+ अब, यह बतलाते हैं कि उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक होने पर भी द्रव्य सत् है -
सदवट्ठिदं सहावे दव्वं दव्वस्स जो हि परिणामो । (99)
अत्थेसु सो सहावो ठिदिसंभवणाससंबद्धो ॥109॥
सदवस्थितं स्वभावे द्रव्यं द्रव्यस्य यो हि परिणामः ।
अर्थेषु स स्वभावः स्थितिसंभवनाशसंबद्धः ॥९९॥
स्वभाव में थित द्रव्य सत् सत् द्रव्य का परिणाम जो
उत्पादव्ययध्रुवसहित है वह ही पदार्थस्वभाव है ॥१०९॥
अन्वयार्थ : स्व भाव में स्थित द्रव्य सत् है, वास्तव में द्रव्य का जो उत्पाद-व्यय-धौव्य सहित परिणाम है-वह पदार्थों का स्वभाव है ।
Meaning : That which stays in its nature of existence (sat) is the substance (dravya). In reality, the transformation of the substance (dravya) in form of origination (utpāda), destruction (vyaya) and permanence (dhrauvya) is the nature of the objects (artha).

  अमृतचंद्राचार्य    जयसेनाचार्य 

अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकत्वेऽपि सद्‌द्रव्यं भवतीति विभावयति -

इह हि स्वभावे नित्यमवतिष्ठमानत्वात्सदिति द्रव्यम्‌ । स्वभावस्तु द्रव्यस्य ध्रौव्योत्पादो-च्छेदैक्यात्मकपरिणाम: ।
यथैव हि द्रव्यवास्तुन: सामस्त्येनैकस्यापि विष्कम्भक्रमप्रवृत्तिवर्तिन: सूक्ष्मांशा: प्रदेशा:, तथैव हि द्रव्यवृत्ते: सामस्त्येनैकस्यापि प्रवाहक्रमप्रवृत्तिवर्त्तिन: सूक्ष्मांशा: परिणामा: ।
यथा च प्रदेशानां परस्परव्यतिरेकनिबन्धनो विष्कम्भक्रम:, तथा परिणामानां परस्पर-व्यतिरेकनिबन्धन: प्रवाहक्रम: ।
यथैव च ते प्रदेशा: स्वस्थाने स्वरूपपूर्वरूपाभ्यामुत्पन्नोच्छन्नवात्सर्वत्र परस्परानुस्यूति- सूत्रितैकवास्तुतयानुत्पन्नप्रलीनत्वाच्चसंभूतिसंहारध्रौव्यात्मकमात्मान धारयन्ति; तथैव ते परिणामा: स्वावसरे स्वरूपपूर्वरूपाभ्यामुत्पन्नोच्छन्नत्वात्सर्वत्र परस्परानुस्यूतिसूत्रितैकप्रवाह-तयानुत्पन्नप्रलीनत्वाच्च संभूतिसंहारध्रौव्यात्मकमात्मानं धारयन्ति ।
यथैव च य एव हि पूर्वप्रदेशोच्छेदनात्मको वास्तुसीमान्त:, स एव हि तदुत्तरोत्पादात्मक:, स एव च परस्परानुस्यूतिसूत्रितैकवास्तुतयातदुभयात्मक इति; तथैव य एव हि पूर्व-परिणामोच्छेदात्मक: प्रवाहसीमान्त:, स एव हि तदुत्तरोत्पादात्मक:, स एव च परस्परा-नुस्यूतिसूत्रितैकप्रवाहतयातदुभयात्मक इति एवमस्य स्वभावत एव त्रिलक्षणायां परिणामपद्धतौ दुर्ललितस्य स्वभावानतिक्रमात्त्रिलक्षणमेव सत्त्वमनुमोदनीयम्‌, मुक्ताफलदामवत्‌ ।
यथैव हि परिगृहीतद्राघाम्न्नि प्रलम्बमाने मुक्ताफलदामनि समस्तेष्वपि स्वधामसूच्चका- सत्सु मुक्ताफलेषूत्तरोत्तरेषु धामसूत्तरोत्तरमुक्ताफलानामुदयनात्पूर्वमुक्ताफलानामनुदयनात्‌ सर्व-त्रापि परस्परानुस्यूतिसूत्रकस्य सूत्रकस्यावस्थानात्त्रैलक्षण्यं प्रसिद्धिमवतरति; तथैव हि परि- गृहीतनित्यवृत्तिनिवर्तमाने द्रव्ये समस्तेष्वपि स्वावसरेषूच्चकासत्सु परिणामेषूत्तरोत्तरेष्ववसरेषू- त्तरोत्तरपरिणामानामुदयनात्पूर्वपूर्वपरिणामानामनुदयनात्‌ सर्वत्रापि परस्परानुस्यूतिसूत्रकस्य प्रवाहस्यावस्थानात्त्रैलक्षण्यं प्रसिद्धिमवतरति ॥९९॥



यहाँ (विश्व में) स्वभाव में नित्य अवस्थित होने से द्रव्य 'सत्' है । स्वभाव द्रव्य का ध्रौव्य-उत्पाद-विनाश की एकतास्वरूप परिणाम है ।
  • जैसे द्रव्य का वास्तु समग्रपने द्वारा (अखण्डता से) एक होने पर भी, विस्तार-क्रम में प्रवर्तमान उसके जो सूक्ष्म-अंश हैं वे प्रदेश हैं,
  • इसी प्रकार द्रव्य की वृत्ति समग्रपने द्वारा एक होने पर भी, प्रवाह-क्रम में प्रवर्तमान उसके जो सूक्ष्म-अंश हैं वे परिणाम है ।
जैसे विस्तार-क्रम का कारण प्रदेशों का परस्पर व्यतिरेक है, उसी प्रकार प्रवाह-क्रम का कारण परिणामों का परस्पर व्यतिरेक है ।
  • जैसे वे प्रदेश अपने स्थान में स्व-रूप से उत्‍पन्‍न और पूर्व-रूप से विनष्ट होने से तथा सर्वत्र परस्पर अनुस्यूति से रचित एक-वास्तुपने द्वारा अनुत्पन्‍न-अविनष्ट होने से उत्पत्ति-संहार-ध्रौव्यात्मक हैं,
  • उसी प्रकार वे परिणाम अपने अवसर में स्वरूप से उत्‍पन्‍न और पूर्वरूप से विनष्ट होने से तथा सर्वत्र परस्पर अनुस्यूति से रचित एक प्रवाहपने द्वारा अनुत्पन्न-अविनष्ट होने से उत्पत्ति-संहार-ध्रौव्यात्मक हैं ।
और
  • जैसे वास्तु का जो छोटे से छोटा अंश पूर्वप्रदेश के विनाश स्वरूप है वही (अंश) उसके बाद के प्रदेश का उत्पाद स्वरूप है तथा वही परस्पर अनुस्यूति से रचित एक वास्तुपने द्वारा अनुभय स्वरूप है (अर्थात् दो में से एक भी स्वरूप नहीं है),
  • इसी प्रकार प्रवाह का जो छोटे से छोटा अंश पूर्व परिणाम के विनाश स्वरूप है वही उसके बाद के परिणाम के उत्पाद स्वरूप है, तथा वही परस्पर अनुस्यूति से रचित एकप्रवाहपने द्वारा अनुभयस्वरूप है ।
इस प्रकार स्वभाव से ही त्रिलक्षण परिणाम पद्धति में ( परिणामों की परम्परा में) प्रवर्तमान द्रव्य स्वभाव का अतिक्रम नहीं करता इसलिये सत्त्व को त्रिलक्षण ही अनुमोदना चाहिये । मोतियों के हार की भाँति ।

जैसे — जिसने (अमुक) लम्बाई ग्रहण की है ऐसे लटकते हुये मोतियों के हार में, अपने-अपने स्थानों में प्रकाशित होते हुये समस्त मोतियों में, पीछे-पीछे के स्थानों में पीछे-पीछे के मोती प्रगट होते हैं इसलिये, और पहले-पहले के मोती प्रगट नहीं होते इसलिये, तथा सर्वत्र परस्पर अनुस्यूति का रचयिता सूत्र अवस्थित होने से त्रिलक्षणत्व प्रसिद्धि को प्राप्त होता है । इसी प्रकार जिसने नित्यवृत्ति ग्रहण की है ऐसे रचित (परिणमित) द्रव्य में अपने अपने अवसरों में प्रकाशित (प्रगट) होते हुये समस्त परिणामों में पीछे-पीछे के अवसरों पर पीछे पीछे के परिणाम प्रगट होते हैं इसलिये, और पहले-पहले के परिणाम नहीं प्रगट होते हैं इसलिये, तथा सर्वत्र परस्पर अनुस्यूति रचने वाला प्रवाह अवस्थित होने से त्रिलक्षणपना प्रसिद्धि को प्राप्त होता है ॥९९॥

द्रव्य का वास्तु = द्रव्य का स्व-विस्तार, द्रव्य का स्व-क्षेत्र, द्रव्य का स्व-आकार, द्रव्य का स्व-दल । (वास्तु = घर, निवास-स्थान, आश्रय, भूमि)
वृत्ति = वर्तना वह; होना वह; अस्तित्व ।
व्यतिरेक = भेद; (एक का दूसरे में) अभाव, (एक परिणाम दूसरे परिणाम-रूप नहीं है, इसलिये द्रव्य के प्रवाह में क्रम है)
अनुस्यूति = अन्वय-पूर्वक जुडान । (सर्व परिणाम परस्पर अन्वय-पूर्वक (सादृश्य सहित) गुंथित (जुड़े) होने से, वे सब परिणाम एक प्रवाह-रूप से हैं, इसलिये वे उत्पन्न या विनष्ट नहीं हैं ।
अतिक्रम = उल्लंघन; त्याग ।
सत्त्व = सत्पना; (अभेद-नय से) द्रव्य ।
त्रिलक्षण = उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ये तीनों लक्षणवाला; त्रिस्वरूप; त्रयात्मक ।
अनुमोदना = आनंद में सम्मत करना ।
नित्यवृत्ति = नित्यस्थायित्व; नित्य अस्तित्व; सदा वर्तना ।
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथोत्पादव्ययध्रौव्यत्वे सति सत्तैव द्रव्यं भवतीति प्रज्ञापयति --
सदवट्ठिदं सहावे दव्वं द्रव्यं मुक्तात्मद्रव्यं भवति । किं कर्तृ । सदिति शुद्धचेतनान्वयरूपमस्तित्वम् । किंविशिष्टम् । अवस्थितम् । क्व । स्वभावे । स्वभावं कथयति -- दव्वस्स जो हि परिणामो तस्य परमात्मद्रव्यस्य संबन्धी हि स्फुटं यः परिणामः । केषु विषयेषु । अत्थेसु परमात्मपदार्थस्य धर्मत्वादभेदनयेनार्था भण्यन्ते । के ते । केवलज्ञानादिगुणाः सिद्धत्वादिपर्यायाश्च,तेष्वर्थेषु विषयेषु योऽसौ परिणामः । सो सहावो केवलज्ञानादिगुणसिद्धत्वादिपर्यायरूपस्तस्यपरमात्मद्रव्यस्य स्वभावो भवति । स च कथंभूतः । ठिदिसंभवणाससंबद्धो स्वात्मप्राप्तिरूपमोक्षपर्यायस्यसंभवस्तस्मिन्नेव क्षणे परमागमभाषयैकत्ववितर्कावीचारद्वितीयशुक्लध्यानसंज्ञस्य शुद्धोपादानभूतस्य समस्तरागादिविकल्पोपाधिरहितस्वसंवेदनज्ञानपर्यायस्य नाशस्तस्मिन्नेव समये तदुभयाधारभूतपरमात्म-द्रव्यस्य स्थितिरित्युक्तलक्षणोत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेण संबन्धो भवतीति । एवमुत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेणैकसमये यद्यपि पर्यायार्थिकनयेन परमात्मद्रव्यं परिणतं, तथापि द्रव्यार्थिकनयेन सत्तालक्षणमेव भवति ।त्रिलक्षणमपि सत्सत्तालक्षणं कथं भण्यत इति चेत् 'उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत्' इति वचनात् । यथेदंपरमात्मद्रव्यमेकसमयेनोत्पादव्ययध्रौव्यैः परिणतमेव सत्तालक्षणं भण्यते तता सर्वद्रव्याणीत्यर्थः ॥१०९॥
एवं स्वरूपसत्तारूपेण प्रथमगाथा, महासत्तारूपेण द्वितीया, यथा द्रव्यं स्वतःसिद्धं तथा सत्तागुणोऽपीति कथनेन तृतीया, उत्पादव्ययध्रौव्यत्वेऽपि सत्तैव द्रव्यं भण्यत इति कथनेन चतुर्थीति गाथाचतुष्टयेन सत्तालक्षणविवरणमुख्यतया द्वितीयस्थलं गतम् ।


[सदवटि्ठदं सहावे दव्वं] द्रव्य-मुक्तात्मा द्रव्य है । वह द्रव्य क्या है? इस वाक्य में कर्ता क्या है? 'सत्' - ऐसा शुद्ध-चेतना का अन्वय (वही-वही) रूप अस्तित्व द्रव्य है । वह अस्तित्व किस विशेषता वाला है? वह अच्छी तरह से स्थित है । अच्छी तरह से कहाँ स्थित है? वह स्वभाव में अच्छी तरह स्थित है । (उस) स्वभाव (को) कहते है- [दव्वस्स जो हि परिणामो] उस परमात्म-द्रव्य सम्बन्धी स्पष्ट जो परिणाम है । किन विषयों में वह परिणाम है? [अत्थेसु] परमात्म-पदार्थ का धर्म-स्वभाव होने से अभेदनय से उन्हें अर्थ कहते हैं । वे अर्थ कौन है? केवलज्ञानादि गुण और सिद्धत्वादि पर्यायें अर्थ हैं । उन अर्थों-विषयों में जो वह परिणाम है । [सो सहावो] केवलज्ञानादि गुण और सिद्धत्वादि पर्यायरूप परिणमन उन परमात्म-द्रव्य का स्वभाव है । और वह स्वभाव कैसा है? [ठिदिसंभवणाससंबद्धो] निजात्मा की प्राप्तिरूप मोक्ष-पर्याय की उत्पत्ति, उसी समय परमागम की भाषा से एकत्ववितर्क-अवीचार रूप द्वितीय शुक्लध्यान नामक शुद्ध उपादानभूत समस्त रागादि विकल्पों की उपाधि (संयोग) रहित स्वसंवेदन-ज्ञान-पर्याय का नाश और उसी समय उन दोनों के आधारभूत परमात्म-द्रव्य की स्थिति-ध्रुवता -- इसप्रकार कहे गये लक्षणवाले उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य -- इन तीनों से सहित वह स्वभाव है ।

इस प्रकार यद्यपि पर्यायार्थिक-नय से एक समय में उत्पाद-व्यय-धौव्य -- इन तीनरूप परमात्मद्रव्य परिणत है, तथापि द्रव्यार्थिकनय से सत्ता लक्षण ही है । तीन लक्षण वाला होने पर भी सत् का सत्ता लक्षण कैसे कहा जाता है? यदि यह प्रश्न हो तो उत्तर देते हैं - 'सत् उत्पाद-व्यय और धौव्य सहित है' - ऐसा वचन होने से सत्ता लक्षण वाला कहा जाता है ।

जैसे यह परमात्म-द्रव्य, एक समय में उत्पाद-व्यय-धौव्य रूप से परिणमता हुआ ही सत्ता लक्षण वाला कहा गया है, उसीप्रकार सभी द्रव्य, एक ही समय में उत्पादादि रूप से परिणमित होते हुये सत्ता लक्षणवाले है - यह अर्थ है ॥१०९॥

इसप्रकार
  • स्वरूप-सत्तारूप से पहली गाथा,
  • महा-सत्तारूप से दूसरी गाथा,
  • जैसे द्रव्य स्वत-सिद्ध है वैसे सत्तागुण भी, इस कथनरूप तीसरी गाथा और
  • उत्पाद-व्यय-धौव्य सहित होने पर भी सत्ता ही द्रव्य कही गयी है - इस कथनरूप चौथी गाथा--
इसप्रकार चार गाथाओं द्वारा सत्तालक्षण विवरण की मुख्यता से दूसरा स्थल पूर्ण हुआ ।