+ ज्ञानी के कर्म-फल में कर्ता-कर्म भाव नहीं -
ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए । (78)
णाणी जाणंतो वि हु पोग्गलकम्मप्फलमणंतं ॥84॥
नापि परिणमति न गृह्णात्युत्पद्यते न परद्रव्यपर्याये ।
ज्ञानी जानन्नपि खलु पुद्गलकर्मफलमनन्तम् ॥७८॥
परद्रव्य की पर्याय में उपजे ग्रहे ना परिणमें
पुद्गल करम का नंतफल ज्ञानी पुरुष जाना करें ॥७८॥
अन्वयार्थ : [णाणी] ज्ञानी [अणेयविहं] अनेक प्रकार के [पोग्गलकम्मप्फलमणंतं] अनन्त पुद्गल-कर्म के फलों को [जाणंतो वि] जानता हुआ भी [हु] निश्चय से [परदव्वपज्जाए] पर द्रव्य के पर्यायों में [ण वि परिणमदि] न ही परिणमित होता है [ण गिण्हदि] न ग्रहण करता है [उप्पज्जदि ण] और न उत्पन्न होता है ।
Meaning : The knower, while knowing the various fruits of karmic matter, surely does not manifest himself in the modifications of alien substances, or assimilate them, or transmute in their form.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
पुद्गलकर्मफलं जानतो जीवस्य सह पुद्गलेन कर्तृकर्मभावः किं भवति किं न भवतीतिचेत् -
यतो यं प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं सुखदुःखादिरूपं पुद्गलकर्मफलं कर्मपुद्गलद्रव्येण स्वयमन्तर्व्यापकेन भूत्वादिमध्यान्तेषु व्याप्य तद् गृह्णता तथा परिणमता तथोत्पद्यमानेन च क्रियमाणं जानन्नपि हि ज्ञानी स्वयमन्तर्व्यापको भूत्वा बहिःस्थस्य परद्रव्यस्य परिणामं मृत्तिकाकलशमिवादिमध्यान्तेषु व्याप्य न तं गृह्णाति न तथा परिणमति न तथोत्पद्यते च, ततः प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च व्याप्यलक्षणं परद्रव्यपरिणामं कर्माकुर्वाणस्य, सुखदुःखादिरूपं पुद्गलकर्मफलं जानतोऽपि, ज्ञानिनः पुद्गलेन सह न कर्तृकर्मभावः ।


जिस कारण प्राप्य, विकार्य, और निर्वर्त्य ऐसे जिसका लक्षण व्याप्य है ऐसा तीन प्रकार का सुख-दुःखादिरूप पुद्गल-कर्म का फल जो कि स्वयं अंतर्व्यापक होकर, आदि-मध्य-अंत में व्याप्त होकर
  • ग्रहण करते हुए,
  • उसी प्रकार परिणमन करते हुए तथा
  • उसी प्रकार उत्पन्न होते हुए
पुद्गल-द्रव्य के द्वारा क्रियमाण को जानता हुआ भी ज्ञानी, आप अंतर्व्यापक होकर बाह्य स्थित पर-द्रव्य के परिणाम को मिट्टी और घड़े की भांति आदि, मध्य और अन्त में व्याप्त कर
  • नहीं ग्रहण करता,
  • उस प्रकार परिणमन भी नहीं करता तथा
  • उस प्रकार उत्पन्न भी नहीं होता ।
इस कारण प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्यरूप व्याप्य-लक्षण पर-द्रव्य के परिणाम-रूप कर्म को नहीं करते हुए, मात्र सुख-दुःखरूप कर्म के फल को जानते हुए भी ज्ञानी का पुद्गल के साथ कर्तृ-कर्म-भाव नहीं है ।
जयसेनाचार्य :

[पोग्गलकम्मप्फलमणंतं] पौद्गलिक कर्मों का फल जो कि उपादान-कारण रूप से उदयागत द्रव्य-कर्म के द्वारा किया जाता है तथा सुख-दुःखरूप-शक्ति की अपेक्षा से अनंत प्रकार का होता है, उसको [णाणी जाणंतो वि हु] वीतराग-रूप जो शुद्धात्मा उसके संवेदन से समुत्पन्न-सुखामृत रस उससे तृप्त होता हुआ भेदज्ञानी जीव अपने निर्मल-विवेकरूप-भेद-ज्ञान से स्पष्ट रूप जानता हुआ भी [ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए] वर्तमान सुख-दुःखरूप शक्ति की अपेक्षा का निमित्त-उपादान रूप में उदय में आया हुआ पुद्गल-कर्म जो की पर-द्रव्य पर्याय-स्वरूप है उसके रूप में जैसे मिट्टी-कलश के रूप में परिणमन करती है वैसे शुद्ध-नय की अपेक्षा से न तो परिणमन ही करता है, न तन्मयता के साथ उसे ग्रहण ही करता है और न उसकी पर्यायरूप से उत्पन्न ही होता है क्योंकि मृत्तिका और कलश में परस्पर जैसा तादात्म्य लक्षण संबंध है वैसा संबंध ज्ञानी जीव का द्रव्य-कर्म के साथ नहीं है ।

यहाँ कोई प्रश्न करता है कि जब पुद्गल-द्रव्यकर्म के रूप में न तो परिणमन ही करता है, न उसे ग्रहण ही करता है और न तदाकाररूप से उत्पन्न ही होता है, तब वह ज्ञानी जीव क्या करता है ? इसका उत्तर आचार्य देते हैं कि वह तो मिथ्यात्व-विषय-कषाय-ख्याति-पूजा-लाभ और भोगों की आकांक्षा रूप निदानबंध-शल्यादि-विभाव-परिणामों के कर्तापन और भोक्तापन के विकल्प से रहित अपनी शुद्धात्मा का स्वरूप जो कि जल के भरे हुए कलश के समान केवल एक-चिदानंद स्वभाव से परिपूर्ण है उसी का निर्विकल्प-समाधि में स्थित होकर ध्यान करता है ।

इस प्रकार निश्चय-नय से आत्मा द्रव्य-कर्मादि स्वरूप-परद्रव्य के रूप में कभी नहीं परिणमता इस प्रकार का व्याख्यान करने वाली तीन गाथाएँ हुईं ।