
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ सर्वथाऽभावलक्षणत्वमतद्भावस्य निषेधयति - एकस्मिन्द्रव्ये यद्द्रव्यं गुणो न तद्भवति, यो गुण: स द्रव्यं न भवतीत्येवं यद्द्रव्यस्य गुण-रूपेण गुणस्य वा द्रव्यरूपेण तेनाभवनं सोऽतद्भाव: । एतावतैवान्यत्वव्यवहारसिद्धेर्न पुर्नद्रव्य- स्याभावो गुणो गुणस्याभावो द्रव्यमित्येवंलक्षणोऽभावोऽतद्भाव, एवं सत्येकद्रव्यस्यानेक-त्वमुभयशून्यत्वमपोहरूपत्वं वा स्यात् । तथाहि - यथा खलु चेतनद्रव्यस्याभावोऽचेतनद्रव्यमचेतनद्रव्यस्याभावश्चेतनद्रव्यमिति तयोरनेकत्वं, तथा द्रव्यस्याभावो गुणो गुणस्याभावो द्रव्यमित्येकस्यापि द्रव्यस्यानेकत्वं स्यात् । यथा सुवर्णस्याभावे सुवर्णत्वस्याभाव: सुवर्णत्वस्याभावे सुवर्णस्याभाव इत्युभयशून्यत्वं, तथा द्रव्यस्याभावे गुणस्याभावो गुणस्याभावे द्रव्यस्याभाव इत्युभयशून्यत्वं स्यात् । यथा पटाभावमात्र एव घटो घटाभावमात्र एव पट इत्युभयोरपोहरूपत्वं तथा द्रव्या-भावमात्र एव गुणो गुणाभावमात्र एव द्रव्यमित्यत्राप्यपोहरूपत्वं स्यात् । ततो द्रव्यगुणयोरेक-त्वमशून्यत्व मनपोहत्वं चेच्छता यथोदित एवातद्भावोऽभ्युपगन्तव्य: ॥१०८॥ एक द्रव्य में, जो द्रव्य है वह गुण नहीं है, जो गुण है वह द्रव्य नहीं है;—इस प्रकार जो द्रव्य का गुणरूप से (न होना) अथवा गुण का द्रव्यरूप से न होना, अतद्भाव है; क्योंकि इतने से ही अन्यत्व व्यवहार (अन्यत्वरूप व्यवहार) सिद्ध होता है । परन्तु द्रव्य का अभाव गुण है, गुण का अभाव द्रव्य है;—ऐसे लक्षण वाला अभाव वह अतद्भाव नहीं है । यदि ऐसा हो तो
१अपोहरूपता = सर्वथा नकारात्मकता; सर्वथा भिन्नता । (द्रव्य और गुण में एक-दूसरे का केवल नकार ही हो तो 'द्रव्य गुणवाला है' 'यह गुण इस द्रव्य का है' -इत्यादि कथन से सूचित किसी प्रकार का सम्बन्ध ही द्रव्य और गुण के नहीं बनेगा) । २अनपोहत्व = अपोहरूपता का न होना; केवल नकारात्मकता का न होना । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ गुणगुणिनोः प्रदेशभेदनिषेधेन तमेव संज्ञादि-भेदरूपमतद्भावं दृढयति -- [जं दव्वं तं ण गुणो यद्द्रव्यं स न गुणः, यन्मुक्तजीवद्रव्यं स शुद्धः सन् गुणोन भवति । मुक्तजीवद्रव्यशब्देन शुद्धसत्तागुणो वाच्यो न भवतीत्यर्थः । जो वि गुणो सो ण तच्चमत्थादो योऽपि गुणः स न तत्त्वं द्रव्यमर्थतः परमार्थतः, यः शुद्धसत्तागुणः स मुक्तात्मद्रव्यं न भवति ।शुद्धसत्ताशब्देन मुक्तात्मद्रव्यं वाच्यं न भवतीत्यर्थः । एसो हि अतब्भावो एष उक्तलक्षणो हिस्फुटमतद्भावः । उक्तलक्षण इति कोऽर्थः । गुणगुणिनोः संज्ञादिभेदेऽपि प्रदेशभेदाभावः । णेव अभावो त्ति णिद्दिट्ठो नैवाभाव इति निर्दिष्टः । नैव अभाव इति कोऽर्थः । यथा सत्तावाचकशब्देन मुक्तात्म-द्रव्यं वाच्यं न भवति तथा यदि सत्ताप्रदेशैरपि सत्तागुणात्सकाशाद्भिन्नं भवति तदा यथा जीवप्रदेशेभ्यः पुद्गलद्रव्यं भिन्नं सद्द्रव्यान्तरं भवति तथा सत्तागुणप्रदेशेभ्यो मुक्तजीवद्रव्यं सत्तागुणाद्भिन्नं सत्पृथग्द्रव्यान्तरं प्राप्नोति । एवं किं सिद्धम् । सत्तागुणरूपं पृथग्द्रव्यं मुक्तात्मद्रव्यंच पृथगिति द्रव्यद्वयं जातं, न च तथा । द्वितीयं च दूषणं प्राप्नोति — यथा सुवर्णत्वगुणप्रदेशेभ्यो भिन्नस्य सुवर्णस्याभावस्तथैव सुवर्णप्रदेशेभ्यो भिन्नस्य सुवर्णत्वगुणस्याप्यभावः, तथा सत्तागुण-प्रदेशेभ्यो भिन्नस्य मुक्तजीवद्रव्यस्याभावस्तथैव मुक्तजीवद्रव्यप्रदेशेभ्यो भिन्नस्य सत्तागुणस्याप्यभावः इत्युभयशून्यत्वं प्राप्नोति । यथेदं मुक्तजीवद्रव्ये संज्ञादिभेदभिन्नस्यातद्भावस्तस्य सत्तागुणेन सहप्रदेशाभेदव्याख्यानं कृतं तथा सर्वद्रव्येषु यथासंभवं ज्ञातव्यमित्यर्थः ॥१०८॥ एवं द्रव्यस्यास्तित्व-कथनरूपेण प्रथमगाथा, पृथक्त्वलक्षणातद्भावाभिधानान्यत्वलक्षणयोः कथनेन द्वितीया, संज्ञालक्षण-प्रयोजनादिभेदरूपस्यातद्भावस्य विवरणरूपेण तृतीया, तस्यैव दृढीकरणार्थं च चतुर्थीति द्रव्यगुणयोरभेदविषये युक्तिकथनमुख्यतया गाथाचतुष्टयेन पञ्चमस्थलं गतम् । [जं दव्वं तण्ण गुणो] जो द्रव्य है, वह गुण नहीं है - जो मुक्तजीवद्रव्य है, वह शुद्ध सत् गुण नहीं है । मुक्तजीवद्रव्य शब्द से शुद्धसत्तागुण वाच्य नहीं है - ऐसा अर्थ है । [जो वि गुणो तो ण तच्चमत्थादो] - जो भी गुण है वह परमार्थ से तत्व-द्रव्य नहीं है, जो शुद्धसत्तागुण है- वह मुक्तजीवद्रव्य नहीं है । शुद्धसत्ता शब्द के द्वारा मुक्तजीवद्रव्य वाच्य नहीं होता है -ऐसा अर्थ है । [एसो हि अतब्भावो] - यह कहा गया लक्षण ही वास्तव में अतद्भाव है । कहा गया लक्षण - इसका क्या अर्थ है? गुण और गुणी में संज्ञादि भेद होने पर भी प्रदेशभेद का अभाव है - इस कहे गये लक्षण वाला अतद्भाव है- यह इसका अर्थ है । [णेव अभावो त्ति णिद्दिट्ठो] - (सर्वथा) अभाव नहीं है - ऐसा कहा है । (सर्वथा) अभाव नहीं है - इसका क्या अर्थ है? जैसे सत्ता वाचक शब्द से मुक्तजीवद्रव्य वाच्य नहीं होता है, वैसे ही यदि सत्ता के प्रदेशों द्वारा भी सत्तागुण से वह भिन्न है, तो जैसे- जीव के प्रदेशों से भिन्न पुद्गलद्रव्य भिन्न सत्-दूसरा द्रव्य है; उसीप्रकार सत्तागुण के प्रदेशों से भिन्न मुक्तजीवद्रव्य, सत्तागुण से भिन्न होते हुये पृथक दूसरे द्रव्य प्राप्त होते हैं । इससे क्या सिद्ध होगा? इससे सत्तागुणरूप पृथक् द्रव्य और मुक्तजीवद्रव्यरूप पृथक् द्रव्य - इसप्रकार दो द्रव्य सिद्ध होते है परन्तु ऐसा नहीं है । और दूसरा दोष (भी) प्राप्त होता है - जैसे सुवर्णत्वगुण के प्रदेशों से भिन्न सुवर्ण का अभाव है, वैसे ही सुवर्ण के प्रदेशों से भिन्न सुवर्णत्वगुण का भी अभाव है; उसीप्रकार सत्तागुण के प्रदेशों से भिन्न मुक्त जीवद्रव्य का अभाव तथा मुक्त जीवद्रव्य के प्रदेशों से भिन्न सत्तागुण का भी अभाव सिद्ध होगा - इसप्रकार दोनों का ही अभाव प्राप्त होगा (परन्तु ऐसी वस्तुस्थिति नहीं है) । जैसे यह मुक्त जीव-द्रव्य में संज्ञा आदि भेदों से पृथक् उसका (सत्ता का) अतद्भाव तथा सत्तागुण के साथ (जीव सम्बन्धी) प्रदेशों के अभेद का व्याख्यान किया है; उसीप्रकार यथासंभव सभी द्रव्यों में जानना चाहिये-यह अर्थ है ॥११८॥ |