
अमृतचंद्राचार्य :
अब, आत्मा का सुख-स्वभावत्व दृष्टान्त देकर दृढ़ करते हैं - जैसे आकाश में अन्य कारण की अपेक्षा रखे बिना ही सूर्य
१जैसे लोहे का गोला कभी उष्णता-परिणाम से परिणमता है वैसे सूर्य सदा ही उष्पता-परिणाम से परिणमा हुआ है २परिनिर्वृत्ति = मोक्ष; परिपूर्णता; अन्तिम सम्पूर्ण सुख (परिनिर्वृत्ति आत्म-तृप्ति से होती है अर्थात् आत्म-तृप्ति की पराकाष्ठा ही परिनिर्वृत्ति है) ३शिलास्तंभ = पत्थर का खंभा ४द्युति = दिव्यता; भव्यता, महिमा (गणधरदेवादि बुध जनों के मन में शुद्धात्म-स्वरूप की दिव्यता का स्तुतिगान उत्कीर्ण हो गया है) |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथात्मनः सुखस्वभावत्वं ज्ञानस्वभावत्वं च पुनरपिदृष्टान्तेन दृढयति -- सयमेव जहादिच्चो तेजो उण्हो य देवदा णभसि कारणान्तरं निरपेक्ष्य स्वयमेव यथादित्यःस्वपरप्रकाशरूपं तेजो भवति, तथैव च स्वयमेवोष्णो भवति, तथा चाज्ञानिजनानां देवता भवति । क्वस्थितः । नभसि आकाशे । सिद्धो वि तहा णाणं सुहं च सिद्धोऽपि भगवांस्तथैव कारणान्तरं निरपेक्ष्यस्वभावेनैव स्वपरप्रकाशकं केवलज्ञानं, तथैव परमतृप्तिरूपमनाकुलत्वलक्षणं सुखम् । क्व । लोगे जगति । तहा देवो निजशुद्धात्मसम्यक्श्रद्धानज्ञानानुष्ठानरूपाभेदरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिसमुत्पन्न-सुन्दरानन्दस्यन्दिसुखामृतपानपिपासितानां गणधरदेवादिपरमयोगिनां देवेन्द्रादीनां चासन्नभव्यानां मनसि निरन्तरं परमाराध्यं, तथैवानन्तज्ञानादिगुणस्तवनेन स्तुत्यं च यद्दिव्यमात्मस्वरूपं तत्स्वभावत्वात्तथैव देवश्चेति । ततो ज्ञायते मुक्तात्मनां विषयैरपि प्रयोजनं नास्तीति ॥६८॥ एवं स्वभावेनैवसुखस्वभावत्वाद्विषया अपि मुक्तात्मनां सुखकारणं न भवन्तीतिकथनरूपेण गाथाद्वयं गतम् । [सयमेव जहादिच्चो तेजो उण्हो य देवदा णभसि] - अन्य कारणों की अपेक्षा नहीं करके जैसे सूर्य स्वयं ही स्व-पर प्रकाशरूप से तेज है, उसीप्रकार स्वयं ही उष्ण है और वैसे ही अज्ञानी मनुष्यों का देवता है। कहाँ स्थित सूर्य इनरूप है? आकाश में स्थित सूर्य इनरूप है । [सिद्धो वा तहा णाणं सुहं च] - उसी प्रकार सिद्ध भगवान भी अन्य कारणों की अपेक्षा नहीं करके स्वभाव से ही स्व-पर प्रकाशक केवलज्ञान-मय और उसी प्रकार परम संतुष्टि स्वरूप अनाकुलता लक्षण सुखमय हैं । सिद्ध भगवान इनमय कहाँ है? [लोगे] - वे लोक में इनमय हैं । [तहा देवो] - और उसी प्रकार निज-शुद्धात्मा के सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र रूप अभेद रत्नत्रय स्वरूप निर्विकल्प समाधि से उत्पन्न सुन्दर आनन्द के तीव्र प्रवाह-रूप सुखामृत पान के पिपासु गणधर देव आदि परम-योगियों और देवेन्द्र आदि आसन्न-भव्य जीवों के मन में निरन्तर परम आराध्य और वैसे ही अनन्त ज्ञानादि गुणों के स्तवन से स्तुत्य जो पवित्र आत्म-स्वरूप - उस स्वभाव के कारण देव हैं । इससे ज्ञात होता है कि मुक्तात्माओं को विषयों से भी प्रयोजन नहीं है । इसप्रकार स्वभाव से ही सुख-स्वभावी होने से विषय भी मुक्तात्माओं को सुख के कारण नहीं - इस कथनरूप दो गाथायें पूर्ण हुईं । |