
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
किं ज्ञानमयभावात्किमज्ञानमयाद्भवतीत्याह - अज्ञानिनो हि सम्यक्स्वपरविवेकाभावेनात्यन्तप्रत्यस्तमितविविक्तात्मख्यातित्वाद्यस्मादज्ञानमय एव भावः स्यात्, तस्मिंस्तु सति स्वपरयोरेकत्वाध्यासेन ज्ञानमात्रात्स्वस्मात्प्रभ्रष्टः पराभ्यां रागद्वेषाभ्यां सममेकीभूय प्रवर्तिताहंकारः स्वयं किलैषोऽहं रज्ये रुष्यामीति रज्यते रुष्यति च; तस्मादज्ञानमयभावादज्ञानी परौ रागद्वेषावात्मानं कुर्वन् करोति कर्माणि ।ज्ञानिनस्तु सम्यक्स्वपरविवेकेनात्यन्तोदितविविक्तात्मख्यातित्वाद्यस्मात् ज्ञानमय एव भावःस्यात्, तस्मिंस्तु सति स्वपरयोर्नानात्वविज्ञानेन ज्ञानमात्रे स्वस्मिन्सुनिविष्टः पराभ्यां रागद्वेषाभ्यां पृथग्भूततया स्वरसत एव निवृत्ताहंकारः स्वयं किल केवलं जानात्येव, न रज्यते, न च रुष्यति, तस्मात् ज्ञानमयभावात् ज्ञानी परौ रागद्वेषावात्मानमकुर्वन्न करोति कर्माणि । (कलश--आर्या) ज्ञानमय एव भावः कुतो भवेत् ज्ञानिनो न पुनरन्यः । अज्ञानमयः सर्वः कुतोऽयमज्ञानिनो नान्यः ॥६६॥ अब यह कहते हैं कि ज्ञानमय भाव से क्या होता है और अज्ञानमय भाव से क्या होता है :- अज्ञानी के अच्छी प्रकार स्व-पर का भेद-ज्ञान न होने से विविक्त आत्मा की ख्याति अत्यंत अस्त हो जाने के कारण अज्ञानमय ही भाव होता है । उस अज्ञानमय भाव के होने पर आत्मा के और पर के एकत्व का अध्यास होने से ज्ञान-मात्र अपने आत्म-स्वरूप से भ्रष्ट हुआ पर-द्रव्य-स्वरूप राग-द्वेष के साथ एक होकर अहंकार में प्रवृत्त हुआ अज्ञानी ऐसा मानता है कि 'मैं रागी हूं, द्वेषी हूं' इस प्रकार वह रागी द्वेषी होता है । उस रागादि स्वरूप अज्ञानमय भाव से अज्ञानी हुआ पर-द्रव्य-स्वरूप जो राग-द्वेष उन रूप अपने को करता हुआ कर्मों को करता है । और ज्ञानी के अच्छी तरह अपना पर का भेद-ज्ञान हो गया है इसलिये जिसके भिन्न आत्मा की प्रकटता--'ख्याति' अत्यंत उदित हो गई है, उस भाव के कारण ज्ञानमय ही भाव होता है । उस भाव के होने पर अपने व पर को भिन्नपने का ज्ञान भेद-ज्ञान होने से ज्ञानमात्र अपने आत्म-स्वरूप में ठहरा हुआ वह ज्ञानी पर-द्रव्य-स्वरूप राग-द्वेषों से पृथग्भूत हो जाने के कारण अपने रस से ही पर में अहंकार निवृत्त हो गया है, ऐसा हुआ निश्चय से केवल जानता ही है, राग-द्वेषरूप नहीं होता । इसलिये ज्ञानमय भाव से ज्ञानी हुआ पर-द्रव्य-स्वरूप जो राग-द्वेष उन-रूप आत्मा को नहीं करता हुआ कर्मों को नहीं करता है । (कलश--रोला)
[ज्ञानिनः कुतः ज्ञानमयः एव भावः भवेत्] यहाँ प्रश्न यह है कि ज्ञानी को ज्ञानमय भाव ही क्यों होता है [पुनः] और [अन्यः न] अन्य (अज्ञानमय भाव) क्यों नहीं होता ? [अज्ञानिनः कुतः सर्वः अयम् अज्ञानमयः] तथा अज्ञानी के सभी भाव अज्ञानमय ही क्यों होते हैं तथा [अन्यः न] अन्य (ज्ञानमय भाव) क्यों नहीं होते ?
ज्ञानी के सब भाव शुभाशुभ ज्ञानमयी हैं । अज्ञानी के वही भाव अज्ञानमयी हैं॥ ज्ञानी और अज्ञानी में यह अन्तर क्यों है । तथा शुभाशुभ भावों में भी अन्तर क्यों है ॥६६॥ |
जयसेनाचार्य :
आगे ज्ञानमय भाव से क्या फल होता है और अज्ञानमय भाव से क्या होता है सो कहते हैं- [अण्णाणमओ भावो अणाणिणो कुणदि तेण कम्माणि] अज्ञानी-जीव के आत्मा की उपलब्धिरुप-भावना से विलक्षणपना होने के कारण अज्ञानमय-भाव ही होता है जिससे कि वह उस अज्ञान-भाव से कर्मों को करता है । [अण्णाणमओ भावो अणाणिणो कुणदि तेण कम्माणि] किन्तु ज्ञानी जीव तो विकार रहित चेतना की चमत्काररूप-भावना होकर रहता है, अत: उसके ज्ञानमयी भाव होता है । उस ज्ञानमयी भाव से ज्ञानी-जीव कर्मों को नहीं करता है -- अर्थात स्वस्थ होकर रहता है । भावार्थ यह है कि जैसे थोडी सी अग्नि बडे भारी तृण-काठ के ढेर को क्षणमात्र में भस्म कर देती है उसी प्रकार तीन गुप्तिरूप-समाधि-लक्षण को रखने वाली भेद-ज्ञानरूपी-अग्नि एक-अन्तमुहूर्त मात्र में अनेक भवों में संचित किये हुए कर्म-समूह को नष्ट कर देती है । यह जानकर जिस प्रकार हो सके मुमुक्षु साधु को उस परमसमाधि में भावना करनी योग्य है ॥१३५॥ |