
जयसेनाचार्य :
[कत्ता आदा भणिदो ण य कत्ता सो] आत्मा कर्त्ता भी है और अकर्त्ता भी है, [केण उवाएण] किसी एक नय विभाग से अर्थात् निश्चय-नय से अकर्त्ता और व्यवहार-नय से कर्त्ता [धम्मादी परिणामे] पुण्य-पापादि कर्म जनित विकारी-भावों का है । इस प्रकार [जो जाणदि सो हवदि णाणी] ख्याति-लाभ-पूजादि समस्त रागादि विकल्पमय औपाधिक परिणामों से रहित समाधि में स्थित होकर जो जानता है, वह ज्ञानी होता है । इस प्रकार निश्चय-नय से अकर्त्तापन और व्यवहार-नय से कर्त्तापन का व्याख्यान करने वाली गाथा हुई । |