
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
काविह जीवाजीवाविति चेत् - यः खलु मिथ्यादर्शनमज्ञानमविरतिरित्यादिरजीवस्तदमूर्ताच्चैतन्यपरिणामादन्यत् मूर्तंपुद्गलकर्म; यस्तु मिथ्यादर्शनमज्ञानमविरतिरित्यादिर्जीवः स मूर्तात्पुद्गलकर्मणोऽन्यश्चैतन्यपरिणामस्य विकारः । जो निश्चय से मिथ्या-दर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि अजीव हैं वे अमूर्तिक चैतन्य के परिणाम से अन्य मूर्तिक पुद्गल-कर्म हैं और जो मिथ्या-दर्शन, अज्ञान, अविरति इत्यादि जीव हैं वे मूर्तिक पुद्गल-कर्म से अन्य चैतन्य-परिणाम के विकार हैं । |
जयसेनाचार्य :
[पोग्गलकम्मं मिच्छं जोगो अविरदि अणाणमज्जीवं] पुद्गल-कर्म रूप जो मिथ्यात्व, योग, अविरति और अज्ञान है, वह तो अजीव है, किन्तु [उवओगो अण्णाणं अविरदि मिच्छं च जीवो दु] उपयोग रूप भाव जो कि शुद्धात्मादि तत्त्वों के विषय में विपरीत जानकारीमय रूप विकार भाव है वह जीव का अज्ञान-भाव है और निर्विकार-स्व-संवेदन विपरीतात्मक अविरतिरूप विकारी परिणाम है वह जीव का अविरति भाव है, और शुद्ध-जीवादि पदार्थ के विषय में विपरीत अभिप्राय लिए हुए उपयोगात्मक विकारमय-विपरीत-श्रद्धान रूप भाव है वह जीव का मिथ्यात्व भाव है । अर्थात् ये सब जीव के विकार रूप परिणाम हैं । |