+ अब, उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य का परस्पर अविनाभाव दृढ़ करते हैं -
ण भवो भंगविहीणो भंगो वा णत्थि संभवविहीणो । (100)
उप्पादो वि य भंगो ण विणा धोव्वेण अत्थेण ॥110॥
न भवो भङ्गविहीनो भङ्गो वा नास्ति संभवविहीनः ।
उत्पादोऽपि च भङ्गो न विना ध्रौव्येणार्थेन ॥१००॥
भंगबिन उत्पाद ना उत्पाद बिन ना भंग हो
उत्पादव्यय हो नहीं सकते एक ध्रौव्यपदार्थ बिन ॥११०॥
अन्वयार्थ : उत्पाद व्यय रहित नही होता, व्यय उत्पाद रहित नही होता है तथा उत्पाद और व्यय धौव्य रूप पदार्थ के बिना नहीं होते हैं ।
Meaning : There is no origination (utpāda) without destruction (vyaya); similarly, there is no destruction (vyaya) without origination (utpāda). Origination (utpāda) and destruction (vyaya) do not take place without the object (artha) that has permanence (dhrauvya) of existence.

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथोत्पादव्ययध्रौव्याणां परस्पराविनाभावं दृढ़यति -

न खलु सर्ग: संहारमन्तरेण, न संहारो वा सर्गमन्तरेण, न सृष्टिसंहारौ स्थितिमन्तरेण, न स्थिति:, सर्गसंहारमन्तरेण । य एव हि सर्ग: स एव संहार:, य एव संहार: स एव सर्ग:; यावेव सर्गसंहारौ सैव स्थिति:, यैव स्थितिस्तावेव सर्गसंहाराविति । तथाहि - य एव कुम्भस्य सर्ग:, स एव मृत्पिण्डस्य संहार:; भावस्य भावान्तराभावस्व-भावेनावभासनात्‌ । य एव च मृत्पिण्डस्य संहार:, सएव कुम्भस्य सर्ग:, अभावस्य भावान्तर-भावस्वभावेनावभासनात्‌ ।
यौ च कुम्भपिण्डयो: सर्गसंहारौ सैवमृत्तिकाया: स्थिति:, व्यतिरेकमुखेनैवान्वयस्य प्रकाशनात्‌ । यैव च मृत्तिकाया: स्थितिस्तावेव कुम्भपिण्डयो: सर्गसंहारौ, व्यतिरेकाणा-मन्वयानतिक्रमणात्‌ ।
यदि पुनर्नेदमेवमिष्येत तदान्य: सर्गोऽन्य: संहार: अन्या स्थितिरित्यायति । तथा सतिहि केवलं सर्गं मृगयमाणस्य कुम्भस्योत्पादन कारणाभावादभवनिरेव भवेत्‌, असदुत्पाद एव वा । तत्र कुम्भस्याभवनौ सर्वेषामेव भावानामभवनिरेव भवेत्‌ । असदुत्पादे वा व्योमप्रसवा-दीनामप्युत्पाद: स्यात्‌ ।
तथा केवलं संहारमारभमाणस्य मृत्पिण्डस्य संहारकारणाभावादसंहरणिरेव भवेत्‌, सदुच्छेद एव वा । तत्र मृत्पिण्डस्यासंहरणौ सर्वेषामेव भावानामसंहरणिरेव भवेत्‌ । सदुच्छेदे वा संविदादीनामप्युच्छेद: स्यात्‌ ।
तथा केवलां स्थितिमुपगच्छन्त्या मृत्तिकाया व्यतिरेकाक्रान्तस्थित्यन्वयाभावादस्थानिरेव भवेत्‌, क्षणिकनित्यत्वमेव वा । तत्र मृत्तिकाया अस्थानौ सर्वेषामेव भावानामस्थानिरेव भवेत्‌ । क्षणिकनित्यत्वे वा चित्तक्षणानामपि नित्यत्वं स्यात्‌ । तत उत्तरोत्तरव्यतिरेकाणां सर्गेण पूर्वपूर्वव्यतिरेकाणां संहारेणान्वयस्यावस्थानेनाविनाभूतमुद्योतमाननिर्विघ्नत्रैलक्षण्यलाञ्छनं द्रव्यमवश्यमनुमन्तव्यम्‌ ॥१००॥


वास्तव में
  • सर्ग संहार के बिना नहीं होता और संहार सर्ग के बिना नहीं होता;
  • सृष्टि और संहार स्थिति (ध्रौव्य) के बिना नहीं होते, स्थिति सर्ग और संहार के बिना नहीं होती ।
  • जो सर्ग है वही संहार है, जो संहार है वही सर्ग है;
  • जो सर्ग और संहार है वही स्थिति है; जो स्थिति है वही सर्ग और संहार है ।
वह इस प्रकार --
  • जो कुम्भ का सर्ग है वही मृत्ति‍का-पिण्ड का संहार है; क्योंकि भाव का भावान्तर के अभाव स्वभाव से अवभासन है । (अर्थात् भाव अन्यभाव के अभावरूप स्वभाव से प्रकाशित है—दिखाई देता है ।) और
  • जो मृत्तिकापिण्ड का संहार है वही कुम्भ का सर्ग है, क्योंकि अभाव का भावान्तर के भावस्वभाव से अवभासन है; (अर्थात् नाश अन्यभाव के उत्पादरूप स्वभाव से प्रकाशित है ।) और
  • जो कुम्भ का सर्ग और पिण्ड का व्‍यय है वही मृत्तिका की स्थिति है, क्योंकि व्यतिरेक अन्वय का अतिक्रमण नहीं करते, और
  • जो मृत्तिका की स्थिति है वही कुम्भ का सर्ग और पिण्ड का व्‍यय है, क्योंकि व्यतिरेकों के द्वारा अन्वय प्रकाशित होता है ।
और यदि ऐसा ही न माना जाये तो ऐसा सिद्ध होगा कि उत्‍पाद अन्य है, व्‍यय अन्य है, ध्रौव्‍य अन्य है । (अर्थात् तीनों पृथक् हैं ऐसा मानने का प्रसंग आ जायेगा ।) ऐसा होने पर (क्या दोष आता है, सो समझाते हैं) :-
  • केवल सर्ग-शोधक कुम्भ की (व्यय और ध्रौव्य से भिन्न मात्र उत्पाद करने को जाने वाले कुम्भ की) उत्पादन कारण का अभाव होने से उत्पत्ति ही नहीं होगी; अथवा तो असत् का ही उत्पाद होगा । और वहाँ,
    • यदि कुम्भ की उत्पत्ति न होगी तो समस्त ही भावों की उत्पत्ति ही नहीं होगी । (अर्थात् जैसे कुम्भ की उत्पत्ति नहीं होगी उसी प्रकार विश्व के किसी भी द्रव्य में किसी भी भाव का उत्पाद ही नहीं होगा,—यह दोष आयेगा); अथवा
    • यदि असत् का उत्पाद हो तो व्योम-पुष्प इत्यादि का भी उत्पाद होगा, (अर्थात् शून्य में से भी पदार्थ उत्पन्न होने लगेंगे,—यह दोष आयेगा ।)
  • और, केवल व्ययारम्भक (उत्पाद और ध्रौव्य से रहित केवल व्यय करने को उद्यत मृत्तपिण्ड) का व्‍यय के कारण का अभाव होने से व्‍यय ही नहीं होगा; अथवा तो सत् का ही उच्छेद होगा । वहाँ,
    • यदि मृत्तिकापिण्ड का व्यय न होगा तो समस्त ही भावों का व्‍यय ही न होगा, (अर्थात् जैसे मृत्तिकापिण्ड का व्‍यय नहीं होगा उसी प्रकार विश्व के किसी भी द्रव्य में किसी भाव का व्‍यय ही नहीं होगा,—यह दोष आयेगा); अथवा
    • यदि सत् का उच्छेद होगा तो चैतन्य इत्यादि का भी उच्छेद हो जायेगा, (अर्थात् समस्त द्रव्यों का सम्पूर्ण विनाश हो जायेगा;—यह दोष आयेगा ।)
  • और केवल ध्रौव्‍य प्राप्त करने को जाने वाली मृत्तिका की, व्यतिरेक सहित स्थिति का अन्वय का (मृत्तिका को) उससे अभाव होने से, स्थिति ही नहीं होगी; अथवा तो क्षणिक को ही नित्यत्व आ जायेगा । वहाँ
    • यदि मृत्तिका की ध्रौव्‍यत्‍व न हो तो समस्त ही भावों का ध्रौव्‍य नहीं होगा, (अर्थात् यदि मिट्टी ध्रुव न रहे तो मिट्टी की ही भाँति विश्व का कोई भी द्रव्य ध्रुव नहीं रहेगा, यह दोष आयेगा।) अथवा
    • यदि क्षणिक का नित्यत्व हो तो चित्त के क्षणिक-भावों का भी नित्यत्व होगा; (अर्थात् मन का प्रत्येक विकल्प भी त्रैकालिक ध्रुव हो जाये,—यह दोष आवे।)
इसलिये द्रव्य को उत्तर-उत्तर व्यतिरेकों के सर्ग के साथ, पूर्व-पूर्व के व्यतिरेकों के संहार के साथ और अन्वय के अवस्थान (ध्रौव्य) के साथ अविनाभाव वाला, जिसको निर्विघ्न (अबाधित) त्रिलक्षणतारूप चिह्न प्रकाशमान है, ऐसा अवश्य सम्मत करना ॥१००॥

सर्ग = उत्पाद, उत्पत्ति ।
संहार = व्यय, नाश ।
सृष्टि = उत्पत्ति ।
स्थिति = स्थित रहना; ध्रुव रहना, ध्रौव्य ।
मृत्तिकापिण्ड = मिट्टीका पिण्ड ।
व्यतिरेक = भेद; एक-दूसरे रूप न होना वह; 'यह वह नहीं है' ऐसे ज्ञान का निमित्तभूत भिन्न-रूपत्व ।
अन्वय = एकरूपता; सादृश्यता; 'यह वही है' ऐसे ज्ञान का कारणभूत एक-रूपत्व ।
उत्पादनकारण = उत्पत्ति का कारण ।
व्योम-पुष्प = आकाश के फूल ।
१०केवल स्थिति = (उत्पाद और व्यय रहित) अकेला ध्रुवपना, केवल स्थितिपना; अकेला अवस्थान । अन्वय व्यतिरेकों सहित ही होता है, इसलिये ध्रौव्य उत्पाद-व्यय सहित ही होगा, अकेला नहीं हो सकता । जैसे उत्पाद (या व्यय) द्रव्य का अंश है - समग्र द्रव्य नहीं, इसप्रकार ध्रौव्य भी द्रव्य का अंश है; - समग्र द्रव्य नहीं ।
११उत्तर-उत्तर = बाद-बाद के ।
१२लांछन = चिह्न ।
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथोत्पादव्ययध्रौव्याणां परस्परसापेक्षत्वं दर्शयति --
ण भवो भंगविहीणो निर्दोषपरमात्मरुचिरूपसम्यक्त्वपर्यायस्य भव उत्पादः तद्विपरीतमिथ्यात्वपर्यायस्यभङ्गं विना न भवति । कस्मात् । उपादानकारणाभावात्, मृत्पिण्डभङ्गाभावे घटोत्पाद इव । द्वितीयं चकारणं मिथ्यात्वपर्यायभङ्गस्य सम्यक्त्वपर्यायरूपेण प्रतिभासनात् । तदपि कस्मात् । 'भावान्तर-स्वभावरूपो भवत्यभाव' इति वचनात् । घटोत्पादरूपेण मृत्पिण्डभङ्ग इव । यदि पुनर्मिथ्यात्वपर्याय-भङ्गस्य सम्यक्त्वोपादानकारणभूतस्याभावेऽपि शुद्धात्मानुभूतिरुचिरूपसम्यक्त्वस्योत्पादो भवति, तर्ह्युपादानकारणरहितानां खपुष्पादीनामप्युत्पादो भवतु । न च तथा । भंगो वा णत्थि संभवविहीणो परद्रव्योपादेयरुचिरूपमिथ्यात्वस्य भङ्गो नास्ति । कथंभूतः । पूर्वोक्तसम्यक्त्वपर्यायसंभवरहितः ।कस्मादिति चेत् । भङ्गकारणाभावात्, घटोत्पादाभावे मृत्पिण्डस्येव । द्वितीयं च कारणंसम्यक्त्वपर्यायोत्पादस्य मिथ्यात्वपर्यायाभावरूपेण दर्शनात् । तदपि कस्मात् । पर्यायस्यपर्यायान्तराभावरूपत्वात्, घटपर्यायस्य मृत्पिण्डाभावरूपेणेव । यदि पुनः सम्यक्त्वोत्पादनिरपेक्षो भवतिमिथ्यात्वपर्यायाभावस्तर्ह्यभाव एव न स्यात् । कस्मात् । अभावकारणाभावादिति, घटोत्पादाभावे मृत्पिण्डाभावस्य इव । उप्पादो वि य भंगो ण विणा दव्वेण अत्थेण परमात्मरुचिरूपसम्यक्त्व-स्योत्पादस्तद्विपरीतमिथ्यात्वस्य भङ्गो वा नास्ति । कं विना । तदुभयाधारभूतपरमात्मरूपद्रव्यपदार्थंविना । कस्मात् । द्रव्याभावे व्ययोत्पादाभावान्मृत्तिकाद्रव्याभावे घटोत्पादमृत्पिण्डभङ्गाभाववदिति मित्यर्थंः ॥११०॥


[ण भवो भंगविहीणो] निर्दोष परमात्मा की रुचिरूप सम्यक्त्व-पर्याय का उत्पाद, वह उससे विपरीत मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना नहीं होता । मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना सम्यक्त्व-पर्याय का उत्पाद क्यों नहीं होता? उपादानकारण का अभाव होने से जैसे मिट्टी के पिण्ड के विनाश बिना घड़े की उत्पत्ति नहीं होती उसीप्रकार मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना सम्यक्त्व-पर्याय की उत्पत्ति नहीं होती है । और दूसरा भी कारण है - मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश का सम्यक्त्व-पर्यायरूप से प्रतिभासन होने से उसके विनाश बिना सम्यक्त्व-पर्याय उत्पन्न नहीं होती है । उसके विनाश का सम्यक्त्व-पर्यायरूप से प्रतिभासन कैसे होता है? 'अभाव अन्य पदार्थ के स्वभावरूप होता है'- ऐसा वचन होने से जैसे मिट्टी के पिण्ड का अभाव घड़े की उत्पत्तिरूप से प्रतिभासित होता है; उसीप्रकार मिथ्यात्व-पर्याय का अभाव सम्यक्त्व-पर्याय की उत्पत्तिरूप से प्रतिभासित होता है ।

यदि सम्यक्त्व के उपादान-कारणभूत मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना ही शुद्धात्मा की अनुभूति-रुचि रूप सम्यक्त्व का उत्पाद होता है, तो उपादान-कारण से रहित आकाशफूल आदि का भी उत्पाद हो । परन्तु वैसा तो नहीं होता है । [भंगो वा णत्थि संभवविहीणो] परद्रव्य उपादेय है ऐसी रुचिरूप मिथ्यात्व का विनाश नही होता है । कैसे मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है? पहले कहे हुये सम्यक्त्व-पर्याय के उत्पाद से रहित मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है । सम्यक्त्व-पर्याय की उत्पत्ति के बिना मिथ्यात्व-पर्याय का विनाश क्यों नहीं होता है? विनाश के कारण का अभाव होने से, घड़े की उत्पत्ति के अभाव में मिट्टी के पिण्ड का विनाश नहीं होने के समान, सम्यक्त्व की उत्पत्ति के अभाव में मिथ्यात्व का विनाश नही होता है । और दूसरा भी कारण है - सम्यक्त्व पर्याय के उत्पाद का मिथ्यात्व-पर्याय के अभावरूप दर्शन होने के कारण, उसकी उत्पत्ति के बिना मिथ्यात्व-पर्याय नष्ट नहीं होती है । उसका उत्पाद मिथ्यात्व-पर्याय के विनाश बिना क्यों दिखाई नहीं देता है? एक पर्याय के अन्य पर्याय की अभावरूपता होने से जैसे घटपर्याय का दर्शन मिट्टी के पिण्ड के अभावरूप से होता है; उसीप्रकार सम्यक्त्व-पर्याय का दिखाई देना मिथ्यात्व-पर्याय के विनाशरूप से होता है ।

यदि सम्यक्त्व की उत्पत्ति के बिना ही मिथ्यात्वपर्याय का अभाव होता है, तो उसका अभाव ही नहीं होगा । सम्यक्त्व की उत्पत्ति बिना मिथ्यात्व का अभाव क्यों नहीं होगा? अभाव के कारण का अभाव होने से (विनाश का कारण उत्पाद है, उसके नहीं होने से) घड़े की उत्पत्ति के अभाव में मिट्टी के पिण्ड का विनाश नहीं होने के समान सम्यक्त्व की उत्पत्ति के अभाव में मिथ्यात्व का विनाश नही होगा ।

[उप्पादो वि य भंगो ण विणा दव्वेण अत्थेण] परमात्मा की रुचिरूप सम्यक्त्व का उत्पाद तथा उससे विपरीत मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है । उन दोनों का उत्पाद-विनाश किसके बिना नहीं होता है? उन दोनों के आधारभूत परमात्मारूप द्रव्य-पदार्थ के बिना उन दोनों का उत्पाद-विनाश नहीं होता है । दोनों के आधारभूत परमात्म-पदार्थ के बिना दोनों का उत्पाद-विनाश क्यों नहीं होता है? द्रव्य के अभाव में विनाश और उत्पत्ति का अभाव होने से मिट्टी द्रव्य के अभाव में घड़े की उत्पत्ति तथा मिट्टी के पिण्ड का विनाश नहीं होने के समान परमात्म-द्रव्य के अभाव में सम्यक्त्व की उत्पत्ति और मिथ्यात्व का विनाश नहीं होता है ।

इसप्रकार जैसे सम्यक्त्व और मिथ्यात्व - इन दो पर्यायों में एक दूसरे की अपेक्षा सहित उत्पाद आदि तीनों दिखाये हैं, उसीप्रकार सभी द्रव्यों की पर्यायों में देख लेना चाहिये- समझ लेना चाहिये ॥११०॥