
अमृतचंद्राचार्य : संस्कृत
अथ द्रव्यस्य सदुत्पादासदुत्पादयोरविरोधं साधयति - एवमेतद्यथोदितप्रकारसाकल्याकलङ्कलाञ्छनमनादिनिधनं सत्स्वभावे प्रादुर्भावमास्कन्दति द्रव्यम् । स तु प्रादुर्भावो द्रव्यस्य द्रव्याभिधेयतायां सद्भावनिबद्ध एव स्यात्; पर्यायाभिधेयतायां त्वसद्भावनिबद्ध एव ।तथाहि - यदा द्रव्यमेवाभिधीयते न पर्यायास्तदा प्रभवावसानवर्जिताभिर्यौगपद्य-प्रवृत्तभिर्द्रव्यनिष्पादिकाभिरन्वयशक्तिभि: प्रभवावसानलाञ्छना क्रमप्रवृत्त: पर्याय-निष्पादिका व्यतिरेकव्यक्तीस्तास्ता: संक्रामतो द्रव्यस्य सद्भावनिबद्ध एव प्रादुर्भाव: हेमवत् । तथाहि - यदा हेमैवाभिधीयते नाङ्गदादाय: पर्यायास्तदा हेमसमानजीविताभिर्यौगपद्य-प्रवृत्तभिर्हेमनिष्पादिकाभिरन्वयशक्तिभिरङ्गदादिपर्यायसमानजीविता: क्रमप्रवृत्त अङ्गदादि- पर्यायनिष्पादिका व्यतिरेकव्यक्तीस्तास्ता: संक्रामतो हेम्न: सद्भावनिबद्ध एव प्रादुर्भाव: । यदा तु पर्याय एवाभिधीयन्ते न द्रव्यं तदा प्रभवावसानलाञ्छनाभि: क्रमप्रवृत्तभि: पर्याय-निष्पादिकाभर्व्यतिरेकव्यक्तिभिस्ताभिस्ताभि: प्रभवावसानवर्जिता यौगपद्यप्रवृत्त द्रव्य-निष्पादिका अन्वयशक्ति: संक्रामतो द्रव्यस्यासद्भावनिबद्ध एव प्रादुर्भाव: हेमवदेव । तथाहि यदाङ्गदादिपर्याया एवाभिधीयन्ते न हेम, तदाङ्गदादिपर्यायसमानजीविताभि: क्रमप्रवृत्तभिरङ्गदादिपर्यायनिष्पादिकाभिर्व्यक्तिभिस्ताभिस्ताभिर्हेमसमानजीविता यौगपद्य-प्रवृत्त हेमनिष्पादिका अन्वयशक्ति: संक्रामतौ हेम्नोऽसद्भावनिबद्ध एव प्रादुर्भाव: । अथ पर्यायाभिधेयतायामप्यसदुत्पत्तै पर्यायनिष्पादिकास्तास्ता व्यतिरेकव्यक्तयो यौग-पद्यप्रवृत्तिमासाद्यान्यशक्तित्वमापन्ना: पर्यायान् द्रवीकुर्यु: । तथाङ्गदादिपर्यायनिष्पादिकाभिस्ताभिस्ताभिर्व्यतिरेकव्यक्तिभियौगपद्यप्रवृत्तिमासा-द्यान्वयशक्तित्वमापन्नाभिरङ्गादिपर्याया अपि हेमीक्रियेरन् । द्रव्याभिधेयतायामपि सदुत्पत्तै द्रव्यनिष्पादिका अन्वयशक्तय: क्रमप्रवृत्तिमासाद्य तत्त- द्वय्यतिरेकव्यक्तित्वमापन्ना द्रव्यं पर्यायीकुर्यु:; तथा हेमनिष्पादिकाभिरन्वयशक्तिभि: क्रमप्रवृत्तिमासाद्य तत्तद्वय्यतिरेकमापन्नाभिर्हेमाङ्गदादिपर्यायमात्री क्रियेत । ततो द्रव्यार्थादेशात्सदुत्पाद:, पर्यायार्थादेशादसत् इत्यनवद्यम् ॥१११॥ इस प्रकार यथोदित (पूर्वकथित) सर्व प्रकार से १अकलंक लक्षण वाला, अनादिनिधन वह द्रव्य सत्स्वभाव में (अस्तित्वस्वभाव में) उत्पाद को प्राप्त होता है । द्रव्य का वह उत्पाद, द्रव्य की २अभिधेयता के समय सद्भाव-संबद्ध ही है और पर्यायों की अभिधेयता के समय असद्भाव-संबद्ध ही है । इसे स्पष्ट समझाते हैं :— जब द्रव्य ही कहा जाता है,—पर्यायें नहीं, तब
और जब पर्यायें ही कही जाती हैं, द्रव्य नहीं, तब
अब, पर्यायों की अभिधेयता (कथनी) के समय भी, असत्-उत्पाद में पर्यायों को उत्पन्न करने वाली वे-वे व्यतिरेक-व्यक्तियाँ युगपत् प्रवृत्ति प्राप्त अन्वय-शक्तिपने को प्राप्त होती हुई पर्यायों को द्रव्य करता है (पर्यायों की विवक्षा के समय भी व्यतिरेक-व्यक्तियाँ अन्वय-शक्तिरूप बनती हुई पर्यायों को द्रव्यरूप करती हैं); जैसे बाजूबंध आदि पर्यायों को उत्पन्न करने वाली वे-वे व्यतिरेक-व्यक्तियाँ युगपत् प्रवृत्ति प्राप्त करके अन्वय-शक्तिपने को प्राप्त करती हुई बाजुबंध इत्यादि पर्यायों को सुवर्ण करता है । द्रव्य की अभिधेयता के समय भी, सत्-उत्पाद में द्रव्य की उत्पादक अन्वय-शक्तियाँ क्रम-प्रवृत्ति को प्राप्त उस-उस व्यतिरेक-व्यक्तित्व को प्राप्त होती हुई, द्रव्य को पर्यायें (पर्यायरूप) करती हैं; जैसे सुवर्ण की उत्पादक अन्वय-शक्तियाँ क्रम-प्रवृत्ति प्राप्त करके उस-उस व्यतिरेक-व्यक्तित्व को प्राप्त होती हुई, सुवर्ण को बाजूबंधादि पर्यायमात्र (पर्यायमात्र-रूप) करती हैं । इसलिये द्रव्यार्थिक कथन से सत्-उत्पाद है, पर्यायार्थिक कथन से असत्-उत्पाद है -- यह बात अनवद्य (निर्दोष, अबाध्य) है ॥१११॥ १अकलंक = निर्दोष (यह द्रव्य पूर्वकथित सर्वप्रकार निर्दोष लक्षणवाला है) । २अभिधेयता = कहने योग्यपना; विवक्षा; कथनी । ३अन्वयशक्ति = अन्वयरूपशक्ति । ( अन्वयशक्तियाँ उत्पत्ति और नाश से रहित हैं, एक ही साथ प्रवृत्त होती हैं और द्रव्य को उत्पन्न करती हैं । ज्ञान, दर्शन, चारित्र इत्यादि आत्म-द्रव्य की अन्वय-शक्तियाँ हैं) । ४व्यतिरेक-व्यक्ति = भेदरूप प्रगटता । (व्यतिरेक-व्यक्तियाँ उत्पत्ति विनाश को प्राप्त होती हैं, क्रमश: प्रवृत्त होती हैं और पर्यायों को उत्पन्न करती हैं । श्रुतज्ञान, केवलज्ञान इत्यादि तथा स्वरूपाचरण-चारित्र, यथाख्यात-चारित्र इत्यादि आत्म-द्रव्य की व्यतिरेक-व्यक्तियाँ हैं । व्यतिरेक और अन्वय के अर्थों के लिये ११ ९वें पृष्ठ का फुटनोट/टिप्पणी देखें) । ५सद्भावसंबद्ध = सद्भाव-अस्तित्व के साथ संबंध रखनेवाला, -संकलित । द्रव्य की विवक्षा के समय अन्वय शक्तियों को मुख्य और व्यतिरेक-व्यक्तियों को गौण कर दिया जाता है, इसलिये द्रव्य के सद्भाव-संबद्ध उत्पाद (सत्-उत्पाद, विद्यमान का उत्पाद) है । ६असद्भावसंबद्ध - अनस्तित्व के साथ सबंधवाला - संकलित । (पर्यायों की विवक्षा के समय व्यतिरेक-व्यक्तियों को मुख्य और अन्वय-शक्तियों को गौण किया जाता है, इसलिये द्रव्य के असद्भाव-संबद्ध उत्पाद (असत्-उत्पाद, अविद्यमान का उत्पाद) है । |
जयसेनाचार्य : संस्कृत
अथद्रव्यस्य द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकनयाभ्यां सदुत्पादासदुत्पादौ दर्शयति -- एवंविहसब्भावे एवंविधसद्भावेसत्तालक्षणमुत्पादव्ययध्रौव्यलक्षणं गुणपर्यायलक्षणं द्रव्यं चेत्येवंविधपूर्वोक्तसद्भावे स्थितं, अथवा एवंविहं सहावे इति पाठान्तरम् । तत्रैवंविधं पूर्वोक्तलक्षणं स्वकीयसद्भावे स्थितम् । किम् । दव्वं द्रव्यं कर्तृ । किं करोति । सदा लभदि सदा सर्वकालं लभते । किं कर्मतापन्नम् । पादुब्भावं प्रादुर्भावमुत्पादम् । कथंभूतम् । सदसब्भावणिबद्धं सद्भावनिबद्धमसद्भावनिबद्धं च । काभ्यां कृत्वा । दव्वत्थपज्जयत्थेहिं द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकनयाभ्यामिति । तथाहि -- यथा यदा काले द्रव्यार्थिकनयेन विवक्षा क्रियते यदेवकटकपर्याये सुवर्णं तदेव कङ्कणपर्याये नान्यदिति, तदा काले सद्भावनिबद्ध एवोत्पादः । कस्मादितिचेत् । द्रव्यस्य द्रव्यरूपेणाविनष्टत्वात् । यदा पुनः पर्यायविवक्षा क्रियते कटकपर्यायात् सकाशादन्यो यःकङ्कणपर्यायः सुवर्णसम्बन्धी स एव न भवति, तदा पुनरसदुत्पादः । कस्मादिति चेत् । पूर्वपर्यायस्यविनष्टत्वात् । तथा यदा द्रव्यार्थिकनयविवक्षा क्रियते य एव पूर्वं गृहस्थावस्थायामेवमेवं गृहव्यापारंकृतवान् पश्चाज्जिनदीक्षां गृहीत्वा स एवेदानीं रामादिकेवलिपुरुषो निश्चयरत्नत्रयात्मकपरमात्मध्याने-नानन्तसुखामृततृप्तो जातः, न चान्य इति, तदा सद्भावनिबद्ध एवोत्पादः । कस्मादिति चेत् ।पुरुषत्वेनाविनष्टत्वात् । यदा तु पर्यायनयविवक्षा क्रियते पूर्वं सरागावस्थायाः सकाशादन्योऽयंभरतसगररामपाण्डवादिकेवलिपुरुषाणां संबन्धी निरुपरागपरमात्मपर्यायः स एव न भवति, तदा पुनरसद्भावनिबद्ध एवोत्पादः । कस्मादिति चेत् । पूर्वपर्यायादन्यत्वादिति । यथेदं जीवद्रव्ये सदुत्पादा-सदुत्पादव्याख्यानं कृतं तथा सर्वद्रव्येषु यथासंभवं ज्ञातव्यमिति ॥१११॥ [एवंविहसब्भावे] इसप्रकार के सद्भाव में -
वह इसप्रकार- जैसे
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