
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
कथञ्चिदन्वयप्रतिभासेsप्यध्यवसानादय: पुद्गलस्वभावा इति चेत् - अध्यवसानादिभावनिर्वर्तकमष्टविधमपि च कर्म समस्तमेव पुद्गलमयमिति किल सकलज्ञ-ज्ञप्तिः । तस्य तु यद्विपाककाष्ठामधिरूढस्य फलत्वेनाभिलप्यते तदनाकुलत्वलक्षणसौख्याख्यात्म-स्वभावविलक्षणत्वात्किल दुःखम् । तदन्तःपातिन एव किलाकुलत्वलक्षणा अध्यवसानादिभावाः । ततो न ते चिदन्वयविभ्रमेऽप्यात्मस्वभावाः, किन्तु पुद्गलस्वभावाः । अब शिष्य पूछता है कि इन अध्यवसानादि भावों को जीव नहीं कहा, अन्य चैतन्यस्वभाव को जीव कहा; तो यह भाव भी चैतन्य के साथ सम्बन्ध रखनेवाले प्रतिभासित होते हैं, (वे चैतन्य के अतिरिक्त जड़ के तो दिखाई नहीं देते) तथापि उन्हें पुद्गल के स्वभाव क्यों कहा ? उसके उत्तरस्वरूप गाथासूत्र कहते हैं :- अध्यवसानादि समस्त भावों को उत्पन्न करनेवाला जो आठों प्रकार का ज्ञानावरणादि कर्म है वह सभी पुद्गल-मय है ऐसा सर्वज्ञ का वचन है । विपाक की मर्यादा को प्राप्त उस कर्म के फलरूप से जो कहा जाता है वह, (अर्थात् कर्मफल) अनाकुलता-लक्षण सुखनामक आत्मस्वभाव से विलक्षण है इसलिए, दु:ख है । उस दु:ख में ही आकुलता-लक्षण अध्यवसानादि भाव समाविष्ट हो जाते हैं; इसलिए, यद्यपि वे चैतन्य के साथ सम्बन्ध होने का भ्रम उत्पन्न करते हैं तथापि वे आत्म-स्वभाव नहीं हैं किन्तु पुद्गल-स्वभाव हैं । |
जयसेनाचार्य :
[अट्ठविहं पि य कम्मं सव्वे पुग्गलमयं जिणाविंति] सभी आठ प्रकार के कर्म पुद्गलमय हैं ऐसा जिनेन्द्र वीतराग सर्वज्ञदेव कहते हैं । वे कर्म पुद्गलमय कैसे हैं ? [जस्स फलं तं वुच्चदि दुक्खं त्ति विपच्चमाणस्स] जिनकर्मों का फल प्रसिद्ध है ऐसा कहा गया है । प्रश्न – क्या कहा गया है ? उत्तर – व्याकुलपना स्वभाव होने से दुख कहा गया है । प्रश्न – किसप्रकार के कर्मों का फल दु:ख है ? उत्तर – विशेष रूप से उदय में आये हुए कर्मों का फल दु:ख है । यहां तात्पर्य यह है कि आठ प्रकार के पुद्गल कर्मों का कार्य, अनाकुलता लक्षण वाले परमार्थिक सुख से विलक्षण आकुलता उत्पन्न करनेवाला दु:ख है और रागादिभाव भी आकुलता उत्पन्न करनेवाले दु:ख लक्षण रूप है । इसकारण से रागादिकभाव भी पुद्गल के ही कार्य हैं इसलिए शुद्ध-निश्चयनय से वे पौद्गलिक हैं । आठ प्रकार के कर्म पुद्गल-द्रव्य ही हैं- ऐसा कथन करनेवाली गाथा पूर्ण हुई ॥५०॥ |