+ उन्हीं भगवान को सिद्धावस्था सम्बन्धी गुणों के स्तवनरूप से नमस्कार -
तं गुणदो अधिगदरं अविच्छिदं मणुवदेवपदिभावं ।
अपुणब्भावणिबद्धं पणमामि पुणो पुणो सिद्धं ॥72॥
तं गुणदो अधिगदरं अविच्छिदं मणुवदेवपदिभावं
अपुणब्भावणिबद्धं पणमामि पुणो पुणो सिद्धं ॥७२॥
हो नमन बारम्बार सुरनरनाथ पद से रहित जो
अपुनर्भावी सिद्धगण गुण से अधिक भव रहित जो ॥७२॥
अन्वयार्थ : उन गुणों से परिपूर्ण, मनुष्य व देवों के स्वामित्व से रहित, अपुनर्भाव निबद्ध-मोक्ष स्वरूप सिद्ध भगवान को बारंबार प्रणाम करता हूँ ॥७२॥

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

जयसेनाचार्य : संस्कृत
पणमामि नमस्करोमि पुणो पुणो पुनः पुनः । कम् । तं सिद्धं परमागमप्रसिद्धं सिद्धम् । कथंभूतम् । गुणदो अधिगदरं अव्याबाधानन्तसुखादिगुणैरधिकतरं समधिकतरगुणम् । पुनरपि कथंभूतम् । अविच्छिदं मणुवदेवपदिभावं यथा पूर्वमर्हदवस्थायां मनुजदेवेन्द्रादयः समवशरणे समागत्यनमस्कुर्वन्ति तेन प्रभुत्वं भवति, तदतिक्रान्तत्वादतिक्रान्तमनुजदेवपतिभावम् । पुनश्च किंविशिष्टम् । अपुणब्भावणिबद्धं द्रव्यक्षेत्रादिपञ्चप्रकारभवाद्विलक्षणः शुद्धबुद्धैकस्वभावनिजात्मोपलम्भलक्षणो योऽसौमोक्षस्तस्याधीनत्वादपुनर्भावनिबद्धमिति भावः ॥७२॥
एवं नमस्कारमुख्यत्वेन गाथाद्वयं गतम् । इतिगाथाष्टकेन पञ्चमस्थलं ज्ञातव्यम् । एवमष्टादशगाथाभिः स्थलपञ्चके न सुखप्रपञ्चनामान्तराधिकारोगतः । इति पूर्वोक्तप्रकारेण 'एस सुरासुर' इत्यादि चतुर्दशगाथाभिः पीठिका गता, तदनन्तरंसप्तगाथाभिः सामान्यसर्वज्ञसिद्धिः, तदनन्तरं त्रयस्त्रिंशद्गाथाभिः ज्ञानप्रपञ्चः, तदनन्तर-मष्टादशगाथाभिः सुखप्रपञ्च इति समुदायेन द्वासप्ततिगाथाभिरन्तराधिकारचतुष्टयेन शुद्धोपयोगाधिकारः समाप्तः ॥
इत ऊर्द्ध्वं पञ्चविंशतिगाथापर्यन्तं ज्ञानकण्डिकाचतुष्टयाभिधानोऽधिकारः प्रारभ्यते । तत्रपञ्चविंशतिगाथामध्ये प्रथमं तावच्छुभाशुभविषये मूढत्वनिराकरणार्थं 'देवदजदिगुरु' इत्यादि दशगाथापर्यन्तं प्रथमज्ञानकण्डिका कथ्यते । तदनन्तरमाप्तात्मस्वरूपपरिज्ञानविषये मूढत्वनिराकरणार्थं'चत्ता पावारंभं इत्यादि सप्तगाथापर्यन्तं द्वितीयज्ञानकण्डिका । अथानन्तरं द्रव्यगुणपर्यायपरिज्ञानविषयेमूढत्वनिराकरणार्थं 'दव्वादीएसु' इत्यादि गाथाषट्क पर्यन्तं तृतीयज्ञानकण्डिका । तदनन्तरं स्वपर-तत्त्वपरिज्ञानविषये मूढत्वनिराकरणार्थं 'णाणप्पगं' इत्यादि गाथाद्वयेन चतुर्थज्ञानकण्डिका । इतिज्ञानकण्डिकाचतुष्टयाभिधानाधिकारे समुदायपातनिका । अथेदानीं प्रथमज्ञानकण्डिकायां स्वतन्त्र-व्याख्यानेन गाथाचतुष्टयं, तदनन्तरं पुण्यं जीवस्य विषयतृष्णामुत्पादयतीति कथनरूपेण गाथाचतुष्टयं, तदनन्तरमुपसंहाररूपेण गाथाद्वयं, इति स्थलत्रयपर्यन्तं क्रमेण व्याख्यानं क्रियते । तद्यथा ---


[पणमामि] - नमस्कार करता हूँ । [पुणो पुणो] - बारम्बार । बारम्बार किन्हें नमस्कार करता हूँ? [तं सिद्धं] - परमागम में प्रसिद्ध उन सिद्धों को नमस्कर करता हूँ । वे सिद्ध कैसे हैं? [गुणदो अधिगदरं] -अव्याबाध- अनन्त सुखादि गुणों से अधिकतर-अच्छी तरह विशिष्टाधिक-परिपूर्ण गुणवाले हैं । वे सिद्ध और कैसे हैं? [अविच्छिदं मणुवदेवपदिभावं] - जैसे पहले अरहन्त अवस्था में चक्रवर्ती, देवेन्द्र आदि समवशरण में आकर नमस्कार करते हैं, उससे प्रभुता होती है; उससे उल्लंघित हो जाने के कारण मानवपति, देवपति भाव से रहित हैं । वे सिद्ध और किस विशेषतावाले हैं? [अपुणब्भावणिबद्धं] - द्रव्य क्षेत्रादि पाँच प्रकार के भवों से विलक्षण शुद्ध-बुद्ध एक स्वभावी निजात्मा की प्राप्ति लक्षण जो मोक्ष, उसके अधीन होने से अपुनर्भावनिबद्ध हैं - यह भाव है ।

इस प्रकार नमस्कार की मुख्यता से दो गाथायें पूर्ण हुईं ।

इस प्रकार आठ गाथाओं वाला पाँचवा स्थल जानना चाहिये ।

इसप्रकार अठारह गाथाओं द्वारा पाँच स्थलों में विभक्त 'सुख प्रपंच' नामक चतुर्थ अन्तराधिकार पूर्ण हुआ ।

इसप्रकार पूर्वोक्त प्रकार से ['एस सुरासुर'] इत्यादि चौदह गाथाओं द्वारा पीठिका पूर्ण हुई उसके बाद सात गाथाओं द्वारा (सामान्य-सर्वज्ञसिद्धि), तदनन्तर तेंतीस गाथाओं द्वारा (ज्ञानप्रपंच) और उसके बाद अठारह गाथाओं द्वारा (सुखप्रपंच) - इसप्रकार सामूहिक बहत्तर गाथाओं द्वारा चार अन्तराधिकार रूप से प्रथम (शुद्धोपयोग अधिकार) पूर्ण हुआ ।

इसके आगे पच्चीस गाथा पर्यन्त चलनेवाला ['ज्ञानकण्डिका चतुष्टय'] नामक द्वितीयाधिकार प्रारम्भ होता है । वहाँ पच्चीस गाथाओं में सबसे पहले शुभाशुभ के विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['देवदजदिगुरु'] इत्यादि दस गाथा पर्यन्त पहली ज्ञानकण्डिका कहते हैं । उसके बाद आप्त और आत्मा के स्वरूप परिज्ञान के विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['चत्ता पावारंभं'] इत्यादि सात गाथा पर्यन्त दूसरी ज्ञान कण्डिका, अब उसके बाद द्रव्य-गुण-पर्याय सम्बन्धी परिज्ञान के विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['दव्वादिएसु'] इत्यादि छह गाथा पर्यन्त तीसरी ज्ञान कण्डिका है । तत्पश्चात् स्व-पर तत्त्व परिज्ञान सम्बन्धी विषय में मूढता-निराकरण के लिये ['णाणप्पग'] इत्यादि दो गाथाओं द्वारा चौथी ज्ञान कण्डिका कही गई है ।

इसप्रकार ज्ञानकण्डिका चतुष्टय नामक दूसरे अधिकार में सामूहिक पातनिका हुई ।

अब, इस समय पहली ज्ञान कण्डिका अन्तराधिकार में स्वतंत्र व्याख्यानरूप से चार गाथायें, उसके बाद पुण्य जीव को विषयतृष्णा का उत्पादक है - इस कथनरूप से चार गाथायें, उसके बाद उपसंहार रूप से दो गाथायें - इसप्रकार तीन स्थल पर्यन्त क्रम से व्याख्यान करते हैं ।