
जयसेनाचार्य :
[पुग्गलकम्मणिमित्तं जह आदा कुणदि अप्पणो भावं] उदय में आये हुए द्रव्य कर्मों का निमित्त पाकर निर्विकार-स्वसंवेदन परिणाम से रहित होता हुआ यह आत्मा सुख-दुखादि रूप अपने भावों को करता है, [पुग्गलकम्मणिमित्तं तह वेददि अप्पणो भावं] उसी प्रकार उदय में आये हुए द्रव्य-कर्म का निमित्त पाकर अपने स्व-शुद्धात्मा की भावना से उत्पन्न हुआ जो वास्तविक-सुख उसका आस्वाद नहीं लेता हुआ उसी कर्मोदय-जनित अपने रागादि भावों को संवेदन करने वाला या अनुभव' करने वाला भी होता है । किन्तु द्रव्य-कर्मरूप जो परभाव है उसका कर्ता आत्मा नहीं होता -- ऐसा समझना चाहिये । |