
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अत एतत्स्थितम् — अयं खल्वात्मा न गृह्णाति न परिणमयति नोत्पादयति न करोति न बध्नाति व्याप्यव्यापकभावा-भावात् प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म । यत्तु व्याप्यव्यापकभावाभावेऽपि प्राप्यं विकार्यं निर्वर्त्यं च पुद्गलद्रव्यात्मकं कर्म गृह्णाति परिणमयति उत्पादयति करोति बध्नाति चात्मेति विकल्प: स किलोपचार: ॥१०७॥ कथमिति चेत् - यथा लोकस्य व्याप्यव्यापकभावेन स्वभावत एवोत्पद्यमानेषु गुण- दोषेषु व्याप्यव्यापकभावाभावेऽपि तदुत्पादको राजेत्युपचार:, तथा पुद्गलद्रव्यस्य व्याप्यव्यापक-भावेन स्वभावत एवोत्पद्यमानेषु गुणदोषेषु व्याप्यव्यापकभावाभावेऽपि तदुत्पादको जीव इत्युपचार: ॥१०८॥ यह आत्मा निश्चय से व्याप्य-व्यापकभाव के अभाव से प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्य पुद्गल-द्रव्यात्मक कर्म को न ग्रहण करता, न परिणमाता है, न उपजाता है, न करता है और न बाँधता है । व्याप्य-व्यापक भाव के अभाव होने पर भी प्राप्य, विकार्य और निर्वर्त्य ऐसे तीन प्रकार के पुद्गल-द्रव्यात्मक कर्म को यह आत्मा ग्रहण करता है, उपजाता है, करता है और बाँधता है । ऐसा जो विकल्प होता है, वह प्रकट उपचार है । यहाँ प्रश्न होता है कि यह उपचार किस तरहसे है, उसका उत्तर दृष्टांत द्वारा देते हैं-- जैसे प्रजा के व्याप्य-व्यापक भाव से स्वभाव से ही उत्पन्न जो गुण और दोष उनमें राजा के व्याप्य-व्यापक-भाव का अभाव है तो भी लोक कहते हैं कि गुण दोष का उपजाने वाला राजा है, ऐसा उपचार (व्यवहार) है, उसी प्रकार पुद्गल-द्रव्य के व्याप्य-व्यापकभावसे ही उत्पन्न गुण, दोषों में जीव के व्याप्य-व्यापक-भाव का अभाव है तो भी उन गुण दोषों का उपजाने वाला जीव है, ऐसा उपचार है । |
जयसेनाचार्य :
अनादिकालीन-बंध-पर्याय के वशवर्तीपने से वीतराग-स्व-संवेदन-लक्षण वाले भेद-ज्ञान के न होने के कारण रागादि-परिणाम से स्निग्ध होता हुआ आत्मा कर्म-वर्गणा-योग्य-पुद्गल-द्रव्य को द्रव्य-कर्म के रूप में उत्पन्न करता है, जैसे कि कुम्हार घड़े को उत्पन्न करता है । द्रव्य-कर्मों को
अब इस ही व्याख्यान को दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं -- [जह राया ववहारा दोसगुणुप्पादगो त्ति आलविदो] जैसे व्यवहार से प्रजा में होने वाले सदोष और निर्दोष लोगों के दोष और गुणों का उत्पादक राजा को कहा जाता है, [तह जीवो ववहारा दव्वगुणुप्पादगो भणिदो] उसी प्रकार पुद्गल-द्रव्य में पुण्य-पाप-रूप गुणों का उत्पादक जीव होता है, यह भी व्यवहार-नय से कहा गया है । इस प्रकार व्यवहार-नय की मुख्यता से चार गाथायें कहीं गई ॥११५॥ इस प्रकार द्विक्रियावादी के निराकरण के उपसंहार की मुख्यता से ग्यारह गाथायें पूर्ण हुई । यहाँ पर कोई शंका कर सकता है कि निश्चय-नय से आत्मा द्रव्य-कर्म को नहीं करता है, ऐसा व्याख्यान बहुत बार किया है, उसी से द्विक्रियावादी का निराकरण अपने-आप हो जाता है, फिर यह व्याख्यान करके पिष्टपेषण क्यों किया ? आचार्य समाधान करते हैं कि -- यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि निश्चय-नय में और द्विक्रियावादीपने में हेतुभाव और हेतुमद्भाव को बतलाने के लिए ऐसा किया है । निश्चय से आत्मा द्रव्य-कर्म का कर्ता नहीं है इसी हेतु से द्विक्रियावादीपने का निराकरण भी सिद्ध है, इस प्रकार इनमें परस्पर हेतु-हेतुमद्भाव है । इस प्रकार पुण्य-पापादि सात पदार्थों की पीठिकारूप महाधिकार में पूर्वोक्त प्रकार से
अथानंतर [सामण्णपच्चया] इत्यादि गाथा को आदि लेकर पाठ्य-क्रम से सात-गाथाओं पर्यन्त मूल-प्रत्यय चतुष्टय को कर्म का कर्ता बताने की मुख्यता से व्यायाख्यान करते हैं । इन सात गाथाओं में से चार गाथाओं में यह बताया गया है कि
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