+ अध्यवसान-भाव जीव है - व्यवहार -
ववहारस्स दरीसणमुवएसो वण्णिदो जिणवरेहिं । (46)
जीवा एदे सव्वे अज्झवसाणादओ भावा ॥51॥
व्यवहारस्य दर्शनमुपदेशो वर्णितो जिनवरै:
जीवा एते सर्वेऽध्यवसानादयो भावा: ॥४६॥
व्यवहार ये दिखला दिया, जिनदेव के उपदेश में
ये सर्व अध्यवसान आदिक, भाव को जँह जिव कहे ॥४६॥
अन्वयार्थ : [एदे सव्वे] यह सब [अज्झवसाणादओ भावा] अध्यवसानादि भाव [जीवा] जीव हैं इसप्रकार [जिणवरेहिं] जिनेन्द्र-देव ने [उवएसो] जो उपदेश दिया है सो [ववहारस्स दरीसणमु] व्यवहारनय [वण्णिदो] दिखाया है ।
Meaning : It is only from the empirical point of view (vyavahâra naya) that the Omniscient Lord has declared all these affective states to be of the nature of the Self.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
यद्यध्यवसानादय: पुद्गलस्वभावास्तदा कथं जीवत्वेन सूचिता इति चेत् -

सर्वे एवैतेऽध्यवसानादयो भावाः जीवा इति यद्भगवद्भिः सकलज्ञैः प्रज्ञप्तं तदभूतार्थस्यापिव्यवहारस्यापि दर्शनम् । व्यवहारो हि व्यवहारिणां म्लेच्छभाषेव म्लेच्छानां परमार्थप्रतिपादकत्वाद-परमार्थोऽपि तीर्थप्रवृत्तिनिमित्तं दर्शयितुं न्याय्य एव । तमन्तरेण तु शरीराज्जीवस्य परमार्थतो भेददर्शनात्त्रसस्थावराणां भस्मन इव निःशंक मुपमर्दनेन हिंसाऽभावाद्भवत्येव बन्धस्याभावः । तथारक्तद्विष्टविमूढो जीवो बध्यमानो मोचनीय इति रागद्वेषमोहेभ्यो जीवस्य परमार्थतो भेददर्शनेन मोक्षोपायपरिग्रहणाभावात् भवत्येव मोक्षस्याभावः ।


अब प्रश्न होता है कि यदि अध्यवसानादि भाव हैं वे पुद्गल-स्वभाव हैं तो सर्वज्ञ के आगम में उन्हें जीवरूप क्यों कहा गया है ? उसके उत्तर-स्वरूप गाथासूत्र कहते हैं :-

यह सब अध्यवसानादि भाव जीव हैं ऐसा जो भगवान सर्वज्ञ-देव ने कहा है वह, यद्यपि व्यवहार-नय अभूतार्थ है तथापि, व्यवहार-नय को भी बताया है; क्योंकि जैसे म्लेच्छों की म्लेच्छ-भाषा वस्तु-स्वरूप बतलाती है उसीप्रकार व्यवहारनय व्यवहारी जीवों को परमार्थ का कहने वाला है इसलिए अपरमार्थ-भूत होने पर भी, धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करने के लिए वह (व्यवहारनय) बतलाना न्याय-सङ्गत ही है । परन्तु यदि व्यवहारनय न बताया जाये तो, परमार्थ से (निश्चय-नय से ) शरीर से जीव को भिन्न बताया जाने पर भी, जैसे भस्म को मसल देने से हिंसा का अभाव है उसीप्रकार, त्रस-स्थावर जीवों को नि:शङ्कतया मसल देने कुचल देने (घात करने) में भी हिंसा का अभाव ठहरेगा और इस कारण बन्ध का ही अभाव सिद्ध होगा; तथा परमार्थ के द्वारा जीव राग-द्वेष-मोह से भिन्न बताया जाने पर भी, 'रागी, द्वेषी, मोही जीव कर्म से बंधता है उसे छुड़ाना'- इसप्रकार मोक्ष के उपाय के ग्रहण का अभाव हो जायेगा और इससे मोक्ष का ही अभाव होगा ॥४६॥

(इसप्रकार यदि व्यवहार-नय न बताया जाय तो बन्ध-मोक्ष का ही अभाव ठहरता है ।)
जयसेनाचार्य :

[ववहारस्य दरीसणं] व्यवहारनय का स्वरूप दिखाया है । किसके द्वारा व्यवहार दिखाया गया है ? [उवएसो वण्णिदो जिणवरेहिं] जिनेन्द्र भगवन्तों द्वारा उपदेशवर्णन किया गया है, कथन किया गया है । किसप्रकार का उपदेश वर्णन किया है ? [जीवा एदे सव्वे अज्झवसाणादओ भावा] ये सब अध्यवसानादि भाव या परिणाम जीवरूप कहे गये है ।

अब विशेष कहते हैं- यद्यपि यह व्यवहार-नय बाह्य-द्रव्यों के अवलम्बन वाला होने से अभूतार्थ है तथापि रागादि बाह्य-द्रव्यों के अवलम्बन से रहित, विशुद्ध ज्ञान-दर्शन-स्वभाव स्वालम्बन सहित ऐसे परमार्थ का प्रतिपादक होने से उसका दिखाया जाना उचित है । यदि व्यवहार-नय नहीं होता तब तो शुद्ध निश्चय-नय से त्रस स्थावर जीव नहीं है ऐसा मानकर उनका नि:शङ्क होकर लोग मर्दन करते । इससे पुण्य रूप (व्यवहार) धर्म का अभाव होता, यह एक दूषण है । उसीप्रकार शुद्ध-निश्चय-नय से तो जीव राग-द्वेष-मोह-रहित पहले से ही हैं, इसलिए मुक्त ही हैं ऐसा मानकर फिर मोक्ष के लिए कोई भी अनुष्ठान नहीं करता । इससे मोक्ष का अभाव होता, यह दूसरा दूषण है । इसलिए व्यवहार-नय का व्याख्यान करना उचित है, ऐसा अभिप्राय है ॥४६॥