
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अज्ञानी चापि परभावस्य न कर्ता स्यात् - इह खल्वनादेरज्ञानात्परात्मनोरेकत्वाध्यासेन पुद्गलकर्मविपाकदशाभ्यां मंदतीव्रस्वादाभ्याम-चलितविज्ञानघनैकस्वादस्याप्यात्मन: स्वादं भिंदान: शुभमशुभं वा यो यं भावमज्ञानरूपमात्मा करोति स आत्मा तदा तन्मयत्वेन तस्य भावस्य व्यापकत्वाद्भवति कर्ता, स भावोऽपि च तदा तन्मयत्वेन तस्यात्मनो व्याप्यत्वाद्भवति कर्म, स एव चात्मा तदा तन्मयत्वेन तस्य भावस्य भावक-त्वाद्भवत्यनुभविता, स भावोऽपि च तदा तन्मयत्वेन तस्यात्मनो भाव्यत्वाद्भवत्यनुभाव्य: ॥१०२॥ इस लोक में आत्मा अनादि-काल से अज्ञान से पर और आत्मा के एकत्व के निश्चय से तीव्र-मंद स्वाद-रूप पुद्गल कर्म की दोनों दशाओं से स्वयं अचलित विज्ञान-घन-रूप एक स्वाद-रूप आत्मा के होने पर भी स्वाद को भेद-रूप करता हुआ शुभ तथा अशुभ अज्ञान-रूप भाव को अज्ञानी करता है । वह आत्मा उस समय उस भाव से तन्मय होने से उस भाव के व्यापकता के कारण उस भाव का कर्ता होता है । तथा वह भाव भी उस समय उस आत्मा की तन्मयता से उस आत्मा का व्याप्य होता है, इसलिये उसका कर्म होता है । वही आत्मा उस समय उस भाव की तन्मयता से उस भाव का भावक होने के कारण उसका अनुभव करने वाला होता है । वह भाव भी उस समय उस आत्मा के तन्मयपने से आत्मा के भावने योग्य होने के कारण अनुभवने योग्य होता है । इस प्रकार अज्ञानी भी परभाव का कर्ता नहीं है । |
जयसेनाचार्य :
[जं भावं सुहमसुहं करेदि आदा स तस्स खलु कत्ता] चिदानंद-एक-स्वभाव-रूप से जो आत्मा एक है, उसी के साता व असाता के रूप में, तीव्र-मन्द के रूप में, अथवा सुख-दुख के रूप में दो भेद करते हुए यह छद्मस्थ जीव जैसा शुभ व अशुभभाव करता है, उसके प्रति स्वतन्त्रतया व्यापक होने से वह उसका कर्ता होता है, [तं तस्स होदि कम्मं] और वह भाव इस आत्मा का कर्म होता है; क्योंकि वह भाव उसी के द्वारा किया गया है [सो तस्स दु वेदगो अप्पा] और इसलिए यह आत्मा उसी शुभ या अशुभ-भाव का भोगने वाला होता है क्योंकि स्वतंत्र-रूप से उसका ही संवेदन करता है किन्तु द्रव्य-कर्म का कर्ता और भोक्ता आत्मा नहीं होता है । तात्पर्य यह है कि अज्ञानी-जीव अशुद्ध-उपादान-रूप अशुद्ध-निश्चय-नय से मिथ्यात्व अथवा रागादिभावों का ही कर्त्ता होता है ज्ञानावरणादि द्रव्य-कर्म का नहीं । आत्मा को द्रव्य-कर्म का कर्ता असद्भूत व्यवहारनय की अपेक्षा से कहा गया है । इस कारण इस अशुद्ध-निश्चयनय को निश्चय की संज्ञा दी गई है । तो भी शुद्ध-निश्चयनय की अपेक्षा से वह व्यवहार ही है । यहाँ कोई शिष्य पूछता है -- कि हे भगवन् ! आपने अशुद्ध-उपादान से आत्मा को रागादिक का कर्त्ता बताया है तो क्या उपादान भी शुद्ध-अशुद्ध के भेद से दो प्रकार का होता है ? इसके उत्तर में आचार्य कहते हैं कि अग्नि के द्वारा गर्म किये हुए लोहे के पिण्ड के समान आत्मा औपाधिक भावों को स्वीकार किये हुए है वह अशुद्ध-उपादान होता है । किन्तु जो निरुपाधिक (सहज) भाव को स्वीकार किये हुए है वह शुद्ध-उपादान कहलाता है । जैसे सोना अपने पीतत्वादि गुणों का, सिद्ध-जीव अपने अनंतज्ञानादि गुणों का और अग्नि अपने उष्णत्वादि गुणों का उपादान है । इस प्रकार शुद्ध या अशुद्ध उपादान स्वरूप के व्याख्यान के समय सभी स्थान पर स्मरण रखना चाहिये ॥१०९॥ आगे आचार्य बताते हैं कोई भी किसी भी प्रकार के उपादान से पर-भाव का कर्ता नहीं होता--- |