
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अतोऽन्यस्तूपचारः - इह खलु पौद्गलिककर्मण: स्वभावादनिमित्तभूतेऽप्यात्मन्यनादेरज्ञानात्तन्निमित्तभूतेनाज्ञान- भावेन परिणमनान्निमित्तीभूते सति संपद्यमानत्वात् पौद्गलिकं कर्मात्मना कृतमितिनिर्विकल्प-विज्ञानघनभ्रष्टानां विकल्पपरायणानां परेषामस्ति विकल्प: । स तूपचार एव न तु परमार्थ: । कथमिति चेत् - यथा युद्धपरिणामेन स्वयं परिणममानै: योधै: कृते युद्धे युद्धपरिणामेन स्वयम-परिणममानस्य राज्ञो राज्ञा किल कृतं युद्धमित्युपचारो, न परमार्थ: । तथा ज्ञानावारणादिकर्मपरिणामेन स्वयं परिणममानेन पुद्गल-द्रव्येण कृते ज्ञानावरणादिकर्मणि ज्ञानावारणादिकर्मपरिणामेन स्वयमपरिणम-मानस्यात्मनः किलात्मना कृतं ज्ञानावारणादिकर्मेत्युपचारो, न परमार्थः। इस लोक में आत्मा निश्चयतः स्वभाव से पुद्गल-कर्म का निमित्त-भूत नहीं है, तो भी अनादि अज्ञान से उसका निमित्त-रूप हुआ जो अज्ञान भाव, उस रूप से परिणमन करने से पुद्गल-कर्म का निमित्त-रूप होने पर पौद्गलिक कर्म के उत्पन्न होने से पुद्गल-कर्म को आत्मा ने किया, ऐसा विकल्प होता है, वह विकल्प निर्विकल्प विज्ञान-घन-स्वभाव से भ्रष्ट और विकल्पों में तत्पर अज्ञानियों के होता है । वह विकल्प उपचार ही है, परमार्थ नहीं है । जैसे युद्ध परिणाम से स्वयं परिणमन करने वाले योद्धाओं द्वारा किए गए युद्ध के होने पर युद्ध परिणाम से स्वयं नहीं परिणत हुए राजा को लोक कहते हैं कि युद्ध राजा ने किया । यह कथन उपचार है, परमार्थ नहीं है । उसी प्रकार ज्ञानावरणादि कर्मपरिणाम से स्वयं परिणमन करने वाले पुद्गल-द्रव्य के द्वारा किए गए ज्ञानावरणादि कर्म के होने पर ज्ञानावरणादि कर्म परिणाम से स्वयं नहीं परिणमन करने वाले आत्मा के सम्बन्ध में कहते हैं कि यह ज्ञानावरणादि कर्म आत्मा के द्वारा किया गया, यह कथन उपचार है, परमार्थ नहीं है । |
जयसेनाचार्य :
[जीवम्हि हेदुभूदे बंधस्स दु पस्सिदूण परिणामं] जैसे निमित्त रूप से बादलों का विस्तार अथवा चाँद-सूर्य का परिवेष आदि के योग्य काल होने पर पानी का बरसना और इन्द्रधनुष आदि में परिणत पुद्गलों का परिणाम होता देखा जाता है, वैसे ही
[जोधेहिं कदे जुद्धे राएण कदंति जप्पदे लोगो] जैसे योद्धाओं के द्वारा किये हुए युद्ध को लोग राजा के द्वारा किया हुआ कहा करते हैं, [तह ववहारेण कदं णाणावरणादि जीवेण] वैसे ही ज्ञानावरणादि-कर्म जीव के द्वारा किये हुए हैं, यह व्यवहार-नय से कहा जाता है । अत: यह बात निश्चित हुई कि शुद्ध-निश्चयनय से यह जीव शुद्ध-बुद्ध-एक-स्वभाव है, इस कारण यह न तो किसी को उपजाता है, न करता है, न बाँधता है, न परिणमाता है और न ग्रहण ही करता है ॥११३॥ |