह] ज्ञान में [प्रामाण्यं प्रति] प्रमाणता के प्रति [तज्जन्म] तदुत्पत्ति [हेतुतां न] हेतु नहीं है, [न ताद्रूप्यं] न तदाकारता है और [न तद् व्यवसिति:] न तद्ध्यवसाय ही है [सह प्रत्येकं वा भजंति] ये तीनों न मिलकर ही हेतु हैं न एक-एक ही हेतु होते हैं॥८॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-इस ज्ञान में प्रमाणता के प्रति निमित्त भाव को नहीं प्राप्त होते हैं। क्यों नहीं होते हैं ? तज्जन्म-ज्ञान की उस अर्थ से उत्पत्ति होती है, इस मान्यता में उस ज्ञान में इंद्रियों से व्यभिचार आता है इसलिए पदार्थ ज्ञान की उत्पत्ति में निमित्त नहीं है, यह अर्थ हुआ है। ज्ञान में तद्रूपता भी नहीं है, उस अर्थ के समान रूप को-आकार को धारण करने वाला तद्रूप कहलाता है उसके भाव को ताद्रूप्य कहते हैं। उस तद्रूप का समानार्थ समनंतर ज्ञान के साथ व्यभिचार होता है और उसका व्यवसाय भी कारण नहीं है-उस अर्थ का निश्चय होना भी ज्ञान में कारण नहीं है क्योंकि द्विचंद्रादि के निश्चय के साथ व्यभिचार आता है। ये एक-एक या साथ में मिलकर प्रमाणता में हेतु नहीं होते हैं क्योंकि ये तीनों भी शुक्ल शंख में पीताकार ज्ञान के अनेक होने से समनंतर ज्ञान से व्यभिचारी होते हैं।
भावार्थ-बौद्धों ने तदुत्पत्ति, तद्रूपता और तदध्यवसाय को ज्ञान की प्रमाणता में कारण माना है किन्तु आचार्यदेव का कहना है कि न तो ये पृथक्-पृथक् ही ज्ञान की प्रमाणता में कारण हो सकते हैं और न तीनों मिलकर ही हो सकते हैं क्योंकि ये तीनों ही व्यभिचरित हैं।
🏠
स्वहेतुजनितोऽप्यर्थ: परिच्छेद्य: स्वतो यथा॥
तथा ज्ञानं स्वहेतूत्थं परिच्छेदात्मकं स्वत:॥9॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[स्वहेतुजनित: अपि अर्थ:] अपने हेतु से उत्पन्न हुआ भी अर्थ [यथा स्वत:] जैसे स्वत: [परिछेद्य:] जानने योग्य है [तथा स्वहेतूत्थं ज्ञानं] वैसे ही अपने हेतु से उत्पन्न हुआ ज्ञान [स्वत:] स्वभाव से ही [परिच्छेदात्मकं] जानने रूप स्वभाव वाला है॥९॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-जैसे घटादि पदार्थ स्वभाव से ही ज्ञेय हैं न कि ज्ञान से उत्पन्न होने आदि की अपेक्षा से और वे अपने हेतु से मिट्टी आदि सामग्री से उत्पन्न होते हैं-बनते हैं, ऐसे अपने कारणों से उत्पन्न होते हुए भी वे घटादि ज्ञान के विषय हैं, वैसे ही ज्ञान भी स्वभाव से ही पदार्थ को ग्रहण करने के स्वभाव वाला है न कि अर्थ से उत्पन्न होने आदि की अपेक्षा से। वह ज्ञान कैसा है ? अपने हेतु से उत्पन्न होने वाला है, ज्ञान का अंतरंग हेतु आवरण के क्षयोपशमरूप है और बहिरंग हेतु इंद्रिय तथा मनरूप है, इन अंतरंग-बहिरंग हेतुओं से उत्पन्न होते हुए भी ज्ञान स्वभाव से ही वस्तु को जानने का कार्य करता है। अर्थ को ग्रहण करने रूप स्वभाव वाला ज्ञान किसी के द्वारा शक्ति के आवृत्त होने पर कुछ-कुछ पदार्थों को ही जानता है और प्रतिबंधक आवरण कर्म क्षयोपशम या क्षय विशेष होने पर तो वही ज्ञान अपने विषय विशेष को जान लेता है।
🏠
व्यवसायात्मकं ज्ञानमात्मार्थग्राहकं मतं॥
ग्रहणं निर्णयस्तेन मुख्यं प्रामाण्यमुश्नुते॥10॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[व्यवसायात्मकं ज्ञानं] निश्चयात्मक ज्ञान [आत्मार्थग्राहकं मतं] अपने को और अर्थ को ग्रहण करने वाला माना गया है [ग्रहणं] वह ज्ञान [निर्णय:] निर्णयरूप है [तेन] इसलिए वह [मुख्यं प्रामाण्यं] मुख्य प्रमाणता को [अश्नुते] प्राप्त होता है॥१०॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-विशेष-जाति आदि आकार का अवसाय-निश्चय व्यवसाय कहलाता है वह निश्चय ही आत्मा-स्वरूप जिसका है वह ज्ञान व्यवसायात्मक माना गया है। इस कथन से ‘प्रत्यक्ष ज्ञान कल्पना से रहित है’ ऐसी बौद्ध की मान्यता का खंडन हो जाता है पुन: वह ज्ञान आत्मा और अर्थ का ग्राहक है, आत्मा-स्वरूप और अर्थ-घटादि बाह्य पदार्थ इनको ग्रहण करने वाला है अर्थात् अपने स्वरूप और बाह्य पदार्थों का निर्णय कराने वाला है।
इस कथन से ज्ञान अर्थ का ही ग्राहक है स्वरूप का ग्राहक नहीं है अथवा ज्ञान अपने स्वरूप का ही ग्राहक है अर्थ का ग्राहक नहीं है, इन दोनोें ही एकांत मान्यताओं का निराकरण कर दिया गया है इसलिए यह ग्रहण-ज्ञान निर्णयरूप है अर्थात् स्वार्थ व्यवसायरूप है यह अर्थ हुआ, उसी हेतु से यह प्रमाणता को प्राप्त होता है और यह ज्ञान कैसा है ? मुख्य-अनुपचरित है क्योंकि ज्ञानरूप क्रिया के प्रति कारण है किन्तु इंद्रिय, लिंग आदि तो उपचार से ही प्रमाण होते हैं इसलिए यह बात ठीक ही कही है कि आत्मादि का ज्ञान प्रमाण है, ऐसा समझना।
🏠
तत्प्रत्यक्षं परोक्षं च द्विधैवात्रान्यसंविदां।
अंतर्भावान्न युज्यंते नियमा: परकल्पिता:॥11॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[तत् द्विधा] वह प्रमाण दो प्रकार का है [प्रत्यक्षं परोक्ष च] प्रत्यक्ष और परोक्ष। [अन्य संविद्यं] अन्य ज्ञानों का [अत्र] इसमें [एव] ही [अंतर्भावात्] अंतर्भाव हो जाने से [परिकल्पिता:] पर से परिकल्पित प्रमाणों का [नियमा:] नियम [न युज्यंते] युक्त नहीं है॥११॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-जो सम्यग्ज्ञान स्वरूप प्रमाण है वह दो प्रकार का ही है-प्रत्यक्ष और परोक्ष।
प्रश्न-अनुमान आदि प्रमाण के भेदों की संख्या भी संभव है।
उत्तर-नहीं, जो आप बौद्धदि लोगों के द्वारा कल्पित दो, तीन, चार आदि संख्या का नियम है वह संभव नहीं है क्योंकि उन सभी अनुमान आदि ज्ञानों का इन्हीं प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप दो प्रमाणों में ही अंतर्भाव हो जाता है। उसमें से प्रत्यक्ष ज्ञान इंद्रिय प्रत्यक्ष, अनिन्द्रिय प्रत्यक्ष और अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष के भेद से तीन प्रकार का है।
स्पर्शन आदि इंद्रियों के व्यापार से उत्पन्न होने वाला ज्ञान इंद्रिय प्रत्यक्ष है। केवल मनोव्यापार से उत्पन्न होने वाला ज्ञान अनिन्द्रिय प्रत्यक्ष है। ये दोनों ही सांव्यवहारिक प्रत्यक्ष कहलाते हैं क्योंकि ये एकदेश विशदता को लिए हुए हैं।
अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष मुख्य प्रत्यक्ष कहलाता है। उसके अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान के भेद से तीन भेद हैं। उनमें से मूर्तिक द्रव्यों का अवलंबन लेने वाला अवधिज्ञान है, उसके भी देशावधि, परमावधि और सर्वावधि के भेद से तीन भेद हैं। उन तीनों में से देव और नारकियों के देशावधि होती है और वह भवप्रत्यय ही होती है तथा तिर्यंच और मनुष्यों की अवधि गुणप्रत्यय कहलाती है। परमावधि-सर्वावधि ये दोनों अवधिज्ञान चरमशरीरी-उसी भव से मोक्ष जाने पर संयमी-मनुष्य के ही होते हैं और ये गुणप्रत्यय कहलाते हैं। ऋजुमति और विपुलमति के भेद से मन:पर्ययज्ञान के दो भेद हैं। प्रगुण-सरणता से निर्वर्तित मन, वचन, कायगत सूक्ष्म द्रव्य का अवलंबन लेने वाला-जानने वाला ऋजुमति मन:पर्ययज्ञान है। सरल और कुटिलता से निर्वर्तित मन, वचन, कायगत सूक्ष्म से सूक्ष्म अर्थ का अवलंबन लेने वाला विपुलमति मन:पर्यय ज्ञान है। त्रिकालगत अनंत पर्याय से परिणत जीव, अजीव द्रव्यों को युगपत् साक्षात् जानने वाला केवलज्ञान है, वह संपूर्ण आवरण कर्म और वीर्यांतराय कर्म के निरवशेष नष्ट हो जाने से होता है।
‘इस केवलज्ञान को प्राप्त करने वाला कोई पुरुष विशेष है क्योंकि सुनिश्चितरूप से बाधक प्रमाण असंभव है, सुखादि के समान’ वास्तव में उस सर्वज्ञ को बाधित करने वाला प्रत्यक्ष ज्ञान तो है नहीं, क्योंकि वह इंद्रिय प्रत्यक्ष उसमें प्रवृत्त ही नहीं हो सकता है।
प्रश्न-उससे निवर्तमान ही उसका बाधक है अर्थात् सर्वज्ञ प्रत्यक्ष का विषय नहीं है इसलिए तो वह नहीं है ?
उत्तर-यह कथन अयुक्त है, क्योंकि ऐसे तो दीवाल आदि के परभाग आदि का भी अभाव हो जावेगा। अनुमान भी सर्वज्ञ का बाधक नहीं है क्योंकि वह उत्पन्न ही नहीं हो सकता है। साध्य-साधन के संबंध को ग्रहण करने पूर्वक ही अनुमान ज्ञान उत्पन्न होता है। वक्तृत्व आदि हेतु का सर्वज्ञत्व साध्य के साथ संबंध है इस बात को संपूर्ण रूप से जानना किसी को भी शक्य नहीं है, क्योंकि सभी लोग अल्पज्ञ हैं। आप कहें कि भिन्न अनुमान से उस साध्य-साधन के संबंध का ज्ञान हो जायेगा, सो भी ठीक नहीं है क्योंकि ऐसे तो अनवस्था आ जाती है इसलिए संदिग्धरूप से अनैकांतिक ऐसे वक्तृत्व आदि हेतु से सर्वज्ञ का निषेध सिद्ध नहीं हो सकता है।
आगम से भी ये सर्वज्ञ बाधित नहीं होते हैं, क्योंकि आपके द्वारा मान्य इस आगम को अपौरुषेयपना सिद्ध नहीं है किन्तु उसको पौरुषेय ही सिद्ध किया है। इष्ट-प्रत्यक्ष और अदृष्ट-अनुमानादि से अविरुद्ध वचन ही आगम है, न कि सर्वज्ञ। और वह आगम सर्वज्ञदेव से प्रणीत ही हो सकता है न कि राग, द्वेष और मोह से व्याप्त पुरुषों से कथित वचनरूप, क्योंकि उनमें वैसे प्रत्यक्षादि से अविरुद्ध वचनों के प्रयोग का अभाव है, रथ्यापुरुष के समान-पागल पुरुष के समान।
प्रश्न-इस प्रकार का आगम तो सौगत आदि के यहाँ भी संभव है अत: अर्हंत ही उस आगम के प्रणेता संभव नहीं हैं ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि वे सौगत आदि भी प्रत्यक्ष और अनुमान से विरुद्ध वचन के बोलने वाले हैं। ‘अनेकांतस्वरूप वस्तु का प्रतिपादक प्रवचन प्रत्यक्ष और अनुमान से अविरोधी है क्योंकि प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उसमें विसंवाद नहीं आता है।’ ऐसा समझना।
विशेषार्थ-यहाँ पर आचार्य ने प्रमाण के दो भेद बताये हैं प्रत्यक्ष और परोक्ष। उनमें से प्रत्यक्ष के भी सांव्यवहारिक और मुख्य ऐसे दो भेद किये हैं। सांव्यवहारिक में इंद्रिय प्रत्यक्ष और अनिंद्रिय प्रत्यक्ष ऐसे दो भेद होते हैं। अवधि में भी देशावधि, परमावधि और सर्वावधि से तीन भेद हो गये हैं। देशावधि के दो भेद हैं-भवप्रत्यय और गुणप्रत्यय। देव, नारकियों के भवप्रत्यय देशावधि ही होती है तथा मनुष्य और तिर्यंचों के क्षयोपशम की मुख्यता से गुणप्रत्यय देशावधि ही होती है। परमावधि, सर्वावधि तद्भव मोक्षगामी परमसंयमी मुनियों के होती हैं। मन:पर्यय ज्ञान के भी ऋजुमती और विपुलमती दोनों भेद संयमी के ही होते हैं। ये दोनों ज्ञान देशप्रत्यक्ष कहलाते हैं। केवलज्ञान अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष है। यह जिनके होता है वे सर्वज्ञ कहलाते हैं।
कुछ लोग-मीमांसक आदि सर्वज्ञ का अस्तित्व नहीं मानते हैं। इस पर आचार्य ने कहा है कि ‘सर्वज्ञ नहीं है’ इस बात को जानने वाला इंद्रिय प्रत्यक्ष तो हो नहीं सकता है क्योंकि उसका विषय सीमित है और वर्तमान का ही है, हाँ, यदि कोई अपने प्रत्यक्ष से तीनों लोकों और तीनों कालों को देखकर निर्णय दे दे कि कोई भी सर्वदर्शी नहीं है तो भाई! वह तो स्वयं ही सर्वदर्शी सर्वज्ञ बन गया है। वैसे ही अनुमान से भी ‘सर्वज्ञ नहीं है’ इस बात को सिद्ध करना कठिन है तथा आगम से निषेध करना चाहो सो भी ठीक नहीं है क्योंकि पहले आगम को प्रमाणीक सिद्ध करना चाहिए। आगम अपौरुषेय है अत: प्रमाणीक है इतना मात्र कहने से भी कुछ नही होगा क्योंकि अपौरुषेय आगम की सिद्धि नहीं है प्रत्युत् पुरुषकृत ही आगम सिद्ध हो रहे हैं। उनमें भी सर्वज्ञ प्रणीत आगम ही निर्दोष है, अल्पज्ञों के द्वारा प्रणीत नहीं है।
🏠
उपयोगौ श्रुतस्य द्वौ स्याद्वादनयसंज्ञितौ॥
स्याद्वाद: सकलादेशो नयो विकलसंकथा॥12॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[श्रुतस्य] श्रुतज्ञान के [स्याद्वादनयसंज्ञितौ] स्याद्वाद और नय इन नाम वाले [द्वौ उपयोगौ] दो व्यापार हैं। [सकलादेश:] संपूर्ण को कहने वाला [स्याद्वाद:] स्याद्वाद है और [विकलसंकथा] एक-एक अंश को सम्यक् प्रकार से कहने वाला [नय:] नय है॥१२॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-श्रुत-आप्तवचनरूप आगम के दो उपयोग व्यापार हैं। वर्णपदवाक्यात्मक द्रव्यरूप का श्रवण करना श्रुत है अथवा भावश्रुत का श्रवण श्रुत है ऐसा श्रुत शब्द का निरुक्ति अर्थ है। श्रुत के दो व्यापार कौन से हैं ? स्याद्वाद और नय हैं।
(स्याद्वाद का व्यापार)
स्यात्-कथंचित् प्रतिपक्ष की अपेक्षा से जो कथन होता है वह २स्याद्वाद कहलाता है। नयनं-वस्तु के विवक्षित धर्म को प्राप्त कराने वाला नय३ है। अब इन दोनों के लक्षण को कहते हुए पहले स्याद्वाद को कहते हैं -
वह स्याद्वाद सकलादेशी है-सकल-अनेक धर्मात्मक वस्तु को आदेश कहना सकलादेश है। जैसे-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल ये छह अर्थ हैं। उनमें से ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य इन असाधारण धर्मों से, सर्वत्र प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व, धर्मित्व, गुणित्व आदि साधारण धर्मों से तथा अमूर्तत्व, सूक्ष्मत्व, असंख्यात प्रदेशत्व आदि साधारणासाधारण धर्मों से अनेकांतात्मक-अनेकों धर्म वाला जीव है। पुन: पुद्गल, स्पर्श, रस, गंध और वर्ण इन असाधारण धर्मों से, सत्त्व आदि साधारण धर्मों से तथा अचेतनत्त्व, मूर्तत्त्व आदि साधारणासाधारण धर्मों से अनेकांतात्मक है। धर्मद्रव्य गतिहेतुरूप असाधारण धर्म से, सत्त्व आदि साधारण धर्मों से और अचेतनत्व आदि उभयरूप धर्मों से अनेकांतात्मक है। अधर्मद्रव्य स्थिति हेतुरूप असाधारण धर्म से, अस्तित्व आदि साधारण धर्मों से और अमूर्तत्व आदि साधारणासाधारण धर्मों से अनेकांतात्मक है। अवगाहनरूप असाधारण धर्म से, अस्तित्व आदि साधारण धर्मों से और अमूर्तत्वादि उभयरूप धर्मों से भी आकाश द्रव्य अनेकांतात्मक है। वर्तनालक्षण असाधारण धर्म से, अस्तित्व आदि साधारण धर्मों से और अमूर्तत्वादि साधारणासाधारण धर्मों से कालद्रव्य अनेकांतात्मक है अथवा उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनों से युक्त सत् होता है, स्याद्वाद ऐसा प्रतिपादन करता है।
(नय का व्यापार)
एक धर्म का सम्यक् कथन करना नय है। विकल-विवक्षित एक धर्म का सं-सम्यक् प्रकार से-प्रतिपक्ष की अपेक्षा से कथा-प्रतिपादन करना नय है, जैसे जीव ज्ञाता ही है, ऐसा देखना चाहिए इत्यादि।
प्रश्न-पहले आपने कहा है कि ज्ञाता का अभिप्राय नय है, पुन: इस समय ‘वचनात्मक नय हैं’ ऐसा आप कह रहे हैं, सो क्या बात है ?
उत्तर-उपचार से नय के हेतुभूत वचन को भी नयपना विरुद्ध नहीं है, जैसे कि श्रुतज्ञान के हेतुभूत वचन को श्रुत, ऐसा नाम कह देते हैं।
उसी का स्पष्टीकरण करते हैं -
कथंचित् जीव ही ज्ञानादि अनेक धर्मात्मक है, यह प्रमाणवाक्य है। कथंचित् अस्ति ही जीव है वह नय वाक्य है और यह सप्तभंगी से प्रतिष्ठित है।
स्वद्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्ति रूप ही है। परद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्ति रूप ही है। स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की क्रम से विवक्षा होने से कथंचित् जीव अस्तिनास्तिरूप ही है। युगपत् स्व और पर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अवक्तव्य ही है। स्वद्रव्यादि चतुष्टय की विवक्षा के साथ युगपत् स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्तिअवक्तव्य ही है। परद्रव्यादि विवक्षा के साथ युगपत् स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल,भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् नास्ति अवक्तव्य है। क्रम से स्वपर द्रव्यादि की विवक्षा के साथ युगपत् स्वपर द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की विवक्षा से जीव कथंचित् अस्ति-नास्ति अवक्तव्य ही है।
इस प्रकार से प्रत्यक्ष और अनुमान के अविरोध रूप से विधि-प्रतिषेध के द्वारा सर्वत्र सप्तभंगी कल्पना संभव है। इसी प्रकार से एक-अनेक, नित्य-अनित्य और भेद-अभेद आदि में भी सप्तभंगी को लगा लेना चाहिए।
विशेषार्थ-यहाँ पर आगम के दो व्यापार बताये हैं-एक तो स्याद्वाद-प्रमाण, दूसरा नय। प्रत्येक वस्तु को अनेक धर्मात्मक ग्रहण करने वाला स्याद्वाद नाम वाला प्रमाण वाक्य है और प्रत्येक वस्तु के विवक्षित किसी एक धर्म को उसके विरोधी धर्म की अपेक्षा के साथ ग्रहण करने वाला नय वाक्य है। जैसे जीव को अस्तित्व आदि साधारण धर्मों से, चेतनत्व आदि असाधारण धर्मों से और उभयात्मक धर्मों से सहित अनेक धर्म वाला कहना। यह प्रमाण वचन है। उसके अस्ति धर्म को स्वद्रव्यादि चतुष्टय की अपेक्षा से कहते हुए भी उसके प्रतिपक्षी नास्ति धर्म का निषेध नहीं करना किन्तु गौण करना यह सुनय का काम है। यदि नास्ति धर्म का निषेध करके यह दुराग्रह रूप एकांत से जीव को अस्तिरूप ही कहे तब यह दुर्नय हो जाता है। यह नयवाक्य सप्तभंगी से युक्त होता है। (ऐसा समझना)।
🏠
अप्रयुक्तेऽपि सर्वत्र स्यात्कारोऽर्थात्प्रतीयते॥
विधौ निषेधेऽप्यन्यत्र कुशलश्चेत्प्रयोजक:॥13॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[चेत् प्रयोजक: कुशल:] यदि प्रयोगकर्ता कुशल है, तो [सर्वत्र] सभी जगह [विधौ निषेधे अपि] विधिवाक्य और निषेधवाक्य में भी [अन्यत्र] अन्य किसी में भी [अर्थात्] सामथ्र्य से [स्यात्कार:] स्यात्कार [अप्रयुक्ते अपि] बिना प्रयोग करने पर भी [प्रतीयते] प्रतीत हो जाता है॥१३॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-स्यात् यह पद अव्यय रूप है, ऐसा यह स्यात्कारपद सर्वत्र-शास्त्र में अथवा लोक में विधि को-अस्तित्व आदि को साध्य करने में प्रतीति में आता है-जाना जाता है। केवल विधि में ही नहीं किन्तु निषेध में भी-असत्त्व आदि को साध्य करने पर भी यह स्यात्कार प्रतीति में आता है। अन्यत्र भी-अन्य अनुवाद के अतिदेश आदि में भी यह प्रतीत होता है।
किस प्रकार का होता हुआ ? अप्रयुक्त भी ‘स्यात् अस्ति जीव:’ ऐसा कथन नहीं करने पर भी यह स्यात्कार अर्थ-सामथ्र्य से (अर्थापत्ति से) प्रतीत हो जाता है। उसी का स्पष्टीकरण -
मोक्ष्मार्ग को सम्यग्दर्शन आदि त्रयात्मक कहने पर उसमें एकत्व कैसे है ? अथवा एकत्व मानने पर तीनपना कैसे है ? इस प्रकार के विरोध में कथंचित् इस प्रकार से ही परिहार होता है किन्तु सर्वथा से नहीं। क्योंकि द्रव्य और पर्याय की अपेक्षा से मार्ग में एकत्व और अनेकत्व का विरोध नहीं है इसलिए ‘कथंचित्’ इस अर्थ की सामथ्र्य से उसका वाचक स्यात्कार प्रयुक्त न होते हुए भी प्रतीति में आता ही है। यदि प्रयोजक-प्रतिपादन करने वाला व्यक्ति कुशल है-व्यवहार में जानकार है, तो ऐसी बात है।
उसी प्रकार से एवकार भी प्रतीति में आता है। उसी हेतु से रत्नत्रय ही मोक्षमार्ग है, इस प्रकार के अवधारण के अभाव में सम्यग्दर्शन ही मार्ग हो जावेगा अथवा अन्य ही कोई अर्थात् ज्ञान ही या चारित्र ही मार्ग हो जावेगा, अथवा कोई भी दो ही मार्ग हो जावेंगे, इस प्रकार से अतिप्रसंग दोष दुर्निवार हो जावेगा अर्थात् एवकार का प्रयोग न होने पर भी सामथ्र्य से एवकार का अर्थ लेना चाहिए अन्यथा कुछ भी अर्थ हो जावेगा किन्तु ऐसी बात तो है नहीं क्योंकि असाधारण स्वरूप को ही लक्षण कहते हैं।
प्रश्न-इस प्रकार बिना प्रयुक्त भी यदि स्यात्कार और एवकार की सामथ्र्य से प्रतीति हो जाती है तब तो कोई भी कहीं पर इनको क्यों प्रयुक्त करते हैं ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि प्रतिपाद्य-शिष्य के अभिप्राय के निमित्त से उनका प्रयोग होता है।
भावार्थ-आचार्यों का यह स्पष्ट कहना है कि यद्यपि स्थल-स्थल पर वाक्य-वाक्य में स्यात्कार का प्रयोग नहीं होता है फिर अर्थापत्ति से लगा लेना चाहिए। जैसे किसी ने कहा जीव शुद्ध है तो समझ लेना चाहिए कि कथंचित् अशुद्ध भी है। ऐसे ही एवकार के विषय में भी प्रयुक्त न होने पर भी यथोचित् उसका भी अर्थ लेना चाहिए और जहाँ-जहाँ पर इनका स्पष्ट प्रयोग है वहाँ पर शिष्यों के अभिप्राय से आचार्यों ने प्रयोग कर दिया है।
🏠
वर्णा: पदानि वाक्यानि प्राहुरर्थानवांछितान्॥
वांछिताँश्च क्वचिन्नेत्ति प्रसिद्धिरियमीदृशी॥14॥
स्वेच्छया तामतिक्रम्य वदतामेव युज्यते॥
वक्त्रभिप्रेतमात्रस्य सूचकं वचनं न्विति॥15॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[वर्णा: पदानि वाक्यानि] वर्ण, पद और वाक्य ये [अवांछितांन् वांछितान् च] अविवक्षित और विवक्षित [अर्थान् प्रादु:] अर्थों को कहते हैं और [क्वचित् ना इति] कहीं पर नहीं भी कहते हैं, [ईदृशी इयं प्रसिद्धि:] ऐसी यह प्रसिद्धि है [तो अतिक्रम्य एव] इस प्रसिद्धि को उल्लंघन करके ही [स्वेच्छया वदतां] स्वेच्छा से कहने वालों को [युज्यते] क्या यह युक्त है ? कि [वचनं] वचन [वक्त्रभिप्रेतमात्रस्य] वक्ता के अभिप्रायमात्र के [सूचकं] सूचक हैं [नु इति] अहो! इस प्रकार तो बड़ा आश्चर्य है॥१४-१५॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-गकार आदि अक्षर वर्ण हैं तथा गौ आदि शब्द पद कहलाते हैं और ‘गाय को लावो’ इत्यादि वाक्य संज्ञक हैं, ये अवांक्षित-अविवक्षित भूमि आदि को वांछित-विवक्षित सास्नादिमान् आदि अर्थ को-वाच्य को कहते हैं। किन्हीं मंदबुद्धि वाले शिष्यों में नहीं भी कहते हैं क्योंकि उनको इनसे अर्थ का बोध नहीं होता है, इस प्रकार से सर्वजन प्रतीति प्रसिद्ध है, ईदृशी-ऐसी विचित्र रूढ़ि को व्यवहारीजन स्वीकार करते हैं क्योंकि उसी प्रकार से ही अर्थक्रिया हो सकती है।
उनमें वर्ण, स्वर और व्यंजनरूप से चौंसठ हैं। परस्पर में सापेक्ष वर्गों का निरपेक्ष समुदाय पद कहलाता है, उसके अव्यय और अव्ययरहित की अपेक्षा से दो भेद हैं। उनमें भी अव्ययरहित के सुबंत और तिङंत की अपेक्षा से दो भेद हैं और तस्, आदि के भेद से अव्यय अनेक प्रकार का है। परस्पर सापेक्ष पदों का जो निरपेक्ष समुदाय है वह वाक्य है। उसके भी क्रिया प्रधान, कारक प्रधान और उभयात्मक ऐसे तीन भेद हैं।
इस प्रसिद्धि का अतिक्रमण करके ही-उल्लंघन करके ही स्वैर भाव से कहने वाले सौगतों को क्या यह कहना युक्त है कि शब्द वक्ता के अभिप्राय मात्र के सूचक हैं अर्थात् प्रयोजक की विवक्षा मात्र को ही कहने वाले हैं किन्तु बाह्य अर्थ को नहीं। नु-अहो! यह बड़े आश्चर्य की बात है। इस कथन से यहाँ पर आक्षेप सूचित हो रहा है क्योंकि सामान्य विशेषात्मक बाह्य पदार्थों की शब्द के प्रयोग से प्रतीति होती है, वे शब्द ही उस अर्थ को कहते हैं। उस शब्द से स्वप्न में भी अभिप्राय की प्रतीति नहीं होती है। जिससे जिस विषय में प्रतीति, प्रवृत्ति और प्राप्ति का होना सम्यक् प्रकार से अनुभव में आता है, वह उसका अर्थ है, यह न्याय है।
भावार्थ-बौद्ध का कहना है कि शब्द बोलने वाले के अभिप्राय मात्र को ही कहते हैं न कि पदार्थों को। इस पर आचार्य आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहते हैं कि जैसा कि लोकव्यवहार में अनुभव आ रहा है कि शब्द अपने वाच्य अर्थ को कहते भी हैं, पुन: प्रतीति के विरुद्ध कथन करना कहाँ तक उचित है ?
🏠
श्रुतभेदा नया: सप्त नैगमादिप्रभेदत:॥
द्रव्यपर्यायमूलास्ते द्रव्यमेकान्वयानुगं॥16॥
निश्चयात्मकमन्योऽपि व्यतिरेकपृथक्त्वग:॥
निश्चयव्यवहारौ तु द्रव्यपर्यायमाश्रितौ॥17॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[श्रुतभेदा: नया:] श्रुतज्ञान के भेद नय हैं, वे [नैगमादिप्रभेदत:] नैगम आदि के भेद से [सप्त] सात हैं, [ते द्रव्य पर्याय मूला:] वे द्रव्य और पर्यायमूलक हैं। [एकं अन्वयानुगं द्रव्यं] एक और अन्वय का अनुसरण करने वाला द्रव्य है, [निश्चयात्मकं] वह निश्चय स्वरूप है और [अन्य: अपि] अन्य पर्याय भी [व्यतिरेक पृथक्त्वग:] व्यतिरेक तथा पृथक्त्व का अनुसरण करने वाली है। [निश्चय व्यवहारौ तु] निश्चय और व्यवहार तो [द्रव्यपर्यायमाश्रितौ] द्रव्य और पर्याय का आश्रय लेने वाले हैं॥१६-१७॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-वे पूर्वोक्त लक्षण वाले नय होते हैं, वे श्रुत-सकलादेशरूप आगम के भेदरूप हैं इसलिए वे विकलादेश कहलाते हैं। वे नैगम, संग्रह अदि प्रभेदों का आश्रय लेकर सात हो जाते हैं। वे द्रव्य और पर्याय को विषय करने वाले होने से द्रव्य पर्यायमूलक हैं।
(द्रव्य का स्वरूप)
द्रव्य सामान्य होता है, वह एक और अन्वय को अनुसरण करता है अर्थात् व्याप्त करता है। उसमेंअर्थ ता सामान्य पूर्वापर पर्याय में व्यापक है वह एकनुग-एक का अनुसरण करने वाला है और सदृश परिणाम लक्षण जो तिर्यक् सामान्य है वह अन्वयानुंग-अन्वय का अनुसरण करता है पुन: वह द्रव्य निश्चयात्मक है-निकल गया है पर्यायांतर का संकर जिससे, ऐसा जो निश्चय-पर्याय, वह जिसके स्वरूप हैं वैसा है अर्थात् पर्यायांतर के मिश्रण से रहित पर्याय स्वरूप है।
और पुन: अन्य पर्याय को विशेष कहते हैं, वह पर्याय व्यतिरेक और पृथक्त्व का अनुसरण करने वाला है, व्यतिरेक और पृथक्त्व को जो प्राप्त करता है, तादात्म्य रूप से परिणत होता है वह वैसा कहलाता है। उसमें एक द्रव्य में क्रम से होने वाली पर्याय को व्यतिरेक कहते हैं और अर्थांतरगत विसदृश परिणाम पृथक्त्व का अनुसरण करने वाला है।
प्रश्न-अन्य शास्त्रों में निश्चय और व्यवहार नयों को प्रतिपादन किया गया है, उनका क्या आलंबन विषय है ?
उत्तर-वे निश्चय और व्यवहार मूलनय हैं, वे द्रव्य और पर्याय का आलंबन लेते हैं अर्थात् निश्चयनय द्रव्य को विषय करता है और व्यवहारनय पर्याय को विषय करता है। द्रव्य का आश्रय लेने वाला निश्चयनय द्रव्यार्थिक कहलाता है तथा पर्यायाश्रित व्यवहारनय पर्यायार्थिक कहलाता है ऐसा अर्थ हुआ है। यहाँ कारिका में द्रव्यपर्यायं ऐसा पद है ‘उसमें’ ‘द्रव्यं च पर्यायश्च तयो: समाहार:’ ऐसा समाहार द्वंद्व समास करने पर नपुंसकलिंग और एकवचन हो जाता है। ऐसा व्याकरण शास्त्र का नियम है।
🏠
गुणप्रधानभावेन धर्मयोरेकधर्मिणि ॥
विवक्षा नैगमोऽत्यंतभेदोक्ति: स्यात्तदाकृति:॥18॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[धर्मयो:] एकत्व-अनेकत्वरूप दो धर्मों को [गुण प्रधान भावेन] गौण तथा प्रधानभाव से [एकधर्मिणि] एक धर्मी में [विवक्षा] कहने की इच्छा [नैगम:] नैगमनय है और [अत्यंतभेदोक्ति:] दोनों धर्मों में अत्यंत भेद का कथन करना [तदाकृति: स्यात्] नैगमाभास होता है॥१८॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-एकत्व और अनेकत्व ऐसे दो धर्मों को गौण और प्रधान भाव से अर्थात् मुख्य और अमुख्य भाव से एक-अभिन्न, धर्मी-द्रव्य में। कहने का जो अभिप्राय है वह नैगमनय है और अत्यंत रूप से भेद का कथन करना, अत्यंत-निरपेक्षरूप से नानात्व का जो कथन है, ऐसा जो नैयायिक आदि जनों का अभिप्राय नैगमाभास कहलाता है, यहाँ वह अर्थ हुआ है।
🏠
सदभेदात्समस्तैक्यसंग्रहात्संग्रहो नय:।
दुर्नयो ब्रह्मवाद: स्यात्तत्स्वरूपानवाप्तित:॥19।
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[सद्भेदात्] सत् सामान्य के अभेद से [समस्तैक्यसंग्रहात्] समस्त को एकरूप से संग्रह करने से [संग्रह: नय:] संग्रह नय होता है और [ब्रह्मवाद: दुर्नय:] ब्रह्माद्वैतवाद दुर्नय-संग्रहाभास [स्यात्] है [तत्स्वरूपानवाप्तित:] क्योंकि वह ब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त करने वाला नहीं है॥१९॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-समस्त-जीव-अजीव विशेष को एकरूप से संग्रह करने वाला-संक्षिप्तरूप से ग्रहण करने से संग्रहनय होता है।
प्रश्न-अनेक को संक्षेप से कैसे ग्रहण करता है ?
उत्तर-सत् अभेद से अर्थात् सत् सामान्यरूप जो अभेद है उसका आश्रय करके ग्रहण करता है। ‘सत्त्व से भिन्न किंचित भी वस्तु है’ ऐसा कहना शक्य नहीं है क्योंकि विरोध आता है अर्थात् जिसका अस्तित्व ही नहीं है उसको ‘यह है’ ऐसा कैसे कह सकते हैं ?
दुर्नय संग्रहाभास है, वह कौन है ? वह ब्रह्मवाद अर्थात् सत्ताद्वैत है। क्यों ? उसके स्वरूप को नहीं प्राप्त करने से अर्थात् उस पर परिकल्पित ब्रह्म का स्वरूप भेद के प्रपंचों से शून्य है और सत्तामात्र है उसकी अप्राप्ति होने से, प्रमाण से प्राप्ति न होने से वह दुर्नय है। वह वास्तव में प्रत्यक्षादि प्रमाण से प्राप्त नहीं किया जाता है क्योंकि वैसी प्रतीति नहीं होती है।
🏠
व्यवहारानुकूल्यात्तु प्रमाणानां प्रमाणता॥
नान्यथा बाध्यमानानां ज्ञानानां तत्प्रसंगत:॥20॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[व्यवहारानुकूल्यात्तु] व्यवहार की अनुकूलता से ही [प्रमाणानां] ज्ञानों की [प्रमाणता] प्रमाणता है [अन्यथा न] अन्य प्रकार से नहीं है, [बाध्यमानानां] अन्यथा बाधित होने वाले [ज्ञानानां] ज्ञानों में भी [तत्प्रसंगत:] प्रमाणता का प्रसंग हो जावेगा॥२०॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-प्रमाणपने से स्वीकृत प्रमाणों की प्रमाणता-अविसंवादकता होती है। कैसे ? व्यवहार की अनुकूलता से अर्थात् संग्रह के विषय में भेद करने वाला व्यवहार है, उसकी अनुकूलता-अविसंवाद है उससे ही प्रमाणता है अन्यथा उसमें विसंवाद होने से प्रमाणता नहीं हो सकेगी। नहीं तो बाध्यमान-बाधित होने वाले संशय आदि विसंवादी ज्ञानों में भी प्रमाणता का प्रसंग आ जावेगा अर्थात प्रमाण आरै अप्रमाण की व्यवस्था का कारण होने से व्यवहारनय कहलाता है अन्यथा वह तदाभास कहलाता है, ऐसा अर्थ है।
🏠
भेदं प्राधान्यतोऽन्विच्छन् ऋजुसूत्रनयो मत:॥
सर्वथैकत्वविक्षेपी तदाभासस्त्वलौकिक:॥21॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[प्राधान्यत:] प्रधानता से [भेदं] भेद को [अन्विच्छन्] स्वीकार करते हुए [ऋजुसूत्रनय: मत:] ऋजुसूत्रनय माना गया है और [सर्वथा] सब प्रकार से [एकत्वविक्षेपी] एकत्व का निषेध करने वाला [तु अलौकिक: तदाभास:] तो लोकव्यवहार से विरुद्ध तदाभास होता है॥२१॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-प्रधानता से-मुख्यता से भेद को-पर्याय को विषय करते हुए ऋजुसूत्र नय कहलाता है, यह गौणरूप से द्रव्य की भी अपेक्षा रखता है, ऐसा यहाँ अर्थ है। पुन: एकत्व-द्रव्य का निराकरण करने वाला तदाभास है क्योंकि यह सर्वथा प्रधानरूप से और अप्रधानरूप से द्रव्य को ग्रहण करता है और यह अलौकिक है अर्थात् लोकव्यवहार वह प्रयोजन जिसका है वह लौकिक है, उससे विपरीत अलौकिक कहा जाता है। यह तदाभास व्यवहार का विरोधी है, ऐसा अर्थ है। परस्पर में सजातीय-विजातीय से व्यावृत्त प्रतिक्षण विसरारू-जीर्ण होने वाले परमाणु परीक्षकजनों के द्वारा व्यवहार को नहीं प्राप्त होते हैं कि जिससे उसका विषय नयाभास न हो जावे अर्थात् बौद्धों द्वारा मान्य क्षणिक परमाणु व्यवहार में नहीं दिखते हैं इसीलिए उनका ग्राहक नय ऋजुसूत्र नयाभास है।
🏠
चत्त्वारोऽर्थनया ह्येते जीवाद्यर्थव्यपाश्रयात्॥
त्रय: शब्दनया: सत्यपदविद्यां समाश्रिता:॥22॥
अकलंकप्रभाभारद्योतितं श्रुतमर्थत:॥
प्रमानयोपयोगात्म सौरी वृत्ति: प्रबोधयेत्॥1॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[ऐते ही चत्वार: अर्थनया:] निश्चितरूप से ये चार ही अर्थ नय हैं [जीवाद्यर्थव्यपाश्रयात्] क्योंकि जीवादि पदार्थों का आश्रय लेते हैं [त्रय: शब्दनया:] शेष तीन शब्दनय हैं, [सत्यपदविद्यां समाश्रिता:] क्योंकि ये व्याकरण शास्त्र का आश्रय लेने वाले हैं॥२२॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-पहले कहे गये जो नैगम आदि नय हैं, उनमें से चार नय अर्थ प्रधान होने से अर्थनय कहलाते हैं क्योंकि ये जीवादि पदार्थों का आश्रय लेते हैं। शेष शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये तीन नय शब्द प्रधान होने से शब्दनय हैं। ये सत्यपद की विद्या के आश्रित हैं अर्थात् प्रमाणांतर से अबाधित, काल, कारक आदि भेद के वाची पद सत्यपद कहलाते हैं, उन सत्यपदों की विद्या-व्याकरण शास्त्र, उसको आश्रित करने वाले हैं वे व्याकरणशास्त्र के आश्रित हैं ऐसा अर्थ है। उनमें काल, कारक, लिंग आदि के भेद से अर्थ में भेद को करने वाला शब्दनय है। पर्यायवाची शब्दों के भेद से अर्थ में भेद को करने वाला समभिरूढ़नय है और क्रियावाची शब्द के भेद से अर्थ में भेद को करने वाला एवंभूत नय हैं।
भावार्थ-यहाँ पर सात नयों में से चार नयों का लक्षण तो कारिकाओं में कह ही दिया है अत: श्री अभयचंद्रसूरि ने शब्दादि तीन नयों का लक्षण संक्षेप से कह दिया है क्योंकि कारिका में भी श्री अकलंकदेव ने इन तीन नयों को सत्यपद की विद्यारूप शब्द शास्त्र के आश्रित कहा है।
श्लोकार्थ-अकलंक-निर्दोष प्रभा के भार से प्रकाशित श्रुत-आगम को जो कि अर्थ से प्रमाणनय और उपयोगस्वरूप है इसको सौरीवृत्ति-श्रीअभयचंद्रसूरि की वृत्ति प्रबोधित करती है।।१।।
भावार्थ-श्रीमान् भट्टाकलंकदेव ने कारिकाओं के द्वारा जिनके स्वरूप को कहा है और श्री प्रभाचंद्राचार्य ने न्यायकुमुद टीका के द्वारा उनका विशद विवेचन किया है पुन: उन दोनों के अभिप्राय को ज्ञातकर श्री अभयचंद्रसूरि ने संक्षेप से सारभूत इस आगम के परिच्छेद में प्रमाण, नय तथा उपयोग के स्वरूप का स्पष्टीकरण किया है, ऐसा अर्थ है।
इस प्रकार श्री अभयचंद्रसूरि कृत लघीयस्त्रय की स्याद्वादभूषण नामक तात्पर्यवृत्ति में श्रुतोपयोग नाम का छठा परिच्छेद पूर्ण हुआ।
🏠
श्रुतादर्थमनेकांतमधिगम्याभिसंधिभि:॥
परीक्ष्य ताँस्तान् तद्धर्माननेकान् व्यावहारिकान् ॥1।
नयानुगतनिक्षेपैरुपायैर्भेदवेदने ॥
विरचय्यार्थवाक्प्रत्ययात्मभेदान् श्रुतार्पितान्॥2॥
अनुयुज्यानुयोगैश्च निर्देशादिभिदागतै:॥
द्रव्याणि जीवादीन्यात्मा विवृद्धाभिनिवेशन:॥3॥
जीवस्थानगुणस्थानमार्गणास्थानतत्त्ववित्॥
तपोनिर्जीर्णकर्माऽयं विमुक्त: सुखमृच्छति॥4॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[श्रुतान] श्रुत से [अनेकांत] अनेकांतात्मक [अर्थं अधिगम्य] अर्थ को जानकर [तांस्तान्] उन-उन [अनेकात् व्यावहारिकान्] अनेक व्यावहारिक [तद्धर्मान्] उस-वस्तु के धर्मों की [अभिसंधिभि:] ज्ञाता के अभिप्रायरूप नयों से [परीक्ष्य] परीक्षा करके [उपायै:] ज्ञान के लिए उपायभूत [नयानुगतनिक्षेपै:] नयों का अनुसरण करने वाले ऐसे निक्षेपों से [भेदवेदने] भेदों के जानने में [श्रुतार्पितान्] श्रुत से विकल्पित [अर्थवाक्यप्रत्यात्म भेदान्] अर्थात्मक, वचनात्मक और ज्ञानात्मक भेदों का [विरचय्य] न्यास करके-कथन करके, [आत्मा] जीव [विवृद्धाभिनिवेशन:] वृद्धि को प्राप्त हुए सम्यग्दर्शन से सहित [निर्देशादिभिदागतै:] निर्देश आदि भेदों को प्राप्त हुए ऐसे [अनुयोगै:] अनुयोगों से [जीवादीनि] जीवादिक [द्रव्याणि] द्रव्यों को [अनुयुज्य] पूछ करके [जीवस्थानगुणस्थानमार्गणा स्यात् तत्त्ववित्] जीवस्थान, गुणस्थान और मार्गणा स्थानों के द्वारा तत्त्व-जीवादिस्वरूप को जानने वाला [तपोनिर्जीर्णकर्मा] तप से कर्मों को निर्जिर्ण कर दिया है जिसने [अयं] ऐसा यह [विमुक्त:] कर्मों से मुक्त हुआ [सुखं] सुख को [ऋच्छति] प्राप्त करता है॥१-२-३-४॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-यह प्रत्यक्षादि प्रमाणों से सिद्ध आत्मा विमुक्त होता हुआ वि-विशेष रूप से (समस्त रूप से) मुक्त-कर्मरहित होता हुआ परम स्वास्थ्यरूप अनंतज्ञानादि गुणस्वरूप सुख को प्राप्त कर लेता है। वह कैसा है आत्मा ? तप से कर्म को जिसने निर्जीण कर दिया है, तप-यथाख्यात चारित्र लक्षण वाले व्युपरतक्रियानिवृत्तिरूप चतुर्थ शुक्लध्यान से जिसने ज्ञानावरण आदि द्रव्यकर्म का और भावकर्म का निर्मूलन कर दिया है वह आत्मा ऐसा है। इस कथन से चारित्र और तप इन दो आराधनाओं को सूचित किया है। पुन: कैसा है ? जीवस्थान, गुणस्थान और मार्गणास्थान को जानने वाला है। समास, स्थान, योनि, अवगाहना और कुलों के भेद को जीवस्थान कहते हैं। मिथ्यात्व आदि परिणामों के स्थान-पद को गुणस्थान कहते हैं और अन्वेषण के उपायभूत गति आदि मार्गणा के स्थान को मार्गणास्थान कहते हैं। इनके प्रत्येक के चौदह-चौदह भेद हैं अर्थात् जीवसमास चौदह हैं, गुणस्थान चौदह हैं और मार्गणास्थान भी चौदह हैं, इनके भेदों से तत्त्व को-जीव के स्वरूप को जो जानता है वह तत्त्ववित् कहलाता है। इस कथन से ज्ञान की आराधना को बतलाया है।
पुन: वह आत्मा कैसा है ?
वृद्धिंगत अभिनिवेश-श्रद्धान वाला है। वि-विशेषरूप से वृद्धि को प्राप्त क्षायिक रूप से परिणत है अभिनिवेश-सम्यग्दर्शन जिसका ऐसा वह आत्मा है। इस कथन से दर्शनाराधना का निरूपण किया है। इस प्रकार से इन चार आराधनाओं से ही मोक्षमार्ग बन सकता है क्योंकि १सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र ही मोक्षमार्ग है, ऐसा सूत्रकार का वचन है।
प्रश्न-सूत्र में रत्नत्रय को मोक्षमार्ग कहा है और आपने यहाँ पर आराधना चतुष्टय को मोक्षमार्ग प्रतिपादित किया है, इसलिए विरोध आता है ?
उत्तर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि तप चारित्र में अंतर्भूत हो जाता है अत: वैसा प्रतिपादन संभव है। चारित्र ही कर्मनिर्जरा में हेतु होने से तपरूप से प्रतिपादित किया जाता है। वास्तव में चारित्र को छोड़कर तप नहीं है अन्यथा वह मोक्ष का कारण नहीं हो सकता है। बहिरंग तपश्चरण रत्नत्रय का साधन है और अंतरंग तपश्चरण तो चारित्रविशेषरूप है अतएव शास्त्र में उसका पृथक् निर्देश नहीं किया है।
प्रश्न-क्या करके विवृद्ध अभिनिवेश उत्पन्न होता है ?
[उत्तर-जीवादि द्रव्यों को अनुयुक्त करके-पूछ करके उत्पन्न होता है। ‘द्रवति द्रोष्यति अदुदु्रवत् इति द्रव्यं’ जो द्रवित होता है-परिणत होता है, होवेगा और होता था, वह द्रव्य है अथवा गुणपर्यय वाला द्रव्य है। इस द्रव्यलक्षण से लक्षित जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल इन नाम वाले जीवादि द्रव्य होते हैं। निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान इन छह अनुयोगों से- प्रश्नों से तथा सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अंतर, भाव और अल्पबहुत्व इन आठ भेदों को प्राप्त हुए प्रश्नों से जीवादि द्रव्यों को जानना चाहिए।
उसी का स्पष्टीकरण करते हैं-
(निर्देश आदि का लक्षण)
क्या है ? ऐसा प्रश्न होने पर वस्तु के स्वरूप का कथन करना निर्देश है, जैसे-चेतना लक्षण वाला जीव है।
किसका है ? ऐसा पूछने पर ‘अपना है’ इस आधिपत्य का कथन करना स्वामित्व है।
किनके द्वारा ? ऐसा प्रश्न होने पर ‘अपने द्वारा’ इस प्रकार से करण का निरूपण करना साधन है।
किसमें ? ऐसा प्रश्न होने पर ‘अपने में’ ऐसे आधार का प्रतिपादन करना अधिकरण है।
कितने काल तक ? ऐसा प्रश्न होने पर ‘अनंत काल पर्यंत’ ऐसे काल का प्ररूपण करना स्थिति है।
कितने प्रकार ? ऐसा प्रश्न होने पर जीव चैतन्य सामान्य से एक प्रकार का है इस प्रकार से प्रकार का कथन करना विधान है।
इस प्रकार से निर्देश आदि छह अनुयोगों का व्याख्यान किया है। मध्यम रुचि वाले शिष्यों के अभिप्राय के निमित्त से ये अनुयोग संभव होते हैं। विस्तार रुचि वाले शिष्यों के अभिप्राय से पुन: सत् आदि का व्याख्यान करते हैं।
(सत् आदि का लक्षण)
उनमें द्रव्य पर्याय, सामान्य, विशेष और उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य में जो व्यापक है वह सत् है, ऐसा कथन करना सत् का प्ररूपण है, जैसे जीव हैं, मिथ्यादृष्टि हैं, सासादन सम्यग्दृष्टि हैं, सम्यग्मिथ्यादृष्टि हैं, असंयतसम्यग्दृष्टि हैं, देशसंयत हैं, प्रमत्तसंयत हैं, अप्रमत्तसंयत हैं, अपूर्वकरणसंयत हैं, अनिवृत्तिकरण बादरसांपराय संयत हैं, सूक्ष्मसांपराय संयत हैं, उपशांतकषाय छद्मस्थ वीतरागी हैं, क्षीणकषाय छद्मस्थ वीतरागी हैं, सयोगीकेवली हैं, अयोगीकेवली हैं और शुद्धात्मा सिद्ध हैं इत्यादि।
भेद की गणना करना संख्या है। जैसे जीव अनंतानंत हैं, मिथ्यादृष्टि अनंतानंत हैं इत्यादि।
वर्तमान के निवास को क्षेत्र कहते हैं। जैसे जीवों का क्षेत्र लोक के असंख्यातवें भाग है, संख्यातवें भाग है अथवा सर्वलोक है इत्यादि। उसी त्रिकालविषयक निवास को स्पर्शन कहते हैं। जैसे जीव का सर्वलोक आदि स्पर्श है। उतने काल रहने को काल कहते हैं। जैसे गुणस्थान का आयामकाल अंतर्मुहूर्त आदि है।
विवक्षित गुणस्थान को छोड़कर गुणस्थानांतर को प्राप्त हुए को, पुन: उस गुणस्थान की प्राप्ति जितने काल में होती है उतना काल अंतर कहलाता है, इसे विरहकाल भी कहते हैं, यह अंतर्मुहूर्त आदि के प्रमाण से होता है।
आत्मा के परिणाम को भाव कहते हैं। ये औदयिक आदि हैं।
परस्पर में संख्या की विशेषता को अल्पबहुत्व कहते हैं। ये सत् आदि आठ अनुयोग कहलाते हैं।
पूर्व में इनका न्यास करके अर्थात् अर्थ स्वभाव, वचन स्वभाव और ज्ञानस्वभाव वाले भेद व्यवहार को पूर्व में करके। उनमें से अर्थस्वभाव वाले के भेद द्रव्य और भाव ऐसे दो होते हैं क्योंकि ये अर्थ के धर्म हैं। वचनात्मक नाम व्यवहार है और ज्ञानस्वरूप स्थापना व्यवहार है क्योंकि वह संकल्परूप है अर्थात् नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव ये चार निक्षेप होते हैं। इनमें से नाम निक्षेप वचनस्वरूप है, स्थापनानिक्षेप ज्ञानस्वरूप है और द्रव्य तथा भावनिक्षेप अर्थस्वरूप हैं। इनसे भी जीवादि पदार्थों का ज्ञान होता है। ये श्रुतार्पित-श्रुत-अनेकांत से विकल्पित हैं। ये चारों निक्षेप नय के अनुगत हैं अर्थात् नयों का-द्रव्य पर्याय रूप विषयों का अनुसरण करने वाले हैं और ये भेद के वेदन में-मुख्य गौणरूप विशेष के निर्णय में उपायभूत हैं-कारण हैं।
इन कारण भेदों से द्रव्य, क्षेत्र, काल भाव से विवक्षित धर्मों का विचार करके अर्थात् अनेकांतात्मक वस्तु के जो अस्तित्वादि अनंत धर्म हैं और व्यावहारिक हैं-हान, उपादान आदि प्रयोजन वाले हैं, उनको ज्ञाता के अभिप्रायरूप नयों के द्वारा प्रमेयरूप जीवादि पदार्थों को पहले जान करके। वे अर्थ अनेकांतात्मक हैं, अनेक अंत-सहभावी और क्रमभावी धर्म जिसमें पाये जाते हैं वह अनेकांत कहलाता है। उन अनेकांतात्मक जीवादि पदार्थों को श्रुत से-स्याद्वाद से जान करके श्रद्धान करते हैं क्योंकि ‘अनेकांत को प्रमाण से१’ जाना जाता है ऐसा वचन है। यहाँ पर संक्षेप रुचि वाले शिष्यों के अभिप्राय के निमित्त से यह कहा गया है। यहाँ पर अभिप्राय यह हुआ है कि-
अनेकांतात्मक जीवादि पदार्थ उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य युक्त सत् हैं इत्यादि को आगम से निश्चित करके पुन: संक्षेप रूप वाले ज्ञाता उन धर्मों की व्यवहार के लिए नैगम आदि नयों से परीक्षा करते हैं क्योंकि उनको उतने से ही तत्त्वों का बोध होना संभव है। पुन: मध्यम रुचि वाले शिष्य विशेष को जानने के लिए उपायभूत ऐसे नाम आदि निक्षेपों से अर्थ, वचन और ज्ञानरूप भेदों का न्यास करके-कथन करके निर्देश, स्वामित्व आदि अनुयोगों से प्रश्न करते हैं, समझते हैं क्योंकि उन लोगों को उतने विस्तार की आकांक्षा है तथा विस्तार रुचि वाले शिष्य जीवादि द्रव्यों में से प्रत्येक को सत्, संख्या, क्षेत्र आदि अनुयोगों से प्रश्न करके-समझ करके गुणस्थान, जीवसमास, पर्याप्ति आदि भेदों से तत्त्व को जानते हैं।
इससे विशुद्ध अधिगम सम्यग्दर्शन से सहित होते हुए जीव शुक्लध्यानरूपी अंतरंग तप से संपूर्ण कर्मों का निर्मूलन करके विमुक्त होते हुए उस ज्ञान के फलरूप सुख का अनुभव करते हैं।
प्रश्न-इस प्रकार से प्रमाण, नय और निर्देश आदि का स्वरूप तो जान लिया गया है, निक्षेप क्या हैं ? सो अब प्रतिपादित कीजिए ?
उत्तर-जो जानने के लिए उपायभूत हैं वे निक्षेप कहलाते हैं, वे चार हैं-नाम निक्षेप, स्थापना निक्षेप, द्रव्य निक्षेप और भावनिक्षेप। उनमें से जाति, द्रव्य, गुण और क्रिया यह नाम हैं, जैसे-प्रतीहार इत्यादि। एक जीव अनेक जीव नाम जैसे (कावड़ी को ढ़ोने वाला कहार) काकावलिकावाही हार इत्यादि, अनेक जीव एक जीव नाम जैसे-आंदोलक इत्यादि। अनेक जीव अजीव नाम, जैसे-नगर इत्यादि। नाम को प्राप्त हुए द्रव्य में वह यह है, इस प्रकार के संकल्प से व्यवस्थापित की गई स्थापना है। उसके दो भेद हैं-सद्भाव स्थापना और असद्भाव स्थापना। उनमें मुख्यद्रव्य की आकृति को सद्भाव स्थापना कहते हैं जैसे-अर्हत्प्रतिमा आदि। तदाकार से शून्य असद्भाव स्थापना है जैसे-कौड़ी आदि में किसी की स्थापना करना आदि।
द्रव्यनिक्षेप के भी दो भेद हैं-आगम और नोआगम। उनमें से जो जीवादि के विषयक शास्त्र का ज्ञाता है किन्तु चिरकाल से दूसरों को प्रतिपादन आदि के उपयोग से रहित है ऐसा श्रुतज्ञानी आगमद्रव्य है। नोआगमद्रव्य के तीन भेद हैं-ज्ञायकशरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त। उसमें जीवादि प्राभृत के ज्ञाता के शरीर के भी तीन भेद हैं-भूत, भविष्यत् और वर्तमान। भूत शरीर के भी तीन भेद हैं-च्युत, च्यावित और त्यक्त। उसमें समाधिमरण से छूटे हुए शरीर को त्यक्त कहते हैं। उसके भी तीन भेद हैं-प्रायोपगमन, इंगिनी और भक्तप्रत्याख्यान।
अपने आयु के पूर्ण होने के निमित्त से छूटा हुआ शरीर च्युत कहलाता है। वेदना आदि के निमित्त से आयु के खंडित हो जाने से छूटा हुआ शरीर च्यावित कहलाता है।
नोआगमद्रव्य के भावी भेद को कहते हैं-गत्यंतर में स्थित हुआ जीव जो मनुष्यत्व आदि के अभिमुख है उसे भावी कहते हैं। कर्म और नोकर्म के भेद से तद्व्यतिरिक्त के भी दो भेद हैं। उसमें आत्मा को परतंत्रता के निमित्त से जो ज्ञानावरण आदि आठ प्रकार का कर्म है वह कर्मतद्व्यतिरिक्त है। तीन शरीर और छह पर्याप्ति के योग्य पुद्गल परिणाम नोकर्म तद्व्यतिरिक्त है अर्थात् औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये पाँच शरीर हैं इनमें से आदि के तीन शरीर के योग्य पुद्गल वर्गणाएं ही नोकर्म हैं। औदारिक, वैक्रियिक और आहारक में तैजस का अंतर्भाव हो जाता है और विग्रहगति में कार्मण शरीर अंतर्भूत होता है।
भावनिक्षेप के भी आगम और नोआगम की अपेक्षा दो भेद हैं। उसमें जीवादिप्राभृत का ज्ञाता, जो कि उसमें उपयुक्त हुआ श्रुतज्ञानी है, वह आगमभाव जीव है। विवक्षित पर्याय से परिणत हुआ नोआगम जीव है।
प्रश्न-निक्षेप के अभाव में भी केवल प्रमाण और नयों में तत्त्वार्थ का स्वरूप जाना ही जाता है ?
उतर-ऐसा नहीं कहना, क्योंकि ये निक्षेप अप्रकृत को निराकरण करने के लिए होते हैं और प्रकृत का प्ररूपण करने के लिए होते हैं। नामादि के अप्रकृत में प्रमाण और नय से जाने गये पदार्थ व्यवहार के लिए समर्थ नहीं होते हैं क्योंकि मुख्य और उपचार के विभाग से ही उनकी सिद्धि होती है और नामादि निक्षेपों के बिना वह मुख्य-उपचार रूप विभाग संभव नहीं है कि जिससे उनके अभाव में भी तत्त्वों का बोध हो सके अर्थात् निक्षेप के बिना भी तत्त्वों का बोध नहीं हो सकता है।
विशेषार्थ-यहाँ पर आचार्य ने चार आराधना के फल को बतलाया है। तब प्रश्न यह हो गया है कि सूत्रकारों ने रत्नत्रय को ही मोक्ष का मार्ग कहा है और चार आराधनाओं से मोक्षफल प्राप्ति का संकेत किया है, यह क्या बात है ? इस पर टीकाकार ने समाधान कर दिया है कि जहाँ रत्नत्रय को मोक्षमार्ग कहा है वहाँ पर चारित्र में ही तप आराधना गर्भित है और जहाँ चार आराधना को मोक्षमार्ग कहा है वहाँ केवल भेद विवक्षा ही है।
पुन: सम्यक्त्व के विषयभूत जीवादि पदार्थों को जानने के लिए जो उपाय है, उनका स्पष्टीकरण किया है। उनमें सबसे प्रथम निर्देश, स्वामित्व आदि छह अनुयोगों को बताया है अनंतर सत्, संख्या, क्षेत्र आदि आठ अनुयोगों को स्पष्ट किया है क्योंकि मध्यम रुचि वाले शिष्यों के लिए निर्देश आदि छह प्रकार हैं, विस्तार रुचि वालों के लिए सत् आदि आठ प्रकार हैं। इसके बाद चार निक्षेपों से पदार्थों को जानने का उपदेश दिया है और प्रमाण तथा नयों से भी समझने को कहा है। यह संक्षेप रुचि वालों के लिए उपाय है। यहाँ पर उन चार निक्षेपों के प्रभेदों का अच्छा स्पष्टीकरण है। प्रश्न यह होता है कि संक्षेप रुचि वाले शिष्य प्रमाण और नयों से ही पदार्थों को समझ लेते हैं पुन: निक्षेपों की क्या आवश्यकता है ? इस पर आचार्य ने कहा है कि बिना निक्षेप के मुख्य और उपचार की व्यवस्था असंभव है तथा प्रकृत का प्ररूपण और अप्रकृत का निराकरण यह भी निक्षेप से ही होता है।
🏠
भव्य: पंचगुरून् तपोभिरमलैराराध्य बुध्वाऽऽगमं।
तेभ्योऽभ्यस्य तदर्थमर्थविषयाच्छब्दादपभ्रंशत:॥
दूरीभूततरात्मकादधिगतो बोद्धाऽऽकलंकं पदं।
लोकालोककलावलोकनबलप्रज्ञो जिन: स्यात् स्वयं ॥5॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[भव्य:] भव्य जीव [अमलै: तपोभि:] निर्दोष तपश्चरण से [पंचगुरुन् आराध्य] पंच परम गुरुओं की आराधना करके, [आगमं बुद्ध्वा] आगम को जानकर, [तेभ्य: तदर्र्थं अभ्यस्य] उन गुरुओं से उस आगम के अर्थ का पुन:-पुन: अभ्यास करके [दूरी भूततरात्मकात्] दूरी भूततररूप [अर्थविषयात्] अर्थ को विषय करने वाले [अपभ्रंशत:] अपभ्रंश शब्दों से [आकलंकं पदं] निर्दोष-आर्हंत्यपद को [अधिगत: बोद्धा] प्राप्त हुआ ज्ञाता [लोकालोककलावलोकनबलप्रज्ञ:] लोक-अलोक के विभाग के अवलोकन में शक्ति और प्रकृष्ट ज्ञान से सहित हुआ [स्वयं] स्वयं ही [जिन:] ‘जिन’ [स्यात्] हो जाता है॥५॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-जो मोक्ष के हेतुभूत रत्नत्रयरूप से होगा-परिणमन करेगा, वह भव्य है क्योंकि अभव्य को मुक्ति में अधिकार ही नहीं है। ऐसा भव्य जीव षट्द्रव्य के समुदायरूप लोक और उसके बाहर केवल आकाशरूप अलोक, इन दोनों की कला-विभाग अथवा लोक, अलोक तथा कला-जीवादि पदार्थ इनके अवलोकन में बल-शक्ति और प्रज्ञा-प्रकृष्ट ज्ञान है जिनके, ऐसा लोकालोक की कला को जानने की शक्ति और ज्ञान से सहित हुआ स्वयं-इंद्रियादि की सहायता के बिना अपने आत्मा के द्वारा, अकलंकों का जो पद है-आर्हंत्यपद है उसको प्राप्त होता हुआ जिन हो जाता है।
प्रश्न-मुक्ति में जीव के ज्ञान का अभाव है, क्योंकि जीव ज्ञान स्वभाव से रहित है ?
उत्तर-नहीं, मुक्ति में भी वह जीव बोद्धा है, ज्ञान स्वभाव वाला होने से जानने वाला है।
प्रश्न-पूर्व में क्या करके जानता है ?
उत्तर-पहले पंचपरमगुरु के निमित्त से अवधिभूत शब्द से-वर्ण, पद, वाक्यात्मक प्रयोग से जो अर्थ को-जीवादि वस्तु को विषय करने वाला है उन शब्दों से उस आगम को पढ़ करके और जान करके पुन: उस आगम के अर्थरूप जीवादि वस्तु का अभ्यास करके पुन:-पुन: भाषित करके-यहाँ शब्द से अर्थ को जानने के कथन से बौद्ध के कथन का निरसन किया है अर्थात् बौद्ध कहता है कि शब्द का विषय अन्यापोह है, यहाँ उसका निराकरण हो जाता है क्योंकि शब्द की अन्यापोह में प्रवृत्ति नहीं होती है।
प्रश्न-पुन: वे शब्द कैसे हैं ?
उत्तर-अपभ्रंश रूप हैं, भ्रंश-लक्षणदोष-व्याकरण के दोष से अप-रहित हैं। इस कथन से ‘यो जागार’ इत्यादि वाक्यों की अप्रमाणता का प्रतिपादन किया है।
प्रश्न-पुन: क्या करके वे ज्ञाता होते हैं ?
उत्तर-पूर्व में मिथ्यात्वादि मल दोषों से रहित, इच्छा निरोधरूप बाह्याभ्यंतर तपश्चरणों से अर्हंत, सिद्ध आदि पंच परमेष्ठियों की आराधना करके ऐसे ज्ञानी होते हैं क्योंकि पंचपरमगुरु के चरण ही परम मंगल स्वरूप हैं। उनके गुण समूह का अनुस्मरण शास्त्र की परिसमाप्ति में सफलीभूत है। इस प्रकार से यहाँ परमागम के अभ्यास से स्वार्थ संपत्ति का कथन किया गया है।
🏠
प्रवचनपदान्यभ्यस्यार्थांस्तत: परिनिष्ठिता-।
नसकृदवबुद्ध्येद्धाद्बोधाद्बुधो हतसंशय:॥
भगवदकलंकानां स्थानं सुखेन समाश्रित:।
कथयतु शिवं पंथानं व: पदस्य महात्मनां॥6॥
अन्वयार्थ : अन्वयार्थ-[प्रवचनपदानि] प्रवचन के पदों का [अभ्यस्य] अभ्यास करके [तत: परिनिष्ठितान् अर्थान्] उसमें व्यवस्थित अर्थों को [असकृत्] पुन:-पुन: [अवबुध्य] निश्चित करके [हतसंशय:] संशयादि दोषों से रहित [इद्धात् बोधात्] उज्ज्वल बोध से युक्त [बुध:] ज्ञानी [भगवदकलंकानां] भगवान् अकलंक- अर्हंतदेव के [स्थानं समाश्रित:] स्थान को प्राप्त हुए हैं, वे [महात्मनां] सिद्ध आत्माओं के [पदस्य] पद के [शिवं पंथानं] कल्याणकारी मार्ग को [व:] आप लोगों के लिए [सुखेन] तालु आदि के व्यापार के क्लेश से रहित सुखपूर्वक [कथयतु] प्रतिपादित करें॥६॥
अभयचन्द्रसूरि :
तात्पर्यवृत्ति-बुध-ज्ञानी महात्मा के-संसारी से अतिरिक्त सिद्धात्माओं के पद के शिवमार्ग को-मोक्ष की प्राप्ति के उपाय को आप सभी शिष्यों के लिए प्रतिपादित करें। कैसे प्रतिपादित करें ? सुख से-तालु, ओष्ठपुट, व्यापार के क्लेश के अभाव से। कैसे होते हुए ? त्रिलोक में पूजा के योग्य और दोष-आवरणरूप कलंक से रहित अकलंक हैं ऐसे भगवान् अर्हंतदेव के स्थान को जो प्राप्त हो चुके हैं, न कि क्षणिक स्थान को क्योंकि वहाँ पर उपदेश का अभाव है।
वे कैसे होते हुए इस स्थान को प्राप्त हुए हैं ? संशयरहित होते हुए-यहाँ यह संशय शब्द उपलक्षण मात्र है इसलिए नष्ट हो गये हैं संशय आदि दोष जिनके ऐसे होते हुए। क्या करके नष्ट हुए हैं ? उन प्रवचन पदों में व्यवस्थित जीवादि पदार्थों को ज्ञान से पुन:-पुन: निश्चित करके-ध्या करके। वह ज्ञान कैसा है ? इद्ध-उज्ज्वल है-संकर व्यतिकर से रहित है, मैं-मैं इस रूप प्रकाशमान है।
क्या करके निश्चित करते हैं ? उन प्रवचन पदों का अभ्यास करके पुन:-पुन: उपयोग करके। वे प्रवचनपद कैसे हैं ? प्रकृष्ट पूर्वापर विरोध रहित वचन प्रवचन हैं अथवा प्रकृष्ट पुरुष के वचन प्रवचन हैं, उस प्रवचन के पद ‘सम्यग्दर्शन’ आदि अथवा ‘णमो अरिहंताणं’ इत्यादि हैं।
परमागम के अभ्यास से श्रुतज्ञानरूप परिणत होते हुए, पुन: शुक्लध्यानरूपी अग्नि से दग्ध कर दिया द्रव्य कलंक और भाव कलंक को जिसने ऐसे भगवान सर्वज्ञ अवस्था को प्राप्त हुए हैं वे पर के लिए मोक्षमार्ग के उपदेश में चेष्टा करें-प्रयत्न करें, ऐसा श्रीमान् भट्टाकलंक देव का अभिप्राय है।
भावार्थ-यहाँ पर आचार्यदेव ने प्रवचन के अभ्यास की महत्ता को स्पष्ट किया है। वास्तव में जिनागम के अभ्यास से ही भव्य जीव ज्ञान और वैराग्य शक्ति से अपने आत्मबल को बढ़ा लेते हैं और पुन: दुद्र्धर तपश्चरण आदि का अनुष्ठान करते हुए एकाग्रचिन्तानिरोधरूप ध्यान से परिणत होकर घातिया कर्मों का नाश करके अर्हंत अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं पुन: वे ही हितोपदेशी, वीतरागी और सर्वज्ञ भगवान तीर्थंकर महापुरुष भव्य जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देते हुए असंख्यातों जीवों को संसार समुद्र से पार करने में समर्थ हो जाते हैं। ऐसा परमागम का उपदेश सदैव हमें मोक्षमार्ग का प्रकाश करता रहे।
🏠
नाभ्यासस्तादृगस्ति प्रवचनविषयो नैव बुद्धिश्च तादृक।
नोपाध्यायोऽपि शिक्षानियमनसमयस्तादृशोऽस्तीह काले॥
विंâत्वेतन्मे मुनींदुव्रतिपतिचरणाराधनोपात्तपुण्यं।
श्रीमद्भट्टाकलंकप्रकरणविवृतावस्ति सामथ्र्यहेतु:॥1॥
माऽयं मदांध इति चेतसि कोपमाधु-।
र्माधुर्यमेव वहते सुधियां मदुक्ति:॥
किं कामिनीजनमदोत्कटचाटुवाणी।
प्राणेश्वरस्य रसनाटकनर्तकी न॥2॥
तथाऽप्येतत्परीक्षंतां। मदुक्तम् मत्सरोज्झिता:॥
हीनाधिकमभिव्यक्तु। मेते हि निकषोपमा:॥3॥
विरुद्धं दर्शनं यस्य। निह्नवस्तस्य विंâकर:।
तेजोभिर्दुर्निरीक्ष्यं किं। घूकशूकोऽर्वâमृच्छति॥4॥
-अंतिम आशीर्वाद:-
भद्रमस्तु जिनशासनश्रिये। श्रायसैकपदकार्यजन्मने॥
जन्मजन्मकृततापलोपन-। प्रायशुद्धनिजतत्त्ववित्तये॥1॥
अन्वयार्थ : [अर्थ]-न तो मेरा वैसा प्रवचनविषयक अभ्यास है और न वैसी मुझमें बुद्धि है, न इस पंचमकाल में नियमितरूप से आगम की शिक्षा देने वाले उपाध्याय ही हैं किन्तु फिर भी जो मुनीन्दु व्रतियों के स्वामी हैं उनके चरणों की आराधना से उपार्जित किया हुआ ही यह पुण्य है कि जो श्रीमान् भट्टाकलंकदेव के इस लघीयस्त्रय प्रकरण की विवृत्ति-वृत्तिरूप टीका के करने में समर्थवान हेतु है॥१॥
[अर्थ]-‘यह मदांध है’ इस प्रकार से चित्त में क्रोध को मत कीजिए क्योंकि मेरे वचन विद्वानजनों में मधुरता को ही धारण करते हैं। क्या कामिनी स्त्रियों के मद से उत्कट हुए चाटुकर वचन उनके पतिदेव के रस नाटक को नर्तन कराने वाले नहीं होते हैं॥२॥
[भावार्थ]-जैसे स्त्रियों के प्रिय वचन उनके पतिदेवों को मधुर लगते हैं वैसे ही मेरे ये टीका में कहे गये वचन भी विद्वानों को मधुर लगेंगे।
[अर्थ]-फिर भी मत्सरभाव से रहित बुधजन इन मेरे वचनों की परीक्षा करें क्योंकि ये हीनाधिक को प्रगट करने के लिए कसौटी के पत्थर के समान हैं॥३॥
[भावार्थ]-श्री अभयचंद्राचार्य कहते हैं कि जिनके हृदय में मत्सर, ईष्र्या आदि भाव नहीं हैं ऐसे बहुश्रुतज्ञानी इस मेरे ग्रंथ की समीक्षा करें क्योंकि जैसे कसौटी का पत्थर इस सुवर्ण में कितने अंश में अन्य धातु का मिश्रण है या नहीं है इस बात को स्पष्ट बता देता है ऐसे ही यह मेरा ग्रंथ भी हीनाधिक दोषों को स्पष्ट कर देता है अर्थात् यह ग्रंथ हीनाधिक दोषों से रहित, निर्दोष, सरल और संक्षिप्त है और न्याय के क्लिष्ट विषय का प्रतिपादन करने वाला होते हुए भी इसकी सुंदर कथन शैली से विषय मधुर बन गया है।
[अर्थ]-जिनका दर्शन-सिद्धांत विरुद्ध है, निन्हव उनका किंकर है, क्या किरणों से दुर्निरीक्ष्य जिसको देखना कठिन है ऐसे सूर्य को उल्लू का बालक देख सकता है ?॥४॥
[भावार्थ]-जिनका मत स्याद्वाद से विपरीत एकांतरूप है उनका नौकर निन्हव है अर्थात् वे हमेशा सच्चे तत्त्वों का अपलाप किया करते हैं, सो ठीक ही है क्योंकि उल्लू के बच्चे को संख्यातों किरणों से व्याप्त ऐसा तेजस्वी सूर्य नहीं दिख सकता है वैसे ही नयरूपी संख्यातों किरणों से व्याप्त ऐसे स्याद्वादरूपी सूर्य का दर्शन वे एकांतवादी लोग नहीं कर सकते हैं। इस कथन से यहाँ पर अनेकांत की दुर्लभता को बतलाया है।
इस प्रकार से श्री अभयचंद्रसूरिकृत लघीयस्त्रय की स्याद्वादभूषण नामक तात्पर्यवृत्ति टीका में निक्षेप का प्ररूपण करने वाला सप्तम परिच्छेद पूर्ण हुआ।
प्रवचनप्रवेश नामक तृतीय महा अधिकार पूर्ण हुआ।
इस प्रकार से श्री भट्टाकलंकदेव रूपी चंद्रमा से अनुस्मृत लघीयस्त्रय नामक प्रकरण समाप्त हुआ है।
[अंतिम आशीर्वाद]
[श्लोकार्थ]-जन्म-जन्म में किये हुए ताप का लोप करने में प्राय: शुद्ध निजतत्त्व के ज्ञान स्वरूप, मोक्षरूप एक अद्वितीय पद उस पदस्वरूप कार्य को उत्पन्न करने वाली ऐसी जो जिनशासनरूपी लक्ष्मी है उसके लिए भद्र-कल्याण होवे॥१॥
[भावार्थ]-जो जिनशासन भव्यजीवों के जन्म-जन्म के संताप को दूर करने में समर्थ ऐसे शुद्ध आत्मा तत्त्व का बोध कराने वाला है और जो मोक्ष को प्रदान करने वाला है उस जिनशासन का सदा ही कल्याण होवे अथवा वह सदैव हितस्वरूप होता हुआ जयशील रहे।
🏠