+ द्विक्रियावादी का विशेष व्याख्यान -
पुग्गलकम्मणिमित्तं जह आदा कुणदि अप्पणो भावं ।
पुग्गलकम्मणिमित्तं तह वेददि अप्पणो भावं ॥93॥
अन्वयार्थ : [जह] जैसे यह [आदा] आत्मा [पुग्गलकम्मणिमित्तं] पौदगलिक ज्ञानावरणादि कर्म के उदय के निमित्त से होने वाले [अप्पणो भावं] अपने भावों को [कुणदि] करता है [तह] उसी प्रकार [पुग्गलकम्मणिमित्तं] पौदगलिक कर्म के निमित्त से होने वाले [अप्पणो भावं] अपने भावों को [वेददि] भोगता भी है ।

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

जयसेनाचार्य :

[पुग्गलकम्मणिमित्तं जह आदा कुणदि अप्पणो भावं] उदय में आये हुए द्रव्य कर्मों का निमित्त पाकर निर्विकार-स्वसंवेदन परिणाम से रहित होता हुआ यह आत्मा सुख-दुखादि रूप अपने भावों को करता है, [पुग्गलकम्मणिमित्तं तह वेददि अप्पणो भावं] उसी प्रकार उदय में आये हुए द्रव्य-कर्म का निमित्त पाकर अपने स्व-शुद्धात्मा की भावना से उत्पन्न हुआ जो वास्तविक-सुख उसका आस्वाद नहीं लेता हुआ उसी कर्मोदय-जनित अपने रागादि भावों को संवेदन करने वाला या अनुभव' करने वाला भी होता है । किन्तु द्रव्य-कर्मरूप जो परभाव है उसका कर्ता आत्मा नहीं होता -- ऐसा समझना चाहिये ।