+ श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेव पूर्वोक्त लक्षण अनन्त-सुख के आधारभूत सर्वज्ञ को वस्तुस्तवनरूप से नमस्कार करते हैं -
तेजो दिट्ठी णाणं इड्ढी सोक्खं तहेव ईसरियं ।
तिहुवणपहाणदैयं माहप्पं जस्स सो अरिहो ॥71॥
तेजो दिट्ठी णाणं इड्ढी सोक्खं तहेव ईसरियं
तिहुवणपहाणदैयं माहप्पं जस्स सो अरिहो ॥७१॥
प्राधान्य है त्रैलोक्य में ऐश्वर्य ऋद्धि सहित हैं
तेज दर्शन ज्ञान सुख युत पूज्य श्री अरिहंत हैं ॥७१॥
अन्वयार्थ : जिनके भामण्डल, केवलदर्शन, केवलज्ञान, ऋद्धि, अतीन्द्रिय सुख, ईश्वरता, तीन लोक में प्रधान देव आदि माहात्म्य हैं; वे अरहंत भगवान हैं ॥७१॥

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

जयसेनाचार्य : संस्कृत
तेजो दिट्ठी णाणं इड्ढी सोक्खं तहेव ईसरियं तिहुवणपहाणदइयं तेजः प्रभामण्डलं,जगत्त्रयकालत्रयवस्तुगतयुगपत्सामान्यास्तित्वग्राहकं केवलदर्शनं, तथैव समस्तविशेषास्तित्वग्राहकं केवलज्ञानं, ऋद्धिशब्देन समवसरणादिलक्षणा विभूतिः, सुखशब्देनाव्याबाधानन्तसुखं, तत्पदाभिलाषेण इन्द्रादयोऽपि भृत्यत्वं कुर्वन्तीत्येवंलक्षणमैश्वर्यं, त्रिभुवनाधीशानामपि वल्लभत्वं दैवं भण्यते । माहप्पं जस्स सो अरिहो इत्थंभूतं माहात्म्यं यस्य सोऽर्हन् भण्यते । इति वस्तुस्तवनरूपेण नमस्कारंकृतवन्तः ॥७१॥


(अब सर्वज्ञ-नमस्कार परक दो गाथाओं वाला पाँचवे स्थल का चौथा भाग प्रारम्भ होता है ।)

[तेजो दिट्ठी णाणं इड्ढी सोक्खं तहेव ईसरियं तिहुवणपहाणदइयं] -
  • प्रभामण्डल,
  • तीनलोक तीनकालवर्तीं सम्पूर्ण वस्तुओं के सामान्य-अस्तित्व को एक साथ ग्रहण करनेवाला केवलदर्शन,
  • उसीप्रकार सभी के विशेष-अस्तित्व को ग्रहण करने वाला केवल-ज्ञान,
  • ऋद्धि शब्द से समवशरणादि लक्षण विभूति,
  • सुख शब्द से अव्याबाध अनंतसुख,
  • उस पद की इच्छा से इन्द्र आदि भी भृत्यता (सेवा-नौकरी) करते हैं - इस लक्षण वाली ईश्वरता,
  • तीन-लोकों के राजाओं के भी प्रिय-स्वामी देव कहे जाते हैं
[माहप्पं जस्स सो अरिहो] - इसप्रकार का माहात्म्य जिनका है, वे अरहंत कहलाते हैं ।

इसप्रकार वस्तु-स्तवनरूप से नमस्कार किया गया है ।