
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
पुद्गलकर्म जानतो जीवस्य सह पुद्गलेन कर्तृकर्मभावः किं भवति किं न भवतीति चेत् - यतो यं प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं पुद्गलपरिणामं कर्म पुद्गलद्रव्येणस्वयमन्तर्व्यापकेन भूत्वादिमध्यान्तेषु व्याप्य तं गृह्णता तथा परिणमता तथोत्पद्यमानेन च क्रियमाणं जानन्नपि हि ज्ञानी स्वयमन्तर्व्यापको भूत्वा बहिःस्थस्य परद्रव्यस्य परिणामं मृत्तिकाकलशमिवादिमध्यान्तेषु व्याप्य न तं गृह्णाति न तथा परिणमति न तथोत्पद्यते च, ततः प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं परद्रव्यपरिणामं कर्माकुर्वाणस्य, पुद्गलकर्म जानतोऽपि ज्ञानिनः पुद्गलेन सह न कर्तृकर्मभावः । चूंकि प्राप्य, विकार्य, निर्वर्त्य ऐसे व्याप्य-लक्षण वाले पुद्गल परिणाम को, जो कि स्वयं अन्तर्व्यापक होकर आदि-मध्य-अन्तमें व्यापकर
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जयसेनाचार्य :
[पुग्गलकम्मं अणेयविहं] उपादान कारणभूत कर्म-वर्गणा योग्य पुद्गल-द्रव्य द्वारा किया हुआ है ऐसे मूल और उत्तर प्रकृति के भेद से अनेक प्रकार होने वाले पुद्गल-कर्म को [जाणंतो वि हु] विशिष्ट-भेदज्ञान के द्वारा स्पष्टरूप से जानता हुआ भी जाणी सहजानंद स्वरूप-एक-स्वभाव-वाला निज शुद्धात्मा और रागादि-आस्रव इन दोनों के भेद का ज्ञान रखनेवाला जीव, [ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि णपरदव्वपज्जाए] न तो परद्रव्य-पर्याय स्वरूप पूर्वोक्त कर्म के रूप में निश्चय से परिणमन ही करता है; जैसे कि मिट्टी-कलशरूप में परिणमन कर जाती है, और न तादात्म्य सम्बन्ध से ग्रहण ही करता है और न उसके आकार होकर उत्पन्न ही होता है । क्योंकि जिस प्रकार मिट्टी और कलश में परस्पर तादात्म्य संबंध है वैसा तादात्म्य संबंध जीव का पुद्गल-कर्म के साथ नहीं है । इसका अर्थ यह हुआ कि पुद्गल-कर्म को जानने वाले जीव का पुद्गल के साथ निश्चय से कर्त्ता-कर्म भाव नहीं है ॥८२॥ |
notes :
निर्वर्त्य : when anything new is produced: Example : कटं करोति - he makes a mat Example : पुत्रं प्रसूते - she bears a son; विकार्य (vi-kārya), when change is implied either of the substance and form Example : काष्ठं भस्म करोति - he reduces fuel to ashes; Example : सुवर्णं कुण्डलं करोति - he fashions gold into an ear-ring प्राप्य : when any desired object is attained Example : ग्रामं गच्च्हति - he goes to the village Example : चन्द्रं पश्यति - he sees the moon अन्तर्व्यापक को कर्ता कहते हैं । अन्तर्व्याप्यको कर्म कहते हैं । |