
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकत्वेऽपि सद्द्रव्यं भवतीति विभावयति - इह हि स्वभावे नित्यमवतिष्ठमानत्वात्सदिति द्रव्यम् । स्वभावस्तु द्रव्यस्य ध्रौव्योत्पादो-च्छेदैक्यात्मकपरिणाम: । यथैव हि द्रव्यवास्तुन: सामस्त्येनैकस्यापि विष्कम्भक्रमप्रवृत्तिवर्तिन: सूक्ष्मांशा: प्रदेशा:, तथैव हि द्रव्यवृत्ते: सामस्त्येनैकस्यापि प्रवाहक्रमप्रवृत्तिवर्त्तिन: सूक्ष्मांशा: परिणामा: । यथा च प्रदेशानां परस्परव्यतिरेकनिबन्धनो विष्कम्भक्रम:, तथा परिणामानां परस्पर-व्यतिरेकनिबन्धन: प्रवाहक्रम: । यथैव च ते प्रदेशा: स्वस्थाने स्वरूपपूर्वरूपाभ्यामुत्पन्नोच्छन्नवात्सर्वत्र परस्परानुस्यूति- सूत्रितैकवास्तुतयानुत्पन्नप्रलीनत्वाच्चसंभूतिसंहारध्रौव्यात्मकमात्मान धारयन्ति; तथैव ते परिणामा: स्वावसरे स्वरूपपूर्वरूपाभ्यामुत्पन्नोच्छन्नत्वात्सर्वत्र परस्परानुस्यूतिसूत्रितैकप्रवाह-तयानुत्पन्नप्रलीनत्वाच्च संभूतिसंहारध्रौव्यात्मकमात्मानं धारयन्ति । यथैव च य एव हि पूर्वप्रदेशोच्छेदनात्मको वास्तुसीमान्त:, स एव हि तदुत्तरोत्पादात्मक:, स एव च परस्परानुस्यूतिसूत्रितैकवास्तुतयातदुभयात्मक इति; तथैव य एव हि पूर्व-परिणामोच्छेदात्मक: प्रवाहसीमान्त:, स एव हि तदुत्तरोत्पादात्मक:, स एव च परस्परा-नुस्यूतिसूत्रितैकप्रवाहतयातदुभयात्मक इति एवमस्य स्वभावत एव त्रिलक्षणायां परिणामपद्धतौ दुर्ललितस्य स्वभावानतिक्रमात्त्रिलक्षणमेव सत्त्वमनुमोदनीयम्, मुक्ताफलदामवत् । यथैव हि परिगृहीतद्राघाम्न्नि प्रलम्बमाने मुक्ताफलदामनि समस्तेष्वपि स्वधामसूच्चका- सत्सु मुक्ताफलेषूत्तरोत्तरेषु धामसूत्तरोत्तरमुक्ताफलानामुदयनात्पूर्वमुक्ताफलानामनुदयनात् सर्व-त्रापि परस्परानुस्यूतिसूत्रकस्य सूत्रकस्यावस्थानात्त्रैलक्षण्यं प्रसिद्धिमवतरति; तथैव हि परि- गृहीतनित्यवृत्तिनिवर्तमाने द्रव्ये समस्तेष्वपि स्वावसरेषूच्चकासत्सु परिणामेषूत्तरोत्तरेष्ववसरेषू- त्तरोत्तरपरिणामानामुदयनात्पूर्वपूर्वपरिणामानामनुदयनात् सर्वत्रापि परस्परानुस्यूतिसूत्रकस्य प्रवाहस्यावस्थानात्त्रैलक्षण्यं प्रसिद्धिमवतरति ॥९९॥ यहाँ (विश्व में) स्वभाव में नित्य अवस्थित होने से द्रव्य 'सत्' है । स्वभाव द्रव्य का ध्रौव्य-उत्पाद-विनाश की एकतास्वरूप परिणाम है ।
जैसे — जिसने (अमुक) लम्बाई ग्रहण की है ऐसे लटकते हुये मोतियों के हार में, अपने-अपने स्थानों में प्रकाशित होते हुये समस्त मोतियों में, पीछे-पीछे के स्थानों में पीछे-पीछे के मोती प्रगट होते हैं इसलिये, और पहले-पहले के मोती प्रगट नहीं होते इसलिये, तथा सर्वत्र परस्पर अनुस्यूति का रचयिता सूत्र अवस्थित होने से त्रिलक्षणत्व प्रसिद्धि को प्राप्त होता है । इसी प्रकार जिसने ९नित्यवृत्ति ग्रहण की है ऐसे रचित (परिणमित) द्रव्य में अपने अपने अवसरों में प्रकाशित (प्रगट) होते हुये समस्त परिणामों में पीछे-पीछे के अवसरों पर पीछे पीछे के परिणाम प्रगट होते हैं इसलिये, और पहले-पहले के परिणाम नहीं प्रगट होते हैं इसलिये, तथा सर्वत्र परस्पर अनुस्यूति रचने वाला प्रवाह अवस्थित होने से त्रिलक्षणपना प्रसिद्धि को प्राप्त होता है ॥९९॥ १द्रव्य का वास्तु = द्रव्य का स्व-विस्तार, द्रव्य का स्व-क्षेत्र, द्रव्य का स्व-आकार, द्रव्य का स्व-दल । (वास्तु = घर, निवास-स्थान, आश्रय, भूमि) । २वृत्ति = वर्तना वह; होना वह; अस्तित्व । ३व्यतिरेक = भेद; (एक का दूसरे में) अभाव, (एक परिणाम दूसरे परिणाम-रूप नहीं है, इसलिये द्रव्य के प्रवाह में क्रम है) । ४अनुस्यूति = अन्वय-पूर्वक जुडान । (सर्व परिणाम परस्पर अन्वय-पूर्वक (सादृश्य सहित) गुंथित (जुड़े) होने से, वे सब परिणाम एक प्रवाह-रूप से हैं, इसलिये वे उत्पन्न या विनष्ट नहीं हैं । ५अतिक्रम = उल्लंघन; त्याग । ६सत्त्व = सत्पना; (अभेद-नय से) द्रव्य । ७त्रिलक्षण = उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ये तीनों लक्षणवाला; त्रिस्वरूप; त्रयात्मक । ८अनुमोदना = आनंद में सम्मत करना । ९नित्यवृत्ति = नित्यस्थायित्व; नित्य अस्तित्व; सदा वर्तना । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथोत्पादव्ययध्रौव्यत्वे सति सत्तैव द्रव्यं भवतीति प्रज्ञापयति -- सदवट्ठिदं सहावे दव्वं द्रव्यं मुक्तात्मद्रव्यं भवति । किं कर्तृ । सदिति शुद्धचेतनान्वयरूपमस्तित्वम् । किंविशिष्टम् । अवस्थितम् । क्व । स्वभावे । स्वभावं कथयति -- दव्वस्स जो हि परिणामो तस्य परमात्मद्रव्यस्य संबन्धी हि स्फुटं यः परिणामः । केषु विषयेषु । अत्थेसु परमात्मपदार्थस्य धर्मत्वादभेदनयेनार्था भण्यन्ते । के ते । केवलज्ञानादिगुणाः सिद्धत्वादिपर्यायाश्च,तेष्वर्थेषु विषयेषु योऽसौ परिणामः । सो सहावो केवलज्ञानादिगुणसिद्धत्वादिपर्यायरूपस्तस्यपरमात्मद्रव्यस्य स्वभावो भवति । स च कथंभूतः । ठिदिसंभवणाससंबद्धो स्वात्मप्राप्तिरूपमोक्षपर्यायस्यसंभवस्तस्मिन्नेव क्षणे परमागमभाषयैकत्ववितर्कावीचारद्वितीयशुक्लध्यानसंज्ञस्य शुद्धोपादानभूतस्य समस्तरागादिविकल्पोपाधिरहितस्वसंवेदनज्ञानपर्यायस्य नाशस्तस्मिन्नेव समये तदुभयाधारभूतपरमात्म-द्रव्यस्य स्थितिरित्युक्तलक्षणोत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेण संबन्धो भवतीति । एवमुत्पादव्ययध्रौव्यत्रयेणैकसमये यद्यपि पर्यायार्थिकनयेन परमात्मद्रव्यं परिणतं, तथापि द्रव्यार्थिकनयेन सत्तालक्षणमेव भवति ।त्रिलक्षणमपि सत्सत्तालक्षणं कथं भण्यत इति चेत् 'उत्पादव्ययधौव्ययुक्तं सत्' इति वचनात् । यथेदंपरमात्मद्रव्यमेकसमयेनोत्पादव्ययध्रौव्यैः परिणतमेव सत्तालक्षणं भण्यते तता सर्वद्रव्याणीत्यर्थः ॥१०९॥ एवं स्वरूपसत्तारूपेण प्रथमगाथा, महासत्तारूपेण द्वितीया, यथा द्रव्यं स्वतःसिद्धं तथा सत्तागुणोऽपीति कथनेन तृतीया, उत्पादव्ययध्रौव्यत्वेऽपि सत्तैव द्रव्यं भण्यत इति कथनेन चतुर्थीति गाथाचतुष्टयेन सत्तालक्षणविवरणमुख्यतया द्वितीयस्थलं गतम् । [सदवटि्ठदं सहावे दव्वं] द्रव्य-मुक्तात्मा द्रव्य है । वह द्रव्य क्या है? इस वाक्य में कर्ता क्या है? 'सत्' - ऐसा शुद्ध-चेतना का अन्वय (वही-वही) रूप अस्तित्व द्रव्य है । वह अस्तित्व किस विशेषता वाला है? वह अच्छी तरह से स्थित है । अच्छी तरह से कहाँ स्थित है? वह स्वभाव में अच्छी तरह स्थित है । (उस) स्वभाव (को) कहते है- [दव्वस्स जो हि परिणामो] उस परमात्म-द्रव्य सम्बन्धी स्पष्ट जो परिणाम है । किन विषयों में वह परिणाम है? [अत्थेसु] परमात्म-पदार्थ का धर्म-स्वभाव होने से अभेदनय से उन्हें अर्थ कहते हैं । वे अर्थ कौन है? केवलज्ञानादि गुण और सिद्धत्वादि पर्यायें अर्थ हैं । उन अर्थों-विषयों में जो वह परिणाम है । [सो सहावो] केवलज्ञानादि गुण और सिद्धत्वादि पर्यायरूप परिणमन उन परमात्म-द्रव्य का स्वभाव है । और वह स्वभाव कैसा है? [ठिदिसंभवणाससंबद्धो] निजात्मा की प्राप्तिरूप मोक्ष-पर्याय की उत्पत्ति, उसी समय परमागम की भाषा से एकत्ववितर्क-अवीचार रूप द्वितीय शुक्लध्यान नामक शुद्ध उपादानभूत समस्त रागादि विकल्पों की उपाधि (संयोग) रहित स्वसंवेदन-ज्ञान-पर्याय का नाश और उसी समय उन दोनों के आधारभूत परमात्म-द्रव्य की स्थिति-ध्रुवता -- इसप्रकार कहे गये लक्षणवाले उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य -- इन तीनों से सहित वह स्वभाव है । इस प्रकार यद्यपि पर्यायार्थिक-नय से एक समय में उत्पाद-व्यय-धौव्य -- इन तीनरूप परमात्मद्रव्य परिणत है, तथापि द्रव्यार्थिकनय से सत्ता लक्षण ही है । तीन लक्षण वाला होने पर भी सत् का सत्ता लक्षण कैसे कहा जाता है? यदि यह प्रश्न हो तो उत्तर देते हैं - 'सत् उत्पाद-व्यय और धौव्य सहित है' - ऐसा वचन होने से सत्ता लक्षण वाला कहा जाता है । जैसे यह परमात्म-द्रव्य, एक समय में उत्पाद-व्यय-धौव्य रूप से परिणमता हुआ ही सत्ता लक्षण वाला कहा गया है, उसीप्रकार सभी द्रव्य, एक ही समय में उत्पादादि रूप से परिणमित होते हुये सत्ता लक्षणवाले है - यह अर्थ है ॥१०९॥ इसप्रकार
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