
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ सत्तद्रव्ययोर्गुणगुणिभावं साधयति - द्रव्यं हि स्वभावे नित्यमवतिष्ठमानत्वात्सदिति प्राक् प्रतिपादितम् । स्वभावस्तु द्रव्यस्य परिणामोऽभिहित: । य एव द्रव्यस्य स्वभावभूत: परिणाम:, स एव सदविशिष्टो गुण इतीह साध्यते । यदेव हि द्रव्यस्वरूपवृत्तिभूतमस्तित्वं द्रव्यप्रधाननिर्देशात्सदिति संशब्द्यते तदविशिष्ट-गुणभूत एव द्रव्यस्य स्वभावभूत: परिणाम: द्रव्यवृत्तेर्हि त्रिकोटिसमयस्पर्शिन्या: प्रतिक्षणं तेन तेन स्वभावेन परिणमनाद् द्रव्यस्वभावभूत एव तावत्परिणाम: । स त्वस्तित्वभूतद्रव्यवृत्त्यात्मककत्वात्सदविशिष्टो द्रव्यविधायको गुण एवेति सत्तद्रव्ययो-र्गुणगुणिभाव: सिद्धयति ॥१०९॥ द्रव्य स्वभाव में नित्य अवस्थित होने से सत् है,—ऐसा पहले (९९वीं गाथा में) प्रतिपादित किया गया है; और (वहाँ) द्रव्य का स्वभाव परिणाम कहा गया है । यहाँ यह सिद्ध किया जा रहा है कि जो द्रव्य का स्वभावभूत परिणाम है वही ‘सत्’ से अविशिष्ट (अस्तित्व से अभिन्न) ऐसा गुण है । जो द्रव्य के स्वरूप का वृत्तिभूत ऐसा जो अस्तित्व द्रव्यप्रधान कथन के द्वारा ‘सत्’ शब्द से कहा जाता है उससे अविशिष्ट (उस अस्तित्व से अनन्य) गुणभूत ही द्रव्यस्वभावभूत परिणाम है; क्योंकि द्रव्य की वृत्ति (अस्तित्व) तीन प्रकार के समय को (भूत, भविष्यत, वर्तमान काल को) स्पर्शित करती है, इसलिये (वह वृत्ति—अस्तित्व) प्रतिक्षण उस-उस स्वभावरूप परिणमित होती है । (इसलिये) प्रथम तो द्रव्य का स्वभावभूत परिणाम है; और वह (उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यात्मक परिणाम) अस्तित्वभूत ऐसी द्रव्य की वृत्तिस्वरूप होने से, ‘सत्’ से अविशिष्ट, द्रव्यविधायक (द्रव्य का रचयिता) गुण ही है । इस प्रकार सत्ता और द्रव्य का गुणगुणीपना सिद्ध होता है ॥१०९॥ |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथ सत्ता गुणो भवति, द्रव्यं च गुणी भवतीति प्रतिपादयति -- जो खलु दव्वसहावो परिणामो यः खलु स्फुटं द्रव्यस्य स्वभावभूतःपरिणामः पञ्चेन्द्रियविषयानुभवरूपमनोव्यापारोत्पन्नसमस्तमनोरथरूपविकल्पजालाभावे सति यश्चिदानन्दैकानुभूतिरूपः स्वस्थभावस्तस्योत्पादः, पूर्वोक्तविकल्पजालविनाशो व्ययः, तदुभयाधारभूतजीवत्वं ध्रौव्यमित्युक्तलक्षणोत्पादव्ययध्रौव्यात्मकजीवद्रव्यस्य स्वभावभूतो योऽसौ परिणामः सो गुणो स गुणोभवति । स परिणामः कथंभूतः सन्गुणो भवति । सदविसिट्ठो सतोऽस्तित्वादविशिष्टोऽभिन्नस्तदुत्पादादित्रयंतिष्ठत्यस्तित्वं चैकं तिष्ठत्यस्तित्वेन सह कथमभिन्नो भवतीति चेत् । 'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' इति वचनात् । एवं सति सत्तैव गुणो भवतीत्यर्थः । इति गुणव्याख्यानं गतम् । सदवट्ठिदं सहावे दव्वं ति सदवस्थितं स्वभावे द्रव्यमिति । द्रव्यं परमात्मद्रव्यं भवति । किं कर्तृ । सदिति । केन । अभेद-नयेन । कथंभूतम् । सत् अवस्थितम् । क्व । उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकस्वभावे । जिणोवदेसोयं अयं जिनोपदेश इति 'सदवट्ठिदं सहावे दव्वं दव्वस्स जो हु परिणामो' इत्यादिपूर्वसूत्रे यदुक्तं तदेवेदं व्याख्यानम्, गुणकथनं पुनरधिकमिति तात्पर्यम् । यथेदं जीवद्रव्ये गुणगुणिनोर्व्याख्यानं कृतं तथा सर्वद्रव्येषु ज्ञातव्यमिति ॥१०९॥ [जो खलु दव्वसहावो परिणामो] - जो वास्तव में द्रव्य का स्वभावभूत परिणाम-पंचेन्द्रिय विषयों के भोगरूप मन की क्रिया से उत्पन्न सम्पूर्ण मनोरथरूपी विकल्पसमूह का अभाव होने पर ज्ञानानन्द एक स्वभाव की अनुभूतिरूप निज में स्थिरतामय जो परिणाम - उसका उत्पाद पहले कहे हुये विकल्पसमूहों का अभावरूप व्यय और उन दोनों का आधारभूत जीवत्वरूप धौव्य- इसप्रकार कहे गये लक्षणवाले उत्पाद-व्यय-धौव्य स्वरूप स्वभावभूत जो वह जीवद्रव्य का परिणाम है, [सो गुणो] - वह गुण है । वह परिणाम कैसा होता हुआ गुण है? [सदविसिट्ठो] - वे उत्पादादि तीनों एक अस्तित्व से अभिन्न- एक अस्तित्वरूप रहते हैं । वे अस्तित्व के साथ अभिन्न कैसे होते हैं? यदि ऐसा प्रश्न हो तो (उत्तर देते है) 'सत् उत्पाद-व्यय-धौव्यस्वरूप है' - ऐसा वचन होने से वे सब अस्तित्व से अभिन्न हैं । ऐसा होने पर सत्ता ही गुण है - यह अर्थ है । इसप्रकार गुण का कथन हुआ । [सदवट्ठिदं सहावे दव्वं ति] - स्वभाव में स्थित सत् द्रव्य है, द्रव्य अर्थात् परमात्मद्रव्य है । सत् द्रव्य कैसे है? अभेदनय से सत् द्रव्य है । कैसा सत् द्रव्य है? अच्छी तरह से स्थित सत् द्रव्य है । कहाँ स्थित सत् द्रव्य है? उत्पाद-व्यय-धौव्य स्वरूप स्वभाव में स्थित सत् द्रव्य है । [जिणोवदेसोयं] - यह जिनोपदेश है । "सदवट्ठिदं सहावे दव्वं दव्वस्स जो हु परिणामो" - स्वभाव में अवस्थित द्रव्य सत् है, वास्तव में द्रव्य का जो परिणमन है-----''इत्यादि पहले (प्रवचनसार, गाथा १०९) गाथा में जो कहा था, वही यह व्याख्यान है; मात्र गुण का कथन अधिक है- यह तात्पर्य है । जैसे यह जीव द्रव्य में गुण्-गुणी का व्याख्यान किया है, उसी प्रकार सभी द्रव्यों में जानना चाहिये ॥११९॥ |