+ आठों कर्मों का फल -- अध्यवसान -
अठ्ठविहं पि य कम्मं सव्वं पोग्गलमयं जिणा बेंति । (45)
जस्स फलं तं वुच्चदि दुक्खं ति विपच्चमाणस्स ॥50॥
अष्टविधमपि च कर्म सर्वं पुद्गलमयं जिना बु्रवन्ति
यस्य फलं तदुच्यते दु:खमिति विपच्यमानस्य ॥४५॥
रे ! कर्म अष्ट प्रकार का, जिन सर्व पुद्गलमय कहे ।
परिपाकमें जिस कर्मका फल दु:ख नाम प्रसिद्ध है ॥४५॥
अन्वयार्थ : [अठ्ठविहं पि य] आठों प्रकार का [कम्मं] कर्म [सव्वं] सब [पोग्गलमयं] पुद्गलमय है ऐसा [जिणा] जिनेन्द्रभगवान सर्वज्ञदेव [बेंति] कहते हैं - [जस्स विपच्चमाणस्स] जो पक्व होकर उदय में आनेवाले कर्म का [फलं] फल [तं] प्रसिद्ध [दुक्खं] दु:ख है [ति वुच्चदि] ऐसा कहा है ।
Meaning : As pronounced by the Omniscient Lord, all the eight kinds of karmas are subtle material particles, and that the fruition of these karmas results into suffering that everyone recognizes.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
कथञ्चिदन्वयप्रतिभासेsप्यध्यवसानादय: पुद्गलस्वभावा इति चेत् -

अध्यवसानादिभावनिर्वर्तकमष्टविधमपि च कर्म समस्तमेव पुद्गलमयमिति किल सकलज्ञ-ज्ञप्तिः । तस्य तु यद्विपाककाष्ठामधिरूढस्य फलत्वेनाभिलप्यते तदनाकुलत्वलक्षणसौख्याख्यात्म-स्वभावविलक्षणत्वात्किल दुःखम् । तदन्तःपातिन एव किलाकुलत्वलक्षणा अध्यवसानादिभावाः । ततो न ते चिदन्वयविभ्रमेऽप्यात्मस्वभावाः, किन्तु पुद्गलस्वभावाः ।


अब शिष्य पूछता है कि इन अध्यवसानादि भावों को जीव नहीं कहा, अन्य चैतन्यस्वभाव को जीव कहा; तो यह भाव भी चैतन्य के साथ सम्बन्ध रखनेवाले प्रतिभासित होते हैं, (वे चैतन्य के अतिरिक्त जड़ के तो दिखाई नहीं देते) तथापि उन्हें पुद्गल के स्वभाव क्यों कहा ? उसके उत्तरस्वरूप गाथासूत्र कहते हैं :-

अध्यवसानादि समस्त भावों को उत्पन्न करनेवाला जो आठों प्रकार का ज्ञानावरणादि कर्म है वह सभी पुद्गल-मय है ऐसा सर्वज्ञ का वचन है । विपाक की मर्यादा को प्राप्त उस कर्म के फलरूप से जो कहा जाता है वह, (अर्थात् कर्मफल) अनाकुलता-लक्षण सुखनामक आत्मस्वभाव से विलक्षण है इसलिए, दु:ख है । उस दु:ख में ही आकुलता-लक्षण अध्यवसानादि भाव समाविष्ट हो जाते हैं; इसलिए, यद्यपि वे चैतन्य के साथ सम्बन्ध होने का भ्रम उत्पन्न करते हैं तथापि वे आत्म-स्वभाव नहीं हैं किन्तु पुद्गल-स्वभाव हैं ।
जयसेनाचार्य :

[अट्ठविहं पि य कम्मं सव्वे पुग्गलमयं जिणाविंति] सभी आठ प्रकार के कर्म पुद्गलमय हैं ऐसा जिनेन्द्र वीतराग सर्वज्ञदेव कहते हैं । वे कर्म पुद्गलमय कैसे हैं ? [जस्स फलं तं वुच्चदि दुक्खं त्ति विपच्चमाणस्स] जिनकर्मों का फल प्रसिद्ध है ऐसा कहा गया है ।

प्रश्न – क्या कहा गया है ?

उत्तर –
व्याकुलपना स्वभाव होने से दुख कहा गया है ।

प्रश्न – किसप्रकार के कर्मों का फल दु:ख है ?

उत्तर –
विशेष रूप से उदय में आये हुए कर्मों का फल दु:ख है ।

यहां तात्पर्य यह है कि आठ प्रकार के पुद्गल कर्मों का कार्य, अनाकुलता लक्षण वाले परमार्थिक सुख से विलक्षण आकुलता उत्पन्न करनेवाला दु:ख है और रागादिभाव भी आकुलता उत्पन्न करनेवाले दु:ख लक्षण रूप है । इसकारण से रागादिकभाव भी पुद्गल के ही कार्य हैं इसलिए शुद्ध-निश्चयनय से वे पौद्गलिक हैं । आठ प्रकार के कर्म पुद्गल-द्रव्य ही हैं- ऐसा कथन करनेवाली गाथा पूर्ण हुई ॥५०॥