
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ कर्मणो मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वं दर्शयति - सम्यक्त्वस्य मोक्षहेतो: स्वभावस्य प्रतिबन्धकं किल मिथ्यात्वं, तत्तु स्वयं कर्मैव, तदुदयादेव ज्ञानस्य मिथ्यादृष्टित्वम् । ज्ञानस्य मोक्षहेतो: स्वभावस्य प्रतिबन्धकं किलाज्ञानं, तत्तु स्वयं कर्मैव, तदुदयादेव ज्ञानस्या-ज्ञानित्वम् । चारित्रस्य मोक्षहेतो: स्वभावस्य प्रतिबन्धक: किल कषाय:, स तु स्वयं कर्मैेव, तदुदयादेव ज्ञानस्याचारित्रत्वम् । अत: स्वयं मोक्षहेतुतिरोधायिभावत्वात्कर्म प्रतिषिद्धम् ॥१६१-१६३॥ (कलश--शार्दूलविक्रीडित) संन्यस्तव्यमिदं समस्तमपि तत्कर्मैव मोक्षार्थिना संन्यस्ते सति तत्र का किल कथा पुण्यस्य पापस्य वा । सम्यक्त्वादिनिजस्वभावभवनान्मोक्षस्य हेतुर्भवन्- नैष्कर्म्यप्रतिबद्धमुद्धतरसं ज्ञानं स्वयं धावति ॥१०९॥ (कलश--शार्दूलविक्रीडित) यावत्पाकमुपैति कर्मविरतिर्ज्ञानस्य सम्यङ् न सा कर्मज्ञानसमुच्चयोऽपि विहितस्तावन्न काचित्क्षतिः । किन्त्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत्कर्म बन्धाय तन्- मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं ज्ञानं विमुक्तं स्वतः ॥११०॥ (कलश--शार्दूलविक्रीडित) मग्नाः कर्मनयावलम्बनपरा ज्ञानं न जानन्ति यन्- मग्ना ज्ञाननयैषिणोऽपि यदतिस्वच्छन्दमन्दोद्यमाः । विश्वस्योपरि ते तरन्ति सततं ज्ञानं भवन्तः स्वयं ये कुर्वन्ति न कर्म जातु न वशं यान्ति प्रमादस्य च ॥१११॥ (कलश--मन्दाक्रान्ता) भेदोन्मादं भ्रमरसभरान्नाटयत् पीतमोहं मूलोन्मूलं सकलमपि तत्कर्म कृत्वा बलेन । हेलोन्मीलत्परमकलया सार्धमारब्धकेलि ज्ञानज्योतिः कवलिततमः प्रोज्जजृम्भे भरेण ॥११२॥ इति पुण्यपापरूपेण द्विपात्रीभूतमेकपात्रीभूय कर्म निष्क्रान्तम् । इति श्रीमदमृतचन्द्रसूरिविरचितायां समयसारव्याख्यायामात्मख्यातौ पुण्यपापप्ररूपकः तृतीयोऽङ्कः अब, यह बतलाते हैं कि कर्म मोक्ष के कारण के तिरोधायिभाव-स्वरूप है -
(कलश--हरिगीत)
[मोक्षार्थिना इदं समस्तम् अपि तत् कर्म एव संन्यस्तव्यम्] मोक्षार्थी को यह समस्त ही कर्ममात्र त्याग करने योग्य है । [संन्यस्ते सति तत्र पुण्यस्य पापस्य वा किल का कथा] जहाँ समस्त कर्म का त्याग किया जाता है फिर वहाँ पुण्य या पाप की क्या बात है ? [सम्यक्त्वादिनिजस्वभावभवनात् मोक्षस्य हेतुः भवन्] सम्यक्त्वादि अपने स्वभावरूप होने (परिणमन करने) से मोक्ष का कारणभूत होता हुआ, [नैष्कर्म्यप्रतिबद्धम् उद्धतरसं] निष्कर्म अवस्था के साथ जिसका उद्धत (उत्कट) रस प्रतिबद्ध है ऐसा [ज्ञानं स्वयं धावति] ज्ञान अपने आप दौड़ा चला आता है ।त्याज्य ही हैं जब मुमुक्षु के लिए सब कर्म ये । तब पुण्य एवं पाप की यह बात करनी किसलिए ॥ निज आतमा के लक्ष्य से जब परिणमन हो जायगा । निष्कर्म में ही रस जगे तब ज्ञान दौड़ा आएगा ॥१०९॥ (कलश--हरिगीत)
[यावत् ज्ञानस्य कर्मविरतिः] जब तक ज्ञान द्वारा कर्म-विरति [सासम्यक् पाकम् न उपैति] भलिभाँति परिपूर्णता को प्राप्त नहीं होती [तावत् ] तब तक [कर्मज्ञानसमुच्चयः अपि विहितः, न काचित् क्षतिः ] कर्म और ज्ञान का एकत्रितपना शास्त्र में कहा है; उसके एकत्रित रहने में कोई भी क्षति या विरोध नहीं है । [किन्तु अत्र अपि] किन्तु यहाँ भी [अवशतः यत् कर्म समुल्लसति] अवशपनें जो कर्म प्रगट होता है [तत् बन्धाय] वह तो बंध का कारण है, और [मोक्षाय] मोक्ष का कारण तो, [एकम्एव परमं ज्ञानं स्थितम्] जो एक परम ज्ञान है वह एक ही है - [स्वतः विमुक्तं] जो कि अपने आप में मुक्त है ।यह कर्मविरति जबतलक ना पूर्णता को प्राप्त हो । हाँ, तबतलक यह कर्मधारा ज्ञानधारा साथ हो ॥ अवरोध इसमें है नहीं पर कर्मधारा बंधमय । मुक्तिमारग एक ही है, ज्ञानधारा मुक्तिमय ॥११०॥ (कलश--हरिगीत)
[कर्मनयावलम्बनपराः मग्नाः ] कर्मनय के आलम्बन में तत्पर (अर्थात् कर्मनय के पक्षपाती) पुरुष डूबे हुए हैं, [यत् ज्ञानं न जानन्ति] क्योंकि वे ज्ञान को नहीं जानते । [ज्ञाननय-एषिणः अपि मग्नाः] ज्ञाननय के इच्छुक (पक्षपाती) पुरुष भी डूबे हुए हैं, [यत् अतिस्वच्छन्दमन्द-उद्यमाः] क्योंकि वे स्वच्छंदता से अत्यन्त मन्द-उद्यमी हैं । [ते विश्वस्य उपरितरन्ति] वे जीव विश्व के ऊपर तैरते हैं [ये स्वयं सततं ज्ञानं भवन्तः कर्म न कुर्वन्ति] जो कि स्वयं निरन्तर ज्ञानरूप होते हुए कर्म नहीं करते [च जातु प्रमादस्य वशंन यान्ति] और कभी भी प्रमादवश भी नहीं होते ।कर्मनय के पक्षपाती ज्ञान से अनभिज्ञ हों । ज्ञाननय के पक्षपाती आलसी स्वच्छन्द हों ॥ जो ज्ञानमय हों परिणमित परमाद के वश में न हों । कर्म विरहित जीव वे संसार-सागर पार हों ॥१११॥ (कलश--हरिगीत)
[पीतमोहं] मोहरूपी मदिरा के पीने से [भ्रमरस-भरात् भेदोन्मादं नाटयत्] भ्रमरस के भार से (अतिशयपने से) शुभाशुभ कर्म के भेदरूपी उन्माद को जो नचाता है [तत् सकलम् अपि कर्म] ऐसे समस्त कर्म को [बलेन मूलोन्मूलं कृत्वा] बलपूर्वक जड़ से उखाड़कर [ज्ञानज्योतिः भरेण प्रोज्जजृम्भे] ज्ञान-ज्योति अत्यन्त सामर्थ्य सहित प्रगट होने से [कवलिततमः] अज्ञानरूपी अंधकार को ग्रस लिया, [हेला-उन्मिलत्] जो लीलामात्र से (सहज पुरुषार्थ से) विकसित होती जाती है और [परमकलया सार्धम् आरब्धकेलि] जिसने परम कला (केवलज्ञान) के साथ क्रीड़ा प्रारम्भ की है ।जग शुभ अशुभ में भेद माने मोह मदिरापान से । पर भेद इनमें है नहीं जाना है सम्यग्ज्ञान से ॥ यह ज्ञान-ज्योति तमविरोधी खेले केवलज्ञान से । जयवंत हो इस जगत में जगमगे आतमज्ञान से ॥११२॥ पुण्य-पापरूप से दो पात्रों के रूप में नाचनेवाला कर्म एक पात्ररूप होकर (रंगभूमि में से) बाहर निकल गया । इसप्रकार श्री समयसार की (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत श्री समयसारपरमागम की) श्रीमद् अमृतचन्द्राचार्यदेव विरचित आत्मख्याति नामक टीका में पुण्य-पाप का प्ररूपक तीसरा अङ्क समाप्त हुआ । |
जयसेनाचार्य :
अभी तक यह बतलाया गया है कि मोक्ष के हेतुभूत जो जीव के सम्यक्त्वादि-गुण हैं, वे मिथ्यात्वादिकर्म के द्वारा ढंके हुए हैं, किन्तु अब आगे यह बतलाते हैं की उन सम्यक्त्वादि-गुणों का आधारभूत जो गुणी जीव है, वह मिथ्यात्वादि कर्मों से अच्छादित हो रहा है -- जिन भगवान ने बतलाया है कि सम्यक्त्व को रोकने वाला उसका प्रतिपक्षभूत मिथ्यात्व नाम का कर्म है जिसके उदय से यह जीव मिथ्यादृष्टि बन रहा है ऐसा जानना चाहिये । ज्ञान को रोकने वाला उसका प्रतिपक्षभूत अज्ञान है ऐसा जिनेन्द्र देव ने कहा है । उसके उदय से जीव अज्ञानी है ऐसा जानना चाहिए । इसी प्रकार जिनेन्द्र भगवान, ने बतलाया है कि चारित्र को रोकने वाला उसका प्रतिपक्षभूत क्रोधादि-कषाय है जिसके उदय से यह जीव चारित्र से रहित अचारित्री हो रहा है ऐसा जानना चाहिये । इस प्रकार मोक्ष का कारणभूत जो यह जीव गुणी है, उसके आवरण के कथन की मुख्यता से तीन गाथायें पूर्ण हुई । साराँश यह है कि सम्यकत्वादि जीव के गुण हैं सो ये मुक्ति के कारण हैं अथवा उन गुणों में परिणमन करने वाला जीव स्वयं मोक्ष का कारण है । किन्तु उस शुद्धजीव से पृथग्भूत जो शुभ व अशुभ मन-वचन-काय के व्यायापाररूप-कर्म हैं अथवा उस व्यापार से उपार्जित किये हुए अदृष्टरूप शुभाशुभ-कर्म हैं वे मोक्ष के कारण नहीं हैं । अत: वे हेय हैं, त्याज्य हैं इस प्रकार के व्याख्यान से नव-गाथायें पूर्ण हुईं । दुसरी पातनिका के अभिप्राय से पापाधिकार के व्याख्यान की मुख्यता से कथन पूर्ण हुआ ॥१६८-१७०॥ यहाँ शिष्य प्रश्न करता है कि इस अधिकार में आचार्य ने [जावादीसद्दहणं] इत्यादि रूप से व्यवहार-रत्नत्रय का कथन किया है फिर यह पापाधिकार कैसे हो सकता है ? इस शंका का उत्तर यह है कि यद्यपि व्यवहार-मोक्षमार्ग, निश्चय-रत्नत्रय जो उपादेयभूत है, उसका कारण होने से उपादेय है / ग्रहण करने योग्य है तथा परम्परा से जीव की पवित्रता का कारण है, इससे पवित्र भी है तथापि बाह्य-द्रव्यों के अवलम्बन को लिए हुए होता है इसलिए पराधीन होने से वह नाश को प्राप्त होता है यह एक कारण है । दूसरा कारण यह है कि निर्विकल्प-समाधि में तत्पर होने वाले योगियों का अपने शुद्धात्म-स्वरूप से पतन व्यवहार-विकल्पों के अवलंबन से हो जाता है । इसलिए व्यवहार-मोक्षमार्ग पाप रूप है अथवा इस अधिकार से सम्यक्त्वादि जीव के गुणों से प्रतिपक्षी मिथ्यात्व आदि भावना का व्याख्यान किया गया है इससे भी यह पापाधिकार है । इस प्रकार व्यवहारनय से कर्म यद्यपि पुण्य-पापरुप दो प्रकार का है तथापि निश्चयनय की अपेक्षा तो श्रंगार-रहित पात्र के समान पुदुगल-रूप से एक-रूप होकर रंग-भूमि से निकल गया । इस प्रकार श्री जयसेनाचार्य कृत शुद्धात्मा की अनुभूति लक्षण को रखने वाली तात्पर्यवृत्ति नाम की समयसार के व्याख्यान में तीन स्थल के समुदायरूप से १९ गाथाओं द्वारा यह पुण्य-पापाधिकार नाम का चौथा प्रकरण समाप्त हुआ । इति चतुर्थाधिकार: समाप्त: । |