
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
न च परभावः केनापि कर्तुं पार्येत - इह किल यो यावान् कश्चिद्वस्तुविशेषो यस्मिन् यावति कस्मिंश्चिच्चिदात्मन्यचिदात्मनि वा द्रव्ये गुणे च स्वरसत एवानादित एव वृत्त:, स खल्वचलितस्य वस्तुस्थितिसीम्नो भेत्तुमशक्यत्वात्त-स्मिन्नेव वर्तेत न पुन: द्रव्यांतरं गुणांतरं वा संक्रामेत । द्रव्यांतरं गुणांतरं वाऽसंक्रामंश्च कथं त्वन्यं वस्तुविशेषं परिणामयेत् ? अत: परभाव: केनापि न कर्तुं पार्येत ॥१०३॥ इस लोक में जो कोई वस्तु-विशेष अपने चेतन-स्वरूप तथा अचेतन-स्वरूप द्रव्य में तथा अपने गुण में, अपने निज-रस में ही अनादि से वर्तता है, वह वास्तव में अपनी अचलित वस्तुस्थिति की मर्यादा को भेदने के लिये असमर्थ होने के कारण अपने ही द्रव्य गुण में रहते हैं । द्रव्यांतर तथा गुणांतररूप संक्रमण नहीं करता हुआ वह अन्य वस्तु-विशेष को कैसे परिणमन करा सकता अर्थात् कभी नहीं परिणमन करा सकता । इसी कारण परभाव किसी के भी द्वारा नहीं किया जा सकता । |
जयसेनाचार्य :
[जो जम्हि गुणे दव्वे सो अण्णम्हि दु ण संकमदि दव्वे] चेतनरूप या अचेतनरूप गुण जिस चेतन या अचेतन द्रव्य में अनादि सम्बन्ध से स्वभावता प्रवर्तमान है, वह उसे छोड़कर कभी भी किसी अन्य द्रव्य में नहीं जाता, [सो अण्णमसंकंतो कह तं परिणामए दव्वं] जब वह चेतन या अचेतन गुण अन्य में नहीं जाता, तब वह उस अन्य द्रव्य को उपादान रूप से कैसे परिणमा सकता है, कभी नहीं परिणमा सकता । इसलिए यह बात निश्चित हुई कि यह आत्मा पुद्गल-द्रव्यों का कर्ता नहीं है ॥११०॥ यहीं बात आचार्यदेव आगे की गाथा में कहते हैं -- |