+ कर्म स्वयमेव बंध है -
सो सव्वणाणदरिसी कम्मरएण णियेणावच्छण्णो । (160)
संसारसमावण्णो ण विजाणदि सव्वदो सव्वं ॥167॥
स सर्वज्ञानदर्शी कर्मरजसा निजेनावच्छन्न:
संसारसमापन्नो न विजानाति सर्वत: सर्व् ॥१६०॥
सर्वदर्शी सर्वज्ञानी कर्मरज आछन्न हो
संसार को सम्प्राप्त कर सबको न जाने सर्वत: ॥१६०॥
अन्वयार्थ : [सो] वह आत्मा स्वभावतः [सव्वणाणदरिसी] सबका जानने देखने वाला है तो भी [कम्मरएण णियेणावच्छण्णो] अपने कर्मरूपी रज से आच्छादित हुआ [संसारसमावण्णो] संसार को प्राप्त होता हुआ [सव्वदो] सब प्रकार से [सव्वं] सब वस्तु को [ण विजानाति] नहीं जानता ।
Meaning : The Self, by his own nature, is all-knowing and all-perceiving. Still, being covered with the dirt of karmas, he is in the worldly state of births and deaths (sansâra) and does not know all the substances and their various modes.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य    notes 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ कर्मणः स्वयं बन्धत्वं साधयति -
यत: स्वयमेव ज्ञानतया विश्वसामान्यविशेषज्ञानशीलमपि ज्ञानमनादिस्वपुरुषापराधप्रवर्तमान-कर्ममलावच्छन्नत्वादेव बन्धावस्थायां सर्वत: सर्वमप्यात्मानमविजानदज्ञानभावेनैवेदमेवमवतिष्ठते, ततो नियतं स्वयमेव कर्मैव बन्ध: । अत: स्वयं बन्धत्वात्कर्म प्रतिषिद्धम्‌ ॥१६०॥


जिस कारण स्वयमेव ज्ञानरूप होने से सब पदार्थों को सामान्य विशेषता से जानने के स्वभाव वाला होने पर भी ज्ञान अनादिकाल से अपने पुरुषार्थ के अपराध से प्रवर्तमान कर्म-रूप मल से आच्छादितपना होने के कारण परभाव-बन्धरूप बंधावस्था में सब प्रकार के सब ज्ञेयाकार-रूप अपने स्वरूप को नहीं जानता हुआ अज्ञान-भाव से ही यह आप स्थित है । इस कारण निश्चय हुआ कि कर्म स्वयं ही बंध-स्वरूप है । इसीलिये स्वयं बंध-रूप होने से कर्म का प्रतिषेध किया गया है ।
जयसेनाचार्य :

जबकि कर्म स्वयं बंध का हेतु है फिर वह मोक्ष का कारण कैसे हो सकता है ऐसा आगे बताते हैं --

[सो सव्वणाणदरिसी कम्मरएण णियेणावच्छण्णो] वह आत्मा शुद्ध-निश्चयनय से समस्त पदार्थों के देखने-जाननेरूप दर्शन और ज्ञानस्वभाव वाला है फिर भी अपने किये हुए कर्मरूपी मैल से ढंका हुआ है । [संसारसमावण्णो ण विजाणदि सव्वदो सव्वं] संसार-सम्पन्न है -- रागी-द्वेषी हो रहा है, अत: संसार में उलझा हुआ है इसलिए सर्व-वस्तुओं को सब प्रकार से नहीं जान रहा है । इसलिए यह मानना पड़ता है कि कर्म स्वयं ही जीव के लिए बंध-स्वरूप है इससे यह कर्म मोक्ष का कारण कैसे हो सकता है ? और जब मोक्ष का कारण नहीं हो सकता तो फिर वह कर्म चाहे पापरूप हो या पुण्यरूप सारा का सारा बंध का ही कारण समझना चाहिए । इस प्रकार जैसे पाप बंध का कारण है वैसे पुण्य भी बंध का कारण है इस प्रकार का कथन गाथा में हुआ ॥१६७॥