
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
मिथ्यादर्शनमज्ञानमविरतिरित्यादयो हि भावाः ते तु प्रत्येकं मयूरमुकुरन्दवज्जीवाजीवाभ्यांभाव्यमानत्वाज्जीवाजीवौ । तथा हि - यथा नीलहरितपीतादयो भावाः स्वद्रव्यस्वभावत्वेन मयूरेणभाव्यमाना मयूर एव, यथा च नीलहरितपीतादयो भावाः स्वच्छताविकारमात्रेण मुकुरन्देन भाव्यमाना मुकुरन्द एव, तथा मिथ्यादर्शनमज्ञानमविरतिरित्यादयो भावाः स्वद्रव्यस्वभावत्वेनाजीवेन भाव्यमाना अजीव एव, तथैव च मिथ्यादर्शनमज्ञानमविरतिरित्यादयो भावाश्चैतन्यविकारमात्रेण जीवेन भाव्यमाना जीव एव । मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादिक जो भाव हैं वे प्रत्येक पृथक्-पृथक् मयूर और दर्पण की भाँति जीव अजीव के द्वारा भाए गये हैं, इसलिये जीव भी हैं और अजीव भी हैं । जैसे मयूर के नीले, काले, हरे, पीले आदि वर्ण रूप भाव मयूर के निज स्वभाव से भाये हुए मयूर ही हैं । और, जैसे दर्पण में उन वर्णों के प्रतिबिम्ब दिखते हैं, वे दर्पण की स्वच्छता (निर्मलता) के विकार मात्र से भाये हुए दर्पण ही है । उसी प्रकार मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादिक भाव अपने अजीव के द्रव्य-स्वभाव से (अजीवरूप से) भाये हुए अजीव ही हैं तथा वे मिथ्यादर्शन, अज्ञान, अविरति आदि भाव चैतन्य के विकार-मात्र से (जीव से) भाये हुए जीव ही हैं । |
जयसेनाचार्य :
[मिच्छत्तं पुण दुविहं जीवमजीवं] जीव-स्वभाव और अजीव-स्वभाव के भेद से मिथ्यात्व दो प्रकार का है । [तहेव अण्णाणं अविरदि जोगो मोहो कोहादीया इमे भावा] अज्ञान, अविरति, योग, मोह और क्रोधादि ये सब ही भाव अर्थात् पर्याय मयूर और दर्पण के समान जीव-स्वरूप और अजीव-स्वरूप भी होते हैं । जैसे मयूर और दर्पण में मयूर के द्वारा पैदा किये हुए अनुभव में आने वाले नील-पीतादि आकार विशेष जो कि मयूर के शरीर के आकार परिणत हो रहे हैं वे मयूर ही हैं, चेतनमय हैं, वैसे ही निर्मल-आत्मानुभूति से च्युत हुए जो जीव के द्वारा उत्पन्न किये हुए अनुभव में आने वाले सुख-दुखादि-विकल्प रूप भाव हैं, वे अशुद्ध निश्चयनय से जीवरूप ही हैं, चेतनामय हैं । और जैसे स्वच्छतारूप दर्पण के द्वारा उत्पन्न किये हुए प्रकाशमान मुख का प्रतिबिम्बादि रूप विकार वे सब दर्पणमयी हैं अतएव अचेतन हैं उसी प्रकार उपादान-भूत कर्मवर्गणारूप पुद्गल-कर्म के द्वारा किये हुए ज्ञानावरणादि द्रव्यकर्म-रूप पर्याय तो पुद्गल-मय ही है, अतएव अचेतन ही है । |