
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
यतो ह्यज्ञानमयाद्भावाद्य: कश्चनापि भावो भवति स सर्वोऽप्यज्ञानमयत्वमनतिवर्तमानोऽज्ञान-मय एव स्यात्, तत: सर्वे एवाज्ञानमया अज्ञानिनो भावा: । यतश्च ज्ञानमयाद्भावाद्य: कश्चनापि भावो भवति स सर्वोऽपि ज्ञानमयत्वमनतिवर्तमानो ज्ञानमय एव स्यात्, तत: सर्वे एव ज्ञानमया ज्ञानिनो भावा: ॥१२८-१२९॥ (कलश--अनुष्टुभ्) ज्ञानिनो ज्ञाननिर्वृत्ता: सर्वे भावा भवन्ति हि । सर्वेऽप्यज्ञाननिर्वृत्ता भवन्त्यज्ञानिनस्तु ते ॥६७॥ जिस कारण निश्चय से अज्ञानमय भाव से जो कुछ भाव होता है, वह सभी अज्ञान-मयपने को उल्लंघन नहीं करता हुआ अज्ञानमय ही होता है; इसलिए अज्ञानी के सभी भाव अज्ञानमय हैं । और जिस कारण ज्ञानमयभाव से जो कुछ भाव होता है, वह सभी ज्ञानमयपने को नहीं उल्लंघन करता हुआ ज्ञानमय ही होता है, इसलिये ज्ञानी के सभी भाव ज्ञानमय हैं । (कलश--रोला)
[ज्ञानिनः] ज्ञानी के [सर्वे भावाः] समस्त भाव [ज्ञाननिर्वृत्ताः हि] ज्ञान से रचित [भवन्ति] होते हैं [तु] और [अज्ञानिनः] अज्ञानी के [सर्वे अपि ते] समस्त भाव [अज्ञाननिर्वृत्ताः] अज्ञान से रचित [भवन्ति] होते हैं ।
ज्ञानी के सब भाव ज्ञान से बने हुए हैं । अज्ञानी के सभी भाव अज्ञानमयी हैं ॥ उपादान के ही समान कारज होते हैं । जौ बौने पर जौ ही तो पैदा होते हैं ॥६७॥ |
जयसेनाचार्य :
ज्ञानी-जीव के ज्ञानमयी भाव ही होता है, अज्ञानमयी-भाव नहीं। वैसे ही अज्ञानी-जीव के अज्ञानमयी ही भाव होता है ज्ञानमयी नहीं, ऐसा आगे कहते हैं -- [णाणमया भावाओ णाणमओ चेव जायदे भावो जम्हा] क्योंकि निश्चय-रत्नत्रयात्मक-जीवपदार्थरूप-ज्ञानमयभाव से स्व-शुद्धात्मा की प्राप्ति है लक्षण जिसका, ऐसा मोक्ष-पर्यायरूप-ज्ञानमय भाव उत्पन्न होता है । [तम्हा णाणिस्स सव्वे भावा हु णाणमया] इसलिये स्व-संवेदन रूप भेद-ज्ञान वाले जीव के सभी भाव उस ज्ञान के द्वारा संपन्न हुए ज्ञानमय ही होते हैं । क्योंकि उपादान कारण के सदृश कार्य होता है -- यह महापुरुषों की मानी हुई बात है । देखो कि यव (जौ) के बोने पर बासमती चावल पैदा नहीं हो सकता, अपितु जौ के बोने से जौ ही पैदा होता है । इसी प्रकार [अण्णाणमया भावा अण्णाणो चेव जायदे भावो] अज्ञानमय राग-द्वेष विशिष्ट जीव से अज्ञानमय भाव ही उत्पन्न होता है । इसलिए [तम्हा भावा अण्णाणमया अणाणिस्स] शुद्धात्मा की उपलब्धि से रहित ऐसे अज्ञानी-मिथ्यादृष्टि-जीव के सभी भाव मिथ्यात्व या रागादिरूप-अज्ञानमय-परिणाम ही होते हैं ॥१३६-१३७॥ अब उपर्युक्त कथन को ही दृष्टान्त और दार्ष्टान्त द्वारा समझाते हैं -- |