
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथोभयं कर्माविशेषेण बन्धहेतुं साधयति - शुभमशुभं च कर्माविशेषेणैव पुरुषं बध्नाति बंधत्वाविशेषात् कांचनकालायसनिगलवत् ॥१४६॥ शुभ और अशुभ कर्म अविशेष-रूप से ही आत्मा को बांधते हैं, क्योंकि दोनों में ही बंध-रूपपने की अविषेषता है जैसे कि सुवर्ण की बेड़ी और लोहे की बेड़ी में बंध की अपेक्षा भेद नहीं है । |
जयसेनाचार्य :
शुभ और अशुभ रूप दोनों ही कर्म सामान्यतया बंध-रूप हैं, ऐसा बताते हैं -- जैसे सोने की बनी बेडी हो चाहे लोहे की, दोनों ही तरह की बेड़ियाँ पुरुष को साधारण रूप में जकड़ कर रखती हैं, इसी प्रकार, चाहे शुभ कर्म हो या अशुभ कर्म वह साधारण रूप से जीव को संसार में रखता है । भावार्थ –- शुभ और अशुभ इन दोनों कर्मों में बंध या संसार भाव की अपेक्षा कोई भी अंतर नहीं है । दोनों कर्म संसार रूप ही हैं । अत: जो कोई पुरुष भोगों की आकांक्षा रूप निदान करते हुए 'सौन्दर्य, सौभाग्य, कामदेव-पद, देवेन्द्र-पद, अहमिन्द्र-पद, ख्याति, पूजा, लाभ आदि मुझे प्राप्त हों', इस निमित्त से व्रत, तपश्चरण या दान-पूजादि करता है वह पुरुष अपने उस व्रत, तपश्चरण आदि रूप आचरण को व्यर्थ ही खोता है । जैसे कि
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