
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
जीवपरिणामं स्वपरिणामं स्वपरिणामफलं चाजानतः पुद्गलद्रव्यस्य सह जीवेन कर्तृकर्मभावःकिं भवति किं न भवतीति चेत् - यतो जीवपरिणामं स्वपरिणामं स्वपरिणामफलं चाप्यजानत् पुद्गलद्रव्यं स्वयमन्तर्व्यापकंभूत्वा परद्रव्यस्य परिणामं मृत्तिकाकलशमिवादिमध्यान्तेषु व्याप्य न तं गृह्णाति न तथा परिणमति न तथोत्पद्यते च, किन्तु प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं स्वभावं कर्म स्वयमन्तर्व्यापकं भूत्वादिमध्यान्तेषु व्याप्य तमेव गृह्णाति तथैव परिणमति तथैवोत्पद्यते च; ततः प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं परद्रव्यपरिणामं कर्माकुर्वाणस्य जीवपरिणामं स्वपरिणामं स्वपरिणामफलं चाजानतः पुद्गलद्रव्यस्य जीवेन सह न कर्तृकर्मभावः । (कलश--स्रग्धरा) ज्ञानी जानन्नपीमां स्वपरपरिणतिं पुद्गलश्चाप्यजानन् व्याप्तृव्याप्यत्वमन्तः कलयितुमसहौ नित्यमत्यन्तभेदात् । अज्ञानात्कर्तृकर्मभ्रममतिरनयोर्भाति तावन्न यावत् विज्ञानार्चिश्चकास्ति क्रकचवददयं भेदमुत्पाद्य सद्यः ॥५०॥ जिस कारण जीव के परिणाम को, अपने परिणाम को तथा अपने परिणाम के फल को न जानता हुआ पुद्गल-द्रव्य पर-द्रव्य (जीव) के परिणाम-रूप कर्म को मृत्ति का कलष की तरह आप अंतर्व्यापक होकर आदि, मध्य और अन्त में व्याप्त कर
अब इसी अर्थ के समर्थन का कलषरूप काव्य कहते हैं -- (कलश-सवैया इकतीसा)
[ज्ञानी इमां स्वपरपरिणति] ज्ञानी अपनी और पर की परिणति को [जानन् अपि च] जानता हुआ भी और [पुद्गलः अपि अजानन्] पुद्गल-द्रव्य न जानता हुआ प्रवर्तता है; [नित्यम् अत्यन्त-भेदात्] इसप्रकार उनमें सदा अत्यन्त भेद होने से, [अन्तः व्याप्तृव्याप्यत्वम्] परस्पर में व्याप्यव्यापकभाव को [कलयितुम् असहौ] प्राप्त होने में असमर्थ हैं । [अनयोः कर्तृकर्मभ्रममतिः] जीव-पुद्गल को कर्ता-कर्मभाव है ऐसी भ्रमबुद्धि [अज्ञानात् तावत् भाति] अज्ञानवश वहाँ तक होती है कि [यावत् विज्ञानार्चिः] जहाँ तक (भेदज्ञान करनेवाली) विज्ञान-ज्योति [क्रकचवत् अदयं] करवत् की भाँति निर्दयता से (उग्रता से) [सद्यः भेदम् उत्पाद्य] जीव-पुद्गल का तत्काल भेद उत्पन्न करके [न चकास्ति] प्रकाशित नहीं होती ।
निजपरपरिणति जानकार जीव यह, परपरिणति को करता कभी नहीं । निजपरपरिणति अजानकार पुद्गल, परपरिणति को करता कभी नहीं ॥ नित्य अत्यन्त भेद जीव-पुद्गल में, करता-करमभाव उनमें बने नहीं, ऐसो भेदज्ञान जबतक प्रगटे नहीं, करता-करम की प्रवृत्ती मिटे नहीं ॥५०॥ |
जयसेनाचार्य :
[ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए] जैसे निश्चय-नय से जीव अपने अनंत-सुखादि स्वरूप को छोड़कर पुद्गल-द्रव्य के रूप में न तो परिणमन ही करता है, न तन्मयता से ग्रहण ही करता है और न उसके आकार-रूप उत्पन्न ही होता है, [पोग्गलदव्वं पि तहा] उसी प्रकार पुद्गल-द्रव्य भी स्वयं तादात्म्य स्वरूप से जिस प्रकार मिट्टी-कलश रूप में परिणमन करती है, उसी प्रकार चिदानंद है लक्षण जिसका ऐसे जीव-स्वरूप में न तो परिणमन ही करता है, न तन्मयता के साथ ग्रहण ही करता है और न जीव के आकार ही बनता है, किन्तु [परिणमदि सएहिं भावेहिं] वह भी सदा अपने वर्णादि स्वभाव-रूप गुण-धर्मों के द्वारा ही परिणमन करता है, क्योंकि मृत्तिका और कलश में जैसा तादात्म्य संबंध है वैसा पुद्गल-द्रव्य का जीव के साथ नहीं है । इस प्रकार पुद्गल-द्रव्य भी जीव के साथ उस रूप होकर परिणमन नहीं करता है इत्यादि व्याख्यान की मुख्यता करके गाथा पूर्ण हुई । |