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समयसार-नाटक
























- 05_समयसार-नाटक



nikkyjain@gmail.com
Date : 17-Nov-2022

Index


अधिकार

जीव-द्वार अजीव-द्वार कर्ता-कर्म पुण्य-पाप एकत्व







Index


गाथा / सूत्रविषय
1-01) मंगलाचरण
1-04) श्रो सिद्धस्तुति
1-05) श्री साधुस्तुति
1-09) मिथ्यादृष्टि का लक्षण
1-11) कविस्वरूप वर्णन
1-12) कविलघुता वर्णन
1-14) भगवान की भक्तिसे हमें बुद्धिबल प्राप्त
1-15) नाटक समयसारकी महिमा वर्णन
1-16) अनुभवका वर्णन
1-17) अनुभव का लक्षण
1-18) अनुभव की महिमा
1-20) जीव द्रव्य का स्वरूप
1-21) पुद्गल द्रव्य का लक्षण
1-22) धर्म द्रव्य का लक्षण
1-23) अधर्म द्रव्य का लक्षण
1-24) आकाश द्रव्य का लक्षण
1-25) काल द्रव्य का लक्षण
1-26) जीव का वर्णन
1-27) अजीव का वर्णन
1-28) पुण्य का वर्णन
1-29) पाप का वर्णन
1-30) आस्रव का वर्णन
1-31) संवर का वर्णन
1-32) निर्जरा वर्णन
1-33) बंध का वर्णन
1-34) मोक्ष का वर्णन
1-35) वस्तु के नाम
1-36) शुद्ध जीवद्रव्य के नाम
1-37) सामान्यतः: जीवद्रव्य के नाम
1-38) आकाश के नाम
1-39) काल के नाम
1-40) पुण्य के नाम
1-41) पाप के नाम
1-42) मोक्ष के नाम
1-43) बुद्धि के नाम
1-44) विचक्षण पुरुष के नाम
1-46) मुनीश्वर के नाम
1-47) दर्शन के नाम
1-48) ज्ञान और चारित्र के नाम
1-49) सत्य के नाम
1-50) झूठ के नाम
1-51) नाटक समयसार के बारह अधिकार

जीव-द्वार

2-01) चिदानंद भगवान की स्तुति
2-02) सिद्ध भगवान की स्तुति
2-03) जिनवाणी की स्तुति
2-04) कवि व्यवस्था
2-05) शास्त्र का माहात्म्य
2-06) निश्चयनय की प्रधानता
2-07) सम्यग्दर्शन का स्वरूप
2-08) जीव की दशा पर अग्नि का दृष्टांत
2-09) जीव की दशा पर सोने का द्रष्टांत
2-10) अनुभव की दशा का सूर्य का दृष्टांत
2-11) शुद्धनय से जीव का स्वरूप
2-12) हितोपदेश
2-13) सम्यग्दृष्टि का विलास
2-14) गुण-गुणी अभेद
2-15) ज्ञानी का चिंतन
2-17) भेद-विवक्षा
2-19) निश्चयनय से जीव का स्वरूप
2-20) शुद्ध निश्चयनय से जीव का स्वरूप
2-21) शुद्ध अनुभव की प्रशंसा
2-22) ज्ञाता की अवस्था
2-23) भेदज्ञान की महिमा
2-24) परमार्थ की शिक्षा
2-25) तीर्थंकर के शरीर की स्तुति
2-27) जिनराज का यथार्थ स्वरूप
2-28) पुद्गल और जीव के भिन्न स्वभाव का दृष्टांत
2-29) तीर्थंकर की निश्चय स्तुति
2-30) व्यवहार से जीव और शरीर एक, निश्चय से नहीं
2-31) वस्तुस्वरूप की प्राप्ति का दृष्टांत
2-32) भेदविज्ञान की प्राप्ति का दृष्टांत
2-33) निजात्मा का सत्य स्वरूप
2-34) तत्त्वज्ञानी जीव की अवस्था
2-35) वस्तुस्वभाव की प्राप्ति का द्रष्टांत

अजीव-द्वार

3-01) अजीव अधिकार के वर्णन की प्रतिज्ञा
3-02) मंगलाचरण
3-03) श्रीगुरु की पारमार्थिक शिक्षा
3-04) जीव और पुद्गल के लक्षण
3-05) आत्मज्ञानी के परिणाम
3-06) जड-चेतन की भिन्नता
3-07) देह-जीव भिन्नता का दूसरा दृष्टांत
3-08) जीव-पुद्गल भिन्नता
3-09) देह-जीव भिन्नता का दृष्टांत
3-10) आत्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप
3-11) अनुभव विधान
3-12) मूढ़ स्वभाव
3-13) ज्ञाता का विलास
3-14) भेदविज्ञान का परिणाम

कर्ता-कर्म

4-01) प्रतिज्ञा
4-04) ज्ञानी कर्ता नहीं, मात्र ज्ञाता
4-06) जीव और पुद्गल के जुदे-जुदे लक्षण

पुण्य-पाप एकत्व

5-02) मंगलाचरण




+ मंगलाचरण -
(वर्ण ३१ मनहर छंद. चाल–झंझरानी)
करम-भरम जग-तिमिर-हरन खग,
उरग-लखन-पगसिवमगदरसी ।
निरखत नयन भविक जल बरखत,
हरखत अमितभविकजन-सरसी ॥
मदन-कदन-जित परम-धरमहित,
सुमिरत भगति भगति सब डरसी ।
सजल-जलद-तन मुकुट सपत फन,
कमठ-दलनजिन नमत बनरसी ॥१॥
अन्वयार्थ : जो संसार में कर्म के भ्रमरूप अंधकार को दूर करने के लिये सूर्य के समान हैं, जिनके चरण में सांप का चिह्न है, जो मोक्ष का मार्ग दिखानेवाले हैं, जिनके दर्शन करने से भव्य-जीवों के नेत्रों से आनंद के आँसू बह निकलते हैं और अनेक भव्यरूपी सरोवर प्रसन्न हो जाते हैं, जिन्होंने कामदेव को युद्ध में हरा दिया है, जो उत्कृष्ट जेनधर्म के हितकारी हैं, जिनका स्मरण करने से भक्तजनों के सब डर दूर भागते हैं, जिनका शरीर पानी से भरे हुए मेघ के समान नीला है, जिनका मुकुट सात फण का है, जो कमठ के जीव को असुर पर्याय में परास्त करनेवाले हैं; ऐसे पार्श्वनाथ जिनराज को (पंडित) बनारसीदास जी नमस्कार करते हैं ॥१॥
खग (ख़=आकाश + ग=गमन) = सूर्य ; कदन=युद्ध; सजल=पानी सहित; जलद (जल=पानी+द=देनेवाले) = मेघ ; सपत=सात;

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(छन्द छप्पय, इस छन्दमें सब वर्ण लघु हैं)
सकल-करम-खल-दलन,
कमठ-सठ-पवन कनक-नग ।
धवल परम-पद-रमन,
जगत-जन-अमल-कमल-खग ॥
परमत-जलधर-पवन,
सजल-घन-सम-तन समकर ।
पर-अघ-रजहर जलद,
सकल-जन-नत-भव-भय-हर ॥
जमदलन नरकपद-छयकरन,
अगम अतट भवजलतरन ।
वर-सबल-मदन-वन-हरदहन,
जय जय परम अभयकरन ॥२॥
अन्वयार्थ : जो सम्पूर्ण दुष्टकर्मों को नष्ट करनेवाले हैं, कमठ की वायु के समक्ष मेरु के समान हैं (कमठ के किए उपसर्ग से जो नहीं हिलनेवाले हैं), निर्विकार सिद्धपद में रमण करते हैं, संसारी जीवोंरूप कमलों को प्रफुल्लित करने के लिये सूर्य के समान हैं, मिथ्यामतरूपी मेघों को उड़ा देने के लिये प्रचण्ड वायुरूप हैं, जिनका शरीर पानी से भरे हुए मेघ के समान नील-वर्ण है, जो जीवों को समता देनेवाले हैं, अशुभ कर्मों की धूल धोने के लिये मेघ के समान हैं, सम्पूर्ण जीवों के द्वारा वन्दनीय हैं, जन्म-मरण का भय हरनेवाले हैं, जिन्होंने मृत्यु को जीता है, जो नरक गति से बचानेवाले हैं, जो बड़े और गम्भीर संसार सागर से तारनेवाले हैं, अत्यन्त बलवान कामदेव के वन को जलाने के लिये रुद्र की अग्नि के समान हैं, जो जीवों को बिलकुल निडर बनानेवाले हैं; उन (पार्श्वनाथ भगवान ) की जय हो !! ॥२॥
कनक-नग (कनक=सोना+नग=पहाड़) = सुमेरु; परमत=जैनमत के सिवाय दूसरे सब मिथ्यामत; नत=वंदनीय ; हरदहन=रुद्र की अग्नि

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(सवैया एकत्रीसा)
जिन्हि के वचन उर धारत जुगल नाग,
भए धरनिंद पदुमावति पलकमैं ।
जाकी नाममहिमासौं कुधातु कनक करै,
पारस पखान नामी भयौ हैखलक मैं ॥
जिन्ह की जनमपुरी-नाम के प्रभाव हम,
अपनौ स्वरुप लख्यौ भानुसौ भलक मैं ।
तेई प्रभु पारस महारस के दाता अब,
दीजै मोहि साता द्रगलीला की ललक मैं ॥३॥
अन्वयार्थ : जिनकी वाणी हृदय में धारण करके सांप का जोड़ा क्षणभर में धरणेन्द्र-पद्मावती हुआ, जिनके नाम के प्रताप से जगत में पत्थर भी पारस के नाम से प्रसिद्ध है जो लोहे को सोना बना देता है, जिनकी जन्मभूमि के नाम के प्रभाव से हमने अपना आत्मस्वरूप देखा है -- मानों सूर्य की ज्योति ही प्रगट हुई है; वे अनुभव-रस का स्वाद देनेवाले पार्श्वनाथ जिनराज अपनी प्यारी चितवन से (दृष्टि से) हमें शान्ति देवें ॥३॥
कुधातु=लोहा; पारस पखान=पारस पत्थर; खलक=जगत; भलक=प्रभा; महारस=अनुभव का स्वाद; साता=शान्ति

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+ श्रो सिद्धस्तुति -
(अडिल्ल छंद)
अविनासी अविकार परमरसधाम हैं ।
समाधान सरवंग सहज अभिराम हैं ॥
सुद्ध बुद्ध अविरुद्ध अनादिअनंत हैं ।
जगत शिरोमनि सिद्ध सदा जयवंत हैं ॥४॥
अन्वयार्थ : जो नित्य और निर्विकार हैं, उत्कृष्ट सुख के स्थान हैं, साहजिक शान्ति से सर्वांग सुन्दर हैं, निर्दोष हैं, पूर्ण ज्ञानी हैं, विरोध-रहित हैं, अनादि-अनन्त हैं; वे लोक के शिरोमणि सिद्ध भगवान सदा जयवन्त होवें ॥४॥॥
सरवंग (सर्वांग)=सब आत्मप्रदेश; परमसुख=आत्मीय सुख; अभिराम=प्रिय

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+ श्री साधुस्तुति -
(श्री साधु स्तुति. सवैया एकत्रीसा)
ज्ञानकौ उजागर सहज-सुखसागर,
सुगुन-रतनागर विराग-रस र्भयौ है ।
सरनकी रीति हरै मरनकौ न भै करै,
करनसौंपीठि दे चरन अनुर्सयौ है ॥
धरमकौ मंडन भरम को विहंडन है,
परम नरम ह्व कै करमसौं लर्यो है ।
ऐसौ मुनिराज भुवलोकमैं विराजमान,
निरखि बनारसी नमस्कार कर्यौ है ॥५॥
अन्वयार्थ : जो ज्ञान के प्रकाशक हैं, साहजिक आत्मसुख के समुद्र हैं, सम्यक्त्वादि गुणरत्नों की खान हैं, वैराग्य-रस से परिपूर्ण हैं, किसी का आश्रय नहीं चाहते, मुत्यु से नहीं डरते, इन्द्रिय-विषयों से विरक्त होकर चारित्र पालन करते हैं, जिनसे धर्म की शोभा है, जो मिथ्यात्व का नाश करनेवाले हैं, जो कर्मों के साथ अत्यन्त शान्तिपूर्वक लड़ते हैं; ऐसे साधु महात्मा जो पृथ्वीतलपर शोभायमान हैं उनके दर्शन करके पंडित बनारसीदासजी नमस्कार करते हैं ॥५॥
उजागर=प्रकाशक; रतनागर (रत्नाकर)=मणियों की खान, समुद्र। भें (भय)=डर; करन (करण)=इन्द्रिय; चरन (चरण)=चारित्र; विहंडन=विनाश करनेवाला; नरम=कोमल अर्थात्‌ निष्कषाय; भुव (भू)=पृथ्वी

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(८ भगण)
भेदविज्ञान जग्यौ जिन्हके घट,
सीतल चित भयौ जिम चंदन ।
केलि करै सिव मारगमैं,
जग माहिंजिनेसुरके लघु नंद ॥
सत्यसरूप सदा जिन्हकै,
प्रगटयौ अवदात मिथ्यातनिकंदन ।
सांतदसा तिन्हकी पहिचानि,
करैकर जोरि बनारसि वंदन ॥६॥
अन्वयार्थ : जिनके हृदय में निज-पर का विवेक प्रगट हुआ है, जिनका चित्त चन्दन के समान शीतल है (कषायों का आताप नहीं है), जो निज-पर विवेक होने से मोक्षमार्ग में मौज करते हैं, जो संसार में अरहंतदेव के लघु-पत्र हैं (थोड़े ही काल में अरहंत पद प्राप्त करनेवाले हैं), जिन्हें मिथ्यादर्शन को नष्ट करनेवाला निर्मल सम्यग्दर्शन प्रकट हुआ है; उन सम्यग्हृष्टि जीवों की आनंदमय अवस्था का निश्चय करके पं ० बनारसीदासजी हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं ॥६॥
भेदविज्ञान=निज और पर का विवेक; केलि=मौज, खेल; लघुनंदन=छोटे पुत्र; अवदात=स्वच्छ; मिथ्यात-निकंदन=मिथ्यात्व को नष्ट-करनेवाला

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(सवैया एकत्रीसा)
स्वारथके साचे परमारथके साचे चित,
साचे साचे बैन कहैं साचेजैनमती हैं ।
काहूके विरुद्धि नाहि परजाय-बुद्धि नाहि,
आतमगवेषी न गृहस्थ हैं न जती हैं ॥
सिद्धि रिद्धि वृद्धि दीसे घटमैं प्रगट सदा,
अंतरकी लच्छिसौं अजाची लच्छपती हैं ।
दास भगवन्तके उदास रहैं जगतसौं,
सुखियासदैव ऐसे जीव समकिती हैं ॥७॥
अन्वयार्थ : जिन्हें निज आत्मा का सच्चा ज्ञान है और मोक्ष पदार्थ से सच्चा प्रेम है, जो हृदय के सच्चे हैं और सत्य वचन बोलते हैं तथा सच्चे जैनी हैं, किसी से भी जिनका विरोध नहीं है, शरीर में जिनको अहंबुद्धि नहीं है, आत्म-स्वरूप के खोजक हैं, न अणुव्रती हैं न महाव्रती हैं, जिन्हें सदैव अपने ही हृदय में आत्महित की सिद्धि, आत्मशक्ति की रिद्धि और आत्मगुणों की वृद्धि प्रगट दिखती है, जो अंतरंग-लक्ष्मी से अजाची लक्षपति (सम्पन्न) हैं, जो जिनराज के सेवक हैं, संसार से उदासीन रहते हैं, जो आत्मीय-सुख से सदा आनन्दरूप रहते हैं; ऐसे गुणों के धारक सम्यग्दृष्टि जीव होते हैं ॥७॥
स्वारथ (स्वार्थ स्व=आत्मा+अर्थ=पदार्थ)=आत्मपदार्थ; परमारथ (परमार्थ)=परम अर्थ, मोक्ष; परजाय (पर्याय)=शरीर; लच्छि=लक्ष्मी; अजाची=अयाचक,नहीं माँगनेवाले

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(सवैया एकत्रीसा)
जाकै घट प्रगट विवेक गणधरकौसौ,
हिरदै हरखि महामोहकौं हरतु है ।
साचौ सुख मानै निजमहिमा अडौल जाने,
आपुहीमैं आपनौ सुभाउ ले धरतु हैं ॥
जैसैं जल-कर्दम कतकफल भिन्न करै,
तैसैं जीव अजीवविलछनु करतु है ।
आतम सकति साधै ज्ञानकौ उदौ आराधै,
सोईसमकिती भवसागर तरतु है ॥८॥
अन्वयार्थ : जिसके हृदय में गणधर जैसा निज-पर का विवेक प्रगट हुआ है, जो आत्मानुभव से आनन्दित होकर मिथ्यात्व को नष्ट करता है, जो सच्चे स्वाधीन-सुख को सुख मानता है, जो अपने ज्ञानादि गुणों का अविचल श्रद्धान करता है, जो अपने सम्यग्दर्शनादि स्वभाव को आपही में धारण करता है, जो अनादि के मिले हुए जीव और अजीव का पृथक्करण जल-कर्दम से कतकफल के समान करता है, जो आत्मबल बढ़ाने में उद्योग करता है और ज्ञान का प्रकाश करता है; वही सम्यग्दृष्टि संसार-समुद्र से पार होता है ॥८॥
कर्दम=कीचड़; कतकफल=निर्मली; बिलछनु=पृथक्‌-करण; सकति=शक्ति;

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+ मिथ्यादृष्टि का लक्षण -
(सवैया एकत्रीसा)
धरम न जानत बखानत भरमरूप,
ठौर ठौर ठानत लराई पच्छपातकी ।
भूल्यो अभिमानमैं न पाउ धरै धरनी में,
हिरदै में करनी विचारैउतपातकी ॥
फिरै डांवाडोलसौ करम के कलोलिनि मैं,
व्है रही अवस्था सु बधूलेकैसे पातकी ।
जाकी छाती ताती कारी कुटिल कुवाती भारी,
ऐसौ ब्रह्मघाती है मिथ्याती महापातकी ॥९॥
अन्वयार्थ : जो वस्तुस्वभाव से अनभिज्ञ है, जिसका कथन मिथ्यात्वमय है और एकान्त का पक्ष लेकर जगह-जगह लड़ाई करता है, अपने मिथ्याज्ञान के अहंकार में भूलकर धरती पर पाँव नहीं टिकाता और चित्त में उपद्रव ही सोचता है, कर्म के झकोरों से संसार में डांवाडोल हुआ फिरता है (विश्राम नहीं पाता) सो ऐसी दशा हो रही है जैसे बघरूड़े में पत्ता उड़ता फिरता है, जो हृदय में (क्रोध से) तप्त रहता है, (लोभ से) मलिन रहता है, (माया से) कुटिल रहता है, (मान से) बड़े कुबोल बोलता है; ऐसा आत्मघाती और महापापी मिथ्यात्वी होता है ॥६॥
धरम (धर्म)=वस्तुस्वभाव; उतपात=उपद्रव

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(दोहा)
बंदौ सिव अवगाहना, अरु बंदौ सिव पंथ ।
जसु प्रसाद भाषा करौं, नाटकनाम गरंथ ॥१०॥
अन्वयार्थ : मैं सिद्ध भगवान को और मोक्षमार्ग (रत्नत्रय) को नमस्कार करता हूँ, जिनके प्रसाद से देशभाषा में नाटक समयसार ग्रन्थ रचता हूँ ॥१०॥

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+ कविस्वरूप वर्णन -
((सवैया मत्तगयन्द वर्ण २३))
चेतनरूप अनूप अमूरति, सिद्धसमान सदा पद मेरौ ।१।
मोह महातम आतम अंग, कियौ परसंग महा तम घेरौ ।२।
ज्ञानकला उपजी अब मोहि, कहौं गुन नाटक आगमकेरौ ।
जासु प्रसाद सधै सिवमारग, वेगि मिटै भववासबसेरौ ॥११॥
अन्वयार्थ : मेरा स्वरूप सदैव चैतन्य-स्वरूप उपमा-रहित और निराकार सिद्ध-सदृश है। परन्तु मोह के महा-अन्धकार का संग करने से अन्धा बन रहा था। अब मुझे ज्ञान की ज्योति प्रगट हुई है इसलिये नाटक समयसार ग्रन्थ को कहता हूँ, जिसके प्रसाद से मोक्षमार्ग की सिद्धि होती है और जल्दी संसार का निवास (जन्म-मरण) छूट जाता है ॥११॥
अमूरति (अमूर्ति)=निराकार । परसंग (प्रसंग )=सम्बन्ध

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+ कविलघुता वर्णन -
(छन्द मनहर. वर्ण ३१)
जैसैं कोऊ मूरख महा समुद्र तिरिवेकौं,
भुजानिसौं उद्यतभयौ है तजि नावरौ ।
जैसैं गिरि ऊपर विरखफल तोरिवेकौं,
बावनु पुरुषकोऊ उमगै उतावरौ ।
जैसैं जलकुंडमैं निरखि ससि-प्रतिबिम्ब,
ताके गहिबेकौं कर नीचौ करै टाबरौ ।
तैसैं मैं अलपबुद्धि नाटक आरंभ कीनौ,
गुनी मोहिहसैंगे कहैंगे कोऊ बावरौ ॥१२॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार कोई मूर्ख अपने बाहुबल से बड़ा भारी समुद्र तैरने का प्रयत्न करे, अथवा कोई बौना मनुष्य पहाड़ के वृक्ष में लगे हुए फल को तोड़ने के लिये जल्दी से उछले, जिस प्रकार कोई बालक पानी में पड़े हुए चन्द्रबिम्ब को हाथ से पकड़ता है, उसी प्रकार मुझ मन्दबुद्धि ने नाटक समयसार (काव्य) प्रारम्भ किया है, विद्वान लोग हँसी करेंगे और कहेंगे कि कोई पागल होगा ॥१२॥
विरख (वृक्ष )=पेड़; बावनु (बौना)=बहुत छोटे कद का मनुष्य; टाबरो=बालक; बाबरो=पागल

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(सवैया एकत्रीसा)
जैसैं काहू रतनसौं बींध्यौ है रतन कोऊ,
तामैं सूत रेसमकी डोरी पोई गई है ।
तैसैं बुध टीकाकरि नाटक सुगम कीनौ,
तापरि अलपबुद्धि सूधी परिनई है ॥
जैसैं काहू देसके पुरुष जैसी भाषा कहैं,
तैसी तिनिहुंकेबालकनि सीख लई है ।
तैसैं ज्यौं गरंथकौ अरथ कह्यौ गुरु त्योंहि,
हमारी मति कहिवेकौं सावधान भई है ॥१३॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार हीरा की कनी से किसी रत्न में छेद कर रक्खा हो तो उसमें रेशम का धागा डाल देते हैं, उसी प्रकार विद्वान स्वामी अमृतचन्द्र आचार्य ने टीका करके समयसार को सरल कर दिया है, इससे मुझ अल्पबुद्धि की समझ में आ गया । अथवा जिस प्रकार किसी देश के निवासी जैसी भाषा बोलते हैं वैसी उनके बालक सीख लेते हैं; उसी प्रकार मुझको गुरु-परम्परा से जैसा अर्थज्ञान हुआ है वैसा ही कहने को मेरी बुद्धि तत्पर हुई है ॥१३॥बुध=विद्वान्‌; परिनई (परणई)=हुईं है

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+ भगवान की भक्तिसे हमें बुद्धिबल प्राप्त -
(सवैया एकत्रीसा)
कबहू सुमति व्है कुमतिकौ विनास करै,
कबहू विमल जोति अंतर जगति है ।
कबहू दया व्है चित्त करत दयालरूप,
कबहू सुलालसा व्है लोचन लगति है ॥
कबहू आरती व्है कै प्रभु सनमुख आवै,
कबहू सुभारती व्है बाहरि बगति है ।
धरै दसा जैसी तब करै रीति तैसी ऐसी,
हिरदै हमारै भगवंतकी भगति है ॥१४॥
अन्वयार्थ : हमारे हृदय में भगवान की ऐसी भक्ति है जो कभी तो सुबुद्धि-रूप होकर कुबुद्धि को हटाती है, कभी निर्मल ज्योति होकर ह॒दय में प्रकाश डालती है, कभी दयालु होकर चित्त को दयालु बनाती है, कभी अनुभव की पिपासारूप होकर नेत्रों को थिर करती है, कभी आरतीरूप होकर प्रभु के सन्मुख आती है, कभी सुन्दर वचनों में स्तोत्र बोलती है, जब जैसी अवस्था होती है तब तैसी क्रिया करती है ॥१४॥
सुभारती=सुन्दर वाणी; लालसा=अभिलाषा; लोचन=नेत्र

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+ नाटक समयसारकी महिमा वर्णन -
(सवैया एकत्रीसा)
मोख चलिवेकौ सौन करमकौ करै बौन,
जाके रस-भौन बुध लौन ज्यौं घुलत है ।
गुनको गरन्थ निरगुनकौ सुगम पंथ,
जाकौजसु कहत सुरेश अकुलत है ॥
याहीकै जु पच्छी ते उड़त ज्ञानगगनमैं,
याहीके विपच्छी जगजालमैं रुलत है ।
हाटकसौ विमल विराटकसौ विसतार,
नाटक सुनत हिये फाटक खुलतहै ॥१५॥
अन्वयार्थ : यह नाटक मोक्ष को चलने के लिये सीढ़ी-स्वरूप है, कर्मरूपी विकार का वमन करता है, इसके रसरूप जल में विद्वान लोग नमक के समान लीन हो जाते हैं, यह सम्यग्दर्शनादि गुणों का पिण्ड है, मुक्ति का सरल रास्ता है, इसकी महिमा वर्णन करते हुए इन्द्र भी लज्जित होते हैं, जिन्हें इस ग्रन्थ की पक्षरूप पंख प्राप्त हैं वे ज्ञानरूपी आकाश में विहार करते हैं और जिसको इस ग्रन्थ की पक्षरूप पंख प्राप्त नहीं हैं वह जगत के जंजाल में फँसता है, यह ग्रन्थ शुद्ध सुवर्ण के समान निर्मल है, विष्णु के विराटरूप के सहश विस्तृत है, इस ग्रन्थ के सुनने से हृदय के कपाट खुल जाते हैं ॥१५॥
सौन=सीढ़ी; बौन=वमन; हाटक=सुवर्ण; भौन (भवन)=जल

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+ अनुभवका वर्णन -
(दोहरा)
कहौं शुद्ध निहचै कथा, कहौं शुद्ध विवहार ।
मुकतिपंथकारन कहौंअनुभौको अधिकार ॥१६॥
अन्वयार्थ : शुद्ध निश्चय नय, शुद्ध व्यवहार नय और मुक्तिमार्ग में कारणभूत आत्मानुभव की चर्चा वर्णन करता हूँ ॥१६॥

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+ अनुभव का लक्षण -
(दोहरा)
वस्तु विचारत ध्यावतैं, मन पावै विश्राम ।
रस स्वादत सुख ऊपजै, अनुभौ याकौ नाम ॥१७॥
अन्वयार्थ : आत्मपदार्थ का विचार और ध्यान करने से चित्त को जो शान्ति मिलती है तथा आत्मिक-रस का आस्वादन करने से जो आनन्द मिलता है, उसी को अनुभव कहते हैं ॥१७॥

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+ अनुभव की महिमा -
(दोहरा)
अनुभव चिंतामनिरतन, अनुभव हे रसकूप ।
अनुभव मारग मोखकौ, अनुभव मोख सरूप ॥१८॥
अन्वयार्थ : अनुभव चिंतामणि रत्न है, शान्ति-रस का कुआँ है, मुक्ति का मार्ग है और मुक्ति-स्वरूप है ॥१८॥
चिंतामणि=मनोवांछित पदार्थों का देनेवाला

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(सवैया)
अनुभौके रसकौं रसायन कहत जग,
अनुभौ अभ्यास यहु तीरथ की ठौर है ।
अनुभौ की जो रसा कहावै सोई पोरसा सु,
अनुभौ अधोरसासौं ऊरध की दौर है ॥
अनुभौ की केलि यहै कामधेनु चित्रावेलि,
अनुभौकौ स्वाद पंच अमृत कौ कौर है ।
अनुभौ करम तोरै परमसौं प्रीति जोरै,
अनुभौ समान न धरम कोऊ और है ॥१९॥
अन्वयार्थ : अनुभव के रस को जगत के ज्ञानी लोग रसायन कहते हैं, अनुभव का अभ्यास एक तीर्थ-भूमि है, अनुभव की भूमि सकल पदार्थों की उपजानेवाली है, अनुभव नर्क से निकालकर स्वर्ग-मोक्ष में ले जाता है, इसका आनन्द कामधेनु और चित्रावेलि के समान है, इसका स्वाद पंचामृत भोजन के समान है। यह कर्मों को क्षय करता है और परम-पद से प्रेम जोड़ता है, इसके समान अन्य कोई धर्म नहीं है ॥१६॥
रसा=पृथ्वी; अधोरसा=नरक; पोरसा=उपजाऊ भूमि; चित्रावेलि=एक तरह की जड़ी का नाम

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+ जीव द्रव्य का स्वरूप -
(दोहरा)
चेतनवंत अनंत गुन, परजै सकति अनंत ।
अलख अखंडित सर्वगत, जीव दरव विरतंत ॥२०॥
अन्वयार्थ : चैतन्यरूप है, अनन्त गुण, अनन्त पर्याय और अनन्त-शक्ति सहित है, इंद्रियगोचर नहीं है, अखण्डित है, सर्वव्यापी है। यह जीवद्रव्य का स्वरूप कहा है ॥२०॥अलख=इंद्रियगोचर नहीं है; सर्वगत=सब लोक में फैला

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+ पुद्गल द्रव्य का लक्षण -
(दोहरा)
फरस-वरन-रस-गन्ध मय, नरद-पास-संठान ।
अनुरूपी पुदगल दरव, नभ-प्रदेश-परवान ॥२१॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
फरस-वरन-रस-गन्ध मय, नरद-पास-संठान ।
अनुरूपी पुदगल दरव, नभ-प्रदेश-परवान ॥२१॥

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+ धर्म द्रव्य का लक्षण -
(दोहरा)
जैसैं सलिल समूहमैं, करै मीन गति-कर्म ।
तैसैं पुदगल जीवकौं, चलनसहाई धर्म ॥२२॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जैसैं सलिल समूहमैं, करै मीन गति-कर्म ।
तैसैं पुदगल जीवकौं, चलनसहाई धर्म ॥२२॥

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+ अधर्म द्रव्य का लक्षण -
(दोहरा)
ज्यौं पंथी ग्रीषमस मै, बैठै छायामाँहि ।
त्यौं अधर्म की भूमि मैं, जड़ चेतन ठहराँहि ॥२३॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
ज्यौं पंथी ग्रीषमस मै, बैठै छायामाँहि ।
त्यौं अधर्म की भूमि मैं, जड़ चेतन ठहराँहि ॥२३॥

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+ आकाश द्रव्य का लक्षण -
(दोहरा)
संतत जाके उदरमैं, सकल पदारथवास ।
जो भाजन सब जगत कौ, सोइ दरव अकास ॥२४॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
संतत जाके उदरमैं, सकल पदारथवास ।
जो भाजन सब जगत कौ, सोइ दरव अकास ॥२४॥

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+ काल द्रव्य का लक्षण -
(दोहरा)
जो नवकरि जीरन, करै, सकल वस्तुथिति ठानि ।
परावर्त वर्तन धरै, काल दरव सो जानि ॥२५॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जो नवकरि जीरन, करै, सकल वस्तुथिति ठानि ।
परावर्त वर्तन धरै, काल दरव सो जानि ॥२५॥

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+ जीव का वर्णन -
(दोहरा)
समता रमता उरधता, ज्ञायकता सुखभास ।
वेदकता चैतन्यता, ए सबजीवविलास ॥२६॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
समता रमता उरधता, ग्यायकता सुखभास ।
वेदकता चैतन्यता, ए सबजीवविलास ॥२६॥

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+ अजीव का वर्णन -
(दोहरा)
तनता मनता वचनता, जड़ता जड़सम्मेल ।
लघुता गुरुता गमनता, ये अजीव के खेल ॥२७॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
तनता मनता वचनता, जड़ता जड़सम्मेल ।
लघुता गुरुता गमनता, ये अजीव के खेल ॥२७॥

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+ पुण्य का वर्णन -
(दोहरा)
जो विशुद्धभावनि बंधै, अरु ऊरधमुख होइ ।
जो सुखदायक जगतमैं, पुन्य पदारथ सोइ ॥२८॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जो विशुद्धभावनि बंधै, अरु ऊरधमुख होइ ।
जो सुखदायक जगतमैं, पुन्य पदारथ सोइ ॥२८॥

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+ पाप का वर्णन -
(दोहरा)
संकलेश भावनि बँधै, सहज अधोमुख होइ ।
दुखदायक संसार मैं, पाप पदारथ सोइ ॥२९॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
संकलेश भावनि बँधै, सहज अधोमुख होइ ।
दुखदायक संसार मैं, पाप पदारथ सोइ ॥२९॥

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+ आस्रव का वर्णन -
(दोहरा)
जोई करमउदोत धरि, होइ क्रिया रसरत्त ।
करषै नूतन करमकौं, सोई आस्रव तत्त ॥३०॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जोई करमउदोत धरि, होइ क्रिया रसरत्त ।
करषै नूतन करमकौं, सोई आस्रव तत्त ॥३०॥

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+ संवर का वर्णन -
(दोहरा)
जो उपयोग स्वरूप धरि, वरतै, जोग विरत्त ।
रोकै आवत करमकौं, सो है संवर तत्त ॥३१॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जो उपयोग स्वरूप धरि, वरतै, जोग विरत्त ।
रोकै आवत करमकौं, सो है संवर तत्त ॥३१॥

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+ निर्जरा वर्णन -
(दोहरा)
जो पूरव सत्ता करम, करि थिति पूरन आउ ।
खिरबेकौं उद्यत भयौ, सो निर्जरा लखाउ ॥३२॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जो पूरव सत्ता करम, करि थिति पूरन आउ ।
खिरबेकौं उद्यत भयौ, सो निर्जरा लखाउ ॥३२॥

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+ बंध का वर्णन -
(दोहरा)
जो नवकरम पुरानसौं, मिलैं गांठि दिढ़ होइ ।
सकति बढ़वै बंसकी, बंध पदारथ सोइ ॥३३॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जो नवकरम पुरानसौं, मिलैं गांठि दिढ़ होइ ।
सकति बढ़वै बंसकी, बंध पदारथ सोइ ॥३३॥

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+ मोक्ष का वर्णन -
(दोहरा)
थिति पूरन करि जो करम, खिरै बंधपद भानि ।
हंस अंस उज्जल करै, मोक्ष तत्त्व सो जानि ॥३४॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
थिति पूरन करि जो करम, खिरै बंधपद भानि ।
हंस अंस उज्जल करै, मोक्ष तत्त्व सो जानि ॥३४॥

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+ वस्तु के नाम -
(दोहरा)
भाव पदारथ समय धन, तत्त्व चित्त वसु दर्व ।
द्रविन अरथ इत्यादि बहु, वस्तु नाम ये सर्व ॥३५॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
भाव पदारथ समय धन, तत्त्व चित्त वसु दर्व ।
द्रविन अरथ इत्यादि बहु, वस्तु नाम ये सर्व ॥३५॥

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+ शुद्ध जीवद्रव्य के नाम -
(सवैया एकत्रीसा)
परमपुरुष परमेसुर परमज्योति,
परब्रह्म पूरन परम परधान है ।
अनादि अनंत अविगत अविनाशी अज,
निरदुंद मुक्त मुकुंद अमलान है ॥
निराबाध निगम निरंजन निरविकार,
निराकार संसारसिरोमनि सुजान है ।
सरवदरसी सरवज्ञ सिद्ध स्वामी सिव,
धनी नाथ ईसजगदीस भगवान है ॥३६॥
अन्वयार्थ : (सवैया एकत्रीसा)
परमपुरुष परमेसुर परमज्योति,
परब्रह्म पूरन परम परधान है ।
अनादि अनंत अविगत अविनाशी अज,
निरदुंद मुक्त मुकुंद अमलान है ॥
निराबाध निगम निरंजन निरविकार,
निराकार संसारसिरोमनि सुजान है ।
सरवदरसी सरवज्ञ सिद्ध स्वामी सिव,
धनी नाथ ईसजगदीस भगवान है ॥३६॥

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+ सामान्यतः: जीवद्रव्य के नाम -
चिदानंद चेतन अलख जीव समैसार,
बुद्धरूप अबुद्ध अशुद्ध उपजोगी है ।
चिद्रूप स्वयंभू चिनमूरति धरमवंत,
प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है ॥
गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी,
अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है ।
चिन्मय अखंड हंस अक्षर आतमराम,
करमकौ करतार परम विजोगी है ॥३७॥
अन्वयार्थ : चिदानंद चेतन अलख जीव समैसार,
बुद्धरूप अबुद्ध अशुद्ध उपजोगी है ।
चिद्रूप स्वयंभू चिनमूरति धरमवंत,
प्रानवंत प्रानी जंतु भूत भवभोगी है ॥
गुनधारी कलाधारी भेषधारी विद्याधारी,
अंगधारी संगधारी जोगधारी जोगी है ।
चिन्मय अखंड हंस अक्षर आतमराम,
करमकौ करतार परम विजोगी है ॥३७॥

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+ आकाश के नाम -
(दोहरा)
खं विहाय अंबर गगन अंतरिच्छ जगधाम ।
व्योम वियत नभ मेघपथ, ये अकाशके नाम ॥३८॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
खं विहाय अंबर गगन अंतरिच्छ जगधाम ।
व्योम वियत नभ मेघपथ, ये अकाशके नाम ॥३८॥

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+ काल के नाम -
(दोहरा)
जम कृतांत अंतक त्रिदस, आवर्ती मृतथान ।
प्रानहरनआदिततनय, काल नाम परवान ॥३९॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
जम कृतांत अंतक त्रिदस, आवर्ती मृतथान ।
प्रानहरनआदिततनय, काल नाम परवान ॥३९॥

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+ पुण्य के नाम -
(दोहरा)
पुन्य सुकृत ऊरधवदन, अकररोग शुभकर्म ।
सुखदायक संसारफल, भाग बहिर्मुख धर्म ॥४०॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
पुन्य सुकृत ऊरधवदन, अकररोग शुभकर्म ।
सुखदायक संसारफल, भाग बहिर्मुख धर्म ॥४०॥

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+ पाप के नाम -
(दोहरा)
पाप अधोमुख एन अघ, कंप रोग दुखधाम ।
कलिल कलुस किल्विस दुरित, असुभ करम के नाम ॥४१॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
पाप अधोमुख एन अघ, कंप रोग दुखधाम ।
कलिल कलुस किल्विस दुरित, असुभ करम के नाम ॥४१॥

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+ मोक्ष के नाम -
(दोहरा)
सिद्धक्षेत्र त्रिभुवनमुकुट, शिवथल अविचलथान ।
मोख मुकतिवैकुंठ सिव, पंचमगति निरवान ॥४२॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
सिद्धक्षेत्र त्रिभुवनमुकुट, शिवथल अविचलथान ।
मोख मुकतिवैकुंठ सिव, पंचमगति निरवान ॥४२॥

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+ बुद्धि के नाम -
(दोहरा)
प्रज्ञा धिसना सेमुसी, धी मेधा मति बुद्धि ।
सुरति मनीषा चेतना, आसय अंश विसुद्धि ॥४३॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
प्रज्ञा धिसना सेमुसी, धी मेधा मति बुद्धि ।
सुरति मनीषा चेतना, आसय अंश विसुद्धि ॥४३॥

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+ विचक्षण पुरुष के नाम -
(दोहरा)
निपुन विचच्छन विबुध बुध, विद्याधरविद्वान ।
पटु प्रवीन पंडित चतुर, सुधी सुजन मतिमान ॥४४॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
निपुन विचच्छन विबुध बुध, विद्याधरविद्वान ।
पटु प्रवीन पंडित चतुर, सुधी सुजन मतिमान ॥४४॥

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कलावंत कोविद कुसल, सुमन दच्छ धीमंत ।
ज्ञाता सज्जन ब्रह्मविद, तज्ञ गुनीजन संत ॥४५॥
अन्वयार्थ : कलावंत कोविद कुसल, सुमन दच्छ धीमंत ।
ज्ञाता सज्जन ब्रह्मविद, तज्ञ गुनीजन संत ॥४५॥

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+ मुनीश्वर के नाम -
(दोहरा)
मुनि महंत तापस तपी, भिच्छुक चारितधाम ।
जती तपोधन संयमी, व्रती साधु ऋषि नाम ॥४६॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
मुनि महंत तापस तपी, भिच्छुक चारितधाम ।
जती तपोधन संयमी, व्रती साधु ऋषि नाम ॥४६॥

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+ दर्शन के नाम -
(दोहरा)
दरस विलोकनि देखनौं, अवलोकनि द्रगचाल ।
लखन द्रष्टि निरखनि जुवनि, चितवनि चाहनि भाल ॥४७॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
दरस विलोकनि देखनौं, अवलोकनि द्रगचाल ।
लखन द्रष्टि निरखनि जुवनि, चितवनि चाहनि भाल ॥४७॥

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+ ज्ञान और चारित्र के नाम -
(दोहरा)
ज्ञान बोध अवगम मनन, जगतभान जगजान ।
संजम चारित आचरन, चरन वृत्ति थिरवान ॥४८॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
ज्ञान बोध अवगम मनन, जगतभान जगजान ।
संजम चारित आचरन, चरन वृत्ति थिरवान ॥४८॥

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+ सत्य के नाम -
(दोहरा)
सम्यक सत्य अमोघ सत, निसंदेह निरधार ।
ठीक जथारथ उचित तथ्य, मिथ्या आदि अकार ॥४९॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
सम्यक सत्य अमोघ सत, निसंदेह निरधार ।
ठीक जथारथ उचित तथ्य, मिथ्या आदि अकार ॥४९॥

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+ झूठ के नाम -
(दोहरा)
अजथारथ मिथ्या मृषा, वृथा असत्त अलीक ।
मुधा मोघ निःफल, वितथ, अनुचित असत अठीक ॥५०॥
अन्वयार्थ : (दोहरा)
अजथारथ मिथ्या मृषा, वृथा असत्त अलीक ।
मुधा मोघ निःफल, वितथ, अनुचित असत अठीक ॥५०॥

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+ नाटक समयसार के बारह अधिकार -
(सवैया एकत्रीसा)
जीव निरजीव करता करम पुन्न पाप,
आस्रव संवर निरजराबंध मोष है ।
सरव विशुद्धि स्यादवाद साध्य साधक,
दुवादस दुवार धरै समैसार कोष है ॥
दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै,
निगमकौ नाटक परमरसपोष है ।
सौ परमागम बनारसी बखानै जामैं,
ज्ञान को निदान सुद्ध चारित की चोष है ॥५१॥
अन्वयार्थ : (सवैया एकत्रीसा)
जीव निरजीव करता करम पुन्न पाप,
आस्रव संवर निरजराबंध मोष है ।
सरव विशुद्धि स्यादवाद साध्य साधक,
दुवादस दुवार धरै समैसार कोष है ॥
दरवानुयोग दरवानुजोग दूरि करै,
निगमकौ नाटक परमरसपोष है ।
सौ परमागम बनारसी बखानै जामैं,
ज्ञान को निदान सुद्ध चारित की चोष है ॥५१॥

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जीव-द्वार



+ चिदानंद भगवान की स्तुति -
((दोहरा))
शोभित निज अनुभूति जुत चिदानंद भगवान ।
सार पदारथ आतमा, सकल पदारथ जान ॥१॥

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+ सिद्ध भगवान की स्तुति -
((सवैया एकत्रीसा))
जो अपनी दुति आप विराजत,
है परधान पदारथ नामी ।
चेतन अंक सदा निकलंक,
महा सुख सागरकौ विसरामी ॥
जीव अजीव जिते जगमैं,
तिनकौ गुन ज्ञायक अंतरजामी ।
सो शिवरुप बसै सिव थानक,
ताहि विलोकि नमैं सिवगामी ॥२॥

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+ जिनवाणी की स्तुति -
(सवैया तेवीसा)
जोग धरै रहे जगसौं भिन्न,
अनंत गुनातम केवलज्ञानी ।
तासु हृदै-द्रहसौं निकसी,
सरितासम व्है श्रुत-सिंधु समानी ॥
याते अनंत नयातम लच्छन,
सत्य स्वरूप सिधंत बखानी ।
बुद्ध लखै न लखै दुरबुद्ध,
सदा जगमाँहिजगै जिनवानी ॥३॥

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+ कवि व्यवस्था -
((छन्द छप्पा))
हौं निहचै तिहुंकाल, सुद्धचेतनमय मूरति ।
पर परनति संजोग, भई जड़ता विसफूरति ॥
मोहकर्म पर हेतु पाइ, चेतन पर रच्चइ ।
ज्यौं धतूर-रस पान करत, नर बहुविध नच्चइ ॥
अब समयसार वरनन करत, परम सुद्धता होहु मुझ ।
अनयास बनारसिदास कहि, मिटहु सहज भ्रम की अरुझ ॥४॥

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+ शास्त्र का माहात्म्य -
((सवैया इकतीसा))
निहचै मैं रूप एक विवहार मैं अनेक,
याही नै विरोध मैं जगत भरमायौ है ।
जग के विवाद नासिबेकौ जिन आगम है,
जामैं स्याद्वादनाम लच्छन सुहायौ है ॥
दरसनमोह जाकौ गयौ है सहजरूप,
आगम प्रमान ताके हिरदै में आयौ है ।
अनैसौं अखंडित अनूतन अनंत तेज,
ऐसो पद पूरन तुरंत तिनि पायौ है ॥५॥

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+ निश्चयनय की प्रधानता -
((सवैया तेवीसा))
ज्यौं नर कौइ गिरै गिरिसौं तिहि,
सोइ हितू जो गहैदिढ़बाहीं ।
त्यौं बुधकौ विवहार भलौ,
तबलौं जबलौं शिव प्रापति नाहीं ॥
यद्यपि यौं परवान तथापि,
सधै परमारथ चेतनमाहीं ।
जीव अव्यापक है परसौं,
विवहारसौं तो परकी परछाहीं ॥६॥

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+ सम्यग्दर्शन का स्वरूप -
((सवैया इकतीसा))
शुद्धनय निहचै अकेलौ आपु चिदानंद,
अपनैंही गुन परजायकौं गहतु है ।
पूरन विज्ञानघन सो है विवहारमाहिं,
नव तत्त्वरुपी पंच दर्वमैं रहतु है ॥
पंच दर्व नव तत्त्व न्यारे जीव न्यारो लखै,
सम्यकदरस यहै और न गहतु है ।
सम्यकदरस जोई आतम सरूप सोई,
मेरे घट प्रगटोबनारसी कहतु है ॥7॥

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+ जीव की दशा पर अग्नि का दृष्टांत -
((सवैया एकत्रीसा))
जैसैं तृण काठ वांस आरने इत्यादि और,
ईंधन अनेक विधि पावकमैं दहिये ।
आकृति विलोकित कहावै आग नानारूप,
दीसै एक दाहक सुभाव जब गहिये ॥
तैसैं नव तत्वमें भयौ हैं बहु भेषी जीव,
सुद्धरूप मिश्रित असुद्ध रूप कहिये ।
जाही छिन चेतना सकतिकौ विचार कीजै,
ताहीं छिन अलखअभेदरूप लहिये ॥८॥

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+ जीव की दशा पर सोने का द्रष्टांत -
((सवैया इकतीसा))
जैसैं बनवारी में कुधात के मिलाप हेम,
नानाभांति भयौ पै तथापि एक नाम है ।
कसिकैं कसोटी लीकु निरखै सराफ ताहि,
बानके प्रवान करि लेतु देतु दाम है ॥
तैसैं ही अनादि पुद्गलसौं संजोगी जीव,
नव तत्त्वरूप मैं अरूपी महा धाम है ।
दीसै उनमानसौं उदोतवान ठौर ठौर,
दूसरौ न और एक आतमाही राम है ॥९॥

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+ अनुभव की दशा का सूर्य का दृष्टांत -
((सवैया एकत्रीसा))
जैसैं रति-मंडलकै उदै महि-मंडल मैं,
आतप अटल तम पटल विलातु है ॥
तैसैं परमातमाकौ अनुभौ रहत जौलौं,
तौलौं कहूँ दुविधा न कहूँ पच्छपातु है ॥
नयकौ न लेस परवानकौ न परवेस,
निच्छेपके वंसकौ विधुंस होत जातु है ॥
जे जे वस्तु साधक हैं तेऊ तहां बाधक हैं,
बाकी राग दोषकी दसाकी कौन बातुहै ॥१०॥

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+ शुद्धनय से जीव का स्वरूप -
((अडिल्ल))
आदि अंत पूरन-सुभाव-संयुक्त है ।
पर-सरूप-परजोग-कल्पनामुक्त है ॥
सदा एकरस प्रगट कही है जैन मैं ।
सुद्धनयातम वस्तु विराजै बेन मैं ॥११॥

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+ हितोपदेश -
((कवित्त -- ३१ मात्रा))
सदगुरु कहै भव्यजीवनि सौं,
तोरहु तुरित मोह की जेल ।
समकितरूप गहौ अपनौं गुन,
करहु सुद्ध अनुभव कौ खेल ॥
पुदगलपिंड भाव रागादिक,
इनसौं नहीं तुम्हारौ मेल ।
ए जड़ प्रगट गुपत तुम चेतन,
जैसैं भिन्न तोय अरु तेल ॥१२॥

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+ सम्यग्दृष्टि का विलास -
सम्यग्द्रष्टिना विलासनुं वर्णन
((सवैया इकतीसा))
कोऊ बुद्धिवंत नर निरखै सरीर-घर,
भेदज्ञानदृष्टिसौं विचारै वस्तु-वासतौ ।
अतीत अनागत वरतमान मोहरस,
भीग्यौ चिदानंद लखै बंधमैं विलासतौ ॥
बंधकौ विदारि महा मोहकौ सुभाउ डारि,
आतमाकौ ध्यान करै देखै परगासतौ ।
करम-कलंक-पंकरहित प्रगटरूप,
अचल अबाधित विलोकै देव सासतौ ॥१३॥

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+ गुण-गुणी अभेद -
((सवैया तेवीसा))
सुद्धनयातम आतमकी,अनुभूति विज्ञान-विभूति है सोई ।
वस्तु विचारत एक पदारथ, नाम के भेद कहावत दोई ॥
यौं सरवंग सदा लखि आपुहि,आतम-ध्यान करै जब कोई ।
मेटि असुद्ध विभावदसा तब, सुद्ध सरूप की प्रापति होई ॥१४॥

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+ ज्ञानी का चिंतन -
(सवैया इकतीसा)
अपनैंही गुन परजायसौं प्रवाहरूप,
परिनयौ तिहुं काल अपनै अधारसौं ।
अन्तर-बाहर-परकासवान एकरस,
खिन्नता न गहै भिन्न रहै भौ-विकारसौं ॥
चेतनाके रस सरवंग भरि रह्यौ जीव,
जैसे लौंन-कांकर भरयो है रस खारसौं ।
पूरन-सुरूप अति उज्जल विज्ञानघन,
मोकौं होहु प्रगट विसेस निरवारसौं ॥१५॥

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((कवित्त))
जंह ध्रुवधर्म कर्मछय लच्छन, सिद्धि समाधि साधिपद सोई ।
सुद्धपयोग जोग महिमंडित, साधक ताहि कहै सब कोई ॥
यौं परतच्छ परोच्छ रूपसौं, साधक साधि अवस्थादोई ।
दुहुकौ एक ज्ञान संचय करि, सेवै सिववंछक थिरहोई ॥१६॥

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+ भेद-विवक्षा -
((कवित्त))
दरसन-ज्ञान-चरन त्रिगुनातम, समलरूप कह्यिे विवहार ।
निहचै-द्रष्टि एकरस चेतन, भेदरहित अविचल अविकार ।
सम्यकदसा प्रमान उभै नय, निर्मल समल एक हीबार ।
यौं समकाल जीवकी परिनति, कहैंजिनेंद गहै गनधार ॥१७॥

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((दोहरा))
एकरूप आतम दरव, ज्ञान चरन द्रग तीन ।
भेदभाव परिनामसौं, विवहारै सु मलीन ॥१८॥

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+ निश्चयनय से जीव का स्वरूप -
((दोहरा))
जदपि समल विवहारसौं, पर्ययं-सकति अनेक ।
तदपि नियत-नय देखिये, सुद्धनिरंजन एक ॥१९॥

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+ शुद्ध निश्चयनय से जीव का स्वरूप -
((दोहरा))
एक देखिये जानिये, रमि रह्यिे इक ठौर ।
समल विमल न विचारिये, यहै सिद्धि नहि और ॥२०॥

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+ शुद्ध अनुभव की प्रशंसा -
((सवैया इकतीसा))
जाकै पद सोहत सुलच्छन अनंत ज्ञान,
विमल विकासवंत ज्योति लहलही है ।
यद्यपि त्रिविधरूप विवहारमैं तथापि,
एकता न तजै यौ नियत अंग कही है ॥
सो है जीव कैसीहुं जुगतिकै सदीव ताके,
ध्यान करिबेकौं मेरी मनसा उनही है ।
जाते अविचल रिद्धि होत और भांति सिद्धि,
नाहीं नाहीं नाहीं यामैं धोखो नाहीं सही है ॥२१॥

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+ ज्ञाता की अवस्था -
((सवैया इकतीसा))
कै अपनौं पद आप संभारत,
कै गुरु के मुख की सुनि बानी ।
भेदविज्ञान जग्यो जिन्हिकै,
प्रगटी सुविवेक-कला-रसधानी ॥
भाव अनंत भए प्रतिबिंबित,
जीवन मोख दसा ठहरानी ।
ते नर दर्पन ज्यौं अविकार,
रहैं थिररूप सदा सुखदानी ॥२२॥

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+ भेदज्ञान की महिमा -
((सवैया इकतीसा))
याही वर्तमानसमै भव्यनिकौ मिटौ मौह,
लग्यौ है अनादिकौ पग्यौ है कर्ममलसौं ।
उदै करै भेदज्ञान महा रुचिकौ निधान,
उरकौ उजारौ भारौ न्यारौ दुंद-दलसौं ॥

जातैं थिर रहै अनुभौ विलास गहै फिरि,
कबहूं अपनपौ न कहै पुदगलसौं ।
यहै करतूति यौं जुदाई करैं जगतसौं,
पावक ज्यौं भिन्न करै कंचन उपलसौं ॥२३॥

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+ परमार्थ की शिक्षा -
((सवैया एकत्रीसा))
बानारसी कहै भैया भव्य सुनो मेरी सीख,
कैहूं भांति कैसैंहूंके ऐसौ काजु कीजिए।
एकहू मुहूरत मिथ्यातकौ विधुंस होइ,
ज्ञानकौं जगाइ अंस हंस खोजि लीजिए।

वाहिकौ विचार वाकौ ध्यान यहै कौतूहल,
यौंही भरि जनम परम रस पीजिए ।
तजि भव-वासकौ विलास सविकाररूप,
अंतकरि मौहकौ अनंतकाल जीजिए ॥२४॥

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+ तीर्थंकर के शरीर की स्तुति -
((सवैया इकतीसा))
जाके देह-द्युतिसौं दसौं दिसा पवित्र भई,
जाके तेज आगैं सब तेजवंत रुके हैं ।
जाकौ रुप निरखि थकित महा रूपवंत,
जाकी वपु-वाससौं सुवास और लुके हैं ॥
जाकी दिव्यधुनि सुनि श्रवणकौं सुख होत,
जाके तन लच्छन अनेक आइ ढुके हैं ।
तेई जिनराज जाके कहे विवहार गुन,
निहचै निरखि सुद्ध चेतनसौं चुके हैं ॥२५॥

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जामैं बालपनौ तरुनापौ वृद्धपनौ नाहिं,
आयु-परजंत महारूप महाबल है ।
बिना ही जतन जाके तनमैं अनेक गुन,
अतिसै-विराजमान काया निर्मल है ॥
जैसैं बिनु पवन समुद्र अविचलरूप,
तैसैं जाकौं मन अरु आसन अचल है ।
ऐसौ जिनराज जयवंत होउ जगतमैं,
जाकी सुभगति महा सुकृतकौ फल है ॥२६॥

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+ जिनराज का यथार्थ स्वरूप -
((दोहरा))
जिनपद नांहि शरीरकौ, जिनपद चेतनमाँहि ।
जिनवर्नन कछु और है, यह जिनवर्नन नांहि ॥२७॥

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+ पुद्गल और जीव के भिन्न स्वभाव का दृष्टांत -
((सवैया इकतीसा))
ऊंचे ऊंचे गढ़के कंगूरे यौं विराजत हैं,
मानौं नभलोक गीलिवेकौं दांत दीयौ है ।
सोहै चहूँओर उपवनकी सघनताई,
घेरा करि मानौ भूमिलोक घेरि लीयौ है ॥
गहिरी गंभीर खाई ताकी उपमा बनाई,
नीचौ करि आनन पताल जल पीयौ है ।
ऐसो है नगर यामैं नृपकौ न अंग कोऊ,
यौंही चिदानंदसौं सरीर भिन्न कीयौ है ॥२८॥

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+ तीर्थंकर की निश्चय स्तुति -
((सवैया इकतीसा))
जामैं लोकालोकके सुभाव प्रतिभासे सब,
जगी ज्ञान सकति विमल जैसी आरसी ।
दर्सन उद्योत लोयौ अंतराय अंत कीयौ,
गयौ महा मोह भयौ परम महारसी ॥
संन्यासी सहज जोगी जोगसौं उदासी जामैं,
प्रकृति पचासी लगि रही जरि छारसी ।
सोहै घट मंदिरमैं चेतन प्रगटरूप,
ऐसौ जिनराज ताहि बंदत बनारसी ॥२९॥

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+ व्यवहार से जीव और शरीर एक, निश्चय से नहीं -
((कवित्त))
तन चेतन विवहार एकसे, निहचै भिन्न भिन्न हैं दोइ ।
तनकी थुति विवहार जीवथुति, नियतद्रष्टि मिथ्या थुति सोइ ॥
जिन सो जीव जीव सो जिनवर, तन जिन एक न मानैकोइ ।
ता कारन तनकी संस्तुतिसौं, जिनवर की संस्तुति नहि होइ ॥३०॥

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+ वस्तुस्वरूप की प्राप्ति का दृष्टांत -
((सवैया इकतीसा))
ज्यौं चिरकाल गड़ी वसुधामहि, भूरि महानिधि अंतर गूझी ।
कोउ उखारि धरै महि ऊपरि, जे द्रगवंत तिन्हैं सब सूझी ॥
त्यौं यह आतमकी अनुभूति; पडी जड़भाउ अनादि अरुझी ।
नै जुगतागम साधि कही गुरु, लच्छन-वेदि विचच्छन बूझी ॥३१॥

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+ भेदविज्ञान की प्राप्ति का दृष्टांत -
((सवैया इकतीसा))
जैसैं कोऊ जन गयौ धोबीके सदन तिन,
पर्हियौ परायौ वस्त्र मेरौ मानि रह्यौ है ।
धनी देखि कह्यौ भैया यह तौ हमारौ वस्त्र,
चीन्हैं पहिचानत ही त्यागभाव लह्यौ है ॥
तैसैंही अनादि पुदगलसौं संजोगी जीव,
संग के ममत्वसौं विभाव तामैं बह्यौ है ।
भेदज्ञान भयौ जब आपौ पर जान्यौ तब
न्यारौ परभावसौं स्वभाव निजगह्यौ है ॥३२॥

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+ निजात्मा का सत्य स्वरूप -
((अडिल्ल छंद))
कहै विचच्छन पुरुष सदा मैं एक हौं ।
अपने रससौं र्भयौ आपनी टेक हौं ॥
मोहकर्म मम नांहि नांहि भ्रमकूप है ।
सुद्ध चेतना सिंधु हमारौ रूप है ॥३३॥

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+ तत्त्वज्ञानी जीव की अवस्था -
((सवैया एकत्रीसा))
तत्त्वकी प्रतीतिसौं लख्यौ है निजपरगुन,
द्रग ज्ञानचरन त्रिविधि परिनयौ है।
विसद विवेक आयौ आछौ विसराम पायौ,
आपुहीमैं आपनौ सहारौ सोधि लयौ है ॥
कहत बनारसी गहत पुरुषारथकौं,
सहज सुभावसौं विभाव मिटि गयौ है ।
पन्नाके पकायें जैसैं कंचन विमल होत,
तैसैं सुद्ध चेतन प्रकाशरूप भयो है ॥३४॥

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+ वस्तुस्वभाव की प्राप्ति का द्रष्टांत -
((सवैया इकतीसा))
जैसैं कोऊ पातुर बनाय वस्त्र आभरन,
आवति अखारे निसि आडौ पट करिकैं ।
दुहूँओर दीवटि संवारि पट दूरि कीजै,
सकल सभाके लोग देखैंद्रष्टि धरिकैं ॥
तैसैं ज्ञान सागर मिथ्याति ग्रंथि भेदि करि,
उमग्यौ प्रगट रह्यौ तिहूँ लोक भरिकैं ।
ऐसौ उपदेस सुनि चाहिए जगत जीव,
सुद्धता संभारै जग जालसौं निसरिकैं ॥३५॥

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अजीव-द्वार



+ अजीव अधिकार के वर्णन की प्रतिज्ञा -
((दोहरा))
जीव तत्त्व अधिकार यह, कह्यौ प्रगट समुझाय ।
अब अधिकार अजीवकौ, सुनहु चतुर चित लाय ॥१॥

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+ मंगलाचरण -
((सवैया इकतीसा))
परम प्रतीति उपजाय गनधरकीसी,
अंतर अनादि की विभावता विदारी है ।
भेदग्यान द्रष्टिसौं विवेक की सकति साधि,
चेतन अचेतन की दसा निरवारी है ॥
करम कौ नासकरि अनुभौ अभ्यास धरि,
हिएमैं हरखि निज उद्धता सँभारी है ।
अंतराय नास भयौ सुद्ध परकास थयौ,
ज्ञान कौ विलास ताकौं वंदना हमारी है ॥२॥

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+ श्रीगुरु की पारमार्थिक शिक्षा -
((सवैया इकतीसा))
भैया जगवासी तू उदासी ह्वैकैं जगतसौं,
एक छ महीना उपदेश मेरौ मानु रे।
और संकलप विकलपके विकार तजि,
बैठिकैं एकंत मन एक ठौरु आनु रे।
तेरौ घट सर तामैं तूही है कमल ताकौ,
तूही मधुकर ह्वै सुवास पहिचानु रे ।
प्रापति न व्हैहै कछु ऐसौ तू विचारतु है,
सही ह्वै है प्रापति सरूप यौंही जानु रे॥३॥

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+ जीव और पुद्गल के लक्षण -
((दोहरा))
चेतनवंतअनंत गुन, सहित सु आतमराम ।
यातैं अनमिल और सब, पुदगल के परिनाम ॥४॥

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+ आत्मज्ञानी के परिणाम -
((कवित्त))
जब चेतन सँभारि निज पौरुष, निरखै निजद्रगसौं निज मर्म।
तब सुखरूप विमल अविनासिक, जानै जगतसिरोमनिधर्म ॥
अनुभौ करै सुद्ध चेतनकौ, रमै स्वभाव वमैसब कर्म।
इहि विधि सधै मुकति कौ मारग, अरुसमीप आवै सिव सर्म ॥५॥

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+ जड-चेतन की भिन्नता -
((दोहरा))
वरनादिक रागादि यह, रूप हमारौ नांहि।
एक ब्रह्म नहि दूसरौ, दीसै अनुभव मांहि ॥६॥

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+ देह-जीव भिन्नता का दूसरा दृष्टांत -
(दोहरा)
खांडो कहिये कनककौ, कनक-म्यान-संयोग ।
न्यारौ निरखत म्यानसौं, लोह कहैं सब लोग ॥७॥

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+ जीव-पुद्गल भिन्नता -
(दोहरा)
वरनादिक पुदगल-दसा, धरै जीव बहु रूप ।
वस्तु विचारत करमसौं, भिन्न एक चिद्रूप ॥८॥

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+ देह-जीव भिन्नता का दृष्टांत -
(दोहरा)
ज्यौं घट कहिये घीवकौ, घटकौ रूप न घीव ।
त्यौं वरनादिक नामसौं, जड़ता, लहै न जीव ॥९॥

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+ आत्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप -
(दोहरा)
निराबाध चेतन अलख, जाने सहज स्वकीव ।
अचल अनादि अनंत नित, प्रगट जगत मैं जीव ॥१०॥

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+ अनुभव विधान -
((सवैया इकतीसा))
रूप-रसवंत मूरतीक एक पुदगल,
रूप बिनुऔरु यौं अजीवदर्व दुधा है ।
चारि हैं अमूरतीक जीव भी अमूरतीक,
याहितैं अमूरतीक-वस्तु-ध्यान मुधा है ॥
औरसौं न कबहूं प्रगट आप आपुही सौं,
ऐसौ थिर चेतन-सुभाउ सुद्धसुधा है ।
चेतनकौ अनुभौ अराधैं जग तेई जीव,
जिन्हकौं अखंड रस चाखिवे की छुधा है ॥११॥

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+ मूढ़ स्वभाव -
((सवैया तेवीसा))
चेतन जीव अजीव अचेतन, लच्छन-भेद उभैपद न्यारे ।
सम्यक्दृष्टि-उदोत विचच्छन, भिन्न लखै लखिकैं निरधारे ॥
जे जगमांहि अनादि अखंडित, मोह महामद के मतवारे ।
ते जड़ चेतन एक कहैं, तिन्ह की फिरि टेक टरै नहि टारे ॥१२॥

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+ ज्ञाता का विलास -
((सवैया तेवीसा))
या घटमैं भ्रमरूप अनादि,
विसाल महा अविवेक अखारौ ।
तामहि और स्वरूप न दीसत,
पुग्गल नृत्य करै अति भारौ ॥
फेरत भेख दिखावत कौतुक,
सौंजि लियैं वरनादि पसारौ ।
मौहसौं भिन्न जुदौ जड़सौ,
चिनमूरति नाटक देखन हारौ ॥13॥

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+ भेदविज्ञान का परिणाम -
((सवैया इकतीसा))
जैसैं करवत एक काठ बीच खंड करै,
जैसैं राजहंस निरवारै दूध जलकौं ।
तैसैं भेदज्ञान निज भेदक-सकतिसेती,
भिन्न भिन्न करै चिदानंद पुदगलकौं ॥
अवधिकौं धावै मनपर्यै की अवस्था पावै,
उमगिकै आवै परमावधि के थलकौं ।
याही भांति पूरन सरूप को उदोत धरै,
करै प्रतिबिंबित पदारथ सकलकौं ॥१४॥

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कर्ता-कर्म



+ प्रतिज्ञा -
यह अजीव अधिकारकौं, प्रगट बखानौ मर्म ।
अब सुनु जीव अजीव के, करता किरिया कर्म ॥१॥

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((सवैया इकतीसा))
प्रथम अज्ञानी जीव कहै मैं सदीव एक,
दूसरौ न और मैं ही करता करमकौ ।
अंतर-विवेक आयौ आपा-पर-भेद पायौ,
भयौ बोध गयौ मिटि भारत भरमकौ ।
भासे छहौं दरबके गुन परजाय सब,
नासे दुख लख्यौ मुख पूरन परमकौ ।
करम कौ करतार मान्यौ पुदगल पिंड,
आप करतार भयौ आतम धरमकौ ॥२॥

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जाही समै जीव देहबुद्धिकौ विकार तजै,
वेदत सरूप निज भेदत भरमकौं ।
महा परचंड मति मंडन अखंड रस,
अनुभौ अभ्यासि परगासत परमकौं ॥
ताही समै घटमैं न रहै विपरीत भाव,
जैसे तम नासै भानु प्रगटि धरमकौं ।
ऐसी दसा आवै जब साधक कहावै तब,
करता ह्वे कैसे करै पुग्गल करमकौं ॥3॥

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+ ज्ञानी कर्ता नहीं, मात्र ज्ञाता -
((सवैया इकतीसा))
जगमैं अनादिकौ अग्यानी कहै मेरौ कर्म,
करता मैं याकौ किरियाकौ प्रतिपाखी है ।
अंतर सुमति भासी जोगसौं भयौ उदासी,
ममता मिटाइ परजाइ बुद्धि नाखी है ॥
निरभै सुभाव लीनौ अनुभौके रस भीनौ,
कीनौ विवहारदृष्टि निहचैमैं राखी है ।
भरमकी डोरी तोरी धरमकौ भयौ धोरी,
परमसौं प्रीति जोरी करमकौ साखी है ॥४॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसो जो दरव ताके तैसो गुन परजाय,
ताहीसौं मिलत पै मिलै न काहु आनसौं ।
जीव वस्तु चेतन करम जड़ जातिभेद,
अमिल मिलाप ज्यौं नितंब जुरै कानसौं ॥
ऐसौ सुविवेक जाकै हिरदै प्रगट भयौ,
ताकौ भ्रम गयौ ज्यौं तिमिर भागै भानसौं ।
सोई जीव करमकौ करता सौ दीसै पै,
अकरता कह्यौ है सुद्धताके परमानसौं ॥5॥

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+ जीव और पुद्गल के जुदे-जुदे लक्षण -
((छंद : छपै))
जीव ज्ञानगुन सहित, आपगुन-परगुन-ज्ञायक ।
आपा परगुन लखै, नांहि पुग्गल इहि लायक ॥
जीवदरव चिद्रूप सहज, पुदगल अचेत जड़ ।
जीव अमूरति मूरतीक, पुदगल अंतर बड़ ॥
जब लग न होइ अनुभौ प्रगट, तब लग मिथ्यामति लसै ।
करतार जीव जड़ करमको, सुबुधि विकास यहु भ्रम नसै ॥६॥

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((दोहा))
कर्ता परिणामी दरव, करम रूप परिनाम ।
किरिया परजयकी फेरनि, वस्तु एक त्रय नाम ॥७॥

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((दोहा))
करता करम क्रिया करै, क्रिया करम करतार।
नाम-भेद बहु विधि भयौ, वस्तु एक निरधार ॥८॥

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((दोहा))
एक करम करतव्यता, करै न करता दोइ ।
दुधा दरव सत्ता सधी, एक भाव क्यौं होइ ॥९॥

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((सवैया इकतीसा))
एक परिनाम के न करता दरव दोइ,
दोइ परिनाम एक दर्व न धरतु है ॥
एक करतूति दोइ दर्व कबहूँ न करै
दोइ करतूति एक दर्व न करतु है ॥
जीव पुदगल एक खेत-अवगाही दोउ,
अपनें अपनें रूप कोउ न टरतु है ।
जड परनामनिकौ करता है पुदगल,
चिदानंद चेतन सुभाउ आचरतु है ॥10॥

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((सवैया इकतीसा))
महा धीठ दुखकौ वसीठ परदर्वरूप,
अंधकूप काहूपै निवार्यो नहि गयौ है ।
ऐसौ मिथ्याभाव लग्यौ जीवकौं अनादिहीको,
याही अहंबुद्धि लिए नानाभांति भयौ है ॥
काहू समै काहूको मिथ्यात अंधकार भेदि,
ममता उछेदि सुद्ध भाव परिनयौ है ।
तिनही विवेक धारि बंधकौ विलास डारि,
आतम सकतिसौं जगत जीत लयौ है ॥११॥

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((सवैया इकतीसा))
सुद्धभाव चेतन असुद्धभाव चेतन,
दुहूंकौ करतार जीव और नहि मानिये ।
कर्मपिंडकौ विलास वन रस गंध फास,
करता दुहूँकौ पुदगल पखानिये ॥
तातै वरनादि गुन ग्यानावरनादि कर्म,
नाना परकार पुदगलरूप जानिये ।
समल विमल परिनाम जे जे चेतनके,
ते ते सब अलख पुरुष यौं बखानिये ॥१२॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसैं गजराज नाज घासके गरास करि,
भच्छत सुभाय नहि भिन्न रस लीयौ है ।
जैसैं मतवारौ नहि जानै सिखरनि स्वाद,
जुंगमें मगन कहै गऊ दूध पीयौ है ॥
तैसैं मिथ्यादृष्टि जीव ज्ञानरूपी है सदीव,
पग्यौ पाप पुन्नसौं सहज सुन्न हीयौ है ।
चेतन अचेतन दुहूँकौ मिश्र पिंड लखि,
एकमेक मानै न विवेक कछु कीयौ है ॥१३॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसैं महा धूपकी तपतिमैं तिसायौ मृग,
भरमसौं मिथ्याजल पीवनकौं धायौ है ।
जैसैं अंधकार मांहि जेवरी निरखि नर,
भरमसौं डरपि सरप मानि आयौ है ॥
अपनैं सुभाव जैसे सागर सुथिर सदा,
पवन-संजोगसौं उछरि अकुलायौ है ।
तैसैं जीव जड़सौ अव्यापक सहज रूप,
भरमसौ करमकौ करता कहायौ है ॥१४॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसैं राजहंस के वदन के सपरसत,
देखिये प्रगट न्यारौ छीर न्यारौ नीर है ।
तैसैं समकिती की सुदृष्टिमैं सहज रूप,
न्यारौ जीव न्यारौ कर्म न्यारौ ही सरीर है ॥
जब सुद्ध चेतन को अनुभौ अभ्यासै तब,
भासै आपु अचल न दूजौ और सीर है ।
पूरव करम उदै आइके दिखाई देइ,
करता न होय तिन्हको तमासगीर है ॥१५॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसैं उसनोदकमैं उदक-सुभाव सीरौ,
आग की उसनता फरस ज्ञान लखियै ।
जैसैं स्वाद व्यंजनमैं दीसत विविधरूप,
लौनकौ सुवाद खारौ जीभ-ज्ञान चखियै ॥
तैसैं घट पिंडमैं विभावता अज्ञानरूप,
ज्ञानरूप जीव भेद-ज्ञानसौं परखिये ।
भरमसौ करमकौ करता है चिदानंद,
दरव विचार करतार भाव नखियै ॥16॥

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((दोहा))
ज्ञान-भाव ज्ञानी करै, अज्ञानी अज्ञान ।
दर्वकर्म पुदगल करै, यह निहचै परवान ॥१७॥

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((दोहा))
ज्ञान सरूपी आतमा, करै ज्ञान नहि और ।
दरव करम चेतन करै, यह विवहारी दौर ॥१८॥

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((सवैया इकतीसा))
पुग्गलकर्म करै नहि जीव, कही तुम मैं समुझी नहि तैसी ।
कौन करै यह रूप कहौं अब, को करता करनी कहु कैसी ॥
आपुही आपु मिलै बिछुरै जड़, क्यौं करि मो मन संसय ऐसी ?
सिष्य संदेह निवारन कारन , बात कहैं गुरु है कछु जैसी ॥१९॥

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((दोहा))
पुदगल परिनामी दरव, सदा परिनवै सोइ ।
यातें पुदगल करमकौ, पुदगल करता होइ ॥२०॥

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((दोहा))
जीव चेतना संजुगत, सदा पूरण सब ठौर।
तातें चेतन भावकौ, करता जीव न और ॥२१॥

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((अड़िल्ल छंद))
ज्ञानवंतकौ भोग निरजरा-हेतु है।
अज्ञानीकौ भोग बंध फल देतु है ॥
यह अचरजकी बात हिये नहि आवही ।
पूछे कोऊ सिष्य गुरू समझावही ॥२२॥

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((सवैया इकतीसा))
दया-दान-पूजादिक विषय-कषायादिक,
दोऊ कर्मबंध पै दुहूको एक खेतु है ।
ज्ञानी मूढ़ करम करत दीसै एकसे पै,
परिनामभेद न्यारौ न्यारौ फल देतु है ॥
ज्ञानवंत करनी करै पै उदासीन रूप,
ममता न धरै तातै निर्जराकौ हेतु है ।
वहै करतूति मूढ़ करै पै मगनरूप,
अंध भयौ ममतासौं बंध-फल लेतु है ॥23॥

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((छप्पय))
ज्यौं माटीमैं कलस होनकी, सकति रहै ध्रुव ।
दंड चक्र चीवर कुलाल, बाहजि निमित्त हुव ॥
त्यौं पुदगल परवांनु, पुंज वरगना भेस धरि ।
ज्ञानावरनादिक स्वरूप, विचरंत विविध परि ॥
बाहजि निमित्त बहिरातमा, गही संसै अज्ञानमति ।
जगमांहि अहंकृत भावसौं, करमरूप है परिनमति ॥२४॥

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((सवैया तेवीसा))
जे न करै नयपच्छ विवाद, धरै न विखाद अलीक न भाखैं ।
जे उदवेग तजैं घट अंतर, सीतल भाव निरंतर राखैं ॥
जे न गुनी-गुन-भेद विचारत, आकुलता मनकी सब नाखैं ।
ते जगमैं धरि आतम ध्यान, अखंडित ज्ञान-सुधारस चाखैं ॥25॥

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((सवैया इकतीसा))
विवहार-दृष्टिसौं विलोकत बंध्यौसौ दीसै,
निहचै निहारत न बांध्यौ यह किनिहीं ।
एक पच्छ बंध्यौ एक पच्छसौं अबंध सदा,
दोऊ पच्छ अपनैं अनादि धरे इनिहीं ॥
कोऊ कहै समल विमलरूप कोऊ कहै,
चिदानंद तैसौई बखान्यौ जैसौ जिनिहीं ।
बंध्यौ मानै खुल्यौ मानै दोऊ नैको भेद जानै,
सोई ज्ञानवंत जीव तत्त्व पायौ तिनिहीं ॥26॥

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((सवैया इकतीसा))
प्रथम नियत नय दूजी विवहार नय,
दुहूकौं फलावत अनंत भेद फले हैं ।
ज्यौं ज्यौं नय फलैं त्यौं त्यौं मनके कल्लोल फलैं,
चंचल सुभाव लोकालोकलौं उछले हैं ॥
ऐसी नयकक्ष ताकौ पक्ष तजि ज्ञानी जीव,
समरसी भए एकतासौं नहि टले हैं ।
महामोह नासि सुद्ध-अनुभौ अभ्यासि निज,
बल परगासि सुखरासि मांहि रले हैं ॥27॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसे काहू बाजीगर चौहटै बजाइ ढोल,
नानारूप धरिकै भगल-विद्या ठानी है ।
तैसैं मैं अनादिकौ मिथ्यातकी तरंगनिसौं,
भरममैं धाइ बहु काय निज मानी है ॥
अब ज्ञानकला जागी भरमकी दृष्टि भागी,
अपनी पराई सब सौंज पहिचानी है ।
जाकै उदै होत परवांन ऐसी भांति भई,
निहचै हमारी जोति सोई हम जानी है ॥२८॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसै महा रतनकी ज्योतिमैं लहरि उठै,
जलकी तरंग जैसैं लीन होय जलमैं।
तैसैं सुद्ध आतम दरब परजाय करि,
उपजै बिनसै थिर रहै निज थलमैं ॥
ऐसै अविकलपी अजलपी अनंद रूपी,
अनादि अनंत गहि लीजै एक पलमैं ।
ताको अनुभव कीजै परम पीयूष पीजै,
बंधकौ विलास डारि दीजै पुदगलमैं ॥29॥

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((सवैया इकतीसा))
दरबकी नय परजायनय दोऊ,
श्रुतज्ञानरूप श्रुतज्ञान तो परोख है ।
सुद्ध परमातमाको अनुभौ प्रगट तातें,
अनुभौ विराजमान अनुभौ अदोख है ॥
अनुभौ प्रवांन भगवान पुरुष पुरान,
ज्ञान औ विज्ञानघन महा सुखपोख है ।
परम पवित्र यौं अनंत नाम अनुभौके,
अनुभौ विना न कहूं और ठौर मोख है ॥३०॥

🏠
((सवैया इकतीसा))
जैसे एक जल नानारूप-दरबानुजोग,
भयौ बहु भांति पहिचान्यौ न परतु है ।
फिरि काल पाइ दरबानुजोग दूरि होत,
अपनै सहज नीचे मारग ढरतु है ॥
तैसैं यह चेतन पदारथ विभाव तासौं,
गति जोनि भेस भव-भावंरि भरतु है ।
सम्यक सुभाइ पाइ अनुभौके पंथ धाइ,
बंधकी जुगति भानि मुकति करतु है ॥31॥

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((दोहा))
निसि दिन मिथ्याभाव बहु, धरै मिथ्याती जीव ।
तातै भावित करमकौ, करता कह्यौ सदीव ॥32॥

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((चौपाई))
करै करम सोई करतारा,
जो जानै सौ जाननहारा ॥
जो करता नहि जानै सोई ।
जानै सो करता नहि होई ॥३३॥

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((सोरठा))
ज्ञान मिथ्यात न एक, नहि रागादिक ज्ञान महि ।
ज्ञान करम अतिरेक, ज्ञाता सो करता नहीं ॥३४॥

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((छप्पय))
करम पिंड अरु रागभाव, मिलि एक हौहि नहि ।
दोऊ भिन्न-सरूप बसहिं, दोऊ न जीवमहि ॥
करमपिंड पुग्गल, विभाव रागादि मूढ़ भ्रम ।
अलख एक पुग्गल अनंत, किमि धरहि प्रकृति सम ॥
निज निज विलासजुत जगतमहि,
जथा सहज परिनमहि तिम ।
करतार जीव जड़ करमकौ,
मोह-विकल जन कहहि इम ॥35॥

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((छप्पय))
जीव मिथ्यात्व न करै, भाव नहि धरै भरम मल ।
ज्ञान ज्ञानरस रमै, होइ करमादिक पुदगल ॥
असंख्यात परदेस सकति, जगमगै प्रगट अति ।
चिदविलास गंभीर धीर, थिर रहै विमलमति ॥
जब लगि प्रबोध घटमहि उदित,
तब लगि अनय न पेखिये ।
जिमि धरम-राज वरतंत पुर,
जहं तहं नीति परेखिये ॥36॥

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पुण्य-पाप एकत्व


करता किरिया करमकौ, प्रगट बखान्यौ मूल ।
अब बरनौं अधिकार यह, पाप पुन्न समतूल ॥१॥
अन्वयार्थ : कर्त्ता, क्रिया और कर्म का स्पष्ट रहस्य वर्णन किया। अब, पाप-पुण्य की समानता का अधिकार कहते हैं।

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+ मंगलाचरण -
(तर्ज : कविता मात्रिक))
जाके उदै होत घट-अंतर,
बिनसै मोह-महातम-रोक ।
सुभ अरु असुभ करमकी दुविधा,
मिटै सहज दीसै इक थोक ॥
जाकी कला होत संपूरन,
प्रतिभासै सब लोक अलोक।
सो प्रबोध-ससि निरखि बनारसि,
सीस नवाइ देत पग धोक ॥२॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसैं काहू चंडाली जुगल पुत्र जने तिनि,
एक दीयौ बांभनकै एक घर राख्यौ है ।
बांभन कहायौ तिनि मद्य मांस त्याग कीनौ,
चंडाल कहायौ तिनि मद्य मांस चाख्यौ है ॥
तैसैं एक वेदनी करमके जुगल पुत्र,
एक पाप एक पुन्न नाम भिन्न भाख्यौ है ।
दुहूं मांहि दौरधूप दोऊ कर्मबंधरूप,
यातै ज्ञानवंत नहि कोउ अभिलाख्यौ है ॥३॥

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((चौपाई))
कोऊ सिष्य कहै गुरु पांहीं,
पाप पुन्न दोऊ सम नाहीं ॥
कारन रस सुभाव फल न्यारे,
एक अनिष्ट लगैं इक प्यारे ॥४॥

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((सवैया इकतीसा))
संकलेस परिनामनिसौं पाप बंध होइ,
विसुद्धसौं पुन्न बंध हेतु-भेद मानीयै ।
पापके उदै असाता ताकौ है कटुक स्वाद,
पुन्न उदै साता मिष्ट रस भेद जानियै ॥
पाप संकलेस रूप पुन्न है विसुद्ध रूप,
दुहूंकौ सुभाव भिन्न भेद यौं बखानियै ।
पापसौं कुगति होइ पुन्नसैं सुगति होइ,
ऐसौ फलभेद परतच्छि परमानियै ॥५॥

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((सवैया इकतीसा))
पाप बंध पुन्न बंध दुहूंमै मुकति नाहि,
कटुक मधुर स्वाद पुग्गलकौ पेखिए ।
संकलेस विसुद्ध सहज दोऊ कर्मचाल,
कुगति सुगति जगजालमै विसेखिए ॥
कारनादि भेद तोहि सूझत मिथ्यात मांहि,
ऐसौ द्वैत भाव ग्यान दृष्टिमैं न लेखिए ।
दोऊ महा अंधकूप दोऊ कर्मबंधरूप,
दुईकौ विनास मोख मारगमै देखिए ॥६॥

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((सवैया इकतीसा))
सील तप संजम विरति दान पूजादिक,
अथवा असंजम कषाय विषैभोग है ।
कोऊ सुभरूप कोऊ अशुभ स्वरूप
मूल वस्तुके विचारत दुविध कर्मरोग है ॥
ऐसी बंधपद्धति बखानी वीतराग देव,
आतम धरममैं करम त्याग-जोग है ।
भौ-जल-तरैया राग-द्वैषकौ हरैया महा,
मोखको करैया एक सुद्ध उपयोग है ॥7॥

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((सवैया इकतीसा))
सिष्य कहै स्वामी तुम करनी असुभ सुभ,
कीनी है निषेध मेरे संसै मन मांही है ।
मोखके सधैया ग्याता देसविरती मनीस,
तिनकी अवस्था तौ निरावलंब नांही है ॥
कहै गुरु करमकौ नास अनुभौ अभ्यास,
ऐसौ अवलंब उनहीकौ उन पांही है ।
निरुपाधि आतम समाधि सोई सिवरूप,
और दौर धूप पुदगल परछांही है ॥८॥

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((सवैया इकतीसा))
मोख सरूप सदा चिनमूरति,
बंधमई करतूति कही है ।
जावतकाल बसै जहाँ चेतन,
तावत सो रस रीति गही है ॥
आतमको अनुभौ जबलौं,
तबलौं शिवरूप दसा निबही है ।
अंध भयौ करनी जब ठानत,
बंध विथा तब फैल रही है ॥९॥

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((सोरठा))
अंतर-दृष्टि-लखाउ, निज सरूपकौ आचरन ।
ए परमातम भाउ, सिव कारन येई सदा ॥१०॥

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((सोरठा))
करम सुभासुभ दोइ, पुदगलपिंड विभाव मल ।
इनसौं मुकति न होइ, नहिं केवल पद पाइए ॥११॥

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((सवैया इकतीसा))
कोऊ शिष्य कहै स्वामी! असुभक्रिया असुद्ध,
सुभक्रिया सुद्ध तुम ऐसी क्यौं न वरनी ।
गुरु कहैं जबलौं क्रियाके परिनाम रहैं,
तबलौं चपल उपयोग जोग धरनी ॥
थिरता न आवै तोलौं सुद्ध अनुभौ न होइ,
यातें दोऊ क्रिया मोख-पंथकी कतरनी ।
बंधकी करैया दोऊ दुहूमें न भली कोऊ,
बाधक विचारि मैं निसिद्ध कीनी करनी ॥१२॥

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((सवैया इकतीसा))
मुकतिके साधककौं बाधक करम सब,
आतमा अनादिकौ करम मांहि लुक्यौ है ।
एते पर कहै जो कि पाप बुरौ पुन्न भलौ,
सोई महा मूढ़ मोख मारगसौं चुक्यौ है ॥
सम्यक सुभाउ लिये हियमै प्रगट्यौ ग्यान,
उरध उमंगि चल्यौ काहूपै न रुक्यौ है ।
आरसीसौ उज्जल बनारसी कहत आपु,
कारन सरूप हैके कारजकौं ढुक्यौ है ॥१३॥

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((सवैया इकतीसा))
जौलौं अष्ट कर्मको विनास नांही सरवथा,
तौलौं अंतरातमामैं धारा दोइ बरनी ।
एक ज्ञानधारा एक सुभासुभ कर्मधारा,
दुहूंकी प्रकृति न्यारी न्यारी न्यारी धरनी ॥
इतनौ विसेस जु करमधारा बंधरूप,
पराधीन सकति विविध बंध करनी ।
ज्ञानधारा मोखरूप मोखकी करनहार,
दोखकी हरनहार भौ-समुद्र-तरनी ॥१४॥

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((सवैया इकतीसा))
समुझै न ज्ञान कहैं करम कियेसौं मोख,
ऐसे जीव विकल मिथ्यातकी गहलमैं ।
ज्ञान पच्छ गहै कहैं आतमा अबंध सदा,
बरतें सुछंद तेऊ बूड़े है चहलमैं ॥
जथा जोग करम करै पै ममता न धरै,
रहै सावधान ग्यान ध्यानकी टहलमैं ।
तेई भव सागरके ऊपर है तरै जीव,
जिन्हिको निवास स्यादवादके महलमैं ॥15॥

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((सवैया इकतीसा))
जैसैं मतवारौ कोऊ कहै और करै और,
तैसैं मूढ़ प्रानी विपरीतता धरतु है ।
असुभ करम बंध कारन बखानै माने,
मुकतिके हेतु सुभ-रीति आचरतु है ॥
अंतर सुदृष्टि भई मूढ़ता बिसर गई,
ज्ञानको उदोत भ्रम-तिमिर हरतु है ।
करनीसौं भिन्न रहै आतम-सुरूप गहै,
अनुभौ अरंभि रस कौतुक करतु है ॥16॥

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((दोहा))
पाप पुन्नकी एकता, वरनी अगम अनूप ।
अब आस्रव अधिकार कछु, कहौं अध्यातम रूप ॥१॥

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((सवैया इकतीसा))
जेते जगवासी जीव थावर जंगमरूप,
तेते निज बस करि राखे बल तोरिकैं ।
महा अभिमानी ऐसौ आस्रव अगाध जोधा,
रोपि रन-थंभ ठाडो भयौ मूछ मोरिकैं ॥
आयौ तिहि थानक अचानक परम धाम,
ज्ञान नाम सुभट सवायौ बल फोरिकैं ।
आस्रव पछार्यौ रन-थंभ तोरि डार्यौ ताहि,
निरखि बनारसी नमत कर जोरिकै ॥२॥

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((सवैया तेवीसा))
दर्वित आस्रव सो कहिए जहं,
पुग्गल जीवप्रदेस गरासै ।
भावित आस्रव सो कहिए जहं,
राग विरोध विमोह विकासै ॥
सम्यक पद्धति सो कहिए जहं,
दर्वित भावित आस्रव नासै ।
ज्ञान कला प्रगटै तिहि थानक,
अंतर बाहिर और न भासै ॥३॥

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((चौपाई))
जो दरवास्रव रूप न होई ।
जहं भावास्रव भाव न कोई ॥
जाकी दसा ज्ञानमय लहिए ।
सो ज्ञातार निरास्रव कहिए ॥४॥

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((सवैया इकतीसा))
जेते मनगोचर प्रगट-बुद्धि-पूरवक,
तिह परिनामनकी मतता हरतु है ।
मनसौं अगोचर अबुद्धि-पूरवक भाव,
तिनके विनासिवेकौं उद्दिम धरतु है ॥
याही भांति पर परनतिकौ पतन करै,
मोखकौ जतन करै भौ-जल तरतु है ।
ऐसे ज्ञानवंत ते निरास्रव कहावैं सदा,
जिन्हिकौ सुजस सुविचच्छन करतु है ॥५॥

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((सवैया तेवीसा))
ज्यौं जगमैं विचरै मतिमंद,
सुछंद सदा वरतै बुध तैसो ।
चंचल चित्त असंजित वैन,
सरीर-सनेह जथावत जैसो ॥
भोग संजोग परिग्रह संग्रह,
मोह विलास करै जहं ऐसो ।
पूछत सिष्य आचारजसौं यह,
सम्यकवंत निरास्रव कैसो ॥6॥

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((सवैया इकतीसा))
पूरव अवस्था जे करम-बंध कीने अब,
तेई उदै आइ नाना भांति रस देत हैं ।
केई सुभ साता कोई असुभ असातारूप,
दुहूंसौं न राग न विरोध समचेत हैं ॥
जथाजोग क्रिया करैं फलकी न इच्छा धरैं,
जीवन-मुकतिकौ बिरद गहि लेत हैं,
यातें ज्ञानवंतकौं न आस्रव कहत कोऊ,
मुद्धतासौं न्यारे भए सुद्धता समेत हैं ॥७॥

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((दोहा))
जो हितभाव सु राग है, अनहितभाव विरोध ।
भ्रामिक भाव विमोह हे, निरमल भाव सु बोध ॥8॥

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((दोहा))
राग विरोध विमोह मल, एई आस्रवमूल ।
एई करम बढ़ाईकैं, करैं धरमकी भूल ॥9॥

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((दोहा))
जहां न रागादिक दसा, सो सम्यक परिनाम ।
यातें सम्यकवंतकौ, कह्यौ निरास्रव नाम ॥१०॥

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((सवैया इकतीसा))
जे केई निकटभव्यरासी जगवासी जीव,
मिथ्यामतभेदि ज्ञान भाव परिनए हैं ।
जिन्हिकी सुदृष्टिमैं न राग द्वेष मोह कहूं,
विमल विलोकनिमैं तीनौं जीति लए हैं ॥
तजि परमाद घट सोधि जे निरोधि जोग,
सुद्ध उपयोगकी दसामैं मिलि गए हैं ।
तेई बंधपद्धति विदारि परसंग डारि,
आपमैं भगत ह्वैकै आपरूप भए हैं ॥११॥

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((सवैया इकतीसा))
जेते जीव पंडित खयोपसमी उपसमी,
तिन्हकी अवस्था ज्यौं लुहारकी संडासी है ।
खिन आगमांहि खिन पानीमांहि तैसैं एऊ,
खिनमैं मिथ्यात खिन ज्ञानकला भासी है ॥
जौलौं ज्ञान रहैं तौलौं सिथिल चरन मोह,
जैसैं कीले नागकी सकति गति नासी है ।
आवत मिथ्यात तब नानारूप बंध करै,
ज्यौं उकीले नागकी सकति परगासी है ॥12॥

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((दोहा))
यह निचोर या ग्रंथकौ, यहै परम रसपोख ।
तजै सुद्धनय बंध है, गहै सुद्धनय मोख ॥13॥

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( सवैया इकतीसा)
करमके चक्रमैं फिरत जगवासी जीव,
ह्वै रह्यौ बहिरमुख व्यापत विषमता ।
अंतर सुमति आई विमल बड़ाई पाई,
पुद्गलसौं प्रीति टूटी छूटी माया ममता ॥
सुद्धनै निवास कीनौ अनुभौ अभ्यास लीनौ,
भ्रमभाव छोड़ि दीनौ भीनौ चित्त समता ।
अनादि अनंत अविकलप अचल ऐसौ,
पद अवलंबि अवलोकै राम रमता ॥१४॥

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((सवैया इकतीसा))
जाके परगासमैं न दीसैं राग द्वेष मोह,
आस्रव मिटत नहि बंधकौ तरस है ।
तिहूं काल जामै प्रतिबिंबित अनंतरूप,
आपहूं अनंत सत्ता नंततैं सरस है ॥
भावश्रुत ज्ञान परवान जो विचारि वस्तु,
अनुभौ करै न जहां बानीकौ परस है ।
अतुल अखंड अविचल अविनासी धाम,
चिदानंद नाम ऐसौ सम्यक दरस है ॥१५॥

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((दोहा))
आस्रवको अधिकार यह, कह्यौ जथावत जेम।
अब संवर वरनन करौं, सुनहु भविक धरि प्रेम ॥१॥

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((सवैया इकतीसा))
आतमको अहित अध्यातमरहित ऐसौ,
आस्रव महातम अखंड अंडवत है।
ताकौ विसतार गिलिबेकौं परगट भयौ,
ब्रहमंडकौ विकासी ब्रहमंडवत है ॥
जामै सब रूप जो सबमैं सबरूपसौ पै,
सबनिसौं अलिप्त आकास-खंडवत है।
सोहै ज्ञानभान सुद्ध संवरकौ भेष धरै,
ताकी रुचि-रेखकौ हमारी दंडवत है ॥२॥

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((सवैया इकतीसा))
सुद्ध सुछंद अभेद अबाधित, भेद-विज्ञान सुतीछन आरा ।
अंतरभेद सुभाव विभाऊ, करै जड़-चेतनरूप दुफारा ॥
सो जिन्हके उरमैं उपज्यौ, न रुचै तिन्हकौं परसंग-सहारा ।
आतमकौ अनुभौ करि ते, हरखैं परखैं परमातम-धारा ॥३॥

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((सवैया तेवीसा))
जो कबहुं यह जीव पदारथ,
औसर पाइ मिथ्यात मिटावे ।
सम्यक धार प्रबाह बहै गुन,
ज्ञान उदै मुख ऊरध धावै ॥
तो अभिअंतर दर्वित भावित,
कर्म कलेस प्रवेस न पावै ।
आतम साधि अध्यातमके पथ,
पूरन है परब्रह्म कहावै ॥४॥

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((सवैया तेवीसा))
भेदि मिथ्यात सु वेदि महारस, भेद-विज्ञान कला जिन्ह पाई ।
जो अपनी महिमा अवधारत, त्याग करैं उर सौंज पराई ।
उद्धत रीति फुरी जिन्हके घट, होत निरंतर जोति सवाई ।
ते मतिमान सुवर्न समान, लगै तिन्हकौं न सुभासुभ काई ॥५॥

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((अडिल्ल छंद))
भेदज्ञान संवर-निदान निरदोष है ।
संवरसौं निरजरा, अनुक्रम मोष है ॥
भेदज्ञान सिवमूल, जगतमहि मानिये ।
जदपि हेय है तदपि, उपादेय जानिये ॥६॥

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