
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
कथं ज्ञानी निरास्रव इति चेत् - ज्ञानी हि तावदास्रवभावभावनाभिप्रायाभावान्निरास्रव एव । यत्तु तस्यापि द्रव्यप्रत्यया: प्रति-समयमनेकप्रकारं पुद्गलकर्म बध्नंति, तत्र ज्ञानगुणपरिणाम एव हेतु: । कथं ज्ञानगुणपरिणामो बंधहेतुरिति चेत् ज्ञानगुणस्य हि यावज्जघन्यो भाव: तावत् तस्यान्तर्मुहूर्तविपरिणामित्वात् पुन: पुनरन्यतयास्ति परिणाम: । स तु यथाख्यातचारित्रावस्थाया अधस्तादवश्यंभाविरागसद्भावात् बंधहेतुरेव स्यात् ॥१७०-१७१ ॥ ज्ञानी तो आस्रव-भाव की भावना के अभिप्राय के अभाव से निरास्रव ही है, किन्तु उस ज्ञानी के भी द्रव्यास्रव प्रति समय अनेक प्रकार के पुद्गल-कर्म को बाँधता है, सो उसमें ज्ञानगुण का परिणमन ही कारण है । ज्ञान-गुण का जब तक जघन्य भाव है याने क्षयोपशम-रूप भाव है, तब तक ज्ञान अंतमुहूर्त विपरिणामी होने से बार बार अन्य प्रकार परिणमन करता है । सो वह यथाख्यात चारित्र अवस्था से नीचे अवश्यंभावी राग का सद्भाव होने से बंध का कारण ही है । |
जयसेनाचार्य :
आगे कहते है कि ज्ञानी जीव आस्रव रहित किस प्रकार होता है -- [चउविह अणेयभेयं बंधंते णाणदंसणगुणेहिं] यहाँ पर 'चहुविह' यह शब्द बहुवचन है फिर ह्रस्वान्त पाठ है क्योंकि प्राकृत के व्याकरण के अनुसार ऐसा होता है । मिथ्यात्वादिरूप चार प्रकार के मूल प्रत्यय हैं, वे ज्ञानावरणादि के भेद से अनेक प्रकार के ज्ञान और दर्शन गुण के द्वारा बंध को करने वाले हैं । यदि यहाँ कोई शंका करे कि ज्ञान-गुण और दर्शन-गुण तो आत्मा के गुण हैं, अत: वे बन्ध के कारण कैसे हो सकते हैं ? उसका समाधान करते हैं कि उदय में आये हुए मिथ्यात्वादि द्रव्य प्रत्यय आत्मा के ज्ञान और दर्शन गुण को रागादिमय अज्ञानभाव के रूप में परिणमा देते है । उस समय वह अज्ञानभाव में परिणत हुआ ज्ञान और दर्शन बंध का कारण होता है । वास्तव में वह रागादिरूप अज्ञानभाव में परिणत हुआ ज्ञान और दर्शन अज्ञान कहलाता है । इसलिए कुछ लोग 'अण्णाणदंसणगुणेहिं' ऐसा पाठान्तर करके पढ़ते हैं । [समये समये जम्हा तेण अबंधुत्ति णाणी दु] जबकि ज्ञान और दर्शन गुण को रागादिमय अज्ञान में परिणत करके मिथ्यात्वादि प्रत्यय ही नूतन कर्म-बन्ध करते हैं । इसलिए भेद-ज्ञानी जीव बन्धक नहीं होता, किन्तु ज्ञान और दर्शन का रंजक -- राग-कारक होने से उपर्युक्त प्रत्यय ही बंधक होते हैं । इस प्रकार से ज्ञानी जीव का निरास्रवत्व सिद्ध हो जाता है ॥१७७॥ अब ज्ञान-गुण का परिणमन भी बंध का कारण कैसे होता है सो बतलाते हैं -- [जम्हा दु जहण्णादो णाणगुणादो पुणो वि परिणमदि अण्णत्तं णाणगुणो] क्योंकि स्पष्टतया यथाख्यात-चारित्र से पूर्व-अवस्था का ज्ञान जघन्य अर्थात हीनदशावाला--कषायसहित-वृत्तिवाला होता है इसलिए ज्ञान-गुण की जघन्यता के कारण से यह जीव अन्तर्मुहूर्त के पीछे निर्विकल्प-समाधि में ठहर नहीं सकता है, इसलिए वह जीव का ज्ञान-गुण अन्यरूपता को सविकल्परूप-पर्यायांतर को स्वीकार करता है । [तेण दु सो बंधगो भणिदो] उस विकल्प-सहित कषाय-भाव के कारण वह गुण नूतन-बंध करने वाला होता है । अथवा इस गाथा का इस प्रकार भी अर्थ लिया जा सकता है कि जघन्य से अर्थात् मिथ्यादृष्टि के ज्ञान-गुण से काल-लब्धि के द्वारा सम्यक्त्व प्राप्त होने पर वह ज्ञान मिथ्यापने को त्यागकर अन्यपने को अर्थात सम्यग्ज्ञानपने को प्राप्त कर लेता है । [तेण दु सो बंधगो भणिदो] इसलिए वह ज्ञान-गुण अथवा ज्ञान-गुण के स्वरूप में परिणत जीव अबन्धक कहा जाता है ॥१७८॥ |