
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथोभयं कर्म प्रतिषेधयति - अथोभयं कर्म प्रतिषेधयति । कुशीलशुभाशुभकर्मभ्यां सह रागसंसर्गौ प्रतिषिद्धौ बन्धहेतुत्वात् कुशीलमनोरमामनोरमकरेणुकुट्टनीरागसंसर्गवत् ॥१४७॥ कुशील शुभ-अशुभ कर्म के साथ राग और संसर्ग करना दोनों ही निषिद्ध हैं, क्योंकि ये दोनों ही कर्म-बंध के कारण हैं । जैसे कुशील, मन को रमाने वाली अथवा नहीं रमाने वाली कुट्टनी हथिनी के साथ राग और संगति करने वाले हाथी का विनाश अपने आप है सो राग व संसर्ग उस हाथी को नहीं करने चाहिये । |
जयसेनाचार्य :
शुभ और अशुभ दोनों ही प्रकार के कर्म मोक्षमार्ग में रोड़ा अटकाने वाले हैं, अत: दोनों ही निषिद्ध हैं ऐसा कहते हैं -- [तम्हा दु कुसीलेहि य रागं मा कुणह मा व संसग्गं] इसलिए खोटे-स्वभाव वाले शुभ या अशुभ किसी भी प्रकार के कर्मों के साथ मानसिक-प्रेम मत करो, बाह्य-वचन एवं काय-गत संसर्ग भी मत करो । क्योंकि [साहीणो हि विणासो कुसीलसंसग्गरायेण] कुशीलों के साथ प्रेम करने से स्वाधीनता का अवश्य ही नाश होता है, निर्विकल्प-समाधि का विघात होता है । अत: अपना अहित होता है अर्थात स्वाधीन जो आत्म-सुख है उसका नाश होता है ॥१५४॥ |