
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथानुषङ्गिकीमिमामेव स्वसमयपरसमयव्यवस्थां प्रतिष्ठाप्योपसंहरति - ये खलु जीवपुद्गलात्मकमसमानजातीयद्रव्यपर्यायं सकलाविद्यानामेकमूलमुपगता यथोदितात्मस्वभावसंभावनक्लीबा: तस्मिन्नेवाशक्तिमुपव्रजन्ति, ते खलूच्छलितनिरर्गलैकान्तदृष्टयो मनुष्य एवाहमेष ममैवैतन्मनुष्यशरीरमित्यहङ्कारममकाराभ्यां विप्रलभ्यमाना अविचलितचेतनाविलासमात्रादात्मव्यवहारात् प्रच्युत्य क्रोडीकृतसमस्तक्रियाकुटुम्बकं मनुष्यव्यवहारमाश्रित्य रज्यन्तो द्विषन्तश्च परद्रव्येण कर्मणा संगतत्वात्परसमया जायन्ते । ये तु पुनरसंकीर्णद्रव्यगुणपर्यायसुस्थितं भगवंतमात्मन: स्वभावं सकलविद्यानामेक-मूलमुपगम्य यथोदितात्मस्वभावसंभावनसमर्थतया पर्यायमात्राशक्तिमत्यस्यात्मन: स्वभाव एव स्थितिमासूत्रयन्ति, ते खलु सहजविजृम्भितानेकान्तदृष्टिप्रक्षपितसमस्तैकान्तदृष्टिपरिग्रहाग्रहा मनुष्यादिगतिषु तद्विग्रहेषु चाविहिताहङ्कारममकारा अनेकापवरकसंचारितरत्नप्रदीपमिवैक-रूपमेवात्मानमुपलभमाना अविचलितचेतनाविलासमात्रमात्मव्यवहारमुररीकृत्य क्रीडीकृत-समस्तक्रियाकुटुम्बकं मनुष्य व्यवहारमनाश्रयन्तो विश्रान्तरागद्वेषोन्मेषतया परममौदासीन्यम-वलंबमाना निरस्तसमस्तपरद्रव्यसंगतितया स्वद्रव्येणैव केवलेन संगतत्वात्स्वसमया जायन्ते । अत: स्वसमय एवात्मनस्तत्त्वम् ॥९४॥ जो जीव पुद्गलात्मक असमान-जातीय द्रव्य-पर्याय का जो कि सकल अविद्याओं का एक जड़ है उसका आश्रय करते हुए
और जो ७असंकीर्ण द्रव्य-गुण-पर्यायों से सुस्थित भगवान आत्मा के स्वभाव का जो कि सकल विद्याओं का एक मूल है उसका आश्रय करके
इसलिये स्वसमय ही आत्मा का तत्त्व है ॥१०४॥ १यथोक्त = पूर्व गाथा में कहा जैसा । २संभावना = संचेतन; अनुभव; मान्यता; आदर । ३निरर्गल = अंकुश बिना की; बेहद (जो मनुष्यादि पर्याय में लीन हैं, वे बेहद एकांत-दृष्टि-रूप हैं) । ४आत्मव्यवहार = आत्मारूप वर्तन, आत्मारूप कार्य, आत्मारूप व्यापार । ५मनुष्यव्यवहार = मनुष्यरूप वर्तन (मैं मनुष्य ही हूँ - ऐसी मान्यता-पूर्वक वर्तन) । ६जो जीव पर के साथ एकत्व की मान्यता-पूर्वक युक्त होता है, उसे परसमय कहते हैं । ७असंकीर्ण = एकमेक नहीं ऐसे; स्पष्टतया भिन्न (भगवान आत्म-स्वभाव स्पष्ट भिन्न -- पर के साथ एकमेक नहीं -- ऐसे द्रव्य-गुण-पर्यायों से सुस्थित है) । ८परिग्रह = स्वीकार; अंगीकार । ९संचारित = ले जाये गये । (जैसे भिन्न-भिन्न कमरों में ले जाया गया रत्न-दीपक एकरूप ही है, वह किंचितमात्र भी कमरे के रूप में नहीं होता, और न कमरे की क्रिया करता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न शरीरों में प्रविष्ट होने वाला आत्मा एकरूप ही है, वह किंचितमात्र भी शरीर रूप नहीं होता और न शरीर की क्रिया करता है - इसप्रकार ज्ञानी जानता है ।) १०जो जीव स्व के साथ एकत्व की मान्यता-पूर्वक (स्वके साथ) युक्त होता है उसे स्व-समय कहा जाता है । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ प्रसंगायातां परसमयस्वसमयव्यवस्थां कथयति -- जे पज्जएसु णिरदा जीवा ये पर्यायेषु निरताः जीवाः परसमइग त्ति णिद्दिट्ठा ते परसमया इति निर्दिष्टाः कथिताः । तथाहितथाहि —मनुष्यादिपर्यायरूपोऽहमित्यहङ्कारो भण्यते, मनुष्यादिशरीरं तच्छरीराधारोत्पन्नपञ्चेन्द्रियविषयसुखस्वरूपं च ममेति ममकारो भण्यते, ताभ्यां परिणताः ममक ाराहङ्काररहितपरमचैतन्यचमत्कारपरिणतेश्च्युता ये ते कर्मोदयजनितपरपर्यायनिरतत्वात्परसमया मिथ्यादृष्टयो भण्यन्ते । आदसहावम्हि ठिदा ये पुनरात्मस्वरूपेस्थितास्ते सगसमया मुणेदव्वा स्वसमया मन्तव्या ज्ञातव्या इति । तद्यथातद्यथा -- अनेकापवरक संचारितैक -रत्नप्रदीप इवानेक शरीरेष्वप्येकोऽहमिति दृढसंस्कारेण निजशुद्धात्मनि स्थिता ये ते कर्मोदयजनित- पर्यायपरिणतिरहितत्वात्स्वसमया भवन्तीत्यर्थः ॥१०४॥ [जे पज्जयेसु णिरदा जीवा] जो पर्यायों में लीन-आसक्त जीव हैं, [परसमयिग त्ति णिद्दिट्ठा] वे परसमय है- ऐसा कहा गया है । वह इसप्रकार -- मनुष्यादि पर्यायरूप मैं हूँ - ऐसी परिणति को अहंकार कहते हैं । मनुष्यादि शरीर, उस शरीर के आधार से उत्पन्न पाँच इन्द्रियाँ, उनके विषय तथा तज्जन्य सुख -ये मेरे है- ऐसी परिणति ममकार हैं, ममकार- अहंकार रहित परम चैतन्य चमत्कार परिणति से रहित जो जीव उन दोनों रूप परिणत हैं वे जीव कर्म के उदय में उत्पन्न पर-पर्याय में लीन - आसक्त होने से परसमय- मिथ्यादृष्टि कहे गये हैं । [आदसहावम्मिठिदा] और जो आत्म- स्वरूप में स्थित है- लीन हैं [ते सगसमया मुणेदव्वा] वे स्वसमय हैं, ऐसा मानना-जानना चाहिये । वह इसप्रकार-जो अनेक कमरों में ले जाये गये एक रत्नदीप के समान अनेक शरीरों में भी 'मैं एक हूँ' इसप्रकार के दृढ़ संस्कार से निज शुद्धात्मा में स्थित रहते हैं -लीन रहते हैं वे कर्म के उदय से उत्पन्न पर्यायरूप परिणमन से रहित होने के कारण स्वसमय हैं- यह अर्थ है ॥१०४॥ |