+ ज्ञेयतत्त्व का प्रज्ञापन करते हैं अर्थात् ज्ञेयतत्त्व बतलाते हैं । उसमें (प्रथम) पदार्थ का सम्यक् (यथार्थ) द्रव्यगुणपर्यायस्वरूप वर्णन करते हैं -
अत्थो खलु दव्वमओ दव्वाणि गुणप्पगाणि भणिदाणि । (93)
तेहिं पुणो पज्जाया पज्जयमूढा हि परसमया ॥103॥
अर्थः खलु द्रव्यमयो द्रव्याणि गुणात्मकानि भणितानि ।
तैस्तु पुनः पर्यायाः पर्ययमूढा हि परसमयाः ॥९३॥
गुणात्मक हैं द्रव्य एवं अर्थ हैं सब द्रव्यमय
गुण-द्रव्य से पर्यायें पर्ययमूढ़ ही हैं परसमय ॥१०३॥
अन्वयार्थ : पदार्थ वास्तव में द्रव्यमय हैं, द्रव्य गुणात्मक कहे गये हैं, द्रव्य तथा गुणों से पर्यायें होती हैं; और पर्यायमूढ जीव ही परसमय है ।
Meaning : Certainly, all objects-of-knowledge (gyaeya) are substances (dravya) having existence as their general nature. All substances (dravya) have qualities (guna) and due to transformation in substance and qualities, modes (paryāya) exist; thus, modes (paryāya) are of two kinds: mode-of-substance (dravyaparyāya) and mode-of-qualities (gunaparyāya). Those who mistake the mode (paryāya) for the substance (dravya) are wrong-believers (mithyadrsti).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ ज्ञेयतत्त्वप्रज्ञापनं । तत्र पदार्थस्य सम्यग्द्रव्यगुणपर्यायस्वरूपमुपवर्णयति -

इह किल य: कश्चनापि परिच्छिद्यमान: पदार्थ: स सर्व एव विस्तारायतसामान्यसमुदायात्मना द्रव्येणाभिनिर्वृत्तत्वाद्‌ द्रव्यमय: । द्रव्याणि तु पुनरेकाश्रयविस्तारविशेषात्मकैर्गुणैरभि-निर्वृत्तत्वाद्‌गुणात्मकानि । पर्यायास्तु पुनरायतविशेषात्मका उक्तलक्षणैर्द्रव्यैरपि गुणैरप्यभि-निवृत्तत्वाद्‌ द्रव्यात्मका अपि गुणात्मका अपि । तत्रानेकद्रव्यात्मकैक्यप्रतिपत्तिनिबन्धनो द्रव्यपर्याय: । स द्विविध:, समानजातीयोऽसमानजातीयश्च । तत्र समानजातीयो नाम यथा अनेकपुद्‌गलात्मको द्वयणुकस्त्र्यणुक इत्यादि; असमानजातीयो नाम यथा जीवपुद्‌गलात्मको देवो मनुष्य इत्यादि । गुणद्वारेणायतानैक्यप्रतिपत्तिननिबन्धनो गुणपर्याय: । सोऽपि द्विविध:, स्वभावपर्यायो विभावपर्यायश्च । तत्र स्वभावपर्यायो नाम समस्तद्रव्याणामात्मीयात्मीयागुरुलघुगुणद्वारेण प्रतिसमयसमुदीयमानषट्‌स्थानपतितवृद्धिहानिनानात्वानुभूति:, विभावपर्यायो नाम रूपादीनां ज्ञानादीनां वा स्वपरप्रत्ययवर्तमानपूर्वोत्तरावस्थावतीर्णतारतम्योपदर्शितस्वभाव-विशेषानेकत्वापत्ति: ।

अथेदं दृष्टान्तेन द्रढयति - यथैव हि सर्व एव पटोऽवस्थायिना विस्तारसामान्यसमुदाये-नाभिधावताऽऽयतसामान्यसमुदायेन चाभिनिर्वर्त्यमानस्तन्मय एव; तथैव हि सर्व एव पदार्थो-ऽवस्थायिना विस्तारसामान्यसमुदायेनाभिधावताऽऽयतसामान्यसमुदायेन च द्रव्यनाम्नाभि-निर्वर्त्त्यमानो द्रव्यमय एव । यथैव च पटेऽवस्थायी विस्तारसामान्यसमुदायोऽभिधावन्नायतसामान्यसमुदायो वा गुणैरभिनिर्वर्त्यमानो गुणेभ्य: पृथगनुपलम्भाद्‌गुणात्मक एव; तथैव च पदार्थेष्ववस्थायी विस्तारसामान्यसमुदायोऽभिधावन्नायतसामान्यसमुदायो वा द्रव्यनामा गुणैरभिनिर्वर्त्यमानो गुणेभ्य: पृथगनुपलम्भाद्‌ गुणात्मक एव । यथैव चानेकपटात्मको द्विपटिका त्रिपटिकेति समानजातीयो द्रव्यपर्याय:, तथैव चानेकपुद्‌गलात्मको द्वय्यणुकस्त्र्यणुक इति समानजातीयो द्रव्यपर्याय: । तथैव चानेककौशेयककार्पाससमयपटात्मको द्विपटिकात्रिपटिकेत्यसमानजातीयो द्रव्यपर्याय:, तथैव चानेकजीवपुद्‌गलात्मको देवो मनुष्य इत्यसमानजातीयो द्रव्यपर्याय: । यथैव च क्वचित्पटे स्थूलात्मीयागुरुलघुद्वारेण कालक्रमप्रवृत्तेन नानाविधेन परिणमन्ना नात्वप्रतिपत्तिर्गुणात्मक: स्वभावपर्याय:; तथैव च समस्तेष्वपि द्रव्येषु सूक्ष्मात्मीया-गुरुलघुगुणद्वारेण प्रतिसमयसमुदीयमानषट्‌स्थानपतितवृद्धिहानिनानात्वानुभूति: गुणात्मक: स्वभावपर्याय: । यथैव च पटे रूपादीनां स्वपरप्रत्ययप्रवर्त्तमानपूर्वोत्तरावस्थावतीर्णतारतम्योपदर्शित-स्वभावविशेषानेकत्वापत्तिर्गुणात्मको विभावपर्याय:; तथैव च समस्तेष्वपि द्रव्येषु रूपादीनां ज्ञानादीनां वा स्वपरप्रत्ययप्रवर्तमानपूर्वोत्तरावस्थावतीर्णतारतम्योपदर्शितस्वभावविशेषानेकत्वापत्तिर्गुणात्मको विभावपर्याय: ।

इयं हि सर्वपदार्थानां द्रव्यगुणपर्यायस्वभावप्रकाशिका पारमेश्वरी व्यवस्था साधीयसी, न पुनरितरा । यतो हि बहवोऽपि पर्यायमात्रमेवावलम्ब्य तत्त्वाप्रतिपत्तिलक्षणं मोहमुपगच्छन्त: परसमया भवन्ति ॥९३॥


इस विश्‍व में जो कोई जानने में आने वाला पदार्थ है वह समस्त ही विस्तार-सामान्य समुदायात्मक और आयत-सामान्य समुदायात्मक द्रव्य से रचित होने से द्रव्यमय (द्रव्यस्वरूप) है । और द्रव्य एक जिनका आश्रय है ऐसे विस्तार-विशेष स्वरूप गुणों से रचित (गुणों से बने हुए) होने से गुणात्मक है ।

और पर्यायें — जो कि आयत-विशेषस्वरूप हैं वे—जिनके लक्षण (ऊपर) कहे गये हैं ऐसे द्रव्यों से तथा गुणों से रचित होने से द्रव्यात्मक भी हैं गुणात्मक भी हैं । उसमें, अनेक-द्रव्यात्मक एकता की प्रतिपत्ति की कारणभूत द्रव्यपर्याय है । वह दो प्रकार है । (१) समानजातीय और (२) असमानजातीय । उसमें
  1. समानजातीय वह है—जैसे कि अनेक पुद्‌गलात्मक द्विअणुक, त्रिअणुक इत्यादि;
  2. असमानजातीय वह है,—जैसे कि जीवपुद्‌गलात्मक देव, मनुष्य इत्यादि ।
गुण द्वारा आयत की अनेकता की प्रतिपत्ति की कारणभूत गुणपर्याय है । वह भी दो प्रकार है । (१) स्वभावपर्याय और (२) विभावपर्याय ।
  1. उसमें समस्त द्रव्यों के अपने-अपने अगुरुलघुगुण द्वारा प्रतिसमय प्रगट होने वाली षट्‌स्‍थानपतित हानि-वृद्धिरूप अनेकत्व की अनुभूत वह स्वभावपर्याय है;
  2. रूपादि के या ज्ञानादि के स्व-पर के कारण प्रवर्तमान पूर्वोत्तर अवस्था में होने वाले तारतम्य के कारण देखने में आने वाले स्वभाव-विशेष-रूप अनेकत्व की आपत्ति विभावपर्याय है ।


अब यह (पूर्वोक्त कथन) दृष्टान्त से दृढ़ करते हैं :—
  • जैसे सम्पूर्ण पट, अवस्थायी (स्थिर) विस्तार-सामान्य-समुदाय से और दौड़ते (बहते, प्रवाहरूप) हुये ऐसे आयत-सामान्य-समुदाय से रचित होता हुआ तन्मय ही है, उसी प्रकार सम्पूर्ण पदार्थ 'द्रव्य' नामक अवस्थायी विस्तार-सामान्य-समुदाय से और दौड़ते हुये आयत-सामान्य-समुदाय से रचित होता हुआ द्रव्यमय ही है । और
  • जैसे पट में, अवस्थायी विस्तार-सामान्य-समुदाय या दौड़ते हुये आयत-सामान्य-समुदाय गुणों से रचित होता हुआ गुणों से पृथक् अप्राप्त होने से गुणात्मक ही है, उसी प्रकार पदार्थों में, अवस्थायी विस्तार-सामान्य-समुदाय या दौड़ता हुआ आयत-सामान्य-समुदाय -- जिसका नाम 'द्रव्य' है वह, गुणों से रचित होता हुआ गुणों से पृथक् अप्राप्त होने से गुणात्मक ही है । और
    • जैसे अनेक पटात्मक (एक से अधिक वस्त्रों से निर्मित) द्विपटिक, त्रिपटिक ऐसे समानजातीय द्रव्य-पर्याय है, उसी प्रकार अनेक पुद्‌गलात्मक द्विअणुक, त्रिअणुक ऐसी समानजातीय द्रव्यपर्याय है; और
    • जैसे अनेक रेशमी और सूती पटों के बने हुए १०द्विपटिक, त्रिपटिक ऐसी असमानजातीय द्रव्य-पर्याय है, उसी प्रकार अनेक जीव-पुद्‌गलात्मक देव, मनुष्य ऐसी असमानजातीय द्रव्य-पर्याय है । और
    • जैसे कभी पट में अपने स्थूल अगुरुलघु-गुण द्वारा कालक्रम से प्रवर्तमान अनेक प्रकाररूप से परिणमित होने के कारण अनेकत्व की प्रतिपत्ति गुणात्मक स्वभाव-पर्याय है, उसी प्रकार समस्त द्रव्यों में अपने-अपने सूक्ष्म अगुरुलघुगुण द्वारा प्रतिसमय प्रगट होने वाली षट्‌स्‍थान-पतित हानि-वृद्धिरूप अनेकत्व की अनुभूति वह गुणात्मक स्वभाव-पर्याय है; और
    • जैसे पट में, रूपादिक के स्व-पर के कारण प्रवर्तमान पूर्वोत्तर अवस्था में होने वाले तारतम्य के कारण देखने में आने वाले स्वभाव-विशेषरूप अनेकत्व की आपत्ति वह गुणात्मक विभावपर्याय है, उसी प्रकार समस्त द्रव्यों में, रूपादिक के या ज्ञानादि के स्व-पर के कारण प्रवर्तमान पूर्वोत्तर अवस्था में होने वाले तारतम्य के कारण देखने में आने वाले स्वभावविशेषरूप अनेकत्व की आपत्ति वह गुणात्मक विभावपर्याय है ।
वास्तव में यह, सर्व पदार्थों के द्रव्य-गुण-पर्याय स्वभाव की प्रकाशक ११पारमेश्‍वरी व्यवस्था भली-उत्तम-पूर्ण-योग्य है, दूसरी कोई नहीं; क्योंकि बहुत से (जीव) पर्यायमात्र का ही अवलम्बन करके, तत्त्व की अप्रतिपत्ति जिसका लक्षण है ऐसे, मोह को प्राप्‍त होते हुए पर-समय होते हैं ॥१०३॥

विस्तार-सामान्य-समुदाय = विस्तारसामान्य-रूप समुदाय । विस्तार का अर्थ है कि चौड़ाई । द्रव्य की चौड़ाई की अपेक्षा के (एक-साथ रहने वाले सहभावी) भेदों को (विस्तार-विशेषों को) गुण कहा जाता है; जैसे ज्ञान, दर्शन, चारित्र इत्यादि जीव-द्रव्य के विस्तार-विशेष अर्थात् गुण हैं । उन विस्तार-विशेषों में रहने वाले विशेषत्व को गौण करें तो इन सबमें एक आत्म-स्वरूप सामान्यत्व भासित होता है । यह विस्तारसामान्य (अथवा विस्तार-सामान्य-समुदाय) वह द्रव्य है ।
आयतसामान्यसमुदाय = आयतसामान्यरूप समुदाय । आयत का अर्थ है लम्बाई अर्थात् कालापेक्षित-प्रवाह । द्रव्य के लम्बाई की अपेक्षा के (एक के बाद एक प्रवर्तमान, क्रमभावी, कालापेक्षित) भेदों को (आयत विशेषों को) पर्याय कहा जाता है । उन क्रमभावी पर्यायों में प्रवर्तमान विशेषत्व को गौण करें तो एक द्रव्यत्वरूप सामान्यत्व ही भासित होता है । यह आयतसामान्य (अथवा आयतसामान्य समुदाय) वह द्रव्य है ।
अनन्त गुणों का आश्रय एक द्रव्य है ।
प्रतिपत्ति = प्राप्ति; ज्ञान; स्वीकार ।
द्विअणुक = दो अणुओं से बना हुआ स्कंध ।
स्व उपादान और पर निमित्त है ।
पूर्वोत्तर = पहले की और बाद की ।
आपत्ति = आपतित, आपड़ना ।
पट = वस्त्र
१०द्विपटिक = दो थानों को जोड़कर (सीकर) बनाया गया एक वस्त्र (यदि दोनों थान एक ही जाति के हों तो समान-जातीय द्रव्य-पर्याय कहलाता है, और यदि दो थान भिन्न जाति के हों (जैसे एक रेशमी दूसरा सूती) तो असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय कहलाता है ।
११परमेश्वर की कही हुई
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ पदार्थस्य द्रव्यगुणपर्यायस्वरूपं निरूपयति --
अत्थो खलु दव्वमओ अर्थो ज्ञानविषयभूतः पदार्थः खलु स्फुटं द्रव्यमयो भवति । कस्मात् । तिर्यक्-सामान्योद्धर्वतासामान्यलक्षणेन द्रव्येण निष्पन्नत्वात् । तिर्यक्सामान्योर्द्ध्वतासामान्यलक्षणं कथ्यते –एककाले नानाव्यक्तिगतोऽन्वयस्तिर्यक्सामान्यं भण्यते । तत्र दृष्टान्तो यथा – नानासिद्धजीवेषु सिद्धोऽयंसिद्धोऽयमित्यनुगताकारः सिद्धजातिप्रत्ययः । नानाकालेष्वेकव्यक्तिगतोन्वय ऊर्ध्वतासामान्यं भण्यते ।तत्र दृष्टांतः यथा – य एव केवलज्ञानोत्पत्तिक्षणे मुक्तात्मा द्वितीयादिक्षणेष्वपि स एवेति प्रतीतिः । अथवानानागोशरीरेषु गौरयं गौरयमिति गोजातिप्रतीतिस्तिर्यक्सामान्यम् । यथैव चैकस्मिन् पुरुषेबालकुमाराद्यवस्थासु स एवायं देवदत्त इति प्रत्यय ऊर्ध्वतासामान्यम् । दव्वाणि गुणप्पगाणि भणिदाणि द्रव्याणि गुणात्मकानि भणितानि । अन्वयिनो गुणा अथवा सहभुवो गुणा इति गुणलक्षणम् ।यथा अनन्तज्ञानसुखादिविशेषगुणेभ्यस्तथैवागुरुलघुकादिसामान्यगुणेभ्यश्चाभिन्नत्वाद्गुणात्मकं भवति
सिद्धजीवद्रव्यं, तथैव स्वकीयस्वकीयविशेषसामान्यगुणेभ्यः सकाशादभिन्नत्वात् सर्वद्रव्याणि गुणात्मकानि भवन्ति । तेहिं पुणो पज्जाया तैः पूर्वोक्तलक्षणैर्द्रव्यैर्गुणैश्च पर्याया भवन्ति । व्यतिरेकिणःपर्याया अथवा क्रमभुवः पर्याया इति पर्यायलक्षणम् । यथैकस्मिन् मुक्तात्मद्रव्ये किंचिदूनचरम-शरीराकारगतिमार्गणाविलक्षणः सिद्धगतिपर्यायः तथाऽगुरुलघुकगुणषड्वृद्धिहानिरूपाः साधारणस्वभाव-गुणपर्यायाश्च, तथा सर्वद्रव्येषु स्वभावद्रव्यपर्यायाः स्वजातीयविजातीयविभावद्रव्यपर्यायाश्च, तथैव स्वभावविभावगुणपर्यायाश्च 'जेसिं अत्थि सहाओ' इत्यादिगाथायां, तथैव 'भावा जीवादीया' इत्यादि- गाथायां च पञ्चास्तिकाये पूर्वं कथितक्रमेण यथासंभवं ज्ञातव्याः । पज्जयमूढा हि परसमया यस्मादित्थंभूत-द्रव्यगुणपर्यायपरिज्ञानमूढा अथवा नारकादिपर्यायरूपो न भवाम्यहमिति भेदविज्ञानमूढाश्च परसमया मिथ्यादृष्टयो भवन्तीति । तस्मादियं पारमेश्वरी द्रव्यगुणपर्यायव्याख्या समीचीना भद्रा भवतीत्यभि-प्रायः ॥१०३॥


अर्थ, ज्ञान का विषयभूत पदार्थ, वास्तव में द्रव्यमय है । पदार्थ द्रव्यमय कैसे है? तिर्यक् सामान्य और ऊर्ध्वता सामान्य लक्षण द्रव्य से रचित होने के कारण पदार्थ द्रव्यमय है । तिर्यक् सामान्य और ऊर्ध्वता सामान्य का लक्षण कहते हैं --
  • एक समय में अनेक वस्तुओं में पाया जाने वाला अन्वय तिर्यक् सामान्य कहलाता है । वहाँ दृष्टांत देते हैं जैसे - अनेक सिद्ध जीवों में 'ये सिद्ध हैं, ये सिद्ध हैं' - इसप्रकार समान स्वभाव वाली सिद्धजाति का ज्ञान तिर्यक् सामान्य है ।
  • अनेक समयों में एक वस्तु सम्बन्धी समानता ऊर्ध्वता सामान्य कहलाती है । वहाँ दृष्टान्त देते हैं जैसे - केवलज्ञान की उत्पत्ति के समय जो मुक्तात्मा हैं दूसरे आदि समयों में भी वही हैं - ऐसी जानकारी ऊर्ध्वता सामान्यरूप है ।
अथवा अनेक गाय शरीरों में यह गाय, यह गाय- इसप्रकार गो जाति का ज्ञान तिर्यक् सामान्य है और जैसे एक ही पुरुष सम्बन्धी बाल कुमार आदि अवस्थाओं में 'यह वही देवदत्त है ' -- इसप्रकार का ज्ञान ऊर्ध्वता सामान्य है ।

द्रव्य गुणात्मक गुणस्वभावी कहे गये है । यह वही-यह वही गुण हैं अथवा साथ-साथ रहने वाले गुण हैं- इसप्रकार गुण का लक्षण है । जैसे सिद्ध जीव द्रव्य अनन्त ज्ञान, सुख आदि विशेष गुणों के साथ और उसीप्रकार अगुरुलघुक आदि सामान्य गुणों के साथ अभिन्नता होने के कारण गुणात्मक हैं । उसीप्रकार अपने-अपने विशेष-सामान्य गुणों के साथ अभिन्नता होने से सभी द्रव्य गुणात्मक हैं ।

उन पूर्वोक्त लक्षण द्रव्य और गुणों से पर्यायें होती हैं । जो व्यतिरेकि (भिन्न-भिन्न) है, वे पर्यायें हैं अथवा जो क्रम से होती हैं वे पर्यायें है - इसप्रकार पर्याय का लक्षण है । जैसे एक मुक्तात्मा द्रव्य में गति मार्गणा से विलक्षण अन्तिम शरीर के आकार से कुछ कम आकार वाली सिद्ध गति पर्याय तथा अगुरुलघुक गुण की षडवृद्धि-हानि रूप साधारण स्वभाव गुणपर्यायें हैं; उसीप्रकार सभी द्रव्यों में स्वभाव द्रव्य पर्यायें और स्वजातीय-विजातीय विभाव द्रव्य पर्यायें होती हैं और उसीप्रकार 'पंचास्तिकाय' ग्रन्थ में पहले कहे हुये क्रम से 'जिनका अस्ति स्वभाव है' -- इत्यादि गाथा में और उसीप्रकार 'जीवादिक द्रव्य भाव है' इत्यादि गाथा में यथासंभव जानना चाहिये ।

क्योंकि इसप्रकार द्रव्य -गुण-पर्याय की जानकरी के सम्बन्ध में जो मूढ (अज्ञानी) हैं अथवा 'नारकादि पर्याय रूप मैं नहीं हूँ' - इसप्रकार के भेद-विज्ञान में जो अज्ञानी हैं - वे परसमय मिथ्यादृष्टि हैं । इसलिए यह परमेश्वर (वीतराग-सर्वज्ञ देव) द्वारा कही गई द्रव्य-गुण-पर्याय की व्याख्या समीचीन कल्याणकारी है -- यह अभिप्राय है ॥१०३॥