
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
कुतो जीवस्य वर्णादयो निश्चयेन न संतीति चेत् - यथा खलु सलिलमिश्रितस्य क्षीरस्य सलिलेन सह परस्परावगाहलक्षणे सम्बन्धेसत्यपि स्वलक्षणभूतक्षीरत्वगुणव्याप्यतया सलिलादधिकत्वेन प्रतीयमानत्वादग्नेरुष्णगुणेनेव सह तादात्म्यलक्षणसम्बन्धाभावात् न निश्चयेन सलिलमस्ति, तथा वर्णादिपुद्गलद्रव्यपरिणाममिश्रितस्यास्यात्मनः पुद्गलद्रव्येण सह परस्परावगाहलक्षणे सम्बन्धे सत्यपि स्वलक्षणभूतोपयोगगुणव्याप्यतया सर्वद्रव्येभ्योऽधिकत्वेन प्रतीयमानत्वादग्नेरुष्णगुणेनेव सह तादात्म्यलक्षणसम्बन्धाभावात् न निश्चयेन वर्णादिपुद्गलपरिणामाः सन्ति । अब फिर शिष्य प्रश्न पूछता है कि वर्णादिक निश्चय से जीव के क्यों नहीं हैं इसका कारण कहिये । इसका उत्तर गाथारूप से कहते हैं :- जैसे जल-मिश्रित दूध का, जल के साथ परस्पर अवगाह-स्वरूप सम्बन्ध होने पर भी, स्व-लक्षण-भूत दुग्धत्व-गुण के द्वारा व्याप्त होने से दूध जल से अधिकपने से प्रतीत होता है; इसलिए जैसा अग्नि का उष्णता के साथ तादात्म्य-स्वरूप सम्बन्ध है वैसा जल के साथ दूध का सम्बन्ध न होने से, निश्चय से जल दूध का नहीं है; इसप्रकार वर्णादिक पुद्गल-द्रव्य के परिणामों के साथ मिश्रित इस आत्मा का, पुद्गल-द्रव्य के साथ परस्पर अवगाह-स्वरूप सम्बन्ध होने पर भी, स्व-लक्षण-भूत उपयोग गुण के द्वारा व्याप्त होने से आत्मा सर्व द्रव्यों से अधिकपने से (परिपूर्णपने से) प्रतीत होता है; इसलिए जैसा अग्नि का उष्णता के साथ तादात्म्य-स्वरूप सम्बन्ध है वैसा वर्णादिक के साथ आत्मा का सम्बन्ध नहीं है, इसलिए निश्चय से वर्णादिक पुद्गल परिणाम आत्मा के नहीं है । |
जयसेनाचार्य :
[एदेहिं य सम्बन्धो जहेव खीरोदयं मुणेदव्वो] इन पूर्वोक्त पर्यायरूप वर्णादि से लेकर गुणस्थान के अन्तर्गत आनेवाले भावों के साथ जीव का वैसा ही संश्लेष सम्बन्ध है, जैसा कि दूध एवं जल में संश्लेष सम्बन्ध होता है । ऐसा मानना योग्य है परन्तु अग्नि और उष्णता की तरह तादात्म्य सम्बन्ध नहीं है प्रश्न – तादात्म्य सम्बन्ध क्यों नहीं है ? [ण य होंति तस्स ताणि दु ] उत्तर – वर्णादिक से लेकर गुणस्थान-पर्यन्त भाव उस जीव के नहीं हैं । प्रश्न – किस कारण से जीव के नहीं हैं ? उत्तर – [उवओग गुणाधिगो जम्हा] क्योंकि जैसे अग्नि उष्णता से परिपूर्ण है, वैसे जीव केवल-ज्ञान केवल-दर्शन गुण से अधिक है, परिपूर्ण है । प्रश्न – यहां जो बहिरंग वर्णादिक हैं उनका जीव के साथ संश्लेष सम्बन्ध क्षीर-नीर (दूध-पानी) की तरह व्यवहार से भले होने परन्तु अभ्यन्तर में होने वाले रागादिक भावों का संयोग सम्बन्ध नहीं होना चाहिए । उत्तर – ऐसा नहीं है, क्योंकि द्रव्य-कर्म बन्ध की अपेक्षा जो असद्भूत-व्यवहार है उसकी अपेक्षा से तारतम्यता दिखलाने के लिए रागादिक भावों को अशुद्ध निश्चय से कहा जाता है परन्तु वस्तुत: शुद्ध-निश्चय-नय की अपेक्षा से तो अशुद्ध-निश्चय-नय भी व्यवहार ही है, ऐसा भावार्थ है ॥५७॥ |